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Wednesday, 11 March 2026

RAJPUTANA KKATHHEHAR KE AJEY YODDHHA

*राजपुताना कठेहर रोहिलखंड*
के एक महान पराक्रमी योद्धा 
सूर्य वंशी क्षत्रिय सम्राट
*एक अजेय योद्धा*
*महाराजा रणवीर सिहं कठेहरिया रोहिला*

      *संक्षिप्त परिचय*
************************* *जन्म दिवस* 25 अक्टूबर, 1204 तदानुसार तत्कालीन कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की प्रथमा तिथि संवत 1261 विक्रमी
#पिता* महाराज त्रिलोक सिंह जी काठी क्षत्रिय 
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*वंश* _सूर्यवंश की निकुंभ शाखा 
वेद _यजुर वेद,उपवेद__धनुर्वेद,प्रवर_एक/तीन , शिखा_दाहिनी, पाद_दाहिनी,सूत्र _गुभेल,देवता__विष्णु (रघुनाथ जी), कुलदेवी _चावड़ा/कालिका माता,ध्वजा__गरुड़,नदी__सरयू,झंडा पंच रंगा,नगाड़ा_रण गंजन , ईष्ट_रघुनाथ/श्री राम चंद्र जी,उद्घोष_हर हर महादेव गोत्र_वशिष्ठ गुणधर्म _काठी (कठोर) गद्दी _ अयोध्या,ठिकाना__रावी व व्यास नदियों के बीच के काठे का क्षेत्र 
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#राज्य विस्तार*
◆गंगा - यमुना दोआब क्षेत्र #दक्षिण पश्चिम में गंगा तक #पश्चिम में उत्तराखंड 
#उत्तर में नेपाल तक
*क्षेत्रफल* 25000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र या 10000 वर्ग मील क्षेत्र तक 

# सूबे* 
पांचाल, 
मध्यदेश,
कठेहर रोहिलखण्ड
*राजधानी* -रामपुर (निकट अहिक्षेत्र, रामनगर) कांपिल्य
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(तेहरवीं शताब्दी का पूर्वार्द्ध)

🔆सूर्यवंश🔆
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#आइए इतिहास में चलें*



"*काल भी अगर छोड दे लेकिन काठी नहीं छोडता”* 
*(Time ( Death ) Forgets But Not Kathi )*

क्या हैं - “काठी और काठीयावाड, कठेहर खंड ” ?

काठी दरबार भव्यअतित कि श्रृंखला मे एक प्रसिद्ध नाम , यह एक क्षत्रिय संघ जो वीरता का वैभव , शौर्य का प्रतीक और अपने कठोर स्वाभीमानी गुणो से प्रसिद्ध है। 

*इसलिए इनके बारे प्रसिद्ध कहावत हैं - "काल भी अगर छोड दे लेकिन काठी नहि छोडता”*
सिकंदर के आक्रमण के पश्चात भारत की पश्चिमी उत्तरीय सीमा प्रांत के प्रहरी इन क्षत्रिय वीरों ने मैदानों का रुख किया,एक टुकड़ी सौराष्ट्र आई दूसरी उत्तरी पांचाल में तथा एक टुकड़ी काठी क्षत्रियों की नेपाल गई।
उत्तरी पांचाल को कठेहर खंड /रोहिलखंड के नाम से विकसित कर स्थिर रूप से राज्य स्थापित किया।
नेपाल में काठी क्षत्रियों ने कठेत कटायतkathayat साम्राज्य स्थापित किया।
 एक टुकड़ी ने थोडी कुछ शताब्दियो से उन्होने स्थिर रुप से अपना निवासस्थान सौराष्ट्र को बना लिया और इतना हि नहीं युगों से पुराण प्रसिद्ध सौराष्ट्र नाम इन्हि के कारण पलटकर ' काठीयावाड ' नाम से मशहुर हुआ एसी इन्होने इस विस्तार कि संस्कृति मे अमिट छाप छोडी हैं। 

कठ गणराज्य वाहिक प्रदेश ( हाल के पंजाब ) मे प्रसिद्ध था।इनकी राजधानी ( संगल ) सांकल थी ,(आज का स्याल कोट)एक उल्लेख मिलता है कि इन पंजाब वासी कठो के नाम से आज के अफगानिस्तान के गजनी प्रांत मे ' काटवाज ' क्षेत्र हे । कठ लोगों के शारीरिक सौदर्य और अलौकिक शौर्य की ग्रीक इतिहास लेखकों ने भूरि - भूरि प्रशंसा की है , ग्रीक लेखकों के अनुसार कठों के यहाँ यह प्रथा प्रचलित थी कि वे केवल स्वस्थ एवं बलिष्ठ संतान को ही जीवित रहने देते थे । 

सीक्रीटोस लिखता है कि वे सुंदरतम एवं बलिष्ठतम व्यक्ति को ही अपना शासक चुनते थे , ग्रिक इतिहासकारो ने कठो को कठोइ या काठीयन जैसे नामो से निर्देषीत किया हे , पाणिनी के ' अष्टाध्यायी ' मे कठो का उल्लेख हे , पंतजली के महाभाष्य के मत से कठ वैशपायन के शिष्य थे । इनकि प्रवर्तित वेदसंहिता कि शाखा ' काठक ' नाम से प्रसिद्ध थी । 

काठक कापिष्ठल संहिता जैतारायण , प्रत्धन ( दिवोदासी ) भीमसेनी इन राजाओ का नाम मीलते हे जीन्होने राजसूय यज्ञ किया था । इन्होने कई बार पोरस को हराया था।
सिकंदर को घुटने टेकने पर मजबूर किया,कठगणराज्य की राजकुमारी कार्विका उर्फ कर्णिका ने सिकंदर को अपनी नारी सेना के द्वारा परास्त किया घायल किया। वह तो आंतरिक राजाओं की सहायता से बच निकला था।
Painting : 1880's. ' A kathiavad Sentry’
By Artist - Horace van Ruith . 

