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Friday, 22 May 2026

SOME SOURCES OF ROHILKHAND RAJPUT HISTORY

गौरवशाली इतिहास के कुछ स्वर्णाक्षर (रोहिला क्षत्रिय)
भारत वर्ष का क्षेत्रफल 42 ,02 ,500 वर्ग किमी था ।
रोहिला साम्राज्य 25 ,000 वर्ग किमी 10 ,000 वर्गमील में फैला हुआ था ।
रोहिला, राजपूतो की एक खाप, परिवार या परिजन- समूह है जो कठेहर - रोहिलखण्ड के शासक एंव संस्थापक थे |मध्यकालीन भारत में बहुत से राजपूत लडाको को रोहिला की उपाधि से विभूषित किया गया. उनके वंशज आज भी रोहिला परिवारों में पाए जाते हैं ।
रोहिले- राजपूत प्राचीन काल से ही सीमा- प्रांत, मध्य देश (गंगा-yamuna का दोआब),रोहिलखंड पंजाब, काश्मीर, गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश में शासन करते रहे हैं । जबकि मुस्लिम-रोहिला साम्राज्य अठारहवी शताब्दी में इस्लामिक दबाव के पश्चात् स्थापित हुआ. । अफगानों ने इसे उर्दू में "रूहेलखण्ड" कहा ।
1702 से 1720 ई तक रोहिलखण्ड में रोहिले राजपूतो का ही शासन था. जिसकी राजधानी बरेली थी ।
रोहिलखंड एक राजपूताना साम्राज्य है। रोहिलखंड एक शुद्ध हिंदी,संस्कृत और प्राकृत भाषा का शब्द है,अरेबिक या उर्दू शब्द नही है।
रोहिले राजपूतो के महान शासक "राजा इन्द्रगिरी" ने रोहिलखण्ड की पश्चिमी सीमा पर रोहिलखंड विस्तार के समय सहारनपुर में एक किला बनवाया,जिसे "प्राचीन रोहिला किला" कहा जाता है । सन 1801 ई में रोहिलखण्ड को अंग्रेजो ने अपने अधिकार में ले लिया था. हिन्दू रोहिले-राजपुत्रो द्वारा बनवाए गये इस प्राचीन रोहिला किला को सन 1806 ईस्वी से सन1858 ईस्वी के मध्य कारागार में परिवर्तित कर दिया गया था । इसी प्राचीन- रोहिला- किला में आज सहारनपुर की जिला- कारागार है । उसके सामने महाराजा रणवीर सिंह रोहिला चौक स्थित है।
"सहारन" राजपूतो का एक गोत्र है जो रोहिले राजपूतो में पाया जाता है. यह सूर्य वंश की एक प्रशाखा है जो राजा भरत के वंशधरो से प्रचालित हुई थी ।
फिरोज़ तुगलक के आक्रमण के समय "थानेसर" (वर्तमान में हरियाणा में स्थित) का राजा "सहारन" ही था ।
दिल्ली में गुलाम वंश के समय रोहिलखण्ड की राजधानी "रामपुर" में RANVEER SINGH ROHILA/KATHEHARIYA/ (काठी कोम, निकुम्भ वंश, सूर्यवंश रावी नदी के निकट से विस्थापित कठ गणों के वंशधर) का शासन था । इसी रोहिले राजा ने दिल्ली के सेनापति नसीरुद्दीन चंगेज को हराया था. 'खंड' kshtriyo से सम्बंधित है, जैसे भरतखंड, BUNDELKHAND, VIDHEYLKHAND , रोहिलखंड, KUMAYUNKHHAND, उत्तराखंड आदि ।
प्राचीन भारत की केवल दो भाषाएँ संस्कृत व प्राकृत (सरलीकृत संस्कृत) थी । रोहिल प्राकृत और खंड संस्कृत के शब्द हैं जो क्षत्रिय राजाओं के प्रमाण हैं । इस्लामिक नाम है दोलताबाद, कुतुबाबाद, मुरादाबाद, जलालाबाद, हैदराबाद, मुबारकबाद, फैजाबाद, आदि ।
रोहिले राजपूतो की उपस्तिथि के प्रमाण हैं । योधेय गणराज्य के सिक्के, गुजरात का (1445 वि ) ' का शिलालेख (रोहिला मालदेव के सम्बन्ध में), उत्तर प्रदेश में स्थित रोहिलखंड रामपुर में राजा रणवीर सिंह के किले के खंडहर, रानी तारादेवी सती का मंदिर , पीलीभीत में राठौर रोहिलो (महिचा- प्रशाखा) की सतियों के मंदिर, कपिल मुनि स्थान पर कलायथ कैथल(हरियाणा)में वीर GANGA SINGH महेचा राठौड़ रोहिला राजपूत PANIPAT के तीसरे युद्ध KE YODHA की समाधि और उनकी रानी सती माता रामप्यारी का मंदिर जिसे क्षेत्र के सभी राजपूत मिलकर पूजते है। सहारनपुर का प्राचीन रोहिला किलाऔर उसके सामने स्थित क्षत्रिय सम्राट MAHA RAJA RANVEER SINGH ROHILA चौक, मंडोर का शिलालेख, " बड़ौत में स्तिथ " RAJA RANVEER SINGH ROHILA MARG"
*दिल्ली के रोहिणी में स्थित है महाराजा रणवीर सिंह रोहिला पार्क,बम्बई में स्थित हैं श्री हर प्रसाद रूहेला मार्ग*
          नगरे नगरे ग्रामै ग्रामै विलसन्तु संस्कृतवाणी ।
          सदने - सदने जन - जन बदने , जयतु चिरं कल्याणी ।।
          जोधपुर का शिलालेख, प्रतिहार शासक HARISH CHANDRA को मिली रोहिल्लाद्व्यंक की उपाधि, कई अन्य
          राजपूतो के वंशो को प्राप्त उपाधियाँ, 'पृथ्वीराज रासो', आल्हाखण्ड - काव्य सभी राजपूत वंशो में पाए
          जाने वाले प्रमुख गोत्र ।
          अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा भारत द्वारा प्रकाशित पावन ग्रन्थ क्षत्रिय वंशाणर्व (रोहिले क्षत्रियों का
          राज्य रोहिलखण्ड का पूर्व नाम पांचाल व मध्य देश, वर्तमान में अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा से
          अखिल भारतीय रोहिला.क्षत्रिय विकास परिषद रजिस्टर्ड को संबद्धता प्राप्त होना,। वर्तमान में भी रोहिलखण्ड (संस्कृत भाषा में)
          क्षेत्र का नाम यथावत बने रहना, अंग्रेजो द्वारा भी उत्तर रेलवे को "रोहिलखण्ड - रेलवे" का नाम देना जो
          बरेली से देहरादून तक सहारनपुर होते हुए जाती थी, वर्तमान में लाखो की संख्या में पाए जाने वाले
          रोहिला-राजपूत, रोहिले-राजपूतों के सम्पूर्ण भारत में फैले हुए कई अन्य संगठन अखिल भारतीय स्तर
          पर 'राजपूत रत्न' रोहिला शिरोमणि डा. कर्णवीर सिंह द्वारा संगठित एक अखिल भारतीय रोहिला
          क्षत्रिय विकास परिषद पंजीकृत (सम्बद्ध अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा) पंजीकरण संख्या - 545, आदि।
   12. पानीपत की तीसरी लड़ाई में रोहिले राजपूत- राजा गंगासहाय/गंगा सिंह राठौर (महेचा) के नेतृत्व में
          मराठों
          की ओर से अफगान आक्रान्ता अहमदशाह अब्दाली व रोहिला पठान नजीबदौला के विरुद्ध लड़े व
          वीरगति पाई । इस मराठा युद्ध में लगभग एक हजार चार सौ रोहिले राजपूत वीरगति को प्राप्त हुए ।
           (इतिहास -रोहिला-राजपूत)
   13. प्रथम स्वतंत्रता संग्राम 1857 में भी रोहिले राजपूतों ने अपना योगदान दिया, ग्वालियर के किले में रानी
          लक्ष्मीबाई को हजारों की संख्या में रोहिले राजपूत मिले, इस महायज्ञ में स्त्री पुरुष सभी ने अपने गहने
          धन आदि एकत्र कर झाँसी की रानी के साथ अंग्रेजो के विरुद्ध आवाज उठाने के लिए सम्राट बहादुरशाह-
          जफर तक पहुँचाए । अंग्रेजों ने ढूँढ-ढूँढ कर उन्हें काट डाला जिससे रोहिले राजपूतों ने अज्ञातवास की
          शरण ली।
   14. राजपूतों की हार के प्रमुख कारण थे हाथियों का प्रयोग, सामंत प्रणाली व आपसी मतभेद, ऊँचे व
          भागीदार कुल का भेदभाव (छोटे व बड़े की भावना) आदि।
   15. सम्वत 825 में बप्पा रावल चित्तौड़ से विधर्मियों को खदेड़ता हुआ ईरान तक गया। बप्पा रावल से समर
          सिंह तक 400 वर्ष होते हैं, गह्लौतों का ही शासन रहा। इनकी 24 शाखाएँ हैं। जिनके 16 गोत्र (बप्पा
          रावल के वंशधर) रोहिले राजपूतों में पाए जाते हैं।
