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Sunday, 1 February 2026

SHIV DATT SINGH ROHILA GZD

*आदरणीय सभापति श्रीमहेश बेनाडीकर पाटिल, सदन नेता श्री कुंवर अजय सिंह, श्री सुखदेव गोगामेडी, ............ सम्मानित मंच देश के कोने कोने से पधारे विभिन्न रजवाडे रियासतों सूबो और राज्यो से संबंधित महान वीर पुत्रों * मैं शिव दत्त सिंह रोहिला,संयोजक अखिल भारतीय रोहिला क्षत्रिय विकास परिषद रजिस्टर्ड,संसद सदस्य गवर्निंग कोंसिल राष्ट्रीय क्षत्रिय जन संसद व संयोजक क्षत्रिय अधिकार न्याय मोर्चा समस्त क्षत्रिय महानुभावों को बोलता हूं जय भवानी जय श्री राम और सभी को मेरा नमस्कार। मैं उत्तर प्रदेश के एक बहुत बडे भाग रोहिलखण्ड राजपूताना का प्रतिनिधित्व कर रहा हूं गवर्निंग कोंसिल संसद सदस्य होने के नाते मैं समस्त देश में विभिन्न नामों उपनामों को धारण किए हुए बिखरे पड़े क्षत्रियों जैसे बुंदेला,चंदेला, बघेला रोहिला ,खंगार, रवा,ओड,लोधी, सिक्ख, मराठा,अर्कवंशी,गोरखा,रवानी, कोलिए,अग्नि वंशी ,चोल , पांड्या गगोई आदि सभी संगठनों के प्रमुखों और गवर्निंग कोंसिल सदस्यों ,क्षत्रिय अधिकार न्याय मोर्चा संयोजको आदि पदाधिकारियों से निवेदन करता हूं कि हम जो लगभग छ हजार टुकड़ों में बिखरे पड़े समस्त क्षत्रियों की एकता व जो सिंह शावक इस्लामिक आक्रांताओं द्वार मचाई हुई भयंकर मारकाट की भगदड़ में मेमने के झुंडो में गुम गए उन्हे अपनी सिंह नाद सुना कर वापस लाने हेतु क्षत्रिय समाज के सामने बहुत विषम परिस्थितियां खड़ी है जिन पर विचार करना और निर्णय आवश्यक हो गया है जैसे सूर्य वंशी क्षत्रिय मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम जन्म भूमि ट्रस्ट में क्षत्रियों की भागीदारी ,वामपंथियों द्वारा लिखित इतिहास को वास्तविक रूप देना उस इतिहास को बदला जाना जिसमे मुस्लिम अक्रांता शासकों का महिमा मंडन किया गया और स्थानीय बलिदानी क्षत्रिय राजाओं को विद्रोही लिखा गया है,जितने भी मार्गो नाम शहरो के नाम मुस्लिम आक्रांताओं ने अपने नाम पर किए या चाटुकार सरकारों ने मुस्लिमो के नाम पर रखे उन्हे बदला जाना और क्षत्रिय राजाओं के नाम पर रखा जाना क्योंकि उन्होंने ही प्रजा की रक्षा की तथा अपना जीवन का सर्वोच्च बलिदान देकर देश को बचाया लोक तंत्र के लिए अपना सर्वस्व दे दिया जितनी भी राष्ट्रीय धरोहर है सभी क्षत्रिय स्थापत्य है उनके रख रखाव के लिए क्षत्रियों का रखा जाना और सबसे घातक आरक्षण है जिसने क्षत्रिय समाज की रीढ़ तोड़ दी है,इसके लालच में क्षत्रिय समाज का विघटन हो रहा है खंड खंड हो विभिन्न जातियों में बंट गया है इस आरक्षण को समाप्त कराना और एस सी एस टी एक्ट जिसमे उल्लिखित है कि केवल एस सी को एस सी कहने मात्र से सवर्ण जाति को तुरंत गिरफ्तार किया जाए यह धारा हटवाना आदि अति आवश्यक व ज्वलंत मुद्दों पर कीर्यानवन तभी संभव है जब अपनी कोई राजनीतिक पकड़ हो,अपनी पार्टी हो अपनी सरकार हो,इसके लिए समस्त क्षत्रियों को एक मंच पर लाया जाए और एक राजनीतिक पार्टी का गठन हो,जैसे अखिल भारतीय क्षत्रिय विकास पार्टी ,राष्ट्रीय क्षत्रिय जन विकास पार्टी, राष्ट्रीय क्षत्रिय उत्थान मोर्चा आदि , हे क्षत्रिय वीर पुत्रों आज समय आ गया है कि जो आपके बलिदान स्वरूप आपको नही मिला वह पाना होगा,कुछ स्वहितार्थ कर दिखाना होगा*
   बुंदेलखंड जहां पहले बनाफर राजपूतों की रियासत थी ओर फिर चंदेल राजपूतों ने शासन किया उसी से लगता हुआ उत्तर पूर्व का राज्य राजपुताना रोहिलखंड हैं ,जिसने महान सम्राट चक्रवर्ती हिंदुआसुर्य्य प्रथ्वीराज चौहान के बाद शेष राजपूतों को कन्नौज पतन के बाद राजपूत एकता का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए तत्कालीन दिल्ली सलतनत को धूल चटाई ओर लगभग चार सौ साल संघर्ष करते हुए अपना सर्वस्व बलिदान कर दिया उन्ही महान वीर क्षत्रियों की संतान सूर्य वंशी ,रघुवंश निकुंभ काठी खाप के महाराजा रणवीर सिंह कठेहर रोहिलखंड नरेश की 817वी जयंती अक्टूबर 25, 2020 को बडी धूमधाम से समस्त राजपूत समाज ने पूरे उत्तर भारत में मनायी गयी। इसी प्रकार सभी क्षत्रिय वीर महाराजाओं की जयंती मनाई जाए। अट्ठारहवीं सदी तक इस्लामिक दबाव के चलते कुछ राजपूत कठेहर रोहिलखंड से भारत के अन्य भागों में गए और रोहिला राजपूत कहलाए। कठेहर रोहिलखंड को औरंगजेब के कमजोर पड़ते ही तुरंत स्वतंत्र घोषित कर रोहिलखंड की पश्चिमी सीमा पर गंगा पार करके सहारनपुर में महान शासक राजा इन्द्र सेन ने 1702 ईसवी तदानुसार 1761 विक्रमी में एक किले का निर्माण कराया जो आज प्राचीन रोहिला किला के नाम से प्रसिद्ध हे भारत के पुरातत्व विभाग ने इसे अपने संरक्षण में लेकर राष्ट्रीय धरोहर घोषित किया हुआ है, उसी प्राचीन रोहिला किला को ब्रिटिश राज में गदर के बाद एक कारागार के रूप में प्रयोग किया ओर आज़ादी के सेनानियों की जेल बना डाली आज भी उसमे जिला कारागार स्थित है ,उसी प्राचीन रोहिला किला के सामने स्थित चौक का नाम सूर्य वंशी क्षत्रिय कठेहर नरेश के नाम पर महाराजा रणवीर सिंह रोहिला चौक कराया गया हे , बड़ौत नगर में एक मार्ग का नाम राजा रणवीर सिंह रोहिला मार्ग हे। इसी प्रकार नगर नगर गांव गांव में चौराहों ,मार्गो और भवनों के नामकरण उन क्षत्रिय राजाओं के नाम पर कराए जाने चाहिए जिन्हे भुलाने में कोई कमी नही छोड़ी गई है।
   *अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा ने समस्त क्षत्रियों की एकता के लिए जो बीड़ा उठाया था उसी महान विश्व विजेता क्षत्रिय संगठन के एकता हेतु किए गए महान कार्यों के कारण आज रोहिलखंड के क्षत्रिय भी आपके सम्मुख आपने भाइयों से मिल सके ओर भारत भूमि के अनेक महान क्षत्रिय वंशजों के दर्शन कर सके। हम अखिल भारतीय रोहिला क्षत्रिय विकास परिषद रजिस्टर्ड की ओर से माननीय सभा पति जी कुंवर अजय सिंह जी व महेश मोहनराव पाटिल बेनाडीकर का आभार प्रकट करते हे जो अपने बिछुड़े क्षत्रियों को मिलाने ओर एकता करने के लिए कटी ब्द्ध है आज के परिवेश में जहा पर क्षत्रियों के विरूद्ध स्वतंत्रता के बाद से ही कुचक्र चल रहे हे,राष्ट्रीय क्षत्रिय जन संसद का गठन अति आवश्यक था समय की पुकार हे कि क्षत्रिय अधिकार न्याय मोर्चा समस्त क्षत्रियों के लिए आवश्यक अधिकार की मांग करे ओर पूरा कराए, अपनी जमीन राज्य आदि सब कुछ लोक तंत्र को सौंपने के बाद भी क्षत्रिय आज अपने बलिदानों की परिणिती को क्यों तरस रहा है यही जानने हेतु आज आप हम सब देश के विभिन्न क्षेत्रों से एकत्र हुए हे कि भारत में हो रही क्षत्रियों की उपेक्षा के चलते किस तरह क्षत्रिय एकता बनाए जाएं ।
एकता न बन पाने के मुख्य कारण हे क्षत्रिय इतिहास जो भारत का गौरव शाली इतिहास है उसे वामपंथियों ओर चाटुकारों द्वारा लिखा जाना जिससे क्षत्रिय संस्कृत ओर विरासत भ्रमित हो भावी पीढ़ी को मार्ग दर्शन न किया जाना, जिससे मानसिक क्षमता ओर इतिहास के प्रति जागरूकता कम हुई।*
*मेरा राजपूत भाइयों से अनुरोध है कि सरकार पर हरेक क्षेत्र में दबाव बनाया जाए कि भारत के महान बलिदानी राजाओं सभ्यताओं की जानकारी पाठ्यक्रम में लाई जाए जिसे आज के सेलेब्स ने पूर्णतया नकार रखा हे,राजपुताना संस्कृती विरासत ओर सभ्यता को यदि भावी पीढ़ी को बताने की बात आए तो इतनी गहरी जड़ें हे इतिहास के पन्ने कम पड़ जाए। उत्तर प्रदेश की ही बात है बेंसवाडा में बेंस राजपूतों न शासन किया मैनपुरी में चौहान ने,दिल्ली में तोमर राजपूतों ने, वृंदावन व मथुरा में सोम वंश ने बुंदेलखंड में चंदेल ओर बनाफर ओर बुंदेला ने, रोहिलखंड में रोहिला कठेरिया राजपूतों ने , विजयपुर सीकरी में सूर्य वंशी सिकरवार राजपूत शासन था अकबर ने ध्वस्त कर फतेहपुर सीकरी किया रोहिलखंड के राजपुताना पर अफगानों को काबिज कर रूहेलखंड लिखा यह सब कोई उल्लेख नहीं है क्या यह इतिहास कारो की महान भूल है या सरकार ही नहीं चाहती कि भावी पीढ़ी क्षत्रिय बलिदान से अवगत हो कहने को बहुत है अंत में यही कहना है कि यदि आज इन ज्वलंत मुद्दों पर क्षत्रिय जन संसद विचार नहीं करती तो यह क्षत्रिय समाज उस वाटिका के समान विकर्षण को प्राप्त हो जाएगा जिसमे पोधे तो विभिन्न प्रकार के है किन्तु सुवासित पुष्प बसंत से रूठ जाए।*

*जय भवानी*
*जय MAHARANA*
*जय चौहान*
*जयMAHARAJA RANVEER SINGH ROHILA*

Wednesday, 28 January 2026

ROHILA THE GREAT WARRIOR

*रक्षा बंधन के दिन रोहिलखंड की वीर भूमि गंगा सी पवित्र राजपूतों के रक्त से रंजित और आक्रांताओं के काल की धरती रामपुर के किले में दिया था कठेहर रोहिलखंड नरेश,महाराजा रणवीर सिंह रोहिला ने अदम्य साहस और अद्भुत शौर्य का परिचय!,दिल्ली सुलतान नासीरुद्दीन बहराम उर्फ चंगेज की चालीस हजार की सेना को दी थी शिकस्त!*
*तथा घुटने टेकने पर मजबूर किया था दिल्ली सल्तनत का दुर्दांत खूंखवार सेनापति नसीरुद्दीन महमूद को*!
*और प्राणदान मांगने पर क्षात्र धर्म रक्षार्थ छोड़ा था।*
*चंगेज ने अवसर पाकर रक्षा बंधन के दिन दरबारी गोकुल चंद पांडे हरिद्वार को लालच देकर किले के द्वार खुलवा लिए*
 *धोखे के शिकार लगभग तीन हजार राजपूत निहत्थे ही लड़े,!आक्रमण कारियो के अस्त्र शस्त्र छीन छीन किया था शौर्य संग्राम दिल्ली सल्तनत की लगभग आधी गुलाम वंशी सेना को काट डाला था रोहिला राजपूतो ने!!अंत में चंगेज के खूंखवार दरिंदो ने अकेले में घेर लिया था रणवीर सिंह रोहिला को, जिन्हे आमने सामने की लड़ाई में दिल्ली सुलतान कभी नही हरा पाए थे किंतु वे उनके साहस से विस्मित हुए बिना नहीं रह सके ।रणवीर रणभूमि के वीर सपूत रक्त की अंतिम बूंद रहने तक संग्राम रत रहे और कतरा कतरा हो कर खेत रहे(सन 1254ईस्वी),उनका बलिदान रोहिलखंड के राजपूताना इतिहास में स्वर्णाक्षर दे गया!,समस्त राजपूत समाज रक्षा बंधन के दिन हुए इस बलिदान को एक शोर्य दिवस के रूप में मनाता आया है,यूट्यूब पर और अन्य सोसल मीडिया पर स्वतंत्र रोहिलखंड संस्थापक नरेश महाराजा रणवीर सिंह रोहिला की वीर गाथा दी हुई है,सभी क्षत्रिय जन अपने बच्चो को दिखाए ताकि सल्तनत काल में १२५४ ईसवी के इस इतिहास के धुंधले पृष्ठ भी उकेरे जा सके*
*, रक्षा बंधन को उनका बलिदान दिवस मनाया जाता है,समस्त क्षत्रिय समाज इस शौर्य दिवस पर उन्हे कोटि कोटि नमन करते हुए उनके। बताए मार्ग पर स्वाधीनता और स्वाभिमान से स्वधर्म रक्षार्थ जीने की शपथ लेता है,यह सच्चाई हमसे स्कूली शिक्षा में छुपाई गई किंतु इतिहास के दर्पण में सब सुरक्षित रहता है जिसे उजागर कर भावी पीढ़ी को बताना ही हरेक क्षत्रिय का नैतिक दायित्व है अतः आप सभी क्षत्रियों से निवेदन है कि भावी पीढ़ी को सच्चाई बताए और स्वाभिमान से जीना दिखाए*
*सूर्य वंशी निकुंभ क्षत्रिय महाराजा रणवीर सिंह रोहिला का जन्म हिंदूवा सूर्य महाराज पृथ्वी राज चौहान के पतन के बाद दिल्ली सल्तनत के बढ़ते कदमों के बीच ऐसे समय में सन१२०४ईस्वी में कठेहर रोहिलखंड की राजधानी रामपुर के किले में राजा त्रिलोक सिंह के यहां हुआ था, जब सभी राजपूत शक्तियां क्षीण और तितर बितर हो चुकी थी,इस्लामिक आक्रांता मध्य भारत की ओर दमन करते हुए आगे बढ़ते रहते थे।।,रणवीर सिंह रोहिला का विवाह विजय पुर सीकरी की राजकुमारी तारा देवी से हुआ तथा पच्चीस वर्ष की आयु में रामपुर की गद्दी पर विराजमान होकर इस्लामीकरण पर रोक लगाई ।। तीस सालों तक दिल्ली सुलतानो को धूल चटाई किंतु रक्षा बंधन के दिन शिव मंदिर गए राजपूतों को रक्षा सूत्र बंधवाते हुए नसीरुद्दीन बहराम ने गोकुल चंद पांडे के द्वारा किले के द्वार खोलने पर घेर लिया और फिर होगया अद्भुत शौर्य संग्राम*
*विस्तार भय से संक्षिप्त गाथा वर्णित है जिसे चाटुकार मुगल कालीन और ब्रिटिश इतिहास कारो ने छिपाया*

*जय जय राजपूताना रोहिलखंड*
*जय क्षत्रिय सम्राट महाराजा रणवीर सिंह रोहिला सनातन रक्षक*



नोट __यहां प्रदर्शित चित्र नेट द्वारा सोसल मीडिया से लिए गए केवल प्रतीकात्मक रूप है इनका लेखक से कोई संबंध नहीं है।।


Monday, 26 January 2026

राजपूताना कठेहर रोहिलखंड के अजेय योद्धा

*राजपुताना कठेहर रोहिलखंड*
के एक महान पराक्रमी योद्धा 
सूर्य वंशी क्षत्रिय सम्राट
*एक अजेय योद्धा*
*महाराजा रणवीर सिहं कठेहरिया रोहिला*

      *संक्षिप्त परिचय*
************************* *जन्म दिवस* 25 अक्टूबर, 1204 तदानुसार तत्कालीन कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की प्रथमा तिथि संवत 1261 विक्रमी
#पिता* महाराज त्रिलोक सिंह जी काठी क्षत्रिय 
*************************
*वंश* _सूर्यवंश की निकुंभ शाखा 
वेद _यजुर वेद,उपवेद__धनुर्वेद,प्रवर_एक/तीन , शिखा_दाहिनी, पाद_दाहिनी,सूत्र _गुभेल,देवता__विष्णु (रघुनाथ जी), कुलदेवी _चावड़ा/कालिका माता,ध्वजा__गरुड़,नदी__सरयू,झंडा पंच रंगा,नगाड़ा_रण गंजन , ईष्ट_रघुनाथ/श्री राम चंद्र जी,उद्घोष_हर हर महादेव गोत्र_वशिष्ठ गुणधर्म _काठी (कठोर) गद्दी _ अयोध्या,ठिकाना__रावी व व्यास नदियों के बीच के काठे का क्षेत्र 
*************************
#राज्य विस्तार*
◆गंगा - यमुना दोआब क्षेत्र #दक्षिण पश्चिम में गंगा तक #पश्चिम में उत्तराखंड 
#उत्तर में नेपाल तक
*क्षेत्रफल* 25000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र या 10000 वर्ग मील क्षेत्र तक 

# सूबे* 
पांचाल, 
मध्यदेश,
कठेहर रोहिलखण्ड
*राजधानी* -रामपुर (निकट अहिक्षेत्र, रामनगर) कांपिल्य
##################
(तेहरवीं शताब्दी का पूर्वार्द्ध)

🔆सूर्यवंश🔆
***********************
#आइए इतिहास में चलें*



"*काल भी अगर छोड दे लेकिन काठी नहीं छोडता”* 
*(Time ( Death ) Forgets But Not Kathi )*

क्या हैं - “काठी और काठीयावाड, कठेहर खंड ” ?

