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Tuesday, 6 October 2026

KATHE HAR ROHILKHAND NARESH UNTOLD STORY OF A GREAT WARRIOR

राजपूताना कठेहर रोहिलखंड के अमर अपराजित योद्धा ,
सूर्यवंशी क्षत्रिय सम्राट महाराजा रणवीर सिंह रोहिला
25 अक्टूबर — स्वाभिमान दिवस | रक्षा बंधन — शौर्य एवं बलिदान दिवस
⚔️ “धर्म, स्वाभिमान और मातृभूमि की रक्षा हेतु जिसने अंतिम सांस तक संघर्ष किया” ⚔️
भारतीय इतिहास के पन्नों में अनेक ऐसे वीर हुए जिन्होंने विदेशी आक्रांताओं के सामने कभी सिर नहीं झुकाया। उन्हीं अमर योद्धाओं में एक तेजस्वी नाम है —
महाराजा रणवीर सिंह रोहिला
जो राजपूताना कठेहर रोहिलखंड के महान सूर्यवंशी क्षत्रिय सम्राट थे।
उनका जीवन केवल युद्ध गाथा नहीं, बल्कि धर्म रक्षा, राष्ट्र गौरव, क्षात्र मर्यादा और आत्मबलिदान का अद्वितीय उदाहरण है।
🛕 जन्म एवं वंश परिचय
जन्म : 25 अक्टूबर 1204 ईस्वी
तिथि : कार्तिक मास, कृष्ण पक्ष, प्रथमा
संवत : 1261 विक्रमी
पिता : महाराजा त्रिलोक सिंह जी
वंश : रघुवंशी सूर्यवंश — निकुंभ शाखा
गोत्र : वशिष्ठ, भारद्वाज 
इष्टदेव : भगवान रघुनाथ जी
उद्घोष : हर हर महादेव
महाराजा रणवीर सिंह उस गौरवशाली सूर्यवंश से संबंधित थे जिसकी परंपरा भगवान श्रीराम तक जाती है। यह वंश वीरता, त्याग और धर्मपालन के लिए प्रसिद्ध रहा।
🌄 कठेहर रोहिलखंड राज्य की स्थापना
निकुंभ वंशी कठ क्षत्रियों का मूल क्षेत्र रावी नदी के तटवर्ती भाग माना जाता है। समय के साथ यह वंश राजस्थान, सौराष्ट्र और फिर पांचाल-मध्यदेश क्षेत्र में पहुँचा।
कन्नौज के पतन के बाद इस वीर क्षत्रिय वंश ने कठेहर रोहिलखंड राज्य की स्थापना की और अहिक्षेत्र के समीप रामनगर तथा बाद में रामपुर को राजधानी बनाया।
राज्य विस्तार
गंगा-यमुना दोआब
उत्तराखंड सीमा तक
नेपाल की तराई तक
लगभग 25,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र
यह राज्य उस समय उत्तर भारत की प्रमुख स्वतंत्र राजपूत शक्तियों में गिना जाता था।
🗡️ महाराजा रणवीर सिंह का उदय
1225 ईस्वी में मात्र 21 वर्ष की आयु में महाराजा रणवीर सिंह का राजतिलक हुआ। उसी वर्ष उनका विवाह विजयपुर सीकरी की राजकुमारी तारा देवी से हुआ।
उनके व्यक्तित्व का वर्णन अत्यंत अद्भुत मिलता है—
लगभग 7 फीट ऊँचा शरीर
60 सेर का कवच
25 सेर की विशाल तलवार
असाधारण युद्ध कौशल
उनके साथ 84 महान कवचधारी राजपूत योद्धाओं की सेना रहती थी, जिनमें राठौड़, चौहान, परमार, गोड़, वच्छिल पुंडीर आदि वीर शामिल थे।
⚔️ दिल्ली सल्तनत से संघर्ष
जब पृथ्वीराज चौहान के बाद अधिकांश राजपूत शक्तियाँ कमजोर पड़ चुकी थीं, उस समय दिल्ली सल्तनत उत्तर भारत में अपना विस्तार कर रही थी।
किन्तु कठेहर रोहिलखंड की धरती पर महाराजा रणवीर सिंह ने विदेशी सत्ता को कभी स्वीकार नहीं किया।
उन्होंने —
दिल्ली सल्तनत की अनेक सेनाओं को पराजित किया
रोहिलखंड में मुस्लिम सल्तनत का प्रवेश रोका
आसपास की राजपूत शक्तियों को संगठित किया
स्वतंत्रता और धर्म रक्षा की लौ जीवित रखी
🔥 1253 ईस्वी का ऐतिहासिक युद्ध
दिल्ली सल्तनत के सेनापति नासिरुद्दीन महमूद (चंगेज) ने रोहिलखंड को जीतने के लिए विशाल सेना के साथ आक्रमण किया।
रामपुर और पीलीभीत के मध्य हुए भीषण युद्ध में—
महाराजा रणवीर सिंह की लगभग 6000 सेना
और 84 कवचधारी वीरों ने
दिल्ली सल्तनत की 30,000 सेना को परास्त कर दिया
इतिहास के अनुसार नासिरुद्दीन महमूद को बंदी बना लिया गया था।
किन्तु क्षात्र धर्म का पालन करते हुए महाराजा रणवीर सिंह ने उसे अभयदान देकर मुक्त कर दिया।
⚠️ विश्वासघात और बलिदान
पराजय से अपमानित नासिरुद्दीन ने छल का सहारा लिया।
राजदरबार के एक व्यक्ति गोकुलराम पांडेय को लालच देकर उसने किले की गुप्त जानकारी प्राप्त की। रक्षा बंधन के दिन जब सभी राजपूत शिव मंदिर में शस्त्र पूजा हेतु निःशस्त्र थे, तभी विश्वासघात कर किले का द्वार खोल दिया गया।
फिर क्या हुआ?
निहत्थे राजपूतों ने भीषण युद्ध किया
महाराजा रणवीर सिंह ने अकेले सैकड़ों शत्रुओं का संहार किया
अंतिम रक्त बूंद तक युद्ध करते रहे
पीठ पर वार होने के बाद भी धराशायी नहीं हुए
अंततः रक्षा बंधन के पावन दिन
महाराजा रणवीर सिंह रोहिला वीरगति को प्राप्त हुए।
🔥 महारानी तारा देवी का जौहर
महाराजा के बलिदान के पश्चात् महारानी तारा देवी ने सती होकर क्षत्राणी धर्म का पालन किया।
आज भी रामपुर क्षेत्र में किले के अवशेष, सती स्थल और ऐतिहासिक टीले उस गौरवगाथा के साक्षी माने जाते हैं।
🛡️ क्यों महत्वपूर्ण है यह इतिहास?
महाराजा रणवीर सिंह का जीवन हमें सिखाता है—
✅ धर्म की रक्षा सर्वोपरि है
✅ विश्वासघात सबसे बड़ा शत्रु है
✅ राष्ट्र और स्वाभिमान हेतु संघर्ष कभी व्यर्थ नहीं जाता
✅ छोटी शक्ति भी संगठन और साहस से बड़ी साम्राज्यवादी ताकतों को चुनौती दे सकती है
📜 आज भी जीवित है उनकी स्मृति
रोहिला क्षत्रिय समाज आज भी—
25 अक्टूबर को स्वाभिमान दिवस
तथा
रक्षा बंधन को शौर्य एवं बलिदान दिवस
के रूप में मनाता है।
शस्त्र पूजन, वीर स्मरण और समाज जागरण कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।
🚩 अमर संदेश
“क्षात्र धर्म केवल युद्ध नहीं, बल्कि सत्य, संस्कृति और स्वाभिमान की रक्षा का संकल्प है।”
महाराजा रणवीर सिंह रोहिला का बलिदान भारतीय इतिहास की उन अमर गाथाओं में से है जिन्हें आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाना आवश्यक है।
📚 संदर्भ स्रोत
इतिहास रोहिला राजपूत — डॉ. के.सी. सेन
रोहिला क्षत्रियों का क्रमबद्ध इतिहास — दर्शन लाल रोहिला
रोहिला क्षत्रिय वंश भास्कर — आर.आर. राजपूत
मध्यकालीन भारत — ठाकुर अजित सिंह परिहार
अन्य पारंपरिक राजपूत वंशावली स्रोत
🚩 जय राजपुताना — जय कठेहर रोहिलखंड 🚩
⚔️ हर हर महादेव ⚔️

