महाराजा अनंगपाल तक की वंशावली :-
1. अर्जुन
2. अभिमन्यु
3. परिक्षत
4. जनमेजय
5. अश्वमेघ
6. दलीप
7. छत्रपाल
8. चित्ररथ
9. पुष्टशल्य
10. उग्रसेन
11. कुमारसेन
12. भवनति
13. रणजीत
14. ऋषिक
15. सुखदेव
16.नरहरिदेव
17. सूचीरथ
18. शूरसेन
19. दलीप द्वितीय
20. पर्वतसेन
21. सोमवीर
22. मेघाता
23. भीमदेव
24. नरहरिदेव द्वितीय
25. पूर्णमल
26. कर्दबीन
27. आपभीक
28. उदयपाल
29. युदनपाल
30. दयातराज
31. भीमपाल
32. क्षेमक
33. अनक्षामी
34. पुरसेन
35. बिसरवा
36. प्रेमसेन
37. सजरा
38. अभयपाल
39. वीरसाल
40. अमरचुड़
41. हरिजीवि
42. अजीतपाल
43. सर्पदन
44. वीरसेन
45. महेशदत्त
46. महानिम
47. समुद्रसेन
48. शत्रुपाल
49. धर्मध्वज
50. तेजपाल
51. वालिपाल
52. सहायपाल
53. देवपाल
54. गोविन्दपाल
55. हरिपाल
56. गोविन्दपाल द्वितीय
57. नरसिंह पाल
58. अमृतपाल
59. प्रेमपाल
60. हरिश्चंद्र
61. महेंद्रपाल
62. छत्रपाल
63. कल्याणसेन
64. केशवसेन
65. गोपालसेन
66. महाबाहु
67. भद्रसेन
68. सोमचंद्र
69. रघुपाल
70. नारायण
71. भनुपाद
72. पदमपाद
73. दामोदरसेन
74. चतरशाल
75. महेशपाल
76. ब्रजागसेन
77. अभयपाल
78. मनोहरदास
79. सुखराज
80. तंगराज
81. तुंगपाल –
इनके नाम से इनके वंशज तोमर या तंवर राजपूत कहलाते हैं।
82. अनंगपाल तंवर (तोमर) –
दिल्ली राज्य के संस्थापक, इस वंशावली से पता चलता है कि अनंगपाल तंवर और तंवर(तोमर) वंश चंद्रवंशी क्षत्रिय हैं, और इनका संबंध पाण्डु-पुत्र-अर्जुन से जुड़ता हैं।
तंवर/तोमर वंश की अनेक शाखाएं इस प्रकार है तंवर वंश को अर्जुनायन वंश भी कहा गया है.इसकी 22 मुख्य शाखाएँ है जो पूरे उत्तर एवं मध्य भारत में फैलीं हुई है। तवंर वंश के मूल पुरुष पांडूपुत्र अर्जुन के पौत्र परीक्षित जी को बताया जाता है। तंवर वंश की 22 प्रमुख शाखाएं इस प्रकार है.....
==========जावला तंवर ===========
जावला या अनंगपाल के वंशज जावला तंवर कहलाए,रुनेचा,असील जी के तंवर,जाटू,सांपला(सिम्पल) आदि इनकी शाखाएँ हैं,सांपला(सिम्पल),रुनेचा जैसलमेर में मिलते हैं,लोकदेवता रामदेव इसी रुनेचा शाखा से थे,
========ग्वालेरा तंवर==============
दिल्ली छूटने के बाद ग्वालियर पर शासन करने के कारण यहाँ के तोमर ग्वालेरा कहलाए
===========जाटू तंवर ==============
जाटू तंवर राजपूत वंश राजा अंगपाल द्वितीय के पौत्र व राजा शालीवाहन तंवर के पुत्र राव जैरथ जी जिन्हे जाटू जी कहा जाता था,के कुटुंब से आगे बढ़ा। राव जाटू के साथ उनके भाई रघु व अंगपाल तंवर प्रथम के पुत्र सतरौला का कुटुंब आज हरयाणा के रोहतक , महेंद्रगढ़ , हिसार, कैथल , कुरुक्षेत्र और खासकर भिवानी में वास करता है। एक समय में इनके राज्य के अधीन लगभग 1440 गाँव थे। आज जाटू तंवरों के चौरासी गाँव भिवानी और आस पास के जिलों में वास करती है। पूर्व जनरल वीके सिंह भी तंवरों की इसी शाखा से है। भिवानी शहर की स्थापना भी इन्ही तंवरों ने की। अब से कुछ समय पहले तक भी सरकारी दस्तावेजों में इस इलाके को तीन टप्पों या टप्पा में बसा हुआ माना व जाना जाता था जो की जाटू, रघु व सतरौला राजाओ की परागनाएँ थी।
इन तीनो तंवरो के वंशजों को अपनी जागीरें बढ़ने के अवसर मिले , जिनमे जाटू के वंशज काफी फैले और उम्र सिंह ने तोशाम का इलाका कब्जे में ले लिया इस कारण इलाका उमरैण टप्पा कहलाया जाने लगा। ऐसे ही भिवानी बछोअन टप्पा कहलाता था। जाटू के सिवानी वाले वंशजों को रईस कहा जाता था और तलवंडी में बसे वंशजों को राणा कहा जाने लगा।
======== जंघारा तंवर ============
