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Wednesday, 17 June 2026

ROHILA KSHTRIYA SMITATA, ITIHAS EVAM JANCHETNA

*रोहिला क्षत्रिय: इतिहास, अस्मिता*,
*अस्तित्व और युवाजन चेतना की नई दिशा*

रोहिला क्षत्रियों का इतिहास केवल एक जातीय पहचान की कहानी नहीं, बल्कि संघर्ष, विस्थापन, पुनर्गठन और स्वाभिमान की लंबी यात्रा है। रोहिला क्षत्रिय सदियों तक राजनीतिक ,सामाजिक बिखराव और पहचान के संकट से गुजरते रहे फिर भी अपने मूल-क्षत्रिय-राजपूत परंपरा-को पूरी तरह नहीं भूले।

*1. ऐतिहासिक आधार और विस्थापन की पीड़ा*

  कठेहर रोहिलखंड में दसवीं सदी से लेकर लगभग चार सौ साल तक क्षत्रियों का शासन रहा, जिनमें लगभग अठारह वंशों व गोत्रों के राजपूतों की शासन व्यवस्था बनी रही। इस क्षेत्र पर दिल्ली सल्तनत ने लगातार आक्रमण करके नरसंहार किया, किंतु स्थानीय क्षत्रियों ने हार नहीं मानी। अत्यधिक दमनकारी आक्रमणों से बड़ी शक्ति का ह्रास होता गया, वस्तुतः कुछ क्षेत्र छूटते भी गए, परंतु समस्त रोहिलखंड के रोहिला राजपूत बार बार संगठित होकर लोहा लेते रहे, अनेक बार धूल चटाई तथा स्वयं को स्वतंत्र घोषित कर आगे बढ़ते गए। दिल्ली सल्तनत कठेहर रोहिलखंड क्षेत्र पर पूर्णतः कब्जा नहीं कर पाई। लगातार होते रहे इन आक्रमणों के कारण रोहिला राजपूतों की शक्ति क्षीण होती रही और विस्थापन भी होता रहा । अंततः अठारहवीं सदी के आरंभ में कठेहर रोहिलखंड क्षेत्र पर बाहरी आक्रांताओं का आधिपत्य हो गया । उन्होंने क्षत्रियों के संपूर्ण इतिहास को नष्ट कर दिया तथा अपनी शासन व्यवस्था कायम रखने के लिए पूरा इतिहास बदल डाला। उन्होंने सल्तनत काल से लेकर मुगल काल तक क्षत्रियों द्वारा किए गए कार्यां तथा आत्मरक्षार्थ किए गए युद्धों और उनके संपूर्ण बलिदान पर पर्दा डालते हुए अपना इतिहास लिखा। कठेहर रोहिलखंड संस्थापक क्षत्रिय राजाओं के स्थान पर लिखा गया कि रोहिलखंड की स्थापना उनके काल में हुई। इस प्रकार अठारहवीं सदी से पहले का क्षत्रिय इतिहास विलुप्त हो गया। जो इतिहास मुगल काल में लिखा गया, ब्रिटिश काल में भी उसी की पुनरावृत्ति हुई, सच्चाई को यहां भी उल्लिखित नहीं किया गया और रोहिलखंड को पश्तूभाषी अफगानों द्वारा स्थापित लिख दिया गया । मुगल कालीन इतिहासकारों द्वारा बड़ी चतुराई से बदले गए इसी इतिहास को हमें आज तक पढ़ाया जाता रहा है। जबकि मध्यकालीन क्षत्रिय इतिहास में रोहिला क्षत्रियों का उल्लेख कई जगह मिलता है, आठवीं सदी के वर्ष 837ईस्वी में उत्कीर्ण मंडोर के किले में स्थित बाउक के शिलालेख के अनुसार वहां के प्रतिहार शासक हरिश्चंद्र को मिली रोहिलाद्वयंक उपाधि का वर्णन राजपुताने के इतिहास नामक ग्रन्थ में पंडित गौरी शंकर हरिश्चंद ओझा ने पृष्ठ संख्या 147 पर किया है। आल्हाखण्ड काव्य, बुंदेलखंड के हमीरपुर गजेटियर और पृथ्वीराजरासो ,इतिहासकार ठाकुर अजीत सिंह परिहार की पुस्तक क्षत्रिय वर्तमान तथा मध्यकालीन भारत आदि में रोहिला राजपूतों की पूर्व से ही उपस्थिति और बहादुरी का वर्णन किया गया है। बीकानेर राजवंश के संग्रहालय की एक क्षत्रियोदय नामक पुस्तक के पृष्ठ संख्या 267 पर रोहिलाध् रूहेला राजवंश को एक उच्च कोटि का राजपूत राजवंश लिखा गया है।

*2. रोहिला क्षत्रिय पहचान का सरकारी अभिलेखों में ऐतिहासिक प्रमाण*

 सन् 1930-31 की जातिगत जनगणना एक महत्वपूर्ण पड़ाव साबित हुई। उस समय संगठनों के अभाव के बावजूद भी लोगों ने स्वयं को “रोहिला क्षत्रिय” के रूप में उल्लिखित कराया।
यह तथ्य स्पष्ट करता है किःयह पहचान स्वाभाविक और ऐतिहासिक है। इसे रोहिला क्षत्रियों ने स्वयं के प्राचीन समृद्ध इतिहास के कारण ही स्वीकार किया, किसी बाहरी दबाव में नहीं। यहां सबसे पहले ऐतिहासिक पहचान रोहिला क्षत्रिय का उल्लेख हुआ। इससे पहले रोहिला को इतिहास में पश्तून भाषी अफगान के नाम से प्रचलित किया जाता रहा था। जबकि कठेहर रोहिलखंड तथा रोहिला शब्द अफगानों से पूर्व ही अस्तित्व में रहा तथा रोहिला क्षत्रिय भी उल्लिखित रहा।

*3. संगठन और पुनर्जागरण की प्रक्रिया*

 1930 के दशक से लेकर स्वतंत्रता के बाद तक रोहिला क्षत्रियों ने धीरे-धीरे संगठित होने का प्रयास किया। विभिन्न संगठनों ने इतिहास संकलन, गोत्र सूची निर्माण और बिखरे परिवारों को जोड़ने का कार्य किया। जगाधरी में रोहिला राजपूत सभा नामक संगठन ने शोध परक ऐतिहासिक ग्रन्थ लिखवाने के लिए राजस्थान से वंशावली लिखने वाले भाट को आमंत्रित कर राजपूतों की बहियां निकलवाई और ‘‘इतिहास रोहिला राजपूत‘‘ नामक पुस्तक का सन1935 में प्रकाशन कराया। जिसका प्रभाव यह हुआ कि समस्त बिखरी हुई रोहिला राजपूत शक्तियां एकजुट होने लगी। इसी समय के आस पास पानीपत में भी डॉक्टर के सी सैन ने भी ’इतिहास रोहिला राजपूत नाम की पुस्तक लिखी ।इनके प्रभाव से रोहिला क्षत्रिय और भी सशक्त तथा गौरवान्वित हुए ।यह ऐतिहासिक आधार संगठित होने का कारण भी बना।
1980 के दशक में यह प्रयास एक सशक्त आंदोलन के रूप में उभरा, जब रोहिला क्षत्रिय पहचान को सुरक्षित रखने के उद्देश्य से बड़े राष्ट्रीय स्तर के संगठन के गठन पर विचार हुआ। सन 1984-1986 तक अखिल भारतीय रोहिला क्षत्रिय विकास परिषद नामक संगठन का गठन हो गया,औपचारिक रूप से सन 1988 में पूर्ण रूपेण परिषद की स्थापना हुई तथा इस संगठन को अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा से संबद्ध होने का गौरव प्राप्त हुआ( अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजर्षी कुंवर श्री पाल सिंह जी महाराजा सिंगरामऊ रियासत जौनपुर का पत्र दिनांक 10 सितंबर 1989 ईस्वी) और रोहिला क्षत्रियों को समस्त क्षत्रिय राजपूत समाज का एक अभिन्न अंग माना। रोहिला क्षत्रियों को समस्त क्षत्रिय जनसमूह के मध्य विशेष सम्मान दिया गया।
यह संगठन रोहिला क्षत्रिय शिरोमणि डॉक्टर कर्ण वीर सिंह रोहिला जी के अटूट प्रयास के कारण विकसित हो पाया आज पूरे भारत में रोहिला क्षत्रियों का यह सबसे पुराना तथा लोक प्रिय संगठन है। 
इस संगठन की स्थापना का उद्वेश्य कोई अल्पकालिक सुविधा,लाभ अथवा क्षणिक पहचान साबित करना नहीं था। इसका दृष्टिकोण दूरगामी व रोहिला क्षत्रियों के लिए पुनरोत्थान तथा भावी पीढ़ी के ऐतिहासिक स्वाभिमान को शाश्वत रखने के लिए था। बिखरे हुए रोहिला क्षत्रियों को विस्थापन के पश्चात से अपने पूर्वजों के इतिहास के अल्प ज्ञान के कारण अनेक कार्यों से सम्बंधित जातियों में विलीन होने से बचाने के लिए था। रोहिला क्षत्रियों को उनकी मूल ऐतिहासिक पहचान दिलाने और एक सुनहरा भविष्य निर्माण करना संगठन का उद्वेश्य और मूलभूत सिद्धांत रहा है । परिषद की इस दूरगामी सोच से प्रभावित होकर रोहिला क्षत्रियों का एक महासम्मेलन सहारनपुर में दिनांक 22 अक्टूबर 1989 को आयोजित हुआ जिसमें देश के कोने कोने से लगभग दस हजार रोहिला क्षत्रिय प्रतिनिधि तथा अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा के पदाधिकारी भी सम्मिलित हुए। इसके द्वारा रोहिला क्षत्रियों को संगठित करने में बड़ा बल मिला । 
ऐतिहासिक अभिलेखों का संकलन किया गया ,रोहिला क्षत्रियों के क्रमबद्ध इतिहास का पुनर्लेखन और प्रकाशन कराया गया। सामाजिक और सांस्कृतिक गौरव को पुनर्स्थापित किया गया, सार्वजनिक स्थलों पर अनेक माध्यम से पहचान को स्थायित्व मिला। यह काल रोहिला क्षत्रियों के पुनरोत्थान का स्वर्णिम चरण कहा जा सकता है। 

*4. राजनीतिक हस्तक्षेप और रोहिला राजपूत क्षत्रिय*
   *पहचान का पुनः संकट*

समय के साथ सन 1995 में कुछ क्षेत्रों में “रोहिला” नाम को अन्य जातियों के साथ जोड़कर उनमें शामिल करने के प्रयास हुए।जबकि रोहिला क्षत्रियों से उन जातियों का कोई ऐतिहासिक और सामाजिक संबंध ही नहीं था। यह स्थिति कई कारणों से चिंताजनक है क्योंकि ऐसे प्रयास कई बार होते रहे है तथा आज भी ऐसे कार्य किए जा रहे है। अल्पकालिक राजनीतिक लाभ के लिए की गई ऐसी पहल रोहिला क्षत्रियों की ऐतिहासिक पहचान को कमजोर कर सकती है तथा अस्तित्व अस्थिर हो सकता है।  

*5. वर्तमान परिदृश्य: डिजिटल युग और युवा शक्ति*

आज का युग सूचना, तकनीक और ’कृत्रिम बुद्धिमत्ता (ए.आई) का है। ’इस परिवेश में समाज की प्रगति का आधार जातीय वर्गीकरण की सोच नहीं बल्कि शिक्षा, कौशल विकास,आर्थिक आत्मनिर्भरता, सामाजिक जागरूकता एवं आधुनिक तकनीकी है। युवा पीढ़ी अब इन तथ्यों को समझ रही है, वह अपनी पहचान पर गर्व करते हुए मुख्यधारा में सम्मानजनक स्थान प्राप्त करना चाहती है।  आज की युवा पीढ़ी की आवश्यकता है उसके बढ़ते कदमों को गति मिलना न कि किसी अल्पकालिक लाभ हेतु उसे भ्रमित करना।

*6. युवाजनचेतना की आवश्यकता*

 आज सबसे बड़ी आवश्यकता है
युवा ही वह शक्ति है जोः इतिहास को समझ सकती है। वर्तमान की चुनौतियों का विश्लेषण कर सकती है। भविष्य की दिशा तय कर सकती है। युवाओं को चाहिए कि वे रोहिला क्षत्रिय इतिहास का सही अध्ययन करें ,भ्रम और मिथ्या प्रचार से दूर रहें ,सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म का सकारात्मक उपयोग करें, शिक्षा, रोजगार और नवाचार पर ध्यान केंद्रित करें, दूरगामी सोच बनाए कि आज तीब्रता से बदल रही दुनिया में कल क्या चाहिएगा इस पर गहन विचार करते हुए आगे बढ़े। जहां मानव रहित कार्य प्रणाली आएगी, बढ़ती जनसंख्या में रोहिला क्षत्रिय राजपूत की युवा जनशक्ति की भागीदारी कितनी होंगी इन्हीं जैसे ज्वलंत प्रश्न विचार हेतु सम्मुख खड़े है उन पर मंथन करे।

*7. संगठनों की भूमिका: जिम्मेदारी और दिशा*

सामाजिक संगठनों का दायित्व केवल पहचान की रक्षा तक सीमित नहीं, बल्कि भविष्य निर्माण भी है। उन्हें चाहिए किः वे राजनीतिक स्वार्थों से ऊपर उठें पारदर्शी और सामूहिक निर्णय लें, युवाओं को नेतृत्व में स्थान दें, शिक्षा, रोजगार और सामाजिक उत्थान के कार्यक्रम चलाएं न कि भावी पीढ़ी को स्वाभिमान खोकर विभिन्न जातियों में विलीन होने की मुहिम चलाए। जो दूरगामी सोच रखते हुए रोहिला क्षत्रिय समाजिक संगठन बने थे उसी सोच पर स्थिर रहे । वर्तमान में हो रही जनगणना में भी रोहिला क्षत्रिय का उल्लेख किया जाए इसके लिए सभी संगठनों को आगे आकर जनमानस को संज्ञानित कराना होगा ताकि पूर्व की भांति रोहिला क्षत्रिय पहचान की प्रविष्टि सरकारी अभिलेख में हो तभी अस्तित्व को स्थिरता तथा शासकीय पहचान मिल सकेगी।
निष्कर्ष रोहिला क्षत्रिय समाज का इतिहास हमें सिखाता है कि परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, यदि समाज अपनी जड़ों से जुड़ा रहे और भविष्य के प्रति सजग हो, तो उसका अस्तित्व सुरक्षित रहता है। आज आवश्यकता हैकृ एकता, शिक्षा, जागरूकता और युवाओं के नेतृत्व में नव निर्माण की। यदि हम अतीत से प्रेरणा लेकर वर्तमान में सही निर्णय लें, तो भविष्य न केवल सुरक्षित होगा, बल्कि गौरवशाली भी बनेगा। “वक्त बदलता है, परंतु पहचान और स्वाभिमान तभी तक जीवित रहते हैं जब तक उन्हें सहेजने वाली चेतना जागृत रहती है।”

