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Wednesday, 30 September 2026

ROHILKHAND,KATHIYAWAD(SAURASHTRA) के संस्थापक थे काठी , कठेहहरिया,निकुंभ वंश, कठ गणराज्य के संस्थापक थे रोहिला क्षत्रिय ,जिन्होंने सिकंदर को घुटनों के बल झुकने को काठगढ़ के मंदिर में मजबूर कर दिया था।

*वर्तमान_क्षत्रिय कठेहरिया_राजपूत_शूरवीरो_क़ी_शौर्यगाथाएँ*

*कठ_काठी_कठोड़े_कुलठान_कठपाल_वर्तमान*
*कठेहरिया_ठाकुर ही काठी क्षत्रिय है*
*राजपूताना रोहिलखंड,*
*क्षत्रिय_राजपूताना_रोहिलखंड* 
योद्धा विलाप करते हैं, साम्राज्य का पतन होता है: सिकंदर महान की विरासत इतिहास के सबसे उल्लेखनीय साम्राज्यों में से एक के कड़वे-मीठे अंत को दर्शाती है। 323 ईसा पूर्व में सिकंदर की मृत्यु के बाद, उसने जो विशाल साम्राज्य बनाया था, जो ग्रीस से लेकर भारत तक फैला हुआ था, वह जल्दी ही बिखर गया। 32 वर्ष की कम उम्र में उसके अचानक निधन के बाद कोई स्पष्ट उत्तराधिकारी नहीं बचा, और उसके सेनापति, जिन्हें डायडोची के नाम से जाना जाता था, ने उसके क्षेत्रों पर नियंत्रण के लिए भयंकर युद्ध किया। एक बार एकीकृत साम्राज्य युद्धरत राज्यों में विभाजित हो गया, जिसने बेजोड़ सैन्य विजय के युग का अंत कर दिया। फिर भी, सिकंदर की विरासत युद्ध के मैदान से कहीं आगे तक चली गई। उसके अभियानों ने ग्रीक संस्कृति, भाषा और विचारों को पूरे ज्ञात विश्व में फैलाया, उन्हें स्थानीय परंपराओं के साथ मिलाया, जिसे हेलेनिस्टिक युग के रूप में जाना जाता है। साम्राज्य के पतन के बावजूद, कला, विज्ञान, दर्शन और राजनीतिक विचारों पर सिकंदर की दृष्टि और प्रभाव ने आने वाली सदियों तक सभ्यताओं को आकार देना जारी रखा, जिससे इतिहास के सबसे महान और सबसे प्रभावशाली व्यक्तियों में से एक के रूप में उसका स्थान सुनिश्चित हुआ।
काठी दरबार भव्यअतित कि श्रुंखला मे एक प्रसिद्ध  नाम,यह एक क्षत्रिय संघ जो वीरता  का वैभव,शौर्य का प्रतिक और अपने कठोर स्वाभीमानी गुणो से प्रसिद्ध  हे।
    इनके बारे मे यह भी कहा जाता हे कि,
"काल भी अगर छोड दे लेकिन काठी नहीं  छोडता"
    (Time (Death) Forgets But Not Kathi)
 थोडी कुछ शताब्दियो से उन्होने स्थिर  रुप से अपना निवासस्थान सौराष्ट्र को बना लिया,और इतना हि नहि युगो से पुराण प्रसिद्ध  सौराष्ट्र नाम इन्हि के कारण पलटकर 'काठीयावाड' नाम से प्रसिद्ध  हुआ  ऐसी  इन्होने इस विस्तार कि संस्कृति  मे अमीट छाप छोडी हे।
कठ गणराज्य वाहिक प्रदेश(हाल के पंजाब) मे प्रसिध्ध था इनकि राजधानी (संगल)सांकल थी,
एक उल्लेख मिलता हे कि इन पंजाब वासी कठो के नाम से  अफगानिस्तान के गजनी प्रांत मे ‘काटवाज’ क्षेत्र हे।
 कठ लोगों के शारीरिक सौदंर्य और अलौकिक शौर्य की ग्रीक इतिहास लेखकों ने भूरि-भूरि प्रशंसा की है, ग्रीक लेखकों के अनुसार कठों के यहाँ यह प्रथा प्रचलित थी कि वे केवल स्वस्थ एवं बलिष्ठ संतान को ही जीवित रहने देते थे। ओने सीक्रीटोस लिखता है कि वे सुंदरतम एवं बलिष्ठतम व्यक्ति को ही अपना शासक चुनते थे, ग्रिक इतिहासकारो ने कठो को कठोइ या काठीयन जैसे नामो से निर्देषीत किया हे, पाणिनी के ‘अष्टाध्यायी’ मे कठो का उल्लेख हे, पंतजली के महाभाष्य के मत से कठ वैंशपायन के शिष्य थे।इनकि प्रवर्तित वेदसंहिता कि शाखा ‘काठक’ नाम से प्रसिध्ध थी । काठक कापिष्ठल संहिता जैतारायण, प्रत्धर्न(दिवोदासी) ,भीमसेनी इन राजाओ का नाम मिलते हे जीन्होने राजसूय यज्ञ किया था।
   इन्होने कइ बार पोरस को हराया था।इसा पूर्व ३२६ मे सिकंदर की विशाल सेना हिंदकुश कि पर्वतमाला के इस पार अश्वक और अष्टको के राज्य को हराकर झेलम पार कर पोरस से भीडने आ पहोंची,पोरस का पुत्र मारा गया,पोरस ने संधी कर ली जीसमे सैनीक सहायता के बदले ब्यास नदी तक के आगे जीते जाने वाले प्रदेशो पर पोरस सिंकदर के सहायक के तौर पर शासन करेगा, इसके बाद अधृष्ट(अद्रेसाइ) ने बिना लडे आधीनता स्वीकार कर ली, बाद मे कठ के नगर पर सेना आ खडी हुइ, कठ स्वतंत्रता प्रेमी थे, जो अपने साहस के लिए सबसे अधीक विख्यात थे,उन्होने शकट व्युह रचकर सिंकदर कि सेना पर भीतर तक भीषण  आक्रमण किया और जिसमें  खुद सिंकदर हताहत हो गया, संधी अनुसार पोरस ने २०,००० सैनीको का दल सिंकदर कि सहायता मे भेजा जीसमे हाथी भी थे जीनसे शकट व्युह तुट सकता था, तब कठो कि पराजय मुमकिन हो पाइ, करीबन १७००० कठ मारे गये और कइ बंदि बनाए गये, वहा पर नारीयो ने जौहर भी किया था एसा उल्लेख भी कइ जगह हुआ हे।
कच्छ के पोलीटकल एजन्ट मेकमर्डो जो काफि प्रतिभावान विद्बान थे वे काठी क्षत्रियो से प्रभावित थे इन्होने काठीओ मे विरता का नैतिक गुण,शक्ति,मुख पर तेजस्वीता और स्त्री सन्मान कि भावना सबधे अधीक पाइ थी जीसकि उनके विवरणो द्वारा हमे जानकारी मीलती हे ।
   सूर्यवंशी राजा व्रुतकेतु ने माळवा मे राज्य स्थापीत किया था,जीनके बाद उनके वंशजो जो की मैत्रक कुल और कठगण(काठी)ओने सौराष्ट्र मे प्रस्थान किया ,काठी वहा से कच्छ और राजस्थान के कुछ क्षेत्र मे गये कच्छ मे उन्होने अंजार,बन्नी,कंथकोट,कोटाय,भद्रेश्वर,पलाडीया आदि विस्तारो और कुछ सिंध और द.राजस्थान मे संस्थान और छोटी बडी जागीर स्थापीत कर दि और मैत्रक राजवंश ने वलभीपुर, तळाजा,वळा पंथक जैसो क्षेत्रो मे वर्चस्व जमाया|वलभी कि अपनी सवंत, मुद्रा और विद्यापीठ थी।मैत्रक विजयसेन ‘भटार्क’ ने वलभी साम्राज्य कि स्थापना कि थी। कुछ समय बाद यह वंश ‘वाळा राजकुल’ से जाना गया, जीसमे कइ समर्थ महापुरुषो ने जन्म लीया यह वाळा कुल भी काठी नाम से हि परापुर्व से जाना जाता था।
काठीओ का नाम पृथ्वीराज और कनोज के युध्ध मे उल्लेखीत हुआ हे, और अणहिलपुर को अपनी मरजी पुर्वक सहायता करते थे ।
और इधर कच्छ मे जाडेजा राजपूतो से अविरत संघर्षो के चलते काठीओ ने कच्छ छोडकर सौराष्ट्र मे आगमन किया ।
गढ अयोध्या निकाश भयो -गादि ठठ्ठा मुलथान
सूर्यदेव स्थापन कर्या-गढ मुलक फेर थान
        -रचनाःबडवाजी(बल्ला राजवंश व्याख्यान माला)
इस पंक्ति मे दो प्रसिध्ध सूर्य मंदिरो के स्थानो का उल्लेख हे, मुलतान(मुलःस्थान,हाल पाकिस्तान) और थान(स्थान यह नाम भी वाळा और काठीओ के सौराष्ट्र मुलस्थान की याद मे हि पडा और जो काठीयावाड मे सुरेन्द्रनगर जीले मे स्थीत हे।)
   -मुलतान का सूर्यमंदिर अब अवशेषो मे हि शेष हे पहेले वो ९ मी सदि तक विद्यमान था, परंतु थान का सूर्य मंदिर अपनी मग ब्र्हामणो कि शील्प शैली मे सज्ज होलबूट और मुगुट पहने भगवान सूर्यनारायण कि मनोहर प्राचिन प्रतिमा के साथ मौजुद हे,वेसे तो यह मंदिर पौराणीक हे किंतु इसका जिर्णोद्वार और किल्लेबंध रचना काठीओ द्वारा हुइ और बाद मे यह मंदिर सूरजदेवल के नाम से प्रसिध्ध हुआ। भारत के आराजक युग मे गुलाम,खिलजी,तुगलक,सैयद,लोदि,सुरी और उसके बाद मुगल इस तरह एक के बाद एक यवन साम्राज्य स्थापीत हुए, जो पुर्वकाल मे अनेक गणराज्यो मे बटा हुआ होकर भी एक था,वह भारत खंडीत हो रहा था ।12 वि शताब्दि के बाद से इस मंदिर पर कइ भीषण हमले होने से यह मंदिर तुटता रहा और फिर से उसका जिर्णोद्वार होता रहा । जीससे यह स्थान आस्था एवं संग्राम की भुमी हे। इनके बाद अंग्रेज और मराठा कि जुल्मी पेशकदमी और धाड से प्रदेश पुरा आंक्रत था तब काठी क्षत्रियो ने अच्छी तरह से युध्ध-रणनीती,संध बनाकर सौराष्ट्र के प्रांतो को जिता और अविरत युध्ध और संघर्ष किया *‘जितस्येवसुधाकाम्ये दैदिप्य सूर्य नभे’* और जीत के साथ नभ मे दिपमान सूर्य के भांती चमकते रहे इसके चलते मराठाओ ने हि इस प्रदेश को काठीयावाड नाम घोषीत किया,यह एक इतिहास कि विरल घटना होगी जिसमें आक्रांताओ द्वारा जन समुदाय से प्रतिकार होने पर प्रदेश का नामाभिधान हो गया।
काठी क्षत्रीयो का प्रत्येक व्यक्ति गण हे और इनकि संघीय विचारधारा रहि हे, काठीयावाड मे उन्होने अन्य क्षत्रीयो को अपने साथ अपनी परंपरा मे जोडा और संघीय शक्ति मजबुत कि,तथा बगसरा दरबार वालेरावाळा ने १६ वी सदि के उतराध मे सहस्त्र भोज यज्ञ कर लग्न और रीवाज संबधी चुस्त प्रथा का निर्माण संघ को और मजबुत करने के लिए किया तथा जनपद युगीन क्षत्रिय परंपरा को जीवंत रखी।
और इनमे समविष्ट अन्य क्षत्रीय इस प्रकार हे,
राव धाधल के पुत्र बुढाजी और बुढाजीके पुत्र कालुसीह थे.वी.सं १४६६ और शा.शके 1328मे जब कालुसींहजी धाधल अचलदास खीचीके साथ युद्ध कर रहे थे तब वासुकी अवतार गोगाजीने कालुसींह को युद्धमे सहायकी थी. कालुसींहने अपना कर्तव्य नीभाते हुवे वासुकीदेवको अपने इस्टदेव माना. कालुसिंहने फीर पांच वार्ष तक अपनी जमीन पर राज कीया. बादमे कालुसीह धाधल शाके 1333 और वी.सं 1471मे अपना पुरा सेन्य और संघ लेकर द्धवारका की यात्रा कि . तब द्धावरका की गादी पे वाढेर शाखाके के राठौर का राज था जो कालुसींहकी पुर्वज राव सिंहाजी के वंशज थे. एक मास तक स्नेहसे द्धारका रहनेके बाद वापस मारवाड लोटने चले. कालुसिहजी मध्य सौराष्ट्रके पंचाल प्रदेशमे शाके 1333 मागसर सुद 9 के पेहले प्रोहर मे कालुसीह और उनका सेन्य थानगढके पास लाखामाची गाव पोहचे. कच्छके जामके साथ युद्धके हेतु काठी राजपुत तब लाखामाचीमे युद्धकी तयारी कर रहे थे.कालुसीहने काठी राजपुतो को जामके साथ चल रहे युद्धमे सहायता की और वासुकीदेव की आज्ञा से कालुसीह काठी राजपुत संघ मे शामील हुए. 