RAJPUTANA ROHILKHAND KE SANSTHAPAK। MAHARSJA RANVEER SINGH ROHILA

*महाराजा रणवीर सिंह रोहिला*
*कठेहर–रोहिलखण्ड के सूर्यवंशी क्षत्रिय शासक*
भारतीय इतिहास के विस्तृत परिदृश्य में अनेक ऐसे क्षेत्रीय शक्तिकेंद्र रहे हैं जिनकी वीरगाथाएँ मुख्यधारा इतिहास लेखन में सीमित स्थान पा सकीं, किन्तु जनस्मृति, वंशावली, लोकपरंपरा और क्षेत्रीय इतिहास में वे अत्यंत जीवंत हैं। कठेहर–रोहिलखण्ड (वर्तमान उत्तर प्रदेश का उत्तरी भाग) का इतिहास भी ऐसा ही एक अध्याय है। इस क्षेत्र के सूर्यवंशी निकुम्भ वंशीय कठेहरिया क्षत्रियों में जन्मे महाराजा रणवीर सिंह रोहिला 13वीं शताब्दी के उन वीर शासकों में गिने जाते हैं जिन्होंने राजनीतिक स्वाधीनता, धार्मिक आस्था और क्षात्र धर्म की रक्षा के लिए संघर्ष किया।
यह ग्रंथ उनके वंश, ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, कठ/काठी परंपरा, कठेहर राज्य की स्थापना, दिल्ली सल्तनत से संघर्ष, विश्वासघात, बलिदान और ऐतिहासिक विरासत का क्रमबद्ध, शोधपरक और विश्लेषणात्मक प्रस्तुतीकरण है।
अध्याय 1
सूर्यवंश, निकुम्भ वंश और कठ परंपरा
1.1 सूर्यवंश की ऐतिहासिक अवधारणा
भारतीय परंपरा में सूर्यवंश को इक्ष्वाकु कुल से जोड़ा जाता है। पुराणों और राजवंशावलियों के अनुसार इक्ष्वाकु से प्रारंभ यह वंश अनेक शाखाओं में विभक्त हुआ। इन्हीं शाखाओं में निकुम्भ वंश का उल्लेख मिलता है, जो परंपरा के अनुसार अयोध्या के सूर्यवंशी राजाओं से संबंधित माना जाता है।
निकुम्भ वंश की एक शाखा “कठ” अथवा “काठी” के नाम से विख्यात हुई। यही शाखा आगे चलकर कठेहरिया क्षत्रियों के रूप में जानी गई।
1.2 कठ गणराज्य और उत्तर-पश्चिम भारत
ईसा पूर्व चौथी शताब्दी में उत्तर-पश्चिम भारत में अनेक गणराज्य विद्यमान थे। जब Alexander the Great ने 326 ईसा पूर्व भारतीय सीमा में प्रवेश किया, तब रावी नदी के तट पर “कठ” या “कठोई” नामक एक वीर गणराज्य का उल्लेख यूनानी लेखकों ने किया है।
उनकी राजधानी “सांकल” (आधुनिक स्यालकोट से संबद्ध मानी जाती है) बताई जाती है। यूनानी इतिहासकारों ने कठों की—
असाधारण युद्धक क्षमता
शारीरिक सौष्ठव
अनुशासित सैन्य संरचना
की प्रशंसा की है।
कुछ विवरणों में यह भी उल्लेख मिलता है कि कठ लोग सर्वश्रेष्ठ और बलिष्ठ योद्धा को ही शासक चुनते थे।
1.3 संस्कृत ग्रंथों में कठ
संस्कृत व्याकरणाचार्य Panini की अष्टाध्यायी में कठों का उल्लेख मिलता है। यह प्रमाणित करता है कि कठ जनपद वैदिकोत्तर काल में एक प्रतिष्ठित समुदाय था।
महाभाष्यकार पतंजलि ने भी कठों का उल्लेख किया है। कठों की वेद शाखा “काठक संहिता” के नाम से प्रसिद्ध रही।
यह उल्लेख इस समुदाय की वैदिक, सांस्कृतिक और सैन्य प्रतिष्ठा को दर्शाता है।
अध्याय 2
कठों का विस्थापन और विस्तार
2.1 सिकंदर के पश्चात राजनीतिक परिवर्तन
उत्तर-पश्चिम भारत में आक्रमणों और सत्ता संघर्षों के परिणामस्वरूप अनेक क्षत्रिय गणराज्य विस्थापित हुए। कठों की विभिन्न टुकड़ियाँ भारत के भिन्न क्षेत्रों में प्रवासित हुईं।
परंपरा के अनुसार:
एक शाखा सौराष्ट्र गई
एक शाखा पंचाल (मध्यदेश) में आई
एक शाखा नेपाल क्षेत्र में पहुँची
2.2 काठियावाड़ की स्थापना
सौराष्ट्र क्षेत्र, जो प्राचीन काल से प्रसिद्ध था, कठ क्षत्रियों के प्रभाव से “काठियावाड़” नाम से विख्यात हुआ। काठी दरबार और काठी क्षत्रिय परंपरा ने वहाँ की सैन्य और सामाजिक संरचना पर गहरी छाप छोड़ी।
लोक कहावत—
“काल भी अगर छोड़ दे, लेकिन काठी नहीं छोड़ता।”
—काठी क्षत्रियों के युद्ध-संकल्प और प्रतिशोधात्मक दृढ़ता का प्रतीक मानी जाती है।
2.3 कठेहर खंड का उद्भव
पंचाल क्षेत्र (वर्तमान उत्तर प्रदेश का उत्तरी भाग) में बसने वाली शाखा ने कठेहर राज्य की नींव रखी। यही क्षेत्र आगे चलकर रोहिलखण्ड के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
कठेहर शब्द का अर्थ है—कठों का क्षेत्र।
अध्याय 3
कठेहर राज्य की स्थापना और प्रारंभिक शासक
3.1 ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
7वीं से 10वीं शताब्दी के मध्य उत्तर भारत में अनेक क्षेत्रीय शक्तियाँ उभरीं। इन्हीं में कठेहर राज्य का भी क्रमिक विकास हुआ।
परंपरा के अनुसार 648–720 ईस्वी के मध्य कठेहर में स्थिर राज्य व्यवस्था विकसित हुई।
3.2 रामपुर की स्थापना
राजा रामसिंह (रामशाह) ने 909 ईस्वी (विक्रमी संवत 966) में रामपुर को राजधानी के रूप में विकसित किया। यह स्थान अहिक्षेत्र (रामनगर के समीप) क्षेत्र में स्थित था।
रामपुर:
सामरिक दृष्टि से सुरक्षित
नदी तंत्र से संरक्षित
कृषि और व्यापार के लिए अनुकूल
क्षेत्र था।
3.3 वंशावली क्रम
परंपरागत वंश सूची के अनुसार प्रमुख शासक:
रामशाह (रामसिंह)
बीजयराज
करणचन्द
विम्रहराज
सावन्त सिंह (जिन्होंने राज्य का विस्तार गंगा पार यमुना तक किया)
जगमाल
रणवीर सिंह
धिंगतराम
गोकुल सिंह
महासहाय
त्रिलोकचन्द
नौरंग देव
यह वंश लगभग 11 पीढ़ियों तक कठेहररोहिलखंड पर शासन करता रहा।
अध्याय 4
महाराजा रणवीर सिंह रोहिला – जन्म और प्रारंभिक जीवन
4.1 जन्म
जन्म तिथि: 25 अक्टूबर 1204 ईस्वी
विक्रम संवत: 1261
स्थान: रामपुर, कठेहर
गोत्र: वशिष्ठ
वंश: निकुम्भ वंशी कठेहरिया क्षत्रिय
4.2 शिक्षा और प्रशिक्षण
राजकुमार रणवीर सिंह को:
धनुर्विद्या
तलवारबाजी
घुड़सवारी
दुर्ग रक्षा नीति
शास्त्र एवं धर्म शिक्षा
दी गई।
उनका व्यक्तित्व तेजस्वी, दृढ़निश्चयी और धर्मनिष्ठ बताया जाता है।
4.3 84 कवचधारी रोहिले
उनकी विशिष्ट सैन्य टुकड़ी “84 लोहे के कवचधारी” योद्धाओं की थी। ये रणधेलवंशी वीर, कठोर अनुशासन और अदम्य साहस के लिए प्रसिद्ध थे।
अध्याय 5
13वीं शताब्दी का राजनीतिक परिदृश्य
13वीं शताब्दी में दिल्ली में गुलाम वंश का शासन था। सुल्तान नासिरुद्दीन महमूद ( बहराम गुलाम वंश)नाममात्र के शासक थे, जबकि वास्तविक शक्ति शक्तिशाली अमीरों, विशेषकर  गयासुद्दीन बलबन के हाथों में केंद्रित थी।
दिल्ली सल्तनत:
दोआब क्षेत्र पर नियंत्रण चाहती थी
राजस्व विस्तार कर रही थी
सीमावर्ती स्वतंत्र राज्यों को अधीन करना चाहती थी
अध्याय 6
संघर्ष का आरंभ
1253–1254 ईस्वी में दोआब, कठेहर और शिवालिक क्षेत्र में दमनकारी अभियान चलाया गया।
अत्याचारों से क्षुब्ध होकर स्थानीय शक्तियों ने विद्रोह किया। कठेहर में सल्तनती सूबेदार की हत्या कर दी गई।
यह घटना दिल्ली के लिए गंभीर चुनौती थी।
अध्याय 7
रामपुर–पीलीभीत का निर्णायक युद्ध
7.1 युद्ध की तैयारी
रामपुर और पीलीभीत के मध्य मैदान में दिल्ली सल्तनत की लगभग 30,000 सेना और महाराजा रणवीर सिंह की सेना आमने-सामने हुई।
7.2 युद्ध का वर्णन
रोहिला सेना ने संगठित प्रतिरोध किया
84 कवचधारी वीरों ने अग्रिम मोर्चा संभाला
हाथी-दल और घुड़सवारों को रोका गया
परंपरा के अनुसार, सुल्तान को बंदी बनाया गया।
7.3 क्षात्र धर्म का पालन
रणवीर सिंह ने शरणागत शत्रु को क्षमा कर अभयदान दिया। यह राजधर्म और क्षात्र मर्यादा का उदाहरण था।
अध्याय 8
विश्वासघात और बलिदान
8.1 षड्यंत्र
दरबारी पंडित गोकुलराम पाण्डेय को लालच देकर विश्वास में लिया गया। किले की सुरक्षा व्यवस्था की जानकारी शत्रु को दी गई।
8.2 रक्षाबंधन का दिन
शिव मंदिर में शस्त्र पूजा हेतु राजपूत निःशस्त्र थे। इसी अवसर पर किले का दक्षिण द्वार खोल दिया गया।
8.3 अंतिम युद्ध
अचानक आक्रमण
मंदिर परिसर में घमासान युद्ध
महाराजा रणवीर सिंह वीरगति को प्राप्त
महारानी तारादेवी सती हो गईं।
भाई सूरत सिंह परिवार सहित सुरक्षित स्थान पर चले गए।
अध्याय 9
सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत
9.1 भौतिक अवशेष
रामपुर किले के अवशेष
सती तारादेवी मंदिर
स्थानीय स्मारक
9.2 सामाजिक प्रभाव
रोहिला क्षत्रियों में आज भी रणवीर सिंह का नाम श्रद्धा से लिया जाता है।
अध्याय 10
ऐतिहासिक विश्लेषण
10.1 स्रोतों की प्रकृति
वंशावली ग्रंथ
लोक परंपराएँ
क्षेत्रीय पत्रिकाएँ
मौखिक इतिहास
10.2 इतिहास लेखन की चुनौती
मुख्यधारा इतिहास प्रायः साम्राज्य केंद्रित रहा है। क्षेत्रीय शक्तियों के संघर्षों को सीमित स्थान मिला। कठेहर राज्य का इतिहास इसी श्रेणी में आता है।
अध्याय 11
रणवीर सिंह का ऐतिहासिक महत्व
क्षेत्रीय स्वाधीनता के प्रतीक
क्षात्र धर्म के पालन का उदाहरण
धार्मिक आस्था और युद्ध नीति का समन्वय
विश्वासघात के विरुद्ध चेतावनी
निष्कर्ष
महाराजा रणवीर सिंह रोहिला का जीवन भारतीय इतिहास में उस परंपरा का प्रतिनिधित्व करता है जिसमें—
स्वाभिमान सर्वोपरि है
पराधीनता अस्वीकार्य है
शरणागत को अभय देना क्षात्र धर्म है
विश्वासघात अंततः विनाशकारी होता है
उनका बलिदान कठेहर–रोहिलखण्ड की स्वतंत्र चेतना का प्रतीक है। यद्यपि उनका राज्य अंततः राजनीतिक रूप से पराजित हुआ,किंतु लोक स्मृति में अमर है।

RAJPUTANA KKATHHEHAR KE AJEY YODDHHA

*राजपुताना कठेहर रोहिलखंड*
के एक महान पराक्रमी योद्धा 
सूर्य वंशी क्षत्रिय सम्राट
*एक अजेय योद्धा*
*महाराजा रणवीर सिहं कठेहरिया रोहिला*

      *संक्षिप्त परिचय*
************************* *जन्म दिवस* 25 अक्टूबर, 1204 तदानुसार तत्कालीन कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की प्रथमा तिथि संवत 1261 विक्रमी
#पिता* महाराज त्रिलोक सिंह जी काठी क्षत्रिय 
*************************
*वंश* _सूर्यवंश की निकुंभ शाखा 
वेद _यजुर वेद,उपवेद__धनुर्वेद,प्रवर_एक/तीन , शिखा_दाहिनी, पाद_दाहिनी,सूत्र _गुभेल,देवता__विष्णु (रघुनाथ जी), कुलदेवी _चामुण्डा,कालिका, अंबिका , दुर्गा माता,ध्वजा__गरुड़,नदी__सरयू,झंडा पंच रंगा,नगाड़ा_रण गंजन , ईष्ट_रघुनाथ/श्री राम चंद्र जी,उद्घोष_हर हर महादेव गोत्र_वशिष्ठ गुणधर्म _काठी (कठोर) गद्दी _ अयोध्या,ठिकाना__रावी व व्यास नदियों के बीच के काठे का क्षेत्र 
*************************
#राज्य विस्तार*
◆गंगा - यमुना दोआब क्षेत्र #दक्षिण पश्चिम में गंगा तक #पश्चिम में उत्तराखंड 
#उत्तर में नेपाल तक
*क्षेत्रफल* 25000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र या 10000 वर्ग मील क्षेत्र तक 

# सूबे* 
पांचाल, 
मध्यदेश,
कठेहर रोहिलखण्ड
*राजधानी* -रामपुर (निकट अहिक्षेत्र, रामनगर) कांपिल्य
##################
(तेहरवीं शताब्दी का पूर्वार्द्ध)

🔆सूर्यवंश🔆
***********************
#आइए इतिहास में चलें*



"*काल भी अगर छोड दे लेकिन काठी नहीं छोडता”* 
*(Time ( Death ) Forgets But Not Kathi )*

क्या हैं - “काठी और काठीयावाड, कठेहर खंड ” ?