   16. चितौड़ के राणा समर सिंह (1193 ई.) की रानी पटना की राजकुमारी थी इसने 9 राजा, 1 रावत और कुछ
          रोहिले साथ लेकर मौ. गोरी के गुलाम कुतुबद्दीन का आक्रमण रोका और उसे ऐसी पराजय दी कि कभी
          उसने चितौड़ की ओर नही देखा।
   17. रोहिला शब्द क्षेत्रजनित, गुणजनित व 'मूल पुरुष' नाम-जनित है। यह गोत्र जाटों में भी रूहेला, रोहेला,
          रूलिया, रूहेल , रूहिल, रूहिलान नामों से पाया जाता है।
   18. रूहेला गोत्र जाटों में राजस्थान व उ. प्र. में पाया जाता है। रोहेला गोत्र के जाट जयपुर में बजरंग बिहार
          ओर ईनकम टैक्स कालोनी टौंक रोड में विद्यमान है। झुनझुन, सीकर, चुरू, अलवर, बाडमेर में भी 
          रोहिला गोत्र के जाट विद्यमान हैं । उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले में रोहेला गोत्र के जाटों के बारह 
          गाँव हैं। महाराष्ट्र में रूहिलान गोत्र के जाट वर्धा में केसर व खेड़ा गाँव में विद्यमान हैं।,रोहतक और भिवानी में रोहिल, रूहिल उपनाम के जाट विद्यमान है।
   19. मुगल सम्राट अकबर ने भी राजपूत राजाओं को विजय प्राप्त करने के पश्चात् रोहिला-उपाधि से
          विभूषित किया था, जैसे राव, रावत, महारावल, राणा, महाराणा, रोहिल्ला, रहकवाल आदि।
   20. "रोहिला-राजपूत" समाज , क्षत्रियों का वह परिवार है जो सरल ह्रदयी, परिश्रमी,राष्ट्रप्रेमी,स्वधर्मपरायण,
          स्वाभिमानी व वर्तमान में अधिकांश अज्ञातवास के कारण साधनविहीन है। 40 प्रतिशत कृषि कार्य से,30
          प्रतिशत श्रम के सहारे व 30 प्रतिशत व्यापार व लघु उद्योगों के सहारे जीवन यापन कर रहे हैं। इनके 
          पूर्वजो ने हजारों वर्षों तक अपनी आन, मान, मर्यादा की रक्षा के लिए बलिदान दिए हैं और अनेको 
          आक्रान्ताओं को रोके रखने में अपना सर्वस्व मिटाया है । गणराज्य व लोकतंत्रात्मक व्यवस्था को
          सजीव बनाये रखने की भावना के कारण वंश परंपरा के विरुद्ध रहे, करद राज्यों में भी स्वतंत्रता बनाये
          रखी । कठेहर रोहिलखण्ड की स्थापना से लेकर सल्तनत काल की उथल पुथल, मार काट , दमन चक्र
          तक लगभग आठ सौ वर्ष के शासन काल के पश्चात् 1857 के ग़दर के समय तक रोहिले राजपूतों ने
          राष्ट्रहित में बलिदान दिये हैं। 
 क्रूर काल के झंझावालों से संघर्ष करते हुए क्षत्रियों का यह 'रोहिला परिवार' बिखर BIKHAR गया।
           , इस समाज की पहचान के लिए भी आज स्पष्टीकरण देना पड़ता है। कैसा दुर्भाग्य है? यह
          क्षत्रिय वर्ग का। जो अपनी पहचान को भी टटोलना पड़ रहा है। परन्तु समय के चक्र में सब कुछ सुरक्षित
          है। इतिहास के दर्पण में थिरकते चित्र, बोलते हैं, अतीत झाँकता है, सच सोचता है कि उसके होने के
          प्रमाण धुंधले-धुंधले से क्यों हैं? हे- क्षत्रिय तुम धन्य हो, पहचानो अपने प्रतिबिम्बों को' -
          "क्षत्रिय एकता का बिगुल फूँक 
           सब धुंधला धुंधला छंटने दो।
           हो अखंड भारत के राजपुत्र 
           खण्ड खण्ड में न सबको बंटने दो ।।"
    21. रोहिलखण्ड से विस्थापित इन रोहिला परिवारों में राजपूत परम्परा के कुछ प्रमुख गोत्र इस प्रकार पाए
           जाते हैं :-
रोहिला, रोहित, रोहिल, रावल, द्रोहिया, रल्हन, रूहिलान, रौतेला , रावत 
यौधेय, योतिक, जोहिया, झोझे, पेशावरी 
पुण्डीर, (पुलस्त्य)पांडला(धौम्य), पंढेर, पुन्ड़ेहार, पुंढीर, पुंडाया  
चौहान, जैवर, जौडा, चाहल, चावड़ा, खींची, गोगद, गदाइया, सनावर, क्लानियां, चिंगारा, चाहड बालसमंद, चोहेल, चेहलान, बालदा, बछ्स (वत्स), बछेर, चयद, झझोड, चौपट, खुम्ब, जांघरा, जंगारा, झांझड चुहल चूहेल 
निकुम्भ, कठेहरिया, कठौरा, कठैत, कलुठान, कठपाल, कठेडिया, कठड, काठी, कठ, पालवार 
RATHOD महेचा, महेचराना धांधल, रतनौता, बंसूठ जोली, जोलिए, बांकटे, बाटूदा, थाथी, कपोलिया, खोखर, अखनौरिया ,लोहमढ़े, मसानिया 
BUNDELA, उमट, ऊमटवाल 
, भारती, गनान 
नाभावंशी,बटेरिया, बटवाल, बरमटिया 
परमार, जावडा, लखमरा, मूसला, मौसिल, भौंसले, बसूक, जंदडा, पछाड़, पंवारखा, ढेड, मौन 
तोमर, तंवर, मुदगल, देहलीवाल, किशनलाल, सानयाल, सैन, सनाढय कालरा
GEHLOT, कूपट, पछाड़, थापा, ग्रेवाल, कंकोटक, गोद्देय, पापडा, नथैड़ा, नैपाली, लाठिवाल, पानिशप, पिसोण्ड, चिरडवाल, नवल, चरखवाल, साम्भा, पातलेय, पातलीय, छन्द (चंड), क्षुद्रक,(छिन्ड, इन्छड़, नौछड़क), रज्जडवाल, बोहरा, जसावत, गौर, मलक, मलिक , मूसला 
कछवाहा, कुशवाहा, कोकच्छ, ततवाल, बलद, कोकचे काक मछेर 
सिसौदिया, भरोलिया, बरनवाल, बरनपाल, बहारा 
 खुमाहड, अवन्ट, ऊँटवाल
सिकरवार, रहकवाल, रायकवार, ममड, गोदे 
सोलंकी, गिलानिया, भुन, बुन, बघेला, ऊन, (उनयारिया)
बडगूजर, सिकरवार, ममड़ा, पुडिया 
कश्यप, काशब, रावल, रहकवाल 
यदु, मेव, छिकारा, तैतवाल, भैनिवाल, उन्हड़, भाटटी बनाफरे, जादो, बागड़ी, सिन्धु, कालड़ा, सारन, छुरियापेड, लखमेरिया, चराड, जाखड़, सेरावत, देसवाल, पूडिया 
प्रमुख रोहिला क्षत्रिय शासक
अंगार सैन - गांधार (वैदिक काल)
अश्वकरण - ईसा पूर्व 326 (मश्कावती दुर्ग)
अजयराव - स्यालकोट (सौकंल दुर्ग) ईसा पूर्व 326
प्रचेता - मलेच्छ संहारक 
शाशिगुप्त - साइरस के समकालीन 
सुभाग सैन - मौर्य साम्राज्य के समकालीन 
राजाराम शाह - 929 वि. रामपुर रोहिलखण्ड 
बीजराज - रोहिलखण्ड
करण चन्द्र - रोहिलखण्ड
विग्रह राज - रोहिलखण्ड - गंगापार कर स्रुघ्न जनपद (सुगनापुर) यमुना तक विस्तार दसवीं शताब्दी में सरसावा में किले का निर्माण पश्चिमी सीमा पर, यमुना द्वारा ध्वस्त टीले के रूप में नकुड़ रोड पर देखा जा सकता है।
सावन्त सिंह - रोहिलखण्ड
जगमाल - रोहिलखण्ड
धिंगतराव - रोहिलखण्ड
गोंकुल सिंह - रोहिलखण्ड
महासहाय - रोहिलखण्ड
त्रिलोक चन्द - रोहिलखण्ड
रणवीर सिंह - रोहिलखण्ड
सुन्दर पाल - रोहिलखण्ड
नौरंग देव - रोहिलखण्ड
सूरत सिंह - रोहिलखण्ड
हंसकरण रहकवाल - पृथ्वीराज के सेनापति 
मिथुन देव रायकवार - ईसम सिंह पुण्डीर के मित्र थाना भवन शासक 
सहकरण, विजयराव - उपरोक्त 
राजा हतरा - हिसार 
जगत राय - बरेली 
मुकंदराज - बरेली 1567 ई.
बुधपाल - बदायुं 
महीचंद राठौर - बदायुं
बांसदेव - बरेली 
बरलदेव - बरेली
राजसिंह - बरेली
परमादित्य - बरेली
न्यादरचन्द - बरेली
राजा सहारन - थानेश्वर 
प्रताप राव खींची (चौहान वंश) - गागरोन 
राणा लक्ष्य सिंह - सीकरी 
रोहिला मालदेव - गुजरात 
जबर सिंह - सोनीपत 
रामदयाल महेचराना - कलायत
गंगसहाय - महेचराना *कलायत* 1761 ई.
राणा प्रताप सिंह - कौराली (गंगोह) 1095 ई.
नानक चन्द - अल्मोड़ा 
राजा पूरणचन्द - बुंदेलखंड 
राजा हंस ध्वज - हिसार व राजा हरचंद 
राजा बसंतपाल - रोहिलखण्ड व्रतुसरदार, सामंत वृतपाल 1193 ई.
महान सिंह बडगूजर - बागपत 1184 ई.
