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Sunday, 29 March 2026

PANIPAT @ROHILA VEER GANGA SINGH MAHECHA RATHOD ROHILA RAJPUT AND THE BATTLE OF PANIPAT

*इतिहास के पन्नो में दर्ज है वीर गंगा सिंह महेचा राठौड़ और अन्य रोहिला राजपूतों का पराक्रम*
*पानीपत के तीसरे युद्ध में हुआ था वीर गंगा सिंह महेचा राठौड़ रोहिला राजपूत और उसकी सेना का बलिदान*

*14 जनवरी सन 1761 ईसवी दिन बुधवार मकर सक्रांति को दिया हिंदुत्व के लिए सर्वोच्च बलिदान**🤺🤺🤺🤺🎠🎠🎠🏇🏼
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*पानीपत के मैदान में समय 2बजे** *अपराह्न,जनवरी की हाड़ कंपाने वाली सर्दी,कोहरा और बिजली की गड़गड़ाहट से बारिश के भयावह मौसम में*
*1400 रोहिले राजपूत वीर गंगा सिंह उर्फ गंगा सहाय महेचा राठौड़ रोहिला राजपूत के नेतृत्व में कूद पड़े हिन्दू धर्म रक्षार्थ युद्ध भूमि पर रुहेला सरदार नजीब खान(नजीबुद्दोला) बंगस व आक्रांता अहमद शाह दुर्रानी अब्दाली के विरुद्ध लड़ रहे मराठो की ओर से* 😇😇🎠🎠🤺🤺🏇🏼🏇🏼🏇🏼 *छिड़ गया घमासान युद्ध! कट कट गिर रहे अब्दाली के सैनिक ।कट कट गिर रहे थे गद्दार रुहेले नजीब खान के रूहेले बंगस बारेच पठान*।
*परन्तु हुआ क्या, गार्दी की टॉप सामने आ गयी* *और8 मुसलमानों के चिथड़े उड़ने लगे 1400 रोहिले राजपूतो की एक टुकड़ी मुख्य सेना से बिछुड़ गयी और अफगानों ने उन्हें घेर लिया वीर राठौड़ गंगा सिंह रोहिला ऊर्फ गंगा सहाय महेचा व उनके साथी हजारो अफगानों का संहार करते हुए सांय पांच बजे वीर गति को प्राप्त हुए* ।
*मराठो की हार हुई अपनी ही तोप के सामने अपनी ही सेना आ गई थी ! उधर सदाशिव राव भाऊ के भतीजे विश्वास राव घायल होकर गिरे तो भाऊ हाथी से उतर के घोड़े पर आ गए युद्ध करने हेतु तो हाथी पर भाऊ को न देख कर सेना भागने लगी और तितर बितर हो गई ।क्या दुखद हार हुई !!जीती हुई* *पानीपत की तीसरी लड़ाई को मराठे जीत कर भी एक घण्टे में हार गए* ।
उत्तर भारत की रक्षार्थ आये मराठो का साथ अन्य राजपूतो जाटो गुज्जरों ने नही दिया क्योंकि मराठे उनसे कर वसूलते थे,और अकेले पड़े हिंदुत्व के लिए लड़े मराठो का साथ सदा शिव राव भाऊ के सेनापति के रूप में सेना में भर्ती हो वीर रोहिला गंगा सिंह महेचावत ने अपना जीवन का सर्वोच्च बलिदान देकर भी दिया ।
वीर गंगा सिंह रोहिला की रानी रामप्यारी देवी mudahad राजपूत रियासत कलायत के कपिल मुनि आश्रम में सती हुई और वही वीर रोहिला गंगा सिंह की समाधि स्थापित की गई।
इसी वंश के
*भवानी सिंह महेचा राठौड़ रोहिला राजपूत तांत्या टोपे की सेना में सेनापति थे जब झांसी की रानी को ह्यूरोज ने घायल किया तो जनरल भवानी सिंह महेचराना ने अपने 16 सेनिको के साथ रक्षा कवच तैयार कर अंग्रेजो से उनकी रक्षा करते रहे और लक्ष्मी बाई को सुरक्षित एक जंगल में कुटिया तक पहुंचाया था किंतु अंग्रेजो के हाथ नही पड़ने दिया*,
 *सन 1858 ईसवी।*

*आज भी महेचा राठौड़ रोहिला राजपूत कलायत ,अंबाला और यमुना पार कर पूरब की ओर उत्तर प्रदेश के जनपद सहारनपुर के दस गांव में आबाद है,इसी वंश के ठाकुर हरिसिंह रोहिला एक महान स्वतंत्रता सेनानी थे ,जिनकी घोड़ी छोटी ट्रेन से भी तेज दौड़ती थी। उनके वंशज आज भी गांव घाठेड़ा,सहारनपुर और करनाल में रहते है।।
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🔥 तीसरा पानीपत का युद्ध (1761) — इतिहास का सबसे खतरनाक टकराव ⚔️

14 जनवरी 1761… हरियाणा के पानीपत के मैदान में वो जंग लड़ी गई जिसने भारत की राजनीति की दिशा बदल दी।

🛡️ एक तरफ मराठा साम्राज्य — ताकत, संख्या और आत्मविश्वास
⚔️ दूसरी तरफ अहमद शाह अब्दाली — रणनीति, धैर्य और घेराबंदी

👉 शुरुआत में मराठा सेना भारी पड़ी…
👉 लेकिन रसद कट गई, घेराव हुआ, और हालात पलट गए
👉 चारों तरफ से हमला… और इतिहास का सबसे भयावह नरसंहार

💔 हजारों सैनिक मारे गए
💔 मराठा शक्ति को गहरा झटका
💔 भारत की सत्ता का संतुलन पूरी तरह बदल गया

📌 ये सिर्फ एक युद्ध नहीं था…
ये वो मोड़ था जिसने आने वाले समय में अंग्रेजों के उदय का रास्ता साफ किया

⚠️ सबक:
रणनीति > संख्या
सप्लाई लाइन > शक्ति
और एक गलती… पूरी लड़ाई पलट सकती है

🔥 इतिहास सिर्फ कहानी नहीं, चेतावनी है।

*विशेष नोट "__यहां प्रदर्शित सभी चित्र सोसल मीडिया से उद्धरत है इन पर लेखक का कोई अधिकार नहीं है ये पाठको को समझाने हेतु प्रतीकात्मक रूप से दर्शाए गए है।। ये सभी सोसल मीडिया की संपत्ति है।।

Tuesday, 24 March 2026

SOME FACTS ABOUT ROHILA SANGTHAN

*अतीत और वर्तमान के दर्पण में थिरकते चित्र बोलते हैं, कि उनके होने का प्रमाण क्या है।।*
*1..रोहिला क्षत्रियों के विस्थापन और गदर1857 में उनके विरुद्ध शूट एट साइट का यानी देखते ही गोली मारने का आदेश जारी होने के बाद से परचून की हालत में बिखरना और ब्रिटिश काल में रोहिलखंड में अफगानों के शासन से इनकी पहचान विलुप्त होने के मुख्य कारण पाए गए* *प्रथम विश्व युद्ध के बाद रोहिला क्षत्रिय रोहिला राजपूत सरनेम से संगठित होने आरंभ हुए क्योंकि वक्त बदलता है रक्त नही*
*2..सन1930में युद्ध समाप्ति के एक दशक बाद महारानी विक्टोरिया ने जातिगत जनगणना कराई,पुरानी दिल्ली में जनगणना से समय कोई संगठन सक्रिय नही था,जो मार्ग दर्शन कर सके तो कुछ लोगो ने स्वयं को रोहिला टांक क्षत्रिय,कुछ लोगो ने टांक रोहिला क्षत्रिय लिखवाया और कार्य वही दोनो जिनका हवाला आज भी देते है दुहाई भी देते है,किंतु क्षत्रिय शब्द दोनो तरह से बताने वाले लोगो ने नही छोड़ा क्योंकि वे अपना और अपने पूर्वजों का इतिहास अभी भूले नही थे,इस जनगणना की रिपोर्ट सेंसस कमिश्नर जे एच हटशन ने ब्रिटिश हाई कमिश्नर को22दिसंबर1930, को सौंप दी जिसमे क्लियर अनुमोदित किया कि जाति के हिसाब से इन दोनो मिक्सड शब्दो के उपनाम से रोहिला टांक क्षत्रिय से टांक को अविलंब भिन्न /अलग किया जाए* *अतः सिद्ध होता है कि रोहिला क्षत्रिय उपनाम ब्रिटिश काल से प्रमाणिक है और दोनो समुदाय अलग अलग है**सामान्य क्षत्रिय केटेगरी में उल्लिखित है*
*4.1931 ईसवी में रोहिलखंड से विस्थापित होकर आए परचून की हालत में बिखरे पड़े इन क्षत्रिय परिवारों ने संगठित होने की योजना बनाई, और खुल कर सामने आ गए जबकि स्वतंत्रता के लिए देश भर में आंदोलन और संघर्ष जारी था बहुत से रोहिला राजपूत आजादी की जंग में कूद पड़े,और कही पर रोहिला क्षत्रिय और कही पर रोहिला राजपूत जाने गए ,कुछ स्थानों पर अभी अज्ञात वास जैसी ही हालत रही और पेशेगत जातियों के उपनाम को धारण कर जाने गए,उत्तर भारत में रोहिलखंड राजपूताना से विस्थापन लगभग चार सदी तक चलता रहा और 1720में पूर्णतया रोहिलखंड अफगानों के अधिकार में आ गया और वे खुद रुहेला सरदार /नवाब बन गए,इसके अतिरिक्त भारत में रोहिला क्षत्रियों की काठ ,कठ शाखा की विभिन्न नामों से लगभग69राजपूत रियासते थी जिनका उल्लेख यहां करना अप्रासंगिक है *एक संगठन रोहिला राजपूत नाम से बना जिसने इतिहास रोहिला राजपूत लिखवाए और खोज खोज कर अपने भाईयो को जोड़ा उनके गोत्रों की लिस्ट बनाई दूसरा संगठन रुहेला क्षत्रिय नाम से बना उन्होंने रुहेला क्षत्रिय जाति निर्णय नाम से इतिहास संकलित कराया* 
*5..दिल्ली में कोई संगठन आजादी से पहले नही बन पाया और भारत 1947, में आजाद हो गया* *1970 के दशक में हजारी लाल वर्मा जी जो एक पत्रिका निकालते थे और प्रेस रिपोर्ट भी बनाते थे उन्होंने टांक रोहिला क्षत्रिय नाम के संगठन बनाए जिनकी संख्या दिल्ली में आज लगभग दस है किसी का नाम रोहिला टांक सभा किसी का टांक रोहिला सभा है इनमे अन्य और पेशेगत जातियों के लोग सदस्य है किंतु 2014 तक सामान्य ही रहे यानी क्षत्रिय ही रहे सन2014, में टोंक नाम से दिल्ली में पिछड़े वर्ग में अधिसूचित हुए,रोहिला क्षत्रिय सामान्य में ही है ओबीसी नही है*
*दिल्ली के अंदर टांको के रोहिला राजपूतों के साथ रोहिला टांक महासभा नाम के संगठन होने के कारण कुछ लोगो ने वहां भी पिछड़ी का जिन्न खड़ा कर दिया है और रोहिला राजपूतों का सामान्य में रह जाना हजम नही हो रहा और रोहिला राजपूत को रुहेला जाति बता कर संख्या बढ़ाने की बात कहते हुए पिछड़ी जाति के लिए आवेदन किया गया बताया गया है ,कुछ राजनीतिक महत्वाकांक्षी लोग संख्या बल दिखा कर अपनी पैठ दिल्ली की राजनीति में बनाना चाहते है कि में इतनी पिछड़ी जातियों का सरदार हूं मुझे आम आदमी पार्टी टिकट दे दे यंत्री मनोनित कर दे ऐसे लोग रोहिला क्षत्रिय समाज के अस्तित्व के लिए घातक सिद्ध हो रहे है।अभी सर्वे हो गया बताया गया है किंतु रोहिला एक क्षत्रिय खाप है सरनेम है और सरनेम को जाति नही बनाया जा सकता,इस लिए अभी स्थिति साफ नही रोहिला क्षत्रियो का दिल्ली में क्या होगा पिछड़ी में रुहेला जाति स्वीकार करेंगे या रोहिला राजपूत बने रहेंगे*जबकि ओल्ड दिल्ली सेंसस में सेंसस कमिश्नर जे एच हटन ने अपनी रिपोर्ट दिनांक 30दिसंबर 1930में  स्पष्ट उल्लेख किया था कि रोहिला क्षत्रिय को जातीय दृष्टि से टांक छिपी दर्जी कास्ट टांक से अविलंब अलग समझा जाए।
*6..1984 में कुछ रोहिला क्षत्रिय लोगो ने डॉक्टर कर्ण वीर सिंह रोहिला चंडीगढ़ के नेतृत्व में निर्णय लिया कि विशुद्ध रोहिला क्षत्रियों का एक अलग संगठन बनाया जाय जिससे भ्रमित हो रहा यह क्षत्रिय समाज जो पेशेग्गत जातियों की दल दल में  धंसता जा रहा है उनकी भीड़ में गुम होता जा रहा है अपनी मौलिक पहचान बनाए और क्षत्रियों की मुख्य धारा की ओर चले, संगठन बन गया इतिहास लिखा गया और1989, के अक्टूबर माह की,22, तारीख को एक महाअधिवेशन बुलाया गया जिसमे इतिहास का विमोचन हो गया और मुख्य धारा के क्षत्रियों ने रोहिला क्षत्रियों को अपना अभिन्न अंग मानते हुए आवाह्न किया कि रोहिला क्षत्रियों को किन्ही अन्य पेशेगत जातियों के स्थान पर अपनी पहचान एक राजपूत/क्षत्रिय के रूप में बनानी चाहिए क्योंकि उनकी वंशावली इतिहास और भूगोल पूर्णतया जीवित है**इस संगठन का नाम रखा गया अखिल भारतीय रोहिला क्षत्रिय विकास परिषद रजिस्टर्ड*
*भारत  भ्रमण के समय डॉक्टर कर्ण वीर सिंह रोहिला जी के साथ लगभग एक सो पचास विशुद्ध रोहिला क्षत्रिय राजपूत समाज के लोगों का एक बड़ा समूह था जो बारी बारी से साथ चलते और जनजागरण करते थे।रोहिला क्षत्रिय समाज को गौरवान्वित पहचान दिलाने हेतु विचार करते थे।*
*7..अब दौर चला कि जोर शोर से प्रचार किया जाए इतिहास बताया जाए रोहिला को क्षत्रिय/राजपूत साबित करने में कोर कसर न छोड़ी जाए।। सभी रोहिला क्षत्रिय अति उत्साह से परिपूर्ण रहे और कार्य करते रहे समाज संगठित होने लगा* *1995ईसवी में हरियाणा में रोहिला क्षत्रिय को क्षत्रिय शब्द हटा कर केवल रोहिला को चार पेशेगत जातियों के साथ पिछड़े वर्ग में सात प्रतिशत के आरक्षण में अधिसूचित कराया गया इसमें जो धोखा हो गया और किसने कैसे किया यदि बखान किया जाए तो रोहिला क्षत्रिय समाज के बने हुए सभी संगठन के अध्यक्षों नेताओ की भारी भूल उजागर होगी जिससे समाज विघटित हो गया एक विजातीय राजनीतिक सामाजिक प्रतिनिधि ने रिश्तों का हवाला दिया था तथा मिलते जुलते कार्य करने वाली सभी जातियों के साथ मिलकर रोहिला क्षत्रिय समाज का भी उल्लेख क्षत्रिय राजपूत शब्द हटा के केवल रोहिल्ला उल्लिखित कराया*
*मध्य प्रदेश में एक ही विधान सभा क्षेत्र में रोहिला राजपूतों के लगभग नब्बे गांव है सभी राजपूत ठाकुर पटेल जमींदार है वे किस ई पेशेगत जाति को नही जानते और न ही वे उनसे संबंधित है राजनीति के एक लालची नेता ने रूवला रुवाला नाम की किसी जाति के साथ पिछड़े वर्ग में अधिसूचित कर दिया अपनी वोटो की संख्या बढ़ाने के लालच में हो यो गया कि कोई सामाजिक संगठन नही था किसान संगठन थे*
*8..आज समय आया इलेक्ट्रोनिक मीडिया सोसल मीडिया का और सगठन में वर्चस्व की जंग का संघ संगठन बने रोहिला क्षत्रिय समाज बिखर गया और युवा वर्ग जाग गया जो इतनी जानकारी प्राप्त कर चुका है कि स्वाभिमान से रोहिला राजपूत कहता है और मुख्य धारा में लोटना चाहता है सम्पूर्ण राजपूत क्षत्रिय समाज रोहिला क्षत्रियों को एकता के लिए पुकारता है और पूर्ण सपोर्ट करने लगा है अपने राजपूत संगठनों में लेने के लिए उतारू है रोहिला क्षत्रियों का सम्मान लोटा लाया है आज का युवा और धीरे धीरे आर्थिक हालात भी काबू में आ गए है*
*दूरस्थ गांव की हालत भी ठीक है उनकी पहचान रोहिला क्षत्रिय के नाम से बनती जा रही है युवाओं का सर्किल विस्तृत हो गया सम्मान बढ़ गया है*
*9.इस पुनरोत्थान, पुनरोत्कर्श के काल में क्षत्रिय शब्द का अकाल पड़ गया अचानक ज्ञात हुआ कि उत्तर प्रदेश में भी कुछ महत्वाकांक्षी रोहिला प्रतिनिधियों ने राजनीतिक लाभ लेने और संख्या ओबीसी की बढ़ाने के लालच में निवेदन किया था कि जिस प्रदेश में राजपूताना रोहिलखंड है वहा भी रोहिला राजपूतों को रुहेला जाति मानते हुए पिछड़े वर्ग में डाला जाए*
**10..जबकि आज उत्तर प्रदेश में तीन सो जातियों को जो पिछड़ी है सत्ताइस प्रतिशत आरक्षण नही मिलेगा, संख्याबल और कार्य के आधार पर चार श्रेणी में बांटा गया है, रुहेला जी को पिछड़ी में संभवतः दो प्रतिशत का ही लाभ मिल पाएगा, राजनीतिक लाभ हेतु सम्पूर्ण समाज के अस्तित्व को खतरे में डाल रहे चंद लोग संख्या बल बढ़ाने के लिए अन्य दस जातिगत लोगो में विलय होकर रोहिला राजपूत समाज को उन जातियों का घटक बता कर उनके साथ रुहेला रोहिला सरनेम लिख कर राजनीतिक लाभ लेने हेतु अलग संगठन उनके साथ मिल कर बना लिए है,स्वयंभू नेता बने उनके सरकार को भ्रमित कर रोहिला राजपूत समाज से भी छलावा किया जा रहा है*
*यदि तीन दशक पहले ज्ञान शून्य कुछ समाज के ठेकेदारों ने उत्तर प्रदेश में पिछड़ी के लिए आवेदन कर भी दिया था तो उनसे अधिक शिक्षित आज के ठेकेदारों को जो वर्तमान में रोहिला क्षत्रिय सगठनों के नेता है और उच्चतम शिक्षित है क्या उन्हे वर्तमान स्थिति का आकलन नहीं करना चाहिए था कि अब आर्थिक आधार पर सवर्ण आरक्षण लेने और सामान्य में पजीकृत कराने में लाभ है या पिछड़ी में जाने में, किंतु उन्हें केवल अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकनी है और निजी लाभ हेतु सम्पूर्ण रोहिला क्षत्रिय समाज के उपनाम को उपयोग में लाना है दिमागी कसरत क्यों करे* आगामी जनगणना में रोहिला क्षत्रिय का उल्लेख तभी होगा जबकि रोहिला राजपूत समाज के लोग अपनी वास्तविक पहचान लिखेंगे।
*शिक्षा आदमी को आंतरिक रूप से परफेक्ट बनाती है किंतु उच्च शिक्षित आज के नेताओ की मति भ्रष्ट हो गई और सोचने और सामाजिक पहलुओं पर अध्ययन करने की शक्ति शून्य हो गई है अथवा कोई समय नहीं लगाना चाहते और फालतू मे नेता बन गले में मालाएं डलवाते और राजपूताना पगड़ी धारण कर उसकी लाज गंवाते फिरते है समाज की कोई चिंता नहीं अपनी चमक के सामने*
*यह कार्य चंद लोगो ने अपनी मर्जी से किया बताया गया जिसमें उत्तर प्रदेश में निवास करने वाले हर आयु वर्ग के रोहिला राजपूत/,,क्षत्रिय परिवारों की कोई लिखित प्रस्तावित वार्ता रूपी सलाह सहमति नही है* 
*इस लिए सभी छ संगठनों ने जो रोहिला क्षत्रिय शब्द के साथ बने थे क्षत्रिय बोलना छोड़ दिया है ताकि पिछड़ी में आने में कोई अड़चन क्षत्रिय खुद को कहने में न आ जाए इसे कहते है आज वक्त बदलता है तो रक्त भी बदल जाता है पुरानी कहावत गलत सिद्ध हुई*
*प्रश्न*
*कृपया बताए सभी पाठक कि अचानक आई इस राजनीतिक बिसात की दूषित हवा के झोंके में सामाजिक सगठनों के राजनीतिक सगठनों में परिवर्तन को कैसे रोका जाए और किया क्या जाए या कुछ न किया जाए क्या ठीक होगा या गलत होगा*
*भावी पीढ़ी का भविष्य लिखने वाले वर्तमान नेतृत्व को क्या अधिकार है कोई* ????
*कुछ बदलते परिवेश को ध्यान में रखते हुए चंद शब्दो में अपनी राय दे क्योंकि सभी रोहिला क्षत्रिय सगठनों का नब्बे वर्षो का सफर निरर्थक होता जा रहा है जहां से आरंभ किया था वही अंत होने जा रहा है जो पहचान रोहिला राजपूत समाज की बनी थी उसे निजी लाभ हेतु धूल धूसरित किया जा रहा है सामाजिक नेता ज्ञान,स्वाभिमान शून्य होकर पिछलग्गू बन कर रोहिला क्षत्रिय समाज के साथ छलावा करने पर आमदा हो रहे है इस लिए आत्म चिंतन करते हुए रोहिला क्षत्रिय समाज के हितों की रक्षा के लिए सोचिए, कि आज ओबीसी में जाने में रोहिला क्षत्रिय समाज का कितना नुकसान हो जायेगा और कुछ अवश्य बोलिए आपकी अति कृपा होगी और भावी पीढ़ी का मार्ग दर्शन और भविष्य निर्धारण भी*
*धन्यवाद*
*निवेदक*
*हम आप और तुम