काठी दरबार भव्यअतित कि श्रृंखला मे एक प्रसिद्ध नाम , यह एक क्षत्रिय संघ जो वीरता का वैभव , शौर्य का प्रतीक और अपने कठोर स्वाभीमानी गुणो से प्रसिद्ध है। 

*इसलिए इनके बारे प्रसिद्ध कहावत हैं - "काल भी अगर छोड दे लेकिन काठी नहि छोडता”*
सिकंदर के आक्रमण के पश्चात भारत की पश्चिमी उत्तरीय सीमा प्रांत के प्रहरी इन क्षत्रिय वीरों ने मैदानों का रुख किया,एक टुकड़ी सौराष्ट्र आई दूसरी उत्तरी पांचाल में तथा एक टुकड़ी काठी क्षत्रियों की नेपाल गई।
उत्तरी पांचाल को कठेहर खंड /रोहिलखंड के नाम से विकसित कर स्थिर रूप से राज्य स्थापित किया।
नेपाल में काठी क्षत्रियों ने कठेत कटायतkathayat साम्राज्य स्थापित किया।
 एक टुकड़ी ने थोडी कुछ शताब्दियो से उन्होने स्थिर रुप से अपना निवासस्थान सौराष्ट्र को बना लिया और इतना हि नहीं युगों से पुराण प्रसिद्ध सौराष्ट्र नाम इन्हि के कारण पलटकर ' काठीयावाड ' नाम से मशहुर हुआ एसी इन्होने इस विस्तार कि संस्कृति मे अमिट छाप छोडी हैं। 

कठ गणराज्य वाहिक प्रदेश ( हाल के पंजाब ) मे प्रसिद्ध था।इनकी राजधानी ( संगल ) सांकल थी ,(आज का स्याल कोट)एक उल्लेख मिलता है कि इन पंजाब वासी कठो के नाम से आज के अफगानिस्तान के गजनी प्रांत मे ' काटवाज ' क्षेत्र हे । कठ लोगों के शारीरिक सौदर्य और अलौकिक शौर्य की ग्रीक इतिहास लेखकों ने भूरि - भूरि प्रशंसा की है , ग्रीक लेखकों के अनुसार कठों के यहाँ यह प्रथा प्रचलित थी कि वे केवल स्वस्थ एवं बलिष्ठ संतान को ही जीवित रहने देते थे । 

सीक्रीटोस लिखता है कि वे सुंदरतम एवं बलिष्ठतम व्यक्ति को ही अपना शासक चुनते थे , ग्रिक इतिहासकारो ने कठो को कठोइ या काठीयन जैसे नामो से निर्देषीत किया हे , पाणिनी के ' अष्टाध्यायी ' मे कठो का उल्लेख हे , पंतजली के महाभाष्य के मत से कठ वैशपायन के शिष्य थे । इनकि प्रवर्तित वेदसंहिता कि शाखा ' काठक ' नाम से प्रसिद्ध थी । 

काठक कापिष्ठल संहिता जैतारायण , प्रत्धन ( दिवोदासी ) भीमसेनी इन राजाओ का नाम मीलते हे जीन्होने राजसूय यज्ञ किया था । इन्होने कई बार पोरस को हराया था।
सिकंदर को घुटने टेकने पर मजबूर किया,कठगणराज्य की राजकुमारी कार्विका उर्फ कर्णिका ने सिकंदर को अपनी नारी सेना के द्वारा परास्त किया घायल किया। वह तो आंतरिक राजाओं की सहायता से बच निकला था।
Painting : 1880's. ' A kathiavad Sentry’
By Artist - Horace van Ruith . 