"कच्छ ना जाम ते कारमा आविया लाविया फ़ौज ते लाख लारा । 
एहना बाप नो वैर वालन वटा पत्तावत गोतता खंड पारा ।। 
सबल सौरठ वीसे साथ ने सांभली द्वेष थी वेरिया दाव दाख्यो ।
 ते दी खत्री वट कारने आफल्या अड़ी खम्भ धरा स्तम्भ धांधले धरम राख्यो॥
  ओखा के वेरावळजी वाढेर(राठोर) भी काठी संघ मे शामील हुए थे इनसे गीडा, तीतोसा, तकमडीया, भांभला इन पेटा राठोड कुल कि पेटा शाखा का उदभव हुआ, जालोरगढ के राजा विरमदेव सोनागरा(चौहान) के पुत्र केशरदेव इनसे जळु शाखा का उदभव हुआ, परमारो राजपूतो मे से बसीया,विंछीया,माला,जेबलीया, और हळवद राजभायात मालसिंहजी जाला से खवड शाखा का उदभव हुआ, कंबध युध्ध करने वाला प्रतापी विर नागाजण जेठवा बचपन मे अपने काठी मामा के यहा पले बडे , इनसे वांक और वरु शाखा का उदभव हुआ तथा चावडा राजपूत और कइ क्षत्रियो को अपने साथ जोडकर संघ को सशक्त किया।इस प्रकार संघ कि शक्ति से वे अपना अस्तीत्व कायम रख पाए ।
काठी दरबारों ने युद्ध के लिए अश्व की एक ब्रीड तैयार की थी जिसका नाम काठी ब्रिड हे है। ये अश्व काफी मामलो में बाकी ब्रीड से आगे है।। महाराणा प्रताप का अश्व चेतक भी एक काठी घोडा था।

कइ लेखक विदो ने इन विरबाहुओ के शौर्य का बखान किया हे यहा प्रसिध्ध लेखक स्व.चंद्रकांत बक्षी के शब्दो मेःकाठी ज्ञाती संख्या मे कम फिर भी शूरविर कोम हे, कम संख्या मे होकर भी पुरे प्रदेश को काठीयावाड घोषीत कर सके वह उनकि शुरविरता,कुनेह,और लडायक नीती का उच्चत्म प्रमाणपत्र हे और यह सिध्धी हासिल करने मे कइ काठी विर,संत और सतिओ के बलीदान हे।

सौजन्यः काठी संस्कृतिदीप संस्थान☀

सदर्भः
 -Arrian, Anabasis of Alexander, V.22-24
-Bharat Discovery
 -An Inquiry Into the Ethnography of Afghanistan By H. W. Bellew page17 
-कर्नल टोड कृत राज. का इतिहास & Travels in -Western India
-जे. डबल्यु. वोटसन
-काठी संस्कृति अने इतिहास-डो.श्री प्रद्युमनभाइ खाचर
-काठीओ अने काठीयावाड -डो.श्री प्रद्युमनभाइ खाचर
-महाविरसिंह छिंताबा(भीलवाडा)
-पथीक मेगेजीन -के.का शास्त्री
-द.श्री भोजवाळा चुडा-सोरठ
-काठी अभ्युदय
-macmurdo. Trans. Lit. soc.