जंघारा तंवर तंवरों में सबसे लड़ाकू शाख मानी जाती है। जंघारा शब्द ही जंग व अहारा शब्द को जोड़ कर बना है जिसका अर्थ है जो वंश जंग के लिए भूखा हो। जंघारा तंवरों की वंशावली अंगपाल के पोत्र राव जगपाल से होती है। यह तंवर इन्दौरिया तंवरो के भी भाई है। दिल्ली में चौहानो के कब्जे के बाद जंघारा तंवर तंवरों की मुख्या शाखा से अलग हो रोहिलखण्ड के इलाके की ओर राजकुमार धापू धाम के नेतृत्व में कूच कर गए। जंघारा राजपूतों ने बरेली व आस पास से चौदवीं शताब्दी में ग्वालों अहीरों व कठेरिया राजपूतों को युद्ध में हरा कर बहार निकाला। इन्होने रूहेला पठानों को भी कभी चैन से नहीं बैठने दिया , जंघारा राजपूतो की बहादुरी व लड़ाकूपन को देखते हुए ब्रिटिश काल में इनकी भर्ती सेना में ऊँचे ओहदों पर की जाती थी।
=========पठानिया तंवर============
पठानिया तंवर राजा अनंगपाल तंवर के अनुज राजा जैतपाल के वंशज है जिन्होंने उत्तर भारत में धमेरी नाम के राज्य की स्थापना की और पठानकोट नामक शहर बसाया। धमेरी राज्य का नाम बाद में जा कर नूरपुर पड़ा। यह वंश सं 1849 तक विदेशी आक्रमणकारियों के विरुध अपने संघर्षों के लिए जाना जाता है चाहे मुस्लमान हो या अंग्रेज। सं 1849 में नूरपुर अंग्रेजो के अधीन हो गया। इस वंश के राजा राम सिंह पठानिया अंग्रेजों के विरुद्ध अपनी वीरता के लिए विख्यात हैं,यह वंश इतना बहादुर व झुझारू है के आजादी के बाद भी पठानिया राजपूतों ने 3 महावीर चक्र प्राप्त किये। आज पठानिया राजपूत उत्तर पंजाब व हिमाचल में फैले हुए है।
============जंजुआ वंश ==============
जंजुआ वंश भी तंवर राजपूतों की तरह अर्जुन के वंशज माने जाते है। जंजुआ राजपूतों की उत्पत्ति व नाम अर्जुन के वंशज राजा जनमेजय से मानी जाती है जिनके ऊपर इनके वंश का नाम पड़ा। जंजुआ वंश तंवर वंश के भाई के रूप में देखा जाता है।जंजुआ राजपूतों के राज्य पूर्वी पाकिस्तान के इलाके में रहे है। इस वंश के ऊपर डिटेल्ड पोस्ट आने वाले समय में की जाएगी। ज्यादातर जंजुआ राजपूतों की खाप आज के पाकिस्तान में पायी जाती है जो मुस्लिम बन चुके है। कुछ जंजुआ राजपूतो के गाँव आज भी पंजाब में मौजूद है और वो हिन्दू राजपूत है। जंजुआ एक बहुत ही झुझारू व बहादुर वंश माना जाता है।पाकिस्तान के कई बड़े आर्मी जनरल जंजुआ राजपूत हैं,अंग्रेजो ने भी जंजुआ राजपूतो को पंजाब की सबसे लड़ाकू कौम बताया था.कबूल का प्रसिद्ध शाही वंश भी जंजुआ राजपूत वंश ही माना जाता है,जिन्होंने गजनवी से लम्बे समय तक संघर्ष किया था.यही नहीं इसके वंशज वीर पोरस को भी अपना पूर्वज मानते हैं जिन्होंने सिकन्दर को भी हरा दिया था.
===========जर्राल वंश ===============
ये भी तंवर वंश की शाखा हैं,इन्होने तराइन के दोनों युद्धों में प्रथ्विराज चौहान के साथ मिलकर गौरी का मुकाबला किया था,इसके बाद किसी कारणवश इस्लाम स्वीकार कर लिया,मध्य काल में इनका राज्य हरियाणा के कलानौर,जम्मू कश्मीर के राजौरी में था,इन्होने पठानों,सिखों,ब्रिटिशों और डोगरो से खूब लड़ाई लड़ी और कभी भी आसानी से किसी के काबू नहीं आये,आज इनकी आबादी अधिकतर जम्मू कश्मीर,पाकिस्तान में मिलती है,
============बेरुआर वंश
बेरुआर वंश तंवर वंश की ही एक शाखा है जिसने पूर्वी उत्तरप्रदेश के बलिया व मुज़्ज़फ़्फ़रपुर जिले पर राज किया। भाटों के अनुसार पूर्वी उत्तर प्रदेश में बेरुर नाम की जन जाती को पराजय कर कर बेरुआरी तंवरों ने राज्य स्थापित किया जिस कारण इनका नाम बेरु + आरी यानि दुश्मन पर पड़ा। बेरुआर वंश के कई गाँव आज बिहार के मिथिलांचल इलाके,फ़ैजाबाद,बलिया,गाजीपुर,बनारस,छपरा आदि जिलो में पाए जाते है,यह वंश पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार सीमा पर सबसे शक्तिशाली राजपूत वंशो में एक है.