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* इस्क्वाकू वंश में सूर्य वंशी महाराज निकुम्भ के वंशधर ई●पू● 326 वर्ष कठगण राज्य (रावी नदी के काठे में) सिकन्दर का आक्रमण काल-राजधानी सांकल दुर्ग (वर्तमान स्यालकोट) 53 वीं पीढ़ी में राजा अजयराव के वंशधर निकुम्भ वंशी राजस्थान अलवर, मंगल गढ़ जैसलमेर होते हुए गुजरात सौराष्ट्र कठियावाड , फिर पांचाल, मध्यदेश गये। 
* एक टुकड़ी नेपाल गई
*************************
*अलवर में दुर्ग निकुम्भ वंशी (कठ क्षत्रिय रावी नदी के काठे से विस्थापित कठ-ंगण जिन्होंने सिकंदर को घुटने टेकने पर मजबूर किया था) क्षत्रियों ने बनवाया (राज्य मंगल गढ़), सौराष्ट्र में काठियावाड़ की स्थापना की ।
*************************
 #मध्यदेश के उत्तरी पांचाल में कठेहर रोहिलखंड राज्य की स्थापन। यहां अहिक्षेत्र के पास रामनगर गांव मे राजधानी स्थापित की, ऊंचा गांव मझगांवा को सैनिक छावनी बनाया। यहां पर शासक हंसदेव, रहे, इनके पुत्र हंसबेध राजा बने-ं816 ई. तक- इसी वंश में राजा रामशाही (राम सिंह जी ) ने रामपुर गांव को एक नगर का रूप दिया और *909 ई में कठेहर- रोहिलखण्ड प्रान्त की राजधानी रामपुर में स्थापित की। 
#यहां पर कठ क्षत्रियों ने 11 पीढ़ी शासन किया इसी वंश75 में महापराक्रमी, विधर्मी संहारक राजा रणवीर
सिंह कठेहरियारोहिला का जन्म कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की प्रथमा तिथि तदानुसार 25 अक्टूबर 1204ईसवी को राजपूत काल के ऐसे समय में हुआ जब महराजा पृथ्वी राज चौहान के शासन अंत के कारण समस्त राजपूत शक्ति क्षीण हो चुकी थी ओर मुस्लिम आक्रांता इस्लामिक सल्तनत कायम करने में लगे थे बची हुई राजपूत शक्तियों का बहुत कठोरता ओर बर्बरता से दमन कर रहे थे हिंदुआ सूर्य चौहान का शासन अस्त हो चुका था ।
वंश वृक्ष इस प्रकार पाया गया
रामपुर संस्थापक राजा राम सिंह उर्फ रामशाह 909 ई. में 966 विक्रमी , 3 पौत्र- बीजयराज 4. करणचन्द 5. विग्रह राज 6. सावन्त सिंह (रोहिलखण्ड कठेहर का विस्तार गंगापार कर यमुना तक किया,) सिरसापाल के राज्य सरसावा में एक किले का निर्माण कराया। (दशवीं शताब्दी का उत्तरार्द्ध) नकुड रोड पर किले को आज यमुना द्वारा ध्वस्त एक टीले के रूप में देखा जा सकता है। 7. जगमाल 8 धिंगतराम 9 गोकुल सिंह 10 महासहाय 11 त्रिलोकसिंह 12रणवीर सिंह( 1204 ),नौरंग देव (पिंगू को परास्त किया) (राजपूत गजट लाहौर 04.06.1940 द्वारा डा0 
सन्त सिंह चैहान)
इक्कीस वर्ष की आयु में रामपुर के राजा त्रिलोक चंद उर्फ त्रिलोक सिंह के पुत्र रणवीर सिंह रोहिला का विवाह विजयपुर सीकरी की राजकुमारी तारा देवी से हुआ। रणवीर सिंह रोहिला का राजतिलक भी इसी वर्ष इक्कीस वर्ष की आयु में हुआ यानी 1225,ईसवी में हुआ ,इनकी लंबाई लगभग सात फीट थी, कंधो पर सीना कवच लगभग साठ शेर ,सिर पर कवच लोहे का इक्कीस सेर खड़ग का वजन 25, सेर ओर स्वयं उनका वजन 125 सेर था। सन् 1236से1240 तक रजया तुदीन सुल्तान सन 1242 मइजुद्दीन बहराम शाह सन,1246 अलाउद्दीन महमूद शाह आदि दिल्ली सुल्तान सेनाओं से राजा रणवीर सिंह रोहिला , कठेहरिया ने कठेहर रोहिलखंड का लोहा मनवाया ओर किसी भी दिल्ली सुल्तान मामुल्क को रोहिलखंड में प्रवेश नहीं होने दिया । इनके साथ विभिन्न राजवंशों के चौरासी अजेय योद्धा थे ,राठौड़, गोड, चौहान,वारेचा परमार गहलोत वच्छिल आदि थे वे सब लोहे के कवच धारी थे।
दिल्ली सुल्तान के 
गुलाम , सेनापति नासिरूद्दीन चंगेज उर्फ नासिरूद्दीन महमूद ने , सन् 1253 ई0,में दोआब, कठेहर, शिवालिक पंजाब, बिजनौर आदि क्षेत्रों पर विजय पाने के लिए दमनकारी अभियान किया। इतने अत्याचार , मारकाट तबाही मचाई कि विद्रोह करने वाले स्थानीय शासक, बच्चे व स्त्रियां भी सुरक्षित नहीं रही। ऐसी विषम परिस्थिति में रोहिल खण्ड के रोहिला शासकों ने दिल्ली सल्तनत के सूबेदार‘ ताजुल मुल्क इज्जूददीन डोमिशी‘ को मार डाला। दिल्ली सल्तनत के लिये यह घटना भीषण चुनौती समझी गई। इस समय रामपुर के राजा रणवीर सिंह थे । उन्होनें आस पास की समस्त राजपूत शक्तियों को एकता के सूत्र में बांधा ओर दिल्ली सल्तनत के विरूद्ध अपनी क्रान्तिकारी प्रवृत्ति को सजीव बनाये रखा था जिससे दिल्ली सुल्तान कठेहर पर आक्रमण करते हुए भय खाते थे ,नासिरूद्दीन महमूद बहराम गुलाम वंश ( उर्फ चंगेज) इस घटना से उद्वेलित हो उठा और सहारनपुर ‘ उशीनर प्रदेश‘ के मण्डावार व मायापुर से 1253 ई0 में गंगापार कर गया और विद्रोह को दबाता हुआ, रोहिलखण्ड को रौदता हुआ बदांयू पहुंचा। वहां उसे ज्ञात हुआ कि रामपुर में राजा रणवीर सिंह रोहिला के साथ लोहे के कवचधारी 84 रोहिले है जिनसे विजय पाना टेढ़ी खीर है। सूचना दिल्ली भेजी गई। दिल्ली दरबार में सन्नाटा हो गया कि एक छोटे राज्य कठेहर रोहिलखंड के रोहिलों से कैसे छीना जाए। नासिरूद्दीन चंगेज (महमूद) ने तलवार व बीड़ा उठाकर राजा रणवीर सिंह के साथ युद्ध करने की घोषणा की। रामपुर व पीलीभीत के बीच मैदान में नसीरुद्दीन व कठेहर नरेश सूर्य वंशी क्षत्रिय रणवीर सिंह की सेना के बीच भयंकर युद्ध हुआ, 6000 रोहिला राजपूत व 
 84 लोहे के कवचधारी रन्धेलवंशी सेना नायकों की सेना के सामने नासिरूद्दीन की तीस हजारी सेना के पैर उखड़ गये।
      नासिरूद्दीन चंगेज को बन्दी बना लिया गया। बची हुई सेना के हाथी व घोडे तथा एक लाख रूपये महाराज रणवीर सिंह को देने की प्रार्थना पर आगे ऐसा अत्याचार न करने की शपथ लेकर नासिरूद्दीन महमूद ने प्राण दान मांग लिया। क्षात्र धर्म के अनुसार शरणागत को अभयदान देकर राजा रणवीर सिंह ने उसे छोड़ दिया। परन्तु धोखेबाज महमूद जो राजा रणवीर सिंह पर विजय पाने का बीड़ा उठाकर दिल्ली से आया था, षडयंत्रों में लग गया। राजा रणवीर सिंह का एक दरबारी पं. गोकुलराम पाण्डेय था। उसे रामपुर का राजा नियुक्त करने का लालच देकर महमूद ने विश्वास में ले लिया और रामपुर के किले का भेद लेता रहा। पं. गोकुल राम ने लालच के वशीभूत होकर विधर्मी को बता दिया कि रक्षांबधन के दिन सभी राजपूत निःशस्त्र होकर शिव मन्दिर में शस्त्र पूजा करेंगें।यह शिव मन्दिर किले के दक्षिण द्वार के समीप है , यह सुनकर महमूद का चेहरा खिल उठा और दिल्ली से भारी सेना को मंगाकर जमावड़ा प्रारम्भ कर दिया रक्षाबन्धन का दिन आ गया। किले में उपस्थित सभी सैनिक, सेनाायक अपने-ंअपने शस्त्रों को उतार कर पूजा स्थान पर शिव मन्दिर ले जा रहे थे। गोकुल राम पाण्डेय यह सब सूचना विधर्मी तक पहुंचाता रहा। श्वेत ध्वज सामने रखकर दक्षिण द्वार पर पठानों की गुलामवंशी सेना एकत्र हो गयी। पूजा में तल्लीन राज पुत्रों को पाकर गोकुलराम पाण्डेय ने द्वार खोल दिया।
      शिव उपासना में रत सभी उपस्थितों को घेरे में ले लिया गया। समस्त राजपूत भौचक्के रह गए ओर मन्दिर से तुलसी का पत्ता लिया ओर मुंह में दबा कर शाका बोल दिया,घमासान युद्ध छिड़ गया परन्तु ऐसी गद्दारी के कारण राजा रणवीर सिंह ने निशस्त्र लड़ते हुए अदम्य साहस ओर शोर्य का परिचय दिया ओर महमूद के सैनिकों से भिड़ गए अद्भुत दृश्य था रणवीर सिंह चारो ओर से विधर्मी सैनिकों से घिरे युद्ध कर रहे थे विधर्मी की खड़ग छीन ली ओर आक्रांताओं के शीश कट कट गिरने लगे , उस समय रामपुर के किले में केवल तीन हजार राजपूत ही उपस्थित थे ओर वे भी निहत्थे रह गए थे सभी राजपूत बड़ी वीरता से लडे किन्तु संख्या में कम होने के कारण बिखर गए, रणवीर सिंह कठहरिया रोहिला की पीठ पर विधर्मी सेना ने तलवार से वार करके काट डाला ओर अंतिम बूंद रक्त की रहने तक रणवीर धराशाई नहीं हुए यह देख कर नसीरुद्दीन चकित रह गया देखते ही देखते कठेहर नरेश वीरगति को प्राप्त हुए। नासिरूद्दीन ने पं. गोकुल राम से कहा कि जिसका नमक खाया अब तुम उसी के नहीं हुए तो तुम्हारा भी संहार अनिवार्य है। नमक हरामी को जीने का हक नहीं है। गोकुल का धड़ भी सिर से अलग पड़ा था। सभी स्त्री बच्चों को लेकर रणवीर सिंह का भाई सूरत सिंह उर्फ सुजान सिंह किले से पलायन कर गया । महारानी तारादेवी जो विजय पुर सीकरी के राजा की पुत्री थी राजा रणवीर सिंह के साथ सती हो गई। 
रामपुर में किले के खण्डरात, सती तारादेवी का मन्दिर तथा उनका राजमहल अभी तक एक ध्वस्त टीले के रूप में मौजूद है, जो क्षात्र धर्म का परिचायक व रामपुर में रोहिला क्षत्रियों की कठ-शाखा के शासन काल की याद ताजा करता है जिन्होंने अपना सर्वस्व बलिदान कर क्षात्र धर्म की रक्षा की। गुलाम वंश, सल्तनत काल में विधर्मी की पराधीनता कभी स्वीकार नहीं की। अन्तिम सांस तक दिल्ली सल्तनत से युद्ध किया और कितनी ही बार धूल चटाई तथा रोहिलखण्ड को स्वतंत्र राज्य बनाये रखा। निरन्तर संघर्ष करते रहे राजा रणवीर सिंह कठहरिया का बलिदान व्यर्थ नहीं , सदैव तुगलक, मंगोल , मुगलों आदि से विद्रोह किया और स्वतंत्र रहने की भावना को सजीव रखा। राणा रणवीर सिंह के वंशधर आज भी रोहिला-ंक्षत्रियों में पाए जाते हे,जय राजपुताना कठेहर रोहिलखंड
उनकी पावन स्मृति को जीवित रखने व रोहिलखंड कठेहर राजपूताना की वीर गाथा को सजीव बनाए रखने के लिए भारत का समस्त रोहिला क्षत्रिय राजपूत समाज रक्षा बन्धन को शोर्य दिवस तथा पच्चीस अक्टूबर को प्रतिवर्ष स्वाभिमान दिवस के रूप में मनाता हे ओर शस्त्र पूजा करता है । उत्तर भारत के महानगर बड़ौत में राजा रणवीर सिंह रोहिला मार्ग व ऐतिहासिक नगर सहारनपुर में आज महाराजा रण वीर सिंह रोहिला चौक स्थित है। (संदर्भ__इतिहास रोहिला राजपूत द्वारा डॉक्टर के सी सेन,
ठाकुर अजीत सिंह परिहार बालाघाट मध्य प्रदेश, मध्यकालीन भारत बीएम रस्तोगी ,रोहिला क्षत्रियों का क्रमबद्ध इतिहास द्वारा श्री दर्शन लाल रोहिला, रोहिला क्षत्रिय वंश भास्कर द्वारा आर आर राजपूत, रोहिला क्षत्रिय जाति निर्णय द्वारा राय भीम राज राजभाट बड़वा जी का बाड़ा तूंगा राजस्थान, काठी कठेरिया क्षत्रिय व रोहिला राजपूत द्वारा महेश सिंह कठाय त नेपाल , मध्य कालीन भारत द्वारा ठाकुर अजित सिंह परिहार बाला घाट मध्य प्रदेश  
संकलन व लेखन 
समय सिंह पुंडीर
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क्षत्रिय/राजपूत वाटिका
अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा
राष्ट्रीय प्रवक्ता 
*क्षत्रिय अस्तित्व न्याय मोर्चा भारत*
नोट
*सनातन रक्षक,विधर्मी संहारक और लगभग तीस वर्ष तक आक्रांताओं द्वारा किए जा रहे इस्लामी करण को रोकने वाले राजपूत सम्राट रोहिलखंड नरेश महाराजा रणवीर सिंह रोहिला काठी क्षत्रिय की जयंती सभी क्षत्रिय भाई स्वाधीनता और स्वाभिमान दिवस के रूप में मनाते हैं*