*ठाकुर_राणा_प्रताप_सिंह उर्फ दीपक_सिंह_कठेहरिय श्री_राष्ट्रीय_राजपूत_करणी_सेना_सम्भल_उत्तर_प्रदेश*

Saturday, 12 September 2026

THE FOUNDERS OF RAJPUTANA KATHHEHAR ROHILKHANND

*KSHTRIYA SAMRAT MAHARAJA RANVEER SINGH ROHILA,THE FOUNDER OF ROHILKHANND*
🙏 क्रमबद्ध, विस्तृत एवं प्रभावशाली ऐतिहासिक जीवन परिचय प्रस्तुत है।
(लेखन शैली: संतुलित – इतिहास + प्रेरणात्मक, शोधपरक संरचना सहित)
MAHARAJA RANVEER SINGH ROHILA 
कठेहर–रोहिलखण्ड के अजेय क्षत्रिय शासक
*(जन्म: 25 अक्टूबर 1204 ई., )* ( बलिदान दिवस रक्षा बंधन के दिन सन1254ईस्वी : 13वीं शताब्दी मध्य)*
1. प्रस्तावना
भारतीय इतिहास में अनेक ऐसे वीर क्षत्रिय हुए जिन्होंने सीमित संसाधनों में भी विदेशी आक्रमणकारियों का डटकर सामना किया। कठेहर–रोहिलखण्ड (वर्तमान उत्तर प्रदेश का उत्तरी भाग) के पराक्रमी शासक महाराजा रणवीर सिंह रोहिला उन्हीं में से एक थे। उन्होंने दिल्ली सल्तनत के विस्तारवादी अभियानों का विरोध करते हुए स्वतंत्रता और क्षात्र धर्म की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व बलिदान कर दिया।
उनका जीवन केवल एक क्षेत्रीय शासक की कथा नहीं, बल्कि आत्मसम्मान, युद्धनीति और राष्ट्ररक्षा का आदर्श उदाहरण है।
भाग 1
काठी, कठेहर और काठियावाड़ का ऐतिहासिक आधार
2. सूर्यवंश और निकुम्भ वंश
महाराजा रणवीर सिंह रोहिला सूर्यवंशी क्षत्रिय परंपरा से संबंधित माने जाते हैं। परंपरागत वंशावली के अनुसार यह वंश इक्ष्वाकु कुल से उत्पन्न हुआ, जिसे भगवान राम की वंश परंपरा माना जाता है। निकुम्भ नामक पराक्रमी राजा से निकुम्भ वंश की स्थापना मानी जाती है।
इस वंश की एक शाखा “कठ” या “काठी” कहलायी।
3. कठ गणराज्य और सिकंदर काल
ईसा पूर्व 326 में जब Alexander the Great ने उत्तर-पश्चिम भारत पर आक्रमण किया, उस समय रावी नदी के तट पर कठ गणराज्य का उल्लेख मिलता है। इसकी राजधानी “सांकल” (वर्तमान स्यालकोट) बताई जाती है।
यूनानी लेखकों ने कठों (Kathoi/Kathaeans) की वीरता, शारीरिक सौष्ठव और युद्ध कौशल की प्रशंसा की है। कुछ ग्रंथों में उल्लेख है कि वे स्वस्थ और बलिष्ठ संतानों को ही जीवित रखते थे तथा सर्वश्रेष्ठ योद्धा को शासक चुनते थे।
संस्कृत व्याकरणाचार्य Panini की अष्टाध्यायी में कठों का उल्लेख मिलता है। महाभाष्यकार Patanjali ने भी कठों का उल्लेख किया है।
4. काठियावाड़ और कठेहर का विकास
सिकंदर के आक्रमणों के पश्चात कठ क्षत्रियों के विभिन्न समूहों ने भारत के विभिन्न क्षेत्रों में प्रवास किया—
एक शाखा सौराष्ट्र गई — जहाँ “सौराष्ट्र” क्षेत्र “काठियावाड़” नाम से प्रसिद्ध हुआ।
एक शाखा उत्तर भारत के पंचाल क्षेत्र में बसी — जो आगे चलकर “कठेहर खण्ड” या “रोहिलखण्ड” कहलाया।
एक शाखा नेपाल क्षेत्र में गई — जहाँ “कटायत” परंपरा का उल्लेख मिलता है।
काठी वीरों के विषय में कहावत प्रचलित हुई:
“काल भी अगर छोड़ दे, लेकिन काठी नहीं छोड़ता।”
भाग 2
कठेहर राज्य की स्थापना
5. रामपुर की स्थापना
लगभग 7वीं–10वीं शताब्दी के मध्य कठेहर क्षेत्र में स्थायी राज्य की स्थापना हुई।
राजा रामसिंह (रामशाह) ने 909 ईस्वी (विक्रमी 966) में रामपुर नगर को राजधानी के रूप में विकसित किया। यह क्षेत्र अहिक्षेत्र (वर्तमान रामनगर के निकट) के आसपास स्थित था।
इसके बाद 11 पीढ़ियों तक कठ क्षत्रियों ने शासन किया।
वंशावली में उल्लेखित प्रमुख नाम:
रामशाह (रामसिंह)
बीजयराज
करणचन्द
विम्रहराज
सावन्त सिंह
जगमाल
रणवीर सिंह
धिंगतराम
गोकुल सिंह
महासहाय
त्रिलोकचन्द
नौरंग देव
भाग 3
महाराजा रणवीर सिंह रोहिला
6. जन्म और व्यक्तित्व
जन्म: 25 अक्टूबर 1204 ईस्वी
विक्रम संवत: 1261
स्थान: रामपुर, कठेहर-रोहिलखण्ड
गोत्र: वशिष्ठ
वंश: निकुम्भ वंशी कठेहरिया क्षत्रिय
वे युद्धकला, घुड़सवारी और शस्त्र संचालन में निपुण थे। उनके साथ 84 कवचधारी रोहिला वीरों की विशिष्ट सेना रहती थी।
7. दिल्ली सल्तनत से संघर्ष
13वीं शताब्दी में दिल्ली में गुलाम वंश का शासन था। उस समय सुल्तान Nasiruddin Mahmud नाममात्र का शासक था, जबकि वास्तविक सत्ता Ghiyas ud din Balban जैसे शक्तिशाली अमीरों के हाथों में थी।
1253–1254 ईस्वी में दोआब, कठेहर और शिवालिक क्षेत्रों में दमनकारी अभियान चलाया गया। स्थानीय शासकों और जनता पर अत्याचार हुए।
रोहिलखण्ड में विद्रोह भड़क उठा और दिल्ली सल्तनत के सूबेदार की हत्या कर दी गई।
8. निर्णायक युद्ध
रामपुर और पीलीभीत के मध्य मैदान में दिल्ली सल्तनत की लगभग 30,000 सेना और रणवीर सिंह के नेतृत्व में रोहिला योद्धाओं के बीच भयंकर युद्ध हुआ।
परंपरा के अनुसार:
84 कवचधारी रणधेलवंशी वीरों ने असाधारण पराक्रम दिखाया
शत्रु सेना के हाथी-घोड़े परास्त हुए
नासिरूद्दीन को बंदी बनाया गया
क्षात्र धर्म के अनुसार शरणागत को अभयदान देकर रणवीर सिंह ने उसे छोड़ दिया।
9. विश्वासघात और बलिदान
दिल्ली दरबार ने पुनः षड्यंत्र रचा।
दरबारी पंडित गोकुलराम पाण्डेय को लालच देकर विश्वास में लिया गया।
रक्षाबंधन के दिन, जब शिव मंदिर में शस्त्र पूजा हेतु राजपूत निःशस्त्र थे, तब किले का द्वार खोल दिया गया। भारी सेना ने आक्रमण किया।
घमासान युद्ध हुआ।
महाराजा रणवीर सिंह वीरगति को प्राप्त हुए।
महारानी तारादेवी सती हो गईं।
उनके भाई सूरत सिंह शेष परिवार सहित सुरक्षित स्थान पर चले गए।
भाग 4
ऐतिहासिक विरासत
रामपुर के किले के अवशेष
सती तारादेवी मंदिर
स्थानीय परंपराएँ और वंशज
महाराजा रणवीर सिंह ने अंतिम सांस तक पराधीनता स्वीकार नहीं की। उनका बलिदान रोहिलखण्ड की स्वतंत्र चेतना का प्रतीक बना।
निष्कर्ष
महाराजा रणवीर सिंह रोहिला का जीवन भारतीय क्षत्रिय परंपरा, स्वाभिमान और स्वतंत्रता की रक्षा का सशक्त उदाहरण है।
उन्होंने सीमित संसाधनों में भी दिल्ली सल्तनत की शक्तिशाली सेना का सामना किया और क्षात्र धर्म का पालन करते हुए शरणागत को अभयदान दिया — यद्यपि अंततः उन्हें विश्वासघात का सामना करना पड़ा।
उनकी गाथा इतिहास के उन पृष्ठों में स्थान पाने योग्य है जहाँ क्षेत्रीय स्वतंत्रता संग्राम और स्थानीय शौर्य को उचित सम्मान दिया जाए।
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Sunday, 9 August 2026

ROHILA RAJPUT GEN Z AND DIGNITY

*ROHILA IS A RAJPUT CLAN DONOT BE CONFUSED WITH ANY OTHER OPTION*⚔️🚩

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_रोहिला क्षत्रिय: इतिहास, अस्मिता, अस्तित्व और युवाजन चेतना की नई दिशा_

रोहिला क्षत्रियों का इतिहास केवल एक जातीय पहचान की कहानी नहीं, बल्कि संघर्ष, विस्थापन, पुनर्गठन और स्वाभिमान की लंबी यात्रा है। रोहिला क्षत्रिय सदियों तक राजनीतिक, सामाजिक बिखराव और पहचान के संकट से गुजरते रहे फिर भी अपने मूल-क्षत्रिय-राजपूत परंपरा-को पूरी तरह नहीं भूले।

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🛡️ *1. ऐतिहासिक आधार और विस्थापन की पीड़ा*