Monday, 23 March 2026

सहारनपुर , का नाम क्षत्रिय राजा सहारण वीर सिंह के नाम पर प्रचलित हुआ । SAHARANPUR NAGAR NAME

THE HISTORY OF THE NAME OF  SAHARANPUR 

एक विचारणीय प्रश्न 

*सहारनपुर के नामकरण को प्रमाणिकता देने के लिए त्रिलोचंदी बैंस राजपूतों का एक ऐतिहासिक लेख प्रस्तुत है,जिसके अनुसार सहारनपुर को बसाने नाम सहारनपुर देने वाले विस्तार देने वाले क्षत्रिय ही थे सूर्य वंशी बैंस राजपूतों के वंशधर त्रिलोक बैंस के वंश त्रिलोकचंदी बैंस सहारण वीर सिंह (सहारन एक क्षत्रिय सूर्य वंशी राजपूतों का गोत्र है)//सहारन वीर सिंह जिन्होंने बाद में जैन धर्म स्वीकार किया ,व्यापार किया तथा नगर की भव्य स्थापना कर विस्तार किया एक नव निर्माण किया इन क्षत्रियों ने आज वैश्य जैन त्रिलोकचंदी सहारनपुर में विराजमान है जिनका संगठन आज भी राजा त्रिलोक चंद बैंस की याद ताज़ा कराता है*
*पुर तथा खंड शब्द हिंदी संस्कृत प्राकृत भाषा में है,जिन शब्दों का प्रयोग वैदिक कालीन क्षत्रिय सभ्यता स्थापत्य से ही किया जाता रहा यही सनातन परंपरा है,जैसे भरत खंड,आदि और पुर का अर्थ नगर स्थापित करने से होता है*
*इसी कारण पुर अन्त्यांतक शब्द सनातन है और क्षत्रिय संस्कृति है जैसे सहारण से सहारनपुर ,शाह हारून के साथ पुर नहीं जोड़ा जा सकता किसी भी भाषा या व्याकरण की दृष्टि से( यह तुष्टिकरित मनघड़ंत और कुर्ताकिक लगता है)अब*
*पूरा लेख ध्यान पूर्वक पढ़ें जिससे सहारनपुर के नामकरण में फैला भ्रम दूर हो जाएगा*
*सहारन गोत्र क्षत्रिय गोत्र भी है जो सूर्य वंश की शाखा है,सहारण गोत्र बैंस वंशी क्षत्रियों में भी है*
*सहारन गोत्र रोहिलखंड के रोहिला राजपूतों व अन्य क्षत्रियों में भी पाया जाता है*
*त्रिलोक चंद बैंस क्षत्रिय के वंशज ही जैन धर्म स्वीकार करने के बाद त्रिलोकचंदी जैन कहे गए*
*जानिए ऐतिहासिक प्रमाण*

मित्रों आज हम आपको मध्य और पूर्वी उत्तर प्रदेश के बहुत सशक्त राजपूत वंश बैस क्षत्रियों के बारे में जानकारी देंगे, कृपया शेयर जरूर करें। 

बैस राजपूतो के गोत्र,प्रवर,आदि -

*वंश-बैंस सूर्यवंशी क्षत्रिय कुल है।हालाँकि कुछ विद्वान इन्हें नागवंशी भी बताते हैं।*

गोत्र-भारद्वाज है
प्रवर-तीन है : भारद्वाज ; बार्हस्पत्य और अंगिरस
वेद-यजुर्वेद 
कुलदेवी-कालिका माता
इष्ट देव-शिव जी 
ध्वज-आसमानी और नाग चिन्ह 
वंश नाम उचारण---
BAIS RAJPUT
Bhais Rajput
Bhains Rajput
Bhainse Rajput
Bains Rajput
Bens Rajput
Bhens Rajput
Bhense Rajput
Baise Rajput
Bes Rajput
Bayas Rajput
Vais Rajput

प्रसिद्ध बैस व्यक्तित्व---

शालिवाहन,हर्षवर्धन,त्रिलोकचंद,सुहेलदेव,अभयचंद,
राणा बेनीमाधवबख्श सिंह,मेजर ध्यानचंद आदि 

शाखाएँ---

कोट बहार बैस,कठ बैस,डोडिया बैस,त्रिलोकचंदी(राव,राजा,नैथम,सैनवासी) बैस,प्रतिष्ठानपुरी बैस,रावत,कुम्भी,नरवरिया,भाले सुल्तान,चंदोसिया,आदि

प्राचीन एवं वर्तमान राज्य और ठिकाने---

प्रतिष्ठानपुरी,स्यालकोट,स्थानेश्वर, मुंगीपट्टम्म,कन्नौज,बैसवाडा, कस्मांदा, बसन्तपुर, खजूरगाँव थालराई ,कुर्रिसुदौली, देवगांव,मुरारमउ, गौंडा, थानगाँव,कटधर आदि 

परम्पराएँ---

*बैस राजपूत नागो को नहीं मारते* हैं,नागपूजा का इनके लिए विशेष महत्व है,इनमे ज्येष्ठ भ्राता को टिकायत कहा जाता था,और सम्पत्ति का बड़ा हिस्सा आजादी से पहले तक उसे ही मिलता था। मुख्य गढ़ी में टिकायत परिवार ही रहता था और शेष भाई अलग किला/मकान बनाकर रहते थे। बैस राजपूतो में आपसी भाईचारा बहुत ज्यादा होता है। बिहार के सोनपुर का पशु मेला बैस राजपूतों ने ही प्रारम्भ किया था।

वर्तमान निवास---

यूपी के अवध में स्थित बैसवाडा, मैनपुरी, एटा, बदायूं, कानपूर,इलाहबाद,बनारस,आजमगढ़,बलिया,बाँदा, हमीरपुर,प्रतापगढ़,सीतापुर,रायबरेली,उन्नाव,लखनऊ,हरदोई,फतेहपुर,गोरखपुर,बस्ती,मिर्जापुर,गाजीपुर,गोंडा,बहराइच,बाराबंकी,बिहार,पंजाब,पाक अधिकृत कश्मीर,पाकिस्तान में बड़ी आबादी है और मध्य प्रदेश और राजस्थान के कुछ हिस्सों में भी थोड़ी आबादी है।

-बैस क्षत्रियों कि उत्पत्ति---

बैस राजपूतों कि उतपत्ति के बारे में कई मत प्रचलित हैं---

1-ठाकुर ईश्वर सिंह मढ़ाड कृत राजपूत वंशावली के पृष्ठ संख्या 112-114 के अनुसार सूर्यवंशी राजा वासु जो बसाति जनपद के राजा थे, उनके वंशज बैस राजपूत कहलाते हैं। बसाति जनपद का अस्तित्व महाभारत काल तक रहा है।

2-देवी सिंह मंडावा कृत राजपूत शाखाओं का इतिहास के पृष्ठ संख्या 67-74 के अनुसार वैशाली से निकास के कारण ही यह वंश वैस या बैस या वैश कहलाया,इनके अनुसार बैस सूर्यवंशी हैं। इनके किसी पूर्वज ने किसी नागवंशी राजा कि सहायता से उन्नति कि,इसीलिए बैस राजपूत नाग पूजा करते हैं और इनका चिन्ह भी नाग है। 

3-महाकवि बाणभट ने सम्राट हर्षवर्धन जो कि बैस क्षत्रिय थे उनकी बहन राज्यश्री और कन्नौज के मौखरी(मखवान,झाला) वंशी महाराजा गृहवर्मा के विवाह को सूर्य और चन्द्र वंश का मिलन बताया है,मौखरी चंद्रवंशी थे अत: बैस सूर्यवंशी सिद्ध होते हैं।