===========इन्दौरिया / इंदोलिया तंवर =========
इन्दौरिया तंवर सम्राट अनंगपाल तोमर के पुत्र इंदुपाल के वंशज है। इन्दौरिया तंवरों के ठिकाने आज झाँसी दतिया धौलपुर आदि में पाए जाते है। दिल्ली के गौरी द्वारा ध्वस्त हो जाने के बाद यह शाख भी इन इलाकों में आ बसी।
============= इन्दा तंवर ============
यह खाप आज के मध्य प्रदेश के ग्वालियर के आस पास के इलाके में बसी हुई है। इस खाप को लडूवा तंवर भी कहते है।
=========बिलदारिया तंवर ============
राजा बंसोली के वंशज भागपाल ने बीदासर में राज्य स्थापित किया। बीदासर से जो तंवर निकले वे तंवर बिलदारिया कहलाये। इनके गाँव उत्तर प्रदेश के कानपूर बलिया उन्नाव आदि जिलों में है।
========खाती तंवर ===========
यह तंवर गढ़वाल के खात्मस्यु के अधिकारी थे। इससे पहले इनका निकास आगरा मुरेना के तोमरधार से माना गया है। आज यह शाख गढ़वाल में बस्ती है।
=============सतरावला तंवर=========
अंगपाल के पुत्र सतरौल के वंशज। भिवानी हरियाणा के आस पास रहते है।
===============सोम वंश ============
सम्राट अनंगपाल उर्फ़ जावल के पुत्र सोम के वंशज। इन्हे सुमाल भी कहा जाता है।
कुछ लोग इन्हें पांडू पुत्र भीम का वंश भी मानते हैं ।ईस्ट यूपी के सोमवंशी राजपूत इनसे अलग हैं।
सुमाल आज भी दिल्ली के रिठाला गाँव के मूल निवासी है। सुमाल रिठाला के आस पास के गाँवो के अलावा उत्तर प्रदेश के मुज़्ज़फरनगर व मेरठ के 24 गाँवो में पाए जाते है यहाँ इन्हे सोम कहा जाता है। उत्तर प्रदेश के मशहूर भाजपा नेता संगीत सोम इसी वंश से है।
============= कोड्यां तंवर=============
जावाल के पुत्र पर ही इस खाप का नाम पड़ा। आज राजस्थान के सीकर जिले में डाबला के आस पास इनके गाँव पड़ते है।
============निहाल तंवर ============
ये भी दिल्ली पति अनंगपाल उर्फ़ जावल के वंश से है आज मध्यप्रदेश में पाए जाते है।
============सेलेरिया तंवर ==========
ये भी दिल्ली पति जावल के वंश से है। इन्हे सुनियार भी कहा जाता है ये मध्य प्रदेश के विदिशा में बस्ते है।
===============घोड़ेवा तंवर ===========
नूरपुर हिमाचल के तंवर घोड़ेवा शाशक कहलाए।
===========तिलोता तंवर =========
बिहार के आरा शाहबाद भोजपुर और यूपी के झाँसी जालौन जिले में निवास करते है।
===============जनवार राजपूत ============
उत्तर प्रदेश के बलरामपुर गंगवाल ऑइल प्रयागपुर इनके ठिकाने है। जनवार राजपूत झाँसी दतिया और बुंदेलखंड में भी पाए जाते है. जनवार तंवरों की शाखा के बजाये भाई बंध माने जाते है जो राजा तुंगपाल से पहले इस वंश से अलग हो गए।
================कटियार तंवर =========
धर्मपुर राज्य जिला हरदोई उत्तर प्रदेश कटियार तंवर राजपूतों का है
============पालीवार तंवर ============
उत्तरप्रदेश के गोरखपुर व फैज़ाबाद जिलो में इनके गाँव है।
================द्वार तंवर ============
यु पी के जालौन झाँसी व हमीरपुर जिलों में पाए जाते है
==============जरोलिया तंवर ====
यु पी के बुलंद शहर के आस पास के तंवर जरोलिया कह लाते है।कुछ जगह इन्हें गौड़ वंश की शाखा भी लिखा है।
=============रघु तंवर ===============
रघु तंवर जाटू तंवर के भाई माने जाते है और भिवानी के आस पास आज बसे हुए है।
===========अन्य तंवर शाखाये :=============
रैक्वाल तिलोता किसनातिल चंदेरिया रिटालिया मोहाल जोधाण अनवार बिलोड़िया अंगडिया मगरोठिया पन्ना बोधयाणा कोढयाना बेबत भैपा तुनिहान आदि '.
=========मराठा क्षत्रियों में तंवर वंश =========
मराठा तंवर मराठा तौर ठाकुर नाम से जाना जाता है.तौर ठाकुर के मराठवाडा प्रांत मे गोदावरी नदी के तीर पर २२ गाँव है.इस प्रांत को गंगथडी भी कहा जाता है,इसके अलावा मराठो में तावडे या तान्वरे,शिर्के भी तंवर वंशी हैं.
