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Sunday, 29 March 2026

PANIPAT @ROHILA VEER GANGA SINGH MAHECHA RATHOD ROHILA RAJPUT AND THE BATTLE OF PANIPAT

*इतिहास के पन्नो में दर्ज है वीर गंगा सिंह महेचा राठौड़ और अन्य रोहिला राजपूतों का पराक्रम*
*पानीपत के तीसरे युद्ध में हुआ था वीर गंगा सिंह महेचा राठौड़ रोहिला राजपूत और उसकी सेना का बलिदान*

*14 जनवरी सन 1761 ईसवी दिन बुधवार मकर सक्रांति को दिया हिंदुत्व के लिए सर्वोच्च बलिदान**🤺🤺🤺🤺🎠🎠🎠🏇🏼
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*पानीपत के मैदान में समय 2बजे** *अपराह्न,जनवरी की हाड़ कंपाने वाली सर्दी,कोहरा और बिजली की गड़गड़ाहट से बारिश के भयावह मौसम में*
*1400 रोहिले राजपूत वीर गंगा सिंह उर्फ गंगा सहाय महेचा राठौड़ रोहिला राजपूत के नेतृत्व में कूद पड़े हिन्दू धर्म रक्षार्थ युद्ध भूमि पर रुहेला सरदार नजीब खान(नजीबुद्दोला) बंगस व आक्रांता अहमद शाह दुर्रानी अब्दाली के विरुद्ध लड़ रहे मराठो की ओर से* 😇😇🎠🎠🤺🤺🏇🏼🏇🏼🏇🏼 *छिड़ गया घमासान युद्ध! कट कट गिर रहे अब्दाली के सैनिक ।कट कट गिर रहे थे गद्दार रुहेले नजीब खान के रूहेले बंगस बारेच पठान*।
*परन्तु हुआ क्या, गार्दी की टॉप सामने आ गयी* *और8 मुसलमानों के चिथड़े उड़ने लगे 1400 रोहिले राजपूतो की एक टुकड़ी मुख्य सेना से बिछुड़ गयी और अफगानों ने उन्हें घेर लिया वीर राठौड़ गंगा सिंह रोहिला ऊर्फ गंगा सहाय महेचा व उनके साथी हजारो अफगानों का संहार करते हुए सांय पांच बजे वीर गति को प्राप्त हुए* ।
*मराठो की हार हुई अपनी ही तोप के सामने अपनी ही सेना आ गई थी ! उधर सदाशिव राव भाऊ के भतीजे विश्वास राव घायल होकर गिरे तो भाऊ हाथी से उतर के घोड़े पर आ गए युद्ध करने हेतु तो हाथी पर भाऊ को न देख कर सेना भागने लगी और तितर बितर हो गई ।क्या दुखद हार हुई !!जीती हुई* *पानीपत की तीसरी लड़ाई को मराठे जीत कर भी एक घण्टे में हार गए* ।
उत्तर भारत की रक्षार्थ आये मराठो का साथ अन्य राजपूतो जाटो गुज्जरों ने नही दिया क्योंकि मराठे उनसे कर वसूलते थे,और अकेले पड़े हिंदुत्व के लिए लड़े मराठो का साथ सदा शिव राव भाऊ के सेनापति के रूप में सेना में भर्ती हो वीर रोहिला गंगा सिंह महेचावत ने अपना जीवन का सर्वोच्च बलिदान देकर भी दिया ।
वीर गंगा सिंह रोहिला की रानी रामप्यारी देवी mudahad राजपूत रियासत कलायत के कपिल मुनि आश्रम में सती हुई और वही वीर रोहिला गंगा सिंह की समाधि स्थापित की गई।
इसी वंश के
*भवानी सिंह महेचा राठौड़ रोहिला राजपूत तांत्या टोपे की सेना में सेनापति थे जब झांसी की रानी को ह्यूरोज ने घायल किया तो जनरल भवानी सिंह महेचराना ने अपने 16 सेनिको के साथ रक्षा कवच तैयार कर अंग्रेजो से उनकी रक्षा करते रहे और लक्ष्मी बाई को सुरक्षित एक जंगल में कुटिया तक पहुंचाया था किंतु अंग्रेजो के हाथ नही पड़ने दिया*,
 *सन 1858 ईसवी।*

*आज भी महेचा राठौड़ रोहिला राजपूत कलायत ,अंबाला और यमुना पार कर पूरब की ओर उत्तर प्रदेश के जनपद सहारनपुर के दस गांव में आबाद है,इसी वंश के ठाकुर हरिसिंह रोहिला एक महान स्वतंत्रता सेनानी थे ,जिनकी घोड़ी छोटी ट्रेन से भी तेज दौड़ती थी। उनके वंशज आज भी गांव घाठेड़ा,सहारनपुर और करनाल में रहते है।।
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🔥 तीसरा पानीपत का युद्ध (1761) — इतिहास का सबसे खतरनाक टकराव ⚔️

14 जनवरी 1761… हरियाणा के पानीपत के मैदान में वो जंग लड़ी गई जिसने भारत की राजनीति की दिशा बदल दी।

🛡️ एक तरफ मराठा साम्राज्य — ताकत, संख्या और आत्मविश्वास
⚔️ दूसरी तरफ अहमद शाह अब्दाली — रणनीति, धैर्य और घेराबंदी

👉 शुरुआत में मराठा सेना भारी पड़ी…
👉 लेकिन रसद कट गई, घेराव हुआ, और हालात पलट गए
👉 चारों तरफ से हमला… और इतिहास का सबसे भयावह नरसंहार

💔 हजारों सैनिक मारे गए
💔 मराठा शक्ति को गहरा झटका
💔 भारत की सत्ता का संतुलन पूरी तरह बदल गया

📌 ये सिर्फ एक युद्ध नहीं था…
ये वो मोड़ था जिसने आने वाले समय में अंग्रेजों के उदय का रास्ता साफ किया

⚠️ सबक:
रणनीति > संख्या
सप्लाई लाइन > शक्ति
और एक गलती… पूरी लड़ाई पलट सकती है

🔥 इतिहास सिर्फ कहानी नहीं, चेतावनी है।

*विशेष नोट "__यहां प्रदर्शित सभी चित्र सोसल मीडिया से उद्धरत है इन पर लेखक का कोई अधिकार नहीं है ये पाठको को समझाने हेतु प्रतीकात्मक रूप से दर्शाए गए है।। ये सभी सोसल मीडिया की संपत्ति है।।

Saturday, 28 March 2026

ROHILA KINGDOM

*प्रमुख रोहिला क्षत्रिय शासक*

*1. अंगार सैन -* गांधार (वैदिक काल)
*2. अश्वकरण -* ईसा पूर्व 326 (मश्कावती दुर्ग)
*3. अजयराव -* स्यालकोट (सांकल दुर्ग) ईसा पूर्व 326
*4. प्रचेता -* मलेच्छ संहारक 
*5. शाशिगुप्त -* साइरस के समकालीन 
*6. सुभाग सैन -* मौर्य साम्राज्य के समकालीन 
*7. राजाराम शाह -* 909ईसवी रामपुर रोहिलखण्ड 
*8. बीजराज -* रोहिलखण्ड
*9. करण चन्द्र -* रोहिलखण्ड
*10. विग्रह राज -* रोहिलखण्ड - गंगापार कर स्रुघ्न जनपद (सुगनापुर) यमुना तक विस्तार दसवीं शताब्दी में सरसावा में किले का निर्माण पश्चिमी सीमा पर, यमुना द्वारा ध्वस्त टीले के रूप में नकुड़ रोड पर देखा जा सकता है।
*11. सावन्त सिंह -* रोहिलखण्ड
*12. जगमाल -* रोहिलखण्ड
*13. धिंगतराव -* रोहिलखण्ड
*14. गोंकुल सिंह -* रोहिलखण्ड
*15. महासहाय -* रोहिलखण्ड
*16. त्रिलोक चन्द -* रोहिलखण्ड
*17. रणवीर सिंह -* रोहिलखण्ड
*18. सुन्दर पाल -* रोहिलखण्ड
*19. नौरंग देव -* रोहिलखण्ड
*20. सूरत सिंह -* रोहिलखण्ड
*21. हंसकरण रहकवाल -* पृथ्वीराज के सेनापति 
*22. मिथुन देव रायकवार -* ईसम सिंह पुण्डीर के मित्र थाना भवन शासक 
*23. सहकरण, विजयराव -* उपरोक्त 
*24. राजा हतरा -* हिसार 
*25. जगत राय -* बरेली 
*26. मुकंदराज -* बरेली 1567 ई.
*27. बुधपाल -* बदायुं 
*28. महीचंद राठौर -* बदायुं
*29. बांसदेव -* बरेली 
*30. बरलदेव -* बरेली
*31. राजसिंह -* बरेली
*32. परमादित्य -* बरेली
*33. न्यादरचन्द -* बरेली
*34. राजा सहारन -* थानेश्वर 
*35. प्रताप राव खींची (चौहान वंश) -* गागरोन 
*36. राणा लक्ष्य सिंह -* सीकरी 
*37. रोहिला मालदेव -* गुजरात एवम जालोर
*38. जबर सिंह -* सोनीपत 
*39. रामदयाल महेचराना -* कलायथ
*40. गंगसहाय ,वीर गंगा सिंह महेचा राठौड़ रोहिला राजपूत -* महेचराना - क्लायथ 1761 ई.
*41. राणा प्रताप सिंह -* कौराली (गंगोह) 1095 ई.
*42. नानक चन्द -* अल्मोड़ा 
*43. राजा पूरणचन्द -* बुंदेलखंड 
*44. राजा हंस ध्वज -* हिसार व राजा हरचंद 
*45. राजा बसंतपाल -* रोहिलखण्ड व्रतुसरदार, सामंत वृतपाल 1193 ई.
*46. महान सिंह बडगूजर -* बागपत 1184 ई.
*47. राजा यशकरण -* अंधली 
*48. गुणाचन्द -* जयकरण - चरखी - दादरी 
*49. राजा मोहनपाल देव -* करोली 
*50. राजारूप सैन -* रोपड़ 
*51. राजा महीपाल पंवार -* जीन्द 
*52. राजा परपदेड पुंडीर -* लाहौर 
*53. राजा लखीराव -* स्यालकोट 
*54. राजा जाजा जी तोमर -* दिल्ली 
*55. खड़ग सिंह -* रोहिलखण्ड लौदी के समकालीन 
*56. राजा हरि सिंह -* खिज्रखां के दमन का शिकार हुआ - कुमायुं की पहाड़ियों में अज्ञातवास की शरण ली 
*57. राजा इन्द्रगिरी (रोहिलखण्ड) (इन्द्रसेन) -* सहारनपुर में प्राचीन रोहिला किला बनवाया रोहिला क्षत्रिय वंश भास्कर लेखक आर. आर. राजपूत मुरसेन अलीगढ से प्रस्तुत 
*58. राजा बुद्ध देव रोहिला -* 1787 ई., सिंधिया व जयपुर के कछवाहो के खेड़ा व तुंगा के मैदान में हुए युद्ध का प्रमुख पात्र (राय कुँवर देवेन्द्र सिंह जी राजभाट, तुंगा (राजस्थान)


तुंगा का युद्ध (जब राठौड़ों की तलवारों ने फ्रांसीसी तोपों के चीथड़े उड़ा दिए!)
इतिहास की किताबों में मराठों की ताकत बहुत गाई जाती है, लेकिन जयपुर और जोधपुर की संयुक्त सेना ने 1787 में जो किया था, वो दुनिया का सबसे खौफनाक 'कैवेलरी चार्ज' था!
*राजा बुद्धदेव रोहिला भी इस युद्ध। का प्रमुख पात्र था।*
"फ्रांसीसी तोपों के सामने नंगी तलवारें लेकर टूट पड़े थे मारवाड़ के शेर... इतिहास का सबसे खौफनाक कैवेलरी चार्ज!
1787 ई. में 'तुंगा के युद्ध' में जोधपुर के महाराजा विजय सिंह और जयपुर के महाराजा प्रताप सिंह की संयुक्त राजपूत सेना का सामना महादजी सिंधिया की विशाल मराठा फौज से हुआ।

सिंधिया की फौज के पास फ्रांस के मशहूर जनरल 'डी बोइन' द्वारा ट्रेन की गई सबसे आधुनिक तोपखाना यूनिट थी। तोपों की भयंकर गोलाबारी के बीच, मारवाड़ के राठौड़ घुड़सवारों ने मौत की परवाह किए बिना अपनी तलवारें निकालीं और सीधे तोपों के मुहाने पर अकल्पनीय 'सुसाइड चार्ज' कर दिया!