MAHARAJA, RANVEER SINGH ROHILA,THE BRAVE KING OF ROHILKHAND

🚩 राजपूताना कठेहर रोहिलखंड के अमर अपराजित योद्धा ,एक अजेय वीर 🚩
⚔️ सूर्यवंशी क्षत्रिय सम्राट ⚔️
महाराजा रणवीर सिंह रोहिला
25 अक्टूबर — स्वाभिमान दिवस
रक्षा बंधन — शौर्य एवं बलिदान दिवस
🌞 वंश एवं कुल परिचय 🌞
महाराजा रणवीर सिंह रोहिला भारत की प्राचीन गौरवशाली रघुवंशी सूर्यवंशी निकुंभ शाखा से संबंधित थे। यह वही तेजस्वी वंश है जिसकी परंपरा मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम तक जाती है।
📜 वंश परंपरा
वंश : रघुवंश
कुल : सूर्यवंश
शाखा : निकुंभ शाखा
गोत्र : वशिष्ठ
प्रवर : वशिष्ठ
वेद : यजुर्वेद
उपवेद : धनुर्वेद
सूत्र : गुभेल
देवता : भगवान विष्णु (रघुनाथ जी)
इष्टदेव : श्री रघुनाथ जी
कुलदेवी : चामुण्डा,चंडिका, कालिका, अंबिका, दुर्गा माता
उद्घोष : हर हर महादेव
ध्वजा : गरुड़ ध्वज
झंडा : पंचरंगा ध्वज
नगाड़ा : रण गंजन
नदी : सरयू
गद्दी : अयोध्या
गुणधर्म : काठी (कठोर क्षात्र स्वभाव)
मूल क्षेत्र : रावी और व्यास नदियों के मध्य का “काठे” क्षेत्र
🛕 जन्म एवं परिवार
जन्म : 25 अक्टूबर 1204 ईस्वी
तिथि : कार्तिक मास, कृष्ण पक्ष, प्रथमा
संवत : 1261 विक्रमी
पिता : महाराजा त्रिलोक सिंह जी
बलिदान दिवस : श्रावण पूर्णिमा, रक्षा बंधन (1254 ईस्वी)
महाराजा रणवीर सिंह का जन्म उस काल में हुआ जब भारत पर विदेशी इस्लामिक आक्रमण तीव्र हो चुके थे और पृथ्वीराज चौहान के पश्चात राजपूत शक्ति अत्यंत कठिन दौर से गुजर रही थी।
ऐसे समय में कठेहर रोहिलखंड की भूमि पर एक ऐसा सूर्य उदित हुआ जिसने विदेशी सल्तनत के सामने कभी सिर नहीं झुकाया।
🏰 कठेहर रोहिलखंड राज्य की स्थापना
निकुंभ वंशी कठ क्षत्रियों का इतिहास अत्यंत प्राचीन माना जाता है।
ऐतिहासिक परंपराओं के अनुसार सिकंदर के आक्रमण काल में कठगण राज्य रावी क्षेत्र में विद्यमान था जिसकी राजधानी सांकल दुर्ग (वर्तमान स्यालकोट क्षेत्र) मानी जाती है।
समय के साथ यह वीर वंश—
➡️ राजस्थान
➡️ अलवर
➡️ मंगलगढ़
➡️ जैसलमेर
➡️ सौराष्ट्र-काठियावाड़
➡️ पांचाल एवं मध्यदेश
की ओर अग्रसर हुआ।
⚔️ काठियावाड़ एवं कठेहर की स्थापना
अलवर क्षेत्र में निकुंभ वंशी कठ क्षत्रियों ने दुर्ग निर्माण करवाए।
सौराष्ट्र में “काठियावाड़” की स्थापना की।
बाद में पांचाल क्षेत्र में “कठेहर रोहिलखंड राज्य” स्थापित किया।
🛡️ राज्य विस्तार
महाराजा रणवीर सिंह के पूर्वजों द्वारा स्थापित कठेहर रोहिलखंड राज्य का विस्तार—
गंगा-यमुना दोआब तक
पश्चिम में उत्तराखंड तक
उत्तर में नेपाल तराई तक
फैला हुआ था।
📍 प्रमुख क्षेत्र
पांचाल
मध्यदेश
कठेहर (रोहिलखंड)
🏛️ राजधानी
प्रारंभिक राजधानी : रामनगर (अहिक्षेत्र के समीप)
बाद की राजधानी : रामपुर
👑 वंशावली
रामपुर संस्थापक राजा रामशाह (राम सिंह) से लेकर महाराजा रणवीर सिंह तक वंश परंपरा इस प्रकार वर्णित है—
राजा रामशाह (909 ई.)
बीजयराज
करणचंद
विम्रहराज
सावंत सिंह
जगमाल
धिंगतराम
गोकुल सिंह
महासहाय
त्रिलोक सिंह
महाराजा रणवीर सिंह रोहिला
⚔️ महाराजा रणवीर सिंह का व्यक्तित्व
1225 ईस्वी में मात्र 21 वर्ष की आयु में महाराजा रणवीर सिंह का राजतिलक हुआ। उसी वर्ष उनका विवाह विजयपुर सीकरी की राजकुमारी महारानी तारा देवी से हुआ।
🔥 अद्भुत शौर्य
लगभग 7 फीट लंबा शरीर
60 सेर का लौह कवच
25 सेर की विशाल तलवार
125 सेर शारीरिक भार
अद्वितीय युद्ध कौशल
उनके साथ 84 अजेय कवचधारी राजपूत वीर रहते थे।
🗡️ दिल्ली सल्तनत से संघर्ष
महाराजा रणवीर सिंह ने—
✅ दिल्ली सल्तनत की सेनाओं को बार-बार पराजित किया
✅ रोहिलखंड को स्वतंत्र बनाए रखा
✅ राजपूत शक्तियों को संगठित किया
✅ विदेशी अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष जारी रखा
उनकी वीरता से दिल्ली सल्तनत तक भयभीत रहती थी।
🔥 1253 ईस्वी का महासंग्राम
दिल्ली सल्तनत के सेनापति नासिरुद्दीन महमूद (चंगेज) ने विशाल सेना के साथ रोहिलखंड पर आक्रमण किया।
रामपुर और पीलीभीत के मध्य हुए युद्ध में—
⚔️ 6000 रोहिला राजपूत
⚔️ 84 लौह कवचधारी वीर
ने दिल्ली सल्तनत की लगभग 30,000 सेना को धूल चटा दी।
इतिहास वर्णन करता है कि नासिरुद्दीन महमूद बंदी बना लिया गया था, किन्तु क्षात्र धर्म निभाते हुए महाराजा रणवीर सिंह ने उसे अभयदान देकर मुक्त कर दिया।
⚠️ विश्वासघात और अमर बलिदान
पराजित महमूद ने छल का सहारा लिया।
रक्षा बंधन के दिन जब सभी राजपूत शिव मंदिर में शस्त्र पूजन हेतु निःशस्त्र थे, तब विश्वासघात कर किले के द्वार खोल दिए गए।
⚔️ अंतिम युद्ध
निहत्थे होने के बावजूद राजपूत वीरों ने युद्ध किया
महाराजा रणवीर सिंह ने अकेले अनेक शत्रुओं का संहार किया
अंतिम रक्त बूंद तक लड़ते रहे
पीठ पर वार होने के बाद भी रणभूमि नहीं छोड़ी
श्रावण पूर्णिमा, रक्षा बंधन के दिन
महाराजा रणवीर सिंह रोहिला वीरगति को प्राप्त हुए।
🔥 महारानी तारा देवी का त्याग
महाराजा के बलिदान के पश्चात् महारानी तारा देवी सती हो गईं।
आज भी रामपुर क्षेत्र में किले के अवशेष, सती स्थल एवं ऐतिहासिक ध्वस्त टीले उस वीरगाथा के मौन साक्षी माने जाते हैं।
🚩 आज भी जीवित है यह गौरवगाथा
रोहिला क्षत्रिय समाज आज भी—
🔸 25 अक्टूबर
स्वाभिमान दिवस
🔸 रक्षा बंधन
शौर्य एवं बलिदान दिवस
के रूप में मनाता है।
इस दिन शस्त्र पूजन, वीर स्मरण और समाज जागरण कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।
📜 इतिहास का संदेश
महाराजा रणवीर सिंह रोहिला का जीवन हमें सिखाता है—
✅ धर्म रक्षा सर्वोपरि है
✅ स्वाभिमान पर समझौता नहीं
✅ संगठन ही शक्ति है
✅ विश्वासघात राष्ट्र का सबसे बड़ा शत्रु है
✅ क्षात्र धर्म त्याग और बलिदान की परंपरा है
⚔️ अमर उद्घोष ⚔️
🚩 जय राजपुताना — जय कठेहर रोहिलखंड 🚩
🌞 जय सूर्यवंश 🌞
🔱 हर हर महादेव 🔱

Wednesday, 30 September 2026

ROHILKHAND,KATHIYAWAD(SAURASHTRA) के संस्थापक थे काठी , कठेहहरिया,निकुंभ वंश, कठ गणराज्य के संस्थापक थे रोहिला क्षत्रिय ,जिन्होंने सिकंदर को घुटनों के बल झुकने को काठगढ़ के मंदिर में मजबूर कर दिया था।