चन्द्रवंशी तंवर (तोमर) राजपूतो का इतिहास
तोमर या तंवर उत्तर-पश्चिम भारत का एक राजपूत वंश है। तोमर राजपूत क्षत्रियो में चन्द्रवंश की एक शाखा है और इन्हें पाण्डु पुत्र अर्जुन का वंशज माना जाता है.इनका गोत्र अत्री एवं व्याघ्रपद अथवा गार्गेय्य होता है। क्षत्रिय वंश भास्कर,पृथ्वीराज रासो,बीकानेर वंशावली में भी यह वंश चन्द्रवंशी लिखा हुआ है,यही नहीं कर्नल जेम्स टॉड जैसे विदेशी इतिहासकार भी तंवर वंश को पांडव वंश ही मानते हैं।
उत्तर मध्य काल में ये वंश बहुत ताकतवर वंश था और उत्तर पश्चिमी भारत के बड़े हिस्से पर इनका शाशन था। देहली जिसका प्राचीन नाम ढिल्लिका था, इस वंश की राजधानी थी और उसकी स्थापना का श्रेय इसी वंश को जाता है।
नामकरण---------
तंवर अथवा तोमर वंश के नामकरण की कई मान्यताएं प्रचलित हैं,कुछ विद्वानों का मानना है कि राजा तुंगपाल के नाम पर तंवर वंश का नाम पड़ा,पर सर्वाधिक उपयुक्त मान्यता ये प्रतीत होती है
इतिहासकार ईश्वर सिंह मडाड की राजपूत वंशावली के पृष्ठ संख्या 228 के अनुसार,,,,,,,
"पांडव वंशी अर्जुन ने नागवंशी क्षत्रियो को अपना दुश्मन बना लिया था,नागवंशी क्षत्रियो ने पांड्वो को मारने का प्रण ले लिया था,पर पांडवो के राजवैध धन्वन्तरी के होते हुए वे पांड्वो का कुछ न बिगाड़ पाए !अतः उन्होंने धन्वन्तरी को मार डाला !इसके बाद अभिमन्यु पुत्र परीक्षित को मार डाला !परीक्षित के बाद उसका पुत्र जन्मेजय राजा बना !अपने पिता का बदला लेने के लिए जन्मेजय ने नागवंश के नो कुल समाप्त कर दिए !नागवंश को समाप्त होता देख उनके गुरु आस्तिक जो की जत्कारू के पुत्र थे,जन्मेजय के दरबार मैं गए व् सुझाव दिया की किसी वंश को समूल नष्ट नहीं किया जाना चाहिए व सुझाव दिया की इस हेतु आप यज्ञ करे !महाराज जन्मेजय के पुरोहित कवष के पुत्र तुर इस यज्ञ के अध्यक्ष बने !
इस यग्य में जन्मेजय के पुत्र,पोत्र अदि दीक्षित हुए !क्योकि इन सभी को तुर ने दीक्षित किया था इस कारण ये पांडव तुर,तोंर या बाद तांवर तंवर या तोमर कहलाने लगे !ऋषि तुर द्वारा इस यज्ञ का वर्णन पुराणों में भी मिलता है.
महाभारत काल के बाद तंवर वंश का वर्णन----------
महाभारत काल के बाद पांडव वंश का वर्णन पहले तो 1000 ईसा पूर्व के ग्रंथो में आता है जब हस्तिनापुर राज्य को युधिष्ठर वंश बताया गया,पर इसके बाद से लेकर बौद्धकाल,मौर्य युग से लेकर गुप्तकाल तक इस वंश के बारे में कोई जानकारी नहीं मिलती,समुद्रगुप्त के शिलालेख से पाता चलता है कि उन्होंने मध्य और पश्चिम भारत की यौधेय और अर्जुनायन क्षत्रियों को अपने अधीन किया था,यौधेय वंश युधिष्ठर का वंश माना जा सकता है और इसके वंशज आज भी चन्द्रवंशी जोहिया राजपूत कहलाते हैं जो अब अधिकतर मुसलमान हो गए हैं,इन्ही के आसपास रहने वाले अर्जुनायन को अर्जुन का वंशज माना जा सकता है और ये उसी क्षेत्रो में पाए जाते थे जहाँ आज भी तंवरावाटी और तंवरघार है,यानि पांडव वंश ही उस समय तक अर्जुनायन के नाम से जाना जाता था और कुछ समय बाद वही वंश अपने पुरोहित ऋषि तुर द्वारा यज्ञ में दीक्षित होने पर तुंवर, तंवर,तूर,या तोमर के नाम से जाना गया.(इतिहासकार महेन्द्र सिंह तंवर खेतासर भी अर्जुनायन को ही तंवर वंश मानते हैं)
तंवर वंश और दिल्ली की स्थापना ------------
ईश्वर का चमत्कार देखिये कि हजारो साल बाद पांडव वंश को पुन इन्द्रप्रस्थ को बसाने का मौका मिला,और ये श्रेय मिला अनंगपाल तोमर प्रथम को.