#kathiyawad #history #gujrat #mumbai #indianhistory #rajput #kathi #indianhistory #rajputhistory #sentry #sword #shield
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* इस्क्वाकू वंश में सूर्य वंशी महाराज निकुम्भ के वंशधर ई●पू● 326 वर्ष कठगण राज्य (रावी नदी के काठे में) सिकन्दर का आक्रमण काल-राजधानी सांकल दुर्ग (वर्तमान स्यालकोट) 53 वीं पीढ़ी में राजा अजयराव के वंशधर निकुम्भ वंशी राजस्थान अलवर, मंगल गढ़ जैसलमेर होते हुए गुजरात सौराष्ट्र कठियावाड , फिर पांचाल, मध्यदेश गये। 
* एक टुकड़ी नेपाल गई
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*अलवर में दुर्ग निकुम्भ वंशी (कठ क्षत्रिय रावी नदी के काठे से विस्थापित कठ-ंगण जिन्होंने सिकंदर को घुटने टेकने पर मजबूर किया था) क्षत्रियों ने बनवाया (राज्य मंगल गढ़), सौराष्ट्र में काठियावाड़ की स्थापना की ।
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 #मध्यदेश के उत्तरी पांचाल में कठेहर रोहिलखंड राज्य की स्थापन। यहां अहिक्षेत्र के पास रामनगर गांव मे राजधानी स्थापित की, ऊंचा गांव मझगांवा को सैनिक छावनी बनाया। यहां पर शासक हंसदेव, रहे, इनके पुत्र हंसबेध राजा बने-ं816 ई. तक- इसी वंश में राजा रामशाही (राम सिंह जी ) ने रामपुर गांव को एक नगर का रूप दिया और *909 ई में कठेहर- रोहिलखण्ड प्रान्त की राजधानी रामपुर में स्थापित की। 
#यहां पर कठ क्षत्रियों ने 11 पीढ़ी शासन किया इसी वंश75 में महापराक्रमी, विधर्मी संहारक राजा रणवीर
सिंह कठेहरियारोहिला का जन्म कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की प्रथमा तिथि तदानुसार 25 अक्टूबर 1204ईसवी को राजपूत काल के ऐसे समय में हुआ जब महराजा पृथ्वी राज चौहान के शासन अंत के कारण समस्त राजपूत शक्ति क्षीण हो चुकी थी ओर मुस्लिम आक्रांता इस्लामिक सल्तनत कायम करने में लगे थे बची हुई राजपूत शक्तियों का बहुत कठोरता ओर बर्बरता से दमन कर रहे थे हिंदुआ सूर्य चौहान का शासन अस्त हो चुका था ।
वंश वृक्ष इस प्रकार पाया गया
रामपुर संस्थापक राजा राम सिंह उर्फ रामशाह 909 ई. में 966 विक्रमी , 3 पौत्र- बीजयराज 4. करणचन्द 5. विग्रह राज 6. सावन्त सिंह (रोहिलखण्ड कठेहर का विस्तार गंगापार कर यमुना तक किया,) सिरसापाल के राज्य सरसावा में एक किले का निर्माण कराया। (दशवीं शताब्दी का उत्तरार्द्ध) नकुड रोड पर किले को आज यमुना द्वारा ध्वस्त एक टीले के रूप में देखा जा सकता है। 7. जगमाल 8 धिंगतराम 9 गोकुल सिंह 10 महासहाय 11 त्रिलोकसिंह 12रणवीर सिंह( 1204 ),नौरंग देव (पिंगू को परास्त किया) (राजपूत गजट लाहौर 04.06.1940 द्वारा डा0 
सन्त सिंह चैहान)
इक्कीस वर्ष की आयु में रामपुर के राजा त्रिलोक चंद उर्फ त्रिलोक सिंह के पुत्र रणवीर सिंह रोहिला का विवाह विजयपुर सीकरी की राजकुमारी तारा देवी से हुआ। रणवीर सिंह रोहिला का राजतिलक भी इसी वर्ष इक्कीस वर्ष की आयु में हुआ यानी 1225,ईसवी में हुआ ,इनकी लंबाई लगभग सात फीट थी, कंधो पर सीना कवच लगभग साठ शेर ,सिर पर कवच लोहे का इक्कीस सेर खड़ग का वजन 25, सेर ओर स्वयं उनका वजन 125 सेर था। सन् 1236से1240 तक रजया तुदीन सुल्तान सन 1242 मइजुद्दीन बहराम शाह सन,1246 अलाउद्दीन महमूद शाह आदि दिल्ली सुल्तान सेनाओं से राजा रणवीर सिंह रोहिला , कठेहरिया ने कठेहर रोहिलखंड का लोहा मनवाया ओर किसी भी दिल्ली सुल्तान मामुल्क को रोहिलखंड में प्रवेश नहीं होने दिया । इनके साथ विभिन्न राजवंशों के चौरासी अजेय योद्धा थे ,राठौड़, गोड, चौहान,वारेचा परमार गहलोत वच्छिल आदि थे वे सब लोहे के कवच धारी थे।
दिल्ली सुल्तान के 
गुलाम , सेनापति नासिरूद्दीन चंगेज उर्फ नासिरूद्दीन महमूद ने , सन् 1253 ई0,में दोआब, कठेहर, शिवालिक पंजाब, बिजनौर आदि क्षेत्रों पर विजय पाने के लिए दमनकारी अभियान किया। इतने अत्याचार , मारकाट तबाही मचाई कि विद्रोह करने वाले स्थानीय शासक, बच्चे व स्त्रियां भी सुरक्षित नहीं रही। ऐसी विषम परिस्थिति में रोहिल खण्ड के रोहिला शासकों ने दिल्ली सल्तनत के सूबेदार‘ ताजुल मुल्क इज्जूददीन डोमिशी‘ को मार डाला। दिल्ली सल्तनत के लिये यह घटना भीषण चुनौती समझी गई। इस समय रामपुर के राजा रणवीर सिंह थे । उन्होनें आस पास की समस्त राजपूत शक्तियों को एकता के सूत्र में बांधा ओर दिल्ली सल्तनत के विरूद्ध अपनी क्रान्तिकारी प्रवृत्ति को सजीव बनाये रखा था जिससे दिल्ली सुल्तान कठेहर पर आक्रमण करते हुए भय खाते थे ,नासिरूद्दीन महमूद बहराम गुलाम वंश ( उर्फ चंगेज) इस घटना से उद्वेलित हो उठा और सहारनपुर ‘ उशीनर प्रदेश‘ के मण्डावार व मायापुर से 1253 ई0 में गंगापार कर गया और विद्रोह को दबाता हुआ, रोहिलखण्ड को रौदता हुआ बदांयू पहुंचा। वहां उसे ज्ञात हुआ कि रामपुर में राजा रणवीर सिंह रोहिला के साथ लोहे के कवचधारी 84 रोहिले है जिनसे विजय पाना टेढ़ी खीर है। सूचना दिल्ली भेजी गई। दिल्ली दरबार में सन्नाटा हो गया कि एक छोटे राज्य कठेहर रोहिलखंड के रोहिलों से कैसे छीना जाए। नासिरूद्दीन चंगेज (महमूद) ने तलवार व बीड़ा उठाकर राजा रणवीर सिंह के साथ युद्ध करने की घोषणा की। रामपुर व पीलीभीत के बीच मैदान में नसीरुद्दीन व कठेहर नरेश सूर्य वंशी क्षत्रिय रणवीर सिंह की सेना के बीच भयंकर युद्ध हुआ, 6000 रोहिला राजपूत व 
 84 लोहे के कवचधारी रन्धेलवंशी सेना नायकों की सेना के सामने नासिरूद्दीन की तीस हजारी सेना के पैर उखड़ गये।
      नासिरूद्दीन चंगेज को बन्दी बना लिया गया। बची हुई सेना के हाथी व घोडे तथा एक लाख रूपये महाराज रणवीर सिंह को देने की प्रार्थना पर आगे ऐसा अत्याचार न करने की शपथ लेकर नासिरूद्दीन महमूद ने प्राण दान मांग लिया। क्षात्र धर्म के अनुसार शरणागत को अभयदान देकर राजा रणवीर सिंह ने उसे छोड़ दिया। परन्तु धोखेबाज महमूद जो राजा रणवीर सिंह पर विजय पाने का बीड़ा उठाकर दिल्ली से आया था, षडयंत्रों में लग गया। राजा रणवीर सिंह का एक दरबारी पं. गोकुलराम पाण्डेय था। उसे रामपुर का राजा नियुक्त करने का लालच देकर महमूद ने विश्वास में ले लिया और रामपुर के किले का भेद लेता रहा। पं. गोकुल राम ने लालच के वशीभूत होकर विधर्मी को बता दिया कि रक्षांबधन के दिन सभी राजपूत निःशस्त्र होकर शिव मन्दिर में शस्त्र पूजा करेंगें।यह शिव मन्दिर किले के दक्षिण द्वार के समीप है , यह सुनकर महमूद का चेहरा खिल उठा और दिल्ली से भारी सेना को मंगाकर जमावड़ा प्रारम्भ कर दिया रक्षाबन्धन का दिन आ गया। किले में उपस्थित सभी सैनिक, सेनाायक अपने-ंअपने शस्त्रों को उतार कर पूजा स्थान पर शिव मन्दिर ले जा रहे थे। गोकुल राम पाण्डेय यह सब सूचना विधर्मी तक पहुंचाता रहा। श्वेत ध्वज सामने रखकर दक्षिण द्वार पर पठानों की गुलामवंशी सेना एकत्र हो गयी। पूजा में तल्लीन राज पुत्रों को पाकर गोकुलराम पाण्डेय ने द्वार खोल दिया।
      शिव उपासना में रत सभी उपस्थितों को घेरे में ले लिया गया। समस्त राजपूत भौचक्के रह गए ओर मन्दिर से तुलसी का पत्ता लिया ओर मुंह में दबा कर शाका बोल दिया,घमासान युद्ध छिड़ गया परन्तु ऐसी गद्दारी के कारण राजा रणवीर सिंह ने निशस्त्र लड़ते हुए अदम्य साहस ओर शोर्य का परिचय दिया ओर महमूद के सैनिकों से भिड़ गए अद्भुत दृश्य था रणवीर सिंह चारो ओर से विधर्मी सैनिकों से घिरे युद्ध कर रहे थे विधर्मी की खड़ग छीन ली ओर आक्रांताओं के शीश कट कट गिरने लगे , उस समय रामपुर के किले में केवल तीन हजार राजपूत ही उपस्थित थे ओर वे भी निहत्थे रह गए थे सभी राजपूत बड़ी वीरता से लडे किन्तु संख्या में कम होने के कारण बिखर गए, रणवीर सिंह कठहरिया रोहिला की पीठ पर विधर्मी सेना ने तलवार से वार करके काट डाला ओर अंतिम बूंद रक्त की रहने तक रणवीर धराशाई नहीं हुए यह देख कर नसीरुद्दीन चकित रह गया देखते ही देखते कठेहर नरेश वीरगति को प्राप्त हुए। नासिरूद्दीन ने पं. गोकुल राम से कहा कि जिसका नमक खाया अब तुम उसी के नहीं हुए तो तुम्हारा भी संहार अनिवार्य है। नमक हरामी को जीने का हक नहीं है। गोकुल का धड़ भी सिर से अलग पड़ा था। सभी स्त्री बच्चों को लेकर रणवीर सिंह का भाई सूरत सिंह उर्फ सुजान सिंह किले से पलायन कर गया । महारानी तारादेवी जो विजय पुर सीकरी के राजा की पुत्री थी राजा रणवीर सिंह के साथ सती हो गई। 
रामपुर में किले के खण्डरात, सती तारादेवी का मन्दिर तथा उनका राजमहल अभी तक एक ध्वस्त टीले के रूप में मौजूद है, जो क्षात्र धर्म का परिचायक व रामपुर में रोहिला क्षत्रियों की कठ-शाखा के शासन काल की याद ताजा करता है जिन्होंने अपना सर्वस्व बलिदान कर क्षात्र धर्म की रक्षा की। गुलाम वंश, सल्तनत काल में विधर्मी की पराधीनता कभी स्वीकार नहीं की। अन्तिम सांस तक दिल्ली सल्तनत से युद्ध किया और कितनी ही बार धूल चटाई तथा रोहिलखण्ड को स्वतंत्र राज्य बनाये रखा। निरन्तर संघर्ष करते रहे राजा रणवीर सिंह कठहरिया का बलिदान व्यर्थ नहीं , सदैव तुगलक, मंगोल , मुगलों आदि से विद्रोह किया और स्वतंत्र रहने की भावना को सजीव रखा। राणा रणवीर सिंह के वंशधर आज भी रोहिला-ंक्षत्रियों में पाए जाते हे,जय राजपुताना कठेहर रोहिलखंड
उनकी पावन स्मृति को जीवित रखने व रोहिलखंड कठेहर राजपूताना की वीर गाथा को सजीव बनाए रखने के लिए भारत का समस्त रोहिला क्षत्रिय राजपूत समाज रक्षा बन्धन को शोर्य दिवस तथा पच्चीस अक्टूबर को प्रतिवर्ष स्वाभिमान दिवस के रूप में मनाता हे ओर शस्त्र पूजा करता है । उत्तर भारत के महानगर बड़ौत में राजा रणवीर सिंह रोहिला मार्ग व ऐतिहासिक नगर सहारनपुर में आज महाराजा रण वीर सिंह रोहिला चौक स्थित है। (संदर्भ__इतिहास रोहिला राजपूत द्वारा डॉक्टर के सी सेन,
ठाकुर अजीत सिंह परिहार बालाघाट मध्य प्रदेश, मध्यकालीन भारत बीएम रस्तोगी ,रोहिला क्षत्रियों का क्रमबद्ध इतिहास द्वारा श्री दर्शन लाल रोहिला, रोहिला क्षत्रिय वंश भास्कर द्वारा आर आर राजपूत, रोहिला क्षत्रिय जाति निर्णय द्वारा राय भीम राज राजभाट बड़वा जी का बाड़ा तूंगा राजस्थान, काठी कठेरिया क्षत्रिय व रोहिला राजपूत द्वारा महेश सिंह कठाय त नेपाल , मध्य कालीन भारत द्वारा ठाकुर अजित सिंह परिहार बाला घाट मध्य प्रदेश  
संकलन व लेखन 
समय सिंह पुंडीर
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क्षत्रिय/राजपूत वाटिका
अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा
राष्ट्रीय प्रवक्ता 
*क्षत्रिय अस्तित्व न्याय मोर्चा भारत*
नोट
*सनातन रक्षक,विधर्मी संहारक और लगभग तीस वर्ष तक आक्रांताओं द्वारा किए जा रहे इस्लामी करण को रोकने वाले राजपूत सम्राट रोहिलखंड नरेश महाराजा रणवीर सिंह रोहिला काठी क्षत्रिय की जयंती सभी क्षत्रिय भाई स्वाधीनता और स्वाभिमान दिवस के रूप में मनाते हैं*