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📜 8वीं सदी (837 ई.)
🟤 प्रतिहार काल – “रोहिल्लाद्वयंक” उपाधि
➡ क्षत्रिय पहचान का प्रारंभिक प्रमाण
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⚔ 10वीं – 14वीं सदी
🟢 कठेहर रोहिलखंड में क्षत्रिय शासन
➡ लगभग 400 वर्षों तक राजपूत शक्ति
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🔥 1200 – 1500
🔴 दिल्ली सल्तनत के आक्रमण
➡ संघर्ष, नरसंहार और विस्थापन
➡ फिर भी प्रतिरोध जारी
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🏰 16वीं – 17वीं सदी
🟠 मुगल काल
➡ इतिहास का विकृतिकरण
➡ क्षत्रिय पहचान पर प्रभाव
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⚫ 18वीं सदी
🌍 बाहरी प्रभुत्व स्थापित
➡ संगठन विघटन
➡ व्यापक विस्थापन
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📘 ब्रिटिश काल
🔵 विकृत इतिहास का संस्थानीकरण
➡ “रोहिलखंड = अफगान” धारणा प्रचलित
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📑 1930 – 31
🟣 जातिगत जनगणना
➡ “रोहिला क्षत्रिय” पहचान दर्ज
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📚 1935
📘 “इतिहास रोहिला राजपूत” पुस्तक
➡ इतिहास पुनर्जागरण की शुरुआत
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🤝 1980 का दशक
🟢 सामाजिक संगठन सक्रिय
➡ पहचान संरक्षण आंदोलन
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⭐ 22 अक्टूबर 1989
🏛 सहारनपुर महासम्मेलन
➡ राष्ट्रीय स्तर पर एकता
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⚠ 1995
🔶 अन्य जातियों में जोड़ने के प्रयास
➡ पहचान संकट की स्थिति
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🔻 2000 – 2014
📉 विवाद और विभाजन
➡ सामाजिक अस्थिरता
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✅ 2021
📌 उपनाम आधारित दावे अस्वीकृत
➡ पहचान की पुनः पुष्टि
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🚀 वर्तमान युग
💻 डिजिटल युग • AI • युवा शक्ति
➡ नई दिशा :
   शिक्षा + कौशल + आत्मनिर्भरता
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⚔️🚩 नव-जागरण का शंखनाद 🚩⚔️
✨ रोहिला राजपूत क्षत्रिय युवा शक्ति – GEN Z के नाम एक सच्चा आवश्यक आह्वान ✨
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🛡️ प्रिय रोहिला राजपूत क्षत्रिय युवा साथियों, 🛡️
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आज मैं आपसे केवल शब्दों में नहीं,
बल्कि इतिहास की पुकार,
स्वाभिमान की ज्वाला,
और भविष्य की चेतावनी लेकर संवाद कर रहा हूँ।
🔥 यह समय सामान्य नहीं है।
यह वह युग है जहाँ केवल वही समाज जीवित रहेगा —
जो अपनी जड़ों से जुड़कर आधुनिकता को अपनाएगा।
और जो समाज भ्रम, विभाजन तथा कृत्रिम सहारों में उलझ जाएगा —
⛔ इतिहास उसे स्मरण भी नहीं रखेगा।
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🌍 GEN Z — परिवर्तन की निर्णायक पीढ़ी
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आप वह पीढ़ी हैं जिसे दुनिया GEN Z कहती है —
📱 डिजिटल युग की पीढ़ी
🤖 Artificial Intelligence के युग की पीढ़ी
⚡ निर्णायक परिवर्तन की पीढ़ी
लेकिन प्रश्न यह है —
❓ क्या आप केवल मोबाइल स्क्रीन तक सीमित रहेंगे?
❓ या इतिहास के पन्नों पर अपना स्वर्णिम अध्याय भी लिखेंगे?
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⚔️ युवा शक्ति ही समाज की वास्तविक शक्ति है ⚔️
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किसी भी समाज का भविष्य उसके युवाओं के विचारों से तय होता है।
आज का रोहिला क्षत्रिय युवा —
✔️ शिक्षित है
✔️ जागरूक है
✔️ परिश्रमी है
✔️ आत्मसम्मान से परिपूर्ण है
वह जानता है कि —
🔸 पहचान केवल उपनाम से नहीं बनती
🔸 सम्मान केवल नारों से नहीं मिलता
🔸 भविष्य केवल आरक्षण या राजनीतिक भ्रमों से सुरक्षित नहीं होता
✅ भविष्य सुरक्षित होता है —
📚 शिक्षा से
💻 तकनीकी ज्ञान से
🏹 आत्मनिर्भरता से
🔥 कठिन परिश्रम से
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🏛️ अतीत की धरोहर और वर्तमान की चुनौती
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रोहिला क्षत्रिय समाज संघर्ष, विस्थापन और विपरीत परिस्थितियों के बीच भी अपने स्वाभिमान और अस्तित्व को जीवित रखने वाला समाज रहा है।
इतिहास गवाह है —
✅ जब समाज संगठित रहा, तब उसका सम्मान बढ़ा।
❌ जब समाज विभाजित हुआ, तब उसकी शक्ति कमजोर हुई।
आज आवश्यकता केवल इतिहास को स्मरण करने की नहीं,
बल्कि उससे प्रेरणा लेकर भविष्य गढ़ने की है।
इसी उद्देश्य से नव-जागरण का यह अभियान समाज के समक्ष खड़ा है।
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🤝 संगठन ही शक्ति का आधार है
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आज सबसे बड़ी आवश्यकता है —
समाज को व्यक्तिगत स्वार्थों, राजनीतिक भ्रमों और जातीय विघटन से ऊपर उठाकर एकजुट करने की।
✨ समाज का हित सर्वोपरि होना चाहिए।
इतिहास और पहचान के प्रश्न पर किसी भी समाज को भ्रमित नहीं किया जा सकता।
युवा शक्ति कभी भी ऐसे कृत्यों का समर्थन नहीं करती जिससे —
⛔ इतिहास बदला जाए
⛔ पहचान धुंधली की जाए
⛔ भावी पीढ़ी को भ्रमित किया जाए
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🤖 AI का युग — अवसर भी, चुनौती भी
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आज दुनिया तेजी से बदल रही है —
🚘 मानव रहित वाहन
🏭 स्वचालित उद्योग
🧠 Artificial Intelligence
📡 Digital Economy
आने वाले समय की दिशा तय कर रहे हैं।
ऐसे समय में जो युवा केवल जातीय भ्रमों, वर्गीकरण और राजनीतिक लालच में उलझा रहेगा —
⛔ वह समय की दौड़ में पीछे छूट जाएगा।
आज विश्व में रोजगार की प्रकृति बदल रही है।
AI के युग में केवल डिग्री नहीं, बल्कि कौशल (Skill) ही वास्तविक शक्ति बनेगा।
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⚔️ AI के युग में कौशल ही अस्त्र है ⚔️
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साथियों,
यह 1980 या 1990 का भारत नहीं है।
अब सफलता वंश से नहीं, Vision और Skill से तय होगी।
इसलिए —
💻 Coding सीखो
📡 Technology सीखो
💼 Business सीखो
🚀 Entrepreneurship अपनाओ
🏢 Startups की ओर बढ़ो
🌐 Digital दुनिया में अपनी पहचान बनाओ
क्योंकि आने वाला समय उसी का होगा —
जो स्वयं अवसर बनाएगा।
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🔥 स्मरण रखो 🔥
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✨ “बैसाखियाँ भविष्य नहीं बनातीं,
पुरुषार्थ भविष्य बनाता है।” ✨
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🚩 समाज को भ्रमित करने वाली शक्तियों से सावधान रहो 🚩
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आज कुछ शक्तियाँ समाज को वर्गीकरण, भ्रम और विघटन में उलझाकर उसकी ऐतिहासिक पहचान को कमजोर करना चाहती हैं।
वे चाहते हैं कि युवा —
❌ अपने इतिहास को भूल जाए
❌ अपनी पहचान से दूर हो जाए
❌ संघर्ष और पुरुषार्थ छोड़कर कृत्रिम सहारों पर निर्भर हो जाए
लेकिन याद रखो —
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✨ “जो समाज अपनी पहचान खो देता है,
वह धीरे-धीरे अपना भविष्य भी खो देता है।” ✨
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युवाओं को तय करना होगा —
🔹 क्या वे दोहरे चरित्र और भ्रम के जाल में फँसेंगे?
🔹 या स्वाभिमान, इतिहास और पुरुषार्थ के साथ आगे बढ़ेंगे?
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🇮🇳 राष्ट्रभक्ति और क्षत्रिय धर्म 🇮🇳
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रोहिला राजपूत क्षत्रिय समाज केवल एक जाति नहीं,
बल्कि —
⚔️ त्याग
🛡️ वीरता
🇮🇳 राष्ट्ररक्षा
की गौरवशाली परंपरा है।
आज भी हमारे युवा —
🎖️ भारतीय सेना में
🏛️ प्रशासन में
📚 शिक्षा में
💼 व्यापार में
🌍 राष्ट्रनिर्माण के प्रत्येक क्षेत्र में
अपना योगदान दे रहे हैं।
✨ निर्धन होकर भी राष्ट्र के लिए खड़ा होना — यही क्षत्रिय धर्म है।
✨ संघर्ष में भी स्वाभिमान बनाए रखना — यही रोहिला पहचान है।
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⚡ GEN Z के सामने सबसे बड़ा प्रश्न ⚡
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आज युवा शक्ति दो मार्गों के सामने खड़ी है —
❌ पहला मार्ग —
भ्रम, विभाजन, जातीय विघटन और राजनीतिक लालच का।
✅ दूसरा मार्ग —
ज्ञान, तकनीक, संगठन, स्वाभिमान और आत्मनिर्भरता का।
निर्णय युवाओं को स्वयं करना होगा।
क्योंकि आने वाली पीढ़ियाँ पूछेंगी —
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✨ “जब समाज चौराहे पर खड़ा था,
तब आपने कौन सा मार्ग चुना था?” ✨
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🌅 नव-जागरण का वास्तविक अर्थ 🌅
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नव-जागरण केवल सम्मेलन नहीं है।
यह चेतना का अभियान है।
इसका अर्थ है —
📖 शिक्षा का विस्तार
🤝 संगठन की मजबूती
⚡ युवाओं का सशक्तिकरण
🏰 इतिहास का संरक्षण
🔥 स्वाभिमान की पुनर्स्थापना
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🚩 युवा शक्ति से आह्वान 🚩
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आइए, हम संकल्प लें —
✅ समाज को विभाजन से बचाएँगे
✅ शिक्षा और तकनीक को अपनाएँगे
✅ आत्मनिर्भर बनेंगे
✅ अपनी ऐतिहासिक पहचान को सुरक्षित रखेंगे
✅ आने वाली पीढ़ियों को भ्रम नहीं, दिशा देंगे
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✨ याद रखिए ✨
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“समय बदलता है,
लेकिन जो समाज अपनी जड़ों से जुड़ा रहता है,
वही भविष्य को दिशा देता है।”
यदि युवा जाग गया —
📖 तो इतिहास बदलेगा।
यदि युवा भ्रमित हो गया —
⛔ तो भविष्य बिखर जाएगा।
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⚔️ इसलिए उठो युवा शक्ति! ⚔️
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🔥 अपने इतिहास को पहचानो।
🔥 अपने स्वाभिमान को जगाओ।
🔥 अपने भविष्य को स्वयं गढ़ो।
क्योंकि —
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🚩 “रोहिला क्षत्रिय केवल इतिहास नहीं,
भविष्य की शक्ति भी है।” 🚩
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🇮🇳 जय क्षत्रिय राजपूत स्वाभिमान 🇮🇳
⚔️ जय रोहिला क्षत्रिय युवा शक्ति ⚔️
🚩 जय भारत 🚩

*सर्वत्र राष्ट्र में शूरवीर,शस्त्रास्त्र निपुण, शत्रुहंता महारथी, क्षत्रिय पैदा हो।यजुर्वेद मा,सा,* *(22/22)*

प्रस्तुति -
समय सिंह पुंडीर

ROHILA RAJPUT GEN Z AND DIGNITY

*ROHILA IS A RAJPUT CLAN DONOT BE CONFUSED WITH ANY OTHER OPTION*⚔️🚩

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_रोहिला क्षत्रिय: इतिहास, अस्मिता, अस्तित्व और युवाजन चेतना की नई दिशा_

रोहिला क्षत्रियों का इतिहास केवल एक जातीय पहचान की कहानी नहीं, बल्कि संघर्ष, विस्थापन, पुनर्गठन और स्वाभिमान की लंबी यात्रा है। रोहिला क्षत्रिय सदियों तक राजनीतिक, सामाजिक बिखराव और पहचान के संकट से गुजरते रहे फिर भी अपने मूल-क्षत्रिय-राजपूत परंपरा-को पूरी तरह नहीं भूले।

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🛡️ *1. ऐतिहासिक आधार और विस्थापन की पीड़ा*

कठेहर रोहिलखंड में दसवीं सदी से लेकर लगभग चार सौ साल तक क्षत्रियों का शासन रहा, जिनमें लगभग अठारह वंशों व गोत्रों के राजपूतों की शासन व्यवस्था बनी रही। इस क्षेत्र पर दिल्ली सल्तनत ने लगातार आक्रमण करके नरसंहार किया, किंतु स्थानीय क्षत्रियों ने हार नहीं मानी। अत्यधिक दमनकारी आक्रमणों से बड़ी शक्ति का ह्रास होता गया, वस्तुतः कुछ क्षेत्र छूटते भी गए, परंतु समस्त रोहिलखंड के रोहिला राजपूत बार संगठित होकर लोहा लेते रहे, अनेक बार धूल चटाई तथा स्वयं को स्वतंत्र घोषित कर आगे बढ़ते गए। दिल्ली सल्तनत कठेहर रोहिलखंड क्षेत्र पर पूर्णतः कब्जा नहीं कर पाई। लगातार होते रहे इन आक्रमणों के कारण रोहिला राजपूतों की शक्ति क्षीण होती रही और विस्थापन भी होता रहा। अंततः अठारहवीं सदी के आरंभ में कठेहर रोहिलखंड क्षेत्र पर बाहरी आक्रांताओं का आधिपत्य हो गया। उन्होंने क्षत्रियों के संपूर्ण इतिहास को नष्ट कर दिया तथा अपनी शासन व्यवस्था कायम रखने के लिए पूरा इतिहास बदल डाला। उन्होंने सल्तनत काल से लेकर मुगल काल तक क्षत्रियों द्वारा किए गए कार्यां तथा आत्मरक्षार्थ किए गए युद्धों और उनके संपूर्ण बलिदान पर पर्दा डालते हुए अपना इतिहास लिखा। कठेहर रोहिलखंड संस्थापक क्षत्रिय राजाओं के स्थान पर लिखा गया कि रोहिलखंड की स्थापना उनके काल में हुई। इस प्रकार अठारहवीं सदी से पहले का क्षत्रिय इतिहास विलुप्त हो गया। जो इतिहास मुगल काल में लिखा गया, ब्रिटिश काल में भी उसी की पुनरावृत्ति हुई, सच्चाई को यहां भी उल्लिखित नहीं किया गया और रोहिलखंड को पश्तूभाषी अफगानों द्वारा स्थापित लिख दिया गया। मुगल कालीन इतिहासकारों द्वारा बड़ी चतुराई से बदले गए इसी इतिहास को हमें आज तक पढ़ाया जाता रहा है। जबकि मध्यकालीन क्षत्रिय इतिहास में रोहिला क्षत्रियों का उल्लेख कई जगह मिलता है, आठवीं सदी के वर्ष 837ईस्वी में उत्कीर्ण मंडोर के किले में स्थित बाउक के शिलालेख के अनुसार वहां के प्रतिहार शासक हरिश्चंद्र को मिली रोहिलाद्वयंक उपाधि का वर्णन राजपुताने के इतिहास नामक ग्रन्थ में पंडित गौरी शंकर हरिश्चंद ओझा ने पृष्ठ संख्या 147 पर किया है। आल्हाखण्ड काव्य, बुंदेलखंड के हमीरपुर गजेटियर और पृथ्वीराजरासो, इतिहासकार ठाकुर अजीत सिंह परिहार की पुस्तक क्षत्रिय वर्तमान तथा मध्यकालीन भारत आदि में रोहिला राजपूतों की पूर्व से ही उपस्थिति और बहादुरी का वर्णन किया गया है। बीकानेर राजवंश के संग्रहालय की एक क्षत्रियोदय नामक पुस्तक के पृष्ठ संख्या 267 पर रोहिलाध् रूहेला राजवंश को एक उच्च कोटि का राजपूत राजवंश लिखा गया है।

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📜 *2. रोहिला क्षत्रिय पहचान का सरकारी अभिलेखों में ऐतिहासिक प्रमाण*

सन् 1930-31 की जातिगत जनगणना एक महत्वपूर्ण पड़ाव साबित हुई। उस समय संगठनों के अभाव के बावजूद भी लोगों ने स्वयं को “रोहिला क्षत्रिय” के रूप में उल्लिखित कराया।  
यह तथ्य स्पष्ट करता है किः  
यह पहचान स्वाभाविक और ऐतिहासिक है। इसे रोहिला क्षत्रियों ने स्वयं के प्राचीन समृद्ध इतिहास के कारण ही स्वीकार किया, किसी बाहरी दबाव में नहीं। यहा�स सबसे पहले ऐतिहासिक पहचान रोहिला क्षत्रिय का उल्लेख हुआ। इससे पहले रोहिला को इतिहास में पश्तून भाषी अफगान के नाम से प्रचलित किया जाता रहा था। जबकि कठेहर रोहिलखंड तथा रोहिला शब्द अफगानों से पूर्व ही अस्तित्व में रहा तथा रोहिला क्षत्रिय भी उल्लिखित रहा।

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⚔️ *3. संगठन और पुनर्जागरण की प्रक्रिया*

1930 के दशक से लेकर स्वतंत्रता के बाद तक रोहिला क्षत्रियों ने धीरे-धीरे संगठित होने का प्रयास किया। विभिन्न संगठनों ने इतिहास संकलन, गोत्र सूची निर्माण और बिखरे परिवारों को जोड़ने का कार्य किया। जगाधरी में रोहिला राजपूत सभा नामक संगठन ने शोध परक ऐतिहासिक ग्रन्थ लिखवाने के लिए राजस्थान से वंशावली लिखने वाले भाट को आमंत्रित कर राजपूतों की बहियां निकलवाई और ‘‘इतिहास रोहिला राजपूत‘ नामक पुस्तक का सन1935 में प्रकाशन कराया। जिसका प्रभाव यह हुआ कि समस्त बिखरी हुई रोहिला राजपूत शक्तियां एकजुट होने लगी। इसी समय के आस पास पानीपत में भी डॉक्टर के सी सैन ने भी ’इतिहास रोहिला राजपूत नाम की पुस्तक लिखी। इनके प्रभाव से रोहिला क्षत्रिय और भी सशक्त तथा गौरवान्वित हुए। यह ऐतिहासिक आधार संगठित होने का कारण भी बना।  
1980 के दशक में यह प्रयास एक सशक्त आंदोलन के रूप में उभरा, जब रोहिला क्षत्रिय पहचान को सुरक्षित रखने के उद्देश्य से बड़े राष्ट्रीय स्तर के संगठन के गठन पर विचार हुआ। सन 1984-1986 तक अखिल भारतीय रोहिला क्षत्रिय विकास परिषद नामक संगठन का गठन हो गया, औपचारिक रूप से सन 1988 में पूर्ण रूपेण परिषद की स्थापना हुई तथा इस संगठन को अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा से संबद्ध होने का गौरव प्राप्त हुआ (अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजर्षी कुंवर श्री पाल सिंह जी महाराजा सिंगरामऊ रियासत जौनपुर का पत्र दिनांक 10 सितंबर 1989 ईस्वी) और रोहिला क्षत्रियों को समस्त क्षत्रिय राजपूत समाज का एक अभिन्न अंग माना। रोहिला क्षत्रियों को समस्त क्षत्रिय जनसमूह के मध्य विशेष सम्मान दिया गया।  
यह संगठन रोहिला क्षत्रिय शिरोमणि डॉक्टर कर्ण वीर सिंह रोहिला जी के अटूट प्रयास के कारण विकसित हो पाया आज पूरे भारत में रोहिला क्षत्रियों का यह सबसे पुराना तथा लोक प्रिय संगठन है।  
इस संगठन की स्थापना का उद्वेश्य कोई अल्पकालिक सुविधा, लाभ अथवा क्षणिक पहचान साबित करना नहीं था। इसका दृष्टिकोण दूरगामी व रोहिला क्षत्रियों के लिए पुनरोत्थान तथा भावी पीढ़ी के ऐतिहासिक स्वाभिमान को शाश्वत रखने के लिए था। बिखरे हुए रोहिला क्षत्रियों को विस्थापन के पश्चात से अपने पूर्वजों के इतिहास के अल्प ज्ञान के कारण अनेक कार्यों से सम्बंधित जातियों में विलीन होने से बचाने के लिए था। रोहिला क्षत्रियों को उनकी मूल ऐतिहासिक पहचान दिलाने और एक सुनहरा भविष्य निर्माण करना संगठन का उद्वेश्य और मूलभूत सिद्धांत रहा है। परिषद की इस दूरगामी सोच से प्रभावित होकर रोहिला क्षत्रियों का एक महासम्मेलन सहारनपुर में दिनांक 22 अक्टूबर 1989 को आयोजित हुआ जिसमें देश के कोने कोने से लगभग दस हजार रोहिला क्षत्रिय प्रतिनिधि तथा अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा के पदाधिकारी भी सम्मिलित हुए। इसके द्वारा रोहिला क्षत्रियों को संगठित करने में बड़ा बल मिला।  
ऐतिहासिक अभिलेखों का संकलन किया गया, रोहिला क्षत्रियों के क्रमबद्ध इतिहास का पुनर्लेखन और प्रकाशन कराया गया। सामाजिक और सांस्कृतिक गौरव को पुनर्स्थापित किया गया, सार्वजनिक स्थलों पर अनेक माध्यम से पहचान को स्थायित्व मिला। यह काल रोहिला क्षत्रियों के पुनरोत्थान का स्वर्णिम चरण कहा जा सकता है।