काठी दरबार भव्यअतित कि श्रृंखला मे एक प्रसिद्ध नाम , यह एक क्षत्रिय संघ जो वीरता का वैभव , शौर्य का प्रतीक और अपने कठोर स्वाभीमानी गुणो से प्रसिद्ध है। 

*इसलिए इनके बारे प्रसिद्ध कहावत हैं - "काल भी अगर छोड दे लेकिन काठी नहि छोडता”*
सिकंदर के आक्रमण के पश्चात भारत की पश्चिमी उत्तरीय सीमा प्रांत के प्रहरी इन क्षत्रिय वीरों ने मैदानों का रुख किया,एक टुकड़ी सौराष्ट्र आई दूसरी उत्तरी पांचाल में तथा एक टुकड़ी काठी क्षत्रियों की नेपाल गई।
उत्तरी पांचाल को कठेहर खंड /रोहिलखंड के नाम से विकसित कर स्थिर रूप से राज्य स्थापित किया।
नेपाल में काठी क्षत्रियों ने कठेत कटायतkathayat साम्राज्य स्थापित किया।
 एक टुकड़ी ने थोडी कुछ शताब्दियो से उन्होने स्थिर रुप से अपना निवासस्थान सौराष्ट्र को बना लिया और इतना हि नहीं युगों से पुराण प्रसिद्ध सौराष्ट्र नाम इन्हि के कारण पलटकर ' काठीयावाड ' नाम से मशहुर हुआ एसी इन्होने इस विस्तार कि संस्कृति मे अमिट छाप छोडी हैं। 

कठ गणराज्य वाहिक प्रदेश ( हाल के पंजाब ) मे प्रसिद्ध था।इनकी राजधानी ( संगल ) सांकल थी ,(आज का स्याल कोट)एक उल्लेख मिलता है कि इन पंजाब वासी कठो के नाम से आज के अफगानिस्तान के गजनी प्रांत मे ' काटवाज ' क्षेत्र हे । कठ लोगों के शारीरिक सौदर्य और अलौकिक शौर्य की ग्रीक इतिहास लेखकों ने भूरि - भूरि प्रशंसा की है , ग्रीक लेखकों के अनुसार कठों के यहाँ यह प्रथा प्रचलित थी कि वे केवल स्वस्थ एवं बलिष्ठ संतान को ही जीवित रहने देते थे । 

सीक्रीटोस लिखता है कि वे सुंदरतम एवं बलिष्ठतम व्यक्ति को ही अपना शासक चुनते थे , ग्रिक इतिहासकारो ने कठो को कठोइ या काठीयन जैसे नामो से निर्देषीत किया हे , पाणिनी के ' अष्टाध्यायी ' मे कठो का उल्लेख हे , पंतजली के महाभाष्य के मत से कठ वैशपायन के शिष्य थे । इनकि प्रवर्तित वेदसंहिता कि शाखा ' काठक ' नाम से प्रसिद्ध थी । 

काठक कापिष्ठल संहिता जैतारायण , प्रत्धन ( दिवोदासी ) भीमसेनी इन राजाओ का नाम मीलते हे जीन्होने राजसूय यज्ञ किया था । इन्होने कई बार पोरस को हराया था।
सिकंदर को घुटने टेकने पर मजबूर किया,कठगणराज्य की राजकुमारी कार्विका उर्फ कर्णिका ने सिकंदर को अपनी नारी सेना के द्वारा परास्त किया घायल किया। वह तो आंतरिक राजाओं की सहायता से बच निकला था।
Painting : 1880's. ' A kathiavad Sentry’
By Artist - Horace van Ruith . 

#kathiyawad #history #gujrat #mumbai #indianhistory #rajput #kathi #indianhistory #rajputhistory #sentry #sword #shield
https://www.facebook.com/share/1BthabtZzW/(नव युवक मंडल मेवाड़)
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* इस्क्वाकू वंश में सूर्य वंशी महाराज निकुम्भ के वंशधर ई●पू● 326 वर्ष कठगण राज्य (रावी नदी के काठे में) सिकन्दर का आक्रमण काल-राजधानी सांकल दुर्ग (वर्तमान स्यालकोट) 53 वीं पीढ़ी में राजा अजयराव के वंशधर निकुम्भ वंशी राजस्थान अलवर, मंगल गढ़ जैसलमेर होते हुए गुजरात सौराष्ट्र कठियावाड , फिर पांचाल, मध्यदेश गये। 
* एक टुकड़ी नेपाल गई
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*अलवर में दुर्ग निकुम्भ वंशी (कठ क्षत्रिय रावी नदी के काठे से विस्थापित कठ-ंगण जिन्होंने सिकंदर को घुटने टेकने पर मजबूर किया था) क्षत्रियों ने बनवाया (राज्य मंगल गढ़), सौराष्ट्र में काठियावाड़ की स्थापना की ।
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 #मध्यदेश के उत्तरी पांचाल में कठेहर रोहिलखंड राज्य की स्थापन। यहां अहिक्षेत्र के पास रामनगर गांव मे राजधानी स्थापित की, ऊंचा गांव मझगांवा को सैनिक छावनी बनाया। यहां पर शासक हंसदेव, रहे, इनके पुत्र हंसबेध राजा बने-ं816 ई. तक- इसी वंश में राजा रामशाही (राम सिंह जी ) ने रामपुर गांव को एक नगर का रूप दिया और *909 ई में कठेहर- रोहिलखण्ड प्रान्त की राजधानी रामपुर में स्थापित की। 
#यहां पर कठ क्षत्रियों ने 11 पीढ़ी शासन किया इसी वंश75 में महापराक्रमी, विधर्मी संहारक राजा रणवीर
सिंह कठेहरियारोहिला का जन्म कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की प्रथमा तिथि तदानुसार 25 अक्टूबर 1204ईसवी को राजपूत काल के ऐसे समय में हुआ जब महराजा पृथ्वी राज चौहान के शासन अंत के कारण समस्त राजपूत शक्ति क्षीण हो चुकी थी ओर मुस्लिम आक्रांता इस्लामिक सल्तनत कायम करने में लगे थे बची हुई राजपूत शक्तियों का बहुत कठोरता ओर बर्बरता से दमन कर रहे थे हिंदुआ सूर्य चौहान का शासन अस्त हो चुका था ।
वंश वृक्ष इस प्रकार पाया गया
रामपुर संस्थापक राजा राम सिंह उर्फ रामशाह 909 ई. में 966 विक्रमी , 3 पौत्र- बीजयराज 4. करणचन्द 5. विग्रह राज 6. सावन्त सिंह (रोहिलखण्ड कठेहर का विस्तार गंगापार कर यमुना तक किया,) सिरसापाल के राज्य सरसावा में एक किले का निर्माण कराया। (दशवीं शताब्दी का उत्तरार्द्ध) नकुड रोड पर किले को आज यमुना द्वारा ध्वस्त एक टीले के रूप में देखा जा सकता है। 7. जगमाल 8 धिंगतराम 9 गोकुल सिंह 10 महासहाय 11 त्रिलोकसिंह 12रणवीर सिंह( 1204 ),नौरंग देव (पिंगू को परास्त किया) (राजपूत गजट लाहौर 04.06.1940 द्वारा डा0 
सन्त सिंह चैहान)
इक्कीस वर्ष की आयु में रामपुर के राजा त्रिलोक चंद उर्फ त्रिलोक सिंह के पुत्र रणवीर सिंह रोहिला का विवाह विजयपुर सीकरी की राजकुमारी तारा देवी से हुआ। रणवीर सिंह रोहिला का राजतिलक भी इसी वर्ष इक्कीस वर्ष की आयु में हुआ यानी 1225,ईसवी में हुआ ,इनकी लंबाई लगभग सात फीट थी, कंधो पर सीना कवच लगभग साठ शेर ,सिर पर कवच लोहे का इक्कीस सेर खड़ग का वजन 25, सेर ओर स्वयं उनका वजन 125 सेर था। सन् 1236से1240 तक रजया तुदीन सुल्तान सन 1242 मइजुद्दीन बहराम शाह सन,1246 अलाउद्दीन महमूद शाह आदि दिल्ली सुल्तान सेनाओं से राजा रणवीर सिंह रोहिला , कठेहरिया ने कठेहर रोहिलखंड का लोहा मनवाया ओर किसी भी दिल्ली सुल्तान मामुल्क को रोहिलखंड में प्रवेश नहीं होने दिया । इनके साथ विभिन्न राजवंशों के चौरासी अजेय योद्धा थे ,राठौड़, गोड, चौहान,वारेचा परमार गहलोत वच्छिल आदि थे वे सब लोहे के कवच धारी थे।
दिल्ली सुल्तान के 
गुलाम , सेनापति नासिरूद्दीन चंगेज उर्फ नासिरूद्दीन महमूद ने , सन् 1253 ई0,में दोआब, कठेहर, शिवालिक पंजाब, बिजनौर आदि क्षेत्रों पर विजय पाने के लिए दमनकारी अभियान किया। इतने अत्याचार , मारकाट तबाही मचाई कि विद्रोह करने वाले स्थानीय शासक, बच्चे व स्त्रियां भी सुरक्षित नहीं रही। ऐसी विषम परिस्थिति में रोहिल खण्ड के रोहिला शासकों ने दिल्ली सल्तनत के सूबेदार‘ ताजुल मुल्क इज्जूददीन डोमिशी‘ को मार डाला। दिल्ली सल्तनत के लिये यह घटना भीषण चुनौती समझी गई। इस समय रामपुर के राजा रणवीर सिंह थे । उन्होनें आस पास की समस्त राजपूत शक्तियों को एकता के सूत्र में बांधा ओर दिल्ली सल्तनत के विरूद्ध अपनी क्रान्तिकारी प्रवृत्ति को सजीव बनाये रखा था जिससे दिल्ली सुल्तान कठेहर पर आक्रमण करते हुए भय खाते थे ,नासिरूद्दीन महमूद बहराम गुलाम वंश ( उर्फ चंगेज) इस घटना से उद्वेलित हो उठा और सहारनपुर ‘ उशीनर प्रदेश‘ के मण्डावार व मायापुर से 1253 ई0 में गंगापार कर गया और विद्रोह को दबाता हुआ, रोहिलखण्ड को रौदता हुआ बदांयू पहुंचा। वहां उसे ज्ञात हुआ कि रामपुर में राजा रणवीर सिंह रोहिला के साथ लोहे के कवचधारी 84 रोहिले है जिनसे विजय पाना टेढ़ी खीर है। सूचना दिल्ली भेजी गई। दिल्ली दरबार में सन्नाटा हो गया कि एक छोटे राज्य कठेहर रोहिलखंड के रोहिलों से कैसे छीना जाए। नासिरूद्दीन चंगेज (महमूद) ने तलवार व बीड़ा उठाकर राजा रणवीर सिंह के साथ युद्ध करने की घोषणा की। रामपुर व पीलीभीत के बीच मैदान में नसीरुद्दीन व कठेहर नरेश सूर्य वंशी क्षत्रिय रणवीर सिंह की सेना के बीच भयंकर युद्ध हुआ, 6000 रोहिला राजपूत व 
 84 लोहे के कवचधारी रन्धेलवंशी सेना नायकों की सेना के सामने नासिरूद्दीन की तीस हजारी सेना के पैर उखड़ गये।
      नासिरूद्दीन चंगेज को बन्दी बना लिया गया। बची हुई सेना के हाथी व घोडे तथा एक लाख रूपये महाराज रणवीर सिंह को देने की प्रार्थना पर आगे ऐसा अत्याचार न करने की शपथ लेकर नासिरूद्दीन महमूद ने प्राण दान मांग लिया। क्षात्र धर्म के अनुसार शरणागत को अभयदान देकर राजा रणवीर सिंह ने उसे छोड़ दिया। परन्तु धोखेबाज महमूद जो राजा रणवीर सिंह पर विजय पाने का बीड़ा उठाकर दिल्ली से आया था, षडयंत्रों में लग गया। राजा रणवीर सिंह का एक दरबारी पं. गोकुलराम पाण्डेय था। उसे रामपुर का राजा नियुक्त करने का लालच देकर महमूद ने विश्वास में ले लिया और रामपुर के किले का भेद लेता रहा। पं. गोकुल राम ने लालच के वशीभूत होकर विधर्मी को बता दिया कि रक्षांबधन के दिन सभी राजपूत निःशस्त्र होकर शिव मन्दिर में शस्त्र पूजा करेंगें।यह शिव मन्दिर किले के दक्षिण द्वार के समीप है , यह सुनकर महमूद का चेहरा खिल उठा और दिल्ली से भारी सेना को मंगाकर जमावड़ा प्रारम्भ कर दिया रक्षाबन्धन का दिन आ गया। किले में उपस्थित सभी सैनिक, सेनाायक अपने-ंअपने शस्त्रों को उतार कर पूजा स्थान पर शिव मन्दिर ले जा रहे थे। गोकुल राम पाण्डेय यह सब सूचना विधर्मी तक पहुंचाता रहा। श्वेत ध्वज सामने रखकर दक्षिण द्वार पर पठानों की गुलामवंशी सेना एकत्र हो गयी। पूजा में तल्लीन राज पुत्रों को पाकर गोकुलराम पाण्डेय ने द्वार खोल दिया।
      शिव उपासना में रत सभी उपस्थितों को घेरे में ले लिया गया। समस्त राजपूत भौचक्के रह गए ओर मन्दिर से तुलसी का पत्ता लिया ओर मुंह में दबा कर शाका बोल दिया,घमासान युद्ध छिड़ गया परन्तु ऐसी गद्दारी के कारण राजा रणवीर सिंह ने निशस्त्र लड़ते हुए अदम्य साहस ओर शोर्य का परिचय दिया ओर महमूद के सैनिकों से भिड़ गए अद्भुत दृश्य था रणवीर सिंह चारो ओर से विधर्मी सैनिकों से घिरे युद्ध कर रहे थे विधर्मी की खड़ग छीन ली ओर आक्रांताओं के शीश कट कट गिरने लगे , उस समय रामपुर के किले में केवल तीन हजार राजपूत ही उपस्थित थे ओर वे भी निहत्थे रह गए थे सभी राजपूत बड़ी वीरता से लडे किन्तु संख्या में कम होने के कारण बिखर गए, रणवीर सिंह कठहरिया रोहिला की पीठ पर विधर्मी सेना ने तलवार से वार करके काट डाला ओर अंतिम बूंद रक्त की रहने तक रणवीर धराशाई नहीं हुए यह देख कर नसीरुद्दीन चकित रह गया देखते ही देखते कठेहर नरेश वीरगति को प्राप्त हुए। नासिरूद्दीन ने पं. गोकुल राम से कहा कि जिसका नमक खाया अब तुम उसी के नहीं हुए तो तुम्हारा भी संहार अनिवार्य है। नमक हरामी को जीने का हक नहीं है। गोकुल का धड़ भी सिर से अलग पड़ा था। सभी स्त्री बच्चों को लेकर रणवीर सिंह का भाई सूरत सिंह उर्फ सुजान सिंह किले से पलायन कर गया । महारानी तारादेवी जो विजय पुर सीकरी के राजा की पुत्री थी राजा रणवीर सिंह के साथ सती हो गई। 
रामपुर में किले के खण्डरात, सती तारादेवी का मन्दिर तथा उनका राजमहल अभी तक एक ध्वस्त टीले के रूप में मौजूद है, जो क्षात्र धर्म का परिचायक व रामपुर में रोहिला क्षत्रियों की कठ-शाखा के शासन काल की याद ताजा करता है जिन्होंने अपना सर्वस्व बलिदान कर क्षात्र धर्म की रक्षा की। गुलाम वंश, सल्तनत काल में विधर्मी की पराधीनता कभी स्वीकार नहीं की। अन्तिम सांस तक दिल्ली सल्तनत से युद्ध किया और कितनी ही बार धूल चटाई तथा रोहिलखण्ड को स्वतंत्र राज्य बनाये रखा। निरन्तर संघर्ष करते रहे राजा रणवीर सिंह कठहरिया का बलिदान व्यर्थ नहीं , सदैव तुगलक, मंगोल , मुगलों आदि से विद्रोह किया और स्वतंत्र रहने की भावना को सजीव रखा। राणा रणवीर सिंह के वंशधर आज भी रोहिला-ंक्षत्रियों में पाए जाते हे,जय राजपुताना कठेहर रोहिलखंड
उनकी पावन स्मृति को जीवित रखने व रोहिलखंड कठेहर राजपूताना की वीर गाथा को सजीव बनाए रखने के लिए भारत का समस्त रोहिला क्षत्रिय राजपूत समाज रक्षा बन्धन को शोर्य दिवस तथा पच्चीस अक्टूबर को प्रतिवर्ष स्वाभिमान दिवस के रूप में मनाता हे ओर शस्त्र पूजा करता है । उत्तर भारत के महानगर बड़ौत में राजा रणवीर सिंह रोहिला मार्ग व ऐतिहासिक नगर सहारनपुर में आज महाराजा रण वीर सिंह रोहिला चौक स्थित है। (संदर्भ__इतिहास रोहिला राजपूत द्वारा डॉक्टर के सी सेन,
ठाकुर अजीत सिंह परिहार बालाघाट मध्य प्रदेश, मध्यकालीन भारत बीएम रस्तोगी ,रोहिला क्षत्रियों का क्रमबद्ध इतिहास द्वारा श्री दर्शन लाल रोहिला, रोहिला क्षत्रिय वंश भास्कर द्वारा आर आर राजपूत, रोहिला क्षत्रिय जाति निर्णय द्वारा राय भीम राज राजभाट बड़वा जी का बाड़ा तूंगा राजस्थान, काठी कठेरिया क्षत्रिय व रोहिला राजपूत द्वारा महेश सिंह कठाय त नेपाल , मध्य कालीन भारत द्वारा ठाकुर अजित सिंह परिहार बाला घाट मध्य प्रदेश  
संकलन व लेखन 
समय सिंह पुंडीर
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क्षत्रिय/राजपूत वाटिका
अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा
राष्ट्रीय प्रवक्ता 
*क्षत्रिय अस्तित्व न्याय मोर्चा भारत*
नोट
*सनातन रक्षक,विधर्मी संहारक और लगभग तीस वर्ष तक आक्रांताओं द्वारा किए जा रहे इस्लामी करण को रोकने वाले राजपूत सम्राट रोहिलखंड नरेश महाराजा रणवीर सिंह रोहिला काठी क्षत्रिय की जयंती सभी क्षत्रिय भाई स्वाधीनता और स्वाभिमान दिवस के रूप में मनाते हैं*