राठौड़ों की इस आंधी ने फ्रांसिसी जनरलों के होश उड़ा दिए। उन्होंने तोपचियों को वहीं काट डाला और मराठा सेना के बीचों-बीच घुसकर लाशों के ढेर लगा दिए। इस भयंकर राजपूती हमले के खौफ से महादजी सिंधिया को रातों-रात मैदान छोड़कर भागना पड़ा था!
*नोट* ..*इनके अतिरिक्त और बहुत से रोहिला शासक विभिन्न स्थानों पर हुए,जिनकी खोज जारी हैं क्योंकि क्षत्रिय इतिहास को छिपाया गया है जैसे महोबा में चंदेला से पहले रोहिला शासन था, राजस्थान के राठौड़ रोहिलखंड बंदायू से आए थे*




* दिनांक 10मई 2011 प्रकाशित.क्षत्रिय आवाज मासिक पत्रिका एवम राजपूत/क्षत्रिय वाटिका(क्षत्रिय वंशावली) 22अगस्त2012 🙏*
*जय राजपूताना*

*विशेष नोट__ये चित्र नेट द्वारा सोसल मीडिया से लिए गए केवल प्रतीकात्मक रूप है लेखक का उनसे कोई लेना देना नही है।।।
विभिन्न राजाओं के चित्र केवल प्रतीकात्मक है ये रोहिलखंड के और राजपूताना रोहिलखंड के राजा नही है।।
आभार दर्शकों का

Tuesday, 24 March 2026

SOME FACTS ABOUT ROHILA SANGTHAN

*अतीत और वर्तमान के दर्पण में थिरकते चित्र बोलते हैं, कि उनके होने का प्रमाण क्या है।।*
*1..रोहिला क्षत्रियों के विस्थापन और गदर1857 में उनके विरुद्ध शूट एट साइट का यानी देखते ही गोली मारने का आदेश जारी होने के बाद से परचून की हालत में बिखरना और ब्रिटिश काल में रोहिलखंड में अफगानों के शासन से इनकी पहचान विलुप्त होने के मुख्य कारण पाए गए* *प्रथम विश्व युद्ध के बाद रोहिला क्षत्रिय रोहिला राजपूत सरनेम से संगठित होने आरंभ हुए क्योंकि वक्त बदलता है रक्त नही*
*2..सन1930में युद्ध समाप्ति के एक दशक बाद महारानी विक्टोरिया ने जातिगत जनगणना कराई,पुरानी दिल्ली में जनगणना से समय कोई संगठन सक्रिय नही था,जो मार्ग दर्शन कर सके तो कुछ लोगो ने स्वयं को रोहिला टांक क्षत्रिय,कुछ लोगो ने टांक रोहिला क्षत्रिय लिखवाया और कार्य वही दोनो जिनका हवाला आज भी देते है दुहाई भी देते है,किंतु क्षत्रिय शब्द दोनो तरह से बताने वाले लोगो ने नही छोड़ा क्योंकि वे अपना और अपने पूर्वजों का इतिहास अभी भूले नही थे,इस जनगणना की रिपोर्ट सेंसस कमिश्नर जे एच हटशन ने ब्रिटिश हाई कमिश्नर को22दिसंबर1930, को सौंप दी जिसमे क्लियर अनुमोदित किया कि जाति के हिसाब से इन दोनो मिक्सड शब्दो के उपनाम से रोहिला टांक क्षत्रिय से टांक को अविलंब भिन्न /अलग किया जाए* *अतः सिद्ध होता है कि रोहिला क्षत्रिय उपनाम ब्रिटिश काल से प्रमाणिक है और दोनो समुदाय अलग अलग है**सामान्य क्षत्रिय केटेगरी में उल्लिखित है*
*4.1931 ईसवी में रोहिलखंड से विस्थापित होकर आए परचून की हालत में बिखरे पड़े इन क्षत्रिय परिवारों ने संगठित होने की योजना बनाई, और खुल कर सामने आ गए जबकि स्वतंत्रता के लिए देश भर में आंदोलन और संघर्ष जारी था बहुत से रोहिला राजपूत आजादी की जंग में कूद पड़े,और कही पर रोहिला क्षत्रिय और कही पर रोहिला राजपूत जाने गए ,कुछ स्थानों पर अभी अज्ञात वास जैसी ही हालत रही और पेशेगत जातियों के उपनाम को धारण कर जाने गए,उत्तर भारत में रोहिलखंड राजपूताना से विस्थापन लगभग चार सदी तक चलता रहा और 1720में पूर्णतया रोहिलखंड अफगानों के अधिकार में आ गया और वे खुद रुहेला सरदार /नवाब बन गए,इसके अतिरिक्त भारत में रोहिला क्षत्रियों की काठ ,कठ शाखा की विभिन्न नामों से लगभग69राजपूत रियासते थी जिनका उल्लेख यहां करना अप्रासंगिक है *एक संगठन रोहिला राजपूत नाम से बना जिसने इतिहास रोहिला राजपूत लिखवाए और खोज खोज कर अपने भाईयो को जोड़ा उनके गोत्रों की लिस्ट बनाई दूसरा संगठन रुहेला क्षत्रिय नाम से बना उन्होंने रुहेला क्षत्रिय जाति निर्णय नाम से इतिहास संकलित कराया* 
*5..दिल्ली में कोई संगठन आजादी से पहले नही बन पाया और भारत 1947, में आजाद हो गया* *1970 के दशक में हजारी लाल वर्मा जी जो एक पत्रिका निकालते थे और प्रेस रिपोर्ट भी बनाते थे उन्होंने टांक रोहिला क्षत्रिय नाम के संगठन बनाए जिनकी संख्या दिल्ली में आज लगभग दस है किसी का नाम रोहिला टांक सभा किसी का टांक रोहिला सभा है इनमे अन्य और पेशेगत जातियों के लोग सदस्य है किंतु 2014 तक सामान्य ही रहे यानी क्षत्रिय ही रहे सन2014, में टोंक नाम से दिल्ली में पिछड़े वर्ग में अधिसूचित हुए,रोहिला क्षत्रिय सामान्य में ही है ओबीसी नही है*
*दिल्ली के अंदर टांको के रोहिला राजपूतों के साथ रोहिला टांक महासभा नाम के संगठन होने के कारण कुछ लोगो ने वहां भी पिछड़ी का जिन्न खड़ा कर दिया है और रोहिला राजपूतों का सामान्य में रह जाना हजम नही हो रहा और रोहिला राजपूत को रुहेला जाति बता कर संख्या बढ़ाने की बात कहते हुए पिछड़ी जाति के लिए आवेदन किया गया बताया गया है ,कुछ राजनीतिक महत्वाकांक्षी लोग संख्या बल दिखा कर अपनी पैठ दिल्ली की राजनीति में बनाना चाहते है कि में इतनी पिछड़ी जातियों का सरदार हूं मुझे आम आदमी पार्टी टिकट दे दे यंत्री मनोनित कर दे ऐसे लोग रोहिला क्षत्रिय समाज के अस्तित्व के लिए घातक सिद्ध हो रहे है।अभी सर्वे हो गया बताया गया है किंतु रोहिला एक क्षत्रिय खाप है सरनेम है और सरनेम को जाति नही बनाया जा सकता,इस लिए अभी स्थिति साफ नही रोहिला क्षत्रियो का दिल्ली में क्या होगा पिछड़ी में रुहेला जाति स्वीकार करेंगे या रोहिला राजपूत बने रहेंगे*जबकि ओल्ड दिल्ली सेंसस में सेंसस कमिश्नर जे एच हटन ने अपनी रिपोर्ट दिनांक 30दिसंबर 1930में  स्पष्ट उल्लेख किया था कि रोहिला क्षत्रिय को जातीय दृष्टि से टांक छिपी दर्जी कास्ट टांक से अविलंब अलग समझा जाए।
*6..1984 में कुछ रोहिला क्षत्रिय लोगो ने डॉक्टर कर्ण वीर सिंह रोहिला चंडीगढ़ के नेतृत्व में निर्णय लिया कि विशुद्ध रोहिला क्षत्रियों का एक अलग संगठन बनाया जाय जिससे भ्रमित हो रहा यह क्षत्रिय समाज जो पेशेग्गत जातियों की दल दल में  धंसता जा रहा है उनकी भीड़ में गुम होता जा रहा है अपनी मौलिक पहचान बनाए और क्षत्रियों की मुख्य धारा की ओर चले, संगठन बन गया इतिहास लिखा गया और1989, के अक्टूबर माह की,22, तारीख को एक महाअधिवेशन बुलाया गया जिसमे इतिहास का विमोचन हो गया और मुख्य धारा के क्षत्रियों ने रोहिला क्षत्रियों को अपना अभिन्न अंग मानते हुए आवाह्न किया कि रोहिला क्षत्रियों को किन्ही अन्य पेशेगत जातियों के स्थान पर अपनी पहचान एक राजपूत/क्षत्रिय के रूप में बनानी चाहिए क्योंकि उनकी वंशावली इतिहास और भूगोल पूर्णतया जीवित है**इस संगठन का नाम रखा गया अखिल भारतीय रोहिला क्षत्रिय विकास परिषद रजिस्टर्ड*
*भारत  भ्रमण के समय डॉक्टर कर्ण वीर सिंह रोहिला जी के साथ लगभग एक सो पचास विशुद्ध रोहिला क्षत्रिय राजपूत समाज के लोगों का एक बड़ा समूह था जो बारी बारी से साथ चलते और जनजागरण करते थे।रोहिला क्षत्रिय समाज को गौरवान्वित पहचान दिलाने हेतु विचार करते थे।*
*7..अब दौर चला कि जोर शोर से प्रचार किया जाए इतिहास बताया जाए रोहिला को क्षत्रिय/राजपूत साबित करने में कोर कसर न छोड़ी जाए।। सभी रोहिला क्षत्रिय अति उत्साह से परिपूर्ण रहे और कार्य करते रहे समाज संगठित होने लगा* *1995ईसवी में हरियाणा में रोहिला क्षत्रिय को क्षत्रिय शब्द हटा कर केवल रोहिला को चार पेशेगत जातियों के साथ पिछड़े वर्ग में सात प्रतिशत के आरक्षण में अधिसूचित कराया गया इसमें जो धोखा हो गया और किसने कैसे किया यदि बखान किया जाए तो रोहिला क्षत्रिय समाज के बने हुए सभी संगठन के अध्यक्षों नेताओ की भारी भूल उजागर होगी जिससे समाज विघटित हो गया एक विजातीय राजनीतिक सामाजिक प्रतिनिधि ने रिश्तों का हवाला दिया था तथा मिलते जुलते कार्य करने वाली सभी जातियों के साथ मिलकर रोहिला क्षत्रिय समाज का भी उल्लेख क्षत्रिय राजपूत शब्द हटा के केवल रोहिल्ला उल्लिखित कराया*
*मध्य प्रदेश में एक ही विधान सभा क्षेत्र में रोहिला राजपूतों के लगभग नब्बे गांव है सभी राजपूत ठाकुर पटेल जमींदार है वे किस ई पेशेगत जाति को नही जानते और न ही वे उनसे संबंधित है राजनीति के एक लालची नेता ने रूवला रुवाला नाम की किसी जाति के साथ पिछड़े वर्ग में अधिसूचित कर दिया अपनी वोटो की संख्या बढ़ाने के लालच में हो यो गया कि कोई सामाजिक संगठन नही था किसान संगठन थे*
*8..आज समय आया इलेक्ट्रोनिक मीडिया सोसल मीडिया का और सगठन में वर्चस्व की जंग का संघ संगठन बने रोहिला क्षत्रिय समाज बिखर गया और युवा वर्ग जाग गया जो इतनी जानकारी प्राप्त कर चुका है कि स्वाभिमान से रोहिला राजपूत कहता है और मुख्य धारा में लोटना चाहता है सम्पूर्ण राजपूत क्षत्रिय समाज रोहिला क्षत्रियों को एकता के लिए पुकारता है और पूर्ण सपोर्ट करने लगा है अपने राजपूत संगठनों में लेने के लिए उतारू है रोहिला क्षत्रियों का सम्मान लोटा लाया है आज का युवा और धीरे धीरे आर्थिक हालात भी काबू में आ गए है*
*दूरस्थ गांव की हालत भी ठीक है उनकी पहचान रोहिला क्षत्रिय के नाम से बनती जा रही है युवाओं का सर्किल विस्तृत हो गया सम्मान बढ़ गया है*
*9.इस पुनरोत्थान, पुनरोत्कर्श के काल में क्षत्रिय शब्द का अकाल पड़ गया अचानक ज्ञात हुआ कि उत्तर प्रदेश में भी कुछ महत्वाकांक्षी रोहिला प्रतिनिधियों ने राजनीतिक लाभ लेने और संख्या ओबीसी की बढ़ाने के लालच में निवेदन किया था कि जिस प्रदेश में राजपूताना रोहिलखंड है वहा भी रोहिला राजपूतों को रुहेला जाति मानते हुए पिछड़े वर्ग में डाला जाए*
**10..जबकि आज उत्तर प्रदेश में तीन सो जातियों को जो पिछड़ी है सत्ताइस प्रतिशत आरक्षण नही मिलेगा, संख्याबल और कार्य के आधार पर चार श्रेणी में बांटा गया है, रुहेला जी को पिछड़ी में संभवतः दो प्रतिशत का ही लाभ मिल पाएगा, राजनीतिक लाभ हेतु सम्पूर्ण समाज के अस्तित्व को खतरे में डाल रहे चंद लोग संख्या बल बढ़ाने के लिए अन्य दस जातिगत लोगो में विलय होकर रोहिला राजपूत समाज को उन जातियों का घटक बता कर उनके साथ रुहेला रोहिला सरनेम लिख कर राजनीतिक लाभ लेने हेतु अलग संगठन उनके साथ मिल कर बना लिए है,स्वयंभू नेता बने उनके सरकार को भ्रमित कर रोहिला राजपूत समाज से भी छलावा किया जा रहा है*
*यदि तीन दशक पहले ज्ञान शून्य कुछ समाज के ठेकेदारों ने उत्तर प्रदेश में पिछड़ी के लिए आवेदन कर भी दिया था तो उनसे अधिक शिक्षित आज के ठेकेदारों को जो वर्तमान में रोहिला क्षत्रिय सगठनों के नेता है और उच्चतम शिक्षित है क्या उन्हे वर्तमान स्थिति का आकलन नहीं करना चाहिए था कि अब आर्थिक आधार पर सवर्ण आरक्षण लेने और सामान्य में पजीकृत कराने में लाभ है या पिछड़ी में जाने में, किंतु उन्हें केवल अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकनी है और निजी लाभ हेतु सम्पूर्ण रोहिला क्षत्रिय समाज के उपनाम को उपयोग में लाना है दिमागी कसरत क्यों करे* आगामी जनगणना में रोहिला क्षत्रिय का उल्लेख तभी होगा जबकि रोहिला राजपूत समाज के लोग अपनी वास्तविक पहचान लिखेंगे।
*शिक्षा आदमी को आंतरिक रूप से परफेक्ट बनाती है किंतु उच्च शिक्षित आज के नेताओ की मति भ्रष्ट हो गई और सोचने और सामाजिक पहलुओं पर अध्ययन करने की शक्ति शून्य हो गई है अथवा कोई समय नहीं लगाना चाहते और फालतू मे नेता बन गले में मालाएं डलवाते और राजपूताना पगड़ी धारण कर उसकी लाज गंवाते फिरते है समाज की कोई चिंता नहीं अपनी चमक के सामने*
*यह कार्य चंद लोगो ने अपनी मर्जी से किया बताया गया जिसमें उत्तर प्रदेश में निवास करने वाले हर आयु वर्ग के रोहिला राजपूत/,,क्षत्रिय परिवारों की कोई लिखित प्रस्तावित वार्ता रूपी सलाह सहमति नही है* 
*इस लिए सभी छ संगठनों ने जो रोहिला क्षत्रिय शब्द के साथ बने थे क्षत्रिय बोलना छोड़ दिया है ताकि पिछड़ी में आने में कोई अड़चन क्षत्रिय खुद को कहने में न आ जाए इसे कहते है आज वक्त बदलता है तो रक्त भी बदल जाता है पुरानी कहावत गलत सिद्ध हुई*
*प्रश्न*
*कृपया बताए सभी पाठक कि अचानक आई इस राजनीतिक बिसात की दूषित हवा के झोंके में सामाजिक सगठनों के राजनीतिक सगठनों में परिवर्तन को कैसे रोका जाए और किया क्या जाए या कुछ न किया जाए क्या ठीक होगा या गलत होगा*
*भावी पीढ़ी का भविष्य लिखने वाले वर्तमान नेतृत्व को क्या अधिकार है कोई* ????
*कुछ बदलते परिवेश को ध्यान में रखते हुए चंद शब्दो में अपनी राय दे क्योंकि सभी रोहिला क्षत्रिय सगठनों का नब्बे वर्षो का सफर निरर्थक होता जा रहा है जहां से आरंभ किया था वही अंत होने जा रहा है जो पहचान रोहिला राजपूत समाज की बनी थी उसे निजी लाभ हेतु धूल धूसरित किया जा रहा है सामाजिक नेता ज्ञान,स्वाभिमान शून्य होकर पिछलग्गू बन कर रोहिला क्षत्रिय समाज के साथ छलावा करने पर आमदा हो रहे है इस लिए आत्म चिंतन करते हुए रोहिला क्षत्रिय समाज के हितों की रक्षा के लिए सोचिए, कि आज ओबीसी में जाने में रोहिला क्षत्रिय समाज का कितना नुकसान हो जायेगा और कुछ अवश्य बोलिए आपकी अति कृपा होगी और भावी पीढ़ी का मार्ग दर्शन और भविष्य निर्धारण भी*
*धन्यवाद*
*निवेदक*
*हम आप और तुम