*वर्तमान_क्षत्रिय कठेहरिया_राजपूत_शूरवीरो_क़ी_शौर्यगाथाएँ*

*कठ_काठी_कठोड़े_कुलठान_कठपाल_वर्तमान*
*कठेहरिया_ठाकुर ही काठी क्षत्रिय है*
*राजपूताना रोहिलखंड,*
*क्षत्रिय_राजपूताना_रोहिलखंड* 
योद्धा विलाप करते हैं, साम्राज्य का पतन होता है: सिकंदर महान की विरासत इतिहास के सबसे उल्लेखनीय साम्राज्यों में से एक के कड़वे-मीठे अंत को दर्शाती है। 323 ईसा पूर्व में सिकंदर की मृत्यु के बाद, उसने जो विशाल साम्राज्य बनाया था, जो ग्रीस से लेकर भारत तक फैला हुआ था, वह जल्दी ही बिखर गया। 32 वर्ष की कम उम्र में उसके अचानक निधन के बाद कोई स्पष्ट उत्तराधिकारी नहीं बचा, और उसके सेनापति, जिन्हें डायडोची के नाम से जाना जाता था, ने उसके क्षेत्रों पर नियंत्रण के लिए भयंकर युद्ध किया। एक बार एकीकृत साम्राज्य युद्धरत राज्यों में विभाजित हो गया, जिसने बेजोड़ सैन्य विजय के युग का अंत कर दिया। फिर भी, सिकंदर की विरासत युद्ध के मैदान से कहीं आगे तक चली गई। उसके अभियानों ने ग्रीक संस्कृति, भाषा और विचारों को पूरे ज्ञात विश्व में फैलाया, उन्हें स्थानीय परंपराओं के साथ मिलाया, जिसे हेलेनिस्टिक युग के रूप में जाना जाता है। साम्राज्य के पतन के बावजूद, कला, विज्ञान, दर्शन और राजनीतिक विचारों पर सिकंदर की दृष्टि और प्रभाव ने आने वाली सदियों तक सभ्यताओं को आकार देना जारी रखा, जिससे इतिहास के सबसे महान और सबसे प्रभावशाली व्यक्तियों में से एक के रूप में उसका स्थान सुनिश्चित हुआ।
काठी दरबार भव्यअतित कि श्रुंखला मे एक प्रसिद्ध  नाम,यह एक क्षत्रिय संघ जो वीरता  का वैभव,शौर्य का प्रतिक और अपने कठोर स्वाभीमानी गुणो से प्रसिद्ध  हे।
    इनके बारे मे यह भी कहा जाता हे कि,
"काल भी अगर छोड दे लेकिन काठी नहीं  छोडता"
    (Time (Death) Forgets But Not Kathi)
 थोडी कुछ शताब्दियो से उन्होने स्थिर  रुप से अपना निवासस्थान सौराष्ट्र को बना लिया,और इतना हि नहि युगो से पुराण प्रसिद्ध  सौराष्ट्र नाम इन्हि के कारण पलटकर 'काठीयावाड' नाम से प्रसिद्ध  हुआ  ऐसी  इन्होने इस विस्तार कि संस्कृति  मे अमीट छाप छोडी हे।
कठ गणराज्य वाहिक प्रदेश(हाल के पंजाब) मे प्रसिध्ध था इनकि राजधानी (संगल)सांकल थी,
एक उल्लेख मिलता हे कि इन पंजाब वासी कठो के नाम से  अफगानिस्तान के गजनी प्रांत मे ‘काटवाज’ क्षेत्र हे।
 कठ लोगों के शारीरिक सौदंर्य और अलौकिक शौर्य की ग्रीक इतिहास लेखकों ने भूरि-भूरि प्रशंसा की है, ग्रीक लेखकों के अनुसार कठों के यहाँ यह प्रथा प्रचलित थी कि वे केवल स्वस्थ एवं बलिष्ठ संतान को ही जीवित रहने देते थे। ओने सीक्रीटोस लिखता है कि वे सुंदरतम एवं बलिष्ठतम व्यक्ति को ही अपना शासक चुनते थे, ग्रिक इतिहासकारो ने कठो को कठोइ या काठीयन जैसे नामो से निर्देषीत किया हे, पाणिनी के ‘अष्टाध्यायी’ मे कठो का उल्लेख हे, पंतजली के महाभाष्य के मत से कठ वैंशपायन के शिष्य थे।इनकि प्रवर्तित वेदसंहिता कि शाखा ‘काठक’ नाम से प्रसिध्ध थी । काठक कापिष्ठल संहिता जैतारायण, प्रत्धर्न(दिवोदासी) ,भीमसेनी इन राजाओ का नाम मिलते हे जीन्होने राजसूय यज्ञ किया था।
   इन्होने कइ बार पोरस को हराया था।इसा पूर्व ३२६ मे सिकंदर की विशाल सेना हिंदकुश कि पर्वतमाला के इस पार अश्वक और अष्टको के राज्य को हराकर झेलम पार कर पोरस से भीडने आ पहोंची,पोरस का पुत्र मारा गया,पोरस ने संधी कर ली जीसमे सैनीक सहायता के बदले ब्यास नदी तक के आगे जीते जाने वाले प्रदेशो पर पोरस सिंकदर के सहायक के तौर पर शासन करेगा, इसके बाद अधृष्ट(अद्रेसाइ) ने बिना लडे आधीनता स्वीकार कर ली, बाद मे कठ के नगर पर सेना आ खडी हुइ, कठ स्वतंत्रता प्रेमी थे, जो अपने साहस के लिए सबसे अधीक विख्यात थे,उन्होने शकट व्युह रचकर सिंकदर कि सेना पर भीतर तक भीषण  आक्रमण किया और जिसमें  खुद सिंकदर हताहत हो गया, संधी अनुसार पोरस ने २०,००० सैनीको का दल सिंकदर कि सहायता मे भेजा जीसमे हाथी भी थे जीनसे शकट व्युह तुट सकता था, तब कठो कि पराजय मुमकिन हो पाइ, करीबन १७००० कठ मारे गये और कइ बंदि बनाए गये, वहा पर नारीयो ने जौहर भी किया था एसा उल्लेख भी कइ जगह हुआ हे।
कच्छ के पोलीटकल एजन्ट मेकमर्डो जो काफि प्रतिभावान विद्बान थे वे काठी क्षत्रियो से प्रभावित थे इन्होने काठीओ मे विरता का नैतिक गुण,शक्ति,मुख पर तेजस्वीता और स्त्री सन्मान कि भावना सबधे अधीक पाइ थी जीसकि उनके विवरणो द्वारा हमे जानकारी मीलती हे ।
   सूर्यवंशी राजा व्रुतकेतु ने माळवा मे राज्य स्थापीत किया था,जीनके बाद उनके वंशजो जो की मैत्रक कुल और कठगण(काठी)ओने सौराष्ट्र मे प्रस्थान किया ,काठी वहा से कच्छ और राजस्थान के कुछ क्षेत्र मे गये कच्छ मे उन्होने अंजार,बन्नी,कंथकोट,कोटाय,भद्रेश्वर,पलाडीया आदि विस्तारो और कुछ सिंध और द.राजस्थान मे संस्थान और छोटी बडी जागीर स्थापीत कर दि और मैत्रक राजवंश ने वलभीपुर, तळाजा,वळा पंथक जैसो क्षेत्रो मे वर्चस्व जमाया|वलभी कि अपनी सवंत, मुद्रा और विद्यापीठ थी।मैत्रक विजयसेन ‘भटार्क’ ने वलभी साम्राज्य कि स्थापना कि थी। कुछ समय बाद यह वंश ‘वाळा राजकुल’ से जाना गया, जीसमे कइ समर्थ महापुरुषो ने जन्म लीया यह वाळा कुल भी काठी नाम से हि परापुर्व से जाना जाता था।
काठीओ का नाम पृथ्वीराज और कनोज के युध्ध मे उल्लेखीत हुआ हे, और अणहिलपुर को अपनी मरजी पुर्वक सहायता करते थे ।
और इधर कच्छ मे जाडेजा राजपूतो से अविरत संघर्षो के चलते काठीओ ने कच्छ छोडकर सौराष्ट्र मे आगमन किया ।
गढ अयोध्या निकाश भयो -गादि ठठ्ठा मुलथान
सूर्यदेव स्थापन कर्या-गढ मुलक फेर थान
        -रचनाःबडवाजी(बल्ला राजवंश व्याख्यान माला)
इस पंक्ति मे दो प्रसिध्ध सूर्य मंदिरो के स्थानो का उल्लेख हे, मुलतान(मुलःस्थान,हाल पाकिस्तान) और थान(स्थान यह नाम भी वाळा और काठीओ के सौराष्ट्र मुलस्थान की याद मे हि पडा और जो काठीयावाड मे सुरेन्द्रनगर जीले मे स्थीत हे।)
   -मुलतान का सूर्यमंदिर अब अवशेषो मे हि शेष हे पहेले वो ९ मी सदि तक विद्यमान था, परंतु थान का सूर्य मंदिर अपनी मग ब्र्हामणो कि शील्प शैली मे सज्ज होलबूट और मुगुट पहने भगवान सूर्यनारायण कि मनोहर प्राचिन प्रतिमा के साथ मौजुद हे,वेसे तो यह मंदिर पौराणीक हे किंतु इसका जिर्णोद्वार और किल्लेबंध रचना काठीओ द्वारा हुइ और बाद मे यह मंदिर सूरजदेवल के नाम से प्रसिध्ध हुआ। भारत के आराजक युग मे गुलाम,खिलजी,तुगलक,सैयद,लोदि,सुरी और उसके बाद मुगल इस तरह एक के बाद एक यवन साम्राज्य स्थापीत हुए, जो पुर्वकाल मे अनेक गणराज्यो मे बटा हुआ होकर भी एक था,वह भारत खंडीत हो रहा था ।12 वि शताब्दि के बाद से इस मंदिर पर कइ भीषण हमले होने से यह मंदिर तुटता रहा और फिर से उसका जिर्णोद्वार होता रहा । जीससे यह स्थान आस्था एवं संग्राम की भुमी हे। इनके बाद अंग्रेज और मराठा कि जुल्मी पेशकदमी और धाड से प्रदेश पुरा आंक्रत था तब काठी क्षत्रियो ने अच्छी तरह से युध्ध-रणनीती,संध बनाकर सौराष्ट्र के प्रांतो को जिता और अविरत युध्ध और संघर्ष किया *‘जितस्येवसुधाकाम्ये दैदिप्य सूर्य नभे’* और जीत के साथ नभ मे दिपमान सूर्य के भांती चमकते रहे इसके चलते मराठाओ ने हि इस प्रदेश को काठीयावाड नाम घोषीत किया,यह एक इतिहास कि विरल घटना होगी जिसमें आक्रांताओ द्वारा जन समुदाय से प्रतिकार होने पर प्रदेश का नामाभिधान हो गया।
काठी क्षत्रीयो का प्रत्येक व्यक्ति गण हे और इनकि संघीय विचारधारा रहि हे, काठीयावाड मे उन्होने अन्य क्षत्रीयो को अपने साथ अपनी परंपरा मे जोडा और संघीय शक्ति मजबुत कि,तथा बगसरा दरबार वालेरावाळा ने १६ वी सदि के उतराध मे सहस्त्र भोज यज्ञ कर लग्न और रीवाज संबधी चुस्त प्रथा का निर्माण संघ को और मजबुत करने के लिए किया तथा जनपद युगीन क्षत्रिय परंपरा को जीवंत रखी।
और इनमे समविष्ट अन्य क्षत्रीय इस प्रकार हे,
राव धाधल के पुत्र बुढाजी और बुढाजीके पुत्र कालुसीह थे.वी.सं १४६६ और शा.शके 1328मे जब कालुसींहजी धाधल अचलदास खीचीके साथ युद्ध कर रहे थे तब वासुकी अवतार गोगाजीने कालुसींह को युद्धमे सहायकी थी. कालुसींहने अपना कर्तव्य नीभाते हुवे वासुकीदेवको अपने इस्टदेव माना. कालुसिंहने फीर पांच वार्ष तक अपनी जमीन पर राज कीया. बादमे कालुसीह धाधल शाके 1333 और वी.सं 1471मे अपना पुरा सेन्य और संघ लेकर द्धवारका की यात्रा कि . तब द्धावरका की गादी पे वाढेर शाखाके के राठौर का राज था जो कालुसींहकी पुर्वज राव सिंहाजी के वंशज थे. एक मास तक स्नेहसे द्धारका रहनेके बाद वापस मारवाड लोटने चले. कालुसिहजी मध्य सौराष्ट्रके पंचाल प्रदेशमे शाके 1333 मागसर सुद 9 के पेहले प्रोहर मे कालुसीह और उनका सेन्य थानगढके पास लाखामाची गाव पोहचे. कच्छके जामके साथ युद्धके हेतु काठी राजपुत तब लाखामाचीमे युद्धकी तयारी कर रहे थे.कालुसीहने काठी राजपुतो को जामके साथ चल रहे युद्धमे सहायता की और वासुकीदेव की आज्ञा से कालुसीह काठी राजपुत संघ मे शामील हुए. 

"कच्छ ना जाम ते कारमा आविया लाविया फ़ौज ते लाख लारा । 
एहना बाप नो वैर वालन वटा पत्तावत गोतता खंड पारा ।। 
सबल सौरठ वीसे साथ ने सांभली द्वेष थी वेरिया दाव दाख्यो ।
 ते दी खत्री वट कारने आफल्या अड़ी खम्भ धरा स्तम्भ धांधले धरम राख्यो॥
  ओखा के वेरावळजी वाढेर(राठोर) भी काठी संघ मे शामील हुए थे इनसे गीडा, तीतोसा, तकमडीया, भांभला इन पेटा राठोड कुल कि पेटा शाखा का उदभव हुआ, जालोरगढ के राजा विरमदेव सोनागरा(चौहान) के पुत्र केशरदेव इनसे जळु शाखा का उदभव हुआ, परमारो राजपूतो मे से बसीया,विंछीया,माला,जेबलीया, और हळवद राजभायात मालसिंहजी जाला से खवड शाखा का उदभव हुआ, कंबध युध्ध करने वाला प्रतापी विर नागाजण जेठवा बचपन मे अपने काठी मामा के यहा पले बडे , इनसे वांक और वरु शाखा का उदभव हुआ तथा चावडा राजपूत और कइ क्षत्रियो को अपने साथ जोडकर संघ को सशक्त किया।इस प्रकार संघ कि शक्ति से वे अपना अस्तीत्व कायम रख पाए ।
काठी दरबारों ने युद्ध के लिए अश्व की एक ब्रीड तैयार की थी जिसका नाम काठी ब्रिड हे है। ये अश्व काफी मामलो में बाकी ब्रीड से आगे है।। महाराणा प्रताप का अश्व चेतक भी एक काठी घोडा था।

कइ लेखक विदो ने इन विरबाहुओ के शौर्य का बखान किया हे यहा प्रसिध्ध लेखक स्व.चंद्रकांत बक्षी के शब्दो मेःकाठी ज्ञाती संख्या मे कम फिर भी शूरविर कोम हे, कम संख्या मे होकर भी पुरे प्रदेश को काठीयावाड घोषीत कर सके वह उनकि शुरविरता,कुनेह,और लडायक नीती का उच्चत्म प्रमाणपत्र हे और यह सिध्धी हासिल करने मे कइ काठी विर,संत और सतिओ के बलीदान हे।

सौजन्यः काठी संस्कृतिदीप संस्थान☀

सदर्भः
 -Arrian, Anabasis of Alexander, V.22-24
-Bharat Discovery
 -An Inquiry Into the Ethnography of Afghanistan By H. W. Bellew page17 
-कर्नल टोड कृत राज. का इतिहास & Travels in -Western India
-जे. डबल्यु. वोटसन
-काठी संस्कृति अने इतिहास-डो.श्री प्रद्युमनभाइ खाचर
-काठीओ अने काठीयावाड -डो.श्री प्रद्युमनभाइ खाचर
-महाविरसिंह छिंताबा(भीलवाडा)
-पथीक मेगेजीन -के.का शास्त्री
-द.श्री भोजवाळा चुडा-सोरठ
-काठी अभ्युदय
-macmurdo. Trans. Lit. soc.