Sunday, 25 January 2026

THE THIRD BETTLE OF PANIPAT पानीपत के युद्ध में रोहिला राजपूतों के बलिदान के सबूत जिंदा है

पानीपत की तीसरी लड़ाई से जुड़े इतिहास के साक्ष्य कलायत में भी मौजूद साक्ष्य खोज  रहे है, रोहिला क्षत्रिय सामाजिक संगठन
देश के अतीत से जुड़ी वीर गाथाओं को जन-जन तक पहुंचाने और इनकी स्मृतियों को हमेशा ताजा रखने के लिए रोहिला क्षत्रिय समाज संगठन ने खास पहल की है। इसके तहत कलायत श्री कपिल मुनि तट और वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप चौक के पास पानीपत की तीसरी लड़ाई के इतिहास से जुड़े धार्मिक स्थल हैं
रोहिल्ला क्षत्रिय समाज संगठन के लोगों ने कहा कि मशहूर मरहट्टा जनरैल भाऊ के दीवान गंगा सिंह महचा राठौड़ ने पानीपत की तीसरी लड़ाई में अहमद शाह अब्दाली के खिलाफ लड़ाई लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए थे। इनकी पत्नी रानी रामप्यारी उस जमाने की परंपरा अनुसार सती हुई थी। उनकी स्मृति में कलायत श्री कपिल मुनि तट के पास सौदागर मल के पुत्र अमरनाथ रोहिल्ला निवासी मछूंडा ने बनाई थी। इस तरह देश के गौरवशाली इतिहास के लिए लड़ी गई लड़ाई में रोहिल्ला क्षत्रिय समाज की महत्वपूर्ण भूमिका है। उन्होंने बताया कि पानीपत की लड़ाई में शहीद हुए गंगा सिंह महेचा राठौड़ रोहिला राजपूत थे। पानीपत की तीसरी लड़ाई में ये योद्धा अहमद शाह अब्दाली के विरुद्ध लड़े थे। उस दौरान गंगा सिंह की रानी रामप्यारी और क्षत्राणी अपने बच्चों के साथ कलायत रियासत के अधीन सुरक्षित थे। इस तरह शुरू से ही भारत भूमि पर कलायत का इतिहास गौरवशाली रहा है।
१४,जनवरी दिन बुधवार१७६१ईसवी में मकर सक्रांति के दिन वीर गंगा सिंह महेचा राठौड़ रोहिला राजपूत ने सदा शिव राव भाऊ के सेनापति के रूप में रुहेला सरदार नजीब खान और अब्दाली दुर्रानी के विरुद्ध युद्ध में अपनी सेना सहित वीर गति पाई जबकि उत्तर भारत में किन्ही राजपूत, आदि ने मराठों का साथ नही दिया ,उनकी रानी राम प्यारी सती हुई।

Monday, 19 January 2026

ANCIENT HISTORY OF RAJPUTANA ROHILKHAND


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ROHILA KSHTRIYA/RAJPUT

 प्राचीन रोहिला क्षत्रिय राज वंश 
*रोहिला क्षत्रिय/राजपूत*

*वैववस्तु मनु से  आरंभ हुई, श्रीराम व  कृष्ण जिस kaalkhand  में है,ं सहस्त्राब्दियों पूर्व से भारत की पावन भूमि पर आज तक चली आ रही, क्षत्रिय vansho की अटूट परम्परा को प्रणाम करते हुए, एक राजन्य (राजपुत्र) ही जन्मप्रदत्त स्वतंत्रता की रक्षा के लिए   seemaoका sanrakshan karata Raha 


हिंदुकुश, रोहित-गिरि पंचनद तक भरत खण्ड की पश्चिम उत्तरीय सीमा के क्षत्रिय प्रहरियों का दीर्घ कालीन बड़ा संघर्ष ही भारत की संस्कृति व सभ्यता की रक्षा करता रहा है। आक्रमणकारियों के लिए रोहितगिरि का उत्तारापथ ही पूर्व काल से एक प्रवेष द्वारा था। सूर्य, चन्द्र और नागादि संज्ञक क्षत्रिय वंशो की* *शाखाओं प्रशाखाओं में बंटे महाजनपद गणराज्यों के शासक ही प्राचीन आर्य सभ्यता को मध्य* *एशिया तक प्रसारित करने में संघर्षरत थे। यह प्रसार क्रम कई द्वीपों तथा मध्य एषिया तक होता चला गया, जहाँ से उनका आना जाना बसना* *उजडना लगा रहता था। वर्तमान भारत में बिखरे पड़े हजारों षाखाओं व प्रषाखाओं में* *विभाजित करोड़ो संताने है जो सूर्य व* *चन्द्र वंष की दो समानान्तर विकसित सभ्यताओं के रूप में समूचे आर्यवर्त, हिमवर्ष व मध्यएषिया, अरब ईरान, मिश्र आदि तक फैल गये थे तथा अपने व अपने पूर्वजों, धर्मगुरूओं ओर वंष पुरोहितों, ऋषियों आदि के नाम पर अपने गणराज्य व ठिकाने स्थापित कर रहे थे*

*रोहिला शब्द भी इसी क्रम की एक*
 *अटूट कड़ी है प्रयाग के पास झूँसी में विकसित प्राचीन चन्द्रवंषी चक्रवर्ती* *सम्राट पुरूरवा व उसके वंशधरो में प्रख्यात सम्राट ययाति के पांच पुत्र पंचजन कहलाये और उनके पाँच जनपद स्थापित हुए। लगभग सात सहस्त्राब्दी पूर्व मध्य देश आर्यवर्त में विश्व की प्राचीनतम् सभ्यता विकसित हो रही थी, इलाहाबाद, (प्रयाग) के पास झूँसी में चन्द्रवंषी क्षत्रियों व कौशल (अयोध्या) में सूर्य वंशी इक्ष्वाकु के वंशधरो के राज्य खण्ड स्थापित हो रहे थे। उस काल की परम्परा के अनुसार जिस सम्राट के रथ का चक्र अनेक राज्यों में निशंक घूमता हो वह चक्रवर्ती सम्राटों की श्रेणी में मान्य होता था। वन गमन से पूर्व (वानप्रस्थ आश्रम) सम्राट ययाति ने अपने पाँच पुत्रों क्रमश यदु, तुर्वसु, द्रहृाू (उपनाम रोहू) पुरू और अनु के लिए अपने साम्राज्य को पांच भागों में विभक्त कर प्रत्येक पुत्र को अपने-अपने प्रदेशों के शासनाधिकार का उत्तरदायित्व सौंप दिया था*

1. *यदु- दक्षिण पश्चिम में केन-बेतुआ और चम्बल नदी के कांठो का प्रदेश दिया, कालान्तर में यदु के वंशधर यादव कहलाये*।

2. *तुर्वसु-कुरूष प्रदेष वर्तमान बघेल खण्ड तुर्वसु को प्राप्त हुआ, वहां कुरूषजनों को परास्त कर तुर्वसु वंष की स्थापना हुई*।

3. *द्रह्यु- चम्बल नदी के उत्तर पश्चिम, सिन्धु नदी के किनारे तथा यमुना नदी के पष्चिम पचनद (पंजाब) का पूरा प्रान्त द्रह्यु को मिला। द्रुह्यु के वष्ंाधर आगे चल कर उत्तर और पूरब में हिन्दु कुष तथा पामीर ओर पश्चिमोत्तर में वाल्हिक, हरअवती तक के विस्तुत क्षेत्रों पर अपना अधिकार स्थापित करते चले गए और वैदिक संस्कृति का प्रसार किया*।

4. *पुरू- पुरू को प्रतिष्ठान के राज्य सिंहासन पर आसीन किया गया, पुरू के वंष आगे चलकर पौरव कहलाए इसी वंष में भरत का जन्म हुआ, आर्यवर्त, हिमवर्ष, जम्बूद्वीप (मध्यप्रदेष-विन्घ्याचल से हिन्दुकुष रोहित गिरी तक) का नाम भरत खण्ड भारत वर्ष कहलाया*।

5. *अनु- यमुना नदी को पूरब* *और गंगा यमुना के मध्य का देष (दक्षिण पंचाल) तथा अयोध्या के पष्चिम के क्षेत्र अनु को प्राप्त हुए अनु के वंष घर आनव कहलाए*। 



*इस प्रकार चन्द वंश का विस्तार हुआ*।



*आर्यवर्त की उत्तरी सीमा पर स्थित केकय देष भरत को उसकी माता कैकेयी के राज्य के कारण प्राप्त हुआ। भरत के दो पुत्रों तक्ष व पुष्कर ने क्रमषः तक्षषिला व पुष्करावती दो राजधानियां स्थापित की और आर्य संस्कृति को समृद्ध किया। उस काल में संस्कृत ही मातृभाशा थी*।



*भारत की पश्चिमि उत्तरीय सीमाओं पर जिस अवसर पर भी विदेशी आक्रमण हुए सूर्य वंशी भरत और चन्द्र वंशी द्रह्यु के वंशधरों ने मिल कर**
**प्रहरियों के अनुरूप अपना रक्त बहाया। ईसा से लगभग पाँच सौ वर्ष पूर्व से इस पर्वतीय प्रदेष में पचनद तक ‘कठ‘ गणराज्य, छुद्रक गणराज्य, यौधेय गणराज्य, मालव गणराज्य, अश्वक गणराज्य आदि फल फूल रहे थे। इनकी शासन प्रणाली गणतंत्रात्मक* *थी। यहाँ के निवासी सौंदर्यापासक थे और सुन्दर पुरुष ही राजा चुना जाता था। दु्रह्यु देश का नाम कालान्तर में द्रुह्यु के वंशज गंधारसैन के नाम पर गांधार और सूर्यवंषी राजाओं ने अपने शासित प्रदेष को ‘कपिष‘ के नाम से प्रसिद्ध कर काबुल (कुम्भा) नदी के पूर्वोत्तरीय क्षेत्र में अपनी राजधानी का नाम कपिषा रखा*

      *प्राचीन काल में कपिष (लडाकू, उदण्ड पर्वताश्रयी) और गान्धार की भाशा संस्कृत थी, किन्तु मध्यकाल से संस्कृत भाशा का विकृत सरलीकृत रूप ‘ प्राकृत‘ में परिवर्तित हो गया। भाषा के आधार पर यह स्पष्ट है कि इस प्रदेष में सहस्त्रों वर्ष तक भारतीय संस्कृति और सभ्यता स्थापित रही और इस समस्त प्रदेष में दीर्घ काल तक आर्य क्षत्रिय नरेषों का षासन रहा*।

      *अनेक पहाड़ियों (माल्यवत्त-रोहितगिरि-लोहितगिरि-हिन्दकाकेश्षस-रोहतांग आदि) नदियों (कुनार, स्वातु, गोमल, कुर्रम, सिन्धु की सहायक नदियाँ- सतलज, रावी, व्यास तथा घाटियों के कारण सामरिक दृष्टि से भी यह प्रदेष इन पर्वताश्रयी क्षत्रिय नरेषों के लिए महत्वपूर्ण था। यहाँ ठण्डी ऋतु जलवायु की दृष्टि से अति उत्तम रही। इसलिए यहां के निवासी बलिष्ठ, रक्तिम वर्ण (ललिमा चुक्त गोरा रंग) व कद काटी में मजबूब, हठी व गठीले होते रहे है। दुर्गम पहाड़ियों, नदियों व घाटियों के कारण यहां के निवासी पर्वताश्रयी, अश्वारोही थे। अश्वो के लिए प्रसिद्ध रहा यह प्रदेश रोहित गिरिये, रोहित नस्ल के अश्वों के व्यापार का प्रमुख केन्द्र था। क्रमषः *इसी कारण यह प्रदेष घोड़ों का प्रदेष अथवा अष्वकों का प्रदेश* *(अष्वकायन) कहलाता था*
**रोहित (संस्कृत), वर्तमान भाषा में लाल- भूरा रंग के घोड़े और श्येन नस्ल *के घोड़े पाए जाते थे। घोडों अथवा अष्वारोहण के बिना यहां जीवन* *सम्भव नहीं था। विदेषी* *आक्रमणों के समय अष्वों की प्रथम भूमिका थी। गहरे किसमिसी रंग के बहादुर घोड़ों को रोहित नाम से सम्बोधित किया जाता था*।
 *ईरानी व यूनानी विद्वानों के द्वारा भी इस प्रदेश के रोहित नस्ल के घोड़ों की प्रषन्सा की गई है*
* **इस प्रदेश के (महाजनपद) प्राचीन शासक (चन्द्रवंषी) द्रुह्यु का उपनाम भी रोहु था। इसलिए इसका नाम द्रुहयू का देश रोह देश रोहित गिरि रोह प्रदेश (अपभ्रनस होता चला* गया )हो जाना व्यावहारिक व स्वाभाविक था। *
*संस्कृत भाषा में रोह का अर्थ है- सीधे दृढ़-बल युक्त चढ़ना-अवरोहण करना, रक्तिम वर्ण (रोहित), पर्वत (माउण्टेन) इसलिए मध्यकाल तक ये पर्वताश्रयी* *क्षत्रिय शासक रोहित वर्ग से प्रसिद्ध हुए*। 
*पर्वतीय प्रदेश का नाम , रोहित प्रदेश*
  (प्रांकृत संस्कृत में) यहां सेनाओं की युद्ध प्रणाली रोहिल्ला युद्ध (रोहिला वार, लैटिन भाषा में) प्रणाली
 *सीधे दृढ़ बल युक्त पर्वत पर अवरोहण की तरह तीब्रता से शत्रु पर चढ़ जाना*
 *शत्रु सेना पर बाढ़ रोह की तरह, लाल* *होकर (रक्ति वर्ण क्रोधित आक्रोष युक्त) टूट पड़ना, तीब्रता से षत्रु सेना में घुस जाना। रोह (कमानी) के समान षत्रु सेना को भेदते, (काटते जाना) हुए चढ़ाई करना, प्रख्यात हुई* कालांतर में अनेक *क्षत्रिय सेनानायकों को , रोहिल्ला उपधि से विभूषित किया गया*। (मध्यकाल में)

‘‘धृतकौषिक मौद्गल्यौ आलम्यान परषरः।

सौपायनस्तथत्रिश्च वासुकी रोहित स्तथा।‘‘

(राष्ट्रधर्म-भाद्रपद 2067, सितम्बर 2010 के पृष्ठ 31 पर रोहित गोत्र का उपरोक्त श्लोक में वर्णन)

‘‘अरूषा रोहिता रथे बात जुता

वृषभस्यवते स्वतः‘‘ ।।10।।

(ऋग्वेद मण्डल 1, अ0 15 स्0 94 ‘‘ रोहिला क्षत्रियों का क्रमबद्ध इतिहासः पृष्ठ 42)



*मद्रान, रोहित कश्चैव, आगेयान, मालवान अपि गणन सर्वान, विनिजीत्य, प्रहसन्निव,। महाभारत वन पर्व 255-20 प्राचीन रोहित गिरि के नाम का अस्तित्व आज भी रोहतांग घाटी, रोहतांग दर्रानाम से अवस्थित है*।

*महाभारत के सभा पर्व में लोहित (रोहित) (संस्कृत शब्द) प्रदेश के दस मण्डलों का उल्लेख है जो भारत का उत्तर पूर्वी मध्यभाग था। श्री वासूदेव शरण अग्रवाल*