DOCTOR KARAN VEER SINGH ROHILA CHANDIGARH



लोकस्मृति में जीवित सम्राट: सिद्धराज जयसिंहदेव और सोलंकी शक्ति का उत्कर्ष-

बलवीर सिंह सोलंकी बासनी खलील -

पन्द्रह लख पखरेत, अस्सी लख पाय तुरंगा। 
साठा लाख बड़ दन्त, उपर सवार चतुरंगा ।।

पांच लाख सामन्त, तीन करोड़ सिपलानो।
चौदह लाख बाणेत, एक लाख रावत और राणा।।

घूंधालो धूजे धरा, बीस लाख बाजंत बली।
सिद्धराज जयसिंह सो, मंडे न दूजो मंडली ।।

राव बड़वा,चारण,भाट, दमामी, शुभराज आदि के मुख से राजा सिद्धराज जयसिंहदेव सोलंकी के समय की यह काव्य भी सुनने में आता रहता है जो अतिश्योक्ति से खाली नहीं पाया जाता है।

यह काव्य राजा सिद्धराज जयसिंहदेव सोलंकी के यश, शक्ति और सुशासन का गौरवपूर्ण प्रतीक है। इसमें वर्णित विशाल सेना, सामंतों की एकजुटता और युद्ध-तैयारी उस युग की संगठित प्रशासनिक व्यवस्था, सैन्य अनुशासन और राजकीय सामर्थ्य को उजागर करती है। अतिशयोक्ति होते हुए भी, यह लोककाव्य तत्कालीन समाज के मन में बसे आत्मविश्वास, सुरक्षा-बोध और राजनिष्ठा को सशक्त रूप से प्रकट करता है।

यह रचना दर्शाती है कि सिद्धराज जयसिंहदेव केवल विजेता सम्राट ही नहीं, बल्कि ऐसे शासक थे जिनके नेतृत्व में राज्य स्थिर, समृद्ध और संगठित था। सामंतों, रावतों और राणाओं की व्यापक सहभागिता उनके समावेशी नेतृत्व और प्रभावशाली राजनीतिक कौशल का प्रमाण है।

अंततः यह काव्य सोलंकी युग के वैभव, शक्ति और सांस्कृतिक चेतना का उत्सव है, जो आज भी गौरव, प्रेरणा और एकता का संदेश देता है तथा सिद्धराज जयसिंहदेव को भारतीय इतिहास में एक आदर्श और प्रभावशाली सम्राट के रूप में स्थापित करता है। 

जय सोमनाथ 🙏 🚩

इतिहास गवाह है: 1191 में पृथ्वीराज चौहान से हारने से पहले मुहम्मद गौरी 1178 B. में गुजरात की सोलंकी रानी 'नायकी देवी' से बुरी तरह हारे थे। एक विधवा रानी ने माउंट आबू की तलहटी में एक बच्चे को गोद में बैठाकर सेना का नेतृत्व किया था। यह राजपूतानी शौर्य है। "

रानी वीरांगना देवी और कायदरा के बीच युद्ध (1178 A. का इतिहास) को अक्सर स्कूल की किताबों में वह जगह नहीं मिलती जिसकी वह हकदार है।
जब मुहम्मद गौरी भारत पर हमला करने का प्लान बना रहा था, तो उसने सोचा कि विधवा रानी और एक छोटे बच्चे (मूलराज II) के साथ गुजरात एक आसान टारगेट होगा। लेकिन उसे नहीं पता था कि वह अदम्य साहस के साथ सामना करने वाला है।
1178 E. ऐतिहासिक कायदरा युद्ध
रणनीतिक जानकारी: रानी वीरांगना देवी जानती थीं कि गौरी की घुड़सवार सेना मैदानी इलाकों में भारी पड़ सकती है। इसलिए वे उसे घसीटकर माउंट आबू के नीचे गदरघट्टा (कायदरा) के पहाड़ी इलाके में ले गईं, जहाँ गौरी की सेना की ताकत कमजोर हो गई थी।
युद्ध का नेतृत्व: जैसा कि आपने बताया, रानी ने अपने छोटे बेटे को पीठ पर बांधकर युद्ध के मैदान में तलवार उठाई। उन्होंने न केवल युद्ध का नेतृत्व किया, बल्कि तुर्की सेना का बुरी तरह पीछा किया।
गौरी की शर्मनाक हार: यह हार गौरी के लिए इतनी भयानक थी कि वह अपनी जान बचाने के लिए युद्ध के मैदान से भाग गया। और अगले 13 साल तक उन्होंने गुजरात की तरफ फिर कभी नहीं देखा

,इसी सोलंकी वंश में जन्मे डॉक्टर कर्ण वीर सिंह रोहिला, बर्नवाल,संपूर्ण जीवन परिचय छपा है उनके चित्र के साथ ब्लॉग में उपलब्ध है।

💬⚔️🚩 *महसूस कीजिए कि डॉक्टर कर्णवीर सिंह रोहिला जी की पुण्य आत्मा आपके साथ खड़ी है और अपने जीवंत विचारो को फलीभूत कराने में आपका साथ दे रही है*
*उनका सपना यही था कि विस्थापित होते होते परचून की हालत में बिखरे इस राजपूत समुदाय को उसकी खोई हुई पहचान रोहिला क्षत्रिय के रूप में तभी मिलेगी जब भावी पीढ़ी को अन्य रोजगार मिलेंगे और विपत्ति काल में जीवन यापन के लिए किए गए कार्य बदल जायेंगे,इसके लिए शिक्षा और रोजगार आवश्यक होगा और रोहिला राजपूत क्षत्रिय महाराजा के प्रतीक बिम्ब बनेंगे और उनका प्रचार होगा इतिहास पुनः दोहराएगा तो रोहिला राजपूत समाज का स्वरूप बदलता चला जायेगा*
*आज रोहिला क्षत्रिय समाज के साथ कुछ वैसा ही आप लोग करते जा रहे हैं प्रशिक्षण संस्थान भी है लगभग चार हजार रोहिला क्षत्रिय लड़के स्वरोजगार,सरकारी गैर सरकारी सर्विस से जरिए, अनेको प्रकार से जीवन यापन और परिवार का पालन पोषण कर रहे है और उन परिवारों के रोजगार भी बदलते जा रहे हैं ,रोहिला राजपूत इतिहास को सोशल मीडिया पर राजपूत सिरदारो ने इतना प्रचार किया के कोई भी अछूता नहीं रहा,रोहिला राजपूत समाज को उसका खोया गौरव मिलता जा रहा है*
*मुझे याद है,उनके विचारों से प्रभावित होकर उनके बड़े भाई सहारनपुर में अति प्रतिष्ठित एडवोकेट चौधरी ओम प्रकाश रोहिला जी ने भटनागर धर्म शाला जनक नगर में दिनांक १२ अगस्त १९८८ को कहा था कि जब तक कोई स्थान रुहेला क्षत्रिय  समाज को नही मिलता, कही मंदिर नही बनता ,कोई तीर्थ स्थान नही मिलता जिसके बारे में दूसरे लोग भी जाने कि यह है रुहेलदेव का मंदिर राजा का स्मारक ,जैसे कश्मीर में सुना गया है रोहिल् देव  मंदिर, तब तक आप को पहचान वापस मिलना कठिन कार्य है क्योंकि आपकी मानसिक शक्ति दम तोड चुकी है,कुछ न कुछ बनाओ चाहे एक मंदिर सहारनपुर में रुहेलदेव का ही बना दो जिसे लोग रोजाना देखे मंदिर रूहेलदेव का है*

*उनकी भाषा में जो उन्होंने कहा था तो उनके छोटे भाई डॉक्टर साहब कर्णवीर सिंह  भी सुनते रहे और मन ही मन मुस्कराते रहे*

*मैने तभी बोला था फोटो फाइल में लगा है ,""कि रोहिला राजपूत है"" और उनके पूर्वजों के बलिदानों के कारण आज आप इस तरह की बैठक कर रहे है अन्यथा सजदा करते फिरते क्यों न उन्ही मे से किसी एक वीर राजा महाराजा सनातन रक्षक विधर्मी संहारक का मंदिर बनवा लो,उस समय इतना ही ज्ञान था मुझे*यहीं पर पुनः दिनांक 28/12/1988को प्रथम जनपद सहारनपुर का सम्मेलन हुआ तो मैने पुनः कहा कि इतिहास गौरव शाली तो होगा किंतु रोहिला राजपूत है तो राजाओं से पहचान बनेगी इस लिए मंदिर के स्थान पर संरक्षित सती स्मारक या किसी प्रसिद्ध रोहिला क्षत्रिय राजपूत राजा का प्रतिमा सहित प्रामाणिक वंशावली के साथ भव्य स्मारक बनवाया जाए। उस समय रोहिला क्षत्रिय राजपूत क्रमबद्ध इतिहास नहीं मिला था कुछ घर पड़ी हुई पुरानी किताबों में रोहिलखंड के रोहिला आल्हा  खंड काव्य में पढ़ा तो बहुत संतुष्टि हुई थी। दिनांक 28/12/1988 का वह वक्तव्य मेरा लगभग तीस मिनट तक का होगा चित्र फाइल में उपलब्ध होना चाहिए ।प्रथम जिला सम्मेलन में भारी भीड़ थी ।ठाकुर रामगोपाल सिंह रोहिला मुजफ्फर नगर वालो ने बहुत ऐतिहासिक जानकारी दी तथा भव्य महासम्मेलन कराए जाने की भूमिका बनी।
*डॉक्टर साहब बोले थे-बेटा जी आपकी  भावनाएं और सपने तभी पूरे होंगे जब आप इस संगठन से जुड़े रह कर चलोगे और अपनी भावनाओं ,इच्छाओं की पूर्ति में लगे रहोगे यह ऐसा प्लेट फार्म बनेगा जिस पर बैठ कर रोहिला राजपूत समाज गर्व की अनुभूति अवश्य करेगा*