कठेहर रोहिलखंड में दसवीं सदी से लेकर लगभग चार सौ साल तक क्षत्रियों का शासन रहा, जिनमें लगभग अठारह वंशों व गोत्रों के राजपूतों की शासन व्यवस्था बनी रही। इस क्षेत्र पर दिल्ली सल्तनत ने लगातार आक्रमण करके नरसंहार किया, किंतु स्थानीय क्षत्रियों ने हार नहीं मानी। अत्यधिक दमनकारी आक्रमणों से बड़ी शक्ति का ह्रास होता गया, वस्तुतः कुछ क्षेत्र छूटते भी गए, परंतु समस्त रोहिलखंड के रोहिला राजपूत बार संगठित होकर लोहा लेते रहे, अनेक बार धूल चटाई तथा स्वयं को स्वतंत्र घोषित कर आगे बढ़ते गए। दिल्ली सल्तनत कठेहर रोहिलखंड क्षेत्र पर पूर्णतः कब्जा नहीं कर पाई। लगातार होते रहे इन आक्रमणों के कारण रोहिला राजपूतों की शक्ति क्षीण होती रही और विस्थापन भी होता रहा। अंततः अठारहवीं सदी के आरंभ में कठेहर रोहिलखंड क्षेत्र पर बाहरी आक्रांताओं का आधिपत्य हो गया। उन्होंने क्षत्रियों के संपूर्ण इतिहास को नष्ट कर दिया तथा अपनी शासन व्यवस्था कायम रखने के लिए पूरा इतिहास बदल डाला। उन्होंने सल्तनत काल से लेकर मुगल काल तक क्षत्रियों द्वारा किए गए कार्यां तथा आत्मरक्षार्थ किए गए युद्धों और उनके संपूर्ण बलिदान पर पर्दा डालते हुए अपना इतिहास लिखा। कठेहर रोहिलखंड संस्थापक क्षत्रिय राजाओं के स्थान पर लिखा गया कि रोहिलखंड की स्थापना उनके काल में हुई। इस प्रकार अठारहवीं सदी से पहले का क्षत्रिय इतिहास विलुप्त हो गया। जो इतिहास मुगल काल में लिखा गया, ब्रिटिश काल में भी उसी की पुनरावृत्ति हुई, सच्चाई को यहां भी उल्लिखित नहीं किया गया और रोहिलखंड को पश्तूभाषी अफगानों द्वारा स्थापित लिख दिया गया। मुगल कालीन इतिहासकारों द्वारा बड़ी चतुराई से बदले गए इसी इतिहास को हमें आज तक पढ़ाया जाता रहा है। जबकि मध्यकालीन क्षत्रिय इतिहास में रोहिला क्षत्रियों का उल्लेख कई जगह मिलता है, आठवीं सदी के वर्ष 837ईस्वी में उत्कीर्ण मंडोर के किले में स्थित बाउक के शिलालेख के अनुसार वहां के प्रतिहार शासक हरिश्चंद्र को मिली रोहिलाद्वयंक उपाधि का वर्णन राजपुताने के इतिहास नामक ग्रन्थ में पंडित गौरी शंकर हरिश्चंद ओझा ने पृष्ठ संख्या 147 पर किया है। आल्हाखण्ड काव्य, बुंदेलखंड के हमीरपुर गजेटियर और पृथ्वीराजरासो, इतिहासकार ठाकुर अजीत सिंह परिहार की पुस्तक क्षत्रिय वर्तमान तथा मध्यकालीन भारत आदि में रोहिला राजपूतों की पूर्व से ही उपस्थिति और बहादुरी का वर्णन किया गया है। बीकानेर राजवंश के संग्रहालय की एक क्षत्रियोदय नामक पुस्तक के पृष्ठ संख्या 267 पर रोहिलाध् रूहेला राजवंश को एक उच्च कोटि का राजपूत राजवंश लिखा गया है।

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📜 *2. रोहिला क्षत्रिय पहचान का सरकारी अभिलेखों में ऐतिहासिक प्रमाण*

सन् 1930-31 की जातिगत जनगणना एक महत्वपूर्ण पड़ाव साबित हुई। उस समय संगठनों के अभाव के बावजूद भी लोगों ने स्वयं को “रोहिला क्षत्रिय” के रूप में उल्लिखित कराया।  
यह तथ्य स्पष्ट करता है किः  
यह पहचान स्वाभाविक और ऐतिहासिक है। इसे रोहिला क्षत्रियों ने स्वयं के प्राचीन समृद्ध इतिहास के कारण ही स्वीकार किया, किसी बाहरी दबाव में नहीं। यहा�स सबसे पहले ऐतिहासिक पहचान रोहिला क्षत्रिय का उल्लेख हुआ। इससे पहले रोहिला को इतिहास में पश्तून भाषी अफगान के नाम से प्रचलित किया जाता रहा था। जबकि कठेहर रोहिलखंड तथा रोहिला शब्द अफगानों से पूर्व ही अस्तित्व में रहा तथा रोहिला क्षत्रिय भी उल्लिखित रहा।

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⚔️ *3. संगठन और पुनर्जागरण की प्रक्रिया*

1930 के दशक से लेकर स्वतंत्रता के बाद तक रोहिला क्षत्रियों ने धीरे-धीरे संगठित होने का प्रयास किया। विभिन्न संगठनों ने इतिहास संकलन, गोत्र सूची निर्माण और बिखरे परिवारों को जोड़ने का कार्य किया। जगाधरी में रोहिला राजपूत सभा नामक संगठन ने शोध परक ऐतिहासिक ग्रन्थ लिखवाने के लिए राजस्थान से वंशावली लिखने वाले भाट को आमंत्रित कर राजपूतों की बहियां निकलवाई और ‘‘इतिहास रोहिला राजपूत‘ नामक पुस्तक का सन1935 में प्रकाशन कराया। जिसका प्रभाव यह हुआ कि समस्त बिखरी हुई रोहिला राजपूत शक्तियां एकजुट होने लगी। इसी समय के आस पास पानीपत में भी डॉक्टर के सी सैन ने भी ’इतिहास रोहिला राजपूत नाम की पुस्तक लिखी। इनके प्रभाव से रोहिला क्षत्रिय और भी सशक्त तथा गौरवान्वित हुए। यह ऐतिहासिक आधार संगठित होने का कारण भी बना।  
1980 के दशक में यह प्रयास एक सशक्त आंदोलन के रूप में उभरा, जब रोहिला क्षत्रिय पहचान को सुरक्षित रखने के उद्देश्य से बड़े राष्ट्रीय स्तर के संगठन के गठन पर विचार हुआ। सन 1984-1986 तक अखिल भारतीय रोहिला क्षत्रिय विकास परिषद नामक संगठन का गठन हो गया, औपचारिक रूप से सन 1988 में पूर्ण रूपेण परिषद की स्थापना हुई तथा इस संगठन को अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा से संबद्ध होने का गौरव प्राप्त हुआ (अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजर्षी कुंवर श्री पाल सिंह जी महाराजा सिंगरामऊ रियासत जौनपुर का पत्र दिनांक 10 सितंबर 1989 ईस्वी) और रोहिला क्षत्रियों को समस्त क्षत्रिय राजपूत समाज का एक अभिन्न अंग माना। रोहिला क्षत्रियों को समस्त क्षत्रिय जनसमूह के मध्य विशेष सम्मान दिया गया।  
यह संगठन रोहिला क्षत्रिय शिरोमणि डॉक्टर कर्ण वीर सिंह रोहिला जी के अटूट प्रयास के कारण विकसित हो पाया आज पूरे भारत में रोहिला क्षत्रियों का यह सबसे पुराना तथा लोक प्रिय संगठन है।  
इस संगठन की स्थापना का उद्वेश्य कोई अल्पकालिक सुविधा, लाभ अथवा क्षणिक पहचान साबित करना नहीं था। इसका दृष्टिकोण दूरगामी व रोहिला क्षत्रियों के लिए पुनरोत्थान तथा भावी पीढ़ी के ऐतिहासिक स्वाभिमान को शाश्वत रखने के लिए था। बिखरे हुए रोहिला क्षत्रियों को विस्थापन के पश्चात से अपने पूर्वजों के इतिहास के अल्प ज्ञान के कारण अनेक कार्यों से सम्बंधित जातियों में विलीन होने से बचाने के लिए था। रोहिला क्षत्रियों को उनकी मूल ऐतिहासिक पहचान दिलाने और एक सुनहरा भविष्य निर्माण करना संगठन का उद्वेश्य और मूलभूत सिद्धांत रहा है। परिषद की इस दूरगामी सोच से प्रभावित होकर रोहिला क्षत्रियों का एक महासम्मेलन सहारनपुर में दिनांक 22 अक्टूबर 1989 को आयोजित हुआ जिसमें देश के कोने कोने से लगभग दस हजार रोहिला क्षत्रिय प्रतिनिधि तथा अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा के पदाधिकारी भी सम्मिलित हुए। इसके द्वारा रोहिला क्षत्रियों को संगठित करने में बड़ा बल मिला।  
ऐतिहासिक अभिलेखों का संकलन किया गया, रोहिला क्षत्रियों के क्रमबद्ध इतिहास का पुनर्लेखन और प्रकाशन कराया गया। सामाजिक और सांस्कृतिक गौरव को पुनर्स्थापित किया गया, सार्वजनिक स्थलों पर अनेक माध्यम से पहचान को स्थायित्व मिला। यह काल रोहिला क्षत्रियों के पुनरोत्थान का स्वर्णिम चरण कहा जा सकता है।