      ‘‘ *पाणिनि कालीन भारत वर्ष पृष्ठ 449 ‘‘ अश्येनस्य जवसा‘‘ वैदिक साहितय ऋग्वेद 1, अ0 17, मत्र 11, सुक्त 118-119 अर्थात- दृढ निश्चय के साथ (अश्येनस्य ) बाज पखेरू के समान (जवसा) तीव्र वेग के समान हम लोगो को आन मिली। (यह श्येन और रोहित नस्ल के घोडों की अश्व के रोहिला सेनाओं का वर्णन है*।)

  ‘‘ *उत्तरीय सीमा प्रान्त मे ंएक सुरम्य स्थानथा यहाँ का राजा क्षत्रिय था वह अपनी प्रजा को बहुत प्यार करता था, यहाँ विभिन्न प्रकार के अन्न व फलों के वृक्ष थे*
*यहां के निवासी भयानक थे तथा उनकी भाषा रूक्ष संस्कृत थी। ये रजत तथा ताम्र मुद्राओं का प्रयोग करते थे*
 *ये बहुत लडाकू तथा बहादूर थे यह क्षेत्र कुम्भा नदी के उत्तर पूर्व में 155 मील दूर था। ‘‘ एक प्रसिद्ध इतिहासकार टालेमी के अनुसार यह वर्णन चीन पागी युलान-च्वाड्डा ने किया। प्राचीन भारत का ऐतिहासिक भूगोल पृष्ठ 153-154 द्वारा श्री विमलचन्द्र लाहा (रोहिला क्षत्रिय क्रमबद्ध इतिहास से साभार‘‘) पाणिनी ने भी पश्चिमोत्तरीय सीमा प्रान्त के अश्वकायनों, अश्वकों, कठों, यादवों, छुद्रकों, मालवों निवासी सभी क्षत्रिय वर्गो को पर्वतीय और युद्धोपजीवि कहा है*।
#गांधार ( आज का अफगानिस्तान, अपगण स्थान,अथवा ऊपरी क्षेत्र आर्यन  प्रदेश आज का ईरान जहां क्षत्रिय से शासक थे ,के गणराज्यों का स्थान)
आपने महाभारत में #गांधारी का नाम तो सुना ही होगा.....लेकिन क्या आपको पता है कि उनका नाम गांधारी इसलिए था क्योकि वह गांधार देश की राजकुमारी थीं. आपको शायद पता ना हो लेकिन #शकुनी इसी जनपद का राजा था।
महाभारत के अनुसार भारत को मुख्‍यत: 16 जनपदों में स्थापित किया गया था. 
..इन्हीं जनपदों में से एक गांधार था।
महाभारत में हमको गांधार नरेश और गांधारी के होने से यह सबूत मिलता है. यह चंद्र वंशी चक्रवर्ती सम्राट ययाति के तीसरे पुत्र द्रह्यु के वंशज थे,। गांधार कभी भारत का सबसे खुशहाल राज्य या जनपद था. ..बड़े आयुर्वेद अस्पतालों के लिए यह जाना जाता था।आज के पाकिस्तान का पश्चिमी तथा अफगानिस्तान (अपगण स्थान) का पूर्वी क्षेत्र उस काल में भारत का गंधार प्रदेश था।भारत में घुसने के लिए यह एक दरवाजा था. गांधार देश द्रह्यु वंशी का द्रोह या रोह देश से ही अधिकतर व्यापारी भारत में घुसते थे। ईरान आर्यन प्रदेश था वहां आज भी पढ़ाया जाता है कि इस आर्यन प्रदेश में ईरान में आर्य समुदाय भारत से आया था,जबकि भारत में इसका उल्टा पढ़ाया जाता है जो झूठा इतिहास है क्षत्रिय विस्थापित हुए फैले प्रसार किया पुनः आते जाते रहे उसी क्रम को यहां उल्टा किया गया है। ईरान आर्यन प्रदेश था आज भी वहां की उड़ान का नाम आर्यन ही है।
#तक्षशिला जो महाभारत काल में गांधार प्रदेश की राजधानी थी। गांधार ही आज कंधार के नाम से जाना जाता है। जो अफगानिस्तान(अपगण स्थान)में मौजूद है।
हम कहाँ तक थे और आज केवल वर्तमान भारत तक सिकुड़ गए....
सिकंदर के आक्रमण के पश्चात चन्द्रगुप्त मौर्य ने 322 ईसा पूर्व में इस साम्राज्य की स्थापना की । 

सिकंदर जैसा कोई अन्य व्यक्ति भारत की ओर आंखें उठाकर देखने का फिर साहस न कर सके , इसलिए चंद्रगुप्त मौर्य और उनके गुरु चाणक्य ने भारत की पश्चिम की सीमाओं का गहनता से अध्ययन किया और अपने साम्राज्य को विशेष शक्ति संपन्न बनाकर उस ओर ही विस्तृत करने का सराहनीय, ऐतिहासिक और देशभक्ति पूर्ण कार्य किया।

 एक विशाल साम्राज्य खड़ा करके भारत की सीमाओं की सुरक्षा का तंत्र इन दोनों महान नायकों ने उस समय इतनी मजबूती से खड़ा किया कि अगले कई सौ वर्ष तक विदेशी आक्रमणकारी इस ओर झांक भी नहीं सके।

   उस समय भारत की एकता और अखंडता के लिए खतरा बने छोटे-छोटे राज्यों को इन दोनों इतिहास पुरुषों ने समाप्त कर विशाल साम्राज्य खड़ा करके भारत में राष्ट्रवाद की पुरानी परंपरा को सफलतापूर्वक स्थापित किया। 

    इन दोनों महापुरुषों के इस प्रयास से हमें इस भ्रम से बाहर निकलना चाहिए कि भारत में राष्ट्रवाद की भावना कभी नहीं रही और राष्ट्रीय एकता स्थापित करने में मुगलों या किसी अन्य विदेशी शक्ति सत्ता का विशेष योगदान रहा है। 

   इन दोनों के पुरूषार्थ से यह पता चलता है कि उन्होंने भारत के आर्य शासकों की पुरानी परंपरा को स्थापित कर भारत में चक्रवर्ती सम्राटों की परंपरा को आगे बढ़ाया।

       316 ईसा पूर्व तक मौर्यवंश ने पूरे उत्तरी पश्चिमी भारत पर अधिकार कर लिया था। 
तथा गणराज्यों क्षुद्रक ,कठ ,मालव  यौद्धेय आदि का एकीकरण करके सुदृढ़ साम्राज्य स्थापित किया।
चक्रवर्ती सम्राट अशोक के राज्य में मौर्यवंश का वृहद स्तर पर विस्तार हुआ। सम्राट अशोक के कारण ही मौर्य साम्राज्य सबसे महान एवं शक्तिशाली बनकर विश्वभर में प्रसिद्ध हुआ। 

      यद्यपि अशोक ने जिस प्रकार बौद्ध धर्म की अहिंसा को अपनाया, उससे भारतीय क्षत्रिय धर्म की परंपरा को क्षति भी उठानी पड़ी।
      *पर्वतीय (संस्कृत-हिन्दी), माउण्टेनीयर (लैटिन-अंगे्रजी), रोहित, रोहिते, रोहिले (संस्कृत ‘प्राकृत‘ - पश्तों) रोहिले-चढ़ने वाले, चढाई करने वाले अवरोही, अश्वारोही, द्रोही रोह रोहि पक्थजन , आदि समानार्थी शब्दों का सम्बन्ध प्राचीन क्षत्रिय वर्गोक्षत्रिय शासित क्षेत्रों ,पर्वतीय प्रदेशों (रोहितगिरि, रोहताग दर्रा, लोहित गिरि, कोकचा, पर्वत श्रेणी आदि)युद्ध प्रणालियों और नदी घाटी, काॅठो घोड़ों की पीठ पर (चढ़कर करने बहादुरी के साथ लडने वाले गुणों स्वभावों व क्षात्र धार्मो से है। भारतीय इतिहास में रोहिला- क्षत्रिय एक गौरवशाली वंश परम्परा है जिसमें कई प्राचीन क्षत्रिय वंशों के वंशज पाए जाते है। क्येांकि यह शब्द, क्षेत्रीयता (रोहिल देश, रोहित प्रदेश रोहित गिरि आदि द्रोह देश- रोह देश) गुणधर्म (रोहित-रक्तिम वर्ण) (कसमिसि लाल रंग) युद्ध प्रणाली (रोहिल्ला-युद्ध) (पूर्व वर्णित प्रणाली) उपाधि, बहादूीर, शौर्यपदक और क्षत्रिय सम्मान से जुडा है, इसलिए जो भी क्षत्रिय राजपुत्र इन सभी से सम्बन्धित रहा- रोहिला-क्षत्रिय अथवा रोहिल्ला राजपुत्र कहलाया गया। रोहिला-पठान इस्लामीकरण के पश्चात् की पक्भजनों , (क्षत्रिय) की आधुनिक वंश परम्परा है। जबकि क्रमशः रोहिला-क्षत्रिय पुरातन काल से भारतवर्ष में एक प्रहरी के रूप में विद्यमान रहे है*। 
*सहारनपुर के प्रख्यात साहित्यकार श्री कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर ने अपने पावन ग्रन्थ ‘‘ भगवान परशुराम‘‘ में भी रोहिल देश की चर्चा की है*।

      *प्रतिष्ठित ज्योतिषी एवं ग्रन्थकार डा. सुरेश चन्द्र मिश्र ने हिन्दुस्तान दैनिक‘‘ के रविवार 20 नवम्बर 2009 के मेरठ संस्करण के पृष्ठ-2 पर ‘‘ मूल गोत्र तालिका (40गोत्र) के क्रमांक छः पर क्षत्रिय गो़त्र रोहित का वर्णन किया है। वैदिक काल में पांच की वर्ग या समुदाय आर्य क्षत्रियों के थे जो मिलकर पंचजना-पंचजन कहे जाते थे। इनके सम्मिलित निर्णय को सभी लोग विवाद की दशा में मान लेते थे। इसी शब्द की परम्परा से आज पंचायत शब्द प्रचलित है। ये पांच वशं पुरूष या गोत्रकर्ता थे*।

  *यादव कुल पुरुष यदु, पौरव वंश पुरूष पुरू, द्रहयु वंश पुरूष द्रुहयु, तुर्वषु और आनववंश पुरूष अनु, से शेष अन्य समुदाय निकले थे*।









*क्षत्रिय वंश तालिका -14 (गंधार) वं. ता.-5*

     *इन्ही पांच वंशों के पुरूषों से महापंचायत बनती थी। प्रारम्भ में इन्हीं पंचजनों से लगभग 400 क्षत्रिय गोत्रों का प्रसार हुआ*

      *भारत की पष्चिमोत्तरीय सीमा पर विदेषी आक्रमण कारियों के आक्रमणों को विफल करने के लिए वहां के निवासी क्षत्रिय वर्गो एवं शासकों ने आरम्भ से ही प्रत्येक अवसर पर आक्रान्ताओं के विरूद्ध घोर संघर्ष किया किन्तु मैदानी षासकों की दुर्बल सीमान्त निति के कारण उन्हें किसी भी प्रकार की सहायता उपलब्ध हो सकी। इसलिए सीमान्त प्रदेष के वीर प्रहरी वर्ग इन प्रबल सुगठित आकान्ताअें की अपार शक्ति के सम्मूख लगभग पाँच सौ वर्षो से अधिक संघर्ष न कर सके और सिकन्दर के आक्रमण ईसा पूर्व लगभग 326 के पष्चात् से नदियाँ घाटियाँ, पर्वताश्रय पार करने लगे और मैदानी स्थानों की तरफ पूर्व व पूर्वोत्तर की तरफ आने लगे*
*(अध्याय-9) क्षत्रिय कुल ‘ काठी क्रम सं. 5*

      *पष्चिमोत्तरीय-सीमा प्रान्त पंजाब की जातियों व समुदायों का विवरण जो कि - स्व. सर डैंजिल लिबैट्रषन द्वारा पंजाब की जनगणना सन् 1883 और सर एडवर्ड मैकलेजन द्वारा पंजाब की जनगणना 1892 पर आधारित, सर .एच.ए. रोज द्वारा संकलित कोष है*
*इसमें रोहिला परिवारों* (राजपूत-क्लेन) का पर्याप्त विवरण है।
*संकलन एवम प्रस्तुति*
*समय सिंह पुंडीर*
*२२अगस्त २०१२*
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*विशेष नोट___*यहां प्रदर्शित सभी चित्र प्रतीकात्मक है जिनका लेखक से कोई संबंध नहीं है ये केवल पाठको  की रुचि वृद्धि हेतु नेट से लिए गए है ये सोसल मीडिया की संपत्ति है लेखक से कोई लेना देना नही है।।।

Some Facts From History (Rohilla Rajput)

गौरवशाली इतिहास के कुछ स्वर्णाक्षर (रोहिला क्षत्रिय)