Sunday, 8 March 2026

ROHILA RAJPUT GOTRA OF RATHOD VANSH (*रोहिला राजपूतों में राठौड़ वंश की १४ शाखाएं)*

राठौड़ वन्स की 14 शाखाये रोहिले राजपूतो में है
1 धांधल
2महेचा/महेचराना

3 बन्दरिया
4 डंगरथ,डंगरोल
5 जोलिये जोलु जालान
6 बांकुटे
7रतानोट
8थाती
9कपोलिया
10खोखर
11अखनोरिया
12मसानिया
13बिसूथ
14 लोह मढ़े
लोहे के कवच धरि
थे84 सरदार जो कन्नौज पतन के बाद रोहिलखण्ड में रणवीर सिंह की सेना में आ गए थे उनको लखमीर भी कहते थे जो एक लाख का सेना नायक होता था
इसलिए यह गोत्र लखमरा भी कहलाता है
14वी शाखा
प्रवर है सौनिक
ऋषि है अंगिरा
वेद है यजुर्वेद
उपवेद धनुर
शाखा कौथुमी
सूत्र कात्यायन
शिखा है दाहिनी
कुलदेवी है पंखिनी
राजेश्वरी और नाग्निचा, नागणायीचा 
धर्म है वैष्णव
झंडा है पंचरंगा
नगाड़ा रणजीत
गद्दी है कन्नौज
पदवी
रणबांका


कर्नाटक से राजस्थान का सफ़र (साउथ की देवी)
क्या आप जानते हैं कि राठौड़ों की कुलदेवी असल में साउथ इंडिया से आई थीं?
"राठौड़ों की रक्षक साउथ से आई थीं!
राठौड़ों की कुलदेवी 'नागनेची माता' की मूर्ति असल में कर्नाटक (कोंकण) की थी, जहाँ उन्हें 'चक्रेश्वरी' कहा जाता था।
राठौड़ राजा राव धुहड़ उन्हें 13वीं सदी में वहाँ से लाए थे।
शर्त थी 'रास्ते में पीछे मुड़कर मत देखना'।
पचपदरा के पास नागाणा गाँव में राजा ने पीछे मुड़कर देखा और मूर्ति ज़मीन में गिर गई।
तब से इस जगह को 'नागाणा धाम' कहा जाने लगा।

नागणेची माता का इतिहास क्या है?

नागणेची माता का इतिहास बहुत ही रोचक है। वह राठौड़ राजपूतों की कुलदेवी हैं और उनकी उत्पत्ति दक्षिण भारत से हुई थी। कहा जाता है कि उन्हें मूल रूप से कर्नाटक में 'चक्रेश्वरी' के नाम से जाना जाता था।

एक कथा के अनुसार, 13वीं सदी में राठौड़ राजा राव धूहड़ ने उन्हें कर्नाटक से राजस्थान लाया था। इस यात्रा के दौरान, उन्हें एक शर्त का पालन करना था कि वह पीछे मुड़कर नहीं देखेंगे। लेकिन जब वह पचपदरा के पास नागाणा गाँव में पहुँचे, तो उन्होंने पीछे मुड़कर देख लिया, जिससे माता की मूर्ति वहीं जमीन में धंस गई। तब से यह स्थान 'नागाणा धाम' के नाम से जाना जाता है।

नागणेची माता की पूजा राठौड़ राजपूतों द्वारा बड़े आदर और श्रद्धा के साथ की जाती है, और उनकी कृपा और रक्षा की कामना की जाती है।

भाखरवाला गांव में मिले धांधल राठौड़ रोहिला राजपूतों के दुर्लभ शिलालेख







ध्वस्त होती कलात्मक छतरियों की सुध लेने वाला नहीं
इतिहास की कई नई जानकारियां
जोधपुर.
जोधपुर से 15 किलोमीटर दूर भाखरवाला गांव में धांधल राठौड़ों के दुर्लभ शिलालेख मिले हैं। लावारिस पड़े ऐतिहासिक शिलालेखों के आधार पर शोध किया जाए तो जोधपुर से जुड़े इतिहास की कई नई जानकारियां सामने आ सकती है।
 
राजस्थानी शोध संस्थान के अधिकारी व शोधकर्ता डॉ. विक्रमसिंह भाटी के अनुसार पूर्व में धांधल राठौड़ों के प्रमुख ठिकानों में से एक इस गांव को रोयला या रोहिला के नाम से जाना जाता था। यहां धांधल सूरतसिंह, धांधल महेशदास, धांधल केसरीसिंह की भव्य कलात्मक छतरियां और देवली भी है। सूरतसिंह की भव्य, कलात्मक छतरी ध्वस्त होने के कगार पर है। लेकिन पुरातत्व या पर्यटन विभाग की ओर से किसी ने सुध नहीं ली है।
 
सूरतसिंह के पुत्र महेशदास की 20 खम्भों की छतरी में लगे शिलालेख के अनुसार छतरी निर्माण में पांच हजार एक रुपए की लागत आई थी। धांधल केसरीसिंह की छतरी जोधपुर के तत्कालीन शासक मानसिंह के कालखण्ड से ही है। उनका नाम विश्वास पात्र सेनानायकों में अव्वल था। उस समय के एतिहासिक ग्रंथों में इनका नाम पांच प्रमुख मुसाहीबों के तौर पर दर्ज है। कविराजा बांकीदास ने कई डिंगल गीतों में इन्हें ‘पाल रौ पौतरौ’ अर्थात् ‘पाबूजी का पोता’ और धांधल वंश का सूर्य बताया है।
छतरियों की देवलियां संगमरमर से और गुम्बज ईंटों से बने हैं। कुछ छतरियां 10 खम्भों की हैं। डॉ. भाटी के अनुसार धांधल राठौड़ों का इतिहास गरिमामयी रहा। तत्कालीन जोधपुर राज्य की सेवा में रहते हुए ये प्रधान, मुसाहीब, किलेदार, कोतवाल, रसोड़े और सुतरखाने के दरोगा जैसे महत्वपूर्ण पदों पर रहे।
 
मारवाड़ के तत्कालीन शासक अभयसिंह के समय धांधल सूरतसिंह को रोहिला का पट्टा मिला था। इन्हें केलावा खुर्द, भादराजून परगने के काकरिया, लोरोली और विरामा गांव भी ईनाम में मिले थे। लावारिस पड़े ऐतिहासिक शिलालेखों के आधार पर शोध किया जाए तो जोधपुर से जुड़े इतिहास की कई नई जानकारियां सामने आ सकती है।
इस ठिकाने के सभी धांधल राठौड़ रोहिला राजपूत कहलाए
🚩 "मेरा सिर बिक चुका है, विधवा होना है तो शादी कर लो!": लोक देवता पाबूजी राठौर की अमर गाथा🚩
जय पाबूजी! 🙏

📜 इतिहास पर एक नज़र:

मैं भाद्रपद महीने में एक बारात जा रहा था। यह वीरों की बारात थी जिसने शादी से पहले बताया - 'मेरा सिर बिक चुका है, विधवा होना है तो शादी कर लो!'

ढोली गा रहा था:

🎶 धरती तुम संभागानि, (थारै) इंद्र जेहदो भारत।

कंचुवा पांव, बादल छाए।

सूखे रेगिस्तान में खुशी की झरना बह रहा था, लेकिन किसे पता था कि सेहरा और कलंगी से सजा दूल्हा एक दिन लोगों का पूजनीय देवता बन जाएगा? किसे पता था कि फेरों के बीच कर्तव्य की पुकार उस सजी हुई सभा को बलिदान के युद्ध के मैदान में बदल देगी?

 🔥 वादे और बलिदान:

जिस समय विवाह के मंगल गीत गूंज रहे थे, उसी समय एक चारणी (देवल चारणी) मुझे याद दिलाने आई कि - "राही! तुम्हारे विवाह की तैयारियां कहीं और हो रही हैं... आसमान की गहराइयों में स्वर्ग की अप्सराएं वरमाला लेकर खड़ी हैं।"

और उस वीर 'पाबू' ने सुहागरात के बंधन को ठोकर मारते हुए गठबंधन की गांठ खोली और चौथे फेरे से पहले ही गाय की रक्षा के लिए चल पड़े। भागीरथ की जिद और भीष्म के वादे की तरह कठोर होकर अनंत की गहराइयों में विलीन हो गए।

🐎 केशर कालवी और अधूरी शादी:

इतिहास गवाह है कि जिसने अग्नि के पूरे चक्कर भी नहीं लगाए, वही दुल्हन (सोढ़ी रानी) हाथ में नारियल लेकर अपने स्वर्गीय पति के पास चल पड़ी।

आज भी राजस्थान का कण-कण पाबूजी की बहादुरी को याद करता है। पद और पहाड़ों में उनकी तारीफ़ है - कि पाबू भी क्षत्रिय थे!