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🏹 *4. राजनीतिक हस्तक्षेप और रोहिला राजपूत क्षत्रिय पहचान का पुनः संकट*

समय के साथ सन 1995 में कुछ क्षेत्रों में “रोहिला” नाम को अन्य जातियों के साथ जोड़कर उनमें शामिल करने के प्रयास हुए। जबकि रोहिला क्षत्रियों से उन जातियों का कोई ऐतिहासिक और सामाजिक संबंध ही नहीं था। यह स्थिति कई कारणों से चिंताजनक है क्योंकि ऐसे प्रयास कई बार होते रहे है तथा आज भी ऐसे कार्य किए जा रहे हैं। अल्पकालिक राजनीतिक लाभ के लिए की गई ऐसी पहल रोहिला क्षत्रियों की ऐतिहासिक पहचान को कमजोर कर सकती है तथा अस्तित्व अस्थिर हो सकता है।

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💻 *5. वर्तमान परिदृश्य: डिजिटल युग और युवा शक्ति*

आज का युग सूचना, तकनीक और ’कृत्रिम बुद्धिमत्ता (ए.आई) का है। इस परिवेश में समाज की प्रगति का आधार जातीय वर्गीकरण की सोच नहीं बल्कि शिक्षा, कौशल विकास, आर्थिक आत्मनिर्भरता, सामाजिक जागरूकता एवं आधुनिक तकनीकी है। युवा पीढ़ी अब इन तथ्यों को समझ रही है, वह अपनी पहचान पर गर्व करते हुए मुख्यधारा में सम्मानजनक स्थान प्राप्त करना चाहती है। आज की युवा पीढ़ी की आवश्यकता है उसके बढ़ते कदमों को गति मिलना न कि किसी अल्पकालिक लाभ हेतु उसे भ्रमित करना।

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🔥 *6. युवाजनचेतना की आवश्यकता*

आज सबसे बड़ी आवश्यकता है युवा ही वह शक्ति है जोः इतिहास को समझ सकती है। वर्तमान की चुनौतियों का विश्लेषण कर सकती है। भविष्य की दिशा तय कर सकती है। युवाओं को चाहिए कि वे रोहिला क्षत्रिय इतिहास का सही अध्ययन करें, भ्रम और मिथ्या प्रचार से दूर रहें, सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म का सकारात्मक उपयोग करें, शिक्षा, रोजगार और नवाचार पर ध्यान केंद्रित करें, दूरगामी सोच बनाए कि आज तीब्रता से बदल रही दुनिया में कल क्या चाहिएगा इस पर गहन विचार करते हुए आगे बढ़े। जहां मानव रहित कार्य प्रणाली आएगी, बढ़ती जनसंख्या में रोहिला क्षत्रिय राजपूत की युवा जनशक्ति की भागीदारी कितनी होंगी इन्हीं जैसे ज्वलंत प्रश्न विचार हेतु सम्मुख खड़े है उन पर मंथन करे।

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🤝 *7. संगठनों की भूमिका: जिम्मेदारी और दिशा*

सामाजिक संगठनों का दायित्व केवल पहचान की रक्षा तक सीमित नहीं, बल्कि भविष्य निर्माण भी है। उन्हें चाहिए किः वे राजनीतिक स्वार्थों से ऊपर उठें पारदर्शी और सामूहिक निर्णय लें, युवाओं को नेतृत्व में स्थान दें, शिक्षा, रोजगार और सामाजिक उत्थान के कार्यक्रम चलाएं न कि भावी पीढ़ी को स्वाभिमान खोकर विभिन्न जातियों में विलीन होने की मुहिम चलाए। जो दूरगामी सोच रखते हुए रोहिला क्षत्रिय सामाजिक संगठन बने थे उसी सोच पर स्थिर रहे। वर्तमान में हो रही जनगणना में भी रोहिला क्षत्रिय का उल्लेख किया जाए इसके लिए सभी संगठनों को आगे आकर जनमानस को संज्ञानित कराना होगा ताकि पूर्व की भांति रोहिला क्षत्रिय पहचान की प्रविष्टि सरकारी अभिलेख में हो तभी अस्तित्व को स्थिरता तथा शासकीय पहचान मिल सकेगी।

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*निष्कर्ष* रोहिला क्षत्रिय समाज का इतिहास हमें सिखाता है कि परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, यदि समाज अपनी जड़ों से जुड़ा रहे और भविष्य के प्रति सजग हो, तो उसका अस्तित्व सुरक्षित रहता है। आज आवश्यकता हैकृ एकता, शिक्षा, जागरूकता और युवाओं के नेतृत्व में नव निर्माण की। यदि हम अतीत से प्रेरणा लेकर वर्तमान में सही निर्णय लें, तो भविष्य न केवल सुरक्षित होगा, बल्कि गौरवशाली भी बनेगा। “वक्त बदलता है, परंतु पहचान और स्वाभिमान तभी तक जीवित रहते हैं जब तक उन्हें सहेजने वाली चेतना जागृत रहती है।”




*प्रस्तुति - समय सिंह पुंडीर*

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Friday, 5 June 2026

DOCTOR KARAN VEER SINGH ROHILA CHANDIGARH



लोकस्मृति में जीवित सम्राट: सिद्धराज जयसिंहदेव और सोलंकी शक्ति का उत्कर्ष-

बलवीर सिंह सोलंकी बासनी खलील -

पन्द्रह लख पखरेत, अस्सी लख पाय तुरंगा। 
साठा लाख बड़ दन्त, उपर सवार चतुरंगा ।।

पांच लाख सामन्त, तीन करोड़ सिपलानो।
चौदह लाख बाणेत, एक लाख रावत और राणा।।

घूंधालो धूजे धरा, बीस लाख बाजंत बली।
सिद्धराज जयसिंह सो, मंडे न दूजो मंडली ।।

राव बड़वा,चारण,भाट, दमामी, शुभराज आदि के मुख से राजा सिद्धराज जयसिंहदेव सोलंकी के समय की यह काव्य भी सुनने में आता रहता है जो अतिश्योक्ति से खाली नहीं पाया जाता है।

यह काव्य राजा सिद्धराज जयसिंहदेव सोलंकी के यश, शक्ति और सुशासन का गौरवपूर्ण प्रतीक है। इसमें वर्णित विशाल सेना, सामंतों की एकजुटता और युद्ध-तैयारी उस युग की संगठित प्रशासनिक व्यवस्था, सैन्य अनुशासन और राजकीय सामर्थ्य को उजागर करती है। अतिशयोक्ति होते हुए भी, यह लोककाव्य तत्कालीन समाज के मन में बसे आत्मविश्वास, सुरक्षा-बोध और राजनिष्ठा को सशक्त रूप से प्रकट करता है।

यह रचना दर्शाती है कि सिद्धराज जयसिंहदेव केवल विजेता सम्राट ही नहीं, बल्कि ऐसे शासक थे जिनके नेतृत्व में राज्य स्थिर, समृद्ध और संगठित था। सामंतों, रावतों और राणाओं की व्यापक सहभागिता उनके समावेशी नेतृत्व और प्रभावशाली राजनीतिक कौशल का प्रमाण है।

अंततः यह काव्य सोलंकी युग के वैभव, शक्ति और सांस्कृतिक चेतना का उत्सव है, जो आज भी गौरव, प्रेरणा और एकता का संदेश देता है तथा सिद्धराज जयसिंहदेव को भारतीय इतिहास में एक आदर्श और प्रभावशाली सम्राट के रूप में स्थापित करता है। 

जय सोमनाथ 🙏 🚩

इतिहास गवाह है: 1191 में पृथ्वीराज चौहान से हारने से पहले मुहम्मद गौरी 1178 B. में गुजरात की सोलंकी रानी 'नायकी देवी' से बुरी तरह हारे थे। एक विधवा रानी ने माउंट आबू की तलहटी में एक बच्चे को गोद में बैठाकर सेना का नेतृत्व किया था। यह राजपूतानी शौर्य है। "

रानी वीरांगना देवी और कायदरा के बीच युद्ध (1178 A. का इतिहास) को अक्सर स्कूल की किताबों में वह जगह नहीं मिलती जिसकी वह हकदार है।
जब मुहम्मद गौरी भारत पर हमला करने का प्लान बना रहा था, तो उसने सोचा कि विधवा रानी और एक छोटे बच्चे (मूलराज II) के साथ गुजरात एक आसान टारगेट होगा। लेकिन उसे नहीं पता था कि वह अदम्य साहस के साथ सामना करने वाला है।
1178 E. ऐतिहासिक कायदरा युद्ध
रणनीतिक जानकारी: रानी वीरांगना देवी जानती थीं कि गौरी की घुड़सवार सेना मैदानी इलाकों में भारी पड़ सकती है। इसलिए वे उसे घसीटकर माउंट आबू के नीचे गदरघट्टा (कायदरा) के पहाड़ी इलाके में ले गईं, जहाँ गौरी की सेना की ताकत कमजोर हो गई थी।
युद्ध का नेतृत्व: जैसा कि आपने बताया, रानी ने अपने छोटे बेटे को पीठ पर बांधकर युद्ध के मैदान में तलवार उठाई। उन्होंने न केवल युद्ध का नेतृत्व किया, बल्कि तुर्की सेना का बुरी तरह पीछा किया।
गौरी की शर्मनाक हार: यह हार गौरी के लिए इतनी भयानक थी कि वह अपनी जान बचाने के लिए युद्ध के मैदान से भाग गया। और अगले 13 साल तक उन्होंने गुजरात की तरफ फिर कभी नहीं देखा

,इसी सोलंकी वंश में जन्मे डॉक्टर कर्ण वीर सिंह रोहिला, बर्नवाल,संपूर्ण जीवन परिचय छपा है उनके चित्र के साथ ब्लॉग में उपलब्ध है।

💬⚔️🚩 *महसूस कीजिए कि डॉक्टर कर्णवीर सिंह रोहिला जी की पुण्य आत्मा आपके साथ खड़ी है और अपने जीवंत विचारो को फलीभूत कराने में आपका साथ दे रही है*
*उनका सपना यही था कि विस्थापित होते होते परचून की हालत में बिखरे इस राजपूत समुदाय को उसकी खोई हुई पहचान रोहिला क्षत्रिय के रूप में तभी मिलेगी जब भावी पीढ़ी को अन्य रोजगार मिलेंगे और विपत्ति काल में जीवन यापन के लिए किए गए कार्य बदल जायेंगे,इसके लिए शिक्षा और रोजगार आवश्यक होगा और रोहिला राजपूत क्षत्रिय महाराजा के प्रतीक बिम्ब बनेंगे और उनका प्रचार होगा इतिहास पुनः दोहराएगा तो रोहिला राजपूत समाज का स्वरूप बदलता चला जायेगा*
*आज रोहिला क्षत्रिय समाज के साथ कुछ वैसा ही आप लोग करते जा रहे हैं प्रशिक्षण संस्थान भी है लगभग चार हजार रोहिला क्षत्रिय लड़के स्वरोजगार,सरकारी गैर सरकारी सर्विस से जरिए, अनेको प्रकार से जीवन यापन और परिवार का पालन पोषण कर रहे है और उन परिवारों के रोजगार भी बदलते जा रहे हैं ,रोहिला राजपूत इतिहास को सोशल मीडिया पर राजपूत सिरदारो ने इतना प्रचार किया के कोई भी अछूता नहीं रहा,रोहिला राजपूत समाज को उसका खोया गौरव मिलता जा रहा है*
*मुझे याद है,उनके विचारों से प्रभावित होकर उनके बड़े भाई सहारनपुर में अति प्रतिष्ठित एडवोकेट चौधरी ओम प्रकाश रोहिला जी ने भटनागर धर्म शाला जनक नगर में दिनांक १२ अगस्त १९८८ को कहा था कि जब तक कोई स्थान रुहेला क्षत्रिय  समाज को नही मिलता, कही मंदिर नही बनता ,कोई तीर्थ स्थान नही मिलता जिसके बारे में दूसरे लोग भी जाने कि यह है रुहेलदेव का मंदिर राजा का स्मारक ,जैसे कश्मीर में सुना गया है रोहिल् देव  मंदिर, तब तक आप को पहचान वापस मिलना कठिन कार्य है क्योंकि आपकी मानसिक शक्ति दम तोड चुकी है,कुछ न कुछ बनाओ चाहे एक मंदिर सहारनपुर में रुहेलदेव का ही बना दो जिसे लोग रोजाना देखे मंदिर रूहेलदेव का है*

*उनकी भाषा में जो उन्होंने कहा था तो उनके छोटे भाई डॉक्टर साहब कर्णवीर सिंह  भी सुनते रहे और मन ही मन मुस्कराते रहे*

*मैने तभी बोला था फोटो फाइल में लगा है ,""कि रोहिला राजपूत है"" और उनके पूर्वजों के बलिदानों के कारण आज आप इस तरह की बैठक कर रहे है अन्यथा सजदा करते फिरते क्यों न उन्ही मे से किसी एक वीर राजा महाराजा सनातन रक्षक विधर्मी संहारक का मंदिर बनवा लो,उस समय इतना ही ज्ञान था मुझे*यहीं पर पुनः दिनांक 28/12/1988को प्रथम जनपद सहारनपुर का सम्मेलन हुआ तो मैने पुनः कहा कि इतिहास गौरव शाली तो होगा किंतु रोहिला राजपूत है तो राजाओं से पहचान बनेगी इस लिए मंदिर के स्थान पर संरक्षित सती स्मारक या किसी प्रसिद्ध रोहिला क्षत्रिय राजपूत राजा का प्रतिमा सहित प्रामाणिक वंशावली के साथ भव्य स्मारक बनवाया जाए। उस समय रोहिला क्षत्रिय राजपूत क्रमबद्ध इतिहास नहीं मिला था कुछ घर पड़ी हुई पुरानी किताबों में रोहिलखंड के रोहिला आल्हा  खंड काव्य में पढ़ा तो बहुत संतुष्टि हुई थी। दिनांक 28/12/1988 का वह वक्तव्य मेरा लगभग तीस मिनट तक का होगा चित्र फाइल में उपलब्ध होना चाहिए ।प्रथम जिला सम्मेलन में भारी भीड़ थी ।ठाकुर रामगोपाल सिंह रोहिला मुजफ्फर नगर वालो ने बहुत ऐतिहासिक जानकारी दी तथा भव्य महासम्मेलन कराए जाने की भूमिका बनी।
*डॉक्टर साहब बोले थे-बेटा जी आपकी  भावनाएं और सपने तभी पूरे होंगे जब आप इस संगठन से जुड़े रह कर चलोगे और अपनी भावनाओं ,इच्छाओं की पूर्ति में लगे रहोगे यह ऐसा प्लेट फार्म बनेगा जिस पर बैठ कर रोहिला राजपूत समाज गर्व की अनुभूति अवश्य करेगा*

*उनके आशीर्वाद से आज आपके महाराजा रणवीर सिंह रोहिला राजपूत की जन्म जयंती राज घरानों में राजा" भींडर" मेवाड़ रणधीर सिंह भींडर महाराज अपने महल में मनाते है,कुल दीप सिंह रोहिला हरियाणा जटौली वाले का प्रयास रंग लाता है-अनेक राजपूत हस्तियां, कुंवर अजय सिंह राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा,कुंवर राजेंद्र सिंह जी नरूका सेवा निवृत कर्नल राष्ट्रीय अध्यक्ष राष्ट्रीय क्षत्रिय ज्योति मिशन,क्षत्रिय शिरोमणि अदम्य साहसी चौहान की अस्थियों को हजार साल बाद गुलामी की बेडियो से आतंकियों के चंगुल से लाने वाले भाई शेर सिंह राणा जी संस्थापक राजपा, ओकेंद्र राणा फ्रॉम हरियाणा युवाओं के दिलो की धड़कन,दादा महिपाल सिंह मकराना अध्यक्ष श्री राजपूत करणी सेना, दिवंगत हुए दादा सुखदेव सिंह गोगा महेड़ी ठाकुर पूर्ण सिंह  ,कुंवर अजय सिंह राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा रजिस्टर्ड, अभय प्रताप सिंह राणा, जय वीर सिंह राणा श्री राष्ट्रीय राजपूत करणी सेना सहारनपुर अध्यक्ष श्री नीरज चौहान आदि जिनके नाम विश्व विख्यात है सोशल मीडिया पर इनके करोड़ों फोलोवर्स है वे रोहिला राजपूत वीर क्षत्रिय सम्राट महाराजा रणवीर सिंह जी का गुणगान करते है जन्म जयंती पूरे विश्व में मनवाते है,भाई शेर सिंह राणाजी अपने साथी भाई कुलदीप सिंह रोहिला और दादा नरेंद्र सिंह चौहान को साथ लाकर महान वीर विधर्मी विनाशक सनातन रक्षक राजपूत रोहिलखंड सम्राट रणवीर सिंह रोहिला के चित्र पर पूजा करके माल्यार्पण कर रहे है*