*4-महान इतिहासकार गौरिशंकर ओझा जी कृत राजपूताने का इतिहास के पृष्ठ संख्या 154-162 में भी बैस राजपूतों को सूर्यवंशी सिद्ध किया गया है*।

5-श्री रघुनाथ सिंह कालीपहाड़ी कृत क्षत्रिय राजवंश के अनुसार भी बैस सूर्यवंशी क्षत्रिय हैं।

6-डा देवीलाल पालीवाल कि कर्नल जेम्स टॉड कृत राजपूत जातियों का इतिहास के प्रष्ठ संख्या 182 के अनुसार भी बैस सूर्यवंशी क्षत्रिय हैं।

7-ठाकुर बहादुर सिंह बीदासर कृत क्षत्रिय वंशावली एवं जाति भास्कर में बैस वंश को स्पष्ट सूर्यवंशी बताया गया है।

8-इनके झंडे में नाग का चिन्ह होने के कारण कई विद्वान इन्हें *नागवंशी मानते हैं*। लक्ष्मण को शेषनाग का अवतार भी माना जाता है,*अत: कुछ विद्वान बैस राजपूतो को लक्ष्मण का वंशज और नागवंशी मानते हैं।* कुछ विद्वानों के अनुसार भरत के पुत्र तक्ष से तक्षक नागवंश चला जिसने तक्षिला कि स्थापना की,बाद में *तक्षक नाग के वंशज* वैशाली आये और उन्ही से बैस राजपूत शाखा प्रारम्भ हुई।

*9-कुछ विद्वानों के अनुसार बैस राजपूतों के आदि पुरुष शालिवाहन के पुत्र का नाम सुन्दरभान या वयस कुमार था जिससे यह वंश वैस या बैस कहलाया,जिन्होंने सहारनपुर कि स्थापना की।*

10-कुछ विद्वानों के अनुसार गौतम राजा धीर सिंह पुंडीर ने 12 वी सदी के अंत में राजा अभयचन्द्र को 22 परगने दहेज़ में दिए इन बाईस परगनों के कारण यह वंश बाईसा या बैस कहलाने लगा।

11-कुछ विद्वान इन्हें गौतमी पुत्र शातकर्णी जिन्हें शालिवाहन भी कहा जाता है उनका वंशज मानते हैं, वहीं कुछ के अनुसार बैस शब्द का अर्थ है वो क्षत्रिय जिन्होंने बहुत सारी भूमि अपने अधिकार में ले ली हो।

----बैस वंश कि उत्पत्ति के सभी मतों का विश्लेष्ण एवं निष्कर्ष----

*बैस राजपूत नाग कि पूजा करते हैं* और इनके झंडे में नाग चिन्ह होने का यह अर्थ नहीं है कि *बैस नागवंशी हैं*। महाकवि बाणभट ने सम्राट हर्षवर्धन जो कि बैस क्षत्रिय थे उनकी बहन राज्यश्री और कन्नौज के मौखरी(मखवान,झाला) वंशी महाराजा गृहवर्मा के विवाह को सूर्य और चन्द्र वंश का मिलन बताया है,मौखरी चंद्रवंशी थे अत: बैस सूर्यवंशी सिद्ध होते हैं।

लक्ष्मण जी को शेषनाग का अवतार माना जाता है किन्तु लक्ष्मन जी नागवंशी नहीं रघुवंशी ही थे और उनके वंशज आज के प्रतिहार(परिहार) और मल्ल राजपूत है।

जिन विद्वानों ने 12 वी सदी में धीर सिंह पुंडीर को अर्गल का गौतमवंशी राजा लिख दिया और उनके द्वारा दहेज में अभयचन्द्र को 22 परगने दहेज़ में देने से बैस नामकरण होने का अनुमान किया है वो बिलकुल गलत है,क्योंकि धीरपुंडीर गौतम वंशी नहीं पुंडीर क्षत्रिय थे जो उस समय हरिद्वार के राजा थे,बाणभट और चीनी यात्री ह्वेंस्वांग ने सातवी सदी में सम्राट हर्ष को स्पष्ट रूप से बैस या वैश वंशी कहा है तो 12 वी सदी में बैस वंशनाम कि उतपत्ति का सवाल ही नहीं है,किन्तु यहाँ एक प्रश्न उठता है कि *अगर बैस वंश कि मान्यताओं के अनुसार शालिवाहन के वंशज वयस कुमार या सुंदरभान सहारनपुर आये थे तो उनके वंशज कहाँ गए?*

*बैस वंश कि एक शाखा त्रिलोकचंदी है और सहारनपुर के वैश्य जैन समुदाय कि भी एक शाखा त्रिलोकचंदी है इन्ही जैनियो के एक व्यक्ति राजा साहरनवीर सिंह ने अकबर के समय सहारनपुर नगर बसाया था*,आज के सहारनपुर,हरिद्वार का क्षेत्र उस समय हरिद्वार के पुंडीर शासको के नियन्त्रण में था तो हो सकता है शालिवाहन के जो वंशज इस क्षेत्र में आये होंगे उन्हें राजा धीर पुंडीर ने दहेज़ में सहारनपुर के कुछ परगने दिए हों और बाद में ये *त्रिलोकचंदी बैस राजपूत ही जैन धर्म ग्रहण करके व्यापारी हो जाने के कारण वैश्य बन गए हों और इन्ही त्रिलोकचंदी जैनियों के वंशज राजा साहरनवीर ने अकबर के समय सहारनपुर नगर कि स्थापना कि हो, और बाद में इन सभी मान्यताओं में घालमेल हो गया हो।* अर्गल के गौतम राजा अलग थे उन्होंने वर्तमान बैसवारे का इलाका हर्षवर्धन के वंशज बैस वंशी राजा अभयचन्द्र को दहेज़ में दिया था।

गौतमी पुत्र शातकर्णी को कुछ विद्वान बैस वंशावली के शालिवाहन से जोड़ते हैं किन्तु नासिक शिलालेख में गौतमी पुत्र श्री शातकर्णी को एक ब्राह्मण (अद्वितिय ब्राह्मण) तथा खतिय-दप-मान-मदन अर्थात क्षत्रियों का मान मर्दन करने वाला आदि उपाधियों से सुशेभित किया है। इसी शिलालेख के लेखक ने गौतमीपुत्र की तुलना परशुराम से की है। साथ ही दात्रीशतपुतलिका में भी शालीवाहनों को मिश्रित ब्राह्मण जाति तथा नागजाति से उत्पन्न माना गया है।अत:गौतमीपुत्र शातकर्णी अथवा शालिवाहन को बैस वंशी शालिवाहन से जोड़ना उचित प्रतीत नहीं होता क्योंकि बैसवंशी सूर्यवंशी क्षत्रिय हैं।

उपरोक्त सभी मतो का अधयन्न करने पर हमारा निष्कर्ष है कि बैस राजपूत सूर्यवंशी हैं। प्राचीन काल में सूर्यवंशी इक्ष्वाकु वंशी राजा विशाल ने वैशाली राज्य कि स्थापना कि थी,विशाल का एक पुत्र लिच्छवी था यहीं से सुर्यवंश कि लिच्छवी, शाक्य(गौतम), मोरिय(मौर्य), कुशवाहा(कछवाहा) ,बैस शाखाएँ अलग हुई।

जब मगध के राजा ने वैशाली पर अधिकार कर लिया और मगध में शूद्र नन्दवंश का शासन स्थापित हो गया और उसने क्षत्रियों पर जुल्म करने शुरू कर दिए तो वैशाली से सूर्यवंशी क्षत्रिय पंजाब,तक्षिला,महाराष्ट्र,स्थानेश्वर,दिल्ली आदि में आ बसे। दिल्ली क्षेत्र पर भी कुछ समय बैस वंशियों ने शासन किया और एक शाखा पंजाब में भी आ बसी। इन्होंने पंजाब में एक नगर श्री कंठ पर अधिकार किया, जिसका नाम आगे चलकर थानेश्वर हुआ।

*दिल्ली क्षेत्र थानेश्वर के नजदीक है अत:दिल्ली शाखा,थानेश्वर शाखा,सहारनपुर शाखा का आपस में जरुर सम्बन्ध होगा।*
*(एक किंवदंती तथा क्षत्रिय वंश भास्कर के अनुसार थानेश्वर के सहारण तक्षक वंशी राजा पर फिरोज तुगलक ने भारी सेना लेकर आक्रमण किया तथा,जबरदस्ती राजा स्थानेश्वर सहारन की बहिन का अपहरण कर राजा को इस्लाम ग्रहण कराया तथा घोड़े के पीछे बांध कर ले भागा रास्ते में बस्तियों को रौंदता हुआ यमुनापार कर रोहिलखंड की ओर बढ़ा तथा श्रुघ्न जनपद में बहते बाबा हरनंद(आज की हिंडन नदी) के जंगलों की दलदल में फैंक दिया, और आक्रमणकारी गंगापार करने को हरिद्वार की तरफ चला गया राजा दुख सहन नहीं कर सका वह सूफी संत बन गया तथा सूंघनानपुर के जंगल में ही रहा)*

*बैसवंशी सम्राट हर्षवर्धन अपनी राजधानी थानेश्वर से हटाकर कन्नौज ले गए।* हर्षवर्धन ने अपने राज्य का विस्तार बंगाल,असम,पंजाब,राजपूताने,मालवा,नेपाल तक किया और स्वयं राजपुत्र शिलादित्य कि उपाधि धारण की।

हर्षवर्द्धन के पश्चात् इस वंश का शासन समाप्त हो गया और इनके वंशज कन्नौज से आगे बढकर अवध तथा रोहिलखंड के क्षेत्र में फ़ैल गए। *इन्ही में आगे चलकर त्रिलोकचंद नाम के प्रसिद्ध व्यक्ति हुए इनसे बैस वंश कि कई शाखाएँ चली।* इनके बड़े पुत्र बिडारदेव के वंशज भालेसुल्तान वंश के बैस हुए जिन्होंने सुल्तानपुर कि स्थापना की। इन्ही बिडारदेव के वंशज राजा सुहेलदेव हुए जिन्होंने महमूद गजनवी के भतीजे सैय्यद सलार मसूद गाजी को बहराइच के युद्ध में उसकी सेना सहित मौत के घाट उतार दिया था और खुद भी शहीद हो गए थे।

चंदावर के युद्ध में हर्षवर्धन के वंशज केशवदेव भी जयचंद के साथ युद्ध लड़ते हुए शहीद हो गए, बाद में उनके वंशज अभयचंद ने अर्गल के गौतम राजा कि पत्नी को तुर्कों से बचाया जिसके कारण गौतम राजा ने अभयचंद से अपनी पुत्री का विवाह कर उसे 1440 गाँव दहेज़ में दे दिए जिसमें विद्रोही भर जाति का दमन कर अभयचंद ने बैस राज्य कि नीव रखी जिसे आज बैसवाड़ा या बैसवारा कहा जाता है। इस प्रकार सूर्यवंशी बैस राजपूत आर्यावृत के एक बड़े भू भाग में फ़ैल गए।

----बैसवंशी राजपूतों का सम्राट हर्षवर्धन से पूर्व का इतिहास

बैस राजपूत मानते हैं कि उनका राज्य पहले मुर्गीपाटन पर था और जब इस पर शत्रु ने अधिकार कर लिया तो ये प्रतिष्ठानपुर आ गए,वहां इस वंश में राजा शालिवाहन हुए,जिन्होंने विक्रमादित्य को हराया और शक सम्वत इन्होने ही चलाया,कुछ ने गौतमी पुत्र शातकर्णी को शालिवाहन मानकर उन्हें बैस वंशावली का शालिवाहन बताया है,और पैठण को प्रतिष्ठानपुर बताया और कुछ ने स्यालकोट को प्रतिष्ठानपुर बताया है, किन्तु यह मत सही प्रतीत नहीं होते। कई वंशो बाद के इतिहास में यह गलतियाँ कि गई कि उसी नाम के किसी प्रसिद्ध व्यक्ति को यह सम्मान देने लग गए,शालिवाहन नाम के इतिहास में कई अलग अलग वंशो में प्रसिद्ध व्यक्ति हुए हैं। भाटी वंश में भी शालिवाहन हुए हैं और सातवाहन वंशी गौतमीपुत्र शातकर्णी को भी शालिवाहन कहा जाता था।

विक्रमादित्य के विक्रम सम्वत और शालिवाहन के शक सम्वत में पूरे 135 वर्ष का फासला है अत:ये दोनों समकालीन नहीं हो सकते। दक्षिण के गौतमीपुत्र शातकर्णी को नासिक शिलालेख में स्पष्ट:ब्राह्मण लिखा है अत:इसका सूर्यवंशी बैस वंश से सम्बन्ध होना संभव नहीं है।
वस्तुत: बैस इतिहास का प्रतिष्ठानपुर न तो दक्षिण का पैठण है और न ही पंजाब का स्यालकोट है यह प्रतिष्ठानपुर इलाहबाद(प्रयाग) के निकट और झूंसी के पास था। 

किन्तु इतना अवश्य है कि बैस वंश में शालिवाहन नाम के एक प्रसिद्ध राजा अवश्य हुए जिन्होंने प्रतिष्ठानपूरी में एक बड़ा बैस राज्य स्थापित किया। शालिवाहन कई राज्यों को जीतकर उनकी कन्याओं को अपने महल में ले आये,जिससे उनकी पहली तीन क्षत्राणी रानियाँ खिन्न होकर अपने पिता के घर चली गयी। इन तीन रानियों के वंशज बाद में भी बैस कहलाते रहे और बाद कि रानियों के वंशज कठबैस कहलाये, ये प्रतिष्ठानपुर(प्रयाग)के शासक थे।

इन्ही शालिवाहन के वंशज त्रिलोकचंद बैस ने दिल्ली(उस समय कुछ और नाम होगा) पर अधिकार कर लिया। स्वामी दयानंद सरस्वती के अनुसार दिल्ली पर सन 404 ईस्वी में राजा मुलखचंद उर्फ़ त्रिलोकचंद प्रथम ने विक्रमपाल को हराकर शासन स्थापित किया। इसके बाद विक्र्मचन्द, कर्तिकचंद, रामचंद्र, अधरचन्द्र, कल्याणचन्द्र, भीमचंद्र, बोधचन्द्र, गोविन्दचन्द्र और प्रेमो देवी ने दो सो से अधिक वर्ष तक शासन किया। वस्तुत ये दिल्ली के बैस शासक स्वतंत्र न होकर गुप्त वंश और बाद में हर्षवर्धन बैस के सामंत के रूप में यहाँ पर होंगे। इसके बाद यह वंश दिल्ली से समाप्त हो गया,और सातवी सदी के बाद में पांडववंशी अर्जुनायन तंवर क्षत्रियों(अनंगपाल प्रथम) ने प्राचीन इन्द्रप्रस्थ के स्थान पर दिल्ली कि स्थापना की।

वस्तुत:बैसवारा ही बैस राज्य था।(देवी सिंह मंडावा कृत राजपूत शाखाओं का इतिहास पृष्ठ संख्या 70,एवं ईश्वर सिंह मढ़ाड कृत राजपूत वंशावली पृष्ठ संख्या 113,114)