*उनके आशीर्वाद से आज आपके महाराजा रणवीर सिंह रोहिला राजपूत की जन्म जयंती राज घरानों में राजा" भींडर" मेवाड़ रणधीर सिंह भींडर महाराज अपने महल में मनाते है,कुल दीप सिंह रोहिला हरियाणा जटौली वाले का प्रयास रंग लाता है-अनेक राजपूत हस्तियां, कुंवर अजय सिंह राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा,कुंवर राजेंद्र सिंह जी नरूका सेवा निवृत कर्नल राष्ट्रीय अध्यक्ष राष्ट्रीय क्षत्रिय ज्योति मिशन,क्षत्रिय शिरोमणि अदम्य साहसी चौहान की अस्थियों को हजार साल बाद गुलामी की बेडियो से आतंकियों के चंगुल से लाने वाले भाई शेर सिंह राणा जी संस्थापक राजपा, ओकेंद्र राणा फ्रॉम हरियाणा युवाओं के दिलो की धड़कन,दादा महिपाल सिंह मकराना अध्यक्ष श्री राजपूत करणी सेना, दिवंगत हुए दादा सुखदेव सिंह गोगा महेड़ी ठाकुर पूर्ण सिंह  ,कुंवर अजय सिंह राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा रजिस्टर्ड, अभय प्रताप सिंह राणा, जय वीर सिंह राणा श्री राष्ट्रीय राजपूत करणी सेना सहारनपुर अध्यक्ष श्री नीरज चौहान आदि जिनके नाम विश्व विख्यात है सोशल मीडिया पर इनके करोड़ों फोलोवर्स है वे रोहिला राजपूत वीर क्षत्रिय सम्राट महाराजा रणवीर सिंह जी का गुणगान करते है जन्म जयंती पूरे विश्व में मनवाते है,भाई शेर सिंह राणाजी अपने साथी भाई कुलदीप सिंह रोहिला और दादा नरेंद्र सिंह चौहान को साथ लाकर महान वीर विधर्मी विनाशक सनातन रक्षक राजपूत रोहिलखंड सम्राट रणवीर सिंह रोहिला के चित्र पर पूजा करके माल्यार्पण कर रहे है*

*उन्होंने प्राचीन रोहिला किला अपनी टीम के साथ देखा और बोला गंगा से भी पवित्र रोहिलखंड की अपने पूर्वजों के रक्त से रंजित उनके खून और हड्डियों से लतपथ धरती में तुझे आज प्रणाम करता हूं तेरी भूमि की माटी हल्दी घाटी की माटी सी पवित्र है,रोहिलखंड के रामपुर को सर जमीन राजा रणवीर सिंह रोहिला के जन्म से एक राजपूत तीर्थ बन गई है*
*क्या यह किसी चमत्कार से कम नजर आता है??????*

*ऐसे ही सहारनपुर के रामपुर (भांकला गांव) की धरती राजपूताना परंपरा संचालित करने वाले डॉक्टर कर्णवीर सिंह रोहिला के जन्म से पवित्र हुई उन्होंने यहां के एक समृद्ध किसान परिवार सोलंकी बरनवाल रोहिला राजपूत समाज में श्री सुगन सिंह रोहिला जी के घर छ: जून उन्नीस सो छत्तीस(06 जून 1936ईस्वी) को जन्म लिया था और अपने व्यवहार और कार्य से इस राजपूत रोहिला परिवार (भांकला)की भूमि को प्रतिष्ठित करने और राजपूत रोहिला खाप को सम्मान दिलाने में अपना जीवन सत्रह मार्च २००० को होली के दिन समाप्त कर दिया था, समाज के कार्यों में इतने खो गए थे कि राष्ट्र पति श्री शंकर दयाल शर्मा जी के फेमिली चिकित्सक होते हुए भी अपनी परवाह करने को समय नही निकाल पाए और अपना जीवन बलिदान कर दिया,ऐसे गांव(  रामपुर) को मेरा कोटि कोटि प्रणाम जिसने रोहिला राजपूतों में अपनी संस्कृति का संचार करने के लिए ऐसे महान राजपूत सोलंकी बरनवाल रोहिला डॉक्टर कर्णवीर सिंह जी को इस समाज में जन्म देकर पुनरोद्धार और उत्कर्ष की राह दिखाई*
उनकी अभिलाषा  और सपने साकार हो रहे हैं ,पुण्य आत्माए आकार ले रही है,इतिहास पुनः अपना गौरव प्राप्त करता जा रहा है,आज आपके रोहिला राजपूत समाज के साथ भारत का सभी राजपूत समाज कंधे से कंधा मिलाए खड़ा है दादा राजेंद्र सिंह परिहार राष्ट्रीय अध्यक्ष क्षत्रिय अस्तित्व न्याय मोर्चा,रोहिला राजपूत इतिहास संरक्षण में लगे है रोहिला राजपूत युवाओं को जोड़ रहे हैं जागृति चरमोत्कर्ष पर है वो दिन दूर नही रोहिलखंड के राजपूतों का इतिहास स्कूल सेलेब्स में पढ़ाए जायेगा रोहिला क्षत्रिय भी अन्य क्षत्रिय राजपूतों की तरह ही सामान्य जाति की सूची में उल्लिखित कराया जाएगा भारत का संपूर्ण राजपूत समाज आ गया मैदान में रोहिला राजपूतों के सम्मान में*
*एक यही तो है ,यही है आशीर्वाद डॉक्टर करण वीर सिंह रोहिला जी की  पुण्य आत्मा के द्वारा दी जाती रही प्रेरणा का*
*आज एक रुहेल देव (,रोहिला राजपूत लोक देव ,सूर्य वंशी क्षत्रिय महाराजा रणवीर सिंह रोहिला) का मंदिर भी बना है क्षत्रिय सम्राट महाराजा रणवीर सिंह रोहिला चौक ,एक भव्य स्मारक,विश्व में सहारनपुर की शान एतिहासिक राष्ट्रीय धरोहर प्राचीन रोहिला किला के सामने स्थित चौक का नाम है ,आज महाराजा रणवीर सिंह रोहिला चौक ,क्या यह किसी भव्य मंदिर से कम है,सचमुच यही जीवित खड़ा दृष्टव्य रोहिला क्षत्रिय  पवित्र धाम????*
*उनके विचारों और उनके संगठन अखिल भारतीय रोहिला क्षत्रिय विकास परिषद में निष्ठा रखिए आपके सभी कार्य पूर्ण होंगे*
*आज राष्ट्र की राजधानी दिल्ली रोहिणी क्षेत्र में युवा साथी जय प्रकाश रोहिला जी के प्रयास से एक पार्क का नाम भी महान वीर राजपूत सम्राट रणवीर सिंह रोहिला जी के नाम से है,रोहिला क्षत्रिय चौक भी नागलोई में है,और सबसे पहले इस क्षेत्र में बड़ौत नगर में रोहिला राजपूत समाज की ओर से श्री अनूप सिंह रोहिला जी ने कराया था श्री मति सरला मालिक तत्कालीन नगर पालिका चेयर मैन के द्वारा एक मार्ग का नाम राजा रणवीर सिंह रोहिला मार्ग आज उनके पति विधायक के पी मालिक राज्य मंत्री जी भी हमारा साथ देते है ,और प्रेरित करते है कि जहाँ भी उनकी अवश्यकता हो वे खड़े होंगे और महाराजा रणवीर सिंह रोहिला जी के नाम पर नामकरण कराएंगे*
सहारनपुर प्राचीन रोहिला किला जो रोहिला राजाओं द्वारा निर्मित है,जिसमें आज जिला कारागार ब्रिटिश राज से प्रचलित है किंतु 18नवंबर सन 1920ईस्वी को ही अंग्रेजी शासन में जिसे भारतीय पुरातत्व विभाग के संरक्षण में दिया हुआ है,जो आज एक राष्ट्रीय धरोहर है,के सामने स्थित महाराजा रणवीर सिंह रोहिला चौक पर  लगाए गए  शिला लेखों का अनावरण कुंवर बृजेश सिंह राज्य मंत्री लोक निर्माण विभाग उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा किया जाता है,सिडको चेयरमैंन श्री वाई पी सिंह जैसे दिग्गज क्षत्रिय नेता एवं राजनीतिज्ञ इस चौक पर उपस्थिति दर्ज कराते तथा क्षत्रिय सम्राट महाराजा रणवीर सिंह रोहिला जी की भव्य प्रतिमा की अपने काफिले के साथ परिक्रमा करते है,क्या यह क्षत्रिय एकता अखंडता को बनाए रखने की एक परम्परा जो रोहिला क्षत्रिय समाज में डॉक्टर कर्ण वीर सिंह राणा द्वारा संचालित की गई थी उसका जीवित दर्शन नहीं है?

*डॉक्टर कर्णवीर सिंह रोहिला जी के ""हमे चाहिए स्वाभिमान""के उद्घोष को ध्यान में रखा वर्तमान न्यू जेनरेशन ने,जिस प्रेरणा के कारण आज युवक युवतियां प्रत्येक क्षेत्र में दर्शनीय भागीदारी कर अपना कैरियर बनाने में जुटे है,। अभिनय ,खेल , क्रिकेट कुश्ती,चिकित्सा ,मॉडलिंग एथलीट, बॉक्सिंग,गायन शिक्षा उच्च तम आई आई टी , सी पी एम टी, एन डी ए,आई ए एस,पी सी एस,भारतीय थल,जल तथा वायु सेना ,अंतरिक्ष आदि में अपना और परिवार तथा रोहिला राजपूत समाज का नाम बिना किसी आरक्षण सुविधा  के गौरवान्वित किया है अनेकों सुपुत्रीयो बेटियों ने आई ए एस पी सी एस जैसे भारत की सर्वोच्च परीक्षा उत्तीर्ण कर अच्छी रैंक प्राप्त की है तथा राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय स्तर से उच्चतम शिक्षा प्राप्त की है मंत्रालयों में गैजेटेड कलाश प्रथम अधिकारी विराजमान है विश्व स्तरीय डॉक्टर्स हे  विदेशों में विख्यात है,  यह किसी सार्थक प्रयास उनकी प्रेरणा  के  श्रोत से उत्पन जिज्ञासाएं प्रतीत नहीं होती ।इसी प्रकार रोहिला क्षत्रिय  युवा शक्ति को  उनके बताए रास्ते पर ही होगा*
रोहिला औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान में भव्य पुस्तकालय  है डिजिटल लाइब्रेरी बनाई गई  है जिससे लाभान्वित होकर  छात्र छात्राएं  आधुनिक शिक्षा प्राप्त करेंगे।
उनके सुपुत्र डॉक्टर शालीन सिंह रोहिला जी ने  रोहिला क्षत्रिय समाज के उत्थान हेतु अनेक कार्य किए,आज वे भी पितृ स्थान पर ही पहुंच चुके है किंतु उनकी धर्मपत्नी डॉक्टर इंद्र जीत सिंह कौर आज भी चिकित्सा के क्षेत्र में उनके आशीर्वाद से ऊंचे आयाम पर है और दिन रात समाज सेवा को निस्वार्थ भाव से करती है,यह है डॉक्टर कर्णवीर सिंह रोहिला जी आत्मा को स्वयं के साथ महसूस करना और आशीर्वाद लेना।।
*सनातन धर्म की रक्षा के लिए उत्तर भारत का अकेला राजपूत वीर गंगा सिंह महेचा राठौड़ रोहिला राजपूत को कलायत (कैथल) के mudahad राजपुतो को साथ लेकर दुर्रानी अब्दाली ,रुहेला नजीब खान से भिड़ गया था और मराठा सेनापति के रूप में वीर गति पाई थी उन्ही की स्मृति में अंबाहेटा नकूड तिराहे पर वीर गंगा सिंह महेचा राठौड़ रोहिला राजपूत का स्मारक और उनकी रानी राम प्यारी देवी की सती समाधि बन कर तैयार किए जाने के प्रस्ताव आ रहे है,राजपूत स्मार्स्को को संरक्षित किया जा रहा है*
उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में क्षत्रिय सम्राट महाराजा रणवीर सिंह रोहिला चौक का प्रस्ताव ,विचाराधीन है,वहां के महापौर ने पूरा आश्वासन दिया है, विश्व प्रसिद्ध नगर रूड़की में भी गंगनहर पर एक घाट तथा एक चौक का नामकरण क्षत्रिय सम्राट महाराजा रणवीर सिंह रोहिला के नाम पर किए जाने की पूरी संभावना है,वहां की युवा शक्ति पूरी लगन के साथ प्रयास कर रही है।
*तीर्थ नगरी हरिद्वार में उत्तराखंड में एक घाट जहा उनकी अस्थियां प्रवाहित हुई थी उस घाट का नाम होगा महाराजा रणवीर सिंह रोहिला घाट* चौक की स्थापना आदि ये सभी सोच और कार्य सम्पादन ही उनकी अभिलाषा थी जिसे आप सभी उनके द्वारा  संस्थापित, अखिल भारतीय रोहिला क्षत्रिय विकास परिषद रजिस्टर्ड,1988 ईस्वी संबद्ध अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा रजिस्टर्ड 1897ईस्वी के सानिध्य में ही बड़ी आशा के साथ पूर्ण करेंगे ।।। 