राजा यशकरण - अंधली 
गुणाचन्द - जयकरण - चरखी - दादरी 
राजा मोहनपाल देव - करोली 
राजारूप सैन - रोपड़ 
राजा महपाल पंवार - जीन्द 
राजा परपदेड पुंडीर - लाहौर 
राजा लखीराव - स्यालकोट 
राजा जाजा जी तोमर - दिल्ली 
खड़ग सिंह - रोहिलखण्ड लौदी के समकालीन 
राजा हरि सिंह - खिज्रखां के दमन का शिकार हुआ - कुमायुं की पहाड़ियों में अज्ञातवास की शरण ली 
राजा इन्द्रगिरी (रोहिलखण्ड) (इन्द्रसेन) - सहारनपुर में प्राचीन रोहिला किला बनवाया । रोहिला क्षत्रिय वंश भास्कर लेखक आर. आर. राजपूत मुरसेन अलीगढ से प्रस्तुत 
राजा बुद्ध देव रोहिला - 1787 ई., सिंधिया व जयपुर के कछवाहो के खेड़ा व तुंगा के मैदान में हुए युद्ध का प्रमुख पात्र । (राय कुँवर देवेन्द्र सिंह जी राजभाट, तुंगा (राजस्थान)

रोहिल्ला उपाधि - शूरवीर, अदम्य - साहसी विशेष युद्ध कला में प्रवीण, उच्च कुलीन सेनानायको, और सामन्तों को उनके गुणों के अनुरूप क्षत्रिय वीरों को तदर्थ उपाधि से विभूषित किया जाता था - जैसे - रावत - महारावत, राणा, महाराणा, ठाकुर, नेगी, रावल, रहकवाल, रोहिल्ला, समरलछन्द, लखमीर,(एक लाख का नायक) आदि। इसी आधार पर उनके वंशज भी आजतक राजपूतों के सभी गोत्रों में पाए जाते हैं।
"वभूव रोहिल्लद्व्यड्कों वेद शास्त्रार्थ पारग: । द्विज: श्री हरि चन्द्राख्य प्रजापति समो गुरू : ।।2।।
( बाउक का जोधपुर लेख )
- सन 837 ई. चैत्र सुदि पंचमी - हिंदी अर्थ - "वेद शास्त्र में पारंगत रोहिल्लाद्धि उपाधिधारी एक हरिश्चन्द्र नाम का ब्राह्मण था" जो प्रजापति के समान था हुआ ।।6।।
( गुज्जर गौरव मासिक पत्रिका - अंक 10, वर्ष ।।माह जौलाई 1991 पृष्ठ - 13) (राजपुताने का इतिहास पृष्ठ - 147) (इतिहास रोहिला - राजपूत पृष्ठ - 23) (प्राचीन भारत का इतिहास, राजपूत वंश, - कैलाश - प्रकाशन लखनऊ सन 1970 ई. पृष्ठ - 104 -105 - )
रोहिल्लद्व्यड्क रोहिल्लद्धि - अंक वाला या उपाधि वाला ।
सर्वप्रथम प्रतिहार शासक द्विज हरिश्चन्द्र को रोहिल्लद्धि उपाधि प्राप्त हुई । बाउक,प्रतिहार शासक विप्र हरिश्चन्द्र के पुत्र कवक और श्रीमति पदमनी का पुत्र था वह बड़ा पराक्रमी और नरसिंह वीर था।
प्रतिहार एक पद है, किसी विशेष वर्ण का सूचक नही है। विप्र हरिश्चन्द्र प्रतिहार अपने बाहुबल से मांडौर दुर्ग की रक्षा करने वाला था, अदम्य साहस व अन्य किसी विशेष रोहिला शासक के प्रभावनुरूप ही रोहिल्लद्व्यड्क उपाधि को किसी आधार के बिना कोई भी व्यक्ति अपने नाम के साथ सम्बन्ध करने का वैधानिक रूप में अधिकारी नही हो सकता।
उपरोक्त से स्पष्ट है कि बहुत प्राचीन काल से ही गुणकर्म के आधार पर क्षत्रिय उपाधि "रोहिल्ला" प्रयुक्त । प्रदत्त करने की वैधानिक व्यवस्था थी। जिसे हिन्दुआसूर्य - महाराजा पृथ्वीराज चौहान ने भी यथावत रखा। पृथ्वीराज चौहान की सेना में एक सौ रोहिल्ला - राजपूत सेना नायक थे । "पृथ्वीराज रासौ" -
चहूँप्रान, राठवर, जाति पुण्डीर गुहिल्ला । बडगूजर पामार, कुरभ, जागरा, रोहिल्ला ।। इस कवित्त से स्पष्ट है । कि - प्राचीन - काल में रोहिला- क्षत्रियों का स्थान बहुत ऊँचा था। रोहिला रोहिल्ल आदि शब्द राजपुत्रों अथवा क्षत्रियों के ही द्योतक थे । इस कवित्त के प्रमाणिकता "आइने अकबरी", 'सुरजन चरिता' भी सिद्ध करते हैं । युद्ध में कमानी की तरह (रोह चढ़ाई करके) शत्रु सेना को छिन्न - भिन्न करने वाले को रहकवाल, रावल, रोहिल्ला, महाभट्ट कहा गया है।
महाराज पृथ्वीराज चौहान की सेना में पांच गोत्रों के रावल थे -
रावल - रोहिला 
रावल - सिन्धु 
रावल - घिलौत (गहलौत)
रावल - काशव या कश्यप 
रावल - बलदया बल्द
मुग़ल बादशाह अकबर ने भी बहादुरी की रोहिल्ला उपाधि को यथावत बनाए रखा जब अकबर की सेना दूसरे राज्यों को जीत कर आती थी तो अकबर अपनी सेना के सरदारों को,बहादुर जवानों बहादुरी के पदक (ख़िताब,उपाधि) देता था। एक बार जब महाराणा मान सिंह काबुल जीतकर वापिस आए तो अकबर ने उसके बाइस राजपूत सरदारों को यह ख़िताब दी (उपाधि से सम्मानित किया)
बाई तेरा हर निरकाला रावत को - रावल जी 
चौमकिंग सरनाथा को - रावल 
झंड्कारा कांड्कड को - रोहिल्ला 
रावत मन्चारा - कांड्कड काम करन, निरकादास रावत को रावराज और रूहेलाल को रोहिला 
स्वतंत्र रोहिलखंड राज्य संस्थापक महाराजा RANVEER SINGH ROHILA 
रक्षा बंधन के दिन रोहिलखंड की वीर भूमि गंगा सी पवित्र राजपूतों के रक्त से रंजित और आक्रांताओं के काल की धरती रामपुर के किले में दिया था कठेहर रोहिलखंड नरेश,महाराजा रणवीर सिंह रोहिला ने अदम्य साहस और अद्भुत शौर्य का परिचय!,दिल्ली सुलतान नासीरुद्दीन बहराम उर्फ चंगेज की चालीस हजार की सेना को दी थी शिकस्त!**तथा घुटने टेकने पर मजबूर किया था दिल्ली सल्तनत का दुर्दांत खूंखवार सेनापति नसीरुद्दीन महमूद को और प्राणदान मांगने पर क्षात्र धर्म रक्षार्थ छोड़ा था।**चंगेज ने अवसर पाकर रक्षा बंधन के दिन दरबारी गोकुल चंद पांडे हरिद्वार को लालच देकर किले के द्वार खुलवा लिए *धोखे के शिकार लगभग तीन हजार राजपूत निहत्थे ही लड़े,!आक्रमण कारियो के अस्त्र शस्त्र छीन छीन किया था शौर्य संग्राम दिल्ली सल्तनत की लगभग आधी गुलाम वंशी सेना को काट डाला था रोहिला राजपूतो ने!!अंत में चंगेज के खूंखवार दरिंदो ने अकेले में घेर लिया था RANVEER SINGH ROHILA को, जिन्हे आमने सामने की लड़ाई में दिल्ली सुलतान कभी नही हरा पाए थे किंतु वे उनके साहस से विस्मित हुए बिना नहीं रह सके ।रणवीर रणभूमि के वीर सपूत रक्त की अंतिम बूंद रहने तक संग्राम रत रहे और कतरा कतरा हो कर खेत रहे(सन 1254ईस्वी),उनका बलिदान रोहिलखंड के राजपूताना इतिहास में स्वर्णाक्षर दे गया!,समस्त राजपूत समाज रक्षा बंधन के दिन हुए इस बलिदान को एक शोर्य दिवस के रूप में मनाता आया है,यूट्यूब पर और अन्य सोसल मीडिया पर स्वतंत्र रोहिलखंड संस्थापक नरेश महाराजा RANVEER SINGH ROHILA की वीर गाथा दी हुई है,सभी क्षत्रिय जन अपने बच्चो को दिखाए ताकि सल्तनत काल में १२५४ ईसवी के इस इतिहास के धुंधले पृष्ठ भी उकेरे जा सके*, रक्षा बंधन को उनका बलिदान दिवस मनाया जाता है,समस्त क्षत्रिय समाज इस SHOURYA दिवस पर उन्हे कोटि कोटि नमन करते हुए उनके। बताए मार्ग पर स्वाधीनता और स्वाभिमान से स्वधर्म रक्षार्थ जीने की शपथ लेता है,यह सच्चाई हमसे स्कूली शिक्षा में छुपाई गई किंतु इतिहास के दर्पण में सब सुरक्षित रहता है जिसे उजागर कर भावी पीढ़ी को बताना ही हरेक क्षत्रिय का नैतिक दायित्व है अतः आप सभी क्षत्रियों से निवेदन है कि भावी पीढ़ी को सच्चाई बताए और स्वाभिमान से जीना दिखाए।।
सूर्य वंशी निकुंभ क्षत्रिय महाराजा RANVEER SINGH ROHILA का जन्म हिंदूवा सूर्य महाराज पृथ्वी राज चौहान के पतन के बाद दिल्ली सल्तनत के बढ़ते कदमों के बीच ऐसे समय में सन१२०४ईस्वी में कठेहर रोहिलखंड की राजधानी रामपुर के किले में राजा त्रिलोक सिंह के यहां हुआ था, जब सभी राजपूत शक्तियां क्षीण और तितर बितर हो चुकी थी,इस्लामिक आक्रांता मध्य भारत की ओर दमन करते हुए आगे बढ़ते रहते थे।।,रणवीर सिंह रोहिला का विवाह विजय पुर सीकरी की राजकुमारी तारा देवी से हुआ तथा पच्चीस वर्ष की आयु में रामपुर की गद्दी पर विराजमान होकर इस्लामीकरण पर रोक लगाई ।। तीस सालों तक दिल्ली सुलतानो को धूल चटाई किंतु रक्षा बंधन के दिन शिव मंदिर गए राजपूतों को रक्षा सूत्र बंधवाते हुए नसीरुद्दीन बहराम ने गोकुल चंद पांडे के द्वारा किले के द्वार खोलने पर घेर लिया और फिर होगया ADBHUT SHOURYA SANGRAM .. विस्तार भय से संक्षिप्त गाथा वर्णित है जिसे चाटुकार मुगल कालीन और ब्रिटिश इतिहास कारो ने छिपाया*
रोहिलखंड एक राजपूताना राज्य