दिल्ली के तोमर शासको के अधीन दिल्ली के अलावा पंजाब ,हरियाणा,पश्चिमी उत्तर प्रदेश भी था,इनके छोटे राज्य पिहोवा,सूरजकुंड,हांसी,थानेश्वर में होने के भी अभिलेखों में उल्लेख मिलते हैं.इस वंश ने बड़ी वीरता के साथ तुर्कों का सामना किया और कई सदी तक उन्हें अपने क्षेत्र में अतिक्रमण करने नहीं दिया
दिल्ली के तंवर(तोमर) शासक (736-1193 ई)------
1.अनगपाल तोमर प्रथम (736-754 ई)-दिल्ली के संस्थापक राजा थे जिनके अनेक नाम मिलते हैं जैसे बीलनदेव, जाऊल इत्यादि।
2.राजा वासुदेव (754-773)
3.राजा गंगदेव (773-794)
4.राजा पृथ्वीमल (794-814)-बंगाल के राजा धर्म पाल के साथ युद्ध
5.जयदेव (814-834)
6.राजा नरपाल (834-849)
7.राजा उदयपाल (849-875)
8.राजा आपृच्छदेव (875-897)
9.राजा पीपलराजदेव (897-919)
10.राज रघुपाल (919-940)
11.राजा तिल्हणपाल (940-961)
12.राजा गोपाल देव (961-979)-इनके समय साम्भर के राजा सिहराज और लवणखेडा के तोमर सामंत सलवण के मध्य युद्ध हुआ जिसमें सलवण मारा गया तथा उसके पश्चात दिल्ली के राजा गोपाल देव ने सिंहराज पर आक्रमण करके उन्हें युद्ध में मारा
12.सुलक्षणपाल तोमर (979-1005)-महमूद गजनवी के साथ युद्ध किया
13.जयपालदेव (1005-1021)-महमूद गजनवी के साथ युद्ध किया, महमूद ने थानेश्वसर ओर मथुरा को लूटा
14.कुमारपाल (1021-1051)-मसूद के साथ युद्ध किया और 1038 में हाँसी के गढ का पतन हुआ, पाच वर्ष बाद कुमारपाल ने हासी, थानेश्वसर के साथ साथ कांगडा भी जीत लिया
16.अनगपाल द्वितीय (1051-1081)-लालकोट का निर्माण करवाया और लोह स्तंभ की स्थापना की, अनंगपाल द्वितीय ने 27 महल और मन्दिर बनवाये थे।दिल्ली सम्राट अनगपाल द्वितीय ने तुर्क इबराहीम को पराजित किया
17.तेजपाल प्रथम(1081-1105)
18.महिपाल(1105-1130)-महिलापुर बसाया और शिव मंदिर का निर्माण करवाया
19.विजयपाल (1130-1151)-मथुरा में केशवदेव का मंदिर
20.मदनपाल(1151-1167)-
मदनपाल अथवा अनंगपाल तृतीय के समय अजमेर के प्रतापी शासक विग्रहराज चौहान उर्फ़ बीसलदेव ने दिल्ली राज्य पर अपना अधिकार कर लिया और संधि के कारण मदनपाल को ही दिल्ली का शासक बना रहने दिया,मदनपाल ने बीसलदेव के साथ मिलकर तुर्कों के हमलो के विरुद्ध युद्ध किया और उन्हें मार भगाया,मदलपाल तोमर ने विग्रहराज चौहान उर्फ़ बीसलदेव के शोर्य से प्रभावित होकर उससे अपनी पुत्री देसलदेवी का विवाह किया,पृथ्वीराज रासो में बाद में किसी ने काल्पनिक कहानी जोड़ दी है कि दिल्ली के राजा अनंगपाल ने अपनी दो पुत्रियों की शादी एक कन्नौज के जयचंद के साथ और दूसरी कमला देवी का विवाह पृथ्वीराज चौहान के साथ की,जिससे पृथ्वीराज चौहान का जन्म हुआ,जबकि सबसे प्रमाणिक ग्रन्थ पृथ्वीराज विजय के अनुसार सच्चाई ये है कि पृथ्वीराज चौहान की माता चेदी राज्य की कर्पूरी देवी थी,और पृथ्वीराज चौहान न तो अनंगपाल तोमर का धेवता था न ही जयचंद उसका मौसा था,ये सारी कहानी काल्पनिक थी.
21.पृथ्वीराज तोमर(1167-1189)-अजमेर के राजा सोमेश्वर और पृथ्वीराज चव्हाण इनके समकालीन थे
22.चाहाडपाल/गोविंदराज (1189-1192)-पृथ्वीराज चौहान के साथ मिलकर गोरी के साथ युद्ध किया,तराईन दुसरे युद्ध मे मारा गया।पृथ्वीराज रासो के अनुसार
तराईन के पहले युद्ध में मौहम्मद गौरी और गोविन्दराज तोमर का आमना सामना हुआ था,जिसमे दोनों घायल हुए थे और गौरी भाग रहा था। भागते हुए गौरी को धीरसिंह पुंडीर ने पकडकर बंदी बना लिया था। जिसे उदारता दिखाते हुए पृथ्वीराज चौहान ने छोड़ दिया। हालाँकि गौरी के मुस्लिम इतिहासकार इस घटना को छिपाते हैं।
23.तेजपाल द्वितीय (1192-1193 ई)-दिल्ली का अन्तिम तोमर राजा , जिन्होंने स्वतन्त्र 15 दिन तक शासन किया, और कुतुबुद्दीन ने दिल्ली पर आक्रमण कर हमेशा के लिए दिल्ली पर कब्जा कर लिया।
ग्वालियर,चम्बल,ऐसाह गढ़ी का तोमर वंश--------
दिल्ली छूटने के बाद वीर सिंह तंवर ने चम्बल घाटी के ऐसाह गढ़ी में अपना राज स्थापित किया जो इससे पहले भी अर्जुनायन तंवर वंश के समय से उनके अधिकार में था,बाद में इस वंश ने ग्वालियर पर भी अधिकार कर मध्य भारत में एक बड़े राज्य की स्थापना की,यह शाखा ग्वालियर स्थापना के कारण ग्वेलेरा कहलाती है,माना जाता है कि ग्वालियर का विश्वप्रसिद्ध किला भी तोमर शासको ने बनवाया था.यह क्षेत्र आज भी तंवरघार कहा जाता है और इस क्षेत्र में तोमर राजपूतो के 1400 गाँव कहे जाते हैं.