*#सोलंकी_वंश_वीर_योद्धाओ_का_इतिहास*

*👉 दद्दा चालुक्य पहले राजपूत योद्धा थे जिन्होंने गजनवी को सोमनाथ मंदिर लूटने से रोका था।*

👉 भीमदेव द्वितीय ने मोहम्मद गोरी की सेना को 2 बार बुरी तरह से हराया और मोहम्मद गोरी को दो साल तक गुजरात के कैद खाने में रखा और बाद में छोड़ दिया जिसकी वजह से मोहम्मद गोरी ने तीसरी बार गुजरात की तरफ आँख उठाना तो दूर जुबान पर नाम तक नहीं लिया ।

👉 सोलंकी सिद्धराज जयसिंह इनके बारे में तो जितना कहे कम है 56 वर्ष तक गुजरात पर राज किया सिंधदेश, मध्यप्रदेश, राजस्थान का कुछ भाग, सोराष्ट्र, तक इनका राज्य था सबसे बड़ी बात तो यह है की यह किसी अफगान, और मुग़ल से युद्ध भूमि में हारे नहीं बल्कि उनको धुल चटा देते थे सिद्धराज जयसिंह और कुमारपाल ने व्यापार के नए-नए तरीके खोजे जिससे गुजरात और राजस्थान की आर्थिक स्थितिया सुधर गयी गरीबो को काम मिलने लगा और सब को काम की वजह से उनके घर की स्थितियां सुधर गयी।

👉 पुलकेशी महाराष्ट्रा, कर्नाटक, आँध्रप्रदेश तक इनका राज्य था इनके समय भारत में ना तो मुग़ल आये थे और ना अफगान थे उस समय राजपूत राजा आपस में लड़ाई करते थे अपना राज्य बढ़ाने के लिए।

👉 किल्हनदेव सोलंकी ( टोडा-टोंक ) इन्होने दिल्ली पर हमला कर बादशाह की सारी बेगमो को उठाकर टोंक के नीच जाति के लोगो में बाट दिया क्यूंकि दिल्ली का सुलतान बेगुनाह हिन्दुओ को मारकर उनकी बीवी, बेटियों, बहुओ को उठाकर ले जाता था इनका राज्य टोंक, धर्मराज, दही, इंदौर, मालवा तक फैला हुआ था।

👉 मांडलगढ़ के बल्लू दादा ने अकेले ही अकबर के दो खास ख्वाजा अब्दुलमाजिद और असरफ खान की सेना का डट कर मुकाबला किया और मौत के घाट उतार दिया हल्दीघाटी में महाराणा प्रताप के साथ युद्ध में काम आये बल्लू दादा के बाद उनके पुत्र नंदराय ने मांडलगढ़ – मेवाड की कमान अपने हाथों में ली इन्होने मांडलगढ़ की बहुत अच्छी तरह देखभाल की लेकिन इनके समय महाराणा प्रताप जंगलो में जिवन गुजार रहे थे और अकबर ने मान सिंह के साथ मिलकर मांडलगढ़ पर हमला कर दिया और सभी सोलंकियों ने उनका मुकाबला किया और लड़ते हुए वीरगति प्राप्त की।

👉 वच्छराज सोलंकी इन्होने गौ हथ्यारो को अकेले ही बिना सैन्य बल के लड़ते हुए धड काटने के बाद भी 32 किलोमीटर तक लड़ते हुए गए अपने घोड़े पर और गाय चोरो को एक भी गाय नहीं ले जने दी और सब को मौत के घात उतार कर अंत में वीरगति को प्राप्त हो गए जिसकी वजह से आज भी गुजरात की जनता इनकी पूजती है और राधनपुर-पालनपुर में इनका एक मंदिर भी बनाया हुआ है।

👉 भीमदेव प्रथम जब 10-11 वर्ष के थे तब इन्होने अपने तीरे अंदाज का नमूना महमूद गजनवी को कम उमर में ही दिखा दिया था महमूद गजनवी को कोई घायल नहीं कर पाया लेकिन इन्होने दद्दा चालुक्य की भतीजी शोभना चालुक्य (शोभा) के साथ मिलकर महमूद गजनवी को घायल कर दिया और वापस गजनी-अफगानिस्तान जाने पर विवश कर दिया जिसके कारण गजनवी को सोमनाथ मंदिर लूटने का विचार बदलकर वापस अफगानिस्तान जाना पड़ा।

👉 कुमारपाल इन्होने जैन धर्म की स्थापना की और जैनों का साथ दिया गुजरात और राजस्थान के व्यापारियों को इन्होने व्यापार करने के नए – नए तरीके बताये और वो तरीके राजस्थान के राजाओ को भी बेहद पसंद आये और इससे दोनों राज्यों की शक्ति और मनोबल और बढ़ गया और गुजरात, राजस्थान की जनता को काम मिलने लगे जिससे उनके घरो का गुजारा होने लगा।

👉 राव सुरतान के समय मांडू सुल्तान ने टोडा पर अधिकार कर लिया तब बदनोर – मेवाड की जागीर मिली राणा रायमल उस समय मेवाड के उतराधिकारी थे राव सुरतान की बेटी ने शर्त रखी मैं उसी राजपूत से शादी करुँगी जो मुझे मेरी जन्म भूमि टोडा दिलाएगा।
तब राणा रायमल के बेटे राणा पृथ्वीराज ने उनका साथ दिया पृथ्वीराज बहुत बहादूर था और जोशीला बहुत ज्यादा था चित्तोड़ के राणा पृथ्वीराज, राव सुरतान सिंह और राजकुमारी तारा बाई ने टोडा-टोंक पर हमला किया और मांडू सुलतान को तारा बाई ने मौत के घाट उतार दिया और टोडा पर फिर से सोलंकियों का राज्य कायम किया।

👉 तारा बाई बहुत बहादूर थी उसने अपने वचन के मुताबिक राणा पृथ्वीराज से विवाह किया ऐसी सोलंकिनी राजकुमारी को सत सत नमन यहाँ पर मान सिंह और अकबर खुद आया था युद्ध करने और पूरे टोडा को 1 लाख मुगलों ने चारो और से गैर लिया सोलंकी सैनिको ने भी अकबर की सेना का सामना किया और अकबर के बहुत से सैनिको को मार गिराया और अंत में सब ने लड़ते हुए वीरगति पाई।

जय राजपूताना जय मां भवानी क्षत्रिय धर्म युगे युगे।

*रोहिला क्षत्रिय शिरोमणि डॉक्टर कर्ण वीर सिंह रोहिला जी जी की 91वी जयंती 06/06/ 2026दिन रविवार को एक युवा जनचेतना महोत्सव के रूप में मनाई जाएगी हर वर्ष उनकी जयंती छ जून को स्वाभिमान दिवस के रूप में मनाई जाती है।

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डॉक्टर कर्ण वीर सिंह रोहिला अमर रहे।
 राजमाता रामकुमारी देवी अमर रहे।
डॉक्टर शालीन सिंह रोहिला अमर रहे।
डॉक्टर इंद्र जीत सिंह कौर जिंदाबाद।
जय जय भवानी,जय कालिका चामुण्डा माता,
*जय जय मां शाकंभरी*
जय राजपूताना रोहिलखंड,बुंदेलखंड,
*जय जय राजपूताना*
*क्षत्रिय एकता जिंदाबाद*
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 SAMAY SINGH PUNDIR



          

Monday, 23 March 2026

सहारनपुर , का नाम क्षत्रिय राजा सहारण वीर सिंह के नाम पर प्रचलित हुआ । SAHARANPUR NAGAR NAME

THE HISTORY OF THE NAME OF  SAHARANPUR 

एक विचारणीय प्रश्न 

*सहारनपुर के नामकरण को प्रमाणिकता देने के लिए त्रिलोचंदी बैंस राजपूतों का एक ऐतिहासिक लेख प्रस्तुत है,जिसके अनुसार सहारनपुर को बसाने नाम सहारनपुर देने वाले विस्तार देने वाले क्षत्रिय ही थे सूर्य वंशी बैंस राजपूतों के वंशधर त्रिलोक बैंस के वंश त्रिलोकचंदी बैंस सहारण वीर सिंह (सहारन एक क्षत्रिय सूर्य वंशी राजपूतों का गोत्र है)//सहारन वीर सिंह जिन्होंने बाद में जैन धर्म स्वीकार किया ,व्यापार किया तथा नगर की भव्य स्थापना कर विस्तार किया एक नव निर्माण किया इन क्षत्रियों ने आज वैश्य जैन त्रिलोकचंदी सहारनपुर में विराजमान है जिनका संगठन आज भी राजा त्रिलोक चंद बैंस की याद ताज़ा कराता है*
*पुर तथा खंड शब्द हिंदी संस्कृत प्राकृत भाषा में है,जिन शब्दों का प्रयोग वैदिक कालीन क्षत्रिय सभ्यता स्थापत्य से ही किया जाता रहा यही सनातन परंपरा है,जैसे भरत खंड,आदि और पुर का अर्थ नगर स्थापित करने से होता है*
*इसी कारण पुर अन्त्यांतक शब्द सनातन है और क्षत्रिय संस्कृति है जैसे सहारण से सहारनपुर ,शाह हारून के साथ पुर नहीं जोड़ा जा सकता किसी भी भाषा या व्याकरण की दृष्टि से( यह तुष्टिकरित मनघड़ंत और कुर्ताकिक लगता है)अब*
*पूरा लेख ध्यान पूर्वक पढ़ें जिससे सहारनपुर के नामकरण में फैला भ्रम दूर हो जाएगा*
*सहारन गोत्र क्षत्रिय गोत्र भी है जो सूर्य वंश की शाखा है,सहारण गोत्र बैंस वंशी क्षत्रियों में भी है*
*सहारन गोत्र रोहिलखंड के रोहिला राजपूतों व अन्य क्षत्रियों में भी पाया जाता है*
*त्रिलोक चंद बैंस क्षत्रिय के वंशज ही जैन धर्म स्वीकार करने के बाद त्रिलोकचंदी जैन कहे गए*
*जानिए ऐतिहासिक प्रमाण*

मित्रों आज हम आपको मध्य और पूर्वी उत्तर प्रदेश के बहुत सशक्त राजपूत वंश बैस क्षत्रियों के बारे में जानकारी देंगे, कृपया शेयर जरूर करें। 

बैस राजपूतो के गोत्र,प्रवर,आदि -

*वंश-बैंस सूर्यवंशी क्षत्रिय कुल है।हालाँकि कुछ विद्वान इन्हें नागवंशी भी बताते हैं।*

गोत्र-भारद्वाज है
प्रवर-तीन है : भारद्वाज ; बार्हस्पत्य और अंगिरस
वेद-यजुर्वेद 
कुलदेवी-कालिका माता
इष्ट देव-शिव जी 
ध्वज-आसमानी और नाग चिन्ह 
वंश नाम उचारण---
BAIS RAJPUT
Bhais Rajput
Bhains Rajput
Bhainse Rajput
Bains Rajput
Bens Rajput
Bhens Rajput
Bhense Rajput
Baise Rajput
Bes Rajput
Bayas Rajput
Vais Rajput

प्रसिद्ध बैस व्यक्तित्व---

शालिवाहन,हर्षवर्धन,त्रिलोकचंद,सुहेलदेव,अभयचंद,
राणा बेनीमाधवबख्श सिंह,मेजर ध्यानचंद आदि 

शाखाएँ---

कोट बहार बैस,कठ बैस,डोडिया बैस,त्रिलोकचंदी(राव,राजा,नैथम,सैनवासी) बैस,प्रतिष्ठानपुरी बैस,रावत,कुम्भी,नरवरिया,भाले सुल्तान,चंदोसिया,आदि

प्राचीन एवं वर्तमान राज्य और ठिकाने---

प्रतिष्ठानपुरी,स्यालकोट,स्थानेश्वर, मुंगीपट्टम्म,कन्नौज,बैसवाडा, कस्मांदा, बसन्तपुर, खजूरगाँव थालराई ,कुर्रिसुदौली, देवगांव,मुरारमउ, गौंडा, थानगाँव,कटधर आदि 