कन्नौज पतन के बाद रोहिलखण्ड राज्य की स्थापना कठेहरिया राजा राम शाह उर्फ रामसिंह ने की थी अहिक्षेत्र काम्पिल्य के एक गॉंव रामनगर को रामपुर नगर बसाया ओर यह क्षत्रिय राजा राम के नाम पर रखा गया था यहाँ रोहिले राजपूतो ने 11 पीढ़ी लगातार शासन किया राजा रणवीर सिंह रोहिला ने नाइरुद्दीन महमूद,, ओर हरिसिंह रोहिला ने खिज्रखान को धूल चटाई नोरंगदेव ने पिंगू(तैमूर लंग)को हराया ।।।san ईस्वी के बाद भी कभी भी पूर्णतया रोहिलखंड को दिल्ली दरबार नही जीत पाया अकबर ओर बाद में औरंगजेब ने चाल चली और अफगानों की घुसपैठ करनी आबादी बढ़ानी शुरू की सन 1707ईस्वी में दाऊद खान बरेच अफगान के जाट दत्तक पुत्र जिसका नाम अलीमुहम्मद रखा था ने धोखे से बरेली में रोहिला राजा हरननंद का कत्ल किया और सम्पूर्ण रोहिलखण्ड पर अधिकार कर लिया इन अफगानों ने भी रोहिलखण्ड के नवाब बन जाने के कारणों से स्वयम को रुहेला सरदार कहा वास्तव में ये रोहिला नही थे जैसे कि रोह देश के अफगान लिखा यह गलत है ।।जिस काल में अफगान आए तब अफगानिस्तान को रोह देश नही कहा जाता था ।।
 यह झूठा मुस्लिम तुष्टि करण का इतिहास है ।।16वी सदी में जगत सिंह कठेहरिया रोहिल्ला राजपूत के पुत्रों बाँसदेव व बर्लदेव के नाम पर बरेली नगर की नीव रखी गयी अफगानों ने कोई नगर नही बसाया उन्होंने अपने काल मे ही रामपुर का नाम राम के नाम पर नही रखा। यह भ्रामक झूठ है कि फैज उल्ला खान ने रामपुर को बसाया था अठारहवीं सदी में जबकि रामपुर रियासत की स्थापना दसवीं सदी में राजा रामसिंह रोहिला(काठी कोम के राजपूत) ने की थी

*रोहिला क्षत्रिय योद्धाओं का शौर्य साहस, युद्ध कौशल, और अपने कुल व राष्ट्र की रक्षा के प्रति बलिदान की भावना में निहित होता था।* *हमारे क्षत्रिय योद्धा युद्ध भूमि में मृत्यु से* *निर्भय होकर लड़ते थे और उनका* *एकमात्र कर्तव्य राज्य व समाज की रक्षा करना था। शौर्य उनके रक्त में समाया हुआ था, जो युद्ध की ज्वाला में अपने बलिदान के रूप में प्रदर्शित होता था।*
*#क्षत्रिय*
*जय राजपूताना अखंड राजपूताना*
*जय राजपूताना,जय राजपूताना रोहिलखंड ,बुंदेलखंड*
संदर्भ 
इतिहास रोहिला राजपूत
 डॉक्टर के सी सैन
रोहिला क्षत्रिय वंश भास्कर
आर आर राजपूत
कठेहरिया रोहिला राजपूत
रोहिला क्षत्रियों का क्रमबद्ध इतिहास
दर्शन लाल रोहिला
मध्य कालीन भारत का इतिहास
ठाकुर अजीत सिंह परिहार
बालाघाट मध्य प्रदेश
 भारत भूमि और उसके वासी पृष्ठ-230 पंडित जयचंद्र विद्यालंकार
2-दून ज्योति-साप्ताहिक देहरादून 18 फरवरी 1974 
पुरुषोत्तम नागेश ओक व डॉक्टर ओमवीर शर्मा हेड ऑफ हिस्ट्री विभाग
3-क्षत्रिय वर्तमान पृष्ठ 97 व 263 ठाकुर अजित सिंह परिहार बालाघाट
4- प्राचीन भारत पृष्ठ -118,159,162 बीएम रस्तोगी इतिहास कार
5 राजतरँगनी पृष्ठ 31-39 कल्हण कृत अनुवादक नीलम अग्रवाल
6-रोहिला क्षत्रिय वन्स भास्कर ,आर आर राजपूत मूरसेन अलीगढ़
7- इतिहास रोहिला राजपूत 
डॉक्टर के सी सेन
8 - भारत का इतिहास पृष्ठ 138 डॉक्टर दया प्रकाश
9-भारतीय इतिहास मीमांसा पृष्ठ 44 जय

FACTS OF ROHILA RAJPUT CLAN

गौरवशाली इतिहास के कुछ स्वर्णाक्षर (रोहिला क्षत्रिय)
भारत वर्ष का क्षेत्रफल 42 ,02 ,500 वर्ग किमी था ।
रोहिला साम्राज्य 25 ,000 वर्ग किमी 10 ,000 वर्गमील में फैला हुआ था ।
रोहिला, राजपूतो की एक खाप, परिवार या परिजन- समूह है जो कठेहर - रोहिलखण्ड के शासक एंव संस्थापक थे |मध्यकालीन भारत में बहुत से राजपूत लडाको को रोहिला की उपाधि से विभूषित किया गया. उनके वंशज आज भी रोहिला परिवारों में पाए जाते हैं ।
रोहिले- राजपूत प्राचीन काल से ही सीमा- प्रांत, मध्य देश (गंगा-yamuna का दोआब),रोहिलखंड पंजाब, काश्मीर, गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश में शासन करते रहे हैं । जबकि मुस्लिम-रोहिला साम्राज्य अठारहवी शताब्दी में इस्लामिक दबाव के पश्चात् स्थापित हुआ. । अफगानों ने इसे उर्दू में "रूहेलखण्ड" कहा ।
1702 से 1720 ई तक रोहिलखण्ड में रोहिले राजपूतो का ही शासन था. जिसकी राजधानी बरेली थी ।
रोहिलखंड एक राजपूताना साम्राज्य है। रोहिलखंड एक शुद्ध हिंदी,संस्कृत और प्राकृत भाषा का शब्द है,अरेबिक या उर्दू शब्द नही है।
रोहिले राजपूतो के महान शासक "राजा इन्द्रगिरी" ने रोहिलखण्ड की पश्चिमी सीमा पर रोहिलखंड विस्तार के समय सहारनपुर में एक किला बनवाया,जिसे "प्राचीन रोहिला किला" कहा जाता है । सन 1801 ई में रोहिलखण्ड को अंग्रेजो ने अपने अधिकार में ले लिया था. हिन्दू रोहिले-राजपुत्रो द्वारा बनवाए गये इस प्राचीन रोहिला किला को सन 1806 ईस्वी से सन1858 ईस्वी के मध्य कारागार में परिवर्तित कर दिया गया था । इसी प्राचीन- रोहिला- किला में आज सहारनपुर की जिला- कारागार है । उसके सामने महाराजा रणवीर सिंह रोहिला चौक स्थित है।
"सहारन" राजपूतो का एक गोत्र है जो रोहिले राजपूतो में पाया जाता है. यह सूर्य वंश की एक प्रशाखा है जो राजा भरत के वंशधरो से प्रचालित हुई थी ।
फिरोज़ तुगलक के आक्रमण के समय "थानेसर" (वर्तमान में हरियाणा में स्थित) का राजा "सहारन" ही था ।
दिल्ली में गुलाम वंश के समय रोहिलखण्ड की राजधानी "रामपुर" में RANVEER SINGH ROHILA/KATHEHARIYA/ (काठी कोम, निकुम्भ वंश, सूर्यवंश रावी नदी के निकट से विस्थापित कठ गणों के वंशधर) का शासन था । इसी रोहिले राजा ने दिल्ली के सेनापति नसीरुद्दीन चंगेज को हराया था. 'खंड' kshtriyo से सम्बंधित है, जैसे भरतखंड, BUNDELKHAND, VIDHEYLKHAND , रोहिलखंड, KUMAYUNKHHAND, उत्तराखंड आदि ।
प्राचीन भारत की केवल दो भाषाएँ संस्कृत व प्राकृत (सरलीकृत संस्कृत) थी । रोहिल प्राकृत और खंड संस्कृत के शब्द हैं जो क्षत्रिय राजाओं के प्रमाण हैं । इस्लामिक नाम है दोलताबाद, कुतुबाबाद, मुरादाबाद, जलालाबाद, हैदराबाद, मुबारकबाद, फैजाबाद, आदि ।
रोहिले राजपूतो की उपस्तिथि के प्रमाण हैं । योधेय गणराज्य के सिक्के, गुजरात का (1445 वि ) ' का शिलालेख (रोहिला मालदेव के सम्बन्ध में), उत्तर प्रदेश में स्थित रोहिलखंड रामपुर में राजा रणवीर सिंह के किले के खंडहर, रानी तारादेवी सती का मंदिर , पीलीभीत में राठौर रोहिलो (महिचा- प्रशाखा) की सतियों के मंदिर, कपिल मुनि स्थान पर कलायथ कैथल(हरियाणा)में वीर GANGA SINGH महेचा राठौड़ रोहिला राजपूत PANIPAT के तीसरे युद्ध KE YODHA की समाधि और उनकी रानी सती माता रामप्यारी का मंदिर जिसे क्षेत्र के सभी राजपूत मिलकर पूजते है। सहारनपुर का प्राचीन रोहिला किलाऔर उसके सामने स्थित क्षत्रिय सम्राट MAHA RAJA RANVEER SINGH ROHILA चौक, मंडोर का शिलालेख, " बड़ौत में स्तिथ " RAJA RANVEER SINGH ROHILA MARG"
*दिल्ली के रोहिणी में स्थित है महाराजा रणवीर सिंह रोहिला पार्क,बम्बई में स्थित हैं श्री हर प्रसाद रूहेला मार्ग*
          नगरे नगरे ग्रामै ग्रामै विलसन्तु संस्कृतवाणी ।
          सदने - सदने जन - जन बदने , जयतु चिरं कल्याणी ।।
          जोधपुर का शिलालेख, प्रतिहार शासक HARISH CHANDRA को मिली रोहिल्लाद्व्यंक की उपाधि, कई अन्य
          राजपूतो के वंशो को प्राप्त उपाधियाँ, 'पृथ्वीराज रासो', आल्हाखण्ड - काव्य सभी राजपूत वंशो में पाए
          जाने वाले प्रमुख गोत्र ।
          अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा भारत द्वारा प्रकाशित पावन ग्रन्थ क्षत्रिय वंशाणर्व (रोहिले क्षत्रियों का
          राज्य रोहिलखण्ड का पूर्व नाम पांचाल व मध्य देश, वर्तमान में अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा से
          अखिल भारतीय रोहिला.क्षत्रिय विकास परिषद रजिस्टर्ड को संबद्धता प्राप्त होना,। वर्तमान में भी रोहिलखण्ड (संस्कृत भाषा में)
          क्षेत्र का नाम यथावत बने रहना, अंग्रेजो द्वारा भी उत्तर रेलवे को "रोहिलखण्ड - रेलवे" का नाम देना जो
          बरेली से देहरादून तक सहारनपुर होते हुए जाती थी, वर्तमान में लाखो की संख्या में पाए जाने वाले
          रोहिला-राजपूत, रोहिले-राजपूतों के सम्पूर्ण भारत में फैले हुए कई अन्य संगठन अखिल भारतीय स्तर
          पर 'राजपूत रत्न' रोहिला शिरोमणि डा. कर्णवीर सिंह द्वारा संगठित एक अखिल भारतीय रोहिला
          क्षत्रिय विकास परिषद पंजीकृत (सम्बद्ध अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा) पंजीकरण संख्या - 545, आदि।
   12. पानीपत की तीसरी लड़ाई में रोहिले राजपूत- राजा गंगासहाय/गंगा सिंह राठौर (महेचा) के नेतृत्व में
          मराठों