*उन्होंने प्राचीन रोहिला किला अपनी टीम के साथ देखा और बोला गंगा से भी पवित्र रोहिलखंड की अपने पूर्वजों के रक्त से रंजित उनके खून और हड्डियों से लतपथ धरती में तुझे आज प्रणाम करता हूं तेरी भूमि की माटी हल्दी घाटी की माटी सी पवित्र है,रोहिलखंड के रामपुर को सर जमीन राजा रणवीर सिंह रोहिला के जन्म से एक राजपूत तीर्थ बन गई है*
*क्या यह किसी चमत्कार से कम नजर आता है??????*

*ऐसे ही सहारनपुर के रामपुर (भांकला गांव) की धरती राजपूताना परंपरा संचालित करने वाले डॉक्टर कर्णवीर सिंह रोहिला के जन्म से पवित्र हुई उन्होंने यहां के एक समृद्ध किसान परिवार सोलंकी बरनवाल रोहिला राजपूत समाज में श्री सुगन सिंह रोहिला जी के घर छ: जून उन्नीस सो छत्तीस(06 जून 1936ईस्वी) को जन्म लिया था और अपने व्यवहार और कार्य से इस राजपूत रोहिला परिवार (भांकला)की भूमि को प्रतिष्ठित करने और राजपूत रोहिला खाप को सम्मान दिलाने में अपना जीवन सत्रह मार्च २००० को होली के दिन समाप्त कर दिया था, समाज के कार्यों में इतने खो गए थे कि राष्ट्र पति श्री शंकर दयाल शर्मा जी के फेमिली चिकित्सक होते हुए भी अपनी परवाह करने को समय नही निकाल पाए और अपना जीवन बलिदान कर दिया,ऐसे गांव(  रामपुर) को मेरा कोटि कोटि प्रणाम जिसने रोहिला राजपूतों में अपनी संस्कृति का संचार करने के लिए ऐसे महान राजपूत सोलंकी बरनवाल रोहिला डॉक्टर कर्णवीर सिंह जी को इस समाज में जन्म देकर पुनरोद्धार और उत्कर्ष की राह दिखाई*
उनकी अभिलाषा  और सपने साकार हो रहे हैं ,पुण्य आत्माए आकार ले रही है,इतिहास पुनः अपना गौरव प्राप्त करता जा रहा है,आज आपके रोहिला राजपूत समाज के साथ भारत का सभी राजपूत समाज कंधे से कंधा मिलाए खड़ा है दादा राजेंद्र सिंह परिहार राष्ट्रीय अध्यक्ष क्षत्रिय अस्तित्व न्याय मोर्चा,रोहिला राजपूत इतिहास संरक्षण में लगे है रोहिला राजपूत युवाओं को जोड़ रहे हैं जागृति चरमोत्कर्ष पर है वो दिन दूर नही रोहिलखंड के राजपूतों का इतिहास स्कूल सेलेब्स में पढ़ाए जायेगा रोहिला क्षत्रिय भी अन्य क्षत्रिय राजपूतों की तरह ही सामान्य जाति की सूची में उल्लिखित कराया जाएगा भारत का संपूर्ण राजपूत समाज आ गया मैदान में रोहिला राजपूतों के सम्मान में*
*एक यही तो है ,यही है आशीर्वाद डॉक्टर करण वीर सिंह रोहिला जी की  पुण्य आत्मा के द्वारा दी जाती रही प्रेरणा का*
*आज एक रुहेल देव (,रोहिला राजपूत लोक देव ,सूर्य वंशी क्षत्रिय महाराजा रणवीर सिंह रोहिला) का मंदिर भी बना है क्षत्रिय सम्राट महाराजा रणवीर सिंह रोहिला चौक ,एक भव्य स्मारक,विश्व में सहारनपुर की शान एतिहासिक राष्ट्रीय धरोहर प्राचीन रोहिला किला के सामने स्थित चौक का नाम है ,आज महाराजा रणवीर सिंह रोहिला चौक ,क्या यह किसी भव्य मंदिर से कम है,सचमुच यही जीवित खड़ा दृष्टव्य रोहिला क्षत्रिय  पवित्र धाम????*
*उनके विचारों और उनके संगठन अखिल भारतीय रोहिला क्षत्रिय विकास परिषद में निष्ठा रखिए आपके सभी कार्य पूर्ण होंगे*
*आज राष्ट्र की राजधानी दिल्ली रोहिणी क्षेत्र में युवा साथी जय प्रकाश रोहिला जी के प्रयास से एक पार्क का नाम भी महान वीर राजपूत सम्राट रणवीर सिंह रोहिला जी के नाम से है,रोहिला क्षत्रिय चौक भी नागलोई में है,और सबसे पहले इस क्षेत्र में बड़ौत नगर में रोहिला राजपूत समाज की ओर से श्री अनूप सिंह रोहिला जी ने कराया था श्री मति सरला मालिक तत्कालीन नगर पालिका चेयर मैन के द्वारा एक मार्ग का नाम राजा रणवीर सिंह रोहिला मार्ग आज उनके पति विधायक के पी मालिक राज्य मंत्री जी भी हमारा साथ देते है ,और प्रेरित करते है कि जहाँ भी उनकी अवश्यकता हो वे खड़े होंगे और महाराजा रणवीर सिंह रोहिला जी के नाम पर नामकरण कराएंगे*
सहारनपुर प्राचीन रोहिला किला जो रोहिला राजाओं द्वारा निर्मित है,जिसमें आज जिला कारागार ब्रिटिश राज से प्रचलित है किंतु 18नवंबर सन 1920ईस्वी को ही अंग्रेजी शासन में जिसे भारतीय पुरातत्व विभाग के संरक्षण में दिया हुआ है,जो आज एक राष्ट्रीय धरोहर है,के सामने स्थित महाराजा रणवीर सिंह रोहिला चौक पर  लगाए गए  शिला लेखों का अनावरण कुंवर बृजेश सिंह राज्य मंत्री लोक निर्माण विभाग उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा किया जाता है,सिडको चेयरमैंन श्री वाई पी सिंह जैसे दिग्गज क्षत्रिय नेता एवं राजनीतिज्ञ इस चौक पर उपस्थिति दर्ज कराते तथा क्षत्रिय सम्राट महाराजा रणवीर सिंह रोहिला जी की भव्य प्रतिमा की अपने काफिले के साथ परिक्रमा करते है,क्या यह क्षत्रिय एकता अखंडता को बनाए रखने की एक परम्परा जो रोहिला क्षत्रिय समाज में डॉक्टर कर्ण वीर सिंह राणा द्वारा संचालित की गई थी उसका जीवित दर्शन नहीं है?

*डॉक्टर कर्णवीर सिंह रोहिला जी के ""हमे चाहिए स्वाभिमान""के उद्घोष को ध्यान में रखा वर्तमान न्यू जेनरेशन ने,जिस प्रेरणा के कारण आज युवक युवतियां प्रत्येक क्षेत्र में दर्शनीय भागीदारी कर अपना कैरियर बनाने में जुटे है,। अभिनय ,खेल , क्रिकेट कुश्ती,चिकित्सा ,मॉडलिंग एथलीट, बॉक्सिंग,गायन शिक्षा उच्च तम आई आई टी , सी पी एम टी, एन डी ए,आई ए एस,पी सी एस,भारतीय थल,जल तथा वायु सेना ,अंतरिक्ष आदि में अपना और परिवार तथा रोहिला राजपूत समाज का नाम बिना किसी आरक्षण सुविधा  के गौरवान्वित किया है अनेकों सुपुत्रीयो बेटियों ने आई ए एस पी सी एस जैसे भारत की सर्वोच्च परीक्षा उत्तीर्ण कर अच्छी रैंक प्राप्त की है तथा राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय स्तर से उच्चतम शिक्षा प्राप्त की है मंत्रालयों में गैजेटेड कलाश प्रथम अधिकारी विराजमान है विश्व स्तरीय डॉक्टर्स हे  विदेशों में विख्यात है,  यह किसी सार्थक प्रयास उनकी प्रेरणा  के  श्रोत से उत्पन जिज्ञासाएं प्रतीत नहीं होती ।इसी प्रकार रोहिला क्षत्रिय  युवा शक्ति को  उनके बताए रास्ते पर ही होगा*
रोहिला औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान में भव्य पुस्तकालय  है डिजिटल लाइब्रेरी बनाई गई  है जिससे लाभान्वित होकर  छात्र छात्राएं  आधुनिक शिक्षा प्राप्त करेंगे।
उनके सुपुत्र डॉक्टर शालीन सिंह रोहिला जी ने  रोहिला क्षत्रिय समाज के उत्थान हेतु अनेक कार्य किए,आज वे भी पितृ स्थान पर ही पहुंच चुके है किंतु उनकी धर्मपत्नी डॉक्टर इंद्र जीत सिंह कौर आज भी चिकित्सा के क्षेत्र में उनके आशीर्वाद से ऊंचे आयाम पर है और दिन रात समाज सेवा को निस्वार्थ भाव से करती है,यह है डॉक्टर कर्णवीर सिंह रोहिला जी आत्मा को स्वयं के साथ महसूस करना और आशीर्वाद लेना।।
*सनातन धर्म की रक्षा के लिए उत्तर भारत का अकेला राजपूत वीर गंगा सिंह महेचा राठौड़ रोहिला राजपूत को कलायत (कैथल) के mudahad राजपुतो को साथ लेकर दुर्रानी अब्दाली ,रुहेला नजीब खान से भिड़ गया था और मराठा सेनापति के रूप में वीर गति पाई थी उन्ही की स्मृति में अंबाहेटा नकूड तिराहे पर वीर गंगा सिंह महेचा राठौड़ रोहिला राजपूत का स्मारक और उनकी रानी राम प्यारी देवी की सती समाधि बन कर तैयार किए जाने के प्रस्ताव आ रहे है,राजपूत स्मार्स्को को संरक्षित किया जा रहा है*
उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में क्षत्रिय सम्राट महाराजा रणवीर सिंह रोहिला चौक का प्रस्ताव ,विचाराधीन है,वहां के महापौर ने पूरा आश्वासन दिया है, विश्व प्रसिद्ध नगर रूड़की में भी गंगनहर पर एक घाट तथा एक चौक का नामकरण क्षत्रिय सम्राट महाराजा रणवीर सिंह रोहिला के नाम पर किए जाने की पूरी संभावना है,वहां की युवा शक्ति पूरी लगन के साथ प्रयास कर रही है।
*तीर्थ नगरी हरिद्वार में उत्तराखंड में एक घाट जहा उनकी अस्थियां प्रवाहित हुई थी उस घाट का नाम होगा महाराजा रणवीर सिंह रोहिला घाट* चौक की स्थापना आदि ये सभी सोच और कार्य सम्पादन ही उनकी अभिलाषा थी जिसे आप सभी उनके द्वारा  संस्थापित, अखिल भारतीय रोहिला क्षत्रिय विकास परिषद रजिस्टर्ड,1988 ईस्वी संबद्ध अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा रजिस्टर्ड 1897ईस्वी के सानिध्य में ही बड़ी आशा के साथ पूर्ण करेंगे ।।। 

*#सोलंकी_वंश_वीर_योद्धाओ_का_इतिहास*

*👉 दद्दा चालुक्य पहले राजपूत योद्धा थे जिन्होंने गजनवी को सोमनाथ मंदिर लूटने से रोका था।*

👉 भीमदेव द्वितीय ने मोहम्मद गोरी की सेना को 2 बार बुरी तरह से हराया और मोहम्मद गोरी को दो साल तक गुजरात के कैद खाने में रखा और बाद में छोड़ दिया जिसकी वजह से मोहम्मद गोरी ने तीसरी बार गुजरात की तरफ आँख उठाना तो दूर जुबान पर नाम तक नहीं लिया ।

👉 सोलंकी सिद्धराज जयसिंह इनके बारे में तो जितना कहे कम है 56 वर्ष तक गुजरात पर राज किया सिंधदेश, मध्यप्रदेश, राजस्थान का कुछ भाग, सोराष्ट्र, तक इनका राज्य था सबसे बड़ी बात तो यह है की यह किसी अफगान, और मुग़ल से युद्ध भूमि में हारे नहीं बल्कि उनको धुल चटा देते थे सिद्धराज जयसिंह और कुमारपाल ने व्यापार के नए-नए तरीके खोजे जिससे गुजरात और राजस्थान की आर्थिक स्थितिया सुधर गयी गरीबो को काम मिलने लगा और सब को काम की वजह से उनके घर की स्थितियां सुधर गयी।

👉 पुलकेशी महाराष्ट्रा, कर्नाटक, आँध्रप्रदेश तक इनका राज्य था इनके समय भारत में ना तो मुग़ल आये थे और ना अफगान थे उस समय राजपूत राजा आपस में लड़ाई करते थे अपना राज्य बढ़ाने के लिए।

👉 किल्हनदेव सोलंकी ( टोडा-टोंक ) इन्होने दिल्ली पर हमला कर बादशाह की सारी बेगमो को उठाकर टोंक के नीच जाति के लोगो में बाट दिया क्यूंकि दिल्ली का सुलतान बेगुनाह हिन्दुओ को मारकर उनकी बीवी, बेटियों, बहुओ को उठाकर ले जाता था इनका राज्य टोंक, धर्मराज, दही, इंदौर, मालवा तक फैला हुआ था।

👉 मांडलगढ़ के बल्लू दादा ने अकेले ही अकबर के दो खास ख्वाजा अब्दुलमाजिद और असरफ खान की सेना का डट कर मुकाबला किया और मौत के घाट उतार दिया हल्दीघाटी में महाराणा प्रताप के साथ युद्ध में काम आये बल्लू दादा के बाद उनके पुत्र नंदराय ने मांडलगढ़ – मेवाड की कमान अपने हाथों में ली इन्होने मांडलगढ़ की बहुत अच्छी तरह देखभाल की लेकिन इनके समय महाराणा प्रताप जंगलो में जिवन गुजार रहे थे और अकबर ने मान सिंह के साथ मिलकर मांडलगढ़ पर हमला कर दिया और सभी सोलंकियों ने उनका मुकाबला किया और लड़ते हुए वीरगति प्राप्त की।

👉 वच्छराज सोलंकी इन्होने गौ हथ्यारो को अकेले ही बिना सैन्य बल के लड़ते हुए धड काटने के बाद भी 32 किलोमीटर तक लड़ते हुए गए अपने घोड़े पर और गाय चोरो को एक भी गाय नहीं ले जने दी और सब को मौत के घात उतार कर अंत में वीरगति को प्राप्त हो गए जिसकी वजह से आज भी गुजरात की जनता इनकी पूजती है और राधनपुर-पालनपुर में इनका एक मंदिर भी बनाया हुआ है।

👉 भीमदेव प्रथम जब 10-11 वर्ष के थे तब इन्होने अपने तीरे अंदाज का नमूना महमूद गजनवी को कम उमर में ही दिखा दिया था महमूद गजनवी को कोई घायल नहीं कर पाया लेकिन इन्होने दद्दा चालुक्य की भतीजी शोभना चालुक्य (शोभा) के साथ मिलकर महमूद गजनवी को घायल कर दिया और वापस गजनी-अफगानिस्तान जाने पर विवश कर दिया जिसके कारण गजनवी को सोमनाथ मंदिर लूटने का विचार बदलकर वापस अफगानिस्तान जाना पड़ा।

👉 कुमारपाल इन्होने जैन धर्म की स्थापना की और जैनों का साथ दिया गुजरात और राजस्थान के व्यापारियों को इन्होने व्यापार करने के नए – नए तरीके बताये और वो तरीके राजस्थान के राजाओ को भी बेहद पसंद आये और इससे दोनों राज्यों की शक्ति और मनोबल और बढ़ गया और गुजरात, राजस्थान की जनता को काम मिलने लगे जिससे उनके घरो का गुजारा होने लगा।

👉 राव सुरतान के समय मांडू सुल्तान ने टोडा पर अधिकार कर लिया तब बदनोर – मेवाड की जागीर मिली राणा रायमल उस समय मेवाड के उतराधिकारी थे राव सुरतान की बेटी ने शर्त रखी मैं उसी राजपूत से शादी करुँगी जो मुझे मेरी जन्म भूमि टोडा दिलाएगा।
तब राणा रायमल के बेटे राणा पृथ्वीराज ने उनका साथ दिया पृथ्वीराज बहुत बहादूर था और जोशीला बहुत ज्यादा था चित्तोड़ के राणा पृथ्वीराज, राव सुरतान सिंह और राजकुमारी तारा बाई ने टोडा-टोंक पर हमला किया और मांडू सुलतान को तारा बाई ने मौत के घाट उतार दिया और टोडा पर फिर से सोलंकियों का राज्य कायम किया।