---बैस वंश कि शाखाएँ---

कोट बाहर बैस---शालिवाहन कि जो रानियाँ अपने पीहर चली गयी उनकी संतान कोट बाहर बैस कहलाती है।
कठ बैस---शालिवाहन कि जो जीती हुई रानियाँ बाद में महल में आई उनकी संतान कोट बैस या कठ बैस कहलाती हैं।
डोडिया बैस---डोडिया खेडा में रहने के कारण राज्य हल्दौर जिला बिजनौर। 
त्रिलोकचंदी बैस---त्रिलोकचंद के वंशज इनकी चार उपशाखाएँ हैं राव,राजा,नैथम,सैनवासी।
प्रतिष्ठानपुरी बैस---प्रतिष्ठानपुर में रहने के कारण।
चंदोसिया---ठाकुर उदय बुधसिंह बैस्वाड़े से सुल्तानपुर के चंदोर में बसे थे उनकी संतान चंदोसिया बैस कहलाती है।

रावत--फतेहपुर,उन्नाव में 
भाले सुल्तान--ये भाले से लड़ने में माहिर थे। मसूद गाजी को मारने वाले सुहेलदेव बैस संभवत: इसी वंश के थे,रायबरेली,लखनऊ,उन्नाव में मिलते हैँ।
कुम्भी एवं नरवरिया--बैसवारा में मिलते हैं।

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--बैसवंशी राजपूतो कि वर्तमान स्थिति---

*बैस राजपूत वंश वर्तमान में भी बहुत ससक्त वंश माना जाता है। ब्रिटिश गजेटियर में भी इस वंश कि सम्पन्नता और कुलीनता के बारे में विस्तार से लिखा गया है।* अवध,पूर्वी उत्तरप्रदेश के बैसवारा में बहुत से बड़े जमीदार बैस वंश से थे। बैस वंशी राणा बेनीमाधव सिंह, रामबक्श सिंह और दूसरे बैस जमीदारों ने सन 1857 इसवी में अवध क्षेत्र में अंग्रेजो से जमकर लोहा लिया था। विद्रोही सिपाहियो में सबसे बड़ी संख्या अवध के बैसवाड़े की ही थी। बैस राजपूतों द्वारा अंग्रेजो का जोरदार विरोध करने के बावजूद अंग्रेजो कि हिम्मत इनकी जमिदारियां खत्म करने कि नहीं हुई। बैस राजपूत अपने इलाको के सरताज माने जाते हैं और सबसे महंगे सलीकेदार वस्त्र धारण करने से इनकी अलग ही पहचान हो जाती थी। अंग्रेजी ज़माने से ही इनके पक्के ऊँचे आवास इनकी अलग पहचान कराते थे,इनके बारे में अंग्रेजो ने लिखा है कि- 

"The Bais Rajput became so rich at a time it is recorded that each Bais Rajput held Lakhs (Hundreds of thousands) of rupees a piece which could buy them nearly anything. To hold this amount of money you would have to have been extremely rich.
This wealth caused the Bais Rajput to become the "best dressed and housed people"[22] in the areas they resided. This had an influence on the areas of Baiswara and beyond as recorded the whole area between Baiswara and Fyzabad was"

जमीदारी के अतिरिक्त बैस राजपूत राजनीती और व्यापार के क्षेत्र में भी कीर्तिमान बना रहे हैं। कई बड़े व्यापारी और राजनेता भारत और पाकिस्तान में बैस बंश से हैं जो विदेशो में भी व्यापार कर रहे हैं। राजनीती और व्यापार के अतिरिक्त खेलो कि दुनियां में मेजर ध्यानचंद जैसे महान हॉकी खिलाडी,उनके भाई कैप्टन रूप सिंह आदि बड़े खिलाडी बैस वंश में पैदा हुए हैं। कई प्रशासनिक अधिकारी,सैन्य अधिकारी बैस वंश का नाम रोशन कर रहे हैं। 

वस्तुत: जिस सूर्यवंशी बैस वंश में शालिवाहन,हर्षवर्धन,त्रिलोकचंद,सुहेलदेव,अभयचंद, राणा बेनीमाधवबख्श सिंह,मेजर ध्यानचंद आदि महान व्यक्तित्व हुए हैं उन्ही के वंशज भारत,पाकिस्तान,पाक अधिकृत कश्मीर,कनाडा,यूरोप में बसा हुआ बैस राजपूत वंश आज भी पूरे परिश्रम,योग्यता से अपनी सम्पन्नता और प्रभुत्व समाज में कायम किये हुए है और अपने पूर्वजो कि गौरवशाली परम्परा का पालन कर रहा है।
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*"सरलता" परम सौंदर्य है।* 
*"सत्यता" अनमोल संस्कार है।*
*"क्षमा" परम बल है।*
*"विनम्रता" सर्वोच्च गुण है और*
*"अपनापन" सर्वोत्तम संबंध है।*


*🙏 महाराज अग्रसेन जी ने नाग देवता को “मामा” क्यों कहा? 🐍*
*यह प्रसंग श्रद्धा, लोक-परंपरा और सम्मान से जुड़ा हुआ है।*
*मान्यता के अनुसार कथा —*
*महाराज अग्रसेन जी के वंश की* *कुलदेवी नागवंशी परंपरा से जुड़ी मानी जाती हैं।*
*नाग देवता को रक्षक, कुलदेव और मार्गदर्शक के रूप में पूजा जाता था।*
*भारतीय परंपरा में— 👉 माता पक्ष के देवता या रक्षक को “मामा” कहा जाता है*

*महाराजा अग्रसेन का विवाह रानी माधवी से हुआ था।*
*इस विवाह से जुड़े कुछ प्रमुख और रोचक तथ्य यहाँ दिए गए हैं:*
*नागवंश और सूर्यवंश का मिलन: रानी माधवी नागराज कुमुद की कन्या थीं। महाराजा अग्रसेन सूर्यवंशी क्षत्रिय थे* *और रानी* *माधवी नागवंशी थीं। इस विवाह को दो अलग-अलग कुलों और संस्कृतियों के मिलन के रूप में देखा जाता है।*

*👉 जो सदा संरक्षण और आशीर्वाद देता है*
*इसी कारण महाराज अग्रसेन जी ने*
*🐍 नाग देवता को आदरपूर्वक “मामा” कहा*
*त्रिलोकचंदी जैन*

कॉपी पेस्ट साभार SOME SOURCES OF RAJPUT HIISTORY

Thursday, 19 March 2026

ROHILA RAJPUT GOTRA OF RATHOD VANSH (*रोहिला राजपूतों में राठौड़ वंश की १४ शाखाएं)*

राठौड़ वन्स की 14 शाखाये रोहिले राजपूतो में है
1 धांधल
2महेचा/महेचराना

3 बन्दरिया
4 डंगरथ,डंगरोल
5 जोलिये जोलु जालान
6 बांकुटे
7रतानोट
8थाती
9कपोलिया
10खोखर
11अखनोरिया
12मसानिया
13बिसूथ
14 लोह मढ़े
लोहे के कवच धरि
थे84 सरदार जो कन्नौज पतन के बाद रोहिलखण्ड में रणवीर सिंह की सेना में आ गए थे उनको लखमीर भी कहते थे जो एक लाख का सेना नायक होता था
इसलिए यह गोत्र लखमरा भी कहलाता है
14वी शाखा
प्रवर है सौनिक
ऋषि है अंगिरा
वेद है यजुर्वेद
उपवेद धनुर
शाखा कौथुमी
सूत्र कात्यायन
शिखा है दाहिनी
कुलदेवी है पंखिनी
राजेश्वरी और नाग्निचा, नागणायीचा 
धर्म है वैष्णव
झंडा है पंचरंगा
नगाड़ा रणजीत
गद्दी है कन्नौज
पदवी
रणबांका


कर्नाटक से राजस्थान का सफ़र (साउथ की देवी)
क्या आप जानते हैं कि राठौड़ों की कुलदेवी असल में साउथ इंडिया से आई थीं?
"राठौड़ों की रक्षक साउथ से आई थीं!
राठौड़ों की कुलदेवी 'नागनेची माता' की मूर्ति असल में कर्नाटक (कोंकण) की थी, जहाँ उन्हें 'चक्रेश्वरी' कहा जाता था।
राठौड़ राजा राव धुहड़ उन्हें 13वीं सदी में वहाँ से लाए थे।
शर्त थी 'रास्ते में पीछे मुड़कर मत देखना'।
पचपदरा के पास नागाणा गाँव में राजा ने पीछे मुड़कर देखा और मूर्ति ज़मीन में गिर गई।
तब से इस जगह को 'नागाणा धाम' कहा जाने लगा।

नागणेची माता का इतिहास क्या है?

नागणेची माता का इतिहास बहुत ही रोचक है। वह राठौड़ राजपूतों की कुलदेवी हैं और उनकी उत्पत्ति दक्षिण भारत से हुई थी। कहा जाता है कि उन्हें मूल रूप से कर्नाटक में 'चक्रेश्वरी' के नाम से जाना जाता था।

एक कथा के अनुसार, 13वीं सदी में राठौड़ राजा राव धूहड़ ने उन्हें कर्नाटक से राजस्थान लाया था। इस यात्रा के दौरान, उन्हें एक शर्त का पालन करना था कि वह पीछे मुड़कर नहीं देखेंगे। लेकिन जब वह पचपदरा के पास नागाणा गाँव में पहुँचे, तो उन्होंने पीछे मुड़कर देख लिया, जिससे माता की मूर्ति वहीं जमीन में धंस गई। तब से यह स्थान 'नागाणा धाम' के नाम से जाना जाता है।

नागणेची माता की पूजा राठौड़ राजपूतों द्वारा बड़े आदर और श्रद्धा के साथ की जाती है, और उनकी कृपा और रक्षा की कामना की जाती है।

भाखरवाला गांव में मिले धांधल राठौड़ रोहिला राजपूतों के दुर्लभ शिलालेख







ध्वस्त होती कलात्मक छतरियों की सुध लेने वाला नहीं
इतिहास की कई नई जानकारियां
जोधपुर.
जोधपुर से 15 किलोमीटर दूर भाखरवाला गांव में धांधल राठौड़ों के दुर्लभ शिलालेख मिले हैं। लावारिस पड़े ऐतिहासिक शिलालेखों के आधार पर शोध किया जाए तो जोधपुर से जुड़े इतिहास की कई नई जानकारियां सामने आ सकती है।
 
राजस्थानी शोध संस्थान के अधिकारी व शोधकर्ता डॉ. विक्रमसिंह भाटी के अनुसार पूर्व में धांधल राठौड़ों के प्रमुख ठिकानों में से एक इस गांव को रोयला या रोहिला के नाम से जाना जाता था। यहां धांधल सूरतसिंह, धांधल महेशदास, धांधल केसरीसिंह की भव्य कलात्मक छतरियां और देवली भी है। सूरतसिंह की भव्य, कलात्मक छतरी ध्वस्त होने के कगार पर है। लेकिन पुरातत्व या पर्यटन विभाग की ओर से किसी ने सुध नहीं ली है।
 
सूरतसिंह के पुत्र महेशदास की 20 खम्भों की छतरी में लगे शिलालेख के अनुसार छतरी निर्माण में पांच हजार एक रुपए की लागत आई थी। धांधल केसरीसिंह की छतरी जोधपुर के तत्कालीन शासक मानसिंह के कालखण्ड से ही है। उनका नाम विश्वास पात्र सेनानायकों में अव्वल था। उस समय के एतिहासिक ग्रंथों में इनका नाम पांच प्रमुख मुसाहीबों के तौर पर दर्ज है। कविराजा बांकीदास ने कई डिंगल गीतों में इन्हें ‘पाल रौ पौतरौ’ अर्थात् ‘पाबूजी का पोता’ और धांधल वंश का सूर्य बताया है।
छतरियों की देवलियां संगमरमर से और गुम्बज ईंटों से बने हैं। कुछ छतरियां 10 खम्भों की हैं। डॉ. भाटी के अनुसार धांधल राठौड़ों का इतिहास गरिमामयी रहा। तत्कालीन जोधपुर राज्य की सेवा में रहते हुए ये प्रधान, मुसाहीब, किलेदार, कोतवाल, रसोड़े और सुतरखाने के दरोगा जैसे महत्वपूर्ण पदों पर रहे।
 
मारवाड़ के तत्कालीन शासक अभयसिंह के समय धांधल सूरतसिंह को रोहिला का पट्टा मिला था। इन्हें केलावा खुर्द, भादराजून परगने के काकरिया, लोरोली और विरामा गांव भी ईनाम में मिले थे। लावारिस पड़े ऐतिहासिक शिलालेखों के आधार पर शोध किया जाए तो जोधपुर से जुड़े इतिहास की कई नई जानकारियां सामने आ सकती है।
इस ठिकाने के सभी धांधल राठौड़ रोहिला राजपूत कहलाए
🚩 "मेरा सिर बिक चुका है, विधवा होना है तो शादी कर लो!": लोक देवता पाबूजी राठौर की अमर गाथा🚩
जय पाबूजी! 🙏

📜 इतिहास पर एक नज़र:

मैं भाद्रपद महीने में एक बारात जा रहा था। यह वीरों की बारात थी जिसने शादी से पहले बताया - 'मेरा सिर बिक चुका है, विधवा होना है तो शादी कर लो!'

ढोली गा रहा था:

🎶 धरती तुम संभागानि, (थारै) इंद्र जेहदो भारत।

कंचुवा पांव, बादल छाए।

सूखे रेगिस्तान में खुशी की झरना बह रहा था, लेकिन किसे पता था कि सेहरा और कलंगी से सजा दूल्हा एक दिन लोगों का पूजनीय देवता बन जाएगा? किसे पता था कि फेरों के बीच कर्तव्य की पुकार उस सजी हुई सभा को बलिदान के युद्ध के मैदान में बदल देगी?

 🔥 वादे और बलिदान:

जिस समय विवाह के मंगल गीत गूंज रहे थे, उसी समय एक चारणी (देवल चारणी) मुझे याद दिलाने आई कि - "राही! तुम्हारे विवाह की तैयारियां कहीं और हो रही हैं... आसमान की गहराइयों में स्वर्ग की अप्सराएं वरमाला लेकर खड़ी हैं।"

और उस वीर 'पाबू' ने सुहागरात के बंधन को ठोकर मारते हुए गठबंधन की गांठ खोली और चौथे फेरे से पहले ही गाय की रक्षा के लिए चल पड़े। भागीरथ की जिद और भीष्म के वादे की तरह कठोर होकर अनंत की गहराइयों में विलीन हो गए।

🐎 केशर कालवी और अधूरी शादी:

इतिहास गवाह है कि जिसने अग्नि के पूरे चक्कर भी नहीं लगाए, वही दुल्हन (सोढ़ी रानी) हाथ में नारियल लेकर अपने स्वर्गीय पति के पास चल पड़ी।

आज भी राजस्थान का कण-कण पाबूजी की बहादुरी को याद करता है। पद और पहाड़ों में उनकी तारीफ़ है - कि पाबू भी क्षत्रिय थे!