          की ओर से अफगान आक्रान्ता अहमदशाह अब्दाली व रोहिला पठान नजीबदौला के विरुद्ध लड़े व
          वीरगति पाई । इस मराठा युद्ध में लगभग एक हजार चार सौ रोहिले राजपूत वीरगति को प्राप्त हुए ।
           (इतिहास -रोहिला-राजपूत)
   13. प्रथम स्वतंत्रता संग्राम 1857 में भी रोहिले राजपूतों ने अपना योगदान दिया, ग्वालियर के किले में रानी
          लक्ष्मीबाई को हजारों की संख्या में रोहिले राजपूत मिले, इस महायज्ञ में स्त्री पुरुष सभी ने अपने गहने
          धन आदि एकत्र कर झाँसी की रानी के साथ अंग्रेजो के विरुद्ध आवाज उठाने के लिए सम्राट बहादुरशाह-
          जफर तक पहुँचाए । अंग्रेजों ने ढूँढ-ढूँढ कर उन्हें काट डाला जिससे रोहिले राजपूतों ने अज्ञातवास की
          शरण ली।
   14. राजपूतों की हार के प्रमुख कारण थे हाथियों का प्रयोग, सामंत प्रणाली व आपसी मतभेद, ऊँचे व
          भागीदार कुल का भेदभाव (छोटे व बड़े की भावना) आदि।
   15. सम्वत 825 में बप्पा रावल चित्तौड़ से विधर्मियों को खदेड़ता हुआ ईरान तक गया। बप्पा रावल से समर
          सिंह तक 400 वर्ष होते हैं, गह्लौतों का ही शासन रहा। इनकी 24 शाखाएँ हैं। जिनके 16 गोत्र (बप्पा
          रावल के वंशधर) रोहिले राजपूतों में पाए जाते हैं।
   16. चितौड़ के राणा समर सिंह (1193 ई.) की रानी पटना की राजकुमारी थी इसने 9 राजा, 1 रावत और कुछ
          रोहिले साथ लेकर मौ. गोरी के गुलाम कुतुबद्दीन का आक्रमण रोका और उसे ऐसी पराजय दी कि कभी
          उसने चितौड़ की ओर नही देखा।
   17. रोहिला शब्द क्षेत्रजनित, गुणजनित व 'मूल पुरुष' नाम-जनित है। यह गोत्र जाटों में भी रूहेला, रोहेला,
          रूलिया, रूहेल , रूहिल, रूहिलान नामों से पाया जाता है।
   18. रूहेला गोत्र जाटों में राजस्थान व उ. प्र. में पाया जाता है। रोहेला गोत्र के जाट जयपुर में बजरंग बिहार
          ओर ईनकम टैक्स कालोनी टौंक रोड में विद्यमान है। झुनझुन, सीकर, चुरू, अलवर, बाडमेर में भी 
          रोहिला गोत्र के जाट विद्यमान हैं । उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले में रोहेला गोत्र के जाटों के बारह 
          गाँव हैं। महाराष्ट्र में रूहिलान गोत्र के जाट वर्धा में केसर व खेड़ा गाँव में विद्यमान हैं।,रोहतक और भिवानी में रोहिल, रूहिल उपनाम के जाट विद्यमान है।
   19. मुगल सम्राट अकबर ने भी राजपूत राजाओं को विजय प्राप्त करने के पश्चात् रोहिला-उपाधि से
          विभूषित किया था, जैसे राव, रावत, महारावल, राणा, महाराणा, रोहिल्ला, रहकवाल आदि।
   20. "रोहिला-राजपूत" समाज , क्षत्रियों का वह परिवार है जो सरल ह्रदयी, परिश्रमी,राष्ट्रप्रेमी,स्वधर्मपरायण,
          स्वाभिमानी व वर्तमान में अधिकांश अज्ञातवास के कारण साधनविहीन है। 40 प्रतिशत कृषि कार्य से,30
          प्रतिशत श्रम के सहारे व 30 प्रतिशत व्यापार व लघु उद्योगों के सहारे जीवन यापन कर रहे हैं। इनके 
          पूर्वजो ने हजारों वर्षों तक अपनी आन, मान, मर्यादा की रक्षा के लिए बलिदान दिए हैं और अनेको 
          आक्रान्ताओं को रोके रखने में अपना सर्वस्व मिटाया है । गणराज्य व लोकतंत्रात्मक व्यवस्था को
          सजीव बनाये रखने की भावना के कारण वंश परंपरा के विरुद्ध रहे, करद राज्यों में भी स्वतंत्रता बनाये
          रखी । कठेहर रोहिलखण्ड की स्थापना से लेकर सल्तनत काल की उथल पुथल, मार काट , दमन चक्र
          तक लगभग आठ सौ वर्ष के शासन काल के पश्चात् 1857 के ग़दर के समय तक रोहिले राजपूतों ने
          राष्ट्रहित में बलिदान दिये हैं। 
 क्रूर काल के झंझावालों से संघर्ष करते हुए क्षत्रियों का यह 'रोहिला परिवार' बिखर BIKHAR गया।
           , इस समाज की पहचान के लिए भी आज स्पष्टीकरण देना पड़ता है। कैसा दुर्भाग्य है? यह
          क्षत्रिय वर्ग का। जो अपनी पहचान को भी टटोलना पड़ रहा है। परन्तु समय के चक्र में सब कुछ सुरक्षित
          है। इतिहास के दर्पण में थिरकते चित्र, बोलते हैं, अतीत झाँकता है, सच सोचता है कि उसके होने के
          प्रमाण धुंधले-धुंधले से क्यों हैं? हे- क्षत्रिय तुम धन्य हो, पहचानो अपने प्रतिबिम्बों को' -
          "क्षत्रिय एकता का बिगुल फूँक 
           सब धुंधला धुंधला छंटने दो।
           हो अखंड भारत के राजपुत्र 
           खण्ड खण्ड में न सबको बंटने दो ।।"
    21. रोहिलखण्ड से विस्थापित इन रोहिला परिवारों में राजपूत परम्परा के कुछ प्रमुख गोत्र इस प्रकार पाए
           जाते हैं :-
रोहिला, रोहित, रोहिल, रावल, द्रोहिया, रल्हन, रूहिलान, रौतेला , रावत 
यौधेय, योतिक, जोहिया, झोझे, पेशावरी 
पुण्डीर, (पुलस्त्य)पांडला(धौम्य), पंढेर, पुन्ड़ेहार, पुंढीर, पुंडाया  
चौहान, जैवर, जौडा, चाहल, चावड़ा, खींची, गोगद, गदाइया, सनावर, क्लानियां, चिंगारा, चाहड बालसमंद, चोहेल, चेहलान, बालदा, बछ्स (वत्स), बछेर, चयद, झझोड, चौपट, खुम्ब, जांघरा, जंगारा, झांझड चुहल चूहेल 
निकुम्भ, कठेहरिया, कठौरा, कठैत, कलुठान, कठपाल, कठेडिया, कठड, काठी, कठ, पालवार 
RATHOD महेचा, महेचराना धांधल, रतनौता, बंसूठ जोली, जोलिए, बांकटे, बाटूदा, थाथी, कपोलिया, खोखर, अखनौरिया ,लोहमढ़े, मसानिया 
BUNDELA, उमट, ऊमटवाल 
, भारती, गनान 
नाभावंशी,बटेरिया, बटवाल, बरमटिया 
परमार, जावडा, लखमरा, मूसला, मौसिल, भौंसले, बसूक, जंदडा, पछाड़, पंवारखा, ढेड, मौन 
तोमर, तंवर, मुदगल, देहलीवाल, किशनलाल, सानयाल, सैन, सनाढय कालरा
GEHLOT, कूपट, पछाड़, थापा, ग्रेवाल, कंकोटक, गोद्देय, पापडा, नथैड़ा, नैपाली, लाठिवाल, पानिशप, पिसोण्ड, चिरडवाल, नवल, चरखवाल, साम्भा, पातलेय, पातलीय, छन्द (चंड), क्षुद्रक,(छिन्ड, इन्छड़, नौछड़क), रज्जडवाल, बोहरा, जसावत, गौर, मलक, मलिक , मूसला 
कछवाहा, कुशवाहा, कोकच्छ, ततवाल, बलद, कोकचे काक मछेर 
सिसौदिया, भरोलिया, बरनवाल, बरनपाल, बहारा 
 खुमाहड, अवन्ट, ऊँटवाल
सिकरवार, रहकवाल, रायकवार, ममड, गोदे 
सोलंकी, गिलानिया, भुन, बुन, बघेला, ऊन, (उनयारिया)
बडगूजर, सिकरवार, ममड़ा, पुडिया 
कश्यप, काशब, रावल, रहकवाल 
यदु, मेव, छिकारा, तैतवाल, भैनिवाल, उन्हड़, भाटटी बनाफरे, जादो, बागड़ी, सिन्धु, कालड़ा, सारन, छुरियापेड, लखमेरिया, चराड, जाखड़, सेरावत, देसवाल, पूडिया 
प्रमुख रोहिला क्षत्रिय शासक
अंगार सैन - गांधार (वैदिक काल)
अश्वकरण - ईसा पूर्व 326 (मश्कावती दुर्ग)
अजयराव - स्यालकोट (सौकंल दुर्ग) ईसा पूर्व 326
प्रचेता - मलेच्छ संहारक 
शाशिगुप्त - साइरस के समकालीन 
सुभाग सैन - मौर्य साम्राज्य के समकालीन 
राजाराम शाह - 929 वि. रामपुर रोहिलखण्ड 
बीजराज - रोहिलखण्ड
करण चन्द्र - रोहिलखण्ड
विग्रह राज - रोहिलखण्ड - गंगापार कर स्रुघ्न जनपद (सुगनापुर) यमुना तक विस्तार दसवीं शताब्दी में सरसावा में किले का निर्माण पश्चिमी सीमा पर, यमुना द्वारा ध्वस्त टीले के रूप में नकुड़ रोड पर देखा जा सकता है।
सावन्त सिंह - रोहिलखण्ड
जगमाल - रोहिलखण्ड
धिंगतराव - रोहिलखण्ड
गोंकुल सिंह - रोहिलखण्ड
महासहाय - रोहिलखण्ड
त्रिलोक चन्द - रोहिलखण्ड
रणवीर सिंह - रोहिलखण्ड
सुन्दर पाल - रोहिलखण्ड
नौरंग देव - रोहिलखण्ड
सूरत सिंह - रोहिलखण्ड
हंसकरण रहकवाल - पृथ्वीराज के सेनापति 
मिथुन देव रायकवार - ईसम सिंह पुण्डीर के मित्र थाना भवन शासक 
सहकरण, विजयराव - उपरोक्त 
राजा हतरा - हिसार 
जगत राय - बरेली 
मुकंदराज - बरेली 1567 ई.
बुधपाल - बदायुं 
महीचंद राठौर - बदायुं
बांसदेव - बरेली 
बरलदेव - बरेली
राजसिंह - बरेली
परमादित्य - बरेली
न्यादरचन्द - बरेली
राजा सहारन - थानेश्वर 
प्रताप राव खींची (चौहान वंश) - गागरोन 
राणा लक्ष्य सिंह - सीकरी 
रोहिला मालदेव - गुजरात 
जबर सिंह - सोनीपत 
रामदयाल महेचराना - कलायत
गंगसहाय - महेचराना *कलायत* 1761 ई.
राणा प्रताप सिंह - कौराली (गंगोह) 1095 ई.
नानक चन्द - अल्मोड़ा 
राजा पूरणचन्द - बुंदेलखंड 
राजा हंस ध्वज - हिसार व राजा हरचंद 
राजा बसंतपाल - रोहिलखण्ड व्रतुसरदार, सामंत वृतपाल 1193 ई.
महान सिंह बडगूजर - बागपत 1184 ई.