👉 तारा बाई बहुत बहादूर थी उसने अपने वचन के मुताबिक राणा पृथ्वीराज से विवाह किया ऐसी सोलंकिनी राजकुमारी को सत सत नमन यहाँ पर मान सिंह और अकबर खुद आया था युद्ध करने और पूरे टोडा को 1 लाख मुगलों ने चारो और से गैर लिया सोलंकी सैनिको ने भी अकबर की सेना का सामना किया और अकबर के बहुत से सैनिको को मार गिराया और अंत में सब ने लड़ते हुए वीरगति पाई।

जय राजपूताना जय मां भवानी क्षत्रिय धर्म युगे युगे।

*रोहिला क्षत्रिय शिरोमणि डॉक्टर कर्ण वीर सिंह रोहिला जी जी की 91वी जयंती 06/06/ 2026दिन रविवार को एक युवा जनचेतना महोत्सव के रूप में मनाई जाएगी हर वर्ष उनकी जयंती छ जून को स्वाभिमान दिवस के रूप में मनाई जाती है।

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डॉक्टर कर्ण वीर सिंह रोहिला अमर रहे।
 राजमाता रामकुमारी देवी अमर रहे।
डॉक्टर शालीन सिंह रोहिला अमर रहे।
डॉक्टर इंद्र जीत सिंह कौर जिंदाबाद।
जय जय भवानी,जय कालिका चामुण्डा माता,
*जय जय मां शाकंभरी*
जय राजपूताना रोहिलखंड,बुंदेलखंड,
*जय जय राजपूताना*
*क्षत्रिय एकता जिंदाबाद*
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 SAMAY SINGH PUNDIR



          

Friday, 22 May 2026

SOME SOURCES OF ROHILKHAND RAJPUT HISTORY

गौरवशाली इतिहास के कुछ स्वर्णाक्षर (रोहिला क्षत्रिय)
भारत वर्ष का क्षेत्रफल 42 ,02 ,500 वर्ग किमी था ।
रोहिला साम्राज्य 25 ,000 वर्ग किमी 10 ,000 वर्गमील में फैला हुआ था ।
रोहिला, राजपूतो की एक खाप, परिवार या परिजन- समूह है जो कठेहर - रोहिलखण्ड के शासक एंव संस्थापक थे |मध्यकालीन भारत में बहुत से राजपूत लडाको को रोहिला की उपाधि से विभूषित किया गया. उनके वंशज आज भी रोहिला परिवारों में पाए जाते हैं ।
रोहिले- राजपूत प्राचीन काल से ही सीमा- प्रांत, मध्य देश (गंगा-yamuna का दोआब),रोहिलखंड पंजाब, काश्मीर, गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश में शासन करते रहे हैं । जबकि मुस्लिम-रोहिला साम्राज्य अठारहवी शताब्दी में इस्लामिक दबाव के पश्चात् स्थापित हुआ. । अफगानों ने इसे उर्दू में "रूहेलखण्ड" कहा ।
1702 से 1720 ई तक रोहिलखण्ड में रोहिले राजपूतो का ही शासन था. जिसकी राजधानी बरेली थी ।
रोहिलखंड एक राजपूताना साम्राज्य है। रोहिलखंड एक शुद्ध हिंदी,संस्कृत और प्राकृत भाषा का शब्द है,अरेबिक या उर्दू शब्द नही है।
रोहिले राजपूतो के महान शासक "राजा इन्द्रगिरी" ने रोहिलखण्ड की पश्चिमी सीमा पर रोहिलखंड विस्तार के समय सहारनपुर में एक किला बनवाया,जिसे "प्राचीन रोहिला किला" कहा जाता है । सन 1801 ई में रोहिलखण्ड को अंग्रेजो ने अपने अधिकार में ले लिया था. हिन्दू रोहिले-राजपुत्रो द्वारा बनवाए गये इस प्राचीन रोहिला किला को सन 1806 ईस्वी से सन1858 ईस्वी के मध्य कारागार में परिवर्तित कर दिया गया था । इसी प्राचीन- रोहिला- किला में आज सहारनपुर की जिला- कारागार है । उसके सामने महाराजा रणवीर सिंह रोहिला चौक स्थित है।
"सहारन" राजपूतो का एक गोत्र है जो रोहिले राजपूतो में पाया जाता है. यह सूर्य वंश की एक प्रशाखा है जो राजा भरत के वंशधरो से प्रचालित हुई थी ।
फिरोज़ तुगलक के आक्रमण के समय "थानेसर" (वर्तमान में हरियाणा में स्थित) का राजा "सहारन" ही था ।
दिल्ली में गुलाम वंश के समय रोहिलखण्ड की राजधानी "रामपुर" में RANVEER SINGH ROHILA/KATHEHARIYA/ (काठी कोम, निकुम्भ वंश, सूर्यवंश रावी नदी के निकट से विस्थापित कठ गणों के वंशधर) का शासन था । इसी रोहिले राजा ने दिल्ली के सेनापति नसीरुद्दीन चंगेज को हराया था. 'खंड' kshtriyo से सम्बंधित है, जैसे भरतखंड, BUNDELKHAND, VIDHEYLKHAND , रोहिलखंड, KUMAYUNKHHAND, उत्तराखंड आदि ।
प्राचीन भारत की केवल दो भाषाएँ संस्कृत व प्राकृत (सरलीकृत संस्कृत) थी । रोहिल प्राकृत और खंड संस्कृत के शब्द हैं जो क्षत्रिय राजाओं के प्रमाण हैं । इस्लामिक नाम है दोलताबाद, कुतुबाबाद, मुरादाबाद, जलालाबाद, हैदराबाद, मुबारकबाद, फैजाबाद, आदि ।
रोहिले राजपूतो की उपस्तिथि के प्रमाण हैं । योधेय गणराज्य के सिक्के, गुजरात का (1445 वि ) ' का शिलालेख (रोहिला मालदेव के सम्बन्ध में), उत्तर प्रदेश में स्थित रोहिलखंड रामपुर में राजा रणवीर सिंह के किले के खंडहर, रानी तारादेवी सती का मंदिर , पीलीभीत में राठौर रोहिलो (महिचा- प्रशाखा) की सतियों के मंदिर, कपिल मुनि स्थान पर कलायथ कैथल(हरियाणा)में वीर GANGA SINGH महेचा राठौड़ रोहिला राजपूत PANIPAT के तीसरे युद्ध KE YODHA की समाधि और उनकी रानी सती माता रामप्यारी का मंदिर जिसे क्षेत्र के सभी राजपूत मिलकर पूजते है। सहारनपुर का प्राचीन रोहिला किलाऔर उसके सामने स्थित क्षत्रिय सम्राट MAHA RAJA RANVEER SINGH ROHILA चौक, मंडोर का शिलालेख, " बड़ौत में स्तिथ " RAJA RANVEER SINGH ROHILA MARG"
*दिल्ली के रोहिणी में स्थित है महाराजा रणवीर सिंह रोहिला पार्क,बम्बई में स्थित हैं श्री हर प्रसाद रूहेला मार्ग*
          नगरे नगरे ग्रामै ग्रामै विलसन्तु संस्कृतवाणी ।
          सदने - सदने जन - जन बदने , जयतु चिरं कल्याणी ।।
          जोधपुर का शिलालेख, प्रतिहार शासक HARISH CHANDRA को मिली रोहिल्लाद्व्यंक की उपाधि, कई अन्य
          राजपूतो के वंशो को प्राप्त उपाधियाँ, 'पृथ्वीराज रासो', आल्हाखण्ड - काव्य सभी राजपूत वंशो में पाए
          जाने वाले प्रमुख गोत्र ।
          अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा भारत द्वारा प्रकाशित पावन ग्रन्थ क्षत्रिय वंशाणर्व (रोहिले क्षत्रियों का
          राज्य रोहिलखण्ड का पूर्व नाम पांचाल व मध्य देश, वर्तमान में अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा से
          अखिल भारतीय रोहिला.क्षत्रिय विकास परिषद रजिस्टर्ड को संबद्धता प्राप्त होना,। वर्तमान में भी रोहिलखण्ड (संस्कृत भाषा में)
          क्षेत्र का नाम यथावत बने रहना, अंग्रेजो द्वारा भी उत्तर रेलवे को "रोहिलखण्ड - रेलवे" का नाम देना जो
          बरेली से देहरादून तक सहारनपुर होते हुए जाती थी, वर्तमान में लाखो की संख्या में पाए जाने वाले
          रोहिला-राजपूत, रोहिले-राजपूतों के सम्पूर्ण भारत में फैले हुए कई अन्य संगठन अखिल भारतीय स्तर
          पर 'राजपूत रत्न' रोहिला शिरोमणि डा. कर्णवीर सिंह द्वारा संगठित एक अखिल भारतीय रोहिला
          क्षत्रिय विकास परिषद पंजीकृत (सम्बद्ध अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा) पंजीकरण संख्या - 545, आदि।
   12. पानीपत की तीसरी लड़ाई में रोहिले राजपूत- राजा गंगासहाय/गंगा सिंह राठौर (महेचा) के नेतृत्व में
          मराठों
          की ओर से अफगान आक्रान्ता अहमदशाह अब्दाली व रोहिला पठान नजीबदौला के विरुद्ध लड़े व
          वीरगति पाई । इस मराठा युद्ध में लगभग एक हजार चार सौ रोहिले राजपूत वीरगति को प्राप्त हुए ।
           (इतिहास -रोहिला-राजपूत)
   13. प्रथम स्वतंत्रता संग्राम 1857 में भी रोहिले राजपूतों ने अपना योगदान दिया, ग्वालियर के किले में रानी
          लक्ष्मीबाई को हजारों की संख्या में रोहिले राजपूत मिले, इस महायज्ञ में स्त्री पुरुष सभी ने अपने गहने
          धन आदि एकत्र कर झाँसी की रानी के साथ अंग्रेजो के विरुद्ध आवाज उठाने के लिए सम्राट बहादुरशाह-
          जफर तक पहुँचाए । अंग्रेजों ने ढूँढ-ढूँढ कर उन्हें काट डाला जिससे रोहिले राजपूतों ने अज्ञातवास की
          शरण ली।
   14. राजपूतों की हार के प्रमुख कारण थे हाथियों का प्रयोग, सामंत प्रणाली व आपसी मतभेद, ऊँचे व
          भागीदार कुल का भेदभाव (छोटे व बड़े की भावना) आदि।
   15. सम्वत 825 में बप्पा रावल चित्तौड़ से विधर्मियों को खदेड़ता हुआ ईरान तक गया। बप्पा रावल से समर
          सिंह तक 400 वर्ष होते हैं, गह्लौतों का ही शासन रहा। इनकी 24 शाखाएँ हैं। जिनके 16 गोत्र (बप्पा
          रावल के वंशधर) रोहिले राजपूतों में पाए जाते हैं।
   16. चितौड़ के राणा समर सिंह (1193 ई.) की रानी पटना की राजकुमारी थी इसने 9 राजा, 1 रावत और कुछ
          रोहिले साथ लेकर मौ. गोरी के गुलाम कुतुबद्दीन का आक्रमण रोका और उसे ऐसी पराजय दी कि कभी
          उसने चितौड़ की ओर नही देखा।
   17. रोहिला शब्द क्षेत्रजनित, गुणजनित व 'मूल पुरुष' नाम-जनित है। यह गोत्र जाटों में भी रूहेला, रोहेला,
          रूलिया, रूहेल , रूहिल, रूहिलान नामों से पाया जाता है।
   18. रूहेला गोत्र जाटों में राजस्थान व उ. प्र. में पाया जाता है। रोहेला गोत्र के जाट जयपुर में बजरंग बिहार
          ओर ईनकम टैक्स कालोनी टौंक रोड में विद्यमान है। झुनझुन, सीकर, चुरू, अलवर, बाडमेर में भी 
          रोहिला गोत्र के जाट विद्यमान हैं । उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले में रोहेला गोत्र के जाटों के बारह 
          गाँव हैं। महाराष्ट्र में रूहिलान गोत्र के जाट वर्धा में केसर व खेड़ा गाँव में विद्यमान हैं।,रोहतक और भिवानी में रोहिल, रूहिल उपनाम के जाट विद्यमान है।
   19. मुगल सम्राट अकबर ने भी राजपूत राजाओं को विजय प्राप्त करने के पश्चात् रोहिला-उपाधि से
          विभूषित किया था, जैसे राव, रावत, महारावल, राणा, महाराणा, रोहिल्ला, रहकवाल आदि।
   20. "रोहिला-राजपूत" समाज , क्षत्रियों का वह परिवार है जो सरल ह्रदयी, परिश्रमी,राष्ट्रप्रेमी,स्वधर्मपरायण,
          स्वाभिमानी व वर्तमान में अधिकांश अज्ञातवास के कारण साधनविहीन है। 40 प्रतिशत कृषि कार्य से,30
          प्रतिशत श्रम के सहारे व 30 प्रतिशत व्यापार व लघु उद्योगों के सहारे जीवन यापन कर रहे हैं। इनके 
          पूर्वजो ने हजारों वर्षों तक अपनी आन, मान, मर्यादा की रक्षा के लिए बलिदान दिए हैं और अनेको 
          आक्रान्ताओं को रोके रखने में अपना सर्वस्व मिटाया है । गणराज्य व लोकतंत्रात्मक व्यवस्था को
          सजीव बनाये रखने की भावना के कारण वंश परंपरा के विरुद्ध रहे, करद राज्यों में भी स्वतंत्रता बनाये
          रखी । कठेहर रोहिलखण्ड की स्थापना से लेकर सल्तनत काल की उथल पुथल, मार काट , दमन चक्र
          तक लगभग आठ सौ वर्ष के शासन काल के पश्चात् 1857 के ग़दर के समय तक रोहिले राजपूतों ने
          राष्ट्रहित में बलिदान दिये हैं। 
 क्रूर काल के झंझावालों से संघर्ष करते हुए क्षत्रियों का यह 'रोहिला परिवार' बिखर BIKHAR गया।
           , इस समाज की पहचान के लिए भी आज स्पष्टीकरण देना पड़ता है। कैसा दुर्भाग्य है? यह
          क्षत्रिय वर्ग का। जो अपनी पहचान को भी टटोलना पड़ रहा है। परन्तु समय के चक्र में सब कुछ सुरक्षित
          है। इतिहास के दर्पण में थिरकते चित्र, बोलते हैं, अतीत झाँकता है, सच सोचता है कि उसके होने के
          प्रमाण धुंधले-धुंधले से क्यों हैं? हे- क्षत्रिय तुम धन्य हो, पहचानो अपने प्रतिबिम्बों को' -
          "क्षत्रिय एकता का बिगुल फूँक 
           सब धुंधला धुंधला छंटने दो।
           हो अखंड भारत के राजपुत्र 
           खण्ड खण्ड में न सबको बंटने दो ।।"
    21. रोहिलखण्ड से विस्थापित इन रोहिला परिवारों में राजपूत परम्परा के कुछ प्रमुख गोत्र इस प्रकार पाए
           जाते हैं :-
रोहिला, रोहित, रोहिल, रावल, द्रोहिया, रल्हन, रूहिलान, रौतेला , रावत 
यौधेय, योतिक, जोहिया, झोझे, पेशावरी 
पुण्डीर, (पुलस्त्य)पांडला(धौम्य), पंढेर, पुन्ड़ेहार, पुंढीर, पुंडाया  
चौहान, जैवर, जौडा, चाहल, चावड़ा, खींची, गोगद, गदाइया, सनावर, क्लानियां, चिंगारा, चाहड बालसमंद, चोहेल, चेहलान, बालदा, बछ्स (वत्स), बछेर, चयद, झझोड, चौपट, खुम्ब, जांघरा, जंगारा, झांझड चुहल चूहेल 
निकुम्भ, कठेहरिया, कठौरा, कठैत, कलुठान, कठपाल, कठेडिया, कठड, काठी, कठ, पालवार 
RATHOD महेचा, महेचराना धांधल, रतनौता, बंसूठ जोली, जोलिए, बांकटे, बाटूदा, थाथी, कपोलिया, खोखर, अखनौरिया ,लोहमढ़े, मसानिया 
BUNDELA, उमट, ऊमटवाल 
, भारती, गनान 
नाभावंशी,बटेरिया, बटवाल, बरमटिया 
परमार, जावडा, लखमरा, मूसला, मौसिल, भौंसले, बसूक, जंदडा, पछाड़, पंवारखा, ढेड, मौन 
तोमर, तंवर, मुदगल, देहलीवाल, किशनलाल, सानयाल, सैन, सनाढय कालरा
GEHLOT, कूपट, पछाड़, थापा, ग्रेवाल, कंकोटक, गोद्देय, पापडा, नथैड़ा, नैपाली, लाठिवाल, पानिशप, पिसोण्ड, चिरडवाल, नवल, चरखवाल, साम्भा, पातलेय, पातलीय, छन्द (चंड), क्षुद्रक,(छिन्ड, इन्छड़, नौछड़क), रज्जडवाल, बोहरा, जसावत, गौर, मलक, मलिक , मूसला 
कछवाहा, कुशवाहा, कोकच्छ, ततवाल, बलद, कोकचे काक मछेर 
सिसौदिया, भरोलिया, बरनवाल, बरनपाल, बहारा 
 खुमाहड, अवन्ट, ऊँटवाल
सिकरवार, रहकवाल, रायकवार, ममड, गोदे 
सोलंकी, गिलानिया, भुन, बुन, बघेला, ऊन, (उनयारिया)
बडगूजर, सिकरवार, ममड़ा, पुडिया 
कश्यप, काशब, रावल, रहकवाल 
यदु, मेव, छिकारा, तैतवाल, भैनिवाल, उन्हड़, भाटटी बनाफरे, जादो, बागड़ी, सिन्धु, कालड़ा, सारन, छुरियापेड, लखमेरिया, चराड, जाखड़, सेरावत, देसवाल, पूडिया 
प्रमुख रोहिला क्षत्रिय शासक
अंगार सैन - गांधार (वैदिक काल)
अश्वकरण - ईसा पूर्व 326 (मश्कावती दुर्ग)
अजयराव - स्यालकोट (सौकंल दुर्ग) ईसा पूर्व 326
प्रचेता - मलेच्छ संहारक 
शाशिगुप्त - साइरस के समकालीन 
सुभाग सैन - मौर्य साम्राज्य के समकालीन 
राजाराम शाह - 929 वि. रामपुर रोहिलखण्ड 
बीजराज - रोहिलखण्ड
करण चन्द्र - रोहिलखण्ड
विग्रह राज - रोहिलखण्ड - गंगापार कर स्रुघ्न जनपद (सुगनापुर) यमुना तक विस्तार दसवीं शताब्दी में सरसावा में किले का निर्माण पश्चिमी सीमा पर, यमुना द्वारा ध्वस्त टीले के रूप में नकुड़ रोड पर देखा जा सकता है।
सावन्त सिंह - रोहिलखण्ड
जगमाल - रोहिलखण्ड
धिंगतराव - रोहिलखण्ड
गोंकुल सिंह - रोहिलखण्ड
महासहाय - रोहिलखण्ड
त्रिलोक चन्द - रोहिलखण्ड
रणवीर सिंह - रोहिलखण्ड
सुन्दर पाल - रोहिलखण्ड
नौरंग देव - रोहिलखण्ड
सूरत सिंह - रोहिलखण्ड
हंसकरण रहकवाल - पृथ्वीराज के सेनापति 
मिथुन देव रायकवार - ईसम सिंह पुण्डीर के मित्र थाना भवन शासक 
सहकरण, विजयराव - उपरोक्त 
राजा हतरा - हिसार 
जगत राय - बरेली 
मुकंदराज - बरेली 1567 ई.
बुधपाल - बदायुं 
महीचंद राठौर - बदायुं
बांसदेव - बरेली 
बरलदेव - बरेली
राजसिंह - बरेली
परमादित्य - बरेली
न्यादरचन्द - बरेली
राजा सहारन - थानेश्वर 
प्रताप राव खींची (चौहान वंश) - गागरोन 
राणा लक्ष्य सिंह - सीकरी 
रोहिला मालदेव - गुजरात 
जबर सिंह - सोनीपत 
रामदयाल महेचराना - कलायत
गंगसहाय - महेचराना *कलायत* 1761 ई.
राणा प्रताप सिंह - कौराली (गंगोह) 1095 ई.
नानक चन्द - अल्मोड़ा 
राजा पूरणचन्द - बुंदेलखंड 
राजा हंस ध्वज - हिसार व राजा हरचंद 
राजा बसंतपाल - रोहिलखण्ड व्रतुसरदार, सामंत वृतपाल 1193 ई.
महान सिंह बडगूजर - बागपत 1184 ई.
राजा यशकरण - अंधली 
गुणाचन्द - जयकरण - चरखी - दादरी 
राजा मोहनपाल देव - करोली 
राजारूप सैन - रोपड़ 
राजा महपाल पंवार - जीन्द 
राजा परपदेड पुंडीर - लाहौर 
राजा लखीराव - स्यालकोट 
राजा जाजा जी तोमर - दिल्ली 
खड़ग सिंह - रोहिलखण्ड लौदी के समकालीन 
राजा हरि सिंह - खिज्रखां के दमन का शिकार हुआ - कुमायुं की पहाड़ियों में अज्ञातवास की शरण ली 
राजा इन्द्रगिरी (रोहिलखण्ड) (इन्द्रसेन) - सहारनपुर में प्राचीन रोहिला किला बनवाया । रोहिला क्षत्रिय वंश भास्कर लेखक आर. आर. राजपूत मुरसेन अलीगढ से प्रस्तुत 
राजा बुद्ध देव रोहिला - 1787 ई., सिंधिया व जयपुर के कछवाहो के खेड़ा व तुंगा के मैदान में हुए युद्ध का प्रमुख पात्र । (राय कुँवर देवेन्द्र सिंह जी राजभाट, तुंगा (राजस्थान)