📌 ऐतिहासिक तथ्य (गर्व करने वाले तथ्य):

🔸 लेखक: स्वर्गीय श्री तन सिंह (किताब: "बदलते नज़ारे")
🔸 केशर कालवी: पाबूजी की वफ़ादार घोड़ी जिसने इतिहास बदल दिया।
🔸 परंपरा: पाबूजी महाराज ने गायों की रक्षा के लिए फेरों के बीच से उठकर बलिदान दिया था। उनकी याद में आज भी राजपूत समुदाय में शादियों में सिर्फ़ चार फेरे लिए जाते हैं।

🙏 जय जय धांधल पाबू जी राठौड़

आइए जानते हैं राठौड़ों में साफा पहनने का रिवाज कैसे शुरू हुआ - 👇

मारवाड़ के राठौड़ 13वीं सदी में इस रेगिस्तान में आए थे। इतिहासकारों के मुताबिक, राठौड़ उत्तर प्रदेश के बदायूं से मारवाड़ आए थे। पहले आदमी राव सिहाजी थे जिन्होंने मारवाड़ के पाली इलाके पर कब्ज़ा करके राठौड़ सत्ता कायम की। आगे चलकर उनके वंशजों ने खेड़ और मंडोर पर राज किया, वे मारवाड़ के सरदार बने।

राठौड़ मरू प्रदेश के नहीं थे, इसलिए उनकी वेशभूषा यहां के माहौल के हिसाब से नहीं थी, लेकिन यहां आने के बाद कई रिवाज और कई रीति-रिवाज बने, जिनके पीछे पहले हुई कई घटनाएं थीं। इन घटनाओं ने नई परंपराओं को जन्म दिया जो आज एक पहचान बन गई हैं।

इतिहास में एक बहुत ही दिलचस्प घटना है जिसकी वजह से राठौड़ों ने साफा (पगड़ी) पहनना शुरू किया। इसके बारे में बहुत कम जानकारी होने की वजह से लोग इसे नहीं जानते।

राव सिहाजी के छह वंशज राव जलांसीजी हुए। वे बहादुर और हिम्मत वाले थे। 14वीं सदी में उनके राज में एक ऐसी घटना हुई, जिससे उन्हें उमरकोट के सोढो पर हमला करना पड़ा। इस जंग में राव जलांसीजी ने सोढो की साफा (पगड़ी) छीन ली।

उन दिनों साफा का बहुत महत्व था। अगर सिर से पगड़ी गिर जाए या दुश्मन के पैरों में पगड़ी गिर जाए, तो समझो वे हार गए। यह साफा आन-बान और शान का प्रतीक था।

राठोड़ों के पास साफा जीत का निशान होता था, इसलिए वे इसे जीत के प्रतीक के तौर पर अपने सिर पर धारण करते थे और इस तरह राठोड़ों ने उसी दिन से साफा बांधना शुरू कर दिया।

जब मैं मुगलों के संपर्क में आया, तो पगड़ी और साफे के कुछ पैच बदल गए जो ट्रेंड में आ गए लेकिन साफा हमेशा ट्रेंड में रहता है। जंग खास तौर पर साफा बांधी जाती थी। आगे चलकर इसी साफे को बांधने के लिए कई पैच (स्टाइल) बनाए गए जैसे जोधपुरी, जिसके पीछे चुरंगा होता है, गोल साफा आदि।

मारवाड़ का जोधपुरी साफा पूरी दुनिया में मशहूर है। मारवाड़ से निकले सभी राठौड़ बीकानेर, किशनगढ़, सीतामऊ, रतलाम, झाबुआ, इडर वगैरह सभी राज्यों में ट्रेंड कर रहे हैं और कुछ बदलावों के साथ यह साफ-सफाई से बंधा हुआ है।

फैशन चाहे जितना बदल जाए, लेकिन इस मारवाड़ की साफ-सफाई आज भी अपने पैच के लिए मशहूर है। इसका क्रेडिट मारवाड़ के मौजूदा नरेश महाराजा गजसिंहजी को जाता है, जिनका नाम गजशाही साफ-सफाई बहुत मशहूर है।

महाराजा साहिब की प्रेरणा से मालाणी राधाधर के बेटे स्वर्गीय डॉ. महेंद्रसिंहजी नागर साहिब, जो मेहरानगढ़ के पूर्व डायरेक्टर थे, ने राजस्थान की पगड़ियों पर रिसर्च करके एक बहुत ही महत्वपूर्ण किताब लिखी थी, जिससे लोगों को पगड़ियों का महत्व समझ में आया। उन्होंने विदेशों में साफो का प्रदर्शन करके बड़ा नाम कमाया।

राठौड़ों की इस शानदार साफ-सफाई का आगाज उमरकोट सिंध की देन है। आगे चलकर यह सिंध
उमरकोट रियासत भी मारवाड़ के तहत आ गई जो आजादी के समय तक मारवाड़ का एक अभिन्न हिस्सा थी। जनमासा में स्वच्छता की कई कहानियाँ आज भी लोगों के मन में बसी हैं। अगर आज पीढ़ी उन्हें सहेज कर रखे तो यह निश्चित रूप से एक ऐतिहासिक काम होगा। स्वच्छ भारत हर वर्ग के कामों के आधार पर अलग-अलग योजनाएँ बनाता है। जोधपुरी नौ मीटर का स्वच्छ है।

अब लोग इसे साफ-साफ बाँधते हैं लेकिन वे इसका सम्मान करना नहीं जानते। जब तक सम्मान नहीं होगा, तब तक उन्हें स्वच्छ नहीं कहा जाएगा।

✍️ डॉ. महेंद्र सिंह तंवर


एक वीर, जिसने रेगिस्तान को अपना घर बनाया।
13वीं सदी में कन्नौज से आए राव सीहा जी ने ही मारवाड़ में राठौड़ वंश की नींव रखी थी।
पाली के ब्राह्मणों की रक्षा के लिए उन्होंने अकेले दम पर लुटेरों से युद्ध किया। 1273 ई. में गायों की रक्षा करते हुए, 1 लाख दुश्मनों (लाखा झंवर) से लड़कर उन्होंने वीरगति प्राप्त की।
मारवाड़ में राठौड़ रोहिल्लादि देश से आए थे।
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Monday, 16 March 2026

THE FOUNDERS OF RAJPUTANA KATHHEHAR ROHILKHANND

*KSHTRIYA SAMRAT MAHARAJA RANVEER SINGH ROHILA,THE FOUNDER OF ROHILKHANND*
🙏 क्रमबद्ध, विस्तृत एवं प्रभावशाली ऐतिहासिक जीवन परिचय प्रस्तुत है।
(लेखन शैली: संतुलित – इतिहास + प्रेरणात्मक, शोधपरक संरचना सहित)
महाराजा रणवीर सिंह रोहिला
कठेहर–रोहिलखण्ड के अजेय क्षत्रिय शासक
(जन्म: 25 अक्टूबर 1204 ई., बलिदान: 13वीं शताब्दी मध्य)
1. प्रस्तावना
भारतीय इतिहास में अनेक ऐसे वीर क्षत्रिय हुए जिन्होंने सीमित संसाधनों में भी विदेशी आक्रमणकारियों का डटकर सामना किया। कठेहर–रोहिलखण्ड (वर्तमान उत्तर प्रदेश का उत्तरी भाग) के पराक्रमी शासक महाराजा रणवीर सिंह रोहिला उन्हीं में से एक थे। उन्होंने दिल्ली सल्तनत के विस्तारवादी अभियानों का विरोध करते हुए स्वतंत्रता और क्षात्र धर्म की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व बलिदान कर दिया।
उनका जीवन केवल एक क्षेत्रीय शासक की कथा नहीं, बल्कि आत्मसम्मान, युद्धनीति और राष्ट्ररक्षा का आदर्श उदाहरण है।
भाग 1
काठी, कठेहर और काठियावाड़ का ऐतिहासिक आधार
2. सूर्यवंश और निकुम्भ वंश
महाराजा रणवीर सिंह रोहिला सूर्यवंशी क्षत्रिय परंपरा से संबंधित माने जाते हैं। परंपरागत वंशावली के अनुसार यह वंश इक्ष्वाकु कुल से उत्पन्न हुआ, जिसे भगवान राम की वंश परंपरा माना जाता है। निकुम्भ नामक पराक्रमी राजा से निकुम्भ वंश की स्थापना मानी जाती है।
इस वंश की एक शाखा “कठ” या “काठी” कहलायी।
3. कठ गणराज्य और सिकंदर काल
ईसा पूर्व 326 में जब Alexander the Great ने उत्तर-पश्चिम भारत पर आक्रमण किया, उस समय रावी नदी के तट पर कठ गणराज्य का उल्लेख मिलता है। इसकी राजधानी “सांकल” (वर्तमान स्यालकोट) बताई जाती है।
यूनानी लेखकों ने कठों (Kathoi/Kathaeans) की वीरता, शारीरिक सौष्ठव और युद्ध कौशल की प्रशंसा की है। कुछ ग्रंथों में उल्लेख है कि वे स्वस्थ और बलिष्ठ संतानों को ही जीवित रखते थे तथा सर्वश्रेष्ठ योद्धा को शासक चुनते थे।
संस्कृत व्याकरणाचार्य Panini की अष्टाध्यायी में कठों का उल्लेख मिलता है। महाभाष्यकार Patanjali ने भी कठों का उल्लेख किया है।
4. काठियावाड़ और कठेहर का विकास
सिकंदर के आक्रमणों के पश्चात कठ क्षत्रियों के विभिन्न समूहों ने भारत के विभिन्न क्षेत्रों में प्रवास किया—
एक शाखा सौराष्ट्र गई — जहाँ “सौराष्ट्र” क्षेत्र “काठियावाड़” नाम से प्रसिद्ध हुआ।
एक शाखा उत्तर भारत के पंचाल क्षेत्र में बसी — जो आगे चलकर “कठेहर खण्ड” या “रोहिलखण्ड” कहलाया।
एक शाखा नेपाल क्षेत्र में गई — जहाँ “कटायत” परंपरा का उल्लेख मिलता है।
काठी वीरों के विषय में कहावत प्रचलित हुई:
“काल भी अगर छोड़ दे, लेकिन काठी नहीं छोड़ता।”
भाग 2
कठेहर राज्य की स्थापना
5. रामपुर की स्थापना
लगभग 7वीं–10वीं शताब्दी के मध्य कठेहर क्षेत्र में स्थायी राज्य की स्थापना हुई।
राजा रामसिंह (रामशाह) ने 909 ईस्वी (विक्रमी 966) में रामपुर नगर को राजधानी के रूप में विकसित किया। यह क्षेत्र अहिक्षेत्र (वर्तमान रामनगर के निकट) के आसपास स्थित था।
इसके बाद 11 पीढ़ियों तक कठ क्षत्रियों ने शासन किया।
वंशावली में उल्लेखित प्रमुख नाम:
रामशाह (रामसिंह)
बीजयराज
करणचन्द
विम्रहराज
सावन्त सिंह
जगमाल
रणवीर सिंह
धिंगतराम
गोकुल सिंह
महासहाय
त्रिलोकचन्द
नौरंग देव
भाग 3
महाराजा रणवीर सिंह रोहिला
6. जन्म और व्यक्तित्व
जन्म: 25 अक्टूबर 1204 ईस्वी
विक्रम संवत: 1261
स्थान: रामपुर, कठेहर-रोहिलखण्ड
गोत्र: वशिष्ठ
वंश: निकुम्भ वंशी कठेहरिया क्षत्रिय
वे युद्धकला, घुड़सवारी और शस्त्र संचालन में निपुण थे। उनके साथ 84 कवचधारी रोहिला वीरों की विशिष्ट सेना रहती थी।
7. दिल्ली सल्तनत से संघर्ष
13वीं शताब्दी में दिल्ली में गुलाम वंश का शासन था। उस समय सुल्तान Nasiruddin Mahmud नाममात्र का शासक था, जबकि वास्तविक सत्ता Ghiyas ud din Balban जैसे शक्तिशाली अमीरों के हाथों में थी।
1253–1254 ईस्वी में दोआब, कठेहर और शिवालिक क्षेत्रों में दमनकारी अभियान चलाया गया। स्थानीय शासकों और जनता पर अत्याचार हुए।
रोहिलखण्ड में विद्रोह भड़क उठा और दिल्ली सल्तनत के सूबेदार की हत्या कर दी गई।
8. निर्णायक युद्ध
रामपुर और पीलीभीत के मध्य मैदान में दिल्ली सल्तनत की लगभग 30,000 सेना और रणवीर सिंह के नेतृत्व में रोहिला योद्धाओं के बीच भयंकर युद्ध हुआ।
परंपरा के अनुसार:
84 कवचधारी रणधेलवंशी वीरों ने असाधारण पराक्रम दिखाया
शत्रु सेना के हाथी-घोड़े परास्त हुए
नासिरूद्दीन को बंदी बनाया गया
क्षात्र धर्म के अनुसार शरणागत को अभयदान देकर रणवीर सिंह ने उसे छोड़ दिया।
9. विश्वासघात और बलिदान
दिल्ली दरबार ने पुनः षड्यंत्र रचा।
दरबारी पंडित गोकुलराम पाण्डेय को लालच देकर विश्वास में लिया गया।
रक्षाबंधन के दिन, जब शिव मंदिर में शस्त्र पूजा हेतु राजपूत निःशस्त्र थे, तब किले का द्वार खोल दिया गया। भारी सेना ने आक्रमण किया।
घमासान युद्ध हुआ।
महाराजा रणवीर सिंह वीरगति को प्राप्त हुए।
महारानी तारादेवी सती हो गईं।
उनके भाई सूरत सिंह शेष परिवार सहित सुरक्षित स्थान पर चले गए।
भाग 4
ऐतिहासिक विरासत
रामपुर के किले के अवशेष
सती तारादेवी मंदिर
स्थानीय परंपराएँ और वंशज
महाराजा रणवीर सिंह ने अंतिम सांस तक पराधीनता स्वीकार नहीं की। उनका बलिदान रोहिलखण्ड की स्वतंत्र चेतना का प्रतीक बना।
निष्कर्ष
महाराजा रणवीर सिंह रोहिला का जीवन भारतीय क्षत्रिय परंपरा, स्वाभिमान और स्वतंत्रता की रक्षा का सशक्त उदाहरण है।
उन्होंने सीमित संसाधनों में भी दिल्ली सल्तनत की शक्तिशाली सेना का सामना किया और क्षात्र धर्म का पालन करते हुए शरणागत को अभयदान दिया — यद्यपि अंततः उन्हें विश्वासघात का सामना करना पड़ा।
उनकी गाथा इतिहास के उन पृष्ठों में स्थान पाने योग्य है जहाँ क्षेत्रीय स्वतंत्रता संग्राम और स्थानीय शौर्य को उचित सम्मान दिया जाए।
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Saturday, 14 March 2026