*ठाकुर_राणा_प्रताप_सिंह उर्फ दीपक_सिंह_कठेहरिय श्री_राष्ट्रीय_राजपूत_करणी_सेना_सम्भल_उत्तर_प्रदेश*

Saturday, 12 September 2026

THE FOUNDERS OF RAJPUTANA KATHHEHAR ROHILKHANND

*KSHTRIYA SAMRAT MAHARAJA RANVEER SINGH ROHILA,THE FOUNDER OF ROHILKHANND*
🙏 क्रमबद्ध, विस्तृत एवं प्रभावशाली ऐतिहासिक जीवन परिचय प्रस्तुत है।
(लेखन शैली: संतुलित – इतिहास + प्रेरणात्मक, शोधपरक संरचना सहित)
MAHARAJA RANVEER SINGH ROHILA 
कठेहर–रोहिलखण्ड के अजेय क्षत्रिय शासक
*(जन्म: 25 अक्टूबर 1204 ई., )* ( बलिदान दिवस रक्षा बंधन के दिन सन1254ईस्वी : 13वीं शताब्दी मध्य)*
1. प्रस्तावना
भारतीय इतिहास में अनेक ऐसे वीर क्षत्रिय हुए जिन्होंने सीमित संसाधनों में भी विदेशी आक्रमणकारियों का डटकर सामना किया। कठेहर–रोहिलखण्ड (वर्तमान उत्तर प्रदेश का उत्तरी भाग) के पराक्रमी शासक महाराजा रणवीर सिंह रोहिला उन्हीं में से एक थे। उन्होंने दिल्ली सल्तनत के विस्तारवादी अभियानों का विरोध करते हुए स्वतंत्रता और क्षात्र धर्म की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व बलिदान कर दिया।
उनका जीवन केवल एक क्षेत्रीय शासक की कथा नहीं, बल्कि आत्मसम्मान, युद्धनीति और राष्ट्ररक्षा का आदर्श उदाहरण है।
भाग 1
काठी, कठेहर और काठियावाड़ का ऐतिहासिक आधार
2. सूर्यवंश और निकुम्भ वंश
महाराजा रणवीर सिंह रोहिला सूर्यवंशी क्षत्रिय परंपरा से संबंधित माने जाते हैं। परंपरागत वंशावली के अनुसार यह वंश इक्ष्वाकु कुल से उत्पन्न हुआ, जिसे भगवान राम की वंश परंपरा माना जाता है। निकुम्भ नामक पराक्रमी राजा से निकुम्भ वंश की स्थापना मानी जाती है।
इस वंश की एक शाखा “कठ” या “काठी” कहलायी।
3. कठ गणराज्य और सिकंदर काल
ईसा पूर्व 326 में जब Alexander the Great ने उत्तर-पश्चिम भारत पर आक्रमण किया, उस समय रावी नदी के तट पर कठ गणराज्य का उल्लेख मिलता है। इसकी राजधानी “सांकल” (वर्तमान स्यालकोट) बताई जाती है।
यूनानी लेखकों ने कठों (Kathoi/Kathaeans) की वीरता, शारीरिक सौष्ठव और युद्ध कौशल की प्रशंसा की है। कुछ ग्रंथों में उल्लेख है कि वे स्वस्थ और बलिष्ठ संतानों को ही जीवित रखते थे तथा सर्वश्रेष्ठ योद्धा को शासक चुनते थे।
संस्कृत व्याकरणाचार्य Panini की अष्टाध्यायी में कठों का उल्लेख मिलता है। महाभाष्यकार Patanjali ने भी कठों का उल्लेख किया है।
4. काठियावाड़ और कठेहर का विकास
सिकंदर के आक्रमणों के पश्चात कठ क्षत्रियों के विभिन्न समूहों ने भारत के विभिन्न क्षेत्रों में प्रवास किया—
एक शाखा सौराष्ट्र गई — जहाँ “सौराष्ट्र” क्षेत्र “काठियावाड़” नाम से प्रसिद्ध हुआ।
एक शाखा उत्तर भारत के पंचाल क्षेत्र में बसी — जो आगे चलकर “कठेहर खण्ड” या “रोहिलखण्ड” कहलाया।
एक शाखा नेपाल क्षेत्र में गई — जहाँ “कटायत” परंपरा का उल्लेख मिलता है।
काठी वीरों के विषय में कहावत प्रचलित हुई:
“काल भी अगर छोड़ दे, लेकिन काठी नहीं छोड़ता।”
भाग 2
कठेहर राज्य की स्थापना
5. रामपुर की स्थापना
लगभग 7वीं–10वीं शताब्दी के मध्य कठेहर क्षेत्र में स्थायी राज्य की स्थापना हुई।
राजा रामसिंह (रामशाह) ने 909 ईस्वी (विक्रमी 966) में रामपुर नगर को राजधानी के रूप में विकसित किया। यह क्षेत्र अहिक्षेत्र (वर्तमान रामनगर के निकट) के आसपास स्थित था।
इसके बाद 11 पीढ़ियों तक कठ क्षत्रियों ने शासन किया।
वंशावली में उल्लेखित प्रमुख नाम:
रामशाह (रामसिंह)
बीजयराज
करणचन्द
विम्रहराज
सावन्त सिंह
जगमाल
रणवीर सिंह
धिंगतराम
गोकुल सिंह
महासहाय
त्रिलोकचन्द
नौरंग देव
भाग 3
महाराजा रणवीर सिंह रोहिला
6. जन्म और व्यक्तित्व
जन्म: 25 अक्टूबर 1204 ईस्वी
विक्रम संवत: 1261
स्थान: रामपुर, कठेहर-रोहिलखण्ड
गोत्र: वशिष्ठ
वंश: निकुम्भ वंशी कठेहरिया क्षत्रिय
वे युद्धकला, घुड़सवारी और शस्त्र संचालन में निपुण थे। उनके साथ 84 कवचधारी रोहिला वीरों की विशिष्ट सेना रहती थी।
7. दिल्ली सल्तनत से संघर्ष
13वीं शताब्दी में दिल्ली में गुलाम वंश का शासन था। उस समय सुल्तान Nasiruddin Mahmud नाममात्र का शासक था, जबकि वास्तविक सत्ता Ghiyas ud din Balban जैसे शक्तिशाली अमीरों के हाथों में थी।
1253–1254 ईस्वी में दोआब, कठेहर और शिवालिक क्षेत्रों में दमनकारी अभियान चलाया गया। स्थानीय शासकों और जनता पर अत्याचार हुए।
रोहिलखण्ड में विद्रोह भड़क उठा और दिल्ली सल्तनत के सूबेदार की हत्या कर दी गई।
8. निर्णायक युद्ध
रामपुर और पीलीभीत के मध्य मैदान में दिल्ली सल्तनत की लगभग 30,000 सेना और रणवीर सिंह के नेतृत्व में रोहिला योद्धाओं के बीच भयंकर युद्ध हुआ।
परंपरा के अनुसार:
84 कवचधारी रणधेलवंशी वीरों ने असाधारण पराक्रम दिखाया
शत्रु सेना के हाथी-घोड़े परास्त हुए
नासिरूद्दीन को बंदी बनाया गया
क्षात्र धर्म के अनुसार शरणागत को अभयदान देकर रणवीर सिंह ने उसे छोड़ दिया।
9. विश्वासघात और बलिदान
दिल्ली दरबार ने पुनः षड्यंत्र रचा।
दरबारी पंडित गोकुलराम पाण्डेय को लालच देकर विश्वास में लिया गया।
रक्षाबंधन के दिन, जब शिव मंदिर में शस्त्र पूजा हेतु राजपूत निःशस्त्र थे, तब किले का द्वार खोल दिया गया। भारी सेना ने आक्रमण किया।
घमासान युद्ध हुआ।
महाराजा रणवीर सिंह वीरगति को प्राप्त हुए।
महारानी तारादेवी सती हो गईं।
उनके भाई सूरत सिंह शेष परिवार सहित सुरक्षित स्थान पर चले गए।
भाग 4
ऐतिहासिक विरासत
रामपुर के किले के अवशेष
सती तारादेवी मंदिर
स्थानीय परंपराएँ और वंशज
महाराजा रणवीर सिंह ने अंतिम सांस तक पराधीनता स्वीकार नहीं की। उनका बलिदान रोहिलखण्ड की स्वतंत्र चेतना का प्रतीक बना।
निष्कर्ष
महाराजा रणवीर सिंह रोहिला का जीवन भारतीय क्षत्रिय परंपरा, स्वाभिमान और स्वतंत्रता की रक्षा का सशक्त उदाहरण है।
उन्होंने सीमित संसाधनों में भी दिल्ली सल्तनत की शक्तिशाली सेना का सामना किया और क्षात्र धर्म का पालन करते हुए शरणागत को अभयदान दिया — यद्यपि अंततः उन्हें विश्वासघात का सामना करना पड़ा।
उनकी गाथा इतिहास के उन पृष्ठों में स्थान पाने योग्य है जहाँ क्षेत्रीय स्वतंत्रता संग्राम और स्थानीय शौर्य को उचित सम्मान दिया जाए।
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Sunday, 9 August 2026

ROHILA RAJPUT GEN Z AND DIGNITY

*ROHILA IS A RAJPUT CLAN DONOT BE CONFUSED WITH ANY OTHER OPTION*⚔️🚩

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_रोहिला क्षत्रिय: इतिहास, अस्मिता, अस्तित्व और युवाजन चेतना की नई दिशा_

रोहिला क्षत्रियों का इतिहास केवल एक जातीय पहचान की कहानी नहीं, बल्कि संघर्ष, विस्थापन, पुनर्गठन और स्वाभिमान की लंबी यात्रा है। रोहिला क्षत्रिय सदियों तक राजनीतिक, सामाजिक बिखराव और पहचान के संकट से गुजरते रहे फिर भी अपने मूल-क्षत्रिय-राजपूत परंपरा-को पूरी तरह नहीं भूले।

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🛡️ *1. ऐतिहासिक आधार और विस्थापन की पीड़ा*

कठेहर रोहिलखंड में दसवीं सदी से लेकर लगभग चार सौ साल तक क्षत्रियों का शासन रहा, जिनमें लगभग अठारह वंशों व गोत्रों के राजपूतों की शासन व्यवस्था बनी रही। इस क्षेत्र पर दिल्ली सल्तनत ने लगातार आक्रमण करके नरसंहार किया, किंतु स्थानीय क्षत्रियों ने हार नहीं मानी। अत्यधिक दमनकारी आक्रमणों से बड़ी शक्ति का ह्रास होता गया, वस्तुतः कुछ क्षेत्र छूटते भी गए, परंतु समस्त रोहिलखंड के रोहिला राजपूत बार संगठित होकर लोहा लेते रहे, अनेक बार धूल चटाई तथा स्वयं को स्वतंत्र घोषित कर आगे बढ़ते गए। दिल्ली सल्तनत कठेहर रोहिलखंड क्षेत्र पर पूर्णतः कब्जा नहीं कर पाई। लगातार होते रहे इन आक्रमणों के कारण रोहिला राजपूतों की शक्ति क्षीण होती रही और विस्थापन भी होता रहा। अंततः अठारहवीं सदी के आरंभ में कठेहर रोहिलखंड क्षेत्र पर बाहरी आक्रांताओं का आधिपत्य हो गया। उन्होंने क्षत्रियों के संपूर्ण इतिहास को नष्ट कर दिया तथा अपनी शासन व्यवस्था कायम रखने के लिए पूरा इतिहास बदल डाला। उन्होंने सल्तनत काल से लेकर मुगल काल तक क्षत्रियों द्वारा किए गए कार्यां तथा आत्मरक्षार्थ किए गए युद्धों और उनके संपूर्ण बलिदान पर पर्दा डालते हुए अपना इतिहास लिखा। कठेहर रोहिलखंड संस्थापक क्षत्रिय राजाओं के स्थान पर लिखा गया कि रोहिलखंड की स्थापना उनके काल में हुई। इस प्रकार अठारहवीं सदी से पहले का क्षत्रिय इतिहास विलुप्त हो गया। जो इतिहास मुगल काल में लिखा गया, ब्रिटिश काल में भी उसी की पुनरावृत्ति हुई, सच्चाई को यहां भी उल्लिखित नहीं किया गया और रोहिलखंड को पश्तूभाषी अफगानों द्वारा स्थापित लिख दिया गया। मुगल कालीन इतिहासकारों द्वारा बड़ी चतुराई से बदले गए इसी इतिहास को हमें आज तक पढ़ाया जाता रहा है। जबकि मध्यकालीन क्षत्रिय इतिहास में रोहिला क्षत्रियों का उल्लेख कई जगह मिलता है, आठवीं सदी के वर्ष 837ईस्वी में उत्कीर्ण मंडोर के किले में स्थित बाउक के शिलालेख के अनुसार वहां के प्रतिहार शासक हरिश्चंद्र को मिली रोहिलाद्वयंक उपाधि का वर्णन राजपुताने के इतिहास नामक ग्रन्थ में पंडित गौरी शंकर हरिश्चंद ओझा ने पृष्ठ संख्या 147 पर किया है। आल्हाखण्ड काव्य, बुंदेलखंड के हमीरपुर गजेटियर और पृथ्वीराजरासो, इतिहासकार ठाकुर अजीत सिंह परिहार की पुस्तक क्षत्रिय वर्तमान तथा मध्यकालीन भारत आदि में रोहिला राजपूतों की पूर्व से ही उपस्थिति और बहादुरी का वर्णन किया गया है। बीकानेर राजवंश के संग्रहालय की एक क्षत्रियोदय नामक पुस्तक के पृष्ठ संख्या 267 पर रोहिलाध् रूहेला राजवंश को एक उच्च कोटि का राजपूत राजवंश लिखा गया है।