  1. भारत वर्ष का क्षेत्रफल 42 ,02 ,500 वर्ग किमी था ।
  2. रोहिला साम्राज्य 25 ,000  वर्ग किमी 10 ,000  वर्गमील में फैला हुआ था ।
  3. रोहिला, राजपूतो की एक खाप, परिवार या परिजन- समूह है जो कठेहर - रोहिलखण्ड के शासक एंव संस्थापक थे |मध्यकालीन भारत में बहुत से राजपूत लडाको को रोहिला की उपाधि से विभूषित किया गया. उनके वंशज आज भी रोहिला परिवारों में पाए जाते हैं ।
  4. रोहिले- राजपूत प्राचीन काल से ही सीमा- प्रांत, मध्य देश (गंगा-yamuna का दोआब),रोहिलखंड पंजाब, काश्मीर, गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश में शासन करते रहे हैं । जबकि मुस्लिम-रोहिला साम्राज्य अठारहवी शताब्दी में इस्लामिक दबाव के पश्चात् स्थापित हुआ. । अफगानों ने इसे उर्दू में "रूहेलखण्ड" कहा ।
  5. 1702 से 1720 ई तक रोहिलखण्ड  में रोहिले राजपूतो का ही शासन था. जिसकी राजधानी बरेली थी ।
  6. रोहिलखंड एक राजपूताना साम्राज्य है। रोहिलखंड एक शुद्ध हिंदी,संस्कृत और प्राकृत भाषा का शब्द है,अरेबिक या उर्दू शब्द नही है।
  7. रोहिले राजपूतो के महान शासक "राजा इन्द्रगिरी" ने रोहिलखण्ड की पश्चिमी सीमा पर रोहिलखंड विस्तार के समय सहारनपुर में एक किला बनवाया,जिसे "प्राचीन रोहिला किला" कहा जाता है । सन 1801 ई में रोहिलखण्ड को अंग्रेजो ने अपने अधिकार में ले लिया था. हिन्दू रोहिले-राजपुत्रो द्वारा बनवाए गये इस प्राचीन रोहिला किला को सन 1806  ईस्वी से सन1858  ईस्वी के मध्य कारागार में परिवर्तित कर दिया गया था । इसी प्राचीन- रोहिला- किला में आज सहारनपुर की जिला- कारागार है । उसके सामने महाराजा रणवीर सिंह रोहिला चौक स्थित है।
  8. "सहारन" राजपूतो का एक गोत्र है जो रोहिले राजपूतो में पाया जाता है. यह सूर्य वंश की एक प्रशाखा है जो राजा भरत  के वंशधरो से प्रचालित हुई थी ।
  9. फिरोज़ तुगलक के आक्रमण के समय "थानेसर" (वर्तमान में हरियाणा में स्थित) का राजा "सहारन" ही  था ।
  10. दिल्ली में गुलाम वंश के समय रोहिलखण्ड की राजधानी "रामपुर" में RANVEER SINGH ROHILA/KATHEHARIYA/ (काठी कोम, निकुम्भ वंश, सूर्यवंश रावी नदी के निकट से विस्थापित कठ गणों के वंशधर) का शासन था । इसी रोहिले राजा ने दिल्ली के सेनापति नसीरुद्दीन चंगेज को हराया था. 'खंड' kshtriyo से सम्बंधित है, जैसे भरतखंड, BUNDELKHAND, VIDHEYLKHAND , रोहिलखंड, KUMAYUNKHHAND, उत्तराखंड आदि ।
  11. प्राचीन भारत  की केवल दो भाषाएँ संस्कृत व प्राकृत (सरलीकृत संस्कृत) थी । रोहिल प्राकृत और खंड संस्कृत के शब्द हैं जो क्षत्रिय राजाओं के प्रमाण हैं । इस्लामिक नाम है दोलताबाद, कुतुबाबाद, मुरादाबाद, जलालाबाद, हैदराबाद, मुबारकबाद, फैजाबाद, आदि ।
  12. रोहिले राजपूतो की उपस्तिथि के प्रमाण हैं । योधेय गणराज्य के सिक्के, गुजरात का (1445 वि ) ' का शिलालेख (रोहिला मालदेव के सम्बन्ध में), उत्तर प्रदेश में स्थित रोहिलखंड रामपुर में राजा रणवीर सिंह के किले के खंडहर, रानी तारादेवी सती का मंदिर , पीलीभीत में राठौर रोहिलो (महिचा- प्रशाखा) की सतियों के मंदिर, कपिल मुनि स्थान पर कलायथ कैथल(हरियाणा)में वीर GANGA SINGH महेचा राठौड़ रोहिला राजपूत   PANIPAT के तीसरे युद्ध KE YODHA की समाधि और उनकी रानी सती माता रामप्यारी का मंदिर जिसे क्षेत्र के सभी राजपूत मिलकर पूजते है। सहारनपुर का प्राचीन रोहिला किलाऔर उसके सामने स्थित क्षत्रिय सम्राट MAHA RAJA RANVEER SINGH ROHILA  चौक, मंडोर का शिलालेख, " बड़ौत  में स्तिथ " RAJA RANVEER SINGH ROHILA MARG"
  13. *दिल्ली के रोहिणी में स्थित है महाराजा रणवीर सिंह रोहिला पार्क,बम्बई में स्थित हैं श्री हर प्रसाद रूहेला मार्ग*
          नगरे नगरे ग्रामै ग्रामै  विलसन्तु संस्कृतवाणी ।
          सदने  - सदने जन - जन बदने , जयतु चिरं कल्याणी ।।
          जोधपुर का शिलालेख, प्रतिहार शासक  HARISH CHANDRA को मिली रोहिल्लाद्व्यंक की उपाधि, कई अन्य
          राजपूतो के वंशो को प्राप्त उपाधियाँ, 'पृथ्वीराज रासो', आल्हाखण्ड - काव्य सभी राजपूत वंशो में पाए
          जाने वाले प्रमुख गोत्र ।
          अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा भारत द्वारा प्रकाशित पावन ग्रन्थ क्षत्रिय वंशाणर्व (रोहिले क्षत्रियों का
          राज्य रोहिलखण्ड  का पूर्व नाम पांचाल व मध्य देश, वर्तमान में अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा से
          अखिल भारतीय रोहिला.क्षत्रिय विकास परिषद रजिस्टर्ड को संबद्धता प्राप्त होना,। वर्तमान में भी रोहिलखण्ड (संस्कृत भाषा में)
          क्षेत्र का नाम यथावत बने रहना, अंग्रेजो द्वारा भी उत्तर रेलवे को "रोहिलखण्ड - रेलवे" का नाम देना जो
          बरेली से देहरादून तक सहारनपुर होते हुए जाती थी, वर्तमान में लाखो की संख्या में पाए जाने वाले
          रोहिला-राजपूत, रोहिले-राजपूतों के सम्पूर्ण भारत में फैले हुए कई अन्य संगठन अखिल भारतीय स्तर
          पर 'राजपूत रत्न' रोहिला शिरोमणि डा. कर्णवीर सिंह द्वारा संगठित एक अखिल भारतीय रोहिला
          क्षत्रिय विकास परिषद पंजीकृत (सम्बद्ध अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा) पंजीकरण संख्या - 545, आदि।
   12.  पानीपत की तीसरी लड़ाई में रोहिले राजपूत- राजा गंगासहाय/गंगा सिंह राठौर (महेचा) के नेतृत्व में
          मराठों
          की ओर से अफगान आक्रान्ता अहमदशाह अब्दाली व रोहिला पठान नजीबदौला के विरुद्ध लड़े व
          वीरगति पाई । इस मराठा युद्ध में लगभग एक हजार चार सौ रोहिले राजपूत वीरगति को प्राप्त हुए ।
           (इतिहास -रोहिला-राजपूत)
   13.  प्रथम स्वतंत्रता संग्राम 1857 में भी रोहिले राजपूतों ने अपना योगदान दिया, ग्वालियर के किले में रानी
          लक्ष्मीबाई को हजारों की संख्या में रोहिले राजपूत मिले, इस महायज्ञ में स्त्री पुरुष सभी ने अपने गहने
          धन  आदि एकत्र कर झाँसी की रानी के साथ अंग्रेजो के विरुद्ध आवाज उठाने के लिए सम्राट बहादुरशाह-
          जफर तक पहुँचाए । अंग्रेजों ने ढूँढ-ढूँढ कर उन्हें काट डाला जिससे रोहिले राजपूतों ने अज्ञातवास की
          शरण ली।
   14.  राजपूतों की हार के प्रमुख कारण थे हाथियों का प्रयोग, सामंत प्रणाली व आपसी मतभेद, ऊँचे व
          भागीदार कुल का भेदभाव (छोटे व बड़े की भावना) आदि।
   15.  सम्वत 825 में बप्पा रावल चित्तौड़ से विधर्मियों को खदेड़ता हुआ ईरान तक गया। बप्पा रावल से समर
          सिंह तक 400 वर्ष होते हैं, गह्लौतों का ही  शासन रहा। इनकी 24 शाखाएँ हैं। जिनके 16 गोत्र (बप्पा
          रावल के वंशधर) रोहिले राजपूतों में पाए जाते हैं।
   16.  चितौड़ के राणा समर सिंह (1193 ई.) की रानी पटना की राजकुमारी थी इसने 9 राजा, 1 रावत और कुछ
          रोहिले साथ लेकर मौ. गोरी के गुलाम कुतुबद्दीन का आक्रमण रोका और उसे ऐसी पराजय दी कि कभी
          उसने चितौड़ की ओर नही देखा।
   17.  रोहिला शब्द क्षेत्रजनित, गुणजनित व 'मूल पुरुष' नाम-जनित है। यह गोत्र जाटों में भी रूहेला, रोहेला,
          रूलिया, रूहेल , रूहिल, रूहिलान नामों से पाया जाता है।
   18.  रूहेला गोत्र जाटों में राजस्थान व उ. प्र. में पाया जाता है। रोहेला गोत्र के जाट जयपुर में बजरंग बिहार
          ओर ईनकम टैक्स कालोनी टौंक रोड में विद्यमान है। झुनझुन, सीकर, चुरू, अलवर, बाडमेर में भी 
          रोहिला गोत्र के जाट विद्यमान हैं । उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले में रोहेला गोत्र के जाटों के बारह 
          गाँव हैं। महाराष्ट्र में रूहिलान गोत्र के जाट वर्धा में केसर व खेड़ा गाँव में विद्यमान हैं।,रोहतक और भिवानी में रोहिल, रूहिल उपनाम के जाट विद्यमान है।
   19.  मुगल सम्राट अकबर ने भी राजपूत राजाओं को विजय प्राप्त करने के पश्चात् रोहिला-उपाधि से
          विभूषित किया था, जैसे राव, रावत, महारावल, राणा, महाराणा, रोहिल्ला, रहकवाल आदि।
   20.  "रोहिला-राजपूत" समाज , क्षत्रियों का वह परिवार है जो सरल ह्रदयी, परिश्रमी,राष्ट्रप्रेमी,स्वधर्मपरायण,
          स्वाभिमानी व वर्तमान में अधिकांश अज्ञातवास के कारण साधनविहीन है। 40 प्रतिशत कृषि कार्य से,30
          प्रतिशत श्रम के सहारे व 30 प्रतिशत व्यापार व लघु उद्योगों के सहारे जीवन यापन कर रहे हैं। इनके 
          पूर्वजो ने हजारों वर्षों तक अपनी आन, मान, मर्यादा की रक्षा के लिए बलिदान दिए हैं और अनेको 
          आक्रान्ताओं को रोके रखने में अपना सर्वस्व मिटाया है । गणराज्य व लोकतंत्रात्मक व्यवस्था को
          सजीव बनाये रखने की भावना के कारण वंश परंपरा के विरुद्ध रहे, करद राज्यों में भी स्वतंत्रता बनाये
          रखी । कठेहर रोहिलखण्ड की स्थापना से लेकर सल्तनत काल की उथल पुथल, मार काट , दमन चक्र
          तक लगभग आठ सौ वर्ष के शासन काल के पश्चात् 1857 के ग़दर के समय तक रोहिले राजपूतों ने
          राष्ट्रहित में बलिदान दिये हैं। 
 क्रूर काल के झंझावालों से संघर्ष करते हुए क्षत्रियों का यह 'रोहिला परिवार' बिखर  BIKHAR गया।
           , इस समाज की पहचान के लिए भी आज स्पष्टीकरण देना पड़ता है। कैसा दुर्भाग्य है? यह
          क्षत्रिय वर्ग का। जो अपनी पहचान को भी टटोलना पड़ रहा है। परन्तु समय के चक्र में सब कुछ सुरक्षित
          है। इतिहास के दर्पण में थिरकते चित्र, बोलते हैं, अतीत झाँकता है, सच सोचता है कि उसके होने के
          प्रमाण धुंधले-धुंधले से क्यों हैं? हे- क्षत्रिय तुम धन्य हो, पहचानो अपने प्रतिबिम्बों को' -
          "क्षत्रिय एकता का बिगुल फूँक 
           सब धुंधला धुंधला छंटने दो।
           हो अखंड भारत के राजपुत्र 
           खण्ड खण्ड में न सबको बंटने दो ।।"
    21.  रोहिलखण्ड से विस्थापित इन रोहिला परिवारों में राजपूत परम्परा के कुछ प्रमुख गोत्र इस प्रकार पाए
           जाते हैं :-
  1. रोहिला, रोहित, रोहिल, रावल, द्रोहिया, रल्हन, रूहिलान, रौतेला , रावत 
  2. यौधेय, योतिक, जोहिया, झोझे, पेशावरी 
  3. पुण्डीर, (पुलस्त्य)पांडला(धौम्य), पंढेर, पुन्ड़ेहार, पुंढीर, पुंडाया  
  4. चौहान, जैवर, जौडा, चाहल, चावड़ा, खींची, गोगद, गदाइया, सनावर, क्लानियां, चिंगारा, चाहड बालसमंद, चोहेल, चेहलान, बालदा, बछ्स (वत्स), बछेर, चयद, झझोड, चौपट, खुम्ब, जांघरा, जंगारा, झांझड    चुहल चूहेल 
  5. निकुम्भ, कठेहरिया, कठौरा, कठैत, कलुठान, कठपाल, कठेडिया, कठड, काठी, कठ, पालवार 
  6. RATHOD महेचा, महेचराना धांधल, रतनौता, बंसूठ जोली, जोलिए, बांकटे, बाटूदा, थाथी, कपोलिया, खोखर, अखनौरिया ,लोहमढ़े, मसानिया 
  7. BUNDELA, उमट, ऊमटवाल 
  8. , भारती, गनान 
  9. नाभावंशी,बटेरिया, बटवाल, बरमटिया 
  10. परमार, जावडा, लखमरा, मूसला, मौसिल, भौंसले, बसूक, जंदडा, पछाड़, पंवारखा, ढेड, मौन 
  11. तोमर, तंवर, मुदगल, देहलीवाल, किशनलाल, सानयाल, सैन, सनाढय  कालरा
  12. GEHLOT, कूपट, पछाड़, थापा, ग्रेवाल, कंकोटक, गोद्देय, पापडा, नथैड़ा, नैपाली, लाठिवाल, पानिशप, पिसोण्ड, चिरडवाल, नवल, चरखवाल, साम्भा, पातलेय, पातलीय, छन्द (चंड), क्षुद्रक,(छिन्ड, इन्छड़, नौछड़क), रज्जडवाल, बोहरा, जसावत, गौर, मलक, मलिक , मूसला 
  13. कछवाहा, कुशवाहा, कोकच्छ, ततवाल, बलद,  कोकचे काक मछेर 
  14. सिसौदिया, भरोलिया, बरनवाल, बरनपाल, बहारा 
  15.  खुमाहड, अवन्ट, ऊँटवाल
  16. सिकरवार, रहकवाल, रायकवार, ममड, गोदे 
  17. सोलंकी, गिलानिया, भुन, बुन, बघेला, ऊन, (उनयारिया)
  18. बडगूजर, सिकरवार, ममड़ा, पुडिया 
  19. कश्यप, काशब, रावल, रहकवाल 
  20. यदु, मेव, छिकारा, तैतवाल, भैनिवाल, उन्हड़, भाटटी बनाफरे, जादो, बागड़ी, सिन्धु, कालड़ा, सारन, छुरियापेड,  लखमेरिया, चराड, जाखड़, सेरावत, देसवाल, पूडिया 
प्रमुख रोहिला क्षत्रिय शासक
  1. अंगार सैन  - गांधार (वैदिक काल)
  2. अश्वकरण - ईसा पूर्व 326 (मश्कावती दुर्ग)
  3. अजयराव - स्यालकोट (सौकंल दुर्ग) ईसा पूर्व 326
  4. प्रचेता - मलेच्छ संहारक 
  5. शाशिगुप्त - साइरस के समकालीन 
  6. सुभाग सैन - मौर्य साम्राज्य के समकालीन 
  7. राजाराम शाह - 929 वि. रामपुर रोहिलखण्ड 
  8. बीजराज - रोहिलखण्ड
  9. करण चन्द्र - रोहिलखण्ड
  10. विग्रह राज - रोहिलखण्ड - गंगापार कर स्रुघ्न जनपद (सुगनापुर) यमुना तक विस्तार दसवीं शताब्दी में सरसावा में किले का निर्माण पश्चिमी सीमा पर, यमुना द्वारा ध्वस्त टीले के रूप में नकुड़ रोड पर देखा जा सकता है।
  11. सावन्त सिंह - रोहिलखण्ड
  12. जगमाल - रोहिलखण्ड
  13. धिंगतराव - रोहिलखण्ड
  14. गोंकुल सिंह - रोहिलखण्ड
  15. महासहाय - रोहिलखण्ड
  16. त्रिलोक चन्द - रोहिलखण्ड
  17. रणवीर सिंह - रोहिलखण्ड
  18. सुन्दर पाल - रोहिलखण्ड
  19. नौरंग देव - रोहिलखण्ड
  20. सूरत सिंह - रोहिलखण्ड
  21. हंसकरण रहकवाल - पृथ्वीराज के सेनापति 
  22. मिथुन देव रायकवार - ईसम सिंह पुण्डीर के मित्र थाना भवन शासक 
  23. सहकरण, विजयराव - उपरोक्त 
  24. राजा हतरा - हिसार 
  25. जगत राय - बरेली 
  26. मुकंदराज - बरेली 1567 ई.
  27. बुधपाल - बदायुं 
  28. महीचंद राठौर - बदायुं
  29. बांसदेव - बरेली 
  30. बरलदेव - बरेली
  31. राजसिंह - बरेली
  32. परमादित्य - बरेली
  33. न्यादरचन्द - बरेली
  34. राजा सहारन - थानेश्वर 
  35. प्रताप राव खींची (चौहान वंश) - गागरोन 
  36. राणा लक्ष्य सिंह - सीकरी 
  37. रोहिला मालदेव - गुजरात 
  38. जबर सिंह - सोनीपत 
  39. रामदयाल महेचराना - कलायत
  40. गंगसहाय - महेचराना *कलायत* 1761 ई.
  41. राणा प्रताप सिंह - कौराली (गंगोह) 1095 ई.
  42. नानक चन्द - अल्मोड़ा 
  43. राजा पूरणचन्द - बुंदेलखंड 
  44. राजा हंस ध्वज - हिसार व राजा हरचंद 
  45. राजा बसंतपाल - रोहिलखण्ड व्रतुसरदार, सामंत वृतपाल 1193 ई.
  46. महान सिंह बडगूजर - बागपत 1184 ई.
  47. राजा यशकरण - अंधली 
  48. गुणाचन्द - जयकरण - चरखी - दादरी 
  49. राजा मोहनपाल देव - करोली 
  50. राजारूप सैन - रोपड़ 
  51. राजा महपाल पंवार - जीन्द 
  52. राजा परपदेड पुंडीर - लाहौर 
  53. राजा लखीराव - स्यालकोट 
  54. राजा जाजा जी तोमर - दिल्ली 
  55. खड़ग सिंह - रोहिलखण्ड लौदी के समकालीन 
  56. राजा हरि सिंह - खिज्रखां के दमन का शिकार हुआ - कुमायुं की पहाड़ियों में अज्ञातवास की शरण ली 
  57. राजा इन्द्रगिरी (रोहिलखण्ड) (इन्द्रसेन) - सहारनपुर में प्राचीन रोहिला किला बनवाया । रोहिला क्षत्रिय वंश भास्कर लेखक आर. आर. राजपूत मुरसेन अलीगढ से प्रस्तुत 
  58. राजा बुद्ध देव रोहिला - 1787 ई., सिंधिया व जयपुर के कछवाहो के खेड़ा व तुंगा के मैदान में हुए युद्ध का प्रमुख पात्र । (राय कुँवर देवेन्द्र सिंह जी राजभाट, तुंगा (राजस्थान)