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🏹 *4. राजनीतिक हस्तक्षेप और रोहिला राजपूत क्षत्रिय पहचान का पुनः संकट*

समय के साथ सन 1995 में कुछ क्षेत्रों में “रोहिला” नाम को अन्य जातियों के साथ जोड़कर उनमें शामिल करने के प्रयास हुए। जबकि रोहिला क्षत्रियों से उन जातियों का कोई ऐतिहासिक और सामाजिक संबंध ही नहीं था। यह स्थिति कई कारणों से चिंताजनक है क्योंकि ऐसे प्रयास कई बार होते रहे है तथा आज भी ऐसे कार्य किए जा रहे हैं। अल्पकालिक राजनीतिक लाभ के लिए की गई ऐसी पहल रोहिला क्षत्रियों की ऐतिहासिक पहचान को कमजोर कर सकती है तथा अस्तित्व अस्थिर हो सकता है।

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💻 *5. वर्तमान परिदृश्य: डिजिटल युग और युवा शक्ति*

आज का युग सूचना, तकनीक और ’कृत्रिम बुद्धिमत्ता (ए.आई) का है। इस परिवेश में समाज की प्रगति का आधार जातीय वर्गीकरण की सोच नहीं बल्कि शिक्षा, कौशल विकास, आर्थिक आत्मनिर्भरता, सामाजिक जागरूकता एवं आधुनिक तकनीकी है। युवा पीढ़ी अब इन तथ्यों को समझ रही है, वह अपनी पहचान पर गर्व करते हुए मुख्यधारा में सम्मानजनक स्थान प्राप्त करना चाहती है। आज की युवा पीढ़ी की आवश्यकता है उसके बढ़ते कदमों को गति मिलना न कि किसी अल्पकालिक लाभ हेतु उसे भ्रमित करना।

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🔥 *6. युवाजनचेतना की आवश्यकता*

आज सबसे बड़ी आवश्यकता है युवा ही वह शक्ति है जोः इतिहास को समझ सकती है। वर्तमान की चुनौतियों का विश्लेषण कर सकती है। भविष्य की दिशा तय कर सकती है। युवाओं को चाहिए कि वे रोहिला क्षत्रिय इतिहास का सही अध्ययन करें, भ्रम और मिथ्या प्रचार से दूर रहें, सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म का सकारात्मक उपयोग करें, शिक्षा, रोजगार और नवाचार पर ध्यान केंद्रित करें, दूरगामी सोच बनाए कि आज तीब्रता से बदल रही दुनिया में कल क्या चाहिएगा इस पर गहन विचार करते हुए आगे बढ़े। जहां मानव रहित कार्य प्रणाली आएगी, बढ़ती जनसंख्या में रोहिला क्षत्रिय राजपूत की युवा जनशक्ति की भागीदारी कितनी होंगी इन्हीं जैसे ज्वलंत प्रश्न विचार हेतु सम्मुख खड़े है उन पर मंथन करे।

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🤝 *7. संगठनों की भूमिका: जिम्मेदारी और दिशा*

सामाजिक संगठनों का दायित्व केवल पहचान की रक्षा तक सीमित नहीं, बल्कि भविष्य निर्माण भी है। उन्हें चाहिए किः वे राजनीतिक स्वार्थों से ऊपर उठें पारदर्शी और सामूहिक निर्णय लें, युवाओं को नेतृत्व में स्थान दें, शिक्षा, रोजगार और सामाजिक उत्थान के कार्यक्रम चलाएं न कि भावी पीढ़ी को स्वाभिमान खोकर विभिन्न जातियों में विलीन होने की मुहिम चलाए। जो दूरगामी सोच रखते हुए रोहिला क्षत्रिय सामाजिक संगठन बने थे उसी सोच पर स्थिर रहे। वर्तमान में हो रही जनगणना में भी रोहिला क्षत्रिय का उल्लेख किया जाए इसके लिए सभी संगठनों को आगे आकर जनमानस को संज्ञानित कराना होगा ताकि पूर्व की भांति रोहिला क्षत्रिय पहचान की प्रविष्टि सरकारी अभिलेख में हो तभी अस्तित्व को स्थिरता तथा शासकीय पहचान मिल सकेगी।

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*निष्कर्ष* रोहिला क्षत्रिय समाज का इतिहास हमें सिखाता है कि परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, यदि समाज अपनी जड़ों से जुड़ा रहे और भविष्य के प्रति सजग हो, तो उसका अस्तित्व सुरक्षित रहता है। आज आवश्यकता हैकृ एकता, शिक्षा, जागरूकता और युवाओं के नेतृत्व में नव निर्माण की। यदि हम अतीत से प्रेरणा लेकर वर्तमान में सही निर्णय लें, तो भविष्य न केवल सुरक्षित होगा, बल्कि गौरवशाली भी बनेगा। “वक्त बदलता है, परंतु पहचान और स्वाभिमान तभी तक जीवित रहते हैं जब तक उन्हें सहेजने वाली चेतना जागृत रहती है।”




*प्रस्तुति - समय सिंह पुंडीर*

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Tuesday, 4 August 2026

ASHWAK GANRAJY KE RAJA ASHVKARAN ROHILA SANKAL DURG

RAJPUTANA ROHILKHAND

जय जय राजपूताना बुंदेलखंड,रोहिलखंड,बघेलखंड,कुमायुखंड उत्तराखंड (भरतखण्ड)
क्षत्रिय अस्तित्व न्याय मोर्चा सभी क्षत्रिय साम्राज्य को खोज खोज कर सामने लाने की मुहिम में है बहुत कुछ छिपाया गया और हमे नही पढ़ाया जाता किंतु क्षत्रिय कभी मिटता नही वह शास्वत है सनातन है उसकी रक्षा स्वयं सृष्टि रचयिता करता है ,क्षत्रिय अस्तित्व न्याय मोर्चा किसी भी क्षत्रिय के अस्तित्व को संरक्षित करने का कार्य कर रहा है,कितना हास्यास्पद है कि वैदिक कालीन उत्तरी पांचाल में स्थापित राजपूताना रोहिलखंड के क्षत्रिय के स्थान पर आक्रांता अफगानों का इतिहास पढ़ाया जाता है अट्ठारहवीं सदी से आगे राजपूत इतिहास को गायब ही कर दिया गया विक्की पीडिया से भी हटा दिया गया है किंतु अब और अन्याय इतिहास के साथ सहन नही किया जायेगा।।