रोहिल्ला उपाधि - शूरवीर, अदम्य - साहसी विशेष युद्ध कला में प्रवीण, उच्च कुलीन सेनानायको, और सामन्तों को उनके गुणों के अनुरूप क्षत्रिय वीरों को तदर्थ उपाधि से विभूषित किया जाता था - जैसे - रावत - महारावत, राणा, महाराणा, ठाकुर, नेगी, रावल, रहकवाल, रोहिल्ला, समरलछन्द, लखमीर,(एक लाख का नायक) आदि। इसी आधार पर उनके वंशज भी आजतक राजपूतों के सभी गोत्रों में पाए जाते हैं।
"वभूव रोहिल्लद्व्यड्कों वेद शास्त्रार्थ पारग: । द्विज: श्री हरि चन्द्राख्य प्रजापति समो गुरू : ।।2।।
( बाउक का जोधपुर लेख )
- सन 837 ई. चैत्र सुदि पंचमी - हिंदी अर्थ - "वेद शास्त्र में पारंगत रोहिल्लाद्धि उपाधिधारी एक हरिश्चन्द्र नाम का ब्राह्मण था" जो प्रजापति के समान था हुआ ।।6।।
( गुज्जर गौरव मासिक पत्रिका - अंक 10, वर्ष ।।माह जौलाई 1991 पृष्ठ - 13) (राजपुताने का इतिहास पृष्ठ - 147) (इतिहास रोहिला - राजपूत पृष्ठ - 23) (प्राचीन भारत का इतिहास, राजपूत वंश, - कैलाश - प्रकाशन लखनऊ सन 1970 ई. पृष्ठ - 104 -105 - )
रोहिल्लद्व्यड्क रोहिल्लद्धि - अंक वाला या उपाधि वाला ।
सर्वप्रथम प्रतिहार शासक द्विज हरिश्चन्द्र को रोहिल्लद्धि उपाधि प्राप्त हुई । बाउक,प्रतिहार शासक विप्र हरिश्चन्द्र के पुत्र कवक और श्रीमति पदमनी का पुत्र था वह बड़ा पराक्रमी और नरसिंह वीर था।
प्रतिहार एक पद है, किसी विशेष वर्ण का सूचक नही है। विप्र हरिश्चन्द्र प्रतिहार अपने बाहुबल से मांडौर दुर्ग की रक्षा करने वाला था, अदम्य साहस व अन्य किसी विशेष रोहिला शासक के प्रभावनुरूप ही रोहिल्लद्व्यड्क उपाधि को किसी आधार के बिना कोई भी व्यक्ति अपने नाम के साथ सम्बन्ध करने का वैधानिक रूप में अधिकारी नही हो सकता।
उपरोक्त से स्पष्ट है कि बहुत प्राचीन काल से ही गुणकर्म के आधार पर क्षत्रिय उपाधि "रोहिल्ला" प्रयुक्त । प्रदत्त करने की वैधानिक व्यवस्था थी। जिसे हिन्दुआसूर्य - महाराजा पृथ्वीराज चौहान ने भी यथावत रखा। पृथ्वीराज चौहान की सेना में एक सौ रोहिल्ला - राजपूत सेना नायक थे । "पृथ्वीराज रासौ" -
चहूँप्रान, राठवर, जाति पुण्डीर गुहिल्ला । बडगूजर पामार, कुरभ, जागरा, रोहिल्ला ।। इस कवित्त से स्पष्ट है । कि - प्राचीन - काल में रोहिला- क्षत्रियों का स्थान बहुत ऊँचा था। रोहिला रोहिल्ल आदि शब्द राजपुत्रों अथवा क्षत्रियों के ही द्योतक थे । इस कवित्त के प्रमाणिकता "आइने अकबरी", 'सुरजन चरिता' भी सिद्ध करते हैं । युद्ध में कमानी की तरह (रोह चढ़ाई करके) शत्रु सेना को छिन्न - भिन्न करने वाले को रहकवाल, रावल, रोहिल्ला, महाभट्ट कहा गया है।
महाराज पृथ्वीराज चौहान की सेना में पांच गोत्रों के रावल थे -
रावल - रोहिला 
रावल - सिन्धु 
रावल - घिलौत (गहलौत)
रावल - काशव या कश्यप 
रावल - बलदया बल्द
मुग़ल बादशाह अकबर ने भी बहादुरी की रोहिल्ला उपाधि को यथावत बनाए रखा जब अकबर की सेना दूसरे राज्यों को जीत कर आती थी तो अकबर अपनी सेना के सरदारों को,बहादुर जवानों बहादुरी के पदक (ख़िताब,उपाधि) देता था। एक बार जब महाराणा मान सिंह काबुल जीतकर वापिस आए तो अकबर ने उसके बाइस राजपूत सरदारों को यह ख़िताब दी (उपाधि से सम्मानित किया)
बाई तेरा हर निरकाला रावत को - रावल जी 
चौमकिंग सरनाथा को - रावल 
झंड्कारा कांड्कड को - रोहिल्ला 
रावत मन्चारा - कांड्कड काम करन, निरकादास रावत को रावराज और रूहेलाल को रोहिला 
स्वतंत्र रोहिलखंड राज्य संस्थापक महाराजा RANVEER SINGH ROHILA 
रक्षा बंधन के दिन रोहिलखंड की वीर भूमि गंगा सी पवित्र राजपूतों के रक्त से रंजित और आक्रांताओं के काल की धरती रामपुर के किले में दिया था कठेहर रोहिलखंड नरेश,महाराजा रणवीर सिंह रोहिला ने अदम्य साहस और अद्भुत शौर्य का परिचय!,दिल्ली सुलतान नासीरुद्दीन बहराम उर्फ चंगेज की चालीस हजार की सेना को दी थी शिकस्त!**तथा घुटने टेकने पर मजबूर किया था दिल्ली सल्तनत का दुर्दांत खूंखवार सेनापति नसीरुद्दीन महमूद को और प्राणदान मांगने पर क्षात्र धर्म रक्षार्थ छोड़ा था।**चंगेज ने अवसर पाकर रक्षा बंधन के दिन दरबारी गोकुल चंद पांडे हरिद्वार को लालच देकर किले के द्वार खुलवा लिए *धोखे के शिकार लगभग तीन हजार राजपूत निहत्थे ही लड़े,!आक्रमण कारियो के अस्त्र शस्त्र छीन छीन किया था शौर्य संग्राम दिल्ली सल्तनत की लगभग आधी गुलाम वंशी सेना को काट डाला था रोहिला राजपूतो ने!!अंत में चंगेज के खूंखवार दरिंदो ने अकेले में घेर लिया था RANVEER SINGH ROHILA को, जिन्हे आमने सामने की लड़ाई में दिल्ली सुलतान कभी नही हरा पाए थे किंतु वे उनके साहस से विस्मित हुए बिना नहीं रह सके ।रणवीर रणभूमि के वीर सपूत रक्त की अंतिम बूंद रहने तक संग्राम रत रहे और कतरा कतरा हो कर खेत रहे(सन 1254ईस्वी),उनका बलिदान रोहिलखंड के राजपूताना इतिहास में स्वर्णाक्षर दे गया!,समस्त राजपूत समाज रक्षा बंधन के दिन हुए इस बलिदान को एक शोर्य दिवस के रूप में मनाता आया है,यूट्यूब पर और अन्य सोसल मीडिया पर स्वतंत्र रोहिलखंड संस्थापक नरेश महाराजा RANVEER SINGH ROHILA की वीर गाथा दी हुई है,सभी क्षत्रिय जन अपने बच्चो को दिखाए ताकि सल्तनत काल में १२५४ ईसवी के इस इतिहास के धुंधले पृष्ठ भी उकेरे जा सके*, रक्षा बंधन को उनका बलिदान दिवस मनाया जाता है,समस्त क्षत्रिय समाज इस SHOURYA दिवस पर उन्हे कोटि कोटि नमन करते हुए उनके। बताए मार्ग पर स्वाधीनता और स्वाभिमान से स्वधर्म रक्षार्थ जीने की शपथ लेता है,यह सच्चाई हमसे स्कूली शिक्षा में छुपाई गई किंतु इतिहास के दर्पण में सब सुरक्षित रहता है जिसे उजागर कर भावी पीढ़ी को बताना ही हरेक क्षत्रिय का नैतिक दायित्व है अतः आप सभी क्षत्रियों से निवेदन है कि भावी पीढ़ी को सच्चाई बताए और स्वाभिमान से जीना दिखाए।।
सूर्य वंशी निकुंभ क्षत्रिय महाराजा RANVEER SINGH ROHILA का जन्म हिंदूवा सूर्य महाराज पृथ्वी राज चौहान के पतन के बाद दिल्ली सल्तनत के बढ़ते कदमों के बीच ऐसे समय में सन१२०४ईस्वी में कठेहर रोहिलखंड की राजधानी रामपुर के किले में राजा त्रिलोक सिंह के यहां हुआ था, जब सभी राजपूत शक्तियां क्षीण और तितर बितर हो चुकी थी,इस्लामिक आक्रांता मध्य भारत की ओर दमन करते हुए आगे बढ़ते रहते थे।।,रणवीर सिंह रोहिला का विवाह विजय पुर सीकरी की राजकुमारी तारा देवी से हुआ तथा पच्चीस वर्ष की आयु में रामपुर की गद्दी पर विराजमान होकर इस्लामीकरण पर रोक लगाई ।। तीस सालों तक दिल्ली सुलतानो को धूल चटाई किंतु रक्षा बंधन के दिन शिव मंदिर गए राजपूतों को रक्षा सूत्र बंधवाते हुए नसीरुद्दीन बहराम ने गोकुल चंद पांडे के द्वारा किले के द्वार खोलने पर घेर लिया और फिर होगया ADBHUT SHOURYA SANGRAM .. विस्तार भय से संक्षिप्त गाथा वर्णित है जिसे चाटुकार मुगल कालीन और ब्रिटिश इतिहास कारो ने छिपाया*
रोहिलखंड एक राजपूताना राज्य
कन्नौज पतन के बाद रोहिलखण्ड राज्य की स्थापना कठेहरिया राजा राम शाह उर्फ रामसिंह ने की थी अहिक्षेत्र काम्पिल्य के एक गॉंव रामनगर को रामपुर नगर बसाया ओर यह क्षत्रिय राजा राम के नाम पर रखा गया था यहाँ रोहिले राजपूतो ने 11 पीढ़ी लगातार शासन किया राजा रणवीर सिंह रोहिला ने नाइरुद्दीन महमूद,, ओर हरिसिंह रोहिला ने खिज्रखान को धूल चटाई नोरंगदेव ने पिंगू(तैमूर लंग)को हराया ।।।san ईस्वी के बाद भी कभी भी पूर्णतया रोहिलखंड को दिल्ली दरबार नही जीत पाया अकबर ओर बाद में औरंगजेब ने चाल चली और अफगानों की घुसपैठ करनी आबादी बढ़ानी शुरू की सन 1707ईस्वी में दाऊद खान बरेच अफगान के जाट दत्तक पुत्र जिसका नाम अलीमुहम्मद रखा था ने धोखे से बरेली में रोहिला राजा हरननंद का कत्ल किया और सम्पूर्ण रोहिलखण्ड पर अधिकार कर लिया इन अफगानों ने भी रोहिलखण्ड के नवाब बन जाने के कारणों से स्वयम को रुहेला सरदार कहा वास्तव में ये रोहिला नही थे जैसे कि रोह देश के अफगान लिखा यह गलत है ।।जिस काल में अफगान आए तब अफगानिस्तान को रोह देश नही कहा जाता था ।।
 यह झूठा मुस्लिम तुष्टि करण का इतिहास है ।।16वी सदी में जगत सिंह कठेहरिया रोहिल्ला राजपूत के पुत्रों बाँसदेव व बर्लदेव के नाम पर बरेली नगर की नीव रखी गयी अफगानों ने कोई नगर नही बसाया उन्होंने अपने काल मे ही रामपुर का नाम राम के नाम पर नही रखा। यह भ्रामक झूठ है कि फैज उल्ला खान ने रामपुर को बसाया था अठारहवीं सदी में जबकि रामपुर रियासत की स्थापना दसवीं सदी में राजा रामसिंह रोहिला(काठी कोम के राजपूत) ने की थी

*रोहिला क्षत्रिय योद्धाओं का शौर्य साहस, युद्ध कौशल, और अपने कुल व राष्ट्र की रक्षा के प्रति बलिदान की भावना में निहित होता था।* *हमारे क्षत्रिय योद्धा युद्ध भूमि में मृत्यु से* *निर्भय होकर लड़ते थे और उनका* *एकमात्र कर्तव्य राज्य व समाज की रक्षा करना था। शौर्य उनके रक्त में समाया हुआ था, जो युद्ध की ज्वाला में अपने बलिदान के रूप में प्रदर्शित होता था।*
*#क्षत्रिय*
*जय राजपूताना अखंड राजपूताना*
*जय राजपूताना,जय राजपूताना रोहिलखंड ,बुंदेलखंड*
संदर्भ 
इतिहास रोहिला राजपूत
 डॉक्टर के सी सैन
रोहिला क्षत्रिय वंश भास्कर
आर आर राजपूत
कठेहरिया रोहिला राजपूत
रोहिला क्षत्रियों का क्रमबद्ध इतिहास
दर्शन लाल रोहिला
मध्य कालीन भारत का इतिहास
ठाकुर अजीत सिंह परिहार
बालाघाट मध्य प्रदेश
 भारत भूमि और उसके वासी पृष्ठ-230 पंडित जयचंद्र विद्यालंकार
2-दून ज्योति-साप्ताहिक देहरादून 18 फरवरी 1974 
पुरुषोत्तम नागेश ओक व डॉक्टर ओमवीर शर्मा हेड ऑफ हिस्ट्री विभाग
3-क्षत्रिय वर्तमान पृष्ठ 97 व 263 ठाकुर अजित सिंह परिहार बालाघाट
4- प्राचीन भारत पृष्ठ -118,159,162 बीएम रस्तोगी इतिहास कार
5 राजतरँगनी पृष्ठ 31-39 कल्हण कृत अनुवादक नीलम अग्रवाल
6-रोहिला क्षत्रिय वन्स भास्कर ,आर आर राजपूत मूरसेन अलीगढ़
7- इतिहास रोहिला राजपूत 
डॉक्टर के सी सेन
8 - भारत का इतिहास पृष्ठ 138 डॉक्टर दया प्रकाश
9-भारतीय इतिहास मीमांसा पृष्ठ 44 जय