वीर सिंह के बाद उद्दरण,वीरम,गणपति,डूंगर सिंह,कीर्तिसिंह,कल्याणमल,और राजा मानसिंह हुए,
राजा मानसिंह तोमर बड़े प्रतापी शासक हुए,उनके दिल्ली के सुल्तानों से निरंतर युद्ध हुए,उनकी नो रानियाँ राजपूत थी,पर एक दीनहींन गुज्जर जाति की लडकी मृगनयनी पर मुग्ध होकर उससे भी विवाह कर लिया,जिसे नीची जाति की मानकर रानियों ने महल में स्थान देने से मना कर दिया जिसके कारण मानसिंह ने छोटी जाति की होते हुए भी मृगनयनी गूजरी के लिए अलग से ग्वालियर में गूजरी महल बनवाया.इस गूजरी रानी पर राजपूत राजा मानसिंह इतने आसक्त थे कि गूजरी महल तक जाने के लिए उन्होंने एक सुरंग भी बनवाई थी,जो अभी भी मौजूद है पर इसे अब बंद कर दिया गया है.
मानसिंह के बाद विक्रमादित्य राजा हुए,उन्होंने पानीपत की लड़ाई में अपना बलिदान दिया,उनके बाद रामशाह तोमर राजा हुए,उनका राज्य 1567 ईस्वी में अकबर ने जीत लिया,इसके बाद राजा रामशाह तोमर ने मुगलों से कोई संधि नहीं की और अपने परिवार के साथ महाराणा उदयसिंह मेवाड़ के पास आ गए,हल्दीघाटी के युद्ध में राजा रामशाह तोमर ने अपने पुत्र शालिवाहन तोमर के साथ वीरता का असाधारण प्रदर्शन कर अपने परिवारजनों समेत महान बलिदान दिया,उनके बलिदान को आज भी मेवाड़ राजपरिवार द्वारा आदरपूर्वक याद किया जाता है.
मालवा में रायसेन में भी तंवर राजपूतो का शासन था ,यहाँ के शासक सिलहदी उर्फ़ शिलादित्य तंवर राणा सांगा के दामाद थे और खानवा के युद्ध में राणा सांगा की और से लडे थे,कुछ इतिहासकार इन पर राणा सांगा से धोखे का भी आरोप लगाते हैं ,पर इसके प्रमाण पुष्ट नही हैं,सिल्ह्दी पर गुजरात के बादशाह बहादुर शाह ने 1532 इसवी में हमला किया,इस हमले में सिलहदी तंवर की पत्नी जो राणा सांगा की पुत्री थी उन्होंने 700 राजपूतानियो और अपने दो छोटे बच्चों के साथ जौहर किया और सिल्हदी तंवर अपने भाई के साथ वीरगति को प्राप्त हुए,
बाद में रायसेन को पूरनमल को दे दिया गया,कुछ वर्षो बाद 1543 इसवी में रायसेन के मुल्लाओ की शिकायत पर शेरशाह सूरी ने इसके राज्य पर हमला किया और पूरणमल की रानियों ने जौहर कर लिया और पूरणमल मारे गये इस प्रकार इस राज्य की समाप्ति हुई.
तंवरावाटी और तंवर ठिकाने ---------------
देहली में तोमरो के पतन के बाद तोमर राजपूत विभिन्न दिशाओ में फ़ैल गए। एक शाखा ने उत्तरी राजस्थान के पाटन में जाकर अपना राज स्थापित किया जो की जयपुर राज्य का एक भाग था। ये अब 'तँवरवाटी'(तोरावाटी) कहलाता है और वहाँ तँवरों के ठिकाने हैं। मुख्य ठिकाना पाटण का ही है,एक ठिकाना खेतासर भी है,इनके अलावा पोखरण में भी तंवर राजपूतो के ठिकाने हैं,बाबा रामदेव तंवर वंश से ही थे जो बहुत बड़े संत माने जाते हैं,आज भी वो पीर के रूप में पूजे जाते हैं.
मेवाड़ के सलुम्बर में भी तंवर राजपूतो के कई ठिकाने हैं जिनमे बोरज तंवरान एक ठिकाना है,
इसके अतिरिक्त हिमाचल प्रदेश में बेजा ठिकाना और कोटि जेलदारी,बीकानेर में दाउदसर ठिकाना,mandholi जागीर,भी तंवर राजपूतो के ठिकाने हैं,धौलपुर की स्थापना भी तंवर राजपूत धोलनदेव ने की थी। 18 वी सदी के आसपास अंग्रेजो ने जाटों को धौलपुर दे दिया। ये जाट गोहद से सिंधिया द्वारा विस्थापित किये गए थे और पूर्व में इनके पूर्वज राजा मानसिंह तोमर की सेवा में थे और उनके द्वारा ही इन्हें गोहद में बसाया गया था।अब भी धौलपुर में कायस्थपाड़ा तंवर राजपूतो का ठिकाना है।
तंवरवंश की शाखाएँ------
तंवर वंश की प्रमुख शाखाएँ रुनेचा,ग्वेलेरा,बेरुआर,बिल्दारिया,खाति,इन्दोरिया,जाटू,जंघहारा,सोमवाल हैं,इसके अतिरिक्त पठानिया वंश भी पांडव वंश ही माना जाता है,इसका प्रसिद्ध राज्य नूरपुर है,इसमें वजीर राम सिंह पठानिया बहुत प्रसिद्ध यौद्धा हुए हैं.जिन्होंने अंग्रेजो को नाको चने चबवा दिए थे.