रोहिल्ला उपाधि -

 शूरवीर, अदम्य - साहसी विशेष युद्ध कला में प्रवीण, उच्च कुलीन सेनानायको, और सामन्तों को उनके गुणों के अनुरूप क्षत्रिय वीरों को तदर्थ उपाधि से विभूषित किया जाता था - जैसे - रावत - महारावत, राणा, महाराणा, ठाकुर, नेगी, रावल, रहकवाल, रोहिल्ला, समरलछन्द, लखमीर,(एक लाख का नायक) आदि। इसी आधार पर उनके वंशज भी आजतक राजपूतों के सभी गोत्रों में पाए जाते हैं। "वभूव रोहिल्लद्व्यड्कों वेद शास्त्रार्थ पारग: । द्विज: श्री हरि चन्द्राख्य प्रजापति समो गुरू : ।।2।। ( बाउक का जोधपुर लेख ) - सन 837 ई. चैत्र सुदि पंचमी - हिंदी अर्थ - "वेद शास्त्र में पारंगत रोहिल्लाद्धि उपाधिधारी एक हरिश्चन्द्र नाम का ब्राह्मण था" जो प्रजापति के समान था हुआ ।।6।। ( गुज्जर गौरव मासिक पत्रिका - अंक 10, वर्ष ।।माह जौलाई 1991 पृष्ठ - 13) (राजपुताने का इतिहास पृष्ठ - 147) (इतिहास रोहिला - राजपूत पृष्ठ - 23) (प्राचीन भारत का इतिहास, राजपूत वंश, - कैलाश - प्रकाशन लखनऊ सन 1970 ई. पृष्ठ - 104 -105 - ) रोहिल्लद्व्यड्क रोहिल्लद्धि - अंक वाला या उपाधि वाला । सर्वप्रथम प्रतिहार शासक द्विज हरिश्चन्द्र को रोहिल्लद्धि उपाधि प्राप्त हुई । बाउक,प्रतिहार शासक विप्र हरिश्चन्द्र के पुत्र कवक और श्रीमति पदमनी का पुत्र था वह बड़ा पराक्रमी और नरसिंह वीर था। प्रतिहार एक पद है, किसी विशेष वर्ण का सूचक नही है। विप्र हरिश्चन्द्र प्रतिहार अपने बाहुबल से मांडौर दुर्ग की रक्षा करने वाला था, अदम्य साहस व अन्य किसी विशेष रोहिला शासक के प्रभावनुरूप ही रोहिल्लद्व्यड्क उपाधि को किसी आधार के बिना कोई भी व्यक्ति अपने नाम के साथ सम्बन्ध करने का वैधानिक रूप में अधिकारी नही हो सकता। उपरोक्त से स्पष्ट है कि बहुत प्राचीन काल से ही गुणकर्म के आधार पर क्षत्रिय उपाधि "रोहिल्ला" प्रयुक्त । प्रदत्त करने की वैधानिक व्यवस्था थी। जिसे हिन्दुआसूर्य - महाराजा पृथ्वीराज चौहान ने भी यथावत रखा। पृथ्वीराज चौहान की सेना में एक सौ रोहिल्ला - राजपूत सेना नायक थे । "पृथ्वीराज रासौ" - चहूँप्रान, राठवर, जाति पुण्डीर गुहिल्ला । बडगूजर पामार, कुरभ, जागरा, रोहिल्ला ।। इस कवित्त से स्पष्ट है । कि - प्राचीन - काल में रोहिला- क्षत्रियों का स्थान बहुत ऊँचा था। रोहिला रोहिल्ल आदि शब्द राजपुत्रों अथवा क्षत्रियों के ही द्योतक थे । इस कवित्त के प्रमाणिकता "आइने अकबरी", 'सुरजन चरिता' भी सिद्ध करते हैं । युद्ध में कमानी की तरह (रोह चढ़ाई करके) शत्रु सेना को छिन्न - भिन्न करने वाले को रहकवाल, रावल, रोहिल्ला, महाभट्ट कहा गया है। महाराज पृथ्वीराज चौहान की सेना में पांच गोत्रों के रावल थे - रावल - रोहिला रावल - सिन्धु रावल - घिलौत (गहलौत) रावल - काशव या कश्यप रावल - बलदया बल्द मुग़ल बादशाह अकबर ने भी बहादुरी की रोहिल्ला उपाधि को यथावत बनाए रखा जब अकबर की सेना दूसरे राज्यों को जीत कर आती थी तो अकबर अपनी सेना के सरदारों को,बहादुर जवानों बहादुरी के पदक (ख़िताब,उपाधि) देता था। एक बार जब महाराणा मान सिंह काबुल जीतकर वापिस आए तो अकबर ने उसके बाइस राजपूत सरदारों को यह ख़िताब दी (उपाधि से सम्मानित किया) बाई तेरा हर निरकाला रावत को - रावल जी चौमकिंग सरनाथा को - रावल झंड्कारा कांड्कड को - रोहिल्ला रावत मन्चारा - कांड्कड काम करन, निरकादास रावत को रावराज और रूहेलाल को रोहिला
गौरवशाली इतिहास के कुछ स्वर्णाक्षर (रोहिला क्षत्रिय) भारत वर्ष का क्षेत्रफल 42 ,02 ,500 वर्ग किमी था । रोहिला साम्राज्य 25 ,000 वर्ग किमी 10 ,000 वर्गमील में फैला हुआ था । रोहिला, राजपूतो का एक गोत्र , कबीला (परिवार) या परिजन- समूह है जो कठेहर - रोहिलखण्ड के शासक एंव संस्थापक थे |मध्यकालीन भारत में बहुत से राजपूत लडाको को रोहिला की उपाधि से विभूषित किया गया. उनके वंशज आज भी रोहिला परिवारों में पाए जाते हैं । रोहिले- राजपूत प्राचीन काल से ही सीमा- प्रांत, मध्य देश (गंगा- यमुना का दोआब), पंजाब, काश्मीर, गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश में शासन करते रहे हैं । जबकि मुस्लिम-रोहिला साम्राज्य अठारहवी शताब्दी में इस्लामिक दबाव के पश्चात् स्थापित हुआ. मुसलमानों ने इसे उर्दू में "रूहेलखण्ड" कहा । 1702 से 1720 ई तक रोहिलखण्ड में रोहिले राजपूतो का शासन था. जिसकी राजधानी बरेली थी । रोहिले राजपूतो के महान शासक "राजा इन्द्रगिरी" ने रोहिलखण्ड की पश्चिमी सीमा पर सहारनपुर में एक किला बनवाया,जिसे "प्राचीन रोहिला किला" कहा जाता है । सन 1801 ई में रोहिलखण्ड को अंग्रेजो ने अपने अधिकार में ले लिया था. हिन्दू रोहिले-राजपुत्रो द्वारा बनवाए गये इस प्राचीन रोहिला किला को 1806 से 1857 के मध्य कारागार में परिवर्तित कर दिया गया था । इसी प्राचीन- रोहिला- किला में आज सहारनपुर की जिला- कारागार है । "सहारन" राजपूतो का एक गोत्र है जो रोहिले राजपूतो में पाया जाता है. यह सूर्य वंश की एक प्रशाखा है जो राजा भरत के पुत्र तक्षक के वंशधरो से प्रचालित हुई थी । फिरोज तुगलक के आक्रमण के समय "थानेसर" (वर्तमान में हरियाणा में स्थित) का राजा "सहारन" ही था । दिल्ली में गुलाम वंश के समय रोहिलखण्ड की राजधानी "रामपुर" में राजा रणवीर सिंह कठेहरिया (काठी कोम, निकुम्भ वंश, सूर्यवंश रावी नदी के काठे से विस्थापित कठगणों के वंशधर) का शासन था । इसी रोहिले राजा रणवीर सिंह ने तुगलक के सेनापति नसीरुद्दीन चंगेज को हराया था. 'खंड' क्षत्रिय राजाओं से सम्बंधित है, जैसे भरतखंड, बुंदेलखंड, विन्धयेलखंड , रोहिलखंड, कुमायुखंड, उत्तराखंड आदि । प्राचीन भारत की केवल दो भाषाएँ संस्कृत व प्राकृत (सरलीकृत संस्कृत) थी । रोहिल प्राकृत और खंड संस्कृत के शब्द हैं जो क्षत्रिय राजाओं के प्रमाण हैं । इस्लामिक नाम है दोलताबाद, कुतुबाबाद, मुरादाबाद, जलालाबाद, हैदराबाद, मुबारकबाद, फैजाबाद, आदि । रोहिले राजपूतो की उपस्तिथि के प्रमाण हैं । योधेय गणराज्य के सिक्के, गुजरात का (1445 वि ) ' का शिलालेख (रोहिला मालदेव के सम्बन्ध में), मध्यप्रदेश में स्थित रोहिलखंड रामपुर में राजा रणवीर सिंह के किले के खंडहर, रानी तारादेवी सती का मंदिर , पीलीभीत में राठौर रोहिलो (महिचा- प्रशाखा) की सतियों के सतियों के मंदिर, सहारनपुर का प्राचीन रोहिला किला, मंडोर का शिलालेख, " बड़ौत में स्तिथ " राजा रणवीर सिंह रोहिला मार्ग "