रोहिल्ला उपाधि - शूरवीर, अदम्य - साहसी विशेष युद्ध कला में प्रवीण, उच्च कुलीन सेनानायको, और सामन्तों को उनके गुणों के अनुरूप क्षत्रिय वीरों को तदर्थ उपाधि से विभूषित किया जाता था - जैसे - रावत - महारावत, राणा, महाराणा, ठाकुर, नेगी, रावल, रहकवाल, रोहिल्ला, समरलछन्द, लखमीर,(एक लाख का नायक) आदि। इसी आधार पर उनके वंशज भी आजतक राजपूतों के सभी गोत्रों में पाए जाते हैं।
"वभूव रोहिल्लद्व्यड्कों वेद शास्त्रार्थ पारग: । द्विज: श्री हरि चन्द्राख्य प्रजापति समो गुरू : ।।2।।
    ( बाउक का जोधपुर लेख )
- सन 837 ई. चैत्र सुदि पंचमी - हिंदी अर्थ  - "वेद शास्त्र में पारंगत रोहिल्लाद्धि उपाधिधारी एक हरिश्चन्द्र  नाम का ब्राह्मण था" जो प्रजापति के समान था हुआ ।।6।।
( गुज्जर गौरव मासिक पत्रिका - अंक 10, वर्ष ।।माह जौलाई 1991 पृष्ठ - 13) (राजपुताने का इतिहास पृष्ठ - 147) (इतिहास रोहिला - राजपूत पृष्ठ - 23) (प्राचीन भारत का इतिहास, राजपूत वंश, - कैलाश - प्रकाशन लखनऊ सन 1970 ई. पृष्ठ - 104 -105 - )
रोहिल्लद्व्यड्क रोहिल्लद्धि - अंक वाला या उपाधि वाला ।
सर्वप्रथम प्रतिहार शासक द्विज हरिश्चन्द्र को रोहिल्लद्धि उपाधि प्राप्त हुई । बाउक,प्रतिहार शासक विप्र हरिश्चन्द्र के पुत्र कवक और श्रीमति पदमनी का पुत्र था वह बड़ा पराक्रमी और नरसिंह वीर था।
प्रतिहार एक पद है, किसी विशेष वर्ण का सूचक नही है। विप्र हरिश्चन्द्र प्रतिहार अपने बाहुबल से मांडौर दुर्ग की रक्षा करने वाला था, अदम्य साहस व अन्य किसी विशेष रोहिला शासक के प्रभावनुरूप ही रोहिल्लद्व्यड्क उपाधि को किसी आधार के बिना कोई भी व्यक्ति अपने नाम के साथ सम्बन्ध करने का वैधानिक रूप में अधिकारी नही हो सकता।
उपरोक्त से स्पष्ट है कि बहुत प्राचीन काल से ही गुणकर्म के आधार पर क्षत्रिय उपाधि "रोहिल्ला" प्रयुक्त । प्रदत्त करने की वैधानिक व्यवस्था थी। जिसे हिन्दुआसूर्य - महाराजा पृथ्वीराज चौहान ने भी यथावत रखा। पृथ्वीराज चौहान की सेना में एक सौ रोहिल्ला - राजपूत सेना नायक थे । "पृथ्वीराज रासौ" -
चहूँप्रान, राठवर, जाति पुण्डीर गुहिल्ला । बडगूजर पामार, कुरभ, जागरा, रोहिल्ला ।। इस कवित्त से स्पष्ट है । कि - प्राचीन - काल में रोहिला- क्षत्रियों का स्थान बहुत ऊँचा था। रोहिला रोहिल्ल आदि शब्द राजपुत्रों अथवा क्षत्रियों के ही द्योतक थे । इस कवित्त के प्रमाणिकता "आइने अकबरी", 'सुरजन चरिता' भी सिद्ध करते हैं । युद्ध में कमानी की तरह (रोह चढ़ाई करके) शत्रु सेना को छिन्न - भिन्न करने वाले को रहकवाल, रावल, रोहिल्ला, महाभट्ट कहा गया है।
महाराज पृथ्वीराज चौहान की सेना में पांच गोत्रों के रावल थे -
  1. रावल - रोहिला 
  2. रावल - सिन्धु 
  3. रावल - घिलौत (गहलौत)
  4. रावल -  काशव या कश्यप 
  5. रावल - बलदया बल्द
मुग़ल बादशाह अकबर ने भी बहादुरी की रोहिल्ला उपाधि को यथावत बनाए रखा जब अकबर की सेना दूसरे  राज्यों को जीत कर आती थी तो अकबर अपनी सेना के सरदारों को,बहादुर जवानों बहादुरी के पदक (ख़िताब,उपाधि) देता था। एक बार जब महाराणा मान सिंह काबुल जीतकर वापिस आए तो अकबर ने उसके बाइस राजपूत सरदारों को यह ख़िताब दी (उपाधि से सम्मानित किया)
  1. बाई तेरा हर निरकाला रावत को - रावल जी 
  2. चौमकिंग सरनाथा को - रावल 
  3. झंड्कारा कांड्कड को - रोहिल्ला 
  4. रावत मन्चारा - कांड्कड काम करन, निरकादास रावत को रावराज और रूहेलाल को रोहिला 
  5. स्वतंत्र रोहिलखंड राज्य संस्थापक महाराजा RANVEER SINGH ROHILA 
  6. रक्षा बंधन के दिन रोहिलखंड की वीर भूमि गंगा सी पवित्र राजपूतों के रक्त से रंजित और आक्रांताओं के काल की धरती रामपुर के किले में दिया था कठेहर रोहिलखंड नरेश,महाराजा रणवीर सिंह रोहिला ने अदम्य साहस और अद्भुत शौर्य का परिचय!,दिल्ली सुलतान नासीरुद्दीन बहराम उर्फ चंगेज की चालीस हजार की सेना को दी थी शिकस्त!**तथा घुटने टेकने पर मजबूर किया था दिल्ली सल्तनत का दुर्दांत खूंखवार सेनापति नसीरुद्दीन महमूद को और प्राणदान मांगने पर क्षात्र धर्म रक्षार्थ छोड़ा था।**चंगेज ने अवसर पाकर रक्षा बंधन के दिन दरबारी गोकुल चंद पांडे हरिद्वार को लालच देकर किले के द्वार खुलवा लिए *धोखे के शिकार लगभग तीन हजार राजपूत निहत्थे ही लड़े,!आक्रमण कारियो के अस्त्र शस्त्र छीन छीन किया था शौर्य संग्राम दिल्ली सल्तनत की लगभग आधी गुलाम वंशी सेना को काट डाला था रोहिला राजपूतो ने!!अंत में चंगेज के खूंखवार दरिंदो ने अकेले में घेर लिया था RANVEER SINGH ROHILA को, जिन्हे आमने सामने की लड़ाई में दिल्ली सुलतान कभी नही हरा पाए थे किंतु वे उनके साहस से विस्मित हुए बिना नहीं रह सके ।रणवीर रणभूमि के वीर सपूत रक्त की अंतिम बूंद रहने तक संग्राम रत रहे और कतरा कतरा हो कर खेत रहे(सन 1254ईस्वी),उनका बलिदान रोहिलखंड के राजपूताना इतिहास में स्वर्णाक्षर दे गया!,समस्त राजपूत समाज रक्षा बंधन के दिन हुए इस बलिदान को एक शोर्य दिवस के रूप में मनाता आया है,यूट्यूब पर और अन्य सोसल मीडिया पर स्वतंत्र रोहिलखंड संस्थापक नरेश महाराजा RANVEER SINGH ROHILA की वीर गाथा दी हुई है,सभी क्षत्रिय जन अपने बच्चो को दिखाए ताकि सल्तनत काल में १२५४ ईसवी के इस इतिहास के धुंधले पृष्ठ भी उकेरे जा सके*, रक्षा बंधन को उनका बलिदान दिवस मनाया जाता है,समस्त क्षत्रिय समाज इस SHOURYA दिवस पर उन्हे कोटि कोटि नमन करते हुए उनके। बताए मार्ग पर स्वाधीनता और स्वाभिमान से स्वधर्म रक्षार्थ जीने की शपथ लेता है,यह सच्चाई हमसे स्कूली शिक्षा में छुपाई गई किंतु इतिहास के दर्पण में सब सुरक्षित रहता है जिसे उजागर कर भावी पीढ़ी को बताना ही हरेक क्षत्रिय का नैतिक दायित्व है अतः आप सभी क्षत्रियों से निवेदन है कि भावी पीढ़ी को सच्चाई बताए और स्वाभिमान से जीना दिखाए।।
  7. सूर्य वंशी निकुंभ क्षत्रिय महाराजा RANVEER SINGH ROHILA का जन्म हिंदूवा सूर्य महाराज पृथ्वी राज चौहान के पतन के बाद दिल्ली सल्तनत के बढ़ते कदमों के बीच ऐसे समय में सन१२०४ईस्वी में कठेहर रोहिलखंड की राजधानी रामपुर के किले में राजा त्रिलोक सिंह के यहां हुआ था, जब सभी राजपूत शक्तियां क्षीण और तितर बितर हो चुकी थी,इस्लामिक आक्रांता मध्य भारत की ओर दमन करते हुए आगे बढ़ते रहते थे।।,रणवीर सिंह रोहिला का विवाह विजय पुर सीकरी की राजकुमारी तारा देवी से हुआ तथा पच्चीस वर्ष की आयु में रामपुर की गद्दी पर विराजमान होकर इस्लामीकरण पर रोक लगाई ।। तीस सालों तक दिल्ली सुलतानो को धूल चटाई किंतु रक्षा बंधन के दिन शिव मंदिर गए राजपूतों को रक्षा सूत्र बंधवाते हुए नसीरुद्दीन बहराम ने गोकुल चंद पांडे के द्वारा किले के द्वार खोलने पर घेर लिया और फिर होगया ADBHUT SHOURYA SANGRAM .. विस्तार  भय से संक्षिप्त गाथा वर्णित है जिसे चाटुकार मुगल कालीन और ब्रिटिश इतिहास कारो ने छिपाया*
  8. रोहिलखंड एक राजपूताना राज्य
कन्नौज पतन के बाद रोहिलखण्ड राज्य की स्थापना कठेहरिया राजा राम शाह उर्फ रामसिंह ने की थी अहिक्षेत्र काम्पिल्य के एक गॉंव रामनगर को रामपुर नगर बसाया ओर यह क्षत्रिय राजा राम के नाम पर रखा गया था यहाँ रोहिले राजपूतो ने 11 पीढ़ी लगातार शासन किया राजा रणवीर सिंह रोहिला ने नाइरुद्दीन महमूद,, ओर हरिसिंह रोहिला ने खिज्रखान को धूल चटाई नोरंगदेव ने पिंगू(तैमूर  लंग)को हराया ।।।san ईस्वी के बाद भी कभी भी पूर्णतया रोहिलखंड को दिल्ली दरबार नही जीत पाया अकबर ओर बाद में औरंगजेब ने चाल चली और अफगानों की घुसपैठ करनी आबादी बढ़ानी शुरू की सन 1707ईस्वी में दाऊद खान बरेच अफगान के जाट दत्तक पुत्र जिसका नाम अलीमुहम्मद रखा था ने धोखे से बरेली में रोहिला राजा हरननंद का कत्ल किया और सम्पूर्ण रोहिलखण्ड पर अधिकार कर लिया इन अफगानों ने भी रोहिलखण्ड के नवाब बन जाने के कारणों से स्वयम को रुहेला  सरदार कहा वास्तव में ये रोहिला नही थे जैसे कि रोह देश के अफगान लिखा यह गलत है ।।जिस काल  में अफगान आए  तब अफगानिस्तान को रोह देश नही कहा जाता था ।।
 यह झूठा मुस्लिम तुष्टि करण का इतिहास है ।।16वी सदी में जगत सिंह कठेहरिया रोहिल्ला राजपूत के पुत्रों बाँसदेव व बर्लदेव के नाम पर बरेली नगर की नीव रखी गयी अफगानों ने कोई नगर नही बसाया उन्होंने अपने  काल मे ही  रामपुर का  नाम राम के नाम पर नही रखा। यह भ्रामक झूठ है कि फैज उल्ला खान ने रामपुर को बसाया था अठारहवीं सदी में जबकि रामपुर रियासत की स्थापना दसवीं सदी में राजा रामसिंह रोहिला(काठी कोम के राजपूत) ने की थी

*रोहिला क्षत्रिय योद्धाओं का शौर्य साहस, युद्ध कौशल, और अपने कुल व राष्ट्र की रक्षा के प्रति बलिदान की भावना में निहित होता था।* *हमारे क्षत्रिय योद्धा युद्ध भूमि में मृत्यु से* *निर्भय होकर लड़ते थे और उनका* *एकमात्र कर्तव्य राज्य व समाज की रक्षा करना था। शौर्य उनके रक्त में समाया हुआ था, जो युद्ध की ज्वाला में अपने बलिदान के रूप में प्रदर्शित होता था।*
*#क्षत्रिय*
*जय राजपूताना अखंड राजपूताना*
*जय राजपूताना,जय राजपूताना रोहिलखंड ,बुंदेलखंड*
संदर्भ 
इतिहास रोहिला राजपूत
 डॉक्टर के सी सैन
रोहिला क्षत्रिय वंश भास्कर
आर आर राजपूत
कठेहरिया रोहिला राजपूत
रोहिला क्षत्रियों का क्रमबद्ध इतिहास
दर्शन लाल रोहिला
मध्य कालीन भारत का इतिहास
ठाकुर अजीत सिंह परिहार
बालाघाट मध्य प्रदेश
 भारत भूमि और उसके वासी पृष्ठ-230 पंडित जयचंद्र विद्यालंकार
2-दून ज्योति-साप्ताहिक देहरादून 18 फरवरी 1974 
पुरुषोत्तम नागेश ओक व डॉक्टर ओमवीर शर्मा हेड ऑफ हिस्ट्री विभाग
3-क्षत्रिय वर्तमान पृष्ठ 97 व 263 ठाकुर अजित सिंह परिहार बालाघाट
4- प्राचीन भारत पृष्ठ -118,159,162 बीएम रस्तोगी इतिहास कार
5 राजतरँगनी पृष्ठ 31-39 कल्हण कृत अनुवादक नीलम अग्रवाल
6-रोहिला क्षत्रिय वन्स भास्कर ,आर आर राजपूत मूरसेन अलीगढ़
7- इतिहास रोहिला राजपूत 
डॉक्टर के सी सेन
8 - भारत का इतिहास पृष्ठ 138 डॉक्टर दया प्रकाश
9-भारतीय इतिहास मीमांसा पृष्ठ 44 जय चंद विद्यालंकार
10- भारतीय इतिहास की रूप रेखा द्वितीय भाग पृष्ठ 699 बीएम रस्तोगी
11-सीमा संरक्षण पृष्ठ 21-22 हरिकृष्ण प्रेमी
12 टॉड राजस्थान पृष्ठ 457 परिच्छेद 43 अनुवादक केशव कुमार ठाकुर
13- प्राचीन भारत का इतिहास राजपूत वन्स पृष्ठ 104 व 105कैलाश प्रकाशन लखनऊ 1970 व पृष्ठ 147
14 रोहिला क्षत्रियो का क्रमबद्ध इतिहास लेखक दर्शन लाल रोहिला 
15 राजपूत ,/क्षत्रिय वाटिका 
राजनीतिन सिंह रावत अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा
16 रिलेशन बिटवीन रोहिला एंड कठहरिया राजपूत निकुम्भ व श्रीनेत वंश 
महेश सिंह कठायत नेपाल आदि बहुत क्षत्रिय वंशावलियों में उपलबद्ध है।।

MAHARANA PRATAP SINGH SISODIYA SURY VANSHI SHRI RAM KE PUTRA LAV KE VANSHDHER BHARAT KE MAHAN VEER ,HALDIGHATI VIJETA OR UNKE BALIDANI SATHI JIVAN PARICHAY ,EK SHOURY GATHA

📜 19 जनवरी 📜

🌹 महाराणा प्रताप // बलिदान दिवस 🌹

जन्म : 09 मई 1540
मृत्यु : 19 जनवरी 1597

                   
महाराणा प्रताप के पराक्रम से अकबर भी घबराता था. इसलिए युद्ध को टालने और अधीनता स्वीकार कराने के लिए अकबर ने 6 बार अपने दूत और मुग़लों के अधीन मेवाड़ का सिंहासन चलाने की पेशकश की लेकिन महाराणा प्रताप ने इसे हर बार मानने से इंकार कर दिया.
                    
महाराणा प्रताप बेहद बलशाली और युद्ध-कौशल में निपुण थे. उनके रण-भूमि में आते ही दुश्मनों में भय का माहौल बन जाता था. युद्ध में वे अपने चहेते घोड़े चेतक पर सवार होकर जाते थे.
                 
>> महाराणा प्रताप के युद्ध हथियार <<

1. महाराणा प्रताप युद्ध के वक्त हमेशा एक भाला अपने साथ रखते थे, जिसका वजन 81 किलो था. वह इस भाले को एक हाथ से नजाते हुए दुश्मन पर टूट पड़ते थे.
2. युद्ध के वक्त महाराणा प्रताप 72 किलो का कवच पहनते थे.
3. इतिहासकारों के अनुसार महाराणा प्रताप के भाले, कवच, ढाल और दो तलवारों का वजन कुल मिलाकर 208 किलोग्राम होता था.
4. महाराणा प्रताप के हथियार इतिहास के सबसे भारी युद्ध हथियारों में शामिल हैं.
5. महाराणा प्रताप अपने एक वार से ही घोड़े के दो टुकड़े कर देते थे.
               
>> महाराणा प्रताप : परिचय व परिवार <<

1. महाराणा प्रताप का जन्म 09 मई 1540 को राजस्थान के कुंभलगढ़ में हुआ था.
2. महाराणा प्रताप ने राजनैतिक कारणों से कुल 11 शादियां की थीं.
3. महाराणा प्रताप के कुल 17 बेटे और 05 बेटियां थीं.
4. महारानी अजाब्दे से पैदा हुए पुत्र अमर सिंह को महाराणा प्रताप का उत्तराधिकारी बनाया गया था.
5. अमर सिंह भी अपने पिता महाराणा प्रताप की तरह बहुत बहादुर और पारक्रमी थे.
6. इतिहासकारों के अनुसार हल्दी घाटी युद्ध के वक्त अमर सिंह की आयु 17 वर्ष थी.
7. मेवाड़ की रक्षा करते हुए महाराणा प्रताप की 19 जनवरी 1597 को मृत्यु हुई थी.
8. अकबर जानता था कि धरती पर महाराणा प्रताप जैसा कोई दूसरा वीर नहीं है.
               