इन शाखाओं में रूनेचा राजस्थान में,ग्वेलेरा चम्बल क्षेत्र में,बेरुआर यूपी बिहार सीमा पर,बिलदारिया कानपूर उन्नाव के पास,इन्दोरिया मथुरा, बुलन्दशहर,आगरा में मिलते हैं,मेरठ मुजफरनगर के सोमाल वंश भी पांडव वंश माना जाता है,जाटू तंवर राजपूतो की भिवानी हरियाणा में 1440 गाँव की रियासत थी,इस शाखा के तंवर राजपूत हरियाणा में मिलते हैं,जंघारा राजपूत यूपी के अलीगढ,बदायूं,बरेली शाहजहांपुर आदि जिलो में मिलते हैं,ये बहुत वीर यौद्धा माने जाते हैं इन्होने रुहेले पठानों को कभी चैन से नहीं बैठने दिया,और अहिरो को भगाकर अपना राज स्थापित किया...
पूर्वी उत्तर प्रदेश का जनवार राजपूत वंश भी पांडववंशी जन्मेजय का वंशज माना जाता है। इस वंश की बलरामपुर समेत कई बड़ी स्टेट पूर्वी यूपी में हैं।
इनके अतिरिक्त पाकिस्तान में मुस्लिम जंजुआ राजपूत भी पांडव वंशी कहे जाते हैं जंजुआ वंश ही शाही वंश था जिसमे जयपाल,आनंदपाल,जैसे वीर हुए जिन्होंने तुर्क महमूद गजनवी का मुकाबला बड़ी वीरता से किया था,जंजुआ राजपूत बड़े वीर होते हैं और पाकिस्तान की सेना में इनकी बडी संख्या में भर्ती होती है.इसके अलावा वहां का जर्राल वंश भी खुद को पांडव वंशी मानता है,
मराठो में भी एक वंश तंवरवंशी है जो तावरे या तावडे कहलाता है ,महादजी सिंधिया का एक सेनापति फाल्किया खुद को बड़े गर्व से तंवर वंशी मानता था.
तोमर/तंवर राजपूतो की वर्तमान आबादी-------
तोमर राजपूत वंश और इसकी सभी शाखाएँ न सिर्फ भारत बल्कि पाकिस्तान में भी बड़ी संख्या में मिलती है,चम्बल क्षेत्र में ही तोमर राजपूतो के 1400 गाँव हैं,इसके अलावा पश्चिमी उत्तर प्रदेश के पिलखुआ के पास तोमरो के 84 गाँव हैं,भिवानी में 84 गाँव जिनमे बापोड़ा प्रमुख है,,मेरठ में गढ़ रोड पर 12 गाँव जिनमे सिसोली और बढ्ला बड़े गाँव हैं,
कुरुक्षेत्र में 12 गाँव,गढ़मुक्तेश्वर में 42 गाँव हैं जिनमे भदस्याना और भैना प्रसिद्ध हैं. बुलन्दशहर में 24 गाँव,खुर्जा के पास 5 गाँव तोमर राजपूतो के हैं,हरियाणा में मेवात के नूह के पास 24 गाँव हैं जिनमे बिघवाली प्रमुख है.
ये सिर्फ वेस्ट यूपी और हरियाणा का थोडा सा ही विवरण दिया गया है,इनकी जनसँख्या का,अगर इनकी सभी प्रदेशो और पाकिस्तान में हर शाखाओ की संख्या जोड़ दी जाये तो इनके कुल गाँव की संख्या कम से कम 6000 होगी,चौहान राजपूतो के अलावा राजपूतो में शायद ही कोई वंश होगा जिसकी इतनी बड़ी संख्या हो.
जाट, गूजर और अहीर में तोमर राजपूतो से निकले गोत्र-----------
कुछ तोमर राजपूत अवनत होकर या तोमर राजपूतो के दूसरी जाती की स्त्रियों से सम्बन्ध होने से तोमर वंश जाट, गूजर और अहीर जैसी जातियो में भी चला गया।जाटों में कई गोत्र है जो अपने को तोमर राजपूतो से निकला हुआ मानते है जैसे सहरावत ,राठी ,पिलानिया, नैन, मल्लन,बेनीवाल, लाम्बा,खटगर, खरब, ढंड, भादो, खरवाल, सोखिरा,ठेनुवा,रोनिल,सकन,बेरवाल और नारू। ये लोग पहले तोमर या तंवर उपनाम नहीँ लगाते थे लेकिन इनमे से कई गोत्र अब तोमर या तंवर लगाने लगे है। उत्तर प्रदेश के बड़ौत क्षेत्र के सलखलेन् जाट भी अपने को किसी सलखलेन् का वंशज बताते है जिसे ये अनंगपाल तोमर का धेवता बताते है और इस आधार पर अपने को तोमर बताने लगे है।गूँजरो में भी तोमर राजपूतो के अवशेष मिलते है। खटाना गूजर अपने को तोमर राजपूतो से निकला हुआ मानते है। ग्वालियर के पास तोंगर गूजर मिलते है जो ग्वालियर के राजा मान सिंह तोमर की गूजरी रानी मृगनयनी के वंशज है जिन्हें गूजरी माँ की औलाद होने के कारण राजपूतों ने स्वीकार नहीँ किया। दक्षिणी दिल्ली में भी तँवर गूजरों के गाँव मिलते है। मुस्लिम शाशनकाल में जब तोमर राजपूत दिल्ली से निष्काषित होकर बाकी जगहों पर राज करने चले गए तो उनमे से कुछ ने गूजर में शादी ब्याह कर मुस्लिम शासकों के अधीन रहना स्वीकार किया।इसके अलावा सहारनपुर में छुटकन गुर्जर भी खुद को तंवर वंश से निकला मानते हैं और करनाल,पानीपत ,सोहना के पास भी कुछ गुज्जर इसी तरह तंवर सरनेम लिखने लगे हैं,हरयाणा के अहिरो में भी दयार गोत्र मिलती है जो अपने को तोमर राजपूतो से निकला हुआ मानते है।दिल्ली में रवा राजपूत समाज में भी तंवर वंश शामिल हो गया है.....