राजा यशकरण - अंधली 
गुणाचन्द - जयकरण - चरखी - दादरी 
राजा मोहनपाल देव - करोली 
राजारूप सैन - रोपड़ 
राजा महपाल पंवार - जीन्द 
राजा परपदेड पुंडीर - लाहौर 
राजा लखीराव - स्यालकोट 
राजा जाजा जी तोमर - दिल्ली 
खड़ग सिंह - रोहिलखण्ड लौदी के समकालीन 
राजा हरि सिंह - खिज्रखां के दमन का शिकार हुआ - कुमायुं की पहाड़ियों में अज्ञातवास की शरण ली 
राजा इन्द्रगिरी (रोहिलखण्ड) (इन्द्रसेन) - सहारनपुर में प्राचीन रोहिला किला बनवाया । रोहिला क्षत्रिय वंश भास्कर लेखक आर. आर. राजपूत मुरसेन अलीगढ से प्रस्तुत 
राजा बुद्ध देव रोहिला - 1787 ई., सिंधिया व जयपुर के कछवाहो के खेड़ा व तुंगा के मैदान में हुए युद्ध का प्रमुख पात्र । (राय कुँवर देवेन्द्र सिंह जी राजभाट, तुंगा (राजस्थान)

रोहिल्ला उपाधि - शूरवीर, अदम्य - साहसी विशेष युद्ध कला में प्रवीण, उच्च कुलीन सेनानायको, और सामन्तों को उनके गुणों के अनुरूप क्षत्रिय वीरों को तदर्थ उपाधि से विभूषित किया जाता था - जैसे - रावत - महारावत, राणा, महाराणा, ठाकुर, नेगी, रावल, रहकवाल, रोहिल्ला, समरलछन्द, लखमीर,(एक लाख का नायक) आदि। इसी आधार पर उनके वंशज भी आजतक राजपूतों के सभी गोत्रों में पाए जाते हैं।
"वभूव रोहिल्लद्व्यड्कों वेद शास्त्रार्थ पारग: । द्विज: श्री हरि चन्द्राख्य प्रजापति समो गुरू : ।।2।।
( बाउक का जोधपुर लेख )
- सन 837 ई. चैत्र सुदि पंचमी - हिंदी अर्थ - "वेद शास्त्र में पारंगत रोहिल्लाद्धि उपाधिधारी एक हरिश्चन्द्र नाम का ब्राह्मण था" जो प्रजापति के समान था हुआ ।।6।।
( गुज्जर गौरव मासिक पत्रिका - अंक 10, वर्ष ।।माह जौलाई 1991 पृष्ठ - 13) (राजपुताने का इतिहास पृष्ठ - 147) (इतिहास रोहिला - राजपूत पृष्ठ - 23) (प्राचीन भारत का इतिहास, राजपूत वंश, - कैलाश - प्रकाशन लखनऊ सन 1970 ई. पृष्ठ - 104 -105 - )
रोहिल्लद्व्यड्क रोहिल्लद्धि - अंक वाला या उपाधि वाला ।
सर्वप्रथम प्रतिहार शासक द्विज हरिश्चन्द्र को रोहिल्लद्धि उपाधि प्राप्त हुई । बाउक,प्रतिहार शासक विप्र हरिश्चन्द्र के पुत्र कवक और श्रीमति पदमनी का पुत्र था वह बड़ा पराक्रमी और नरसिंह वीर था।
प्रतिहार एक पद है, किसी विशेष वर्ण का सूचक नही है। विप्र हरिश्चन्द्र प्रतिहार अपने बाहुबल से मांडौर दुर्ग की रक्षा करने वाला था, अदम्य साहस व अन्य किसी विशेष रोहिला शासक के प्रभावनुरूप ही रोहिल्लद्व्यड्क उपाधि को किसी आधार के बिना कोई भी व्यक्ति अपने नाम के साथ सम्बन्ध करने का वैधानिक रूप में अधिकारी नही हो सकता।
उपरोक्त से स्पष्ट है कि बहुत प्राचीन काल से ही गुणकर्म के आधार पर क्षत्रिय उपाधि "रोहिल्ला" प्रयुक्त । प्रदत्त करने की वैधानिक व्यवस्था थी। जिसे हिन्दुआसूर्य - महाराजा पृथ्वीराज चौहान ने भी यथावत रखा। पृथ्वीराज चौहान की सेना में एक सौ रोहिल्ला - राजपूत सेना नायक थे । "पृथ्वीराज रासौ" -
चहूँप्रान, राठवर, जाति पुण्डीर गुहिल्ला । बडगूजर पामार, कुरभ, जागरा, रोहिल्ला ।। इस कवित्त से स्पष्ट है । कि - प्राचीन - काल में रोहिला- क्षत्रियों का स्थान बहुत ऊँचा था। रोहिला रोहिल्ल आदि शब्द राजपुत्रों अथवा क्षत्रियों के ही द्योतक थे । इस कवित्त के प्रमाणिकता "आइने अकबरी", 'सुरजन चरिता' भी सिद्ध करते हैं । युद्ध में कमानी की तरह (रोह चढ़ाई करके) शत्रु सेना को छिन्न - भिन्न करने वाले को रहकवाल, रावल, रोहिल्ला, महाभट्ट कहा गया है।
महाराज पृथ्वीराज चौहान की सेना में पांच गोत्रों के रावल थे -
रावल - रोहिला 
रावल - सिन्धु 
रावल - घिलौत (गहलौत)
रावल - काशव या कश्यप 
रावल - बलदया बल्द
मुग़ल बादशाह अकबर ने भी बहादुरी की रोहिल्ला उपाधि को यथावत बनाए रखा जब अकबर की सेना दूसरे राज्यों को जीत कर आती थी तो अकबर अपनी सेना के सरदारों को,बहादुर जवानों बहादुरी के पदक (ख़िताब,उपाधि) देता था। एक बार जब महाराणा मान सिंह काबुल जीतकर वापिस आए तो अकबर ने उसके बाइस राजपूत सरदारों को यह ख़िताब दी (उपाधि से सम्मानित किया)
बाई तेरा हर निरकाला रावत को - रावल जी 
चौमकिंग सरनाथा को - रावल 
झंड्कारा कांड्कड को - रोहिल्ला 
रावत मन्चारा - कांड्कड काम करन, निरकादास रावत को रावराज और रूहेलाल को रोहिला 
स्वतंत्र रोहिलखंड राज्य संस्थापक महाराजा RANVEER SINGH ROHILA 
रक्षा बंधन के दिन रोहिलखंड की वीर भूमि गंगा सी पवित्र राजपूतों के रक्त से रंजित और आक्रांताओं के काल की धरती रामपुर के किले में दिया था कठेहर रोहिलखंड नरेश,महाराजा रणवीर सिंह रोहिला ने अदम्य साहस और अद्भुत शौर्य का परिचय!,दिल्ली सुलतान नासीरुद्दीन बहराम उर्फ चंगेज की चालीस हजार की सेना को दी थी शिकस्त!**तथा घुटने टेकने पर मजबूर किया था दिल्ली सल्तनत का दुर्दांत खूंखवार सेनापति नसीरुद्दीन महमूद को और प्राणदान मांगने पर क्षात्र धर्म रक्षार्थ छोड़ा था।**चंगेज ने अवसर पाकर रक्षा बंधन के दिन दरबारी गोकुल चंद पांडे हरिद्वार को लालच देकर किले के द्वार खुलवा लिए *धोखे के शिकार लगभग तीन हजार राजपूत निहत्थे ही लड़े,!आक्रमण कारियो के अस्त्र शस्त्र छीन छीन किया था शौर्य संग्राम दिल्ली सल्तनत की लगभग आधी गुलाम वंशी सेना को काट डाला था रोहिला राजपूतो ने!!अंत में चंगेज के खूंखवार दरिंदो ने अकेले में घेर लिया था RANVEER SINGH ROHILA को, जिन्हे आमने सामने की लड़ाई में दिल्ली सुलतान कभी नही हरा पाए थे किंतु वे उनके साहस से विस्मित हुए बिना नहीं रह सके ।रणवीर रणभूमि के वीर सपूत रक्त की अंतिम बूंद रहने तक संग्राम रत रहे और कतरा कतरा हो कर खेत रहे(सन 1254ईस्वी),उनका बलिदान रोहिलखंड के राजपूताना इतिहास में स्वर्णाक्षर दे गया!,समस्त राजपूत समाज रक्षा बंधन के दिन हुए इस बलिदान को एक शोर्य दिवस के रूप में मनाता आया है,यूट्यूब पर और अन्य सोसल मीडिया पर स्वतंत्र रोहिलखंड संस्थापक नरेश महाराजा RANVEER SINGH ROHILA की वीर गाथा दी हुई है,सभी क्षत्रिय जन अपने बच्चो को दिखाए ताकि सल्तनत काल में १२५४ ईसवी के इस इतिहास के धुंधले पृष्ठ भी उकेरे जा सके*, रक्षा बंधन को उनका बलिदान दिवस मनाया जाता है,समस्त क्षत्रिय समाज इस SHOURYA दिवस पर उन्हे कोटि कोटि नमन करते हुए उनके। बताए मार्ग पर स्वाधीनता और स्वाभिमान से स्वधर्म रक्षार्थ जीने की शपथ लेता है,यह सच्चाई हमसे स्कूली शिक्षा में छुपाई गई किंतु इतिहास के दर्पण में सब सुरक्षित रहता है जिसे उजागर कर भावी पीढ़ी को बताना ही हरेक क्षत्रिय का नैतिक दायित्व है अतः आप सभी क्षत्रियों से निवेदन है कि भावी पीढ़ी को सच्चाई बताए और स्वाभिमान से जीना दिखाए।।
सूर्य वंशी निकुंभ क्षत्रिय महाराजा RANVEER SINGH ROHILA का जन्म हिंदूवा सूर्य महाराज पृथ्वी राज चौहान के पतन के बाद दिल्ली सल्तनत के बढ़ते कदमों के बीच ऐसे समय में सन१२०४ईस्वी में कठेहर रोहिलखंड की राजधानी रामपुर के किले में राजा त्रिलोक सिंह के यहां हुआ था, जब सभी राजपूत शक्तियां क्षीण और तितर बितर हो चुकी थी,इस्लामिक आक्रांता मध्य भारत की ओर दमन करते हुए आगे बढ़ते रहते थे।।,रणवीर सिंह रोहिला का विवाह विजय पुर सीकरी की राजकुमारी तारा देवी से हुआ तथा पच्चीस वर्ष की आयु में रामपुर की गद्दी पर विराजमान होकर इस्लामीकरण पर रोक लगाई ।। तीस सालों तक दिल्ली सुलतानो को धूल चटाई किंतु रक्षा बंधन के दिन शिव मंदिर गए राजपूतों को रक्षा सूत्र बंधवाते हुए नसीरुद्दीन बहराम ने गोकुल चंद पांडे के द्वारा किले के द्वार खोलने पर घेर लिया और फिर होगया ADBHUT SHOURYA SANGRAM .. विस्तार भय से संक्षिप्त गाथा वर्णित है जिसे चाटुकार मुगल कालीन और ब्रिटिश इतिहास कारो ने छिपाया*
रोहिलखंड एक राजपूताना राज्य
कन्नौज पतन के बाद रोहिलखण्ड राज्य की स्थापना कठेहरिया राजा राम शाह उर्फ रामसिंह ने की थी अहिक्षेत्र काम्पिल्य के एक गॉंव रामनगर को रामपुर नगर बसाया ओर यह क्षत्रिय राजा राम के नाम पर रखा गया था यहाँ रोहिले राजपूतो ने 11 पीढ़ी लगातार शासन किया राजा रणवीर सिंह रोहिला ने नाइरुद्दीन महमूद,, ओर हरिसिंह रोहिला ने खिज्रखान को धूल चटाई नोरंगदेव ने पिंगू(तैमूर लंग)को हराया ।।।san ईस्वी के बाद भी कभी भी पूर्णतया रोहिलखंड को दिल्ली दरबार नही जीत पाया अकबर ओर बाद में औरंगजेब ने चाल चली और अफगानों की घुसपैठ करनी आबादी बढ़ानी शुरू की सन 1707ईस्वी में दाऊद खान बरेच अफगान के जाट दत्तक पुत्र जिसका नाम अलीमुहम्मद रखा था ने धोखे से बरेली में रोहिला राजा हरननंद का कत्ल किया और सम्पूर्ण रोहिलखण्ड पर अधिकार कर लिया इन अफगानों ने भी रोहिलखण्ड के नवाब बन जाने के कारणों से स्वयम को रुहेला सरदार कहा वास्तव में ये रोहिला नही थे जैसे कि रोह देश के अफगान लिखा यह गलत है ।।जिस काल में अफगान आए तब अफगानिस्तान को रोह देश नही कहा जाता था ।।