📌 ऐतिहासिक तथ्य (गर्व करने वाले तथ्य):

🔸 लेखक: स्वर्गीय श्री तन सिंह (किताब: "बदलते नज़ारे")
🔸 केशर कालवी: पाबूजी की वफ़ादार घोड़ी जिसने इतिहास बदल दिया।
🔸 परंपरा: पाबूजी महाराज ने गायों की रक्षा के लिए फेरों के बीच से उठकर बलिदान दिया था। उनकी याद में आज भी राजपूत समुदाय में शादियों में सिर्फ़ चार फेरे लिए जाते हैं।

🙏 जय जय धांधल पाबू जी राठौड़

आइए जानते हैं राठौड़ों में साफा पहनने का रिवाज कैसे शुरू हुआ - 👇

मारवाड़ के राठौड़ 13वीं सदी में इस रेगिस्तान में आए थे। इतिहासकारों के मुताबिक, राठौड़ उत्तर प्रदेश के बदायूं से मारवाड़ आए थे। पहले आदमी राव सिहाजी थे जिन्होंने मारवाड़ के पाली इलाके पर कब्ज़ा करके राठौड़ सत्ता कायम की। आगे चलकर उनके वंशजों ने खेड़ और मंडोर पर राज किया, वे मारवाड़ के सरदार बने।

राठौड़ मरू प्रदेश के नहीं थे, इसलिए उनकी वेशभूषा यहां के माहौल के हिसाब से नहीं थी, लेकिन यहां आने के बाद कई रिवाज और कई रीति-रिवाज बने, जिनके पीछे पहले हुई कई घटनाएं थीं। इन घटनाओं ने नई परंपराओं को जन्म दिया जो आज एक पहचान बन गई हैं।

इतिहास में एक बहुत ही दिलचस्प घटना है जिसकी वजह से राठौड़ों ने साफा (पगड़ी) पहनना शुरू किया। इसके बारे में बहुत कम जानकारी होने की वजह से लोग इसे नहीं जानते।

राव सिहाजी के छह वंशज राव जलांसीजी हुए। वे बहादुर और हिम्मत वाले थे। 14वीं सदी में उनके राज में एक ऐसी घटना हुई, जिससे उन्हें उमरकोट के सोढो पर हमला करना पड़ा। इस जंग में राव जलांसीजी ने सोढो की साफा (पगड़ी) छीन ली।

उन दिनों साफा का बहुत महत्व था। अगर सिर से पगड़ी गिर जाए या दुश्मन के पैरों में पगड़ी गिर जाए, तो समझो वे हार गए। यह साफा आन-बान और शान का प्रतीक था।

राठोड़ों के पास साफा जीत का निशान होता था, इसलिए वे इसे जीत के प्रतीक के तौर पर अपने सिर पर धारण करते थे और इस तरह राठोड़ों ने उसी दिन से साफा बांधना शुरू कर दिया।

जब मैं मुगलों के संपर्क में आया, तो पगड़ी और साफे के कुछ पैच बदल गए जो ट्रेंड में आ गए लेकिन साफा हमेशा ट्रेंड में रहता है। जंग खास तौर पर साफा बांधी जाती थी। आगे चलकर इसी साफे को बांधने के लिए कई पैच (स्टाइल) बनाए गए जैसे जोधपुरी, जिसके पीछे चुरंगा होता है, गोल साफा आदि।

मारवाड़ का जोधपुरी साफा पूरी दुनिया में मशहूर है। मारवाड़ से निकले सभी राठौड़ बीकानेर, किशनगढ़, सीतामऊ, रतलाम, झाबुआ, इडर वगैरह सभी राज्यों में ट्रेंड कर रहे हैं और कुछ बदलावों के साथ यह साफ-सफाई से बंधा हुआ है।

फैशन चाहे जितना बदल जाए, लेकिन इस मारवाड़ की साफ-सफाई आज भी अपने पैच के लिए मशहूर है। इसका क्रेडिट मारवाड़ के मौजूदा नरेश महाराजा गजसिंहजी को जाता है, जिनका नाम गजशाही साफ-सफाई बहुत मशहूर है।

महाराजा साहिब की प्रेरणा से मालाणी राधाधर के बेटे स्वर्गीय डॉ. महेंद्रसिंहजी नागर साहिब, जो मेहरानगढ़ के पूर्व डायरेक्टर थे, ने राजस्थान की पगड़ियों पर रिसर्च करके एक बहुत ही महत्वपूर्ण किताब लिखी थी, जिससे लोगों को पगड़ियों का महत्व समझ में आया। उन्होंने विदेशों में साफो का प्रदर्शन करके बड़ा नाम कमाया।

राठौड़ों की इस शानदार साफ-सफाई का आगाज उमरकोट सिंध की देन है। आगे चलकर यह सिंध
उमरकोट रियासत भी मारवाड़ के तहत आ गई जो आजादी के समय तक मारवाड़ का एक अभिन्न हिस्सा थी। जनमासा में स्वच्छता की कई कहानियाँ आज भी लोगों के मन में बसी हैं। अगर आज पीढ़ी उन्हें सहेज कर रखे तो यह निश्चित रूप से एक ऐतिहासिक काम होगा। स्वच्छ भारत हर वर्ग के कामों के आधार पर अलग-अलग योजनाएँ बनाता है। जोधपुरी नौ मीटर का स्वच्छ है।

अब लोग इसे साफ-साफ बाँधते हैं लेकिन वे इसका सम्मान करना नहीं जानते। जब तक सम्मान नहीं होगा, तब तक उन्हें स्वच्छ नहीं कहा जाएगा।

✍️ डॉ. महेंद्र सिंह तंवर


एक वीर, जिसने रेगिस्तान को अपना घर बनाया।
13वीं सदी में कन्नौज से आए राव सीहा जी ने ही मारवाड़ में राठौड़ वंश की नींव रखी थी।
पाली के ब्राह्मणों की रक्षा के लिए उन्होंने अकेले दम पर लुटेरों से युद्ध किया। 1273 ई. में गायों की रक्षा करते हुए, 1 लाख दुश्मनों (लाखा झंवर) से लड़कर उन्होंने वीरगति प्राप्त की।

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Saturday, 28 February 2026

THE FOUNDERS OF RAJPUTANA KKATHHEHAR ROHILKHANND

*KSHTRIYA SAMRAT MAHARAJA RANVEER SINGH ROHILA,THE FOUNDER OF ROHILKHANND*
🙏 क्रमबद्ध, विस्तृत एवं प्रभावशाली ऐतिहासिक जीवन परिचय प्रस्तुत है।
(लेखन शैली: संतुलित – इतिहास + प्रेरणात्मक, शोधपरक संरचना सहित)
महाराजा रणवीर सिंह रोहिला
कठेहर–रोहिलखण्ड के अजेय क्षत्रिय शासक
(जन्म: 25 अक्टूबर 1204 ई., बलिदान: 13वीं शताब्दी मध्य)
1. प्रस्तावना
भारतीय इतिहास में अनेक ऐसे वीर क्षत्रिय हुए जिन्होंने सीमित संसाधनों में भी विदेशी आक्रमणकारियों का डटकर सामना किया। कठेहर–रोहिलखण्ड (वर्तमान उत्तर प्रदेश का उत्तरी भाग) के पराक्रमी शासक महाराजा रणवीर सिंह रोहिला उन्हीं में से एक थे। उन्होंने दिल्ली सल्तनत के विस्तारवादी अभियानों का विरोध करते हुए स्वतंत्रता और क्षात्र धर्म की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व बलिदान कर दिया।
उनका जीवन केवल एक क्षेत्रीय शासक की कथा नहीं, बल्कि आत्मसम्मान, युद्धनीति और राष्ट्ररक्षा का आदर्श उदाहरण है।
भाग 1
काठी, कठेहर और काठियावाड़ का ऐतिहासिक आधार
2. सूर्यवंश और निकुम्भ वंश
महाराजा रणवीर सिंह रोहिला सूर्यवंशी क्षत्रिय परंपरा से संबंधित माने जाते हैं। परंपरागत वंशावली के अनुसार यह वंश इक्ष्वाकु कुल से उत्पन्न हुआ, जिसे भगवान राम की वंश परंपरा माना जाता है। निकुम्भ नामक पराक्रमी राजा से निकुम्भ वंश की स्थापना मानी जाती है।
इस वंश की एक शाखा “कठ” या “काठी” कहलायी।
3. कठ गणराज्य और सिकंदर काल
ईसा पूर्व 326 में जब Alexander the Great ने उत्तर-पश्चिम भारत पर आक्रमण किया, उस समय रावी नदी के तट पर कठ गणराज्य का उल्लेख मिलता है। इसकी राजधानी “सांकल” (वर्तमान स्यालकोट) बताई जाती है।
यूनानी लेखकों ने कठों (Kathoi/Kathaeans) की वीरता, शारीरिक सौष्ठव और युद्ध कौशल की प्रशंसा की है। कुछ ग्रंथों में उल्लेख है कि वे स्वस्थ और बलिष्ठ संतानों को ही जीवित रखते थे तथा सर्वश्रेष्ठ योद्धा को शासक चुनते थे।
संस्कृत व्याकरणाचार्य Panini की अष्टाध्यायी में कठों का उल्लेख मिलता है। महाभाष्यकार Patanjali ने भी कठों का उल्लेख किया है।
4. काठियावाड़ और कठेहर का विकास
सिकंदर के आक्रमणों के पश्चात कठ क्षत्रियों के विभिन्न समूहों ने भारत के विभिन्न क्षेत्रों में प्रवास किया—
एक शाखा सौराष्ट्र गई — जहाँ “सौराष्ट्र” क्षेत्र “काठियावाड़” नाम से प्रसिद्ध हुआ।
एक शाखा उत्तर भारत के पंचाल क्षेत्र में बसी — जो आगे चलकर “कठेहर खण्ड” या “रोहिलखण्ड” कहलाया।
एक शाखा नेपाल क्षेत्र में गई — जहाँ “कटायत” परंपरा का उल्लेख मिलता है।
काठी वीरों के विषय में कहावत प्रचलित हुई:
“काल भी अगर छोड़ दे, लेकिन काठी नहीं छोड़ता।”
भाग 2
कठेहर राज्य की स्थापना
5. रामपुर की स्थापना
लगभग 7वीं–10वीं शताब्दी के मध्य कठेहर क्षेत्र में स्थायी राज्य की स्थापना हुई।
राजा रामसिंह (रामशाह) ने 909 ईस्वी (विक्रमी 966) में रामपुर नगर को राजधानी के रूप में विकसित किया। यह क्षेत्र अहिक्षेत्र (वर्तमान रामनगर के निकट) के आसपास स्थित था।
इसके बाद 11 पीढ़ियों तक कठ क्षत्रियों ने शासन किया।
वंशावली में उल्लेखित प्रमुख नाम:
रामशाह (रामसिंह)
बीजयराज
करणचन्द
विम्रहराज
सावन्त सिंह
जगमाल
रणवीर सिंह
धिंगतराम
गोकुल सिंह
महासहाय
त्रिलोकचन्द
नौरंग देव
भाग 3
महाराजा रणवीर सिंह रोहिला
6. जन्म और व्यक्तित्व
जन्म: 25 अक्टूबर 1204 ईस्वी
विक्रम संवत: 1261
स्थान: रामपुर, कठेहर-रोहिलखण्ड
गोत्र: वशिष्ठ
वंश: निकुम्भ वंशी कठेहरिया क्षत्रिय
वे युद्धकला, घुड़सवारी और शस्त्र संचालन में निपुण थे। उनके साथ 84 कवचधारी रोहिला वीरों की विशिष्ट सेना रहती थी।
7. दिल्ली सल्तनत से संघर्ष
13वीं शताब्दी में दिल्ली में गुलाम वंश का शासन था। उस समय सुल्तान Nasiruddin Mahmud नाममात्र का शासक था, जबकि वास्तविक सत्ता Ghiyas ud din Balban जैसे शक्तिशाली अमीरों के हाथों में थी।
1253–1254 ईस्वी में दोआब, कठेहर और शिवालिक क्षेत्रों में दमनकारी अभियान चलाया गया। स्थानीय शासकों और जनता पर अत्याचार हुए।
रोहिलखण्ड में विद्रोह भड़क उठा और दिल्ली सल्तनत के सूबेदार की हत्या कर दी गई।
8. निर्णायक युद्ध
रामपुर और पीलीभीत के मध्य मैदान में दिल्ली सल्तनत की लगभग 30,000 सेना और रणवीर सिंह के नेतृत्व में रोहिला योद्धाओं के बीच भयंकर युद्ध हुआ।
परंपरा के अनुसार:
84 कवचधारी रणधेलवंशी वीरों ने असाधारण पराक्रम दिखाया
शत्रु सेना के हाथी-घोड़े परास्त हुए
नासिरूद्दीन को बंदी बनाया गया
क्षात्र धर्म के अनुसार शरणागत को अभयदान देकर रणवीर सिंह ने उसे छोड़ दिया।
9. विश्वासघात और बलिदान
दिल्ली दरबार ने पुनः षड्यंत्र रचा।
दरबारी पंडित गोकुलराम पाण्डेय को लालच देकर विश्वास में लिया गया।
रक्षाबंधन के दिन, जब शिव मंदिर में शस्त्र पूजा हेतु राजपूत निःशस्त्र थे, तब किले का द्वार खोल दिया गया। भारी सेना ने आक्रमण किया।
घमासान युद्ध हुआ।
महाराजा रणवीर सिंह वीरगति को प्राप्त हुए।
महारानी तारादेवी सती हो गईं।
उनके भाई सूरत सिंह शेष परिवार सहित सुरक्षित स्थान पर चले गए।
भाग 4
ऐतिहासिक विरासत
रामपुर के किले के अवशेष
सती तारादेवी मंदिर
स्थानीय परंपराएँ और वंशज
महाराजा रणवीर सिंह ने अंतिम सांस तक पराधीनता स्वीकार नहीं की। उनका बलिदान रोहिलखण्ड की स्वतंत्र चेतना का प्रतीक बना।
निष्कर्ष
महाराजा रणवीर सिंह रोहिला का जीवन भारतीय क्षत्रिय परंपरा, स्वाभिमान और स्वतंत्रता की रक्षा का सशक्त उदाहरण है।
उन्होंने सीमित संसाधनों में भी दिल्ली सल्तनत की शक्तिशाली सेना का सामना किया और क्षात्र धर्म का पालन करते हुए शरणागत को अभयदान दिया — यद्यपि अंततः उन्हें विश्वासघात का सामना करना पड़ा।
उनकी गाथा इतिहास के उन पृष्ठों में स्थान पाने योग्य है जहाँ क्षेत्रीय स्वतंत्रता संग्राम और स्थानीय शौर्य को उचित सम्मान दिया जाए।
 🚩