नगरे नगरे ग्रामै ग्रामै विलसन्तु संस्कृतवाणी । सदने - सदने जन - जन बदने , जयतु चिरं कल्याणी ।। जोधपुर का शिलालेख, प्रतिहार शासक हरीशचंद्र को मिली रोहिल्लाद्व्यंक की उपाधि, कई अन्य राजपूतो के वंशो को प्राप्त उपाधियाँ, 'पृथ्वीराज रासो', आल्हाखण्ड - काव्यव, सभी राजपूत वंशो में पाए जाने वाले प्रमुख गोत्र । अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा भारत द्वारा प्रकाशित पावन ग्रन्थ क्षत्रिय वंशाणर्व (रोहिले क्षत्रियों का राज्य रोहिलखण्ड का पूर्व नाम पांचाल व मध्यप्रदेश), वर्तमान में अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा से अखिल भारतीय रो. क्ष. वि. परिषद को संबद्धता प्राप्त होना, वर्तमान में भी रोहिलखण्ड (संस्कृत भाषा में) क्षेत्र का नाम यथावत बने रहना, अंग्रेजो द्वारा भी उत्तर रेलवे को "रोहिलखण्ड - रेलवे" का नाम देना जो बरेली से देहरादून तक सहारनपुर होते हुए जाती थी, वर्तमान में लाखो की संख्या में पाए जाने वाले रोहिला-राजपूत, रोहिले-राजपूतों के सम्पूर्ण भारत में फैले हुए कई अन्य संगठन अखिल भारतीय स्तर पर 'राजपूत रत्न' रोहिला शिरोमणि डा. कर्णवीर सिंह द्वारा संगठित एक अखिल भारतीय रोहिला क्षत्रिय विकास परिषद (सम्बद्ध अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा) पंजीकरण संख्या - 545, आदि। 12. पानीपत की तीसरी लड़ाई (रोहिला वार) में रोहिले राजपूत- राजा गंगासहाय राठौर (महेचा) के नेतृत्व में मराठों की ओर से अफगान आक्रान्ता अहमदशाह अब्दाली व रोहिला पठान नजीबदौला के विरुद्ध लड़े व वीरगति पाई । इस मराठा युद्ध में लगभग एक हजार चार सौ रोहिले राजपूत वीरगति को प्राप्त हुए । (1761-1774 ई .) (इतिहास -रोहिला-राजपूत) 13. प्रथम स्वतंत्रता संग्राम 1857 में भी रोहिले राजपूतों ने अपना योगदान दिया, ग्वालियर के किले में रानी लक्ष्मीबाई को हजारों की संख्या में रोहिले राजपूत मिले, इस महायज्ञ में स्त्री पुरुष सभी ने अपने गहने धन आदि एकत्र कर झाँसी की रानी के साथ अंग्रेजो के विरुद्ध आवाज उठाने के लिए सम्राट बहादुरशाह- जफर तक पहुँचाए । अंग्रेजों ने ढूँढ-ढूँढ कर उन्हें काट डाला जिससे रोहिले राजपूतों ने अज्ञातवास की शरण ली। 14. राजपूतों की हार के प्रमुख कारण थे हाथियों का प्रयोग, सामंत प्रणाली व आपसी मतभेद, ऊँचे व भागीदार कुल का भेदभाव (छोटे व बड़े की भावना) आदि। 15. सम्वत 825 में बप्पा रावल चित्तौड़ से विधर्मियों को खदेड़ता हुआ ईरान तक गया। बप्पा रावल से समर सिंह तक 400 वर्ष होते हैं, गह्लौतों का ही शासन रहा। इनकी 24 शाखाएँ हैं। जिनके 16 गोत्र (बप्पा रावल के वंशधर) रोहिले राजपूतों में पाए जाते हैं। 16. चितौड़ के राणा समर सिंह (1193 ई.) की रानी पटना की राजकुमारी थी इसने 9 राजा, 1 रावत और कुछ रोहिले साथ लेकर मौ. गोरी के गुलाम कुतुबद्दीन का आक्रमण रोका और उसे ऐसी पराजय दी कि कभी उसने चितौड़ की ओर नही देखा। 17. रोहिला शब्द क्षेत्रजनित, गुणजनित व 'मूल पुरुष' नाम-जनित है। यह गोत्र जाटों में भी रूहेला, रोहेला, रूलिया, रूहेल , रूहिल, रूहिलान नामों से पाया जाता है। 18. रूहेला गोत्र जाटों में राजस्थान व उ. प्र. में पाया जाता है। रोहेला गोत्र के जाट जयपुर में बजरंग बिहार ओर ईनकम टैक्स कालोनी टौंक रोड में विद्यमान है। झुनझुन, सीकर, चुरू, अलवर, बाडमेर में भी रोहिला गोत्र के जाट विद्यमान हैं । उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले में रोहेला गोत्र के जाटों के बारह गाँव हैं। महाराष्ट्र में रूहिलान गोत्र के जाट वर्धा में केसर व खेड़ा गाँव में विद्यमान हैं। 19. मुगल सम्राट अकबर ने भी राजपूत राजाओं को विजय प्राप्त करने के पश्चात् रोहिला-उपाधि से विभूषित किया था, जैसे राव, रावत, महारावल, राणा, महाराणा, रोहिल्ला, रहकवाल आदि। 20. "रोहिला-राजपूत" समाज , क्षत्रियों का वह परिवार है जो सरल ह्रदयी, परिश्रमी,राष्ट्रप्रेमी,स्वधर्मपरायण, स्वाभिमानी व वर्तमान में अधिकांश अज्ञातवास के कारण साधनविहीन है। 40 प्रतिशत कृषि कार्य से,30 प्रतिशत श्रम के सहारे व 30 प्रतिशत व्यापार व लघु उद्योगों के सहारे जीवन यापन कर रहे हैं। इनके पूर्वजो ने हजारों वर्षों तक अपनी आन, मान, मर्यादा की रक्षा के लिए बलिदान दिए हैं और अनेको आक्रान्ताओं को रोके रखने में अपना सर्वस्व मिटाया है । गणराज्य व लोकतंत्रात्मक व्यवस्था को सजीव बनाये रखने की भावना के कारण वंश परंपरा के विरुद्ध रहे, करद राज्यों में भी स्वतंत्रता बनाये रखी । कठेहर रोहिलखण्ड की स्थापना से लेकर सल्तनत काल की उथल पुथल, मार काट , दमन चक्र तक लगभग आठ सौ वर्ष के शासन काल के पश्चात् 1857 के ग़दर के समय तक रोहिले राजपूतों ने राष्ट्रहित में बलिदान दिये हैं। क्रूर काल के झंझावालों से संघर्ष करते हुए क्षत्रियों का यह 'रोहिला परिवार' बिखर गया है, इस समाज की पहचान के लिए भी आज स्पष्टीकरण देना पड़ता है। कैसा दुर्भाग्य है? यह क्षत्रिय वर्ग का। जो अपनी पहचान को भी टटोलना पड़ रहा है। परन्तु समय के चक्र में सब कुछ सुरक्षित है। इतिहास के दर्पण में थिरकते चित्र, बोलते हैं, अतीत झाँकता है, सच सोचता है कि उसके होने के प्रमाण धुंधले-धुंधले से क्यों हैं? हे- क्षत्रिय तुम धन्य हो, पहचानो अपने प्रतिबिम्बों को' - "क्षत्रिय एकता का बिगुल फूँक सब धुंधला धुंधला छंटने दो। हो अखंड भारत के राजपुत्र खण्ड खण्ड में न सबको बंटने दो ।।" 21. रोहिलखण्ड से विस्थापित इन रोहिला परिवारों में राजपूत परम्परा के कुछ प्रमुख गोत्र इस प्रकार पाए जाते हैं :- 
रोहिला, रोहित, रोहिल, रावल, द्रोहिया, रल्हन, रूहिलान, रौतेला , रावत यौधेय, योतिक, जोहिया, झोझे, पेशावरी पुण्डीर, पांडला, पंढेर, पुन्ड़ेहार, पुंढीर, पुंडाया चौहान, जैवर, जौडा, चाहल, चावड़ा, खींची, गोगद, गदाइया, सनावर, क्लानियां, चिंगारा, चाहड बालसमंद, चोहेल, चेहलान, बालदा, बछ्स (वत्स), बछेर, चयद, झझोड, चौपट, खुम्ब, जांघरा, जंगारा, झांझड निकुम्भ, कठेहरिया, कठौरा, कठैत, कलुठान, कठपाल, कठेडिया, कठड, काठी, कठ, पालवार राठौर, महेचा, महेचराना, रतनौता, बंसूठ जोली, जोलिए, बांकटे, बाटूदा, थाथी, कपोलिया, खोखर, अखनौरिया ,लोहमढ़े, मसानिया बुन्देला, उमट, ऊमटवाल भारतवंशी, भारती, गनान नाभावंशी,बटेरिया, बटवाल, बरमटिया परमार, जावडा, लखमरा, मूसला, मौसिल, भौंसले, बसूक, जंदडा, पछाड़, पंवारखा, ढेड, मौन तोमर, तंवर, मुदगल, देहलीवाल, किशनलाल, सानयाल, सैन, सनाढय गहलौत, कूपट, पछाड़, थापा, ग्रेवाल, कंकोटक, गोद्देय, पापडा, नथैड़ा, नैपाली, लाठिवाल, पानिशप, पिसोण्ड, चिरडवाल, नवल, चरखवाल, साम्भा, पातलेय, पातलीय, छन्द (चंड), क्षुद्रक,(छिन्ड, इन्छड़, नौछड़क), रज्जडवाल, बोहरा, जसावत, गौर, मलक, मलिक, कोकचे, काक कछवाहा, कुशवाहा, कोकच्छ, ततवाल, बलद, मछेर सिसौदिया, भरोलिया, बरनवाल, बरनपाल, बहारा
खुमाहड, अवन्ट, ऊँटवाल 