इस प्रकार हम देखते हैं कि चन्द्रवंशी पांडव वंश तोमर/तंवर राजपूतो का इतिहास बहुत शानदार रहा है,वर्तमान में भी तोमर राजपूत राजनीति,सेना,प्रशासन,में अपना दबदबा कायम किये हुए है,पूर्व थलसेनाध्यक्ष जनरल वी के सिंह भिवानी हरियाणा के तंवर राजपूत हैं,और आज केंद्र सरकार में मंत्री भी हैं,मध्य प्रदेश के नरेंद्र सिंह तोमर भी केंद्र सरकार में मंत्री हैं,प्रसिद्ध एथलीट और बाद में मशहूर बागी पान सिंह तोमर के बारे में सभी जानते ही हैं,स्वतंत्रता सेनानी रामप्रसाद बिस्मिल भी तोमर राजपूत थे,इनके अतिरिक्त सैंकड़ो राजनीतिज्ञ,प्रशासनिक अधिकारी,समाजसेवी,सैन्य अधिकारी,खिलाडी तंवर वंशी राजपूत हैं
तोमर क्षत्रिय राजपूतो के बारे में कहा गया है की
"अर्जुन के सुत सो अभिमन्यु नाम उदार.
तिन्हते उत्तम कुल भये तोमर क्षत्रिय उदार."
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रोहिला क्षत्रियों में भी तोमर तंवर वंश पांडु के वंशधर अनेक गोत्र हे दिल्ली से विस्थापित बहुत सी तोमर शाखाएं रोहिला राजपूत गोत्रों में विद्यमान है।
#जय_भवानी 🙏🚩🗡️तोमर ,तंवर,तुंवर ( पांडु वंसी चन्द्र वन्स,तुवरसू वंसी चन्द्र वन्स), राजपूतो की निम्न शाखाये रोहिले राजपूतो में है
1, जंघारा
2सोमवाल
3बटोला
4बढ़ वार
5 जाडिया
6इन्दौलिया
7कटियार/कटोच
8गोगड़
9गंगवार
10बनाफ़रे(एक यदु वन्स बनाफर अलग है)
11पठानिया
12 काठी(सूर्य वंश की निकुंभ काठी शाखा अलग है)
13 जडोलिया
14सिकरवार
15किशन लाल,कुशनवाल किशनवाल
*गद्दी*--इंद्रप्रस्थ(दिल्ली)
*ठिकाने*--बुद्धमूउ (बंदायू )रोहिलखण्ड,
दतिया,(,बुंदेलखंड)
धर्मपुर(हरदोई)
आदि
ऋषि गोत्र -गार्गेय,पराशर,मुदगल,
प्रवर -तीन
वेद--,यजुर्वेद
शाखा --वाजसनेयी
सूत्र--पारस्कर,गुह्य सूत्र
*कुलदेवी*--योगेश्वरी
निशान --हरा
देवता --शिव
नगाडा -रणगंजन
शस्त्र--खड्ग
पर्व --विजय दशमी
उद्घोष-हरर हर महादेव
उन्माद -विजय या वीर गति
पूर्वज
पुरुरवा
ययाति
पुरु
शान्तनु
:
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:
पाण्डव
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:
:क्षेमक
(ईसापूर्व 424)
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:
:
अनंगपाल प्रथम (742 ईसवी में उजड़ी दिलली को पुनः बसाया)
इनकी 16 वी पीढ़ी में सोलहवाँ अनंगपाल हुवा इसने क्वार सुदी एकादशी दिन सोमवार को लालकोट(वर्तमान लालकिला) की नींव डाली
17वां अनंगपाल उर्फ तेजपाल हुवा इन्होंने आगरे में तेज महल बनवाया(वर्तमान ताज महल)
इसी तेजपाल के दो पुत्र
महेश पाल ओर जीत पाल(अजयपाल)
थे। महेश पाल इंद्रप्रस्थ दिल्ली की गद्दी पर ही रहा ओर अजयपाल वहाँ से चल कर कठहर रोहिलखण्ड के बुद्धमऊ के राजा बुधपाल के यहां आया और अपना राज्य स्थापित कर वन्स चलाया अजय पाल के पुत्र महिपाल ने माघ सुदी पंचमी दिन मंगल वार को बुद्धमूउ बंदायू के किले की नीव रखी
इनके प्रपौत्र थे किसन सिंह उर्फ किशन सेन ओर सुख सेन 1253 ईसवी में रामपुर के राजा रणवीर सिंह रोहिला के सेनापति की हैसियत से दिल्ली सुल्तान नसीरूदीन महमूद बहराम उर्फ चंगेज की तीस हजारी सेना को धूल चटाई इनके प्रपौत्र राजा सोहन पाल देव ने करोली में ठिकाना स्थाई कर अपने दादा श्री किशन सेन उर्फ किशन सिंह के नाम पर अपने वंशजो के गोत्र को किशनलाल या किसन वाल नाम से प्रचलित किया इन्ही के वंसज बुंदेलखंड दतिया गए वहां वे किशन लाल राजपूत है ।इसी तरह रोहिलखण्ड में जिन जिन वन्स के राजपूतो ने 909 ईसवी से 1720ईसवी तक शासन किया वही है
*रोहिला राजपूत*
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