 यह झूठा मुस्लिम तुष्टि करण का इतिहास है ।।16वी सदी में जगत सिंह कठेहरिया रोहिल्ला राजपूत के पुत्रों बाँसदेव व बर्लदेव के नाम पर बरेली नगर की नीव रखी गयी अफगानों ने कोई नगर नही बसाया उन्होंने अपने काल मे ही रामपुर का नाम राम के नाम पर नही रखा। यह भ्रामक झूठ है कि फैज उल्ला खान ने रामपुर को बसाया था अठारहवीं सदी में जबकि रामपुर रियासत की स्थापना दसवीं सदी में राजा रामसिंह रोहिला(काठी कोम के राजपूत) ने की थी

*रोहिला क्षत्रिय योद्धाओं का शौर्य साहस, युद्ध कौशल, और अपने कुल व राष्ट्र की रक्षा के प्रति बलिदान की भावना में निहित होता था।* *हमारे क्षत्रिय योद्धा युद्ध भूमि में मृत्यु से* *निर्भय होकर लड़ते थे और उनका* *एकमात्र कर्तव्य राज्य व समाज की रक्षा करना था। शौर्य उनके रक्त में समाया हुआ था, जो युद्ध की ज्वाला में अपने बलिदान के रूप में प्रदर्शित होता था।*
*#क्षत्रिय*
*जय राजपूताना अखंड राजपूताना*
*जय राजपूताना,जय राजपूताना रोहिलखंड ,बुंदेलखंड*
संदर्भ 
इतिहास रोहिला राजपूत
 डॉक्टर के सी सैन
रोहिला क्षत्रिय वंश भास्कर
आर आर राजपूत
कठेहरिया रोहिला राजपूत
रोहिला क्षत्रियों का क्रमबद्ध इतिहास
दर्शन लाल रोहिला
मध्य कालीन भारत का इतिहास
ठाकुर अजीत सिंह परिहार
बालाघाट मध्य प्रदेश
 भारत भूमि और उसके वासी पृष्ठ-230 पंडित जयचंद्र विद्यालंकार
2-दून ज्योति-साप्ताहिक देहरादून 18 फरवरी 1974 
पुरुषोत्तम नागेश ओक व डॉक्टर ओमवीर शर्मा हेड ऑफ हिस्ट्री विभाग
3-क्षत्रिय वर्तमान पृष्ठ 97 व 263 ठाकुर अजित सिंह परिहार बालाघाट
4- प्राचीन भारत पृष्ठ -118,159,162 बीएम रस्तोगी इतिहास कार
5 राजतरँगनी पृष्ठ 31-39 कल्हण कृत अनुवादक नीलम अग्रवाल
6-रोहिला क्षत्रिय वन्स भास्कर ,आर आर राजपूत मूरसेन अलीगढ़
7- इतिहास रोहिला राजपूत 
डॉक्टर के सी सेन
8 - भारत का इतिहास पृष्ठ 138 डॉक्टर दया प्रकाश
9-भारतीय इतिहास मीमांसा पृष्ठ 44 जय

Thursday, 21 May 2026

ROHILA PARIVAR SMARIKA 6JUNE 2026

रोहिला क्षत्रिय : इतिहास, अस्मिता, अस्तित्व और युवाजनचेतना की नई दिशा
प्रस्तावना
रोहिला क्षत्रियों का इतिहास केवल एक जातीय पहचान की कहानी नहीं, बल्कि संघर्ष, विस्थापन, पुनर्गठन और स्वाभिमान की दीर्घ यात्रा है। सदियों तक राजनीतिक और सामाजिक बिखराव तथा पहचान के संकट से गुजरने के बावजूद रोहिला क्षत्रिय अपने मूल क्षत्रिय/राजपूत स्वरूप को पूरी तरह विस्मृत नहीं कर सके।
यह इतिहास केवल अतीत का स्मरण नहीं, बल्कि वर्तमान चेतना और भविष्य निर्माण का आधार भी है।
1. ऐतिहासिक आधार और विस्थापन की पीड़ा
कठेहर रोहिलखंड में लगभग दसवीं सदी से लेकर चार सौ वर्षों तक अनेक क्षत्रिय वंशों और गोत्रों का शासन स्थापित रहा। लगभग अठारह राजपूत वंशों की संगठित शासन व्यवस्था इस क्षेत्र में विद्यमान थी।
दिल्ली सल्तनत द्वारा इस क्षेत्र पर लगातार आक्रमण किए गए। भीषण नरसंहारों और दमन के बावजूद स्थानीय क्षत्रियों ने आत्मसमर्पण नहीं किया। अनेक बार उन्होंने पुनः संगठित होकर संघर्ष किया और अपनी स्वतंत्र सत्ता स्थापित की। यद्यपि समय के साथ उनकी शक्ति क्षीण होती गई तथा विस्थापन बढ़ता गया, फिर भी कठेहर रोहिलखंड पूर्णतः सल्तनती नियंत्रण में लंबे समय तक नहीं आ सका।
अठारहवीं सदी के प्रारंभ तक बाहरी शक्तियों का प्रभुत्व स्थापित हो गया। इसके पश्चात स्थानीय क्षत्रिय इतिहास को क्रमशः विकृत किया गया। मुगलकालीन इतिहासकारों ने रोहिलखंड के मूल संस्थापक क्षत्रिय राजाओं की उपेक्षा कर क्षेत्र की स्थापना बाहरी अफ़गान शासकों से जोड़ दी। ब्रिटिश काल में भी इसी विकृत इतिहास को दोहराया गया और “रोहिलखंड” को केवल पश्तून अफ़गानों से संबंधित बताने की प्रवृत्ति को संस्थागत रूप दिया गया।
इसके विपरीत अनेक प्राचीन और मध्यकालीन स्रोत रोहिला क्षत्रियों की पूर्व उपस्थिति का प्रमाण देते हैं।
मंडोर दुर्ग के 837 ईस्वी के बाउक शिलालेख में प्रतिहार शासक हरिश्चंद्र को प्राप्त “रोहिलाद्वयंक” उपाधि का उल्लेख मिलता है। पंडित गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने अपनी पुस्तक राजपुताने का इतिहास में इसका वर्णन किया है।
इसके अतिरिक्त आल्हाखण्ड, पृथ्वीराज रासो, हमीरपुर गजेटियर, इतिहासकार ठाकुर अजीत सिंह परिहार की क्षत्रिय वर्तमान तथा मध्यकालीन भारत और क्षत्रियोदय जैसी पुस्तकों में भी रोहिला/रूहेला राजवंश को उच्च कोटि के राजपूत वंश के रूप में वर्णित किया गया है।
2. सरकारी अभिलेखों में रोहिला क्षत्रिय पहचान
सन 1930–31 की जातिगत जनगणना रोहिला क्षत्रिय इतिहास में एक महत्वपूर्ण पड़ाव सिद्ध हुई। उस समय किसी बड़े संगठित आंदोलन के अभाव के बावजूद लोगों ने स्वयं को “रोहिला क्षत्रिय” के रूप में दर्ज कराया।
यह तथ्य स्पष्ट करता है कि यह पहचान स्वाभाविक, ऐतिहासिक और समाज द्वारा स्वयं स्वीकार की गई थी। यह किसी बाहरी प्रभाव या दबाव का परिणाम नहीं थी।
विशेष बात यह है कि उस समय तक इतिहास में “रोहिल्ला” शब्द को मुख्यतः अफ़गान पहचान से जोड़कर प्रस्तुत किया जाता रहा था, जबकि “कठेहर रोहिलखंड” और “रोहिला” शब्द अफ़गानों के आगमन से पूर्व भी प्रचलित रहे हैं।
3. संगठन और पुनर्जागरण की प्रक्रिया
बीसवीं सदी के प्रारंभ से ही रोहिला क्षत्रियों ने अपने इतिहास और पहचान को पुनर्संगठित करने के प्रयास प्रारंभ किए।
जगाधरी स्थित रोहिला राजपूत सभा ने राजस्थान से वंशावली विशेषज्ञ भाटों को आमंत्रित कर राजपूत बहियों का अध्ययन कराया और 1935 में इतिहास रोहिला राजपूत नामक ग्रंथ का प्रकाशन कराया। लगभग इसी काल में पानीपत के डॉ. के.सी. सैन ने भी इसी विषय पर पुस्तक लिखी। इन ग्रंथों ने बिखरे हुए रोहिला क्षत्रिय समाज में नई चेतना और आत्मगौरव का संचार किया।
1980 के दशक में यह प्रयास एक व्यापक सामाजिक आंदोलन में परिवर्तित हुआ।
सन 1984–86 के बीच अखिल भारतीय रोहिला क्षत्रिय विकास परिषद का गठन प्रारंभ हुआ तथा 1988 में इसका औपचारिक विस्तार हुआ। परिषद को अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा से संबद्धता प्राप्त हुई, जिससे रोहिला क्षत्रियों को व्यापक क्षत्रिय समाज का अभिन्न अंग स्वीकार किया गया।
इस संगठन के विकास में डॉ. कर्ण वीर सिंह रोहिला का विशेष योगदान रहा। परिषद का उद्देश्य केवल तात्कालिक लाभ प्राप्त करना नहीं था, बल्कि बिखरे हुए समाज को उसकी मूल ऐतिहासिक पहचान से पुनः जोड़ना और भविष्य की पीढ़ियों के लिए स्थायी स्वाभिमान स्थापित करना था।
22 अक्टूबर 1989 को सहारनपुर में विशाल महासम्मेलन आयोजित हुआ, जिसमें देशभर से लगभग दस हजार प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इससे समाज में एक नई एकजुटता और ऐतिहासिक चेतना का संचार हुआ।
इस कालखंड को रोहिला क्षत्रियों के पुनरोत्थान का स्वर्णिम चरण कहा जा सकता है।
4. राजनीतिक हस्तक्षेप और पहचान का पुनः संकट
सन 1995 के बाद कुछ क्षेत्रों में “रोहिला” नाम को अन्य असंबंधित जातीय समूहों के साथ जोड़ने के प्रयास हुए, जबकि ऐतिहासिक और सामाजिक दृष्टि से उनका रोहिला क्षत्रियों से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं था।
ऐसे प्रयासों ने समाज में भ्रम और पहचान संकट की स्थिति उत्पन्न की। अल्पकालिक राजनीतिक हितों के कारण की गई ऐसी पहलें दीर्घकाल में ऐतिहासिक अस्मिता और सामाजिक स्थिरता को प्रभावित कर सकती हैं।
5. वर्तमान परिदृश्य : डिजिटल युग और युवा शक्ति
आज का युग सूचना, तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) का युग है। वर्तमान समय में समाज की प्रगति केवल जातीय पहचान पर आधारित नहीं रह सकती; इसके लिए शिक्षा, कौशल विकास, आर्थिक आत्मनिर्भरता और तकनीकी दक्षता आवश्यक है।