RAJPUTANA ROHILKHAND KE SANSTHAPAK। MAHARSJA RANVEER SINGH ROHILA

*महाराजा रणवीर सिंह रोहिला*
*कठेहर–रोहिलखण्ड के सूर्यवंशी क्षत्रिय शासक*
भारतीय इतिहास के विस्तृत परिदृश्य में अनेक ऐसे क्षेत्रीय शक्तिकेंद्र रहे हैं जिनकी वीरगाथाएँ मुख्यधारा इतिहास लेखन में सीमित स्थान पा सकीं, किन्तु जनस्मृति, वंशावली, लोकपरंपरा और क्षेत्रीय इतिहास में वे अत्यंत जीवंत हैं। कठेहर–रोहिलखण्ड (वर्तमान उत्तर प्रदेश का उत्तरी भाग) का इतिहास भी ऐसा ही एक अध्याय है। इस क्षेत्र के सूर्यवंशी निकुम्भ वंशीय कठेहरिया क्षत्रियों में जन्मे महाराजा रणवीर सिंह रोहिला 13वीं शताब्दी के उन वीर शासकों में गिने जाते हैं जिन्होंने राजनीतिक स्वाधीनता, धार्मिक आस्था और क्षात्र धर्म की रक्षा के लिए संघर्ष किया।
यह ग्रंथ उनके वंश, ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, कठ/काठी परंपरा, कठेहर राज्य की स्थापना, दिल्ली सल्तनत से संघर्ष, विश्वासघात, बलिदान और ऐतिहासिक विरासत का क्रमबद्ध, शोधपरक और विश्लेषणात्मक प्रस्तुतीकरण है।
अध्याय 1
सूर्यवंश, निकुम्भ वंश और कठ परंपरा
1.1 सूर्यवंश की ऐतिहासिक अवधारणा
भारतीय परंपरा में सूर्यवंश को इक्ष्वाकु कुल से जोड़ा जाता है। पुराणों और राजवंशावलियों के अनुसार इक्ष्वाकु से प्रारंभ यह वंश अनेक शाखाओं में विभक्त हुआ। इन्हीं शाखाओं में निकुम्भ वंश का उल्लेख मिलता है, जो परंपरा के अनुसार अयोध्या के सूर्यवंशी राजाओं से संबंधित माना जाता है।
निकुम्भ वंश की एक शाखा “कठ” अथवा “काठी” के नाम से विख्यात हुई। यही शाखा आगे चलकर कठेहरिया क्षत्रियों के रूप में जानी गई।
1.2 कठ गणराज्य और उत्तर-पश्चिम भारत
ईसा पूर्व चौथी शताब्दी में उत्तर-पश्चिम भारत में अनेक गणराज्य विद्यमान थे। जब Alexander the Great ने 326 ईसा पूर्व भारतीय सीमा में प्रवेश किया, तब रावी नदी के तट पर “कठ” या “कठोई” नामक एक वीर गणराज्य का उल्लेख यूनानी लेखकों ने किया है।
उनकी राजधानी “सांकल” (आधुनिक स्यालकोट से संबद्ध मानी जाती है) बताई जाती है। यूनानी इतिहासकारों ने कठों की—
असाधारण युद्धक क्षमता
शारीरिक सौष्ठव
अनुशासित सैन्य संरचना
की प्रशंसा की है।
कुछ विवरणों में यह भी उल्लेख मिलता है कि कठ लोग सर्वश्रेष्ठ और बलिष्ठ योद्धा को ही शासक चुनते थे।
1.3 संस्कृत ग्रंथों में कठ
संस्कृत व्याकरणाचार्य Panini की अष्टाध्यायी में कठों का उल्लेख मिलता है। यह प्रमाणित करता है कि कठ जनपद वैदिकोत्तर काल में एक प्रतिष्ठित समुदाय था।
महाभाष्यकार Patanjali ने भी कठों का उल्लेख किया है। कठों की वेद शाखा “काठक संहिता” के नाम से प्रसिद्ध रही।
यह उल्लेख इस समुदाय की वैदिक, सांस्कृतिक और सैन्य प्रतिष्ठा को दर्शाता है।
अध्याय 2
कठों का विस्थापन और विस्तार
2.1 सिकंदर के पश्चात राजनीतिक परिवर्तन
उत्तर-पश्चिम भारत में आक्रमणों और सत्ता संघर्षों के परिणामस्वरूप अनेक क्षत्रिय गणराज्य विस्थापित हुए। कठों की विभिन्न टुकड़ियाँ भारत के भिन्न क्षेत्रों में प्रवासित हुईं।
परंपरा के अनुसार:
एक शाखा सौराष्ट्र गई
एक शाखा पंचाल (मध्यदेश) में आई
एक शाखा नेपाल क्षेत्र में पहुँची
2.2 काठियावाड़ की स्थापना
सौराष्ट्र क्षेत्र, जो प्राचीन काल से प्रसिद्ध था, कठ क्षत्रियों के प्रभाव से “काठियावाड़” नाम से विख्यात हुआ। काठी दरबार और काठी क्षत्रिय परंपरा ने वहाँ की सैन्य और सामाजिक संरचना पर गहरी छाप छोड़ी।
लोक कहावत—
“काल भी अगर छोड़ दे, लेकिन काठी नहीं छोड़ता।”
—काठी क्षत्रियों के युद्ध-संकल्प और प्रतिशोधात्मक दृढ़ता का प्रतीक मानी जाती है।
2.3 कठेहर खंड का उद्भव
पंचाल क्षेत्र (वर्तमान उत्तर प्रदेश का उत्तरी भाग) में बसने वाली शाखा ने कठेहर राज्य की नींव रखी। यही क्षेत्र आगे चलकर रोहिलखण्ड के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
कठेहर शब्द का अर्थ है—कठों का क्षेत्र।
अध्याय 3
कठेहर राज्य की स्थापना और प्रारंभिक शासक
3.1 ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
7वीं से 10वीं शताब्दी के मध्य उत्तर भारत में अनेक क्षेत्रीय शक्तियाँ उभरीं। इन्हीं में कठेहर राज्य का भी क्रमिक विकास हुआ।
परंपरा के अनुसार 648–720 ईस्वी के मध्य कठेहर में स्थिर राज्य व्यवस्था विकसित हुई।
3.2 रामपुर की स्थापना
राजा रामसिंह (रामशाह) ने 909 ईस्वी (विक्रमी संवत 966) में रामपुर को राजधानी के रूप में विकसित किया। यह स्थान अहिक्षेत्र (रामनगर के समीप) क्षेत्र में स्थित था।
रामपुर:
सामरिक दृष्टि से सुरक्षित
नदी तंत्र से संरक्षित
कृषि और व्यापार के लिए अनुकूल
क्षेत्र था।
3.3 वंशावली क्रम
परंपरागत वंश सूची के अनुसार प्रमुख शासक:
रामशाह (रामसिंह)
बीजयराज
करणचन्द
विम्रहराज
सावन्त सिंह (जिन्होंने राज्य का विस्तार गंगा पार यमुना तक किया)
जगमाल
रणवीर सिंह
धिंगतराम
गोकुल सिंह
महासहाय
त्रिलोकचन्द
नौरंग देव
यह वंश लगभग 11 पीढ़ियों तक कठेहर पर शासन करता रहा।
अध्याय 4
महाराजा रणवीर सिंह रोहिला – जन्म और प्रारंभिक जीवन
4.1 जन्म
जन्म तिथि: 25 अक्टूबर 1204 ईस्वी
विक्रम संवत: 1261
स्थान: रामपुर, कठेहर
गोत्र: वशिष्ठ
वंश: निकुम्भ वंशी कठेहरिया क्षत्रिय
4.2 शिक्षा और प्रशिक्षण
राजकुमार रणवीर सिंह को:
धनुर्विद्या
तलवारबाजी
घुड़सवारी
दुर्ग रक्षा नीति
शास्त्र एवं धर्म शिक्षा
दी गई।
उनका व्यक्तित्व तेजस्वी, दृढ़निश्चयी और धर्मनिष्ठ बताया जाता है।
4.3 84 कवचधारी रोहिले
उनकी विशिष्ट सैन्य टुकड़ी “84 लोहे के कवचधारी” योद्धाओं की थी। ये रणधेलवंशी वीर, कठोर अनुशासन और अदम्य साहस के लिए प्रसिद्ध थे।
अध्याय 5
13वीं शताब्दी का राजनीतिक परिदृश्य
13वीं शताब्दी में दिल्ली में गुलाम वंश का शासन था। सुल्तान Nasiruddin Mahmud नाममात्र के शासक थे, जबकि वास्तविक शक्ति शक्तिशाली अमीरों, विशेषकर Ghiyas ud din Balban के हाथों में केंद्रित थी।
दिल्ली सल्तनत:
दोआब क्षेत्र पर नियंत्रण चाहती थी
राजस्व विस्तार कर रही थी
सीमावर्ती स्वतंत्र राज्यों को अधीन करना चाहती थी
अध्याय 6
संघर्ष का आरंभ
1253–1254 ईस्वी में दोआब, कठेहर और शिवालिक क्षेत्र में दमनकारी अभियान चलाया गया।
अत्याचारों से क्षुब्ध होकर स्थानीय शक्तियों ने विद्रोह किया। कठेहर में सल्तनती सूबेदार की हत्या कर दी गई।
यह घटना दिल्ली के लिए गंभीर चुनौती थी।
अध्याय 7
रामपुर–पीलीभीत का निर्णायक युद्ध
7.1 युद्ध की तैयारी
रामपुर और पीलीभीत के मध्य मैदान में दिल्ली सल्तनत की लगभग 30,000 सेना और महाराजा रणवीर सिंह की सेना आमने-सामने हुई।
7.2 युद्ध का वर्णन
रोहिला सेना ने संगठित प्रतिरोध किया
84 कवचधारी वीरों ने अग्रिम मोर्चा संभाला
हाथी-दल और घुड़सवारों को रोका गया
परंपरा के अनुसार, सुल्तान को बंदी बनाया गया।
7.3 क्षात्र धर्म का पालन
रणवीर सिंह ने शरणागत शत्रु को क्षमा कर अभयदान दिया। यह राजधर्म और क्षात्र मर्यादा का उदाहरण था।
अध्याय 8
विश्वासघात और बलिदान
8.1 षड्यंत्र
दरबारी पंडित गोकुलराम पाण्डेय को लालच देकर विश्वास में लिया गया। किले की सुरक्षा व्यवस्था की जानकारी शत्रु को दी गई।
8.2 रक्षाबंधन का दिन
शिव मंदिर में शस्त्र पूजा हेतु राजपूत निःशस्त्र थे। इसी अवसर पर किले का दक्षिण द्वार खोल दिया गया।
8.3 अंतिम युद्ध
अचानक आक्रमण
मंदिर परिसर में घमासान युद्ध
महाराजा रणवीर सिंह वीरगति को प्राप्त
महारानी तारादेवी सती हो गईं।
भाई सूरत सिंह परिवार सहित सुरक्षित स्थान पर चले गए।
अध्याय 9
सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत
9.1 भौतिक अवशेष
रामपुर किले के अवशेष
सती तारादेवी मंदिर
स्थानीय स्मारक
9.2 सामाजिक प्रभाव
रोहिला क्षत्रियों में आज भी रणवीर सिंह का नाम श्रद्धा से लिया जाता है।
अध्याय 10
ऐतिहासिक विश्लेषण
10.1 स्रोतों की प्रकृति
वंशावली ग्रंथ
लोक परंपराएँ
क्षेत्रीय पत्रिकाएँ
मौखिक इतिहास
10.2 इतिहास लेखन की चुनौती
मुख्यधारा इतिहास प्रायः साम्राज्य केंद्रित रहा है। क्षेत्रीय शक्तियों के संघर्षों को सीमित स्थान मिला। कठेहर राज्य का इतिहास इसी श्रेणी में आता है।
अध्याय 11
रणवीर सिंह का ऐतिहासिक महत्व
क्षेत्रीय स्वाधीनता के प्रतीक
क्षात्र धर्म के पालन का उदाहरण
धार्मिक आस्था और युद्ध नीति का समन्वय
विश्वासघात के विरुद्ध चेतावनी
निष्कर्ष
महाराजा रणवीर सिंह रोहिला का जीवन भारतीय इतिहास में उस परंपरा का प्रतिनिधित्व करता है जिसमें—
स्वाभिमान सर्वोपरि है
पराधीनता अस्वीकार्य है
शरणागत को अभय देना क्षात्र धर्म है
विश्वासघात अंततः विनाशकारी होता है
उनका बलिदान कठेहर–रोहिलखण्ड की स्वतंत्र चेतना का प्रतीक है। यद्यपि उनका राज्य अंततः राजनीतिक रूप से पराजित हुआ,किंतु लोक स्मृति में अमर है।