FACTS OF ROHILA RAJPUT CLAN

गौरवशाली इतिहास के कुछ स्वर्णाक्षर (रोहिला क्षत्रिय)
भारत वर्ष का क्षेत्रफल 42 ,02 ,500 वर्ग किमी था ।
रोहिला साम्राज्य 25 ,000 वर्ग किमी 10 ,000 वर्गमील में फैला हुआ था ।
रोहिला, राजपूतो की एक खाप, परिवार या परिजन- समूह है जो कठेहर - रोहिलखण्ड के शासक एंव संस्थापक थे |मध्यकालीन भारत में बहुत से राजपूत लडाको को रोहिला की उपाधि से विभूषित किया गया. उनके वंशज आज भी रोहिला परिवारों में पाए जाते हैं ।
रोहिले- राजपूत प्राचीन काल से ही सीमा- प्रांत, मध्य देश (गंगा-yamuna का दोआब),रोहिलखंड पंजाब, काश्मीर, गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश में शासन करते रहे हैं । जबकि मुस्लिम-रोहिला साम्राज्य अठारहवी शताब्दी में इस्लामिक दबाव के पश्चात् स्थापित हुआ. । अफगानों ने इसे उर्दू में "रूहेलखण्ड" कहा ।
1702 से 1720 ई तक रोहिलखण्ड में रोहिले राजपूतो का ही शासन था. जिसकी राजधानी बरेली थी ।
रोहिलखंड एक राजपूताना साम्राज्य है। रोहिलखंड एक शुद्ध हिंदी,संस्कृत और प्राकृत भाषा का शब्द है,अरेबिक या उर्दू शब्द नही है।
रोहिले राजपूतो के महान शासक "राजा इन्द्रगिरी" ने रोहिलखण्ड की पश्चिमी सीमा पर रोहिलखंड विस्तार के समय सहारनपुर में एक किला बनवाया,जिसे "प्राचीन रोहिला किला" कहा जाता है । सन 1801 ई में रोहिलखण्ड को अंग्रेजो ने अपने अधिकार में ले लिया था. हिन्दू रोहिले-राजपुत्रो द्वारा बनवाए गये इस प्राचीन रोहिला किला को सन 1806 ईस्वी से सन1858 ईस्वी के मध्य कारागार में परिवर्तित कर दिया गया था । इसी प्राचीन- रोहिला- किला में आज सहारनपुर की जिला- कारागार है । उसके सामने महाराजा रणवीर सिंह रोहिला चौक स्थित है।
"सहारन" राजपूतो का एक गोत्र है जो रोहिले राजपूतो में पाया जाता है. यह सूर्य वंश की एक प्रशाखा है जो राजा भरत के वंशधरो से प्रचालित हुई थी ।
फिरोज़ तुगलक के आक्रमण के समय "थानेसर" (वर्तमान में हरियाणा में स्थित) का राजा "सहारन" ही था ।
दिल्ली में गुलाम वंश के समय रोहिलखण्ड की राजधानी "रामपुर" में RANVEER SINGH ROHILA/KATHEHARIYA/ (काठी कोम, निकुम्भ वंश, सूर्यवंश रावी नदी के निकट से विस्थापित कठ गणों के वंशधर) का शासन था । इसी रोहिले राजा ने दिल्ली के सेनापति नसीरुद्दीन चंगेज को हराया था. 'खंड' kshtriyo से सम्बंधित है, जैसे भरतखंड, BUNDELKHAND, VIDHEYLKHAND , रोहिलखंड, KUMAYUNKHHAND, उत्तराखंड आदि ।
प्राचीन भारत की केवल दो भाषाएँ संस्कृत व प्राकृत (सरलीकृत संस्कृत) थी । रोहिल प्राकृत और खंड संस्कृत के शब्द हैं जो क्षत्रिय राजाओं के प्रमाण हैं । इस्लामिक नाम है दोलताबाद, कुतुबाबाद, मुरादाबाद, जलालाबाद, हैदराबाद, मुबारकबाद, फैजाबाद, आदि ।
रोहिले राजपूतो की उपस्तिथि के प्रमाण हैं । योधेय गणराज्य के सिक्के, गुजरात का (1445 वि ) ' का शिलालेख (रोहिला मालदेव के सम्बन्ध में), उत्तर प्रदेश में स्थित रोहिलखंड रामपुर में राजा रणवीर सिंह के किले के खंडहर, रानी तारादेवी सती का मंदिर , पीलीभीत में राठौर रोहिलो (महिचा- प्रशाखा) की सतियों के मंदिर, कपिल मुनि स्थान पर कलायथ कैथल(हरियाणा)में वीर GANGA SINGH महेचा राठौड़ रोहिला राजपूत PANIPAT के तीसरे युद्ध KE YODHA की समाधि और उनकी रानी सती माता रामप्यारी का मंदिर जिसे क्षेत्र के सभी राजपूत मिलकर पूजते है। सहारनपुर का प्राचीन रोहिला किलाऔर उसके सामने स्थित क्षत्रिय सम्राट MAHA RAJA RANVEER SINGH ROHILA चौक, मंडोर का शिलालेख, " बड़ौत में स्तिथ " RAJA RANVEER SINGH ROHILA MARG"
*दिल्ली के रोहिणी में स्थित है महाराजा रणवीर सिंह रोहिला पार्क,बम्बई में स्थित हैं श्री हर प्रसाद रूहेला मार्ग*
          नगरे नगरे ग्रामै ग्रामै विलसन्तु संस्कृतवाणी ।
          सदने - सदने जन - जन बदने , जयतु चिरं कल्याणी ।।
          जोधपुर का शिलालेख, प्रतिहार शासक HARISH CHANDRA को मिली रोहिल्लाद्व्यंक की उपाधि, कई अन्य
          राजपूतो के वंशो को प्राप्त उपाधियाँ, 'पृथ्वीराज रासो', आल्हाखण्ड - काव्य सभी राजपूत वंशो में पाए
          जाने वाले प्रमुख गोत्र ।
          अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा भारत द्वारा प्रकाशित पावन ग्रन्थ क्षत्रिय वंशाणर्व (रोहिले क्षत्रियों का
          राज्य रोहिलखण्ड का पूर्व नाम पांचाल व मध्य देश, वर्तमान में अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा से
          अखिल भारतीय रोहिला.क्षत्रिय विकास परिषद रजिस्टर्ड को संबद्धता प्राप्त होना,। वर्तमान में भी रोहिलखण्ड (संस्कृत भाषा में)
          क्षेत्र का नाम यथावत बने रहना, अंग्रेजो द्वारा भी उत्तर रेलवे को "रोहिलखण्ड - रेलवे" का नाम देना जो
          बरेली से देहरादून तक सहारनपुर होते हुए जाती थी, वर्तमान में लाखो की संख्या में पाए जाने वाले
          रोहिला-राजपूत, रोहिले-राजपूतों के सम्पूर्ण भारत में फैले हुए कई अन्य संगठन अखिल भारतीय स्तर
          पर 'राजपूत रत्न' रोहिला शिरोमणि डा. कर्णवीर सिंह द्वारा संगठित एक अखिल भारतीय रोहिला
          क्षत्रिय विकास परिषद पंजीकृत (सम्बद्ध अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा) पंजीकरण संख्या - 545, आदि।
   12. पानीपत की तीसरी लड़ाई में रोहिले राजपूत- राजा गंगासहाय/गंगा सिंह राठौर (महेचा) के नेतृत्व में
          मराठों
          की ओर से अफगान आक्रान्ता अहमदशाह अब्दाली व रोहिला पठान नजीबदौला के विरुद्ध लड़े व
          वीरगति पाई । इस मराठा युद्ध में लगभग एक हजार चार सौ रोहिले राजपूत वीरगति को प्राप्त हुए ।
           (इतिहास -रोहिला-राजपूत)
   13. प्रथम स्वतंत्रता संग्राम 1857 में भी रोहिले राजपूतों ने अपना योगदान दिया, ग्वालियर के किले में रानी
          लक्ष्मीबाई को हजारों की संख्या में रोहिले राजपूत मिले, इस महायज्ञ में स्त्री पुरुष सभी ने अपने गहने
          धन आदि एकत्र कर झाँसी की रानी के साथ अंग्रेजो के विरुद्ध आवाज उठाने के लिए सम्राट बहादुरशाह-
          जफर तक पहुँचाए । अंग्रेजों ने ढूँढ-ढूँढ कर उन्हें काट डाला जिससे रोहिले राजपूतों ने अज्ञातवास की
          शरण ली।
   14. राजपूतों की हार के प्रमुख कारण थे हाथियों का प्रयोग, सामंत प्रणाली व आपसी मतभेद, ऊँचे व
          भागीदार कुल का भेदभाव (छोटे व बड़े की भावना) आदि।
   15. सम्वत 825 में बप्पा रावल चित्तौड़ से विधर्मियों को खदेड़ता हुआ ईरान तक गया। बप्पा रावल से समर
          सिंह तक 400 वर्ष होते हैं, गह्लौतों का ही शासन रहा। इनकी 24 शाखाएँ हैं। जिनके 16 गोत्र (बप्पा
          रावल के वंशधर) रोहिले राजपूतों में पाए जाते हैं।
   16. चितौड़ के राणा समर सिंह (1193 ई.) की रानी पटना की राजकुमारी थी इसने 9 राजा, 1 रावत और कुछ
          रोहिले साथ लेकर मौ. गोरी के गुलाम कुतुबद्दीन का आक्रमण रोका और उसे ऐसी पराजय दी कि कभी
          उसने चितौड़ की ओर नही देखा।
   17. रोहिला शब्द क्षेत्रजनित, गुणजनित व 'मूल पुरुष' नाम-जनित है। यह गोत्र जाटों में भी रूहेला, रोहेला,
          रूलिया, रूहेल , रूहिल, रूहिलान नामों से पाया जाता है।
   18. रूहेला गोत्र जाटों में राजस्थान व उ. प्र. में पाया जाता है। रोहेला गोत्र के जाट जयपुर में बजरंग बिहार
          ओर ईनकम टैक्स कालोनी टौंक रोड में विद्यमान है। झुनझुन, सीकर, चुरू, अलवर, बाडमेर में भी 
          रोहिला गोत्र के जाट विद्यमान हैं । उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले में रोहेला गोत्र के जाटों के बारह 
          गाँव हैं। महाराष्ट्र में रूहिलान गोत्र के जाट वर्धा में केसर व खेड़ा गाँव में विद्यमान हैं।,रोहतक और भिवानी में रोहिल, रूहिल उपनाम के जाट विद्यमान है।
   19. मुगल सम्राट अकबर ने भी राजपूत राजाओं को विजय प्राप्त करने के पश्चात् रोहिला-उपाधि से
          विभूषित किया था, जैसे राव, रावत, महारावल, राणा, महाराणा, रोहिल्ला, रहकवाल आदि।
   20. "रोहिला-राजपूत" समाज , क्षत्रियों का वह परिवार है जो सरल ह्रदयी, परिश्रमी,राष्ट्रप्रेमी,स्वधर्मपरायण,
          स्वाभिमानी व वर्तमान में अधिकांश अज्ञातवास के कारण साधनविहीन है। 40 प्रतिशत कृषि कार्य से,30
          प्रतिशत श्रम के सहारे व 30 प्रतिशत व्यापार व लघु उद्योगों के सहारे जीवन यापन कर रहे हैं। इनके 
          पूर्वजो ने हजारों वर्षों तक अपनी आन, मान, मर्यादा की रक्षा के लिए बलिदान दिए हैं और अनेको 
          आक्रान्ताओं को रोके रखने में अपना सर्वस्व मिटाया है । गणराज्य व लोकतंत्रात्मक व्यवस्था को
          सजीव बनाये रखने की भावना के कारण वंश परंपरा के विरुद्ध रहे, करद राज्यों में भी स्वतंत्रता बनाये
          रखी । कठेहर रोहिलखण्ड की स्थापना से लेकर सल्तनत काल की उथल पुथल, मार काट , दमन चक्र
          तक लगभग आठ सौ वर्ष के शासन काल के पश्चात् 1857 के ग़दर के समय तक रोहिले राजपूतों ने
          राष्ट्रहित में बलिदान दिये हैं। 
 क्रूर काल के झंझावालों से संघर्ष करते हुए क्षत्रियों का यह 'रोहिला परिवार' बिखर BIKHAR गया।
           , इस समाज की पहचान के लिए भी आज स्पष्टीकरण देना पड़ता है। कैसा दुर्भाग्य है? यह
          क्षत्रिय वर्ग का। जो अपनी पहचान को भी टटोलना पड़ रहा है। परन्तु समय के चक्र में सब कुछ सुरक्षित
          है। इतिहास के दर्पण में थिरकते चित्र, बोलते हैं, अतीत झाँकता है, सच सोचता है कि उसके होने के
          प्रमाण धुंधले-धुंधले से क्यों हैं? हे- क्षत्रिय तुम धन्य हो, पहचानो अपने प्रतिबिम्बों को' -
          "क्षत्रिय एकता का बिगुल फूँक 
           सब धुंधला धुंधला छंटने दो।
           हो अखंड भारत के राजपुत्र 
           खण्ड खण्ड में न सबको बंटने दो ।।"
    21. रोहिलखण्ड से विस्थापित इन रोहिला परिवारों में राजपूत परम्परा के कुछ प्रमुख गोत्र इस प्रकार पाए
           जाते हैं :-
रोहिला, रोहित, रोहिल, रावल, द्रोहिया, रल्हन, रूहिलान, रौतेला , रावत 
यौधेय, योतिक, जोहिया, झोझे, पेशावरी 
पुण्डीर, (पुलस्त्य)पांडला(धौम्य), पंढेर, पुन्ड़ेहार, पुंढीर, पुंडाया  
चौहान, जैवर, जौडा, चाहल, चावड़ा, खींची, गोगद, गदाइया, सनावर, क्लानियां, चिंगारा, चाहड बालसमंद, चोहेल, चेहलान, बालदा, बछ्स (वत्स), बछेर, चयद, झझोड, चौपट, खुम्ब, जांघरा, जंगारा, झांझड चुहल चूहेल 
निकुम्भ, कठेहरिया, कठौरा, कठैत, कलुठान, कठपाल, कठेडिया, कठड, काठी, कठ, पालवार 
RATHOD महेचा, महेचराना धांधल, रतनौता, बंसूठ जोली, जोलिए, बांकटे, बाटूदा, थाथी, कपोलिया, खोखर, अखनौरिया ,लोहमढ़े, मसानिया 
BUNDELA, उमट, ऊमटवाल 
, भारती, गनान 
नाभावंशी,बटेरिया, बटवाल, बरमटिया 
परमार, जावडा, लखमरा, मूसला, मौसिल, भौंसले, बसूक, जंदडा, पछाड़, पंवारखा, ढेड, मौन 
तोमर, तंवर, मुदगल, देहलीवाल, किशनलाल, सानयाल, सैन, सनाढय कालरा
GEHLOT, कूपट, पछाड़, थापा, ग्रेवाल, कंकोटक, गोद्देय, पापडा, नथैड़ा, नैपाली, लाठिवाल, पानिशप, पिसोण्ड, चिरडवाल, नवल, चरखवाल, साम्भा, पातलेय, पातलीय, छन्द (चंड), क्षुद्रक,(छिन्ड, इन्छड़, नौछड़क), रज्जडवाल, बोहरा, जसावत, गौर, मलक, मलिक , मूसला 
कछवाहा, कुशवाहा, कोकच्छ, ततवाल, बलद, कोकचे काक मछेर 
सिसौदिया, भरोलिया, बरनवाल, बरनपाल, बहारा 
 खुमाहड, अवन्ट, ऊँटवाल
सिकरवार, रहकवाल, रायकवार, ममड, गोदे 
सोलंकी, गिलानिया, भुन, बुन, बघेला, ऊन, (उनयारिया)
बडगूजर, सिकरवार, ममड़ा, पुडिया 
कश्यप, काशब, रावल, रहकवाल 
यदु, मेव, छिकारा, तैतवाल, भैनिवाल, उन्हड़, भाटटी बनाफरे, जादो, बागड़ी, सिन्धु, कालड़ा, सारन, छुरियापेड, लखमेरिया, चराड, जाखड़, सेरावत, देसवाल, पूडिया 
प्रमुख रोहिला क्षत्रिय शासक
अंगार सैन - गांधार (वैदिक काल)
अश्वकरण - ईसा पूर्व 326 (मश्कावती दुर्ग)
अजयराव - स्यालकोट (सौकंल दुर्ग) ईसा पूर्व 326
प्रचेता - मलेच्छ संहारक 
शाशिगुप्त - साइरस के समकालीन 
सुभाग सैन - मौर्य साम्राज्य के समकालीन 
राजाराम शाह - 929 वि. रामपुर रोहिलखण्ड 
बीजराज - रोहिलखण्ड
करण चन्द्र - रोहिलखण्ड
विग्रह राज - रोहिलखण्ड - गंगापार कर स्रुघ्न जनपद (सुगनापुर) यमुना तक विस्तार दसवीं शताब्दी में सरसावा में किले का निर्माण पश्चिमी सीमा पर, यमुना द्वारा ध्वस्त टीले के रूप में नकुड़ रोड पर देखा जा सकता है।
सावन्त सिंह - रोहिलखण्ड
जगमाल - रोहिलखण्ड
धिंगतराव - रोहिलखण्ड
गोंकुल सिंह - रोहिलखण्ड
महासहाय - रोहिलखण्ड
त्रिलोक चन्द - रोहिलखण्ड
रणवीर सिंह - रोहिलखण्ड
सुन्दर पाल - रोहिलखण्ड
नौरंग देव - रोहिलखण्ड
सूरत सिंह - रोहिलखण्ड
हंसकरण रहकवाल - पृथ्वीराज के सेनापति 
मिथुन देव रायकवार - ईसम सिंह पुण्डीर के मित्र थाना भवन शासक 
सहकरण, विजयराव - उपरोक्त 
राजा हतरा - हिसार 
जगत राय - बरेली 
मुकंदराज - बरेली 1567 ई.
बुधपाल - बदायुं 
महीचंद राठौर - बदायुं
बांसदेव - बरेली 
बरलदेव - बरेली
राजसिंह - बरेली
परमादित्य - बरेली
न्यादरचन्द - बरेली
राजा सहारन - थानेश्वर 
प्रताप राव खींची (चौहान वंश) - गागरोन 
राणा लक्ष्य सिंह - सीकरी 
रोहिला मालदेव - गुजरात 
जबर सिंह - सोनीपत 
रामदयाल महेचराना - कलायत
गंगसहाय - महेचराना *कलायत* 1761 ई.
राणा प्रताप सिंह - कौराली (गंगोह) 1095 ई.
नानक चन्द - अल्मोड़ा 
राजा पूरणचन्द - बुंदेलखंड 
राजा हंस ध्वज - हिसार व राजा हरचंद 
राजा बसंतपाल - रोहिलखण्ड व्रतुसरदार, सामंत वृतपाल 1193 ई.
महान सिंह बडगूजर - बागपत 1184 ई.
राजा यशकरण - अंधली 
गुणाचन्द - जयकरण - चरखी - दादरी 
राजा मोहनपाल देव - करोली 
राजारूप सैन - रोपड़ 
राजा महपाल पंवार - जीन्द 
राजा परपदेड पुंडीर - लाहौर 
राजा लखीराव - स्यालकोट 
राजा जाजा जी तोमर - दिल्ली 
खड़ग सिंह - रोहिलखण्ड लौदी के समकालीन 
राजा हरि सिंह - खिज्रखां के दमन का शिकार हुआ - कुमायुं की पहाड़ियों में अज्ञातवास की शरण ली 
राजा इन्द्रगिरी (रोहिलखण्ड) (इन्द्रसेन) - सहारनपुर में प्राचीन रोहिला किला बनवाया । रोहिला क्षत्रिय वंश भास्कर लेखक आर. आर. राजपूत मुरसेन अलीगढ से प्रस्तुत 
राजा बुद्ध देव रोहिला - 1787 ई., सिंधिया व जयपुर के कछवाहो के खेड़ा व तुंगा के मैदान में हुए युद्ध का प्रमुख पात्र । (राय कुँवर देवेन्द्र सिंह जी राजभाट, तुंगा (राजस्थान)