>> महाराणा प्रताप के 10 वाक्य <<

1. समय इतना ताकतवर होता है कि एक राजा को भी घास की रोटी खिला सकता है.
2. मनुष्य का गौरव व आत्म सम्मान उसकी सबसे बड़ी कमाई होती है. इसलिए इनकी सदैव रक्षा करनी चाहिए.
3. अपने व अपने परिवार के साथ जो अपने राष्ट्र के बारे में भी सोचते हैं, वही सच्चे नागरिक होते हैं.
4. तब तक परिश्रम करो, जब तक तुम्हे तुम्हारी मंजिल न मिल जाए.
5. अन्याय व अधर्म आदि का विनाश करना पूरी मानव जाति का कर्तव्य है.
6. जो अत्यंत विकट परिस्थिति में भी हार नहीं मानते हैं, वो हार कर भी जीत जाते हैं.
7. जो सुख में अतिप्रसन्न और विपत्ति में डर कर झुक जाते हैं, उन्हें न तो सफलता मिलती है और न ही इतिहास उन्हें याद रखता है.
8. अगर सांप से प्रेम करोगे तो भी वह अपने स्वभाव अनुरूप कभी न कभी डसेगा ही.
9. शासक का पहला कर्तव्य अपने राज्य का गौरव और सम्मान बचाए रखना होता है.
10. अपना गौरव, मान-मर्यादा और आत्म सम्मान के आगे जीवन की भी कोई कीमत नहीं है.
           
>> महाराणा प्रताप के 10 रोचक किस्से <<

1. महाराणा प्रताप के सबसे प्रिय घोड़े का नाम चेतक था. महाराणा प्रताप की तरह उनका घोड़ा भी बहुत बहादुर और समझदार था.
2. महाराणा प्रताप को बचपन में प्यार से कीका कहकर बुलाया जाता था.
3. महाराणा प्रताप और मुगल शासक अकबर के बीच हल्दी घाटी का विनाशकारी युद्ध 18 जून 1576 को हुआ था. इतिहास में हल्दी घाटी के युद्ध की तुलना महाभारत के युद्ध से की गई है.
4. इतिहासकारों के अनुसार हल्दी घाटी के युद्ध में न तो अकबर की जीत हुई थी और न ही महाराणा प्रताप हारे थे. इसकी वजह महाराणा प्रताप के मन में राज्य की सुरक्षा का अटूट जज्बा था.
5. हल्दी घाटी के युद्ध को टालने के लिए अकबर ने छह बार महाराणा प्रताप के पास अपने शांति दूत भेजे, लेकिन राजपूत राजा ने हर बार अकबर के प्रस्ताव को ठुकरा दिया.
6. हल्दी घाटी के युद्ध में महाराणा प्रताप ने मात्र 20 हजार सैनिकों के साथ मुगल बादशाह अकबर के 80 हजार सैनिकों का डटकर सामना किया था. बावजूद अकबर महाराणा प्रताप को झुका नहीं सका था.
7. महाराणा प्रताप के सबसे प्रिय और वफादार घोड़े ने भी दुश्मनों के सामने अद्भुत वीरता का परिचय दिया था. हालांकि इसी युद्ध में घायल होने से उसकी मौत हुई थी.
8. उदयपुर की हल्दी घाटी में आज भी महाराणा प्रताप के प्रिय घोड़े चेतक की समाधि मौजूद है.
9. चेतक ने अंतिम दम तक महाराणा प्रताप का साथ दिया. युद्ध में मुगल सेना से घिरने पर चेतक महाराणा प्रताप को बैठाकर कई फीट लंबा नाला फांद गया था.

यह भी जानीये..........
नाम -कुँवर प्रताप जी{महाराणा प्रताप}
जन्म - 9 मई, 1540 ई.
जन्म भूमि - राजस्थान कुम्भलगढ़
पुन्य तिथि - 19 जनवरी, 1597 ई.
पिता - महाराणा उदय सिंह जी
माता - राणी जीवत कँवर जी
राज्य सीमा - मेवाड़
शासन काल - 1568–1597ई.
शा. अवधि - 29 वर्ष
वंश - सुर्यवंश
राजवंश - सिसोदिया
राजघराना - राजपूताना
धार्मिक मान्यता - हिंदू धर्म
युद्ध - हल्दीघाटी का युद्ध
राजधानी - उदयपुर
पूर्वाधिकारी - महाराणा उदयसिंह जी
उत्तराधिकारी - राणा अमर सिंह जी
महाराणा प्रताप जी के पास एक सबसे प्रिय घोड़ा था,जिसका नाम 'चेतक' था।
‌‌‌‌‌‌‌"राजपूत शिरोमणि श्री महाराणा प्रताप जी" उदयपुर, मेवाड़ में।सिसोदिया राजवंश के राजा थे।
वह तिथि धन्य है, जब मेवाड़ की शौर्य-भूमि परमेवाड़-मुकुट
मणि राणा प्रताप जी का जन्म हुआ। श्री प्रताप जी का नाम इतिहास में वीरता और दृढ प्रण के लिये अमर है।
महाराणा प्रतापजी की जयंती विक्रमी सम्वत् कॅलण्डर के अनुसार प्रतिवर्ष ज्येष्ठ, शुक्ल पक्ष तृतीया को मनाई जाती है।
महाराणा प्रताप जी के बारे में कुछरोचक जानकारी :-
1... श्री महाराणा प्रताप सिंह जी एकही झटके में घोड़े समेत दुश्मन सैनिक को काट डालते थे।
2.... जब इब्राहिम लिंकन भारत दौरे पर आ रहे थेतब उन्होने
अपनी माँ सेपूछा कि हिंदुस्तान से आपके लिए क्या लेकर
आए| तब माँ का जवाब मिला ” उस महान देश की वीर भूमि हल्दी घाटी से एक मुट्ठी धूल
लेकरआना जहाँ का राजा अपनी प्रजा केप्रति इतना वफ़ादार
था कि उसने आधे हिंदुस्तान के बदले अपनी मातृभूमि को चुना ”
बदकिस्मती से उनका वो दौरा रद्द हो गया था | “बुक ऑफ़ प्रेसिडेंट यु।एस ए ‘किताब में आप ये बात पढ़ सकते है |
3.... श्री महाराणा प्रताप सिंह जी के भाले का वजन 80 किलो था और कवच का वजन 80 किलो कवच , भाला, ढाल, और हाथ में तलवार का वजन मिलाये तो 207 किलो था।
4.... आज भी महाराणा प्रताप की तलवार कवच आदि सामान उदयपुर राज घराने के संग्रहालय में सुरक्षित हैं |
5.... अकबर ने कहा था कि अगर राणा प्रताप मेरे सामने झुकते है तो आधा हिंदुस्तान के वारिस वो होंगे पर बादशाहत अकबर की ही रहेगी पर श्री महाराणा प्रताप जी ने किसी की भी आधीनता स्वीकार करने से मना कर दिया |
6.... हल्दी घाटी की लड़ाई में मेवाड़ से 20000 सैनिक थे और अकबर की ओर से 85000 सैनिक युद्ध में सम्मिलित हुए |
7.... श्री महाराणा प्रताप जी के घोड़े चेतक का मंदिर भी बना हुवा हैं।जो आज भी हल्दी घाटी में सुरक्षित है |
8.... श्री महाराणा प्रताप जी ने जब महलो का त्याग किया तब उनके साथ लुहार जाति के हजारो लोगो ने भी घर छोड़ा और दिन रात राणा जी कि फौज के लिए तलवारे बनायीं इसी समाज को आज गुजरात
मध्यप्रदेश और राजस्थान में गड़लिया लोहार कहा जाता है मै नमन।करता हूँ एसे लोगो को |
9.... हल्दी घाटी के युद्ध के 300 साल बाद भी वहाँ जमीनों में तलवारें।पायी गयी। आखिरी बार तलवारों का जखीरा 1985 में हल्दी घाटी में।मिला |
10..... श्री महाराणा प्रताप सिंह जी अस्त्र शस्त्र की शिक्षा "श्री जैमल मेड़तिया जी" ने दी थी जो 8000 राजपूत वीरो को लेकर 60000 से लड़े थे। उस युद्ध में 48000 मारे गए थे जिनमे 8000 राजपूत और 40000 मुग़ल थे |
11.... श्री महाराणा प्रताप सिंह जी के देहांत पर अकबर भी रो पड़ा था |
12.... मेवाड़ के आदिवासी भील समाज ने हल्दी घाटी में अकबर की फौज।को अपने तीरो से रौंद डाला था वो श्री महाराणा प्रताप को अपना बेटा मानते थे और राणा जी बिना भेद भाव के उन के साथ रहते थे आज भी मेवाड़ के राजचिन्ह पर एक तरफ राजपूत है तो दूसरी तरफ भील ।
13..... राणा जी का घोडा चेतक महाराणा जी को 26 फीट का दरिया पार करने के बाद वीर गति को प्राप्त हुआ | उसकी एक टांग टूटने के बाद भी वह दरिया पार कर गया। जहा वो घायल हुआ वहीं आज खोड़ी इमली नाम का पेड़ है जहाँ पर चेतक की म्रत्यु हुई वहाँ चेतक मंदिर है।
14...राणा जी का घोडा चेतक भी बहुत ताकतवर था उसके मुँह के आगे दुश्मन के हाथियों को भ्रमीत करने के लिए हाथी की सूंड लगाई जाती थी । यह हेतक और चेतक नाम के दो घोड़े थे ।
15..मरने से पहले महाराणाप्रताप जी ने अपना खोया हुआ 85 % मेवाड फिर से जीत लिया था । सोने चांदी और महलो को छोड़ वो 20 साल मेवाड़ के जंगलो में घूमे ।
16....महाराणा प्रताप जी का वजन 110 किलो और लम्बाई 7 फिट 5इंच थी, वे हाथ मे दो म्यान वाली तलवार और 80 किलो का भाला रखते थे।
द्वंद्व कहां तक पाला जाए, युद्ध कहां तक टाला जाए, 
तू भी है राणा का वंशज है, फेंक जहां तक भाला जाए! 🚩
🚩⚔️हल्दीघाटी युद्ध में वीरगति को प्राप्त होने वाले प्रमुख मेवाड़ी योद्धा" 

1) ग्वालियर के राजा रामशाह तोमर

2) कुंवर शालिवाहन तोमर (रामशाह तोमर के पुत्र व महाराणा प्रताप के बहनोई)

3) कुंवर भान तोमर (रामशाह तोमर के पुत्र)

4) कुंवर प्रताप तोमर (रामशाह तोमर के पुत्र)

5) भंवर धर्मागत तोमर (शालिवाहन तोमर के पुत्र)

6) दुर्गा तोमर (रामशाह तोमर के साथी)

7) बाबू भदौरिया (रामशाह तोमर के साथी)

८) खाण्डेराव तोमर (रामशाह तोमर के साथी)

9) बुद्ध सेन (रामशाह तोमर के साथी)

10) शक्तिसिंह राठौड़ (रामशाह तोमर के साथी)

11) विष्णुदास चौहान (रामशाह तोमर के साथी)

12) डूंगर (रामशाह तोमर के साथी)

13) कीरतसिंह (रामशाह तोमर के साथी)

14) दौलतखान (रामशाह तोमर के साथी)

15) देवीचन्द चौहान (रामशाह तोमर के साथी)

16) छीतर सिंह चौहान (हरिसिंह के पुत्र व रामशाह तोमर के साथी)

17) अभयचन्द्र (रामशाह तोमर के साथी)

18) राघो तोमर (रामशाह तोमर के साथी)

19) राम खींची (रामशाह तोमर के साथी)

20) ईश्वर (रामशाह तोमर के साथी)

21) पुष्कर (रामशाह तोमर के साथी)

22) कल्याण मिश्र (रामशाह तोमर के साथी)

23) बदनोर के ठाकुर रामदास राठौड़ (वीरवर जयमल राठौड़ के 7वें पुत्र) :- ये अपने 9 साथियों समेत काम आए |

24) बदनोर के कुंवर किशनसिंह राठौड़ (ठाकुर रामदास राठौड़ के पुत्र)

25) पाली के मानसिंह सोनगरा चौहान (महाराणा प्रताप के मामा) :- ये अपने 11 साथियों समेत काम आए |

26) कान्ह/कान्हा (महाराणा प्रताप के भाई) :- इनके वंशज आमल्दा व अमरगढ़ में हैं |

27) कल्याणसिंह/कल्ला (महाराणा प्रताप के भाई)

28) कानोड़ के रावत नैतसिंह सारंगदेवोत

29) केशव बारठ (कवि) :- ये सोन्याणा वाले चारणों के पूर्वज थे |

30) जैसा/जयसा बारठ (कवि) :- ये भी सोन्याणा वाले चारणों के पूर्वज थे |

31) कान्हा सांदू (चारण कवि)

32) पृथ्वीराज चुण्डावत (पत्ता चुण्डावत के भाई)

33) आमेट के ठाकुर कल्याणसिंह चुण्डावत (वीरवर पत्ता चुण्डावत के पुत्र) - इनके पीछे रानी बदन कंवर राठौड़ सती हुईं | रानी बदन कंवर मेड़ता के जयमल राठौड़ की पुत्री थीं |

34) देसूरी के खान सौलंकी (ठाकुर सावन्त सिंह सौलंकी के पुत्र)

35) नीमडी के *महेचा* बाघसिंह राठौड़ कल्लावत (मल्लीनाथ के वंशज)

36) देवगढ़ के पहले रावत सांगा चुण्डावत :- ये वीरवर पत्ता चुण्डावत के पिता जग्गा चुण्डावत के भाई थे | रावत सांगा देवगढ़ वालों के मूलपुरुष थे |

37) देवगढ़ के कुंवर जगमाल चुण्डावत (रावत सांगा चुण्डावत के पुत्र)

38) शंकरदास जैतमालोत राठौड़ (ठि. बनोल)

39) रामदास जैतमालोत राठौड़ (ठि. बनोल)

40) केनदास जैतमालोत राठौड़ (ठि. बनोल)

41) नरहरीदास जैतमालोत राठौड़ (ठि. बनोल) :- ये शंकरदास राठौड़ के पुत्र थे |

42) नाहरदास जैतमालोत राठौड़ (ठि. बनोल) :- ये शंकरदास राठौड़ के पुत्र थे |

43) राजपुरोहित नारायणदास पालीवाल के 2 पुत्र

44) किशनदास मेड़तिया

45) सुन्दरदास

46) जावला

47) प्रताप मेड़तिया राठौड़ (वीरमदेव के पुत्र व वीरवर जयमल राठौड़ के भाई)

48) बदनोर के कूंपा राठौड़ (वीरवर जयमल राठौड़ के पुत्र)

49) राव नृसिंह अखैराजोत (पाली के अखैराज के पुत्र)

50) प्रयागदास भाखरोत

51) मानसिंह

52) मेघराज

53) खेमकरण

54) भगवानदास राठौड़ (केलवा के ईश्वरदास राठौड़ के पुत्र)

55) नन्दा पडियार

56) पडियार सेडू

57) साँडू पडियार

58) अचलदास चुण्डावत

59) रावत खेतसिंह चुण्डावत के पुत्र

60) राजराणा झाला मान/झाला बींदा

61) बागड़ के ठाकुर नाथुसिंह मेड़तिया

61) देलवाड़ा के मानसिंह झाला

62) सरदारगढ़ के ठाकुर भीमसिंह डोडिया

63) सरदारगढ़ के कुंवर हम्मीर सिंह डोडिया (ठाकुर भीमसिंह के पुत्र)

64) सरदारगढ़ के कुंवर गोविन्द सिंह डोडिया (ठाकुर भीमसिंह के पुत्र)

65) सरदारगढ़ के ठाकुर भीमसिंह डोडिया के 2 भाई

66) पठान हाकिम खां सूर (शेरशाह सूरी के वंशज, मायरा स्थित शस्त्रागार के प्रमुख व मेवाड़ के सेनापति)

67) मोहम्मद खान पठान

68) जसवन्त सिंह

69) कोठारिया के राव चौहान पूर्बिया

70) रामदास चौहान

71) राजा संग्रामसिंह चौहान

72) विजयराज चौहान

73) राव दलपत चौहान

74) दुर्गादास चौहान (परबत सिंह पूर्बिया के पुत्र)

75) दूरस चौहान (परबत सिंह पूर्बिया के पुत्र)

76) सांभर के राव शेखा चौहान

77) हरिदास चौहान

78) बेदला के भगवानदास चौहान (राव ईश्वरदास के पुत्र)

79) शूरसिंह चौहान

80) रामलाल

81) कल्याणचन्द मिश्र

82) प्रतापगढ़ के कुंवर कमल सिंह

83) धमोतर के ठाकुर कांधल जी :- देवलिया महारावत बीका ने अपने भतीजे ठाकुर कांधल जी को हल्दीघाटी युद्ध में लड़ने भेजा था |

84) अभयचन्द बोगसा चारण

85) खिड़िया चारण

86) रामसिंह चुण्डावत (सलूम्बर रावत कृष्णदास चुण्डावत के भाई)

87) प्रतापसिंह चुण्डावत (सलूम्बर रावत कृष्णदास चुण्डावत के भाई)

88) गवारड़ी (रेलमगरा) के मेनारिया ब्राह्मण कल्याण जी पाणेरी

89) श्रीमाली ब्राह्मण :- इनके पीछे इनकी एक पत्नी सती हुईं | रक्त तलाई (खमनौर) में इन सती माता का स्थान अब तक मौजूद है |

90) कीर्तिसिंह राठौड़

91) जालमसिंह राठौड़

92) आलमसिंह राठौड़

93) भवानीसिंह राठौड़

94) अमानीसिंह राठौड़

95) रामसिंह राठौड़

96) दुर्गादास राठौड़

97) कानियागर के मानसिंह राठौड़

98) राघवदास

99) गोपालदास सिसोदिया

100) मानसिंह सिसोदिया

101) राजा विट्ठलदास

102) भाऊ

103) पुरोहित जगन्नाथ

104) पडियार कल्याण

105) महता जयमल बच्छावत

106) महता रतनचन्द खेमावत

107) महासहानी जगन्नाथ

108) पुरोहित गोपीनाथ

109) बिजौलिया के राव मामरख पंवार (महाराणा प्रताप के ससुर व महारानी अजबदे बाई के पिता)

110) बिजौलिया के कुंवर डूंगरसिंह पंवार (महारानी अजबदे बाई के भाई)

111) बिजौलिया के कुंवर पहाडसिंह पंवार (महारानी अजबदे बाई के भाई)

112) ताराचन्द पंवार (खडा पंवार के पुत्र)

113) सूरज पंवार (खडा पंवार के पुत्र)

114) वीरमदेव पंवार

115) राठौड़ साईंदास पंचायनोत जेतमालोत (कल्ला राठौड़ के पुत्र) :- ये अपने 13 साथियों समेत काम आए |

116) मेघा खावडिया (राठौड़ साईंदास के साथी)

117) सिंधल बागा (राठौड़ साईंदास के साथी)

118) दुर्गा चौहान (राठौड़ साईंदास के साथी)

119) वागडिया (राठौड़ साईंदास के साथी)

120) जयमल (राठौड़ साईंदास के साथी)

121) नागराज
✍🏻नवयुवक मंडल मेवाड़

महाराणा प्रताप जैसे युगपुरुष की प्रतापशील स्मृति को केवल एक दिवस में बाँधने की चर्चा ही असंगत लगती है। उनकी पुण्यतिथि को लेकर 19 और 29 जनवरी का असमंजस भले ही बना रहे, पर मेरे लिए इस प्रश्न ने कभी महत्व नहीं रखा क्योंकि जिनका जीवन ही स्वाभिमान की अखंड साधना था, उन्हें स्मरण करने के लिए प्रत्येक दिन स्वयं में एक पर्व है। महाराणा प्रताप इतिहास का मात्र एक स्वर्णिम अध्याय नहीं हैं, बल्कि अन्याय तथा वर्चस्ववाद के विरुद्ध खड़े हर सजग मनुष्य की चेतना का नाम हैं। शौर्य, स्वाभिमान तथा राष्ट्रधर्म के प्रतीक महान महाराणा प्रताप को सादर प्रणाम 🙏🏻

#वो_मतवाला_वीर_बड़ा_दिलवाला_था ,, 
#मातृभूमि_का_सचा_रखवाला_था !!! 