Monday, 23 February 2026

SOME GOTRA OF ROHILA KSHTRIYAS

*ROHILA RAJPUT GOTRA*
आठवी सदी से आरंभ हुई
*रोहिल्ला *उपाधि से शूरवीर, अदम्य - साहसी विशेष युद्ध कला में प्रवीण, उच्च कुलीन सेनानायको, और सामन्तों को उनके गुणों के अनुरूप क्षत्रिय वीरों को तदर्थ उपाधि से विभूषित किया जाता था - जैसे - रावत - महारावत, राणा, रूहॆला, ठाकुर, नेगी, रावल, रहकवाल, रोहिला, समरलछन्द, लखमीर,(एक लाख का नायक) आदि। इसी आधार पर उनके वंशज भी आज तक (क्षत्रियों) के सभी गोत्रों में पाए जाते हैं।

रोहिलखण्ड से विस्थापित इन रोहिला परिवारों में क्षत्रिय वंश परम्परा के कुछ प्रमुख गोत्र हैं :-

रोहिला, रूहेला, ठैँगर,ठहित, रोहिल, रावल, द्रोहिया, रल्हन, रूहिलान, रौतेला , रावत,लोहारिया


यौधेय, योतिक, जोहिया, झोझे, पेशावरी

पुण्डीर, पांडला, पंढेर, पुन्ड़ेहार, पुंढीर, पुंडाया

चौहान, जैवर, जौडा, चाहल, चऊहा ,चूहा,चाहिल चावड़ा, खींची, गोगद, गदाइया, सनावर, क्लानियां, चिंगारा, चाहड बालसमंद, बहरासर, बराबर, चोहेल, चेहलान, बालदा, बछ्स (वत्स), बछेर, चयद, झझोड, चौपट, खुम्ब, जांघरा, जंगारा, झांझड,शाण

निकुम्भ, कठेहरिया,कठोड़ , कठोडा ,कठौरा, कठैत, कलुठान, कठपाल, कठेडिया, कठड, काठी, कठ, पालवार

राठौर, महेचा, महेचराना, रतनौता, बंसूठ जोली,धांधल, जोलिए, बांकटे, बाटूदा, थाथी, कपोलिया, खोखर, अखनौरिया ,लोहमढ़े, मसानिया,लखमार, लखमीर 

बुन्देला, उमट, ऊमटवाल

 भारती, गनान बटेरिया, बटवाल, बरमटिया

परमार, जावडा, लखमरा, मूसला, मौसिल, मूसा ,भौंसले, बसूक, जंदडा, पछाड़, पंवारखा, मौन

तोमर, तंवर, मुदगल, देहलीवाल, किशनलाल, सानयाल, सैन, सनाढय,बंदरीया

गहलौत, कूपट, पछाड़, थापा, ग्रेवाल, कंकोटक, गोद्देय, पापडा, नथैड़ा, नैपाली, लाठिवाल, पानिशप, पिसोण्ड, चिरडवाल, नवल, ऊंट , ऊंटवाल,चरखवाल, साम्भा, पातलेय, पातलीय, छन्द (चंड), क्षुद्रक,(छिन्ड, इन्छड़, नौछड़क), रज्जडवाल, बोहरा, जसावत, गौर, मलक, मलिक, 

कछवाहा, कुशवाहा, कोकच्छ, कोकचा, काक, ततवाल, बलद, मछेर

सिसौदिया, ऊँटवाड़ या ऊँटवाल, भरोलिया, बरनवाल, बरनपाल, बहारा

खुमाहड, अवन्ट, ऊँट, ऊँटवाल

सिकरवार, रहकवाल,गर्ग, रायकवार, ,ममड, गोदे

सोलंकी, गिलानिया, भुन, बुन, बघेला, ऊन, (उनयारिया)

बडगूजर, सिकरवार, ममड़ा, पुडिया

कश्यप, काशब, रावल, रहकवाल

यदु, मेव, छिकारा,,चिकारा तैतवाल, भैनिवाल, उन्हड़, भाटी ,बनाफरे, जादो, बागड़ी, सिन्धु, कालड़ा, सारन, छुरियापेड,(सूर्य वंश के क्षुद्रक छ्त्रपारे छुरिया पेड़ अलग है) लखमेरिया,(परमार लख्मरा ,ओर गहलोत लखमरा अलग है)चराड, जाखड़, सेरावत, देसवाल।

रोहि्ला क्षत्रियों में ऊंटवाल गोत्र चंद्रवंशी एवं सूर्यवंशी दोनों में पाए जाते हैं सूर्यवंशी ऊंटवाल गोत्र मेवाड़ के गहलोत सिसोदिया घराने से हैं और चंद्रवंशी ऊंटवाल जैसलमेर के भाटी है। ये लोग रेगिस्तान में मरुधरा के जहाज कहे जाने वाले ऊँटों की सेना के सेनापति तथा संचालक थे।
कोई गोत्र छूट गया हो तो उस गोत्र को coment box में लिखे संशोधन के साथ एड किया जायेगा

गौत्र और वंश....
गुणसूत्र वंश का वाहक

हमारे धार्मिक ग्रंथ और हमारी सनातन हिन्दू परंपरा के अनुसार पुत्र (बेटा) को कुलदीपक अथवा वंश को आगे बढ़ाने वाला माना जाता है..... 
अर्थात.... उसे गोत्र का वाहक माना जाता है.