परम्पराएँ---

*बैस राजपूत नागो को नहीं मारते* हैं,नागपूजा का इनके लिए विशेष महत्व है,इनमे ज्येष्ठ भ्राता को टिकायत कहा जाता था,और सम्पत्ति का बड़ा हिस्सा आजादी से पहले तक उसे ही मिलता था। मुख्य गढ़ी में टिकायत परिवार ही रहता था और शेष भाई अलग किला/मकान बनाकर रहते थे। बैस राजपूतो में आपसी भाईचारा बहुत ज्यादा होता है। बिहार के सोनपुर का पशु मेला बैस राजपूतों ने ही प्रारम्भ किया था।

वर्तमान निवास---

यूपी के अवध में स्थित बैसवाडा, मैनपुरी, एटा, बदायूं, कानपूर,इलाहबाद,बनारस,आजमगढ़,बलिया,बाँदा, हमीरपुर,प्रतापगढ़,सीतापुर,रायबरेली,उन्नाव,लखनऊ,हरदोई,फतेहपुर,गोरखपुर,बस्ती,मिर्जापुर,गाजीपुर,गोंडा,बहराइच,बाराबंकी,बिहार,पंजाब,पाक अधिकृत कश्मीर,पाकिस्तान में बड़ी आबादी है और मध्य प्रदेश और राजस्थान के कुछ हिस्सों में भी थोड़ी आबादी है।

-बैस क्षत्रियों कि उत्पत्ति---

बैस राजपूतों कि उतपत्ति के बारे में कई मत प्रचलित हैं---

1-ठाकुर ईश्वर सिंह मढ़ाड कृत राजपूत वंशावली के पृष्ठ संख्या 112-114 के अनुसार सूर्यवंशी राजा वासु जो बसाति जनपद के राजा थे, उनके वंशज बैस राजपूत कहलाते हैं। बसाति जनपद का अस्तित्व महाभारत काल तक रहा है।

2-देवी सिंह मंडावा कृत राजपूत शाखाओं का इतिहास के पृष्ठ संख्या 67-74 के अनुसार वैशाली से निकास के कारण ही यह वंश वैस या बैस या वैश कहलाया,इनके अनुसार बैस सूर्यवंशी हैं। इनके किसी पूर्वज ने किसी नागवंशी राजा कि सहायता से उन्नति कि,इसीलिए बैस राजपूत नाग पूजा करते हैं और इनका चिन्ह भी नाग है। 

3-महाकवि बाणभट ने सम्राट हर्षवर्धन जो कि बैस क्षत्रिय थे उनकी बहन राज्यश्री और कन्नौज के मौखरी(मखवान,झाला) वंशी महाराजा गृहवर्मा के विवाह को सूर्य और चन्द्र वंश का मिलन बताया है,मौखरी चंद्रवंशी थे अत: बैस सूर्यवंशी सिद्ध होते हैं।

*4-महान इतिहासकार गौरिशंकर ओझा जी कृत राजपूताने का इतिहास के पृष्ठ संख्या 154-162 में भी बैस राजपूतों को सूर्यवंशी सिद्ध किया गया है*।

5-श्री रघुनाथ सिंह कालीपहाड़ी कृत क्षत्रिय राजवंश के अनुसार भी बैस सूर्यवंशी क्षत्रिय हैं।

6-डा देवीलाल पालीवाल कि कर्नल जेम्स टॉड कृत राजपूत जातियों का इतिहास के प्रष्ठ संख्या 182 के अनुसार भी बैस सूर्यवंशी क्षत्रिय हैं।

7-ठाकुर बहादुर सिंह बीदासर कृत क्षत्रिय वंशावली एवं जाति भास्कर में बैस वंश को स्पष्ट सूर्यवंशी बताया गया है।

8-इनके झंडे में नाग का चिन्ह होने के कारण कई विद्वान इन्हें *नागवंशी मानते हैं*। लक्ष्मण को शेषनाग का अवतार भी माना जाता है,*अत: कुछ विद्वान बैस राजपूतो को लक्ष्मण का वंशज और नागवंशी मानते हैं।* कुछ विद्वानों के अनुसार भरत के पुत्र तक्ष से तक्षक नागवंश चला जिसने तक्षिला कि स्थापना की,बाद में *तक्षक नाग के वंशज* वैशाली आये और उन्ही से बैस राजपूत शाखा प्रारम्भ हुई।

*9-कुछ विद्वानों के अनुसार बैस राजपूतों के आदि पुरुष शालिवाहन के पुत्र का नाम सुन्दरभान या वयस कुमार था जिससे यह वंश वैस या बैस कहलाया,जिन्होंने सहारनपुर कि स्थापना की।*

10-कुछ विद्वानों के अनुसार गौतम राजा धीर सिंह पुंडीर ने 12 वी सदी के अंत में राजा अभयचन्द्र को 22 परगने दहेज़ में दिए इन बाईस परगनों के कारण यह वंश बाईसा या बैस कहलाने लगा।

11-कुछ विद्वान इन्हें गौतमी पुत्र शातकर्णी जिन्हें शालिवाहन भी कहा जाता है उनका वंशज मानते हैं, वहीं कुछ के अनुसार बैस शब्द का अर्थ है वो क्षत्रिय जिन्होंने बहुत सारी भूमि अपने अधिकार में ले ली हो।

----बैस वंश कि उत्पत्ति के सभी मतों का विश्लेष्ण एवं निष्कर्ष----

*बैस राजपूत नाग कि पूजा करते हैं* और इनके झंडे में नाग चिन्ह होने का यह अर्थ नहीं है कि *बैस नागवंशी हैं*। महाकवि बाणभट ने सम्राट हर्षवर्धन जो कि बैस क्षत्रिय थे उनकी बहन राज्यश्री और कन्नौज के मौखरी(मखवान,झाला) वंशी महाराजा गृहवर्मा के विवाह को सूर्य और चन्द्र वंश का मिलन बताया है,मौखरी चंद्रवंशी थे अत: बैस सूर्यवंशी सिद्ध होते हैं।

लक्ष्मण जी को शेषनाग का अवतार माना जाता है किन्तु लक्ष्मन जी नागवंशी नहीं रघुवंशी ही थे और उनके वंशज आज के प्रतिहार(परिहार) और मल्ल राजपूत है।

जिन विद्वानों ने 12 वी सदी में धीर सिंह पुंडीर को अर्गल का गौतमवंशी राजा लिख दिया और उनके द्वारा दहेज में अभयचन्द्र को 22 परगने दहेज़ में देने से बैस नामकरण होने का अनुमान किया है वो बिलकुल गलत है,क्योंकि धीरपुंडीर गौतम वंशी नहीं पुंडीर क्षत्रिय थे जो उस समय हरिद्वार के राजा थे,बाणभट और चीनी यात्री ह्वेंस्वांग ने सातवी सदी में सम्राट हर्ष को स्पष्ट रूप से बैस या वैश वंशी कहा है तो 12 वी सदी में बैस वंशनाम कि उतपत्ति का सवाल ही नहीं है,किन्तु यहाँ एक प्रश्न उठता है कि *अगर बैस वंश कि मान्यताओं के अनुसार शालिवाहन के वंशज वयस कुमार या सुंदरभान सहारनपुर आये थे तो उनके वंशज कहाँ गए?*

*बैस वंश कि एक शाखा त्रिलोकचंदी है और सहारनपुर के वैश्य जैन समुदाय कि भी एक शाखा त्रिलोकचंदी है इन्ही जैनियो के एक व्यक्ति राजा साहरनवीर सिंह ने अकबर के समय सहारनपुर नगर बसाया था*,आज के सहारनपुर,हरिद्वार का क्षेत्र उस समय हरिद्वार के पुंडीर शासको के नियन्त्रण में था तो हो सकता है शालिवाहन के जो वंशज इस क्षेत्र में आये होंगे उन्हें राजा धीर पुंडीर ने दहेज़ में सहारनपुर के कुछ परगने दिए हों और बाद में ये *त्रिलोकचंदी बैस राजपूत ही जैन धर्म ग्रहण करके व्यापारी हो जाने के कारण वैश्य बन गए हों और इन्ही त्रिलोकचंदी जैनियों के वंशज राजा साहरनवीर ने अकबर के समय सहारनपुर नगर कि स्थापना कि हो, और बाद में इन सभी मान्यताओं में घालमेल हो गया हो।* अर्गल के गौतम राजा अलग थे उन्होंने वर्तमान बैसवारे का इलाका हर्षवर्धन के वंशज बैस वंशी राजा अभयचन्द्र को दहेज़ में दिया था।

गौतमी पुत्र शातकर्णी को कुछ विद्वान बैस वंशावली के शालिवाहन से जोड़ते हैं किन्तु नासिक शिलालेख में गौतमी पुत्र श्री शातकर्णी को एक ब्राह्मण (अद्वितिय ब्राह्मण) तथा खतिय-दप-मान-मदन अर्थात क्षत्रियों का मान मर्दन करने वाला आदि उपाधियों से सुशेभित किया है। इसी शिलालेख के लेखक ने गौतमीपुत्र की तुलना परशुराम से की है। साथ ही दात्रीशतपुतलिका में भी शालीवाहनों को मिश्रित ब्राह्मण जाति तथा नागजाति से उत्पन्न माना गया है।अत:गौतमीपुत्र शातकर्णी अथवा शालिवाहन को बैस वंशी शालिवाहन से जोड़ना उचित प्रतीत नहीं होता क्योंकि बैसवंशी सूर्यवंशी क्षत्रिय हैं।

उपरोक्त सभी मतो का अधयन्न करने पर हमारा निष्कर्ष है कि बैस राजपूत सूर्यवंशी हैं। प्राचीन काल में सूर्यवंशी इक्ष्वाकु वंशी राजा विशाल ने वैशाली राज्य कि स्थापना कि थी,विशाल का एक पुत्र लिच्छवी था यहीं से सुर्यवंश कि लिच्छवी, शाक्य(गौतम), मोरिय(मौर्य), कुशवाहा(कछवाहा) ,बैस शाखाएँ अलग हुई।

जब मगध के राजा ने वैशाली पर अधिकार कर लिया और मगध में शूद्र नन्दवंश का शासन स्थापित हो गया और उसने क्षत्रियों पर जुल्म करने शुरू कर दिए तो वैशाली से सूर्यवंशी क्षत्रिय पंजाब,तक्षिला,महाराष्ट्र,स्थानेश्वर,दिल्ली आदि में आ बसे। दिल्ली क्षेत्र पर भी कुछ समय बैस वंशियों ने शासन किया और एक शाखा पंजाब में भी आ बसी। इन्होंने पंजाब में एक नगर श्री कंठ पर अधिकार किया, जिसका नाम आगे चलकर थानेश्वर हुआ।

*दिल्ली क्षेत्र थानेश्वर के नजदीक है अत:दिल्ली शाखा,थानेश्वर शाखा,सहारनपुर शाखा का आपस में जरुर सम्बन्ध होगा।*
*(एक किंवदंती तथा क्षत्रिय वंश भास्कर के अनुसार थानेश्वर के सहारण तक्षक वंशी राजा पर फिरोज तुगलक ने भारी सेना लेकर आक्रमण किया तथा,जबरदस्ती राजा स्थानेश्वर सहारन की बहिन का अपहरण कर राजा को इस्लाम ग्रहण कराया तथा घोड़े के पीछे बांध कर ले भागा रास्ते में बस्तियों को रौंदता हुआ यमुनापार कर रोहिलखंड की ओर बढ़ा तथा श्रुघ्न जनपद में बहते बाबा हरनंद(आज की हिंडन नदी) के जंगलों की दलदल में फैंक दिया, और आक्रमणकारी गंगापार करने को हरिद्वार की तरफ चला गया राजा दुख सहन नहीं कर सका वह सूफी संत बन गया तथा सूंघनानपुर के जंगल में ही रहा)*

*बैसवंशी सम्राट हर्षवर्धन अपनी राजधानी थानेश्वर से हटाकर कन्नौज ले गए।* हर्षवर्धन ने अपने राज्य का विस्तार बंगाल,असम,पंजाब,राजपूताने,मालवा,नेपाल तक किया और स्वयं राजपुत्र शिलादित्य कि उपाधि धारण की।

हर्षवर्द्धन के पश्चात् इस वंश का शासन समाप्त हो गया और इनके वंशज कन्नौज से आगे बढकर अवध तथा रोहिलखंड के क्षेत्र में फ़ैल गए। *इन्ही में आगे चलकर त्रिलोकचंद नाम के प्रसिद्ध व्यक्ति हुए इनसे बैस वंश कि कई शाखाएँ चली।* इनके बड़े पुत्र बिडारदेव के वंशज भालेसुल्तान वंश के बैस हुए जिन्होंने सुल्तानपुर कि स्थापना की। इन्ही बिडारदेव के वंशज राजा सुहेलदेव हुए जिन्होंने महमूद गजनवी के भतीजे सैय्यद सलार मसूद गाजी को बहराइच के युद्ध में उसकी सेना सहित मौत के घाट उतार दिया था और खुद भी शहीद हो गए थे।