नई पीढ़ी अपनी ऐतिहासिक पहचान पर गर्व करते हुए मुख्यधारा में सम्मानजनक स्थान प्राप्त करना चाहती है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि युवाओं को भ्रमित करने के बजाय उन्हें आधुनिक शिक्षा, विज्ञान, नवाचार और नेतृत्व की दिशा में प्रेरित किया जाए।
6. युवाजनचेतना की आवश्यकता
युवा वर्ग ही वह शक्ति है जो इतिहास को समझ सकता है, वर्तमान चुनौतियों का विश्लेषण कर सकता है और भविष्य की दिशा निर्धारित कर सकता है।
युवाओं को चाहिए कि वे—
रोहिला क्षत्रिय इतिहास का गंभीर अध्ययन करें
मिथ्या प्रचार और भ्रम से दूर रहें
सोशल मीडिया और डिजिटल मंचों का सकारात्मक उपयोग करें
शिक्षा, रोजगार और नवाचार को प्राथमिकता दें
बदलती वैश्विक परिस्थितियों के अनुसार कौशल विकसित करें
भविष्य में कृत्रिम बुद्धिमत्ता और स्वचालित कार्य प्रणालियों के विस्तार के साथ नई चुनौतियाँ सामने आएँगी। ऐसे समय में यह आवश्यक है कि रोहिला क्षत्रिय युवाशक्ति आधुनिक प्रतिस्पर्धा में अपनी सार्थक भागीदारी सुनिश्चित करे।
7. संगठनों की भूमिका : जिम्मेदारी और दिशा
सामाजिक संगठनों का कार्य केवल पहचान संरक्षण तक सीमित नहीं होना चाहिए। उन्हें समाज के भविष्य निर्माण की दिशा में भी सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए।
संगठनों को चाहिए कि वे—
राजनीतिक स्वार्थों से ऊपर उठें
पारदर्शी और सामूहिक निर्णय लें
युवाओं को नेतृत्व में अवसर दें
शिक्षा और रोजगारोन्मुख कार्यक्रम चलाएँ
समाज को बिखराव से बचाएँ
ऐतिहासिक पहचान के संरक्षण हेतु जागरूकता बढ़ाएँ
वर्तमान जनगणना और सरकारी अभिलेखों में “रोहिला क्षत्रिय” पहचान की उचित प्रविष्टि सुनिश्चित करने के लिए भी संगठित प्रयास आवश्यक हैं। इससे सामाजिक अस्तित्व और ऐतिहासिक पहचान को स्थिरता प्राप्त हो सकती है।
निष्कर्ष
रोहिला क्षत्रिय समाज का इतिहास यह संदेश देता है कि कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी यदि समाज अपनी जड़ों, संस्कृति और स्वाभिमान से जुड़ा रहे, तो उसका अस्तित्व सुरक्षित रहता है।
आज आवश्यकता है—
एकता, शिक्षा, जागरूकता और युवाओं के नेतृत्व में नव निर्माण की।
यदि अतीत से प्रेरणा लेकर वर्तमान में सही निर्णय लिए जाएँ, तो भविष्य न केवल सुरक्षित होगा बल्कि गौरवशाली भी बनेगा।
“वक्त बदलता है, परंतु पहचान और स्वाभिमान तभी तक जीवित रहते हैं, जब तक उन्हें सहेजने वाली चेतना जागृत रहती है।”

Sunday, 17 May 2026

MAHARAJA, RANVEER SINGH ROHILA,THE BRAVE KING OF ROHILKHAND

🚩 राजपूताना कठेहर रोहिलखंड के अमर अपराजित योद्धा ,एक अजेय वीर 🚩
⚔️ सूर्यवंशी क्षत्रिय सम्राट ⚔️
महाराजा रणवीर सिंह रोहिला
25 अक्टूबर — स्वाभिमान दिवस
रक्षा बंधन — शौर्य एवं बलिदान दिवस
🌞 वंश एवं कुल परिचय 🌞
महाराजा रणवीर सिंह रोहिला भारत की प्राचीन गौरवशाली रघुवंशी सूर्यवंशी निकुंभ शाखा से संबंधित थे। यह वही तेजस्वी वंश है जिसकी परंपरा मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम तक जाती है।
📜 वंश परंपरा
वंश : रघुवंश
कुल : सूर्यवंश
शाखा : निकुंभ शाखा
गोत्र : वशिष्ठ
प्रवर : वशिष्ठ
वेद : यजुर्वेद
उपवेद : धनुर्वेद
सूत्र : गुभेल
देवता : भगवान विष्णु (रघुनाथ जी)
इष्टदेव : श्री रघुनाथ जी
कुलदेवी : चावड़ा माता
उद्घोष : हर हर महादेव
ध्वजा : गरुड़ ध्वज
झंडा : पंचरंगा ध्वज
नगाड़ा : रण गंजन
नदी : सरयू
गद्दी : अयोध्या
गुणधर्म : काठी (कठोर क्षात्र स्वभाव)
मूल क्षेत्र : रावी और व्यास नदियों के मध्य का “काठे” क्षेत्र
🛕 जन्म एवं परिवार
जन्म : 25 अक्टूबर 1204 ईस्वी
तिथि : कार्तिक मास, कृष्ण पक्ष, प्रथमा
संवत : 1261 विक्रमी
पिता : महाराजा त्रिलोक सिंह जी
बलिदान दिवस : श्रावण पूर्णिमा, रक्षा बंधन (1254 ईस्वी)
महाराजा रणवीर सिंह का जन्म उस काल में हुआ जब भारत पर विदेशी इस्लामिक आक्रमण तीव्र हो चुके थे और पृथ्वीराज चौहान के पश्चात राजपूत शक्ति अत्यंत कठिन दौर से गुजर रही थी।
ऐसे समय में कठेहर रोहिलखंड की भूमि पर एक ऐसा सूर्य उदित हुआ जिसने विदेशी सल्तनत के सामने कभी सिर नहीं झुकाया।
🏰 कठेहर रोहिलखंड राज्य की स्थापना
निकुंभ वंशी कठ क्षत्रियों का इतिहास अत्यंत प्राचीन माना जाता है।
ऐतिहासिक परंपराओं के अनुसार सिकंदर के आक्रमण काल में कठगण राज्य रावी क्षेत्र में विद्यमान था जिसकी राजधानी सांकल दुर्ग (वर्तमान स्यालकोट क्षेत्र) मानी जाती है।
समय के साथ यह वीर वंश—
➡️ राजस्थान
➡️ अलवर
➡️ मंगलगढ़
➡️ जैसलमेर
➡️ सौराष्ट्र-काठियावाड़
➡️ पांचाल एवं मध्यदेश
की ओर अग्रसर हुआ।
⚔️ काठियावाड़ एवं कठेहर की स्थापना
अलवर क्षेत्र में निकुंभ वंशी कठ क्षत्रियों ने दुर्ग निर्माण करवाए।
सौराष्ट्र में “काठियावाड़” की स्थापना की।
बाद में पांचाल क्षेत्र में “कठेहर रोहिलखंड राज्य” स्थापित किया।
🛡️ राज्य विस्तार
महाराजा रणवीर सिंह के पूर्वजों द्वारा स्थापित कठेहर रोहिलखंड राज्य का विस्तार—
गंगा-यमुना दोआब तक
पश्चिम में उत्तराखंड तक
उत्तर में नेपाल तराई तक
फैला हुआ था।
📍 प्रमुख क्षेत्र
पांचाल
मध्यदेश
कठेहर (रोहिलखंड)
🏛️ राजधानी
प्रारंभिक राजधानी : रामनगर (अहिक्षेत्र के समीप)
बाद की राजधानी : रामपुर
👑 वंशावली
रामपुर संस्थापक राजा रामशाह (राम सिंह) से लेकर महाराजा रणवीर सिंह तक वंश परंपरा इस प्रकार वर्णित है—
राजा रामशाह (909 ई.)
बीजयराज
करणचंद
विम्रहराज
सावंत सिंह
जगमाल
धिंगतराम
गोकुल सिंह
महासहाय
त्रिलोक सिंह
महाराजा रणवीर सिंह रोहिला
⚔️ महाराजा रणवीर सिंह का व्यक्तित्व
1225 ईस्वी में मात्र 21 वर्ष की आयु में महाराजा रणवीर सिंह का राजतिलक हुआ। उसी वर्ष उनका विवाह विजयपुर सीकरी की राजकुमारी महारानी तारा देवी से हुआ।
🔥 अद्भुत शौर्य
लगभग 7 फीट लंबा शरीर
60 सेर का लौह कवच
25 सेर की विशाल तलवार
125 सेर शारीरिक भार
अद्वितीय युद्ध कौशल
उनके साथ 84 अजेय कवचधारी राजपूत वीर रहते थे।
🗡️ दिल्ली सल्तनत से संघर्ष
महाराजा रणवीर सिंह ने—
✅ दिल्ली सल्तनत की सेनाओं को बार-बार पराजित किया
✅ रोहिलखंड को स्वतंत्र बनाए रखा
✅ राजपूत शक्तियों को संगठित किया
✅ विदेशी अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष जारी रखा
उनकी वीरता से दिल्ली सल्तनत तक भयभीत रहती थी।
🔥 1253 ईस्वी का महासंग्राम
दिल्ली सल्तनत के सेनापति नासिरुद्दीन महमूद (चंगेज) ने विशाल सेना के साथ रोहिलखंड पर आक्रमण किया।
रामपुर और पीलीभीत के मध्य हुए युद्ध में—
⚔️ 6000 रोहिला राजपूत
⚔️ 84 लौह कवचधारी वीर
ने दिल्ली सल्तनत की लगभग 30,000 सेना को धूल चटा दी।
इतिहास वर्णन करता है कि नासिरुद्दीन महमूद बंदी बना लिया गया था, किन्तु क्षात्र धर्म निभाते हुए महाराजा रणवीर सिंह ने उसे अभयदान देकर मुक्त कर दिया।
⚠️ विश्वासघात और अमर बलिदान
पराजित महमूद ने छल का सहारा लिया।
रक्षा बंधन के दिन जब सभी राजपूत शिव मंदिर में शस्त्र पूजन हेतु निःशस्त्र थे, तब विश्वासघात कर किले के द्वार खोल दिए गए।
⚔️ अंतिम युद्ध
निहत्थे होने के बावजूद राजपूत वीरों ने युद्ध किया
महाराजा रणवीर सिंह ने अकेले अनेक शत्रुओं का संहार किया
अंतिम रक्त बूंद तक लड़ते रहे
पीठ पर वार होने के बाद भी रणभूमि नहीं छोड़ी
श्रावण पूर्णिमा, रक्षा बंधन के दिन
महाराजा रणवीर सिंह रोहिला वीरगति को प्राप्त हुए।
🔥 महारानी तारा देवी का त्याग
महाराजा के बलिदान के पश्चात् महारानी तारा देवी सती हो गईं।
आज भी रामपुर क्षेत्र में किले के अवशेष, सती स्थल एवं ऐतिहासिक ध्वस्त टीले उस वीरगाथा के मौन साक्षी माने जाते हैं।
🚩 आज भी जीवित है यह गौरवगाथा
रोहिला क्षत्रिय समाज आज भी—
🔸 25 अक्टूबर
स्वाभिमान दिवस
🔸 रक्षा बंधन
शौर्य एवं बलिदान दिवस
के रूप में मनाता है।
इस दिन शस्त्र पूजन, वीर स्मरण और समाज जागरण कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।
📜 इतिहास का संदेश
महाराजा रणवीर सिंह रोहिला का जीवन हमें सिखाता है—
✅ धर्म रक्षा सर्वोपरि है
✅ स्वाभिमान पर समझौता नहीं
✅ संगठन ही शक्ति है
✅ विश्वासघात राष्ट्र का सबसे बड़ा शत्रु है
✅ क्षात्र धर्म त्याग और बलिदान की परंपरा है
⚔️ अमर उद्घोष ⚔️
🚩 जय राजपुताना — जय कठेहर रोहिलखंड 🚩
🌞 जय सूर्यवंश 🌞
🔱 हर हर महादेव 🔱