क्या आप जानते हैं कि.... आखिर क्यों होता है कि सिर्फ पुत्र को ही वंश का वाहक माना जाता है ????

असल में इसका कारण.... पुरुष प्रधान समाज अथवा पितृसत्तात्मक व्यवस्था नहीं .... 
बल्कि, हमारे जन्म लेने की प्रक्रिया है.

अगर हम जन्म लेने की प्रक्रिया को सूक्ष्म रूप से देखेंगे तो हम पाते हैं कि......

एक स्त्री में गुणसूत्र (Chromosomes) XX होते है.... और, पुरुष में XY होते है. 

इसका मतलब यह हुआ कि.... अगर पुत्र हुआ (जिसमें XY गुणसूत्र है)... तो, उस पुत्र में Y गुणसूत्र पिता से ही आएगा क्योंकि माता में तो Y गुणसूत्र होता ही नही है

और.... यदि पुत्री हुई तो (xx गुणसूत्र) तो यह गुणसूत्र पुत्री में माता व् पिता दोनों से आते है.

XX गुणसूत्र अर्थात पुत्री

अब इस XX गुणसूत्र के जोड़े में एक X गुणसूत्र पिता से तथा दूसरा X गुणसूत्र माता से आता है. 

तथा, इन दोनों गुणसूत्रों का संयोग एक गांठ सी रचना बना लेता है... जिसे, Crossover कहा जाता है.

जबकि... पुत्र में XY गुणसूत्र होता है.

अर्थात.... जैसा कि मैंने पहले ही बताया कि.... पुत्र में Y गुणसूत्र केवल पिता से ही आना संभव है क्योंकि माता में Y गुणसूत्र होता ही नहीं है.

और.... दोनों गुणसूत्र अ-समान होने के कारण.... इन दोनों गुणसूत्र का पूर्ण Crossover नहीं... बल्कि, केवल 5 % तक ही Crossover होता है.

और, 95 % Y गुणसूत्र ज्यों का त्यों (intact) ही बना रहता है.

तो, इस लिहाज से महत्त्वपूर्ण Y गुणसूत्र हुआ.... क्योंकि, Y गुणसूत्र के विषय में हम निश्चिंत है कि.... यह पुत्र में केवल पिता से ही आया है.

बस..... इसी Y गुणसूत्र का पता लगाना ही गौत्र प्रणाली का एकमात्र उदेश्य है जो हजारों/लाखों वर्षों पूर्व हमारे ऋषियों ने जान लिया था.

इस तरह ये बिल्कुल स्पष्ट है कि.... हमारी वैदिक गोत्र प्रणाली, गुणसूत्र पर आधारित है अथवा Y गुणसूत्र को ट्रेस करने का एक माध्यम है.

उदाहरण के लिए .... यदि किसी व्यक्ति का गोत्र शांडिल्य है तो उस व्यक्ति में विद्यमान Y गुणसूत्र शांडिल्य ऋषि से आया है.... या कहें कि शांडिल्य ऋषि उस Y गुणसूत्र के मूल हैं.

अब चूँकि.... Y गुणसूत्र स्त्रियों में नहीं होता है इसीलिए विवाह के पश्चात स्त्रियों को उसके पति के गोत्र से जोड़ दिया जाता है.

वैदिक/ हिन्दू संस्कृति में एक ही गोत्र में विवाह वर्जित होने का मुख्य कारण यह है कि एक ही गोत्र से होने के कारण वह पुरुष व् स्त्री भाई-बहन कहलाए क्योंकि उनका पूर्वज (ओरिजिन) एक ही है..... क्योंकि, एक ही गोत्र होने के कारण...
दोनों के गुणसूत्रों में समानता होगी.

आज की आनुवंशिक विज्ञान के अनुसार भी..... यदि सामान गुणसूत्रों वाले दो व्यक्तियों में विवाह हो तो उनके संतान... आनुवंशिक विकारों का साथ उत्पन्न होगी क्योंकि.... ऐसे दंपत्तियों की संतान में एक सी विचारधारा, पसंद, व्यवहार आदि में कोई नयापन नहीं होता एवं ऐसे बच्चों में रचनात्मकता का अभाव होता है.

विज्ञान द्वारा भी इस संबंध में यही बात कही गई है कि सगौत्र शादी करने पर अधिकांश ऐसे दंपत्ति की संतानों में अनुवांशिक दोष अर्थात् मानसिक विकलांगता, अपंगता, गंभीर रोग आदि जन्मजात ही पाए जाते हैं.
शास्त्रों के अनुसार इन्हीं कारणों से सगौत्र विवाह पर प्रतिबंध लगाया था.
यही कारण था कि शारीरिक बिषमता के कारण अग्रेज राज परिवार में आपसी विवाह बन्द हुए। 
जैसा कि हम जानते हैं कि.... पुत्री में 50% गुणसूत्र माता का और 50% पिता से आता है.

फिर, यदि पुत्री की भी पुत्री हुई तो.... वह डीएनए 50% का 50% रह जायेगा...
और फिर.... यदि उसके भी पुत्री हुई तो उस 25% का 50% डीएनए रह जायेगा.

इस तरह से सातवीं पीढ़ी में पुत्री जन्म में यह % घटकर 1% रह जायेगा.

अर्थात.... एक पति-पत्नी का ही डीएनए सातवीं पीढ़ी तक पुनः पुनः जन्म लेता रहता है....और, यही है "सात जन्मों के साथ का रहस्य".

लेकिन..... यदि संतान पुत्र है तो .... पुत्र का गुणसूत्र पिता के गुणसूत्रों का 95% गुणों को अनुवांशिकी में ग्रहण करता है और माता का 5% (जो कि किन्हीं परिस्थितियों में एक % से कम भी हो सकता है) डीएनए ग्रहण करता है...
और, यही क्रम अनवरत चलता रहता है.

जिस कारण पति और पत्नी के गुणों युक्त डीएनए बारम्बार जन्म लेते रहते हैं.... अर्थात, यह जन्म जन्मांतर का साथ हो जाता है.

इन सब में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि.... माता पिता यदि कन्यादान करते हैं तो इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि वे कन्या को कोई वस्तु समकक्ष समझते हैं...

बल्कि, इस दान का विधान इस निमित किया गया है कि दूसरे कुल की कुलवधू बनने के लिये और उस कुल की कुल धात्री बनने के लिये, उसे गोत्र मुक्त होना चाहिए. 

पुत्रियां..... आजीवन डीएनए मुक्त हो नहीं सकती क्योंकि उसके भौतिक शरीर में वे डीएनए रहेंगे ही, इसलिये मायका अर्थात माता का रिश्ता बना रहता है.

शायद यही कारण है कि..... विवाह के पश्चात लड़कियों के पिता को घर को ""मायका"" ही कहा जाता है.... "'पिताका"" नहीं.

क्योंकि..... उसने अपने जन्म वाले गोत्र अर्थात पिता के गोत्र का त्याग कर दिया है....!

और चूंकि..... कन्या विवाह के बाद कुल वंश के लिये रज का दान कर मातृत्व को प्राप्त करती है... इसीलिए, हर विवाहित स्त्री माता समान पूजनीय हो जाती है.

आश्चर्य की बात है कि.... हमारी ये परंपराएं हजारों-लाखों साल से चल रही है जिसका सीधा सा मतलब है कि हजारों लाखों साल पहले.... जब पश्चिमी देशों के लोग नंग-धड़ंग जंगलों में रह रहा करते थे और चूहा ,बिल्ली, कुत्ता वगैरह मारकर खाया करते थे....

उस समय भी हमारे पूर्वज ऋषि मुनि.... इंसानी शरीर में गुणसूत्र के विभक्तिकरण को समझ गए थे.... और, हमें गोत्र सिस्टम में बांध लिया था.

इस बातों से एक बार फिर ये स्थापित होता है कि....  
हमारा सनातन हिन्दू धर्म पूर्णतः वैज्ञानिक है....

बस, हमें ही इस बात का भान नहीं है.

असल में..... अंग्रेजों ने जो हमलोगों के मन में जो कुंठा बोई है..... उससे बाहर आकर हमें अपने पुरातन विज्ञान को फिर से समझकर उसे अपनी नई पीढियों को बताने और समझाने की जरूरत है.
 गोत्र के महत्व को वैज्ञानिक तरीके से समझे अज्ञानता की हठधर्मिता न करे*
*विशेष नोट__यहां प्रदर्शित चित्र केवल प्रतीकात्मक है जो सोसल मीडिया से लिया गया है इस पर लेखक का कोई हक और लेखक से कोई संबंध नहीं है।।