ROHILA RAJPUT OF TOMAR (तंवर)VANSH GOTRA

तोमर वंश की पांडववीर अर्जुन से दिल्लीपति 
महाराजा अनंगपाल तक की वंशावली :-
1. अर्जुन
2. अभिमन्यु
3. परिक्षत
4. जनमेजय
5. अश्वमेघ
6. दलीप
7. छत्रपाल
8. चित्ररथ
9. पुष्टशल्य
10. उग्रसेन
11. कुमारसेन
12. भवनति
13. रणजीत
14. ऋषिक
15. सुखदेव
16.नरहरिदेव
17. सूचीरथ
18. शूरसेन
19. दलीप द्वितीय
20. पर्वतसेन
21. सोमवीर
22. मेघाता
23. भीमदेव
24. नरहरिदेव द्वितीय
25. पूर्णमल
26. कर्दबीन
27. आपभीक
28. उदयपाल
29. युदनपाल
30. दयातराज
31. भीमपाल
32. क्षेमक
33. अनक्षामी
34. पुरसेन
35. बिसरवा
36. प्रेमसेन
37. सजरा
38. अभयपाल
39. वीरसाल
40. अमरचुड़
41. हरिजीवि
42. अजीतपाल
43. सर्पदन
44. वीरसेन
45. महेशदत्त
46. महानिम
47. समुद्रसेन
48. शत्रुपाल
49. धर्मध्वज
50. तेजपाल
51. वालिपाल
52. सहायपाल
53. देवपाल
54. गोविन्दपाल
55. हरिपाल
56. गोविन्दपाल द्वितीय
57. नरसिंह पाल
58. अमृतपाल
59. प्रेमपाल
60. हरिश्चंद्र
61. महेंद्रपाल
62. छत्रपाल
63. कल्याणसेन
64. केशवसेन
65. गोपालसेन
66. महाबाहु
67. भद्रसेन
68. सोमचंद्र
69. रघुपाल
70. नारायण
71. भनुपाद
72. पदमपाद
73. दामोदरसेन
74. चतरशाल
75. महेशपाल
76. ब्रजागसेन
77. अभयपाल
78. मनोहरदास
79. सुखराज
80. तंगराज
81. तुंगपाल – 
इनके नाम से इनके वंशज तोमर या तंवर राजपूत कहलाते हैं।
82. अनंगपाल तंवर (तोमर) – 
दिल्ली राज्य के संस्थापक, इस वंशावली से पता चलता है कि अनंगपाल तंवर और तंवर(तोमर) वंश चंद्रवंशी क्षत्रिय हैं, और इनका संबंध पाण्डु-पुत्र-अर्जुन से जुड़ता हैं।

🇮🇳⚔️ दिल्ली की स्थापना - तोमर राजपूतों की शानदार विरासत
बहुत कम लोग जानते हैं कि भारत की राजधानी दिल्ली की स्थापना का क्रेडिट तोमर राजपूतों को जाता है।
इतिहास के पन्नों में दर्ज है कि हरियाणा और आस-पास के इलाकों के मूल निवासी तोमर राजपूतों ने दिल्ली को एक ऑर्गनाइज़्ड और मज़बूत शहर बनाया।
⚔️ 8वीं सदी में राजा अनंगपाल तोमर प्रथम ने तोमर वंश की नींव रखी।
इसके बाद उनके वंशजों ने इस इलाके में अपनी ताकत और शासन को मज़बूत किया।
एक बार फिर महान राजा अनंगपाल तोमर II हुए, जिन्होंने 11वीं सदी में दिल्ली को फिर से ऑर्गनाइज़ किया और इसे एक पावरफुल पॉलिटिकल सेंटर बनाया।
उनके राज में रेड कोट किला बनाया गया, जिसे दिल्ली का पहला बड़ा किला माना जाता है।
बाद में यह किला राय पिथौरा के नाम से मशहूर हुआ, जब चौहान वंश ने दिल्ली की सत्ता संभाली।
⚔️ तोमर राजपूतों की बहादुरी, दूर की सोच और ऑर्गनाइज़ेशन पावर ने इस इलाके को सुरक्षित और खुशहाल बनाया। इसी मज़बूत नींव पर आगे बढ़ते हुए दिल्ली भारत के सबसे अहम शहरों में से एक बन गया।
इतिहास यह साफ़ बताता है।
दिल्ली को असल में बसाने का क्रेडिट तोमर राजपूतों को जाता है।
🙏 तोमर वंश के उन महान वीरों को कोटि-कोटि नमन, जिनकी दूरदर्शिता और बहादुरी ने भारत के इतिहास में अमिट छाप छोड़ी।
अगर आपको अपने शानदार इतिहास पर गर्व है — तो सच्चाई जाने । दिल्ली से। तोमर, तंवर राजपूत उत्तर भारत में बहुत फैले तथा बहु गोत्र उप गोत्रों में बिखरते गए।
❤️ 
💬"जय राजपूताना ⚔️"
📲 
#TomarRajput #AnangpalTomar #DelhiHistory #RajputHistory #IndianHistory #Rajputana #भारतकाइतिहास #Delhi #History ⚔️🇮🇳


तंवर/तोमर वंश की अनेक  शाखाएं इस प्रकार है तंवर वंश को अर्जुनायन वंश भी कहा गया है.इसकी 22 मुख्य शाखाएँ है जो पूरे उत्तर एवं मध्य भारत में फैलीं हुई है। तवंर वंश के मूल पुरुष पांडूपुत्र अर्जुन के पौत्र परीक्षित जी को बताया जाता है। तंवर वंश की 22 प्रमुख शाखाएं इस प्रकार है.....

==========जावला तंवर ===========
जावला या अनंगपाल के वंशज जावला तंवर कहलाए,रुनेचा,असील जी के तंवर,जाटू,सांपला(सिम्पल) आदि इनकी शाखाएँ हैं,सांपला(सिम्पल),रुनेचा जैसलमेर में मिलते हैं,लोकदेवता रामदेव इसी रुनेचा शाखा से थे,

========ग्वालेरा तंवर==============
दिल्ली छूटने के बाद ग्वालियर पर शासन करने के कारण यहाँ के तोमर ग्वालेरा कहलाए 

===========जाटू तंवर ==============
जाटू तंवर राजपूत वंश राजा अंगपाल द्वितीय के पौत्र व राजा शालीवाहन तंवर के पुत्र राव जैरथ जी जिन्हे जाटू जी कहा जाता था,के कुटुंब से आगे बढ़ा। राव जाटू के साथ उनके भाई रघु व अंगपाल तंवर प्रथम के पुत्र सतरौला का कुटुंब आज हरयाणा के रोहतक , महेंद्रगढ़ , हिसार, कैथल , कुरुक्षेत्र और खासकर भिवानी में वास करता है। एक समय में इनके राज्य के अधीन लगभग 1440 गाँव थे। आज जाटू तंवरों के चौरासी गाँव भिवानी और आस पास के जिलों में वास करती है। पूर्व जनरल वीके सिंह भी तंवरों की इसी शाखा से है। भिवानी शहर की स्थापना भी इन्ही तंवरों ने की। अब से कुछ समय पहले तक भी सरकारी दस्तावेजों में इस इलाके को तीन टप्पों या टप्पा में बसा हुआ माना व जाना जाता था जो की जाटू, रघु व सतरौला राजाओ की परागनाएँ थी।

इन तीनो तंवरो के वंशजों को अपनी जागीरें बढ़ने के अवसर मिले , जिनमे जाटू के वंशज काफी फैले और उम्र सिंह ने तोशाम का इलाका कब्जे में ले लिया इस कारण इलाका उमरैण टप्पा कहलाया जाने लगा। ऐसे ही भिवानी बछोअन टप्पा कहलाता था। जाटू के सिवानी वाले वंशजों को रईस कहा जाता था और तलवंडी में बसे वंशजों को राणा कहा जाने लगा।

======== जंघारा तंवर ============

जंघारा तंवर तंवरों में सबसे लड़ाकू शाख मानी जाती है। जंघारा शब्द ही जंग व अहारा शब्द को जोड़ कर बना है जिसका अर्थ है जो वंश जंग के लिए भूखा हो। जंघारा तंवरों की वंशावली अंगपाल के पोत्र राव जगपाल से होती है। यह तंवर इन्दौरिया तंवरो के भी भाई है। दिल्ली में चौहानो के कब्जे के बाद जंघारा तंवर तंवरों की मुख्या शाखा से अलग हो रोहिलखण्ड के इलाके की ओर राजकुमार धापू धाम के नेतृत्व में कूच कर गए। जंघारा राजपूतों ने बरेली व आस पास से चौदवीं शताब्दी में ग्वालों अहीरों व कठेरिया राजपूतों को युद्ध में हरा कर बहार निकाला। इन्होने रूहेला पठानों को भी कभी चैन से नहीं बैठने दिया , जंघारा राजपूतो की बहादुरी व लड़ाकूपन को देखते हुए ब्रिटिश काल में इनकी भर्ती सेना में ऊँचे ओहदों पर की जाती थी।

=========पठानिया तंवर============

पठानिया तंवर राजा अनंगपाल तंवर के अनुज राजा जैतपाल के वंशज है जिन्होंने उत्तर भारत में धमेरी नाम के राज्य की स्थापना की और पठानकोट नामक शहर बसाया। धमेरी राज्य का नाम बाद में जा कर नूरपुर पड़ा। यह वंश सं 1849 तक विदेशी आक्रमणकारियों के विरुध अपने संघर्षों के लिए जाना जाता है चाहे मुस्लमान हो या अंग्रेज। सं 1849 में नूरपुर अंग्रेजो के अधीन हो गया। इस वंश के राजा राम सिंह पठानिया अंग्रेजों के विरुद्ध अपनी वीरता के लिए विख्यात हैं,यह वंश इतना बहादुर व झुझारू है के आजादी के बाद भी पठानिया राजपूतों ने 3 महावीर चक्र प्राप्त किये। आज पठानिया राजपूत उत्तर पंजाब व हिमाचल में फैले हुए है।

============जंजुआ वंश ==============

जंजुआ वंश भी तंवर राजपूतों की तरह अर्जुन के वंशज माने जाते है। जंजुआ राजपूतों की उत्पत्ति व नाम अर्जुन के वंशज राजा जनमेजय से मानी जाती है जिनके ऊपर इनके वंश का नाम पड़ा। जंजुआ वंश तंवर वंश के भाई के रूप में देखा जाता है।जंजुआ राजपूतों के राज्य पूर्वी पाकिस्तान के इलाके में रहे है। इस वंश के ऊपर डिटेल्ड पोस्ट आने वाले समय में की जाएगी। ज्यादातर जंजुआ राजपूतों की खाप आज के पाकिस्तान में पायी जाती है जो मुस्लिम बन चुके है। कुछ जंजुआ राजपूतो के गाँव आज भी पंजाब में मौजूद है और वो हिन्दू राजपूत है। जंजुआ एक बहुत ही झुझारू व बहादुर वंश माना जाता है।पाकिस्तान के कई बड़े आर्मी जनरल जंजुआ राजपूत हैं,अंग्रेजो ने भी जंजुआ राजपूतो को पंजाब की सबसे लड़ाकू कौम बताया था.कबूल का प्रसिद्ध शाही वंश भी जंजुआ राजपूत वंश ही माना जाता है,जिन्होंने गजनवी से लम्बे समय तक संघर्ष किया था.यही नहीं इसके वंशज वीर पोरस को भी अपना पूर्वज मानते हैं जिन्होंने सिकन्दर को भी हरा दिया था.

===========जर्राल वंश ===============

ये भी तंवर वंश की शाखा हैं,इन्होने तराइन के दोनों युद्धों में प्रथ्विराज चौहान के साथ मिलकर गौरी का मुकाबला किया था,इसके बाद किसी कारणवश इस्लाम स्वीकार कर लिया,मध्य काल में इनका राज्य हरियाणा के कलानौर,जम्मू कश्मीर के राजौरी में था,इन्होने पठानों,सिखों,ब्रिटिशों और डोगरो से खूब लड़ाई लड़ी और कभी भी आसानी से किसी के काबू नहीं आये,आज इनकी आबादी अधिकतर जम्मू कश्मीर,पाकिस्तान में मिलती है,

============बेरुआर वंश

बेरुआर वंश तंवर वंश की ही एक शाखा है जिसने पूर्वी उत्तरप्रदेश के बलिया व मुज़्ज़फ़्फ़रपुर जिले पर राज किया। भाटों के अनुसार पूर्वी उत्तर प्रदेश में बेरुर नाम की जन जाती को पराजय कर कर बेरुआरी तंवरों ने राज्य स्थापित किया जिस कारण इनका नाम बेरु + आरी यानि दुश्मन पर पड़ा। बेरुआर वंश के कई गाँव आज बिहार के मिथिलांचल इलाके,फ़ैजाबाद,बलिया,गाजीपुर,बनारस,छपरा आदि जिलो में पाए जाते है,यह वंश पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार सीमा पर सबसे शक्तिशाली राजपूत वंशो में एक है.

===========इन्दौरिया / इंदोलिया तंवर =========
इन्दौरिया तंवर सम्राट अनंगपाल तोमर के पुत्र इंदुपाल के वंशज है। इन्दौरिया तंवरों के ठिकाने आज झाँसी दतिया धौलपुर आदि में पाए जाते है। दिल्ली के गौरी द्वारा ध्वस्त हो जाने के बाद यह शाख भी इन इलाकों में आ बसी।

============= इन्दा तंवर ============
यह खाप आज के मध्य प्रदेश के ग्वालियर के आस पास के इलाके में बसी हुई है। इस खाप को लडूवा तंवर भी कहते है।

=========बिलदारिया तंवर ============
राजा बंसोली के वंशज भागपाल ने बीदासर में राज्य स्थापित किया। बीदासर से जो तंवर निकले वे तंवर बिलदारिया कहलाये। इनके गाँव उत्तर प्रदेश के कानपूर बलिया उन्नाव आदि जिलों में है।

========खाती तंवर ===========
यह तंवर गढ़वाल के खात्मस्यु के अधिकारी थे। इससे पहले इनका निकास आगरा मुरेना के तोमरधार से माना गया है। आज यह शाख गढ़वाल में बस्ती है।

=============सतरावला तंवर========= 
अंगपाल के पुत्र सतरौल के वंशज। भिवानी हरियाणा के आस पास रहते है।

===============सोम वंश ============
सम्राट अनंगपाल उर्फ़ जावल के पुत्र सोम के वंशज। इन्हे सुमाल भी कहा जाता है। 
कुछ लोग इन्हें पांडू पुत्र भीम का वंश भी मानते हैं ।ईस्ट यूपी के सोमवंशी राजपूत इनसे अलग हैं।
सुमाल आज भी दिल्ली के रिठाला गाँव के मूल निवासी है। सुमाल रिठाला के आस पास के गाँवो के अलावा उत्तर प्रदेश के मुज़्ज़फरनगर व मेरठ के 24 गाँवो में पाए जाते है यहाँ इन्हे सोम कहा जाता है। उत्तर प्रदेश के मशहूर भाजपा नेता संगीत सोम इसी वंश से है।

============= कोड्यां तंवर============= 
जावाल के पुत्र पर ही इस खाप का नाम पड़ा। आज राजस्थान के सीकर जिले में डाबला के आस पास इनके गाँव पड़ते है।

============निहाल तंवर ============
ये भी दिल्ली पति अनंगपाल उर्फ़ जावल के वंश से है आज मध्यप्रदेश में पाए जाते है।
============सेलेरिया तंवर ==========
ये भी दिल्ली पति जावल के वंश से है। इन्हे सुनियार भी कहा जाता है ये मध्य प्रदेश के विदिशा में बस्ते है।

===============घोड़ेवा तंवर ===========
नूरपुर हिमाचल के तंवर घोड़ेवा शाशक कहलाए।

===========तिलोता तंवर =========
बिहार के आरा शाहबाद भोजपुर और यूपी के झाँसी जालौन जिले में निवास करते है।

===============जनवार राजपूत ============ 
उत्तर प्रदेश के बलरामपुर गंगवाल ऑइल प्रयागपुर इनके ठिकाने है। जनवार राजपूत झाँसी दतिया और बुंदेलखंड में भी पाए जाते है. जनवार तंवरों की शाखा के बजाये भाई बंध माने जाते है जो राजा तुंगपाल से पहले इस वंश से अलग हो गए।

================कटियार तंवर =========
धर्मपुर राज्य जिला हरदोई उत्तर प्रदेश कटियार तंवर राजपूतों का है

============पालीवार तंवर ============
उत्तरप्रदेश के गोरखपुर व फैज़ाबाद जिलो में इनके गाँव है।

================द्वार तंवर ============
यु पी के जालौन झाँसी व हमीरपुर जिलों में पाए जाते है

==============जरोलिया तंवर ====
यु पी के बुलंद शहर के आस पास के तंवर जरोलिया कह लाते है।कुछ जगह इन्हें गौड़ वंश की शाखा भी लिखा है।

=============रघु तंवर ===============
रघु तंवर जाटू तंवर के भाई माने जाते है और भिवानी के आस पास आज बसे हुए है।
===========अन्य तंवर शाखाये :=============
रैक्वाल तिलोता किसनातिल चंदेरिया रिटालिया मोहाल जोधाण अनवार बिलोड़िया अंगडिया मगरोठिया पन्ना बोधयाणा कोढयाना बेबत भैपा तुनिहान आदि '.