रोहिल्ला उपाधि - शूरवीर, अदम्य - साहसी विशेष युद्ध कला में प्रवीण, उच्च कुलीन सेनानायको, और सामन्तों को उनके गुणों के अनुरूप क्षत्रिय वीरों को तदर्थ उपाधि से विभूषित किया जाता था - जैसे - रावत - महारावत, राणा, महाराणा, ठाकुर, नेगी, रावल, रहकवाल, रोहिल्ला, समरलछन्द, लखमीर,(एक लाख का नायक) आदि। इसी आधार पर उनके वंशज भी आजतक राजपूतों के सभी गोत्रों में पाए जाते हैं।
"वभूव रोहिल्लद्व्यड्कों वेद शास्त्रार्थ पारग: । द्विज: श्री हरि चन्द्राख्य प्रजापति समो गुरू : ।।2।।
( बाउक का जोधपुर लेख )
- सन 837 ई. चैत्र सुदि पंचमी - हिंदी अर्थ - "वेद शास्त्र में पारंगत रोहिल्लाद्धि उपाधिधारी एक हरिश्चन्द्र नाम का ब्राह्मण था" जो प्रजापति के समान था हुआ ।।6।।
( गुज्जर गौरव मासिक पत्रिका - अंक 10, वर्ष ।।माह जौलाई 1991 पृष्ठ - 13) (राजपुताने का इतिहास पृष्ठ - 147) (इतिहास रोहिला - राजपूत पृष्ठ - 23) (प्राचीन भारत का इतिहास, राजपूत वंश, - कैलाश - प्रकाशन लखनऊ सन 1970 ई. पृष्ठ - 104 -105 - )
रोहिल्लद्व्यड्क रोहिल्लद्धि - अंक वाला या उपाधि वाला ।
सर्वप्रथम प्रतिहार शासक द्विज हरिश्चन्द्र को रोहिल्लद्धि उपाधि प्राप्त हुई । बाउक,प्रतिहार शासक विप्र हरिश्चन्द्र के पुत्र कवक और श्रीमति पदमनी का पुत्र था वह बड़ा पराक्रमी और नरसिंह वीर था।
प्रतिहार एक पद है, किसी विशेष वर्ण का सूचक नही है। विप्र हरिश्चन्द्र प्रतिहार अपने बाहुबल से मांडौर दुर्ग की रक्षा करने वाला था, अदम्य साहस व अन्य किसी विशेष रोहिला शासक के प्रभावनुरूप ही रोहिल्लद्व्यड्क उपाधि को किसी आधार के बिना कोई भी व्यक्ति अपने नाम के साथ सम्बन्ध करने का वैधानिक रूप में अधिकारी नही हो सकता।
उपरोक्त से स्पष्ट है कि बहुत प्राचीन काल से ही गुणकर्म के आधार पर क्षत्रिय उपाधि "रोहिल्ला" प्रयुक्त । प्रदत्त करने की वैधानिक व्यवस्था थी। जिसे हिन्दुआसूर्य - महाराजा पृथ्वीराज चौहान ने भी यथावत रखा। पृथ्वीराज चौहान की सेना में एक सौ रोहिल्ला - राजपूत सेना नायक थे । "पृथ्वीराज रासौ" -
चहूँप्रान, राठवर, जाति पुण्डीर गुहिल्ला । बडगूजर पामार, कुरभ, जागरा, रोहिल्ला ।। इस कवित्त से स्पष्ट है । कि - प्राचीन - काल में रोहिला- क्षत्रियों का स्थान बहुत ऊँचा था। रोहिला रोहिल्ल आदि शब्द राजपुत्रों अथवा क्षत्रियों के ही द्योतक थे । इस कवित्त के प्रमाणिकता "आइने अकबरी", 'सुरजन चरिता' भी सिद्ध करते हैं । युद्ध में कमानी की तरह (रोह चढ़ाई करके) शत्रु सेना को छिन्न - भिन्न करने वाले को रहकवाल, रावल, रोहिल्ला, महाभट्ट कहा गया है।
महाराज पृथ्वीराज चौहान की सेना में पांच गोत्रों के रावल थे -
रावल - रोहिला 
रावल - सिन्धु 
रावल - घिलौत (गहलौत)
रावल - काशव या कश्यप 
रावल - बलदया बल्द
मुग़ल बादशाह अकबर ने भी बहादुरी की रोहिल्ला उपाधि को यथावत बनाए रखा जब अकबर की सेना दूसरे राज्यों को जीत कर आती थी तो अकबर अपनी सेना के सरदारों को,बहादुर जवानों बहादुरी के पदक (ख़िताब,उपाधि) देता था। एक बार जब महाराणा मान सिंह काबुल जीतकर वापिस आए तो अकबर ने उसके बाइस राजपूत सरदारों को यह ख़िताब दी (उपाधि से सम्मानित किया)
बाई तेरा हर निरकाला रावत को - रावल जी 
चौमकिंग सरनाथा को - रावल 
झंड्कारा कांड्कड को - रोहिल्ला 
रावत मन्चारा - कांड्कड काम करन, निरकादास रावत को रावराज और रूहेलाल को रोहिला 
स्वतंत्र रोहिलखंड राज्य संस्थापक महाराजा RANVEER SINGH ROHILA 
रक्षा बंधन के दिन रोहिलखंड की वीर भूमि गंगा सी पवित्र राजपूतों के रक्त से रंजित और आक्रांताओं के काल की धरती रामपुर के किले में दिया था कठेहर रोहिलखंड नरेश,महाराजा रणवीर सिंह रोहिला ने अदम्य साहस और अद्भुत शौर्य का परिचय!,दिल्ली सुलतान नासीरुद्दीन बहराम उर्फ चंगेज की चालीस हजार की सेना को दी थी शिकस्त!**तथा घुटने टेकने पर मजबूर किया था दिल्ली सल्तनत का दुर्दांत खूंखवार सेनापति नसीरुद्दीन महमूद को और प्राणदान मांगने पर क्षात्र धर्म रक्षार्थ छोड़ा था।**चंगेज ने अवसर पाकर रक्षा बंधन के दिन दरबारी गोकुल चंद पांडे हरिद्वार को लालच देकर किले के द्वार खुलवा लिए *धोखे के शिकार लगभग तीन हजार राजपूत निहत्थे ही लड़े,!आक्रमण कारियो के अस्त्र शस्त्र छीन छीन किया था शौर्य संग्राम दिल्ली सल्तनत की लगभग आधी गुलाम वंशी सेना को काट डाला था रोहिला राजपूतो ने!!अंत में चंगेज के खूंखवार दरिंदो ने अकेले में घेर लिया था RANVEER SINGH ROHILA को, जिन्हे आमने सामने की लड़ाई में दिल्ली सुलतान कभी नही हरा पाए थे किंतु वे उनके साहस से विस्मित हुए बिना नहीं रह सके ।रणवीर रणभूमि के वीर सपूत रक्त की अंतिम बूंद रहने तक संग्राम रत रहे और कतरा कतरा हो कर खेत रहे(सन 1254ईस्वी),उनका बलिदान रोहिलखंड के राजपूताना इतिहास में स्वर्णाक्षर दे गया!,समस्त राजपूत समाज रक्षा बंधन के दिन हुए इस बलिदान को एक शोर्य दिवस के रूप में मनाता आया है,यूट्यूब पर और अन्य सोसल मीडिया पर स्वतंत्र रोहिलखंड संस्थापक नरेश महाराजा RANVEER SINGH ROHILA की वीर गाथा दी हुई है,सभी क्षत्रिय जन अपने बच्चो को दिखाए ताकि सल्तनत काल में १२५४ ईसवी के इस इतिहास के धुंधले पृष्ठ भी उकेरे जा सके*, रक्षा बंधन को उनका बलिदान दिवस मनाया जाता है,समस्त क्षत्रिय समाज इस SHOURYA दिवस पर उन्हे कोटि कोटि नमन करते हुए उनके। बताए मार्ग पर स्वाधीनता और स्वाभिमान से स्वधर्म रक्षार्थ जीने की शपथ लेता है,यह सच्चाई हमसे स्कूली शिक्षा में छुपाई गई किंतु इतिहास के दर्पण में सब सुरक्षित रहता है जिसे उजागर कर भावी पीढ़ी को बताना ही हरेक क्षत्रिय का नैतिक दायित्व है अतः आप सभी क्षत्रियों से निवेदन है कि भावी पीढ़ी को सच्चाई बताए और स्वाभिमान से जीना दिखाए।।
सूर्य वंशी निकुंभ क्षत्रिय महाराजा RANVEER SINGH ROHILA का जन्म हिंदूवा सूर्य महाराज पृथ्वी राज चौहान के पतन के बाद दिल्ली सल्तनत के बढ़ते कदमों के बीच ऐसे समय में सन१२०४ईस्वी में कठेहर रोहिलखंड की राजधानी रामपुर के किले में राजा त्रिलोक सिंह के यहां हुआ था, जब सभी राजपूत शक्तियां क्षीण और तितर बितर हो चुकी थी,इस्लामिक आक्रांता मध्य भारत की ओर दमन करते हुए आगे बढ़ते रहते थे।।,रणवीर सिंह रोहिला का विवाह विजय पुर सीकरी की राजकुमारी तारा देवी से हुआ तथा पच्चीस वर्ष की आयु में रामपुर की गद्दी पर विराजमान होकर इस्लामीकरण पर रोक लगाई ।। तीस सालों तक दिल्ली सुलतानो को धूल चटाई किंतु रक्षा बंधन के दिन शिव मंदिर गए राजपूतों को रक्षा सूत्र बंधवाते हुए नसीरुद्दीन बहराम ने गोकुल चंद पांडे के द्वारा किले के द्वार खोलने पर घेर लिया और फिर होगया ADBHUT SHOURYA SANGRAM .. विस्तार भय से संक्षिप्त गाथा वर्णित है जिसे चाटुकार मुगल कालीन और ब्रिटिश इतिहास कारो ने छिपाया*
रोहिलखंड एक राजपूताना राज्य
कन्नौज पतन के बाद रोहिलखण्ड राज्य की स्थापना कठेहरिया राजा राम शाह उर्फ रामसिंह ने की थी अहिक्षेत्र काम्पिल्य के एक गॉंव रामनगर को रामपुर नगर बसाया ओर यह क्षत्रिय राजा राम के नाम पर रखा गया था यहाँ रोहिले राजपूतो ने 11 पीढ़ी लगातार शासन किया राजा रणवीर सिंह रोहिला ने नाइरुद्दीन महमूद,, ओर हरिसिंह रोहिला ने खिज्रखान को धूल चटाई नोरंगदेव ने पिंगू(तैमूर लंग)को हराया ।।।san ईस्वी के बाद भी कभी भी पूर्णतया रोहिलखंड को दिल्ली दरबार नही जीत पाया अकबर ओर बाद में औरंगजेब ने चाल चली और अफगानों की घुसपैठ करनी आबादी बढ़ानी शुरू की सन 1707ईस्वी में दाऊद खान बरेच अफगान के जाट दत्तक पुत्र जिसका नाम अलीमुहम्मद रखा था ने धोखे से बरेली में रोहिला राजा हरननंद का कत्ल किया और सम्पूर्ण रोहिलखण्ड पर अधिकार कर लिया इन अफगानों ने भी रोहिलखण्ड के नवाब बन जाने के कारणों से स्वयम को रुहेला सरदार कहा वास्तव में ये रोहिला नही थे जैसे कि रोह देश के अफगान लिखा यह गलत है ।।जिस काल में अफगान आए तब अफगानिस्तान को रोह देश नही कहा जाता था ।।
 यह झूठा मुस्लिम तुष्टि करण का इतिहास है ।।16वी सदी में जगत सिंह कठेहरिया रोहिल्ला राजपूत के पुत्रों बाँसदेव व बर्लदेव के नाम पर बरेली नगर की नीव रखी गयी अफगानों ने कोई नगर नही बसाया उन्होंने अपने काल मे ही रामपुर का नाम राम के नाम पर नही रखा। यह भ्रामक झूठ है कि फैज उल्ला खान ने रामपुर को बसाया था अठारहवीं सदी में जबकि रामपुर रियासत की स्थापना दसवीं सदी में राजा रामसिंह रोहिला(काठी कोम के राजपूत) ने की थी

*रोहिला क्षत्रिय योद्धाओं का शौर्य साहस, युद्ध कौशल, और अपने कुल व राष्ट्र की रक्षा के प्रति बलिदान की भावना में निहित होता था।* *हमारे क्षत्रिय योद्धा युद्ध भूमि में मृत्यु से* *निर्भय होकर लड़ते थे और उनका* *एकमात्र कर्तव्य राज्य व समाज की रक्षा करना था। शौर्य उनके रक्त में समाया हुआ था, जो युद्ध की ज्वाला में अपने बलिदान के रूप में प्रदर्शित होता था।*
*#क्षत्रिय*
*जय राजपूताना अखंड राजपूताना*
*जय राजपूताना,जय राजपूताना रोहिलखंड ,बुंदेलखंड*
संदर्भ 
इतिहास रोहिला राजपूत
 डॉक्टर के सी सैन
रोहिला क्षत्रिय वंश भास्कर
आर आर राजपूत
कठेहरिया रोहिला राजपूत
रोहिला क्षत्रियों का क्रमबद्ध इतिहास
दर्शन लाल रोहिला
मध्य कालीन भारत का इतिहास
ठाकुर अजीत सिंह परिहार
बालाघाट मध्य प्रदेश
 भारत भूमि और उसके वासी पृष्ठ-230 पंडित जयचंद्र विद्यालंकार
2-दून ज्योति-साप्ताहिक देहरादून 18 फरवरी 1974 
पुरुषोत्तम नागेश ओक व डॉक्टर ओमवीर शर्मा हेड ऑफ हिस्ट्री विभाग
3-क्षत्रिय वर्तमान पृष्ठ 97 व 263 ठाकुर अजित सिंह परिहार बालाघाट
4- प्राचीन भारत पृष्ठ -118,159,162 बीएम रस्तोगी इतिहास कार
5 राजतरँगनी पृष्ठ 31-39 कल्हण कृत अनुवादक नीलम अग्रवाल
6-रोहिला क्षत्रिय वन्स भास्कर ,आर आर राजपूत मूरसेन अलीगढ़
7- इतिहास रोहिला राजपूत 
डॉक्टर के सी सेन
8 - भारत का इतिहास पृष्ठ 138 डॉक्टर दया प्रकाश
9-भारतीय इतिहास मीमांसा पृष्ठ 44 जय