रक्त रंजीत हुई धरा रोहिलखंड रामपुर की ,सिर कटा ,धड़ लड़ता रहा रणबांके रणवीर का

रक्त रंजीत हुई धरा तीन हजार राजपूतों का संहार निहत्थे किया गया।*तेरहवीं शदाब्दी के आरंभ में उत्तर प्रदेश के बहुत बड़े भूभाग पर रोहिला राजपूतों का शासन था,जिसकी स्थापना सूर्य वंशी क्षत्रिय महाराजा रणवीर सिंह रोहिला जी ने एक स्वतंत्र राज्य के रूप में की थी। उस समय दिल्ली के सुलतानों ने आतंक मचा रखा था और सल्तनत विस्तार करने और धर्मांतरण करने में दिल्ली की पूरी शक्ति काम कर रही थी किंतु रोहिलखंड नरेश महाराजा रणवीर सिंह रोहिला से दिल्ली के सुल्तान भय खाते थे क्योंकि तीस साल तक आक्रमण करते रहने के बाद भी वे कभी रोहिलखंड पर कब्जा नहीं कर पाए।महाराजा रणवीर सिंह रोहिला सनातन धर्म के रक्षक और विधर्मी संहारक के रूप में उभर रहे थे समस्त राजपूत शक्तियों को एक मंच पर रोहिलखंड में एकत्र करके उन्होंने अनेको बार आक्रांताओ को धूल चटाई और रोहिलखंड की स्वतंत्रता पर आंच नहीं आने दी। सन 1254ईस्वी में रक्षा बंधन के दिन जब निशस्त्र राजपूत किले में राखी का त्योहार मना रहे थे और बहिनों से रक्षा सूत्र बंधवा रहे थे तो पूर्व नियोजित गद्दारी के कारण दिल्ली सुल्तान नसीरुद्दीन महमूद ने गद्दार द्वारा किले के चारो द्वार खोल देने पर अचानक निहत्थे राजपूतों पर तीस हजार की सेना लेकर लग भाग दस बजे हमला कर दिया,सभी राजपूत संख्या में कम लगभग तीन हजार होने बाद भी बड़ी बहादुरी से लड़े,राजा रणवीर सिंह रोहिला ने अद्भुत वीरता का प्रदर्शन करते हुए सांय पांच बजे तक भीषण संग्राम किया और दिल्ली की सेना को उनके ही हथियार छीन कर गाजर मूली की तरह काट डाला अंत में अकरांताओ के एक दुर्दांत खूंखवार दल ने उन्हे चारो ओर से घेर लिया ,रक्त की अंतिम बूंद रहने तक महाराजा रणवीर सिंह रोहिला ने साहस नहीं छोड़ा और दुश्मनों का काल बने रहे,संख्या में अधिक आक्रांता होने के कारण उनके टुकड़े टुकड़े कर दिए गए और बचे तो केवल हड्डियो के टुकड़े ही इतना दुर्दांत राक्षसी तरीके से राजा रणवीर सिंह को काट डाला उनकी इस वीरता को देख कर नसीरुद्दीन किले से बाहर आ गया और बचे स्त्री बच्चो को छोड़ गया लूट कर किले को चला गया पुस्तकालय को आग लगा दी। राजा रणवीर सिंह के रक्षा बंधन के दिन हुए इस बलिदान को समस्त सनातन रक्षक क्षत्रियजन शौर्य और स्वाभिमान दिवस के रूप में मनाते है।इस वर्ष सोमवार दिनांक19 अगस्त2024को क्षत्रिय सम्राट रोहिलखंड नरेश का 771वा बलिदान दिवस है। सभी से निवेदन है महापुरुषों को सम्मान देने और इतिहास संरक्षण की कड़ी में रक्षा बंधन को शौर्य दिवस के रूप में मनाए । महाराजा रणवीर सिंह रोहिला जी के नाम पर नामित चौक ,चौराहे,भवनों , पार्कों और सड़को पर सांय काल दीपक जलाएं और सनातन रक्षक के बलिदान को याद करे,प्रतिमाओं पर माल्यार्पण पर पुष्पांजलि दे और श्रद्धा सुमन अर्पित करे।अपने अपने घरों नगरों गांवों में जैसी भी व्यवस्था हो सामूहिक या व्यक्तिगत रक्षा बंधन को सांय काल अवश्य महान वीर सनातन रक्षक विधर्मी संहारक को याद करे ताकि इतिहास जिंदा रहे और भावी पीढ़ी को देश प्रेम की प्रेरणा मिले।*

*रोहिला क्षत्रिय समाज के महान वीरों को सच्ची श्रद्धांजलि तभी होगी जब रोहिला क्षत्रियों के अस्तित्व की रक्षा होगी अन्यथा राजनीति के शिकार कुछ षड्यंत्र कारी अन्य समाज में इस क्षत्रिय समाज को घटक बता कर विलीन करना चाहते है*
*उनके बहकावे में न आकर रोहिला क्षत्रिय समाज की रक्षा करे और भावी पीढ़ी का मार्ग दर्शन करे*
*गिरा जहां पर खून वहां का , पत्थर पत्थर जिंदा है ।*
*जिस्म नही है मगर नाम का ,अक्षर अक्षर जिंदा है ।।*

*जीवन मे यह अमर कहानी , अक्षर अक्षर गढ़ लेना ।*
*शौर्य कभी सो जाएं तो ,राजा रणवीर सिंह और राणा प्रताप को पढ़ लेना ।।*


कटिया सिर अरु धड़ लड़े... ई तो राजपूती रीत!
अर्थ: सिर कटने के बाद भी धड़ का लड़ते रहना...यही तो राजपूतों की असली रीत है!
दुनिया में लोग मौत से डरते हैं,
और एक राजपूताने का इतिहास है जहाँ वीरों ने मौत को भी डरा कर रखा था।
जब तक तलवार हाथ में है, तब तक हार नहीं मानी जाती।

क्षत्रिय_ऑफ़_इंडिया
*देश के इतिहास में त्याग बलिदान और वीरता की सबसे मिसाल महान सपूत और वीर योद्धा महाराजा रणवीर सिंह रोहिला को उनकी पुण्यतिथि पर शत-शत नमन।*

 *उनकी जीवन-गाथा साहस, शौर्य, स्वाभिमान और पराक्रम का प्रतीक है, जिससे देशवासियों को सदा राष्ट्रभक्ति की प्रेरणा मिलती रहेगी*




*जय जय महाराजा रणवीर सिंह रोहिला*
*जय जय राजपूताना रोहिलखंड*
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ROHILA RAJPUT,THE GREAT WARRIOR OF INDIA

*रक्षा बंधन के दिन रोहिलखंड की वीर भूमि गंगा सी पवित्र राजपूतों के रक्त से रंजित और आक्रांताओं के काल की धरती रामपुर के किले में दिया था कठेहर रोहिलखंड नरेश,महाराजा रणवीर सिंह रोहिला ने अदम्य साहस और अद्भुत शौर्य का परिचय!,दिल्ली सुलतान नासीरुद्दीन बहराम उर्फ चंगेज की चालीस हजार की सेना को दी थी शिकस्त!*
*तथा घुटने टेकने पर मजबूर किया था दिल्ली सल्तनत का दुर्दांत खूंखवार सेनापति नसीरुद्दीन महमूद को*!
*और प्राणदान मांगने पर क्षात्र धर्म रक्षार्थ छोड़ा था।*
*चंगेज ने अवसर पाकर रक्षा बंधन के दिन दरबारी गोकुल चंद पांडे हरिद्वार को लालच देकर किले के द्वार खुलवा लिए*
 *धोखे के शिकार लगभग तीन हजार राजपूत निहत्थे ही लड़े,!आक्रमण कारियो के अस्त्र शस्त्र छीन छीन किया था शौर्य संग्राम दिल्ली सल्तनत की लगभग आधी गुलाम वंशी सेना को काट डाला था रोहिला राजपूतो ने!!अंत में चंगेज के खूंखवार दरिंदो ने अकेले में घेर लिया था रणवीर सिंह रोहिला को, जिन्हे आमने सामने की लड़ाई में दिल्ली सुलतान कभी नही हरा पाए थे किंतु वे उनके साहस से विस्मित हुए बिना नहीं रह सके ।रणवीर रणभूमि के वीर सपूत रक्त की अंतिम बूंद रहने तक संग्राम रत रहे और कतरा कतरा हो कर खेत रहे(सन 1254ईस्वी),उनका बलिदान रोहिलखंड के राजपूताना इतिहास में स्वर्णाक्षर दे गया!,समस्त राजपूत समाज रक्षा बंधन के दिन हुए इस बलिदान को एक शोर्य दिवस के रूप में मनाता आया है,यूट्यूब पर और अन्य सोसल मीडिया पर स्वतंत्र रोहिलखंड संस्थापक नरेश महाराजा रणवीर सिंह रोहिला की वीर गाथा दी हुई है,सभी क्षत्रिय जन अपने बच्चो को दिखाए ताकि सल्तनत काल में १२५४ ईसवी के इस इतिहास के धुंधले पृष्ठ भी उकेरे जा सके*
*, रक्षा बंधन को उनका बलिदान दिवस मनाया जाता है,समस्त क्षत्रिय समाज इस शौर्य दिवस पर उन्हे कोटि कोटि नमन करते हुए उनके। बताए मार्ग पर स्वाधीनता और स्वाभिमान से स्वधर्म रक्षार्थ जीने की शपथ लेता है,यह सच्चाई हमसे स्कूली शिक्षा में छुपाई गई किंतु इतिहास के दर्पण में सब सुरक्षित रहता है जिसे उजागर कर भावी पीढ़ी को बताना ही हरेक क्षत्रिय का नैतिक दायित्व है अतः आप सभी क्षत्रियों से निवेदन है कि भावी पीढ़ी को सच्चाई बताए और स्वाभिमान से जीना दिखाए*
*सूर्य वंशी निकुंभ क्षत्रिय महाराजा रणवीर सिंह रोहिला का जन्म हिंदूवा सूर्य महाराज पृथ्वी राज चौहान के पतन के बाद दिल्ली सल्तनत के बढ़ते कदमों के बीच ऐसे समय में सन१२०४ईस्वी में कठेहर रोहिलखंड की राजधानी रामपुर के किले में राजा त्रिलोक सिंह के यहां हुआ था, जब सभी राजपूत शक्तियां क्षीण और तितर बितर हो चुकी थी,इस्लामिक आक्रांता मध्य भारत की ओर दमन करते हुए आगे बढ़ते रहते थे।।,रणवीर सिंह रोहिला का विवाह विजय पुर सीकरी की राजकुमारी तारा देवी से हुआ तथा पच्चीस वर्ष की आयु में रामपुर की गद्दी पर विराजमान होकर इस्लामीकरण पर रोक लगाई ।। तीस सालों तक दिल्ली सुलतानो को धूल चटाई किंतु रक्षा बंधन के दिन शिव मंदिर गए राजपूतों को रक्षा सूत्र बंधवाते हुए नसीरुद्दीन बहराम ने गोकुल चंद पांडे के द्वारा किले के द्वार खोलने पर घेर लिया और फिर होगया अद्भुत शौर्य संग्राम*
*विस्तार भय से संक्षिप्त गाथा वर्णित है जिसे चाटुकार मुगल कालीन और ब्रिटिश इतिहास कारो ने छिपाया*

*जय जय राजपूताना रोहिलखंड*
*जय क्षत्रिय सम्राट महाराजा रणवीर सिंह रोहिला सनातन रक्षक*



नोट __यहां प्रदर्शित चित्र नेट द्वारा सोसल मीडिया से लिए गए केवल प्रतीकात्मक रूप है इनका लेखक से कोई संबंध नहीं है।।