चंदावर के युद्ध में हर्षवर्धन के वंशज केशवदेव भी जयचंद के साथ युद्ध लड़ते हुए शहीद हो गए, बाद में उनके वंशज अभयचंद ने अर्गल के गौतम राजा कि पत्नी को तुर्कों से बचाया जिसके कारण गौतम राजा ने अभयचंद से अपनी पुत्री का विवाह कर उसे 1440 गाँव दहेज़ में दे दिए जिसमें विद्रोही भर जाति का दमन कर अभयचंद ने बैस राज्य कि नीव रखी जिसे आज बैसवाड़ा या बैसवारा कहा जाता है। इस प्रकार सूर्यवंशी बैस राजपूत आर्यावृत के एक बड़े भू भाग में फ़ैल गए।

----बैसवंशी राजपूतों का सम्राट हर्षवर्धन से पूर्व का इतिहास

बैस राजपूत मानते हैं कि उनका राज्य पहले मुर्गीपाटन पर था और जब इस पर शत्रु ने अधिकार कर लिया तो ये प्रतिष्ठानपुर आ गए,वहां इस वंश में राजा शालिवाहन हुए,जिन्होंने विक्रमादित्य को हराया और शक सम्वत इन्होने ही चलाया,कुछ ने गौतमी पुत्र शातकर्णी को शालिवाहन मानकर उन्हें बैस वंशावली का शालिवाहन बताया है,और पैठण को प्रतिष्ठानपुर बताया और कुछ ने स्यालकोट को प्रतिष्ठानपुर बताया है, किन्तु यह मत सही प्रतीत नहीं होते। कई वंशो बाद के इतिहास में यह गलतियाँ कि गई कि उसी नाम के किसी प्रसिद्ध व्यक्ति को यह सम्मान देने लग गए,शालिवाहन नाम के इतिहास में कई अलग अलग वंशो में प्रसिद्ध व्यक्ति हुए हैं। भाटी वंश में भी शालिवाहन हुए हैं और सातवाहन वंशी गौतमीपुत्र शातकर्णी को भी शालिवाहन कहा जाता था।

विक्रमादित्य के विक्रम सम्वत और शालिवाहन के शक सम्वत में पूरे 135 वर्ष का फासला है अत:ये दोनों समकालीन नहीं हो सकते। दक्षिण के गौतमीपुत्र शातकर्णी को नासिक शिलालेख में स्पष्ट:ब्राह्मण लिखा है अत:इसका सूर्यवंशी बैस वंश से सम्बन्ध होना संभव नहीं है।
वस्तुत: बैस इतिहास का प्रतिष्ठानपुर न तो दक्षिण का पैठण है और न ही पंजाब का स्यालकोट है यह प्रतिष्ठानपुर इलाहबाद(प्रयाग) के निकट और झूंसी के पास था। 

किन्तु इतना अवश्य है कि बैस वंश में शालिवाहन नाम के एक प्रसिद्ध राजा अवश्य हुए जिन्होंने प्रतिष्ठानपूरी में एक बड़ा बैस राज्य स्थापित किया। शालिवाहन कई राज्यों को जीतकर उनकी कन्याओं को अपने महल में ले आये,जिससे उनकी पहली तीन क्षत्राणी रानियाँ खिन्न होकर अपने पिता के घर चली गयी। इन तीन रानियों के वंशज बाद में भी बैस कहलाते रहे और बाद कि रानियों के वंशज कठबैस कहलाये, ये प्रतिष्ठानपुर(प्रयाग)के शासक थे।

इन्ही शालिवाहन के वंशज त्रिलोकचंद बैस ने दिल्ली(उस समय कुछ और नाम होगा) पर अधिकार कर लिया। स्वामी दयानंद सरस्वती के अनुसार दिल्ली पर सन 404 ईस्वी में राजा मुलखचंद उर्फ़ त्रिलोकचंद प्रथम ने विक्रमपाल को हराकर शासन स्थापित किया। इसके बाद विक्र्मचन्द, कर्तिकचंद, रामचंद्र, अधरचन्द्र, कल्याणचन्द्र, भीमचंद्र, बोधचन्द्र, गोविन्दचन्द्र और प्रेमो देवी ने दो सो से अधिक वर्ष तक शासन किया। वस्तुत ये दिल्ली के बैस शासक स्वतंत्र न होकर गुप्त वंश और बाद में हर्षवर्धन बैस के सामंत के रूप में यहाँ पर होंगे। इसके बाद यह वंश दिल्ली से समाप्त हो गया,और सातवी सदी के बाद में पांडववंशी अर्जुनायन तंवर क्षत्रियों(अनंगपाल प्रथम) ने प्राचीन इन्द्रप्रस्थ के स्थान पर दिल्ली कि स्थापना की।

वस्तुत:बैसवारा ही बैस राज्य था।(देवी सिंह मंडावा कृत राजपूत शाखाओं का इतिहास पृष्ठ संख्या 70,एवं ईश्वर सिंह मढ़ाड कृत राजपूत वंशावली पृष्ठ संख्या 113,114)

---बैस वंश कि शाखाएँ---

कोट बाहर बैस---शालिवाहन कि जो रानियाँ अपने पीहर चली गयी उनकी संतान कोट बाहर बैस कहलाती है।
कठ बैस---शालिवाहन कि जो जीती हुई रानियाँ बाद में महल में आई उनकी संतान कोट बैस या कठ बैस कहलाती हैं।
डोडिया बैस---डोडिया खेडा में रहने के कारण राज्य हल्दौर जिला बिजनौर। 
त्रिलोकचंदी बैस---त्रिलोकचंद के वंशज इनकी चार उपशाखाएँ हैं राव,राजा,नैथम,सैनवासी।
प्रतिष्ठानपुरी बैस---प्रतिष्ठानपुर में रहने के कारण।
चंदोसिया---ठाकुर उदय बुधसिंह बैस्वाड़े से सुल्तानपुर के चंदोर में बसे थे उनकी संतान चंदोसिया बैस कहलाती है।

रावत--फतेहपुर,उन्नाव में 
भाले सुल्तान--ये भाले से लड़ने में माहिर थे। मसूद गाजी को मारने वाले सुहेलदेव बैस संभवत: इसी वंश के थे,रायबरेली,लखनऊ,उन्नाव में मिलते हैँ।
कुम्भी एवं नरवरिया--बैसवारा में मिलते हैं।

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--बैसवंशी राजपूतो कि वर्तमान स्थिति---

*बैस राजपूत वंश वर्तमान में भी बहुत ससक्त वंश माना जाता है। ब्रिटिश गजेटियर में भी इस वंश कि सम्पन्नता और कुलीनता के बारे में विस्तार से लिखा गया है।* अवध,पूर्वी उत्तरप्रदेश के बैसवारा में बहुत से बड़े जमीदार बैस वंश से थे। बैस वंशी राणा बेनीमाधव सिंह, रामबक्श सिंह और दूसरे बैस जमीदारों ने सन 1857 इसवी में अवध क्षेत्र में अंग्रेजो से जमकर लोहा लिया था। विद्रोही सिपाहियो में सबसे बड़ी संख्या अवध के बैसवाड़े की ही थी। बैस राजपूतों द्वारा अंग्रेजो का जोरदार विरोध करने के बावजूद अंग्रेजो कि हिम्मत इनकी जमिदारियां खत्म करने कि नहीं हुई। बैस राजपूत अपने इलाको के सरताज माने जाते हैं और सबसे महंगे सलीकेदार वस्त्र धारण करने से इनकी अलग ही पहचान हो जाती थी। अंग्रेजी ज़माने से ही इनके पक्के ऊँचे आवास इनकी अलग पहचान कराते थे,इनके बारे में अंग्रेजो ने लिखा है कि- 

"The Bais Rajput became so rich at a time it is recorded that each Bais Rajput held Lakhs (Hundreds of thousands) of rupees a piece which could buy them nearly anything. To hold this amount of money you would have to have been extremely rich.
This wealth caused the Bais Rajput to become the "best dressed and housed people"[22] in the areas they resided. This had an influence on the areas of Baiswara and beyond as recorded the whole area between Baiswara and Fyzabad was"

जमीदारी के अतिरिक्त बैस राजपूत राजनीती और व्यापार के क्षेत्र में भी कीर्तिमान बना रहे हैं। कई बड़े व्यापारी और राजनेता भारत और पाकिस्तान में बैस बंश से हैं जो विदेशो में भी व्यापार कर रहे हैं। राजनीती और व्यापार के अतिरिक्त खेलो कि दुनियां में मेजर ध्यानचंद जैसे महान हॉकी खिलाडी,उनके भाई कैप्टन रूप सिंह आदि बड़े खिलाडी बैस वंश में पैदा हुए हैं। कई प्रशासनिक अधिकारी,सैन्य अधिकारी बैस वंश का नाम रोशन कर रहे हैं। 

वस्तुत: जिस सूर्यवंशी बैस वंश में शालिवाहन,हर्षवर्धन,त्रिलोकचंद,सुहेलदेव,अभयचंद, राणा बेनीमाधवबख्श सिंह,मेजर ध्यानचंद आदि महान व्यक्तित्व हुए हैं उन्ही के वंशज भारत,पाकिस्तान,पाक अधिकृत कश्मीर,कनाडा,यूरोप में बसा हुआ बैस राजपूत वंश आज भी पूरे परिश्रम,योग्यता से अपनी सम्पन्नता और प्रभुत्व समाज में कायम किये हुए है और अपने पूर्वजो कि गौरवशाली परम्परा का पालन कर रहा है।
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*"सरलता" परम सौंदर्य है।* 
*"सत्यता" अनमोल संस्कार है।*
*"क्षमा" परम बल है।*
*"विनम्रता" सर्वोच्च गुण है और*
*"अपनापन" सर्वोत्तम संबंध है।*


*🙏 महाराज अग्रसेन जी ने नाग देवता को “मामा” क्यों कहा? 🐍*
*यह प्रसंग श्रद्धा, लोक-परंपरा और सम्मान से जुड़ा हुआ है।*
*मान्यता के अनुसार कथा —*
*महाराज अग्रसेन जी के वंश की* *कुलदेवी नागवंशी परंपरा से जुड़ी मानी जाती हैं।*
*नाग देवता को रक्षक, कुलदेव और मार्गदर्शक के रूप में पूजा जाता था।*
*भारतीय परंपरा में— 👉 माता पक्ष के देवता या रक्षक को “मामा” कहा जाता है*

*महाराजा अग्रसेन का विवाह रानी माधवी से हुआ था।*
*इस विवाह से जुड़े कुछ प्रमुख और रोचक तथ्य यहाँ दिए गए हैं:*
*नागवंश और सूर्यवंश का मिलन: रानी माधवी नागराज कुमुद की कन्या थीं। महाराजा अग्रसेन सूर्यवंशी क्षत्रिय थे* *और रानी* *माधवी नागवंशी थीं। इस विवाह को दो अलग-अलग कुलों और संस्कृतियों के मिलन के रूप में देखा जाता है।*

*👉 जो सदा संरक्षण और आशीर्वाद देता है*
*इसी कारण महाराज अग्रसेन जी ने*
*🐍 नाग देवता को आदरपूर्वक “मामा” कहा*
*त्रिलोकचंदी जैन*

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Thursday, 19 March 2026

ROHILA RAJPUT GOTRA OF RATHOD VANSH (*रोहिला राजपूतों में राठौड़ वंश की १४ शाखाएं)*

राठौड़ वन्स की 14 शाखाये रोहिले राजपूतो में है
1 धांधल
2महेचा/महेचराना

3 बन्दरिया
4 डंगरथ,डंगरोल
5 जोलिये जोलु जालान
6 बांकुटे
7रतानोट
8थाती
9कपोलिया
10खोखर
11अखनोरिया
12मसानिया
13बिसूथ
14 लोह मढ़े
लोहे के कवच धरि
थे84 सरदार जो कन्नौज पतन के बाद रोहिलखण्ड में रणवीर सिंह की सेना में आ गए थे उनको लखमीर भी कहते थे जो एक लाख का सेना नायक होता था
इसलिए यह गोत्र लखमरा भी कहलाता है
14वी शाखा
प्रवर है सौनिक
ऋषि है अंगिरा
वेद है यजुर्वेद
उपवेद धनुर
शाखा कौथुमी
सूत्र कात्यायन
शिखा है दाहिनी
कुलदेवी है पंखिनी
राजेश्वरी और नाग्निचा, नागणायीचा 
धर्म है वैष्णव
झंडा है पंचरंगा
नगाड़ा रणजीत
गद्दी है कन्नौज
पदवी
रणबांका


कर्नाटक से राजस्थान का सफ़र (साउथ की देवी)
क्या आप जानते हैं कि राठौड़ों की कुलदेवी असल में साउथ इंडिया से आई थीं?
"राठौड़ों की रक्षक साउथ से आई थीं!
राठौड़ों की कुलदेवी 'नागनेची माता' की मूर्ति असल में कर्नाटक (कोंकण) की थी, जहाँ उन्हें 'चक्रेश्वरी' कहा जाता था।
राठौड़ राजा राव धुहड़ उन्हें 13वीं सदी में वहाँ से लाए थे।
शर्त थी 'रास्ते में पीछे मुड़कर मत देखना'।
पचपदरा के पास नागाणा गाँव में राजा ने पीछे मुड़कर देखा और मूर्ति ज़मीन में गिर गई।
तब से इस जगह को 'नागाणा धाम' कहा जाने लगा।

नागणेची माता का इतिहास क्या है?