=========मराठा क्षत्रियों में तंवर वंश =========
मराठा तंवर मराठा तौर ठाकुर नाम से जाना जाता है.तौर ठाकुर के मराठवाडा प्रांत मे गोदावरी नदी के तीर पर २२ गाँव है.इस प्रांत को गंगथडी भी कहा जाता है,इसके अलावा मराठो में तावडे या तान्वरे,शिर्के भी तंवर वंशी हैं.

चन्द्रवंशी तंवर (तोमर) राजपूतो का इतिहास

तोमर या तंवर उत्तर-पश्चिम भारत का एक राजपूत वंश है। तोमर राजपूत क्षत्रियो में चन्द्रवंश की एक शाखा है और इन्हें पाण्डु पुत्र अर्जुन का वंशज माना जाता है.इनका गोत्र अत्री एवं व्याघ्रपद अथवा गार्गेय्य होता है। क्षत्रिय वंश भास्कर,पृथ्वीराज रासो,बीकानेर वंशावली में भी यह वंश चन्द्रवंशी लिखा हुआ है,यही नहीं कर्नल जेम्स टॉड जैसे विदेशी इतिहासकार भी तंवर वंश को पांडव वंश ही मानते हैं।

उत्तर मध्य काल में ये वंश बहुत ताकतवर वंश था और उत्तर पश्चिमी भारत के बड़े हिस्से पर इनका शाशन था। देहली जिसका प्राचीन नाम ढिल्लिका था, इस वंश की राजधानी थी और उसकी स्थापना का श्रेय इसी वंश को जाता है।

नामकरण---------

तंवर अथवा तोमर वंश के नामकरण की कई मान्यताएं प्रचलित हैं,कुछ विद्वानों का मानना है कि राजा तुंगपाल के नाम पर तंवर वंश का नाम पड़ा,पर सर्वाधिक उपयुक्त मान्यता ये प्रतीत होती है 

इतिहासकार ईश्वर सिंह मडाड की राजपूत वंशावली के पृष्ठ संख्या 228 के अनुसार,,,,,,,

"पांडव वंशी अर्जुन ने नागवंशी क्षत्रियो को अपना दुश्मन बना लिया था,नागवंशी क्षत्रियो ने पांड्वो को मारने का प्रण ले लिया था,पर पांडवो के राजवैध धन्वन्तरी के होते हुए वे पांड्वो का कुछ न बिगाड़ पाए !अतः उन्होंने धन्वन्तरी को मार डाला !इसके बाद अभिमन्यु पुत्र परीक्षित को मार डाला !परीक्षित के बाद उसका पुत्र जन्मेजय राजा बना !अपने पिता का बदला लेने के लिए जन्मेजय ने नागवंश के नो कुल समाप्त कर दिए !नागवंश को समाप्त होता देख उनके गुरु आस्तिक जो की जत्कारू के पुत्र थे,जन्मेजय के दरबार मैं गए व् सुझाव दिया की किसी वंश को समूल नष्ट नहीं किया जाना चाहिए व सुझाव दिया की इस हेतु आप यज्ञ करे !महाराज जन्मेजय के पुरोहित कवष के पुत्र तुर इस यज्ञ के अध्यक्ष बने !

इस यग्य में जन्मेजय के पुत्र,पोत्र अदि दीक्षित हुए !क्योकि इन सभी को तुर ने दीक्षित किया था इस कारण ये पांडव तुर,तोंर या बाद तांवर तंवर या तोमर कहलाने लगे !ऋषि तुर द्वारा इस यज्ञ का वर्णन पुराणों में भी मिलता है.

महाभारत काल के बाद तंवर वंश का वर्णन----------

महाभारत काल के बाद पांडव वंश का वर्णन पहले तो 1000 ईसा पूर्व के ग्रंथो में आता है जब हस्तिनापुर राज्य को युधिष्ठर वंश बताया गया,पर इसके बाद से लेकर बौद्धकाल,मौर्य युग से लेकर गुप्तकाल तक इस वंश के बारे में कोई जानकारी नहीं मिलती,समुद्रगुप्त के शिलालेख से पाता चलता है कि उन्होंने मध्य और पश्चिम भारत की यौधेय और अर्जुनायन क्षत्रियों को अपने अधीन किया था,यौधेय वंश युधिष्ठर का वंश माना जा सकता है और इसके वंशज आज भी चन्द्रवंशी जोहिया राजपूत कहलाते हैं जो अब अधिकतर मुसलमान हो गए हैं,इन्ही के आसपास रहने वाले अर्जुनायन को अर्जुन का वंशज माना जा सकता है और ये उसी क्षेत्रो में पाए जाते थे जहाँ आज भी तंवरावाटी और तंवरघार है,यानि पांडव वंश ही उस समय तक अर्जुनायन के नाम से जाना जाता था और कुछ समय बाद वही वंश अपने पुरोहित ऋषि तुर द्वारा यज्ञ में दीक्षित होने पर तुंवर, तंवर,तूर,या तोमर के नाम से जाना गया.(इतिहासकार महेन्द्र सिंह तंवर खेतासर भी अर्जुनायन को ही तंवर वंश मानते हैं)

तंवर वंश और दिल्ली की स्थापना ------------

ईश्वर का चमत्कार देखिये कि हजारो साल बाद पांडव वंश को पुन इन्द्रप्रस्थ को बसाने का मौका मिला,और ये श्रेय मिला अनंगपाल तोमर प्रथम को.
दिल्ली के तोमर शासको के अधीन दिल्ली के अलावा पंजाब ,हरियाणा,पश्चिमी उत्तर प्रदेश भी था,इनके छोटे राज्य पिहोवा,सूरजकुंड,हांसी,थानेश्वर में होने के भी अभिलेखों में उल्लेख मिलते हैं.इस वंश ने बड़ी वीरता के साथ तुर्कों का सामना किया और कई सदी तक उन्हें अपने क्षेत्र में अतिक्रमण करने नहीं दिया

दिल्ली के तंवर(तोमर) शासक (736-1193 ई)------

1.अनगपाल तोमर प्रथम (736-754 ई)-दिल्ली के संस्थापक राजा थे जिनके अनेक नाम मिलते हैं जैसे बीलनदेव, जाऊल इत्यादि।
2.राजा वासुदेव (754-773)
3.राजा गंगदेव (773-794)
4.राजा पृथ्वीमल (794-814)-बंगाल के राजा धर्म पाल के साथ युद्ध
5.जयदेव (814-834)
6.राजा नरपाल (834-849)
7.राजा उदयपाल (849-875)
8.राजा आपृच्छदेव (875-897)
9.राजा पीपलराजदेव (897-919)
10.राज रघुपाल (919-940)
11.राजा तिल्हणपाल (940-961)
12.राजा गोपाल देव (961-979)-इनके समय साम्भर के राजा सिहराज और लवणखेडा के तोमर सामंत सलवण के मध्य युद्ध हुआ जिसमें सलवण मारा गया तथा उसके पश्चात दिल्ली के राजा गोपाल देव ने सिंहराज पर आक्रमण करके उन्हें युद्ध में मारा
12.सुलक्षणपाल तोमर (979-1005)-महमूद गजनवी के साथ युद्ध किया
13.जयपालदेव (1005-1021)-महमूद गजनवी के साथ युद्ध किया, महमूद ने थानेश्वसर ओर मथुरा को लूटा
14.कुमारपाल (1021-1051)-मसूद के साथ युद्ध किया और 1038 में हाँसी के गढ का पतन हुआ, पाच वर्ष बाद कुमारपाल ने हासी, थानेश्वसर के साथ साथ कांगडा भी जीत लिया

16.अनगपाल द्वितीय (1051-1081)-लालकोट का निर्माण करवाया और लोह स्तंभ की स्थापना की, अनंगपाल द्वितीय ने 27 महल और मन्दिर बनवाये थे।दिल्ली सम्राट अनगपाल द्वितीय ने तुर्क इबराहीम को पराजित किया

17.तेजपाल प्रथम(1081-1105)
18.महिपाल(1105-1130)-महिलापुर बसाया और शिव मंदिर का निर्माण करवाया
19.विजयपाल (1130-1151)-मथुरा में केशवदेव का मंदिर

20.मदनपाल(1151-1167)-
मदनपाल अथवा अनंगपाल तृतीय के समय अजमेर के प्रतापी शासक विग्रहराज चौहान उर्फ़ बीसलदेव ने दिल्ली राज्य पर अपना अधिकार कर लिया और संधि के कारण मदनपाल को ही दिल्ली का शासक बना रहने दिया,मदनपाल ने बीसलदेव के साथ मिलकर तुर्कों के हमलो के विरुद्ध युद्ध किया और उन्हें मार भगाया,मदलपाल तोमर ने विग्रहराज चौहान उर्फ़ बीसलदेव के शोर्य से प्रभावित होकर उससे अपनी पुत्री देसलदेवी का विवाह किया,पृथ्वीराज रासो में बाद में किसी ने काल्पनिक कहानी जोड़ दी है कि दिल्ली के राजा अनंगपाल ने अपनी दो पुत्रियों की शादी एक कन्नौज के जयचंद के साथ और दूसरी कमला देवी का विवाह पृथ्वीराज चौहान के साथ की,जिससे पृथ्वीराज चौहान का जन्म हुआ,जबकि सबसे प्रमाणिक ग्रन्थ पृथ्वीराज विजय के अनुसार सच्चाई ये है कि पृथ्वीराज चौहान की माता चेदी राज्य की कर्पूरी देवी थी,और पृथ्वीराज चौहान न तो अनंगपाल तोमर का धेवता था न ही जयचंद उसका मौसा था,ये सारी कहानी काल्पनिक थी.

21.पृथ्वीराज तोमर(1167-1189)-अजमेर के राजा सोमेश्वर और पृथ्वीराज चव्हाण इनके समकालीन थे
22.चाहाडपाल/गोविंदराज (1189-1192)-पृथ्वीराज चौहान के साथ मिलकर गोरी के साथ युद्ध किया,तराईन दुसरे युद्ध मे मारा गया।पृथ्वीराज रासो के अनुसार 
तराईन के पहले युद्ध में मौहम्मद गौरी और गोविन्दराज तोमर का आमना सामना हुआ था,जिसमे दोनों घायल हुए थे और गौरी भाग रहा था। भागते हुए गौरी को धीरसिंह पुंडीर ने पकडकर बंदी बना लिया था। जिसे उदारता दिखाते हुए पृथ्वीराज चौहान ने छोड़ दिया। हालाँकि गौरी के मुस्लिम इतिहासकार इस घटना को छिपाते हैं।

23.तेजपाल द्वितीय (1192-1193 ई)-दिल्ली का अन्तिम तोमर राजा , जिन्होंने स्वतन्त्र 15 दिन तक शासन किया, और कुतुबुद्दीन ने दिल्ली पर आक्रमण कर हमेशा के लिए दिल्ली पर कब्जा कर लिया।
ग्वालियर,चम्बल,ऐसाह गढ़ी का तोमर वंश--------

दिल्ली छूटने के बाद वीर सिंह तंवर ने चम्बल घाटी के ऐसाह गढ़ी में अपना राज स्थापित किया जो इससे पहले भी अर्जुनायन तंवर वंश के समय से उनके अधिकार में था,बाद में इस वंश ने ग्वालियर पर भी अधिकार कर मध्य भारत में एक बड़े राज्य की स्थापना की,यह शाखा ग्वालियर स्थापना के कारण ग्वेलेरा कहलाती है,माना जाता है कि ग्वालियर का विश्वप्रसिद्ध किला भी तोमर शासको ने बनवाया था.यह क्षेत्र आज भी तंवरघार कहा जाता है और इस क्षेत्र में तोमर राजपूतो के 1400 गाँव कहे जाते हैं.
वीर सिंह के बाद उद्दरण,वीरम,गणपति,डूंगर सिंह,कीर्तिसिंह,कल्याणमल,और राजा मानसिंह हुए,
राजा मानसिंह तोमर बड़े प्रतापी शासक हुए,उनके दिल्ली के सुल्तानों से निरंतर युद्ध हुए,उनकी नो रानियाँ राजपूत थी,पर एक दीनहींन गुज्जर जाति की लडकी मृगनयनी पर मुग्ध होकर उससे भी विवाह कर लिया,जिसे नीची जाति की मानकर रानियों ने महल में स्थान देने से मना कर दिया जिसके कारण मानसिंह ने छोटी जाति की होते हुए भी मृगनयनी गूजरी के लिए अलग से ग्वालियर में गूजरी महल बनवाया.इस गूजरी रानी पर राजपूत राजा मानसिंह इतने आसक्त थे कि गूजरी महल तक जाने के लिए उन्होंने एक सुरंग भी बनवाई थी,जो अभी भी मौजूद है पर इसे अब बंद कर दिया गया है.
मानसिंह के बाद विक्रमादित्य राजा हुए,उन्होंने पानीपत की लड़ाई में अपना बलिदान दिया,उनके बाद रामशाह तोमर राजा हुए,उनका राज्य 1567 ईस्वी में अकबर ने जीत लिया,इसके बाद राजा रामशाह तोमर ने मुगलों से कोई संधि नहीं की और अपने परिवार के साथ महाराणा उदयसिंह मेवाड़ के पास आ गए,हल्दीघाटी के युद्ध में राजा रामशाह तोमर ने अपने पुत्र शालिवाहन तोमर के साथ वीरता का असाधारण प्रदर्शन कर अपने परिवारजनों समेत महान बलिदान दिया,उनके बलिदान को आज भी मेवाड़ राजपरिवार द्वारा आदरपूर्वक याद किया जाता है.