#छाती_फटने_लगती_दुश्मनो_की_उसकी_हूँकार_सुनकर,,, 
#करोडो_मे_से_एक_वो_समर_मतवाला_था !!! 

#अजर_अमर_वो_शूरवीर_था_अपार_शक्तिशाली,, 
#मुगलो_की_जिसने_रातो_की_नींदे_उड़ा_डाली !!! 

#गरीबो_के_प्रति_था_बहुत_दिल_था_बहुत_प्रेम_उसके ,,, 
#उनकी_खुशियों_के_लिए_अपनी_पहचान_लुटा_डाली !!! 

#वंश_का_गौरव_था_सूर्य_सा_उसमे_तेज_था ,,, 
#प्रजा_के_प्रति_ह्वदय_मे_अपार_प्रेम_था !!! 

#अपने_तेज_से_राज्य_को_प्रफुल्लित_करता ,,, 
#दुश्मन_को_को_राख_बना_दे_ऐसा_उसमे_तेज_था !!! 

#जब_भी_विवश_होकर_वो_महावीर_समर_भूमि_मे_उतरता_था ,,, 

#दुश्मनो_की_छाती_चिरता_हुआ_आगे_बढ़ता_था !!! 

#खौफ_खाते_थे_सारे_आक्रांता_उसके_तपोबल_से ,,, 
#वो_वीरपराकर्मी_जीधर_बढ़ता_मानो_मृत्युंज्य_बनता_था !!! 

#क्षत्रिय_सम्राट_वीर_शिरोमणि_महाराणा_प्रताप_सिंह_जी_की_429_वी_पुण्यतिथि_पर_शत_शत_नमन 🙏🙏🙏🙏🙏

🚩🏹 #जय_जय_श्रीराम 🏹🚩
🙏❤ #महादेव_नमन ❤🙏
🚩🔱 #जय_माँ_भवानी 🔱🚩
🚩⚔ #जय_महाराणा_प्रताप_जी_की ⚔🚩
🚩⚔ #जय_जय_राजपुताना ⚔🚩
साभार


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*वीरता ,स्वाभिमान की प्रतिमूर्ति , अखंड स्वाभिमानी वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप जी की पुण्यतिथि पर कोटि कोटि नमन🙏🙏*

*महाराणा प्रताप जी की जीवनी*
*हर व्यक्ति को पढ़नी चाहिए, ताकि स्वाभिमान कभी न सोए*

अंग्रेजी तिथि अनुसार वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप का जन्म 9 मई, 1540 ई. व विक्रम संवत अनुसार ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया को कुंभलगढ़ में हुआ।

1552 ई. में कुंभलगढ़ से चित्तौड़गढ़ प्रस्थान किया। कुँवर प्रताप ने 1554 ई. में 14 वर्ष की उम्र में जैताणा के युद्ध में करण सिंह को मारकर वागड़ की फ़ौज को परास्त किया। कुछ समय बाद छप्पन व गोडवाड़ के क्षेत्रों को जीत लिया।

1557 ई. में बिजोलिया की राजकुमारी अजबदे बाई सा से विवाह हुआ। 1563 ई. में भोमठ पर विजय प्राप्त की। 1572 ई. में महाराणा प्रताप मेवाड़ के शासक बने व सिरोही पर कल्ला देवड़ा के ज़रिए अधिकार किया, कुछ समय बाद सिरोही राव सुरताण से मित्रता कर ली।

1572 ई. में महाराणा प्रताप द्वारा मंदसौर के मुगल थानों पर आक्रमण व विजय प्राप्त की गई। 1573 ई. में महाराणा ने गुजरात से आगरा जाती हुई मुगल फौज पर आक्रमण किया व दण्डस्वरूप खजाना लिया।

महाराणा प्रताप ने 1572 ई. से 1573 ई. के बीच अकबर द्वारा भेजे गए 4 सन्धि प्रस्तावों को खारिज किया :- 1) जलाल खां 2) राजा मानसिंह 3) राजा भगवानदास 4) राजा टोडरमल

1574 ई. में चुंडावत जी के ज़रिए सिन्हा राठौड़ को परास्त कर सलूम्बर पर विजय प्राप्त की। 1576 ई. में हल्दीघाटी का विश्व प्रसिद्ध युद्ध हुआ, जो कि अनिर्णित रहा। हालांकि दोनों पक्षों ने अपनी-अपनी विजय बयां की है।
23 जून, 1576 ई. को राजा मानसिंह ने गोगुन्दा पर हमला किया। यहां तैनात 20 मेवाड़ी बहादुर काम आए। अगस्त, 1576 ई. में महाराणा प्रताप द्वारा अजमेर, गोडवाड़ व उदयपुर की मुगल छावनियों पर आक्रमण किए गए।

सितम्बर, 1576 ई. में महाराणा प्रताप ने गोगुन्दा पर आक्रमण किया व कईं मुगलों को मारकर गोगुन्दा पर अधिकार किया। अक्टूबर, 1576 ई. में मुगल बादशाह अकबर 80 हज़ार सवारों समेत स्वयं मेवाड़ अभियान हेतु रवाना हुआ।

अकबर एक वर्ष तक मेवाड़ व उसके आसपास ही रहा व महाराणा प्रताप पर कईं हमले किए, पर हर बार नाकामयाबी मिली। अकबर ने कुतुबुद्दीन, राजा भगवानदास व राजा मानसिंह को गोगुन्दा पर हमला करने भेजा।
छोटे-बड़े कई हमलों के बाद अंततः गोगुन्दा पर महाराणा प्रताप की दोबारा विजय हुई। महाराणा प्रताप के खौफ से हज यात्रियों के जुलूस की हिफाजत में अकबर द्वारा 2 फौजें भेजी गईं।

महाराणा प्रताप ने राव दूदा हाडा को बूंदी जीतने में फ़ौजी मदद की। 1577 ई. में ईडर के दूसरे युद्ध में महाराणा प्रताप ने अपने श्वसुर राय नारायणदास राठौड़ को ईडर की गद्दी दिलाने का प्रयास किया, पर सफलता नहीं मिली।

मई-सितम्बर, 1577 ई. में महाराणा प्रताप ने गोगुन्दा व उदयपुर में तैनात मुगल थाने उखाड़ फेंके। अक्टूबर, 1577 ई. में महाराणा प्रताप ने मेवाड़ के सबसे बड़े मुगल थाने मोही पर आक्रमण किया। थानेदार मुजाहिद बेग कत्ल हुआ व मोही पर महाराणा का अधिकार हुआ।

अक्टूबर, 1577 ई. में अकबर ने शाहबाज खां को फौज समेत मेवाड़ भेजा। नवम्बर, 1577 ई. में महाराणा प्रताप द्वारा केलवाड़ा मुगल थाने पर आक्रमण किया गया व 4 मुगल हाथी पकड़े गए।

1578 ई. में कुम्भलगढ़ का युद्ध हुआ, जिसमें शाहबाज खां ने कुम्भलगढ़ पर अधिकार किया। महाराणा प्रताप ने कुम्भलगढ़ की पराजय के प्रतिशोध स्वरुप जालौर व सिरोंज के सभी मुगल थाने जलाकर खाक किये।

1578 ई. में वागड़ की फौजों से हुए युद्ध में महाराणा प्रताप द्वारा भेजे गए रावत भाण सारंगदेवोत की विजय हुई। 15 दिसम्बर, 1578 ई. में अकबर ने शाहबाज खां को दूसरी बार मेवाड़ अभियान हेतु भेजा।

1578 ई. में महाराणा प्रताप ने भामाशाह जी को फौज देकर मालवा पर आक्रमण करने भेजा। 15 नवम्बर, 1579 ई. को अकबर ने शाहबाज खां को तीसरी बार मेवाड़ अभियान हेतु

भेजा, पर वह असफल हुआ। 1580 ई. में अकबर ने अब्दुर्रहीम खान-ए-खाना को फौज

सहित मेवाड़ भेजा। महाराणा प्रताप ने कुँवर अमरसिंह द्वारा बंदी बनाई गई रहीम की बेगमों को मुक्त कर क्षात्र धर्म का पालन किया। रहीम इस अभियान में बुरी तरह असफल रहा।

1580 ई. में मालवा में भामाशाह के भाई ताराचंद के ज़ख़्मी होने पर महाराणा प्रताप मालवा से ताराचंद को सुरक्षित चावण्ड ले आए व रास्ते में आने वाली मुगल चौकियों को तहस-नहस कर दिया, साथ ही मंदसौर के सबसे बड़े मुगल थाने पर आक्रमण कर विजय प्राप्त की।

अक्टूबर, 1582 ई. में दिवेर का युद्ध हुआ। महाराणा प्रताप द्वारा मुग़ल सेनापति सुल्तान खां को परास्त किया गया। कुँवर अमरसिंह द्वारा सुल्तान खां का वध किया गया।

1583 ई. में महाराणा ने हमीरपाल झील पर तैनात मुगल छावनी हटाई। 1583 ई. में कुम्भलगढ़ का दूसरा युद्ध हुआ, जिसमें महाराणा प्रताप ने मुगल सेनापति को परास्त कर दुर्ग पर अधिकार किया।

1583 ई. में महाराणा प्रताप द्वारा मांडल के थाने पर आक्रमण करके विजय प्राप्त की गई। मुगलों की तरफ से इस थाने के मुख्तार राव खंगार कछवाहा व नाथा कछवाहा काम आए। राव खंगार की छतरी विद्यमान है, जिसपे इस लड़ाई में मरने वालों के नाम खुदे हैं।

1583 ई. में बांसवाड़ा में मानसिंह चौहान से युद्ध हुआ। 1584 ई. में उदयपुर के राजमहलों में तैनात मुगलों पर महाराणा प्रताप ने आक्रमण कर विजय पाई। अकबर द्वारा 1576 ई. में उदयपुर का नाम 'मुहम्मदाबाद' रखने पर महाराणा द्वारा फिर से नाम बदलकर उदयपुर रख दिया गया।

1584 ई. में अकबर ने जगन्नाथ कछवाहा को फौज समेत मेवाड़ भेजा, पर जगन्नाथ कछवाहा भी 2 वर्ष तक मेवाड़ में रहकर असफल होकर लौट गए। 1584 ई. में अकबर ने अब्दुर्रहीम खान-ए-खाना को दोबारा मेवाड़ अभियान पर भेजा।

1585 ई. में महाराणा प्रताप ने लूणा चावण्डिया को पराजित कर चावण्ड पर अधिकार किया व चावण्ड को राजधानी बनाई। 1586 ई. में मेवाड़ में लूटमार करने वाले नवाब अली खां का दमन किया।

1585 से 1587 ई. के मध्य महाराणा प्रताप व कुँवर अमरसिंह द्वारा मोही, मदारिया समेत कुल 36 मुगल थानों पर आक्रमण करके विजय प्राप्त की गई। 1588 ई. में महाराणा प्रताप ने जहाजपुर पर विजय प्राप्त की।

1589 ई. में महाराणा प्रताप द्वारा सूरत के शाही थानों पर आक्रमण किया गया। महाराणा ने हाथी पर सवार सूरत के मुगल सूबेदार को भाले से कत्ल किया। 1591 ई. में राजनगर के युद्ध में महाराणा की फौज द्वारा दलेल खां की पराजय हुई।

1591 ई. में दिलावर खां से कनेचण का युद्ध हुआ। जनवरी, 1597 ई. में वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप का देहान्त हुआ।

आप पढ़ते-पढ़ते थक गए होंगे। महाराणा प्रताप ने कितना कुछ सहा, क्या कुछ झेला, इसकी कल्पना हम और आप जैसे साधारण लोगों के बस की बात नहीं। निसन्देह महाराणा प्रताप संघर्ष व स्वाभिमान के पर्याय थे, हैं व रहेंगे।

*जय मां भवानी*🚩
*क्षत्रिय धर्म युगेयुगे*🚩


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वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप जी की मौत पर अकबर का दुख 🙏🚩⚔️
अकबर महाराणा प्रताप के सबसे बड़े राजनीतिक विरोधी थे, लेकिन यह संघर्ष किसी निजी नफ़रत का नतीजा नहीं था। यह दो विचारधाराओं का टकराव था—
एक और साम्राज्य विस्तार की नीति, और दूसरी ओर मातृभूमि की आज़ादी का पक्का इरादा।
महाराणा प्रताप ने ज़िंदगी भर आज़ादी को सबसे ऊपर माना। वे ऐसे हीरो थे जिन्होंने किसी भी हालत में आत्म-सम्मान से समझौता नहीं किया।
इसलिए महाराणा प्रताप की मौत की खबर सुनकर अकबर बहुत दुखी हुए। दिल से वे महाराणा प्रताप की बहादुरी, आत्म-सम्मान और बलिदान के मुरीद थे। कहा जाता है कि यह खबर सुनकर अकबर चुप हो गए और उनकी आंखों से आंसू बह निकले।
महाराणा प्रताप की मौत के समय अकबर लाहौर में थे। वहीं उन्हें यह खबर मिली। उस पल अकबर के मूड को उनके दरबारी कवि दुरसा आढ़ा ने राजस्थानी कविताओं में इस तरह बताया है। राजस्थानी शौक
यह लेगो अनस्टेन्ड पग लेगो अननेम्ड है
गो आदा गावदाई जी, कई घुरवामी
नवरोज न गयो न गो आसतां नवल्ली
डोंट गो विंडो हेठ जेठ दुनियां दहली
गहलोत राणा वॉन दसन मुंड रसना दासी
निसा साइलेंट आइज़ आर डेड शाह प्रतापसी
हिंदी भाई ट्रांसलेशन
हे राणा प्रताप सिंह इन गहलोत!
तुम्हारी मौत पर बादशाह अकबर ने दांतों तले जीभ दबाई और आंखों से आंसू बह निकले।
क्योंकि तुमने कभी अपने घोड़ों पर दाग नहीं लगने दिया,
तुमने कभी किसी के सामने अपनी पगड़ी नहीं झुकाई।
भले ही तुमने अपना राज खो दिया,
लेकिन तुमने हमेशा अपने कंधों पर आत्म-सम्मान का भार उठाया।
तुम कभी नवरोज नहीं गए, न ही शाही कैंप में खड़े हुए।
कभी खिड़की के नीचे सिर नहीं झुकाया।
तो इतिहास गवाह है—
तुम हर तरह से जीते, और राजा हार गया। अपनी मातृभूमि की आज़ादी के लिए जान देने वाले
वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप
और उनके अपने भक्त घोड़ा चेतक
आपको शत-शत नमन।
🚩🇮🇳
 से साभार उद्धृत
*Asweekran DISCLAIMER*

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जय राजपूताना अखंड राजपूताना जय महाराणा।



*गिरा जहां पर खून वहां का , पत्थर पत्थर जिंदा है ।*
*जिस्म नही है मगर नाम का ,अक्षर अक्षर जिंदा है ।।*

*जीवन मे यह अमर कहानी , अक्षर अक्षर गढ़ लेना ।*
*शौर्य कभी सो जाएं तो ,राणा प्रताप को पढ़ लेना ।।*

*देश के इतिहास में त्याग बलिदान और वीरता की सबसे मिसाल महान सपूत और वीर योद्धा महाराणा प्रताप को उनकी पुण्यतिथि पर शत-शत नमन।*

 *उनकी जीवन-गाथा साहस, शौर्य, स्वाभिमान और पराक्रम का प्रतीक है, जिससे देशवासियों को सदा राष्ट्रभक्ति की प्रेरणा मिलती रहेगी*