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📜 *2. रोहिला क्षत्रिय पहचान का सरकारी अभिलेखों में ऐतिहासिक प्रमाण*

सन् 1930-31 की जातिगत जनगणना एक महत्वपूर्ण पड़ाव साबित हुई। उस समय संगठनों के अभाव के बावजूद भी लोगों ने स्वयं को “रोहिला क्षत्रिय” के रूप में उल्लिखित कराया।  
यह तथ्य स्पष्ट करता है किः  
यह पहचान स्वाभाविक और ऐतिहासिक है। इसे रोहिला क्षत्रियों ने स्वयं के प्राचीन समृद्ध इतिहास के कारण ही स्वीकार किया, किसी बाहरी दबाव में नहीं। यहा�स सबसे पहले ऐतिहासिक पहचान रोहिला क्षत्रिय का उल्लेख हुआ। इससे पहले रोहिला को इतिहास में पश्तून भाषी अफगान के नाम से प्रचलित किया जाता रहा था। जबकि कठेहर रोहिलखंड तथा रोहिला शब्द अफगानों से पूर्व ही अस्तित्व में रहा तथा रोहिला क्षत्रिय भी उल्लिखित रहा।

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⚔️ *3. संगठन और पुनर्जागरण की प्रक्रिया*

1930 के दशक से लेकर स्वतंत्रता के बाद तक रोहिला क्षत्रियों ने धीरे-धीरे संगठित होने का प्रयास किया। विभिन्न संगठनों ने इतिहास संकलन, गोत्र सूची निर्माण और बिखरे परिवारों को जोड़ने का कार्य किया। जगाधरी में रोहिला राजपूत सभा नामक संगठन ने शोध परक ऐतिहासिक ग्रन्थ लिखवाने के लिए राजस्थान से वंशावली लिखने वाले भाट को आमंत्रित कर राजपूतों की बहियां निकलवाई और ‘‘इतिहास रोहिला राजपूत‘ नामक पुस्तक का सन1935 में प्रकाशन कराया। जिसका प्रभाव यह हुआ कि समस्त बिखरी हुई रोहिला राजपूत शक्तियां एकजुट होने लगी। इसी समय के आस पास पानीपत में भी डॉक्टर के सी सैन ने भी ’इतिहास रोहिला राजपूत नाम की पुस्तक लिखी। इनके प्रभाव से रोहिला क्षत्रिय और भी सशक्त तथा गौरवान्वित हुए। यह ऐतिहासिक आधार संगठित होने का कारण भी बना।  
1980 के दशक में यह प्रयास एक सशक्त आंदोलन के रूप में उभरा, जब रोहिला क्षत्रिय पहचान को सुरक्षित रखने के उद्देश्य से बड़े राष्ट्रीय स्तर के संगठन के गठन पर विचार हुआ। सन 1984-1986 तक अखिल भारतीय रोहिला क्षत्रिय विकास परिषद नामक संगठन का गठन हो गया, औपचारिक रूप से सन 1988 में पूर्ण रूपेण परिषद की स्थापना हुई तथा इस संगठन को अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा से संबद्ध होने का गौरव प्राप्त हुआ (अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजर्षी कुंवर श्री पाल सिंह जी महाराजा सिंगरामऊ रियासत जौनपुर का पत्र दिनांक 10 सितंबर 1989 ईस्वी) और रोहिला क्षत्रियों को समस्त क्षत्रिय राजपूत समाज का एक अभिन्न अंग माना। रोहिला क्षत्रियों को समस्त क्षत्रिय जनसमूह के मध्य विशेष सम्मान दिया गया।  
यह संगठन रोहिला क्षत्रिय शिरोमणि डॉक्टर कर्ण वीर सिंह रोहिला जी के अटूट प्रयास के कारण विकसित हो पाया आज पूरे भारत में रोहिला क्षत्रियों का यह सबसे पुराना तथा लोक प्रिय संगठन है।  
इस संगठन की स्थापना का उद्वेश्य कोई अल्पकालिक सुविधा, लाभ अथवा क्षणिक पहचान साबित करना नहीं था। इसका दृष्टिकोण दूरगामी व रोहिला क्षत्रियों के लिए पुनरोत्थान तथा भावी पीढ़ी के ऐतिहासिक स्वाभिमान को शाश्वत रखने के लिए था। बिखरे हुए रोहिला क्षत्रियों को विस्थापन के पश्चात से अपने पूर्वजों के इतिहास के अल्प ज्ञान के कारण अनेक कार्यों से सम्बंधित जातियों में विलीन होने से बचाने के लिए था। रोहिला क्षत्रियों को उनकी मूल ऐतिहासिक पहचान दिलाने और एक सुनहरा भविष्य निर्माण करना संगठन का उद्वेश्य और मूलभूत सिद्धांत रहा है। परिषद की इस दूरगामी सोच से प्रभावित होकर रोहिला क्षत्रियों का एक महासम्मेलन सहारनपुर में दिनांक 22 अक्टूबर 1989 को आयोजित हुआ जिसमें देश के कोने कोने से लगभग दस हजार रोहिला क्षत्रिय प्रतिनिधि तथा अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा के पदाधिकारी भी सम्मिलित हुए। इसके द्वारा रोहिला क्षत्रियों को संगठित करने में बड़ा बल मिला।  
ऐतिहासिक अभिलेखों का संकलन किया गया, रोहिला क्षत्रियों के क्रमबद्ध इतिहास का पुनर्लेखन और प्रकाशन कराया गया। सामाजिक और सांस्कृतिक गौरव को पुनर्स्थापित किया गया, सार्वजनिक स्थलों पर अनेक माध्यम से पहचान को स्थायित्व मिला। यह काल रोहिला क्षत्रियों के पुनरोत्थान का स्वर्णिम चरण कहा जा सकता है।

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🏹 *4. राजनीतिक हस्तक्षेप और रोहिला राजपूत क्षत्रिय पहचान का पुनः संकट*

समय के साथ सन 1995 में कुछ क्षेत्रों में “रोहिला” नाम को अन्य जातियों के साथ जोड़कर उनमें शामिल करने के प्रयास हुए। जबकि रोहिला क्षत्रियों से उन जातियों का कोई ऐतिहासिक और सामाजिक संबंध ही नहीं था। यह स्थिति कई कारणों से चिंताजनक है क्योंकि ऐसे प्रयास कई बार होते रहे है तथा आज भी ऐसे कार्य किए जा रहे हैं। अल्पकालिक राजनीतिक लाभ के लिए की गई ऐसी पहल रोहिला क्षत्रियों की ऐतिहासिक पहचान को कमजोर कर सकती है तथा अस्तित्व अस्थिर हो सकता है।

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💻 *5. वर्तमान परिदृश्य: डिजिटल युग और युवा शक्ति*

आज का युग सूचना, तकनीक और ’कृत्रिम बुद्धिमत्ता (ए.आई) का है। इस परिवेश में समाज की प्रगति का आधार जातीय वर्गीकरण की सोच नहीं बल्कि शिक्षा, कौशल विकास, आर्थिक आत्मनिर्भरता, सामाजिक जागरूकता एवं आधुनिक तकनीकी है। युवा पीढ़ी अब इन तथ्यों को समझ रही है, वह अपनी पहचान पर गर्व करते हुए मुख्यधारा में सम्मानजनक स्थान प्राप्त करना चाहती है। आज की युवा पीढ़ी की आवश्यकता है उसके बढ़ते कदमों को गति मिलना न कि किसी अल्पकालिक लाभ हेतु उसे भ्रमित करना।

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🔥 *6. युवाजनचेतना की आवश्यकता*

आज सबसे बड़ी आवश्यकता है युवा ही वह शक्ति है जोः इतिहास को समझ सकती है। वर्तमान की चुनौतियों का विश्लेषण कर सकती है। भविष्य की दिशा तय कर सकती है। युवाओं को चाहिए कि वे रोहिला क्षत्रिय इतिहास का सही अध्ययन करें, भ्रम और मिथ्या प्रचार से दूर रहें, सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म का सकारात्मक उपयोग करें, शिक्षा, रोजगार और नवाचार पर ध्यान केंद्रित करें, दूरगामी सोच बनाए कि आज तीब्रता से बदल रही दुनिया में कल क्या चाहिएगा इस पर गहन विचार करते हुए आगे बढ़े। जहां मानव रहित कार्य प्रणाली आएगी, बढ़ती जनसंख्या में रोहिला क्षत्रिय राजपूत की युवा जनशक्ति की भागीदारी कितनी होंगी इन्हीं जैसे ज्वलंत प्रश्न विचार हेतु सम्मुख खड़े है उन पर मंथन करे।

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🤝 *7. संगठनों की भूमिका: जिम्मेदारी और दिशा*

सामाजिक संगठनों का दायित्व केवल पहचान की रक्षा तक सीमित नहीं, बल्कि भविष्य निर्माण भी है। उन्हें चाहिए किः वे राजनीतिक स्वार्थों से ऊपर उठें पारदर्शी और सामूहिक निर्णय लें, युवाओं को नेतृत्व में स्थान दें, शिक्षा, रोजगार और सामाजिक उत्थान के कार्यक्रम चलाएं न कि भावी पीढ़ी को स्वाभिमान खोकर विभिन्न जातियों में विलीन होने की मुहिम चलाए। जो दूरगामी सोच रखते हुए रोहिला क्षत्रिय सामाजिक संगठन बने थे उसी सोच पर स्थिर रहे। वर्तमान में हो रही जनगणना में भी रोहिला क्षत्रिय का उल्लेख किया जाए इसके लिए सभी संगठनों को आगे आकर जनमानस को संज्ञानित कराना होगा ताकि पूर्व की भांति रोहिला क्षत्रिय पहचान की प्रविष्टि सरकारी अभिलेख में हो तभी अस्तित्व को स्थिरता तथा शासकीय पहचान मिल सकेगी।

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*निष्कर्ष* रोहिला क्षत्रिय समाज का इतिहास हमें सिखाता है कि परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, यदि समाज अपनी जड़ों से जुड़ा रहे और भविष्य के प्रति सजग हो, तो उसका अस्तित्व सुरक्षित रहता है। आज आवश्यकता हैकृ एकता, शिक्षा, जागरूकता और युवाओं के नेतृत्व में नव निर्माण की। यदि हम अतीत से प्रेरणा लेकर वर्तमान में सही निर्णय लें, तो भविष्य न केवल सुरक्षित होगा, बल्कि गौरवशाली भी बनेगा। “वक्त बदलता है, परंतु पहचान और स्वाभिमान तभी तक जीवित रहते हैं जब तक उन्हें सहेजने वाली चेतना जागृत रहती है।”




*प्रस्तुति - समय सिंह पुंडीर*

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