मालवा में रायसेन में भी तंवर राजपूतो का शासन था ,यहाँ के शासक सिलहदी उर्फ़ शिलादित्य तंवर राणा सांगा के दामाद थे और खानवा के युद्ध में राणा सांगा की और से लडे थे,कुछ इतिहासकार इन पर राणा सांगा से धोखे का भी आरोप लगाते हैं ,पर इसके प्रमाण पुष्ट नही हैं,सिल्ह्दी पर गुजरात के बादशाह बहादुर शाह ने 1532 इसवी में हमला किया,इस हमले में सिलहदी तंवर की पत्नी जो राणा सांगा की पुत्री थी उन्होंने 700 राजपूतानियो और अपने दो छोटे बच्चों के साथ जौहर किया और सिल्हदी तंवर अपने भाई के साथ वीरगति को प्राप्त हुए,
बाद में रायसेन को पूरनमल को दे दिया गया,कुछ वर्षो बाद 1543 इसवी में रायसेन के मुल्लाओ की शिकायत पर शेरशाह सूरी ने इसके राज्य पर हमला किया और पूरणमल की रानियों ने जौहर कर लिया और पूरणमल मारे गये इस प्रकार इस राज्य की समाप्ति हुई.

तंवरावाटी और तंवर ठिकाने ---------------
देहली में तोमरो के पतन के बाद तोमर राजपूत विभिन्न दिशाओ में फ़ैल गए। एक शाखा ने उत्तरी राजस्थान के पाटन में जाकर अपना राज स्थापित किया जो की जयपुर राज्य का एक भाग था। ये अब 'तँवरवाटी'(तोरावाटी) कहलाता है और वहाँ तँवरों के ठिकाने हैं। मुख्य ठिकाना पाटण का ही है,एक ठिकाना खेतासर भी है,इनके अलावा पोखरण में भी तंवर राजपूतो के ठिकाने हैं,बाबा रामदेव तंवर वंश से ही थे जो बहुत बड़े संत माने जाते हैं,आज भी वो पीर के रूप में पूजे जाते हैं.

मेवाड़ के सलुम्बर में भी तंवर राजपूतो के कई ठिकाने हैं जिनमे बोरज तंवरान एक ठिकाना है,
इसके अतिरिक्त हिमाचल प्रदेश में बेजा ठिकाना और कोटि जेलदारी,बीकानेर में दाउदसर ठिकाना,mandholi जागीर,भी तंवर राजपूतो के ठिकाने हैं,धौलपुर की स्थापना भी तंवर राजपूत धोलनदेव ने की थी। 18 वी सदी के आसपास अंग्रेजो ने जाटों को धौलपुर दे दिया। ये जाट गोहद से सिंधिया द्वारा विस्थापित किये गए थे और पूर्व में इनके पूर्वज राजा मानसिंह तोमर की सेवा में थे और उनके द्वारा ही इन्हें गोहद में बसाया गया था।अब भी धौलपुर में कायस्थपाड़ा तंवर राजपूतो का ठिकाना है।

तंवरवंश की शाखाएँ------

तंवर वंश की प्रमुख शाखाएँ रुनेचा,ग्वेलेरा,बेरुआर,बिल्दारिया,खाति,इन्दोरिया,जाटू,जंघहारा,सोमवाल हैं,इसके अतिरिक्त पठानिया वंश भी पांडव वंश ही माना जाता है,इसका प्रसिद्ध राज्य नूरपुर है,इसमें वजीर राम सिंह पठानिया बहुत प्रसिद्ध यौद्धा हुए हैं.जिन्होंने अंग्रेजो को नाको चने चबवा दिए थे.
इन शाखाओं में रूनेचा राजस्थान में,ग्वेलेरा चम्बल क्षेत्र में,बेरुआर यूपी बिहार सीमा पर,बिलदारिया कानपूर उन्नाव के पास,इन्दोरिया मथुरा, बुलन्दशहर,आगरा में मिलते हैं,मेरठ मुजफरनगर के सोमाल वंश भी पांडव वंश माना जाता है,जाटू तंवर राजपूतो की भिवानी हरियाणा में 1440 गाँव की रियासत थी,इस शाखा के तंवर राजपूत हरियाणा में मिलते हैं,जंघारा राजपूत यूपी के अलीगढ,बदायूं,बरेली शाहजहांपुर आदि जिलो में मिलते हैं,ये बहुत वीर यौद्धा माने जाते हैं इन्होने रुहेले पठानों को कभी चैन से नहीं बैठने दिया,और अहिरो को भगाकर अपना राज स्थापित किया...
पूर्वी उत्तर प्रदेश का जनवार राजपूत वंश भी पांडववंशी जन्मेजय का वंशज माना जाता है। इस वंश की बलरामपुर समेत कई बड़ी स्टेट पूर्वी यूपी में हैं।

इनके अतिरिक्त पाकिस्तान में मुस्लिम जंजुआ राजपूत भी पांडव वंशी कहे जाते हैं जंजुआ वंश ही शाही वंश था जिसमे जयपाल,आनंदपाल,जैसे वीर हुए जिन्होंने तुर्क महमूद गजनवी का मुकाबला बड़ी वीरता से किया था,जंजुआ राजपूत बड़े वीर होते हैं और पाकिस्तान की सेना में इनकी बडी संख्या में भर्ती होती है.इसके अलावा वहां का जर्राल वंश भी खुद को पांडव वंशी मानता है,
मराठो में भी एक वंश तंवरवंशी है जो तावरे या तावडे कहलाता है ,महादजी सिंधिया का एक सेनापति फाल्किया खुद को बड़े गर्व से तंवर वंशी मानता था.

तोमर/तंवर राजपूतो की वर्तमान आबादी-------

तोमर राजपूत वंश और इसकी सभी शाखाएँ न सिर्फ भारत बल्कि पाकिस्तान में भी बड़ी संख्या में मिलती है,चम्बल क्षेत्र में ही तोमर राजपूतो के 1400 गाँव हैं,इसके अलावा पश्चिमी उत्तर प्रदेश के पिलखुआ के पास तोमरो के 84 गाँव हैं,भिवानी में 84 गाँव जिनमे बापोड़ा प्रमुख है,,मेरठ में गढ़ रोड पर 12 गाँव जिनमे सिसोली और बढ्ला बड़े गाँव हैं,
कुरुक्षेत्र में 12 गाँव,गढ़मुक्तेश्वर में 42 गाँव हैं जिनमे भदस्याना और भैना प्रसिद्ध हैं. बुलन्दशहर में 24 गाँव,खुर्जा के पास 5 गाँव तोमर राजपूतो के हैं,हरियाणा में मेवात के नूह के पास 24 गाँव हैं जिनमे बिघवाली प्रमुख है.
ये सिर्फ वेस्ट यूपी और हरियाणा का थोडा सा ही विवरण दिया गया है,इनकी जनसँख्या का,अगर इनकी सभी प्रदेशो और पाकिस्तान में हर शाखाओ की संख्या जोड़ दी जाये तो इनके कुल गाँव की संख्या कम से कम 6000 होगी,चौहान राजपूतो के अलावा राजपूतो में शायद ही कोई वंश होगा जिसकी इतनी बड़ी संख्या हो.

जाट, गूजर और अहीर में तोमर राजपूतो से निकले गोत्र-----------

कुछ तोमर राजपूत अवनत होकर या तोमर राजपूतो के दूसरी जाती की स्त्रियों से सम्बन्ध होने से तोमर वंश जाट, गूजर और अहीर जैसी जातियो में भी चला गया।जाटों में कई गोत्र है जो अपने को तोमर राजपूतो से निकला हुआ मानते है जैसे सहरावत ,राठी ,पिलानिया, नैन, मल्लन,बेनीवाल, लाम्बा,खटगर, खरब, ढंड, भादो, खरवाल, सोखिरा,ठेनुवा,रोनिल,सकन,बेरवाल और नारू। ये लोग पहले तोमर या तंवर उपनाम नहीँ लगाते थे लेकिन इनमे से कई गोत्र अब तोमर या तंवर लगाने लगे है। उत्तर प्रदेश के बड़ौत क्षेत्र के सलखलेन् जाट भी अपने को किसी सलखलेन् का वंशज बताते है जिसे ये अनंगपाल तोमर का धेवता बताते है और इस आधार पर अपने को तोमर बताने लगे है।गूँजरो में भी तोमर राजपूतो के अवशेष मिलते है। खटाना गूजर अपने को तोमर राजपूतो से निकला हुआ मानते है। ग्वालियर के पास तोंगर गूजर मिलते है जो ग्वालियर के राजा मान सिंह तोमर की गूजरी रानी मृगनयनी के वंशज है जिन्हें गूजरी माँ की औलाद होने के कारण राजपूतों ने स्वीकार नहीँ किया। दक्षिणी दिल्ली में भी तँवर गूजरों के गाँव मिलते है। मुस्लिम शाशनकाल में जब तोमर राजपूत दिल्ली से निष्काषित होकर बाकी जगहों पर राज करने चले गए तो उनमे से कुछ ने गूजर में शादी ब्याह कर मुस्लिम शासकों के अधीन रहना स्वीकार किया।इसके अलावा सहारनपुर में छुटकन गुर्जर भी खुद को तंवर वंश से निकला मानते हैं और करनाल,पानीपत ,सोहना के पास भी कुछ गुज्जर इसी तरह तंवर सरनेम लिखने लगे हैं,हरयाणा के अहिरो में भी दयार गोत्र मिलती है जो अपने को तोमर राजपूतो से निकला हुआ मानते है।दिल्ली में रवा राजपूत समाज में भी तंवर वंश शामिल हो गया है.....

इस प्रकार हम देखते हैं कि चन्द्रवंशी पांडव वंश तोमर/तंवर राजपूतो का इतिहास बहुत शानदार रहा है,वर्तमान में भी तोमर राजपूत राजनीति,सेना,प्रशासन,में अपना दबदबा कायम किये हुए है,पूर्व थलसेनाध्यक्ष जनरल वी के सिंह भिवानी हरियाणा के तंवर राजपूत हैं,और आज केंद्र सरकार में मंत्री भी हैं,मध्य प्रदेश के नरेंद्र सिंह तोमर भी केंद्र सरकार में मंत्री हैं,प्रसिद्ध एथलीट और बाद में मशहूर बागी पान सिंह तोमर के बारे में सभी जानते ही हैं,स्वतंत्रता सेनानी रामप्रसाद बिस्मिल भी तोमर राजपूत थे,इनके अतिरिक्त सैंकड़ो राजनीतिज्ञ,प्रशासनिक अधिकारी,समाजसेवी,सैन्य अधिकारी,खिलाडी तंवर वंशी राजपूत हैं 
तोमर क्षत्रिय राजपूतो के बारे में कहा गया है की 

"अर्जुन के सुत सो अभिमन्यु नाम उदार.
तिन्हते उत्तम कुल भये तोमर क्षत्रिय उदार."
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रोहिला क्षत्रियों में भी तोमर तंवर वंश पांडु के वंशधर अनेक गोत्र हे दिल्ली से विस्थापित बहुत सी तोमर शाखाएं रोहिला राजपूत गोत्रों में विद्यमान है।
#जय_भवानी 🙏🚩🗡️तोमर ,तंवर,तुंवर ( पांडु वंसी चन्द्र वन्स,तुवरसू वंसी चन्द्र वन्स), राजपूतो की निम्न शाखाये रोहिले राजपूतो में है
1, जंघारा
2सोमवाल
3बटोला
4बढ़ वार
5 जाडिया 
6इन्दौलिया
7कटियार/कटोच
8गोगड़
9गंगवार
10बनाफ़रे(एक यदु वन्स बनाफर अलग है)
11पठानिया
12 काठी(सूर्य वंश की निकुंभ काठी शाखा अलग है)
13 जडोलिया
14सिकरवार
15किशन लाल,कुशनवाल किशनवाल
*गद्दी*--इंद्रप्रस्थ(दिल्ली)
*ठिकाने*--बुद्धमूउ (बंदायू )रोहिलखण्ड,
दतिया,(,बुंदेलखंड)
धर्मपुर(हरदोई)
आदि
ऋषि गोत्र -गार्गेय,पराशर,मुदगल,
प्रवर -तीन
वेद--,यजुर्वेद
शाखा --वाजसनेयी
सूत्र--पारस्कर,गुह्य सूत्र
*कुलदेवी*--योगेश्वरी
निशान --हरा
देवता --शिव
नगाडा -रणगंजन

शस्त्र--खड्ग
पर्व --विजय दशमी
उद्घोष-हरर हर महादेव
उन्माद -विजय या वीर गति
पूर्वज 
पुरुरवा
ययाति
पुरु
शान्तनु
:
:
:
:
पाण्डव
:
:
:क्षेमक
(ईसापूर्व 424)
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:
:
अनंगपाल प्रथम (742 ईसवी में उजड़ी दिलली को पुनः बसाया)
इनकी 16 वी पीढ़ी में सोलहवाँ अनंगपाल हुवा इसने क्वार सुदी एकादशी दिन सोमवार को लालकोट(वर्तमान लालकिला) की नींव डाली
17वां अनंगपाल उर्फ तेजपाल हुवा इन्होंने आगरे में तेज महल बनवाया(वर्तमान ताज महल)
इसी तेजपाल के दो पुत्र
महेश पाल ओर जीत पाल(अजयपाल)
थे। महेश पाल इंद्रप्रस्थ दिल्ली की गद्दी पर ही रहा ओर अजयपाल वहाँ से चल कर कठहर रोहिलखण्ड के बुद्धमऊ के राजा बुधपाल के यहां आया और अपना राज्य स्थापित कर वन्स चलाया अजय पाल के पुत्र महिपाल ने माघ सुदी पंचमी दिन मंगल वार को बुद्धमूउ बंदायू के किले की नीव रखी 
इनके प्रपौत्र थे किसन सिंह उर्फ किशन सेन ओर सुख सेन 1253 ईसवी में रामपुर के राजा रणवीर सिंह रोहिला के सेनापति की हैसियत से दिल्ली सुल्तान नसीरूदीन महमूद बहराम उर्फ चंगेज की तीस हजारी सेना को धूल चटाई इनके प्रपौत्र राजा सोहन पाल देव ने करोली में ठिकाना स्थाई कर अपने दादा श्री किशन सेन उर्फ किशन सिंह के नाम पर अपने वंशजो के गोत्र को किशनलाल या किसन वाल नाम से प्रचलित किया इन्ही के वंसज बुंदेलखंड दतिया गए वहां वे किशन लाल राजपूत है ।इसी तरह रोहिलखण्ड में जिन जिन वन्स के राजपूतो ने 909 ईसवी से 1720ईसवी तक शासन किया वही है 
*रोहिला राजपूत*
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