सिकरवार, रहकवाल, रायकवार, ममड, गोदे सोलंकी, गिलानिया, भुन, बुन, बघेला, ऊन, (उनयारिया) बडगूजर, सिकरवार, ममड़ा, पुडिया कश्यप, काशब, रावल, रहकवाल यदु, मेव, छिकारा, तैतवाल, भैनिवाल, उन्हड़, भाटटी बनाफरे, जादो, बागड़ी, सिन्धु, कालड़ा, सारन, छुरियापेड, लखमेरिया, चराड, जाखड़, सेरावत, देसवाल, पूडिया प्रमुख रोहिला क्षत्रिय शासक अंगार सैन - गांधार (वैदिक काल) अश्वकरण - ईसा पूर्व 326 (मश्कावती दुर्ग) अजयराव - स्यालकोट (सौकंल दुर्ग) ईसा पूर्व 326 प्रचेता - मलेच्छ संहारक शाशिगुप्त - साइरस के समकालीन सुभाग सैन - मौर्य साम्राज्य के समकालीन राजाराम शाह - 929 वि. रामपुर रोहिलखण्ड बीजराज - रोहिलखण्ड करण चन्द्र - रोहिलखण्ड विग्रह राज - रोहिलखण्ड - गंगापार कर स्रुघ्न जनपद (सुगनापुर) यमुना तक विस्तार दसवीं शताब्दी में सरसावा में किले का निर्माण पश्चिमी सीमा पर, यमुना द्वारा ध्वस्त टीले के रूप में नकुड़ रोड पर देखा जा सकता है। सावन्त सिंह - रोहिलखण्ड जगमाल - रोहिलखण्ड धिंगतराव - रोहिलखण्ड गोंकुल सिंह - रोहिलखण्ड महासहाय - रोहिलखण्ड त्रिलोक चन्द - रोहिलखण्ड रणवीर सिंह - रोहिलखण्ड सुन्दर पाल - रोहिलखण्ड नौरंग देव - रोहिलखण्ड सूरत सिंह - रोहिलखण्ड हंसकरण रहकवाल - पृथ्वीराज के सेनापति मिथुन देव रायकवार - ईसम सिंह पुण्डीर के मित्र थाना भवन शासक सहकरण, विजयराव - उपरोक्त राजा हतरा - हिसार जगत राय - बरेली मुकंदराज - बरेली 1567 ई. बुधपाल - बदायुं महीचंद राठौर - बदायुं बांसदेव - बरेली बरलदेव - बरेली राजसिंह - बरेली परमादित्य - बरेली न्यादरचन्द - बरेली राजा सहारन - थानेश्वर प्रताप राव खींची (चौहान वंश) - गागरोन राणा लक्ष्य सिंह - सीकरी रोहिला मालदेव - गुजरात जबर सिंह - सोनीपत रामदयाल महेचराना - क्लामथ गंगसहाय - महेचराना - क्लामथ 1761 ई. राणा प्रताप सिंह - कौराली (गंगोह) 1095 ई. नानक चन्द - अल्मोड़ा राजा पूरणचन्द - बुंदेलखंड राजा हंस ध्वज - हिसार व राजा हरचंद राजा बसंतपाल - रोहिलखण्ड व्रतुसरदार, सामंत वृतपाल 1193 ई. महान सिंह बडगूजर - बागपत 1184 ई. राजा यशकरण - अंधली गुणाचन्द - जयकरण - चरखी - दादरी राजा मोहनपाल देव - करोली राजारूप सैन - रोपड़ राजा महपाल पंवार - जीन्द राजा परपदेड पुंडीर - लाहौर राजा लखीराव - स्यालकोट राजा जाजा जी तोमर - दिल्ली खड़ग सिंह - रोहिलखण्ड लौदी के समकालीन राजा हरि सिंह - खिज्रखां के दमन का शिकार हुआ - कुमायुं की पहाड़ियों में अज्ञातवास की शरण ली राजा इन्द्रगिरी (रोहिलखण्ड) (इन्द्रसेन) - सहारनपुर में प्राचीन रोहिला किला बनवाया । रोहिला क्षत्रिय वंश भास्कर लेखक आर. आर. राजपूत मुरसेन अलीगढ से प्रस्तुत राजा बुद्ध देव रोहिला - 1787 ई., सिंधिया व जयपुर के कछवाहो के खेड़ा व तुंगा के मैदान में हुए युद्ध का प्रमुख पात्र । (राय कुँवर देवेन्द्र सिंह जी राजभाट, तुंगा (राजस्थान)
रोहिल्ला उपाधि - शूरवीर, अदम्य - साहसी विशेष युद्ध कला में प्रवीण, उच्च कुलीन सेनानायको, और सामन्तों को उनके गुणों के अनुरूप क्षत्रिय वीरों को तदर्थ उपाधि से विभूषित किया जाता था - जैसे - रावत - महारावत, राणा, महाराणा, ठाकुर, नेगी, रावल, रहकवाल, रोहिल्ला, समरलछन्द, लखमीर,(एक लाख का नायक) आदि। इसी आधार पर उनके वंशज भी आजतक राजपूतों के सभी गोत्रों में पाए जाते हैं। "वभूव रोहिल्लद्व्यड्कों वेद शास्त्रार्थ पारग: । द्विज: श्री हरि चन्द्राख्य प्रजापति समो गुरू : ।।2।। ( बाउक का जोधपुर लेख ) - सन 837 ई. चैत्र सुदि पंचमी - हिंदी अर्थ - "वेद शास्त्र में पारंगत रोहिल्लाद्धि उपाधिधारी एक हरिश्चन्द्र नाम का ब्राह्मण था" जो प्रजापति के समान था हुआ ।।6।। ( गुज्जर गौरव मासिक पत्रिका - अंक 10, वर्ष ।।माह जौलाई 1991 पृष्ठ - 13) (राजपुताने का इतिहास पृष्ठ - 147) (इतिहास रोहिला - राजपूत पृष्ठ - 23) (प्राचीन भारत का इतिहास, राजपूत वंश, - कैलाश - प्रकाशन लखनऊ सन 1970 ई. पृष्ठ - 104 -105 - ) रोहिल्लद्व्यड्क रोहिल्लद्धि - अंक वाला या उपाधि वाला । सर्वप्रथम प्रतिहार शासक द्विज हरिश्चन्द्र को रोहिल्लद्धि उपाधि प्राप्त हुई । बाउक,प्रतिहार शासक विप्र हरिश्चन्द्र के पुत्र कवक और श्रीमति पदमनी का पुत्र था वह बड़ा पराक्रमी और नरसिंह वीर था। प्रतिहार एक पद है, किसी विशेष वर्ण का सूचक नही है। विप्र हरिश्चन्द्र प्रतिहार अपने बाहुबल से मांडौर दुर्ग की रक्षा करने वाला था, अदम्य साहस व अन्य किसी विशेष रोहिला शासक के प्रभावनुरूप ही रोहिल्लद्व्यड्क उपाधि को किसी आधार के बिना कोई भी व्यक्ति अपने नाम के साथ सम्बन्ध करने का वैधानिक रूप में अधिकारी नही हो सकता। उपरोक्त से स्पष्ट है कि बहुत प्राचीन काल से ही गुणकर्म के आधार पर क्षत्रिय उपाधि "रोहिल्ला" प्रयुक्त । प्रदत्त करने की वैधानिक व्यवस्था थी। जिसे हिन्दुआसूर्य - महाराजा पृथ्वीराज चौहान ने भी यथावत रखा। पृथ्वीराज चौहान की सेना में एक सौ रोहिल्ला - राजपूत सेना नायक थे । "पृथ्वीराज रासौ" - चहूँप्रान, राठवर, जाति पुण्डीर गुहिल्ला । बडगूजर पामार, कुरभ, जागरा, रोहिल्ला ।। इस कवित्त से स्पष्ट है । कि - प्राचीन - काल में रोहिला- क्षत्रियों का स्थान बहुत ऊँचा था। रोहिला रोहिल्ल आदि शब्द राजपुत्रों अथवा क्षत्रियों के ही द्योतक थे । इस कवित्त के प्रमाणिकता "आइने अकबरी", 'सुरजन चरिता' भी सिद्ध करते हैं । युद्ध में कमानी की तरह (रोह चढ़ाई करके) शत्रु सेना को छिन्न - भिन्न करने वाले को रहकवाल, रावल, रोहिल्ला, महाभट्ट कहा गया है। महाराज पृथ्वीराज चौहान की सेना में पांच गोत्रों के रावल थे - रावल - रोहिला रावल - सिन्धु रावल - घिलौत (गहलौत) रावल - काशव या कश्यप रावल - बलदया बल्द मुग़ल बादशाह अकबर ने भी बहादुरी की रोहिल्ला उपाधि को यथावत बनाए रखा जब अकबर की सेना दूसरे राज्यों को जीत कर आती थी तो अकबर अपनी सेना के सरदारों को,बहादुर जवानों बहादुरी के पदक (ख़िताब,उपाधि) देता था। एक बार जब महाराणा मान सिंह काबुल जीतकर वापिस आए तो अकबर ने उसके बाइस राजपूत सरदारों को यह ख़िताब दी (उपाधि से सम्मानित किया) बाई तेरा हर निरकाला रावत को - रावल जी चौमकिंग सरनाथा को - रावल झंड्कारा कांड्कड को - रोहिल्ला रावत मन्चारा - कांड्कड काम करन, निरकादास रावत को रावराज और रूहेलाल को रोहिला✍️संकलित द्वारा :-समय सिंह पुंडीर,राष्ट्रीय प्रवक्ता,क्षत्रिय अस्तित्व न्याय मोर्चा,आजीवन सदस्य अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा स्थापित१८९७ईस्वी भारत मुख्यालय दिल्ली, 🙏🌹🌷

ANCIENT HISTORY OF RAJPUTANA ROHILKHAND



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ROHILA KSHTRIYA/RAJPUT

 प्राचीन रोहिला क्षत्रिय राज वंश 
*रोहिला क्षत्रिय/राजपूत*

*वैववस्तु मनु से  आरंभ हुई, श्रीराम व  कृष्ण जिस kaalkhand  में है,ं सहस्त्राब्दियों पूर्व से भारत की पावन भूमि पर आज तक चली आ रही, क्षत्रिय vansho की अटूट परम्परा