नागणेची माता का इतिहास बहुत ही रोचक है। वह राठौड़ राजपूतों की कुलदेवी हैं और उनकी उत्पत्ति दक्षिण भारत से हुई थी। कहा जाता है कि उन्हें मूल रूप से कर्नाटक में 'चक्रेश्वरी' के नाम से जाना जाता था।

एक कथा के अनुसार, 13वीं सदी में राठौड़ राजा राव धूहड़ ने उन्हें कर्नाटक से राजस्थान लाया था। इस यात्रा के दौरान, उन्हें एक शर्त का पालन करना था कि वह पीछे मुड़कर नहीं देखेंगे। लेकिन जब वह पचपदरा के पास नागाणा गाँव में पहुँचे, तो उन्होंने पीछे मुड़कर देख लिया, जिससे माता की मूर्ति वहीं जमीन में धंस गई। तब से यह स्थान 'नागाणा धाम' के नाम से जाना जाता है।

नागणेची माता की पूजा राठौड़ राजपूतों द्वारा बड़े आदर और श्रद्धा के साथ की जाती है, और उनकी कृपा और रक्षा की कामना की जाती है।

भाखरवाला गांव में मिले धांधल राठौड़ रोहिला राजपूतों के दुर्लभ शिलालेख







ध्वस्त होती कलात्मक छतरियों की सुध लेने वाला नहीं
इतिहास की कई नई जानकारियां
जोधपुर.
जोधपुर से 15 किलोमीटर दूर भाखरवाला गांव में धांधल राठौड़ों के दुर्लभ शिलालेख मिले हैं। लावारिस पड़े ऐतिहासिक शिलालेखों के आधार पर शोध किया जाए तो जोधपुर से जुड़े इतिहास की कई नई जानकारियां सामने आ सकती है।
 
राजस्थानी शोध संस्थान के अधिकारी व शोधकर्ता डॉ. विक्रमसिंह भाटी के अनुसार पूर्व में धांधल राठौड़ों के प्रमुख ठिकानों में से एक इस गांव को रोयला या रोहिला के नाम से जाना जाता था। यहां धांधल सूरतसिंह, धांधल महेशदास, धांधल केसरीसिंह की भव्य कलात्मक छतरियां और देवली भी है। सूरतसिंह की भव्य, कलात्मक छतरी ध्वस्त होने के कगार पर है। लेकिन पुरातत्व या पर्यटन विभाग की ओर से किसी ने सुध नहीं ली है।
 
सूरतसिंह के पुत्र महेशदास की 20 खम्भों की छतरी में लगे शिलालेख के अनुसार छतरी निर्माण में पांच हजार एक रुपए की लागत आई थी। धांधल केसरीसिंह की छतरी जोधपुर के तत्कालीन शासक मानसिंह के कालखण्ड से ही है। उनका नाम विश्वास पात्र सेनानायकों में अव्वल था। उस समय के एतिहासिक ग्रंथों में इनका नाम पांच प्रमुख मुसाहीबों के तौर पर दर्ज है। कविराजा बांकीदास ने कई डिंगल गीतों में इन्हें ‘पाल रौ पौतरौ’ अर्थात् ‘पाबूजी का पोता’ और धांधल वंश का सूर्य बताया है।
छतरियों की देवलियां संगमरमर से और गुम्बज ईंटों से बने हैं। कुछ छतरियां 10 खम्भों की हैं। डॉ. भाटी के अनुसार धांधल राठौड़ों का इतिहास गरिमामयी रहा। तत्कालीन जोधपुर राज्य की सेवा में रहते हुए ये प्रधान, मुसाहीब, किलेदार, कोतवाल, रसोड़े और सुतरखाने के दरोगा जैसे महत्वपूर्ण पदों पर रहे।
 
मारवाड़ के तत्कालीन शासक अभयसिंह के समय धांधल सूरतसिंह को रोहिला का पट्टा मिला था। इन्हें केलावा खुर्द, भादराजून परगने के काकरिया, लोरोली और विरामा गांव भी ईनाम में मिले थे। लावारिस पड़े ऐतिहासिक शिलालेखों के आधार पर शोध किया जाए तो जोधपुर से जुड़े इतिहास की कई नई जानकारियां सामने आ सकती है।
इस ठिकाने के सभी धांधल राठौड़ रोहिला राजपूत कहलाए
🚩 "मेरा सिर बिक चुका है, विधवा होना है तो शादी कर लो!": लोक देवता पाबूजी राठौर की अमर गाथा🚩
जय पाबूजी! 🙏

📜 इतिहास पर एक नज़र:

मैं भाद्रपद महीने में एक बारात जा रहा था। यह वीरों की बारात थी जिसने शादी से पहले बताया - 'मेरा सिर बिक चुका है, विधवा होना है तो शादी कर लो!'

ढोली गा रहा था:

🎶 धरती तुम संभागानि, (थारै) इंद्र जेहदो भारत।

कंचुवा पांव, बादल छाए।

सूखे रेगिस्तान में खुशी की झरना बह रहा था, लेकिन किसे पता था कि सेहरा और कलंगी से सजा दूल्हा एक दिन लोगों का पूजनीय देवता बन जाएगा? किसे पता था कि फेरों के बीच कर्तव्य की पुकार उस सजी हुई सभा को बलिदान के युद्ध के मैदान में बदल देगी?

 🔥 वादे और बलिदान:

जिस समय विवाह के मंगल गीत गूंज रहे थे, उसी समय एक चारणी (देवल चारणी) मुझे याद दिलाने आई कि - "राही! तुम्हारे विवाह की तैयारियां कहीं और हो रही हैं... आसमान की गहराइयों में स्वर्ग की अप्सराएं वरमाला लेकर खड़ी हैं।"

और उस वीर 'पाबू' ने सुहागरात के बंधन को ठोकर मारते हुए गठबंधन की गांठ खोली और चौथे फेरे से पहले ही गाय की रक्षा के लिए चल पड़े। भागीरथ की जिद और भीष्म के वादे की तरह कठोर होकर अनंत की गहराइयों में विलीन हो गए।

🐎 केशर कालवी और अधूरी शादी:

इतिहास गवाह है कि जिसने अग्नि के पूरे चक्कर भी नहीं लगाए, वही दुल्हन (सोढ़ी रानी) हाथ में नारियल लेकर अपने स्वर्गीय पति के पास चल पड़ी।

आज भी राजस्थान का कण-कण पाबूजी की बहादुरी को याद करता है। पद और पहाड़ों में उनकी तारीफ़ है - कि पाबू भी क्षत्रिय थे!

📌 ऐतिहासिक तथ्य (गर्व करने वाले तथ्य):

🔸 लेखक: स्वर्गीय श्री तन सिंह (किताब: "बदलते नज़ारे")
🔸 केशर कालवी: पाबूजी की वफ़ादार घोड़ी जिसने इतिहास बदल दिया।
🔸 परंपरा: पाबूजी महाराज ने गायों की रक्षा के लिए फेरों के बीच से उठकर बलिदान दिया था। उनकी याद में आज भी राजपूत समुदाय में शादियों में सिर्फ़ चार फेरे लिए जाते हैं।

🙏 जय जय धांधल पाबू जी राठौड़

आइए जानते हैं राठौड़ों में साफा पहनने का रिवाज कैसे शुरू हुआ - 👇

मारवाड़ के राठौड़ 13वीं सदी में इस रेगिस्तान में आए थे। इतिहासकारों के मुताबिक, राठौड़ उत्तर प्रदेश के बदायूं से मारवाड़ आए थे। पहले आदमी राव सिहाजी थे जिन्होंने मारवाड़ के पाली इलाके पर कब्ज़ा करके राठौड़ सत्ता कायम की। आगे चलकर उनके वंशजों ने खेड़ और मंडोर पर राज किया, वे मारवाड़ के सरदार बने।

राठौड़ मरू प्रदेश के नहीं थे, इसलिए उनकी वेशभूषा यहां के माहौल के हिसाब से नहीं थी, लेकिन यहां आने के बाद कई रिवाज और कई रीति-रिवाज बने, जिनके पीछे पहले हुई कई घटनाएं थीं। इन घटनाओं ने नई परंपराओं को जन्म दिया जो आज एक पहचान बन गई हैं।

इतिहास में एक बहुत ही दिलचस्प घटना है जिसकी वजह से राठौड़ों ने साफा (पगड़ी) पहनना शुरू किया। इसके बारे में बहुत कम जानकारी होने की वजह से लोग इसे नहीं जानते।

राव सिहाजी के छह वंशज राव जलांसीजी हुए। वे बहादुर और हिम्मत वाले थे। 14वीं सदी में उनके राज में एक ऐसी घटना हुई, जिससे उन्हें उमरकोट के सोढो पर हमला करना पड़ा। इस जंग में राव जलांसीजी ने सोढो की साफा (पगड़ी) छीन ली।

उन दिनों साफा का बहुत महत्व था। अगर सिर से पगड़ी गिर जाए या दुश्मन के पैरों में पगड़ी गिर जाए, तो समझो वे हार गए। यह साफा आन-बान और शान का प्रतीक था।

राठोड़ों के पास साफा जीत का निशान होता था, इसलिए वे इसे जीत के प्रतीक के तौर पर अपने सिर पर धारण करते थे और इस तरह राठोड़ों ने उसी दिन से साफा बांधना शुरू कर दिया।

जब मैं मुगलों के संपर्क में आया, तो पगड़ी और साफे के कुछ पैच बदल गए जो ट्रेंड में आ गए लेकिन साफा हमेशा ट्रेंड में रहता है। जंग खास तौर पर साफा बांधी जाती थी। आगे चलकर इसी साफे को बांधने के लिए कई पैच (स्टाइल) बनाए गए जैसे जोधपुरी, जिसके पीछे चुरंगा होता है, गोल साफा आदि।

मारवाड़ का जोधपुरी साफा पूरी दुनिया में मशहूर है। मारवाड़ से निकले सभी राठौड़ बीकानेर, किशनगढ़, सीतामऊ, रतलाम, झाबुआ, इडर वगैरह सभी राज्यों में ट्रेंड कर रहे हैं और कुछ बदलावों के साथ यह साफ-सफाई से बंधा हुआ है।

फैशन चाहे जितना बदल जाए, लेकिन इस मारवाड़ की साफ-सफाई आज भी अपने पैच के लिए मशहूर है। इसका क्रेडिट मारवाड़ के मौजूदा नरेश महाराजा गजसिंहजी को जाता है, जिनका नाम गजशाही साफ-सफाई बहुत मशहूर है।

महाराजा साहिब की प्रेरणा से मालाणी राधाधर के बेटे स्वर्गीय डॉ. महेंद्रसिंहजी नागर साहिब, जो मेहरानगढ़ के पूर्व डायरेक्टर थे, ने राजस्थान की पगड़ियों पर रिसर्च करके एक बहुत ही महत्वपूर्ण किताब लिखी थी, जिससे लोगों को पगड़ियों का महत्व समझ में आया। उन्होंने विदेशों में साफो का प्रदर्शन करके बड़ा नाम कमाया।

राठौड़ों की इस शानदार साफ-सफाई का आगाज उमरकोट सिंध की देन है। आगे चलकर यह सिंध
उमरकोट रियासत भी मारवाड़ के तहत आ गई जो आजादी के समय तक मारवाड़ का एक अभिन्न हिस्सा थी। जनमासा में स्वच्छता की कई कहानियाँ आज भी लोगों के मन में बसी हैं। अगर आज पीढ़ी उन्हें सहेज कर रखे तो यह निश्चित रूप से एक ऐतिहासिक काम होगा। स्वच्छ भारत हर वर्ग के कामों के आधार पर अलग-अलग योजनाएँ बनाता है। जोधपुरी नौ मीटर का स्वच्छ है।

अब लोग इसे साफ-साफ बाँधते हैं लेकिन वे इसका सम्मान करना नहीं जानते। जब तक सम्मान नहीं होगा, तब तक उन्हें स्वच्छ नहीं कहा जाएगा।

✍️ डॉ. महेंद्र सिंह तंवर


एक वीर, जिसने रेगिस्तान को अपना घर बनाया।
13वीं सदी में कन्नौज से आए राव सीहा जी ने ही मारवाड़ में राठौड़ वंश की नींव रखी थी।
पाली के ब्राह्मणों की रक्षा के लिए उन्होंने अकेले दम पर लुटेरों से युद्ध किया। 1273 ई. में गायों की रक्षा करते हुए, 1 लाख दुश्मनों (लाखा झंवर) से लड़कर उन्होंने वीरगति प्राप्त की।
मारवाड़ में राठौड़ रोहिल्लादि देश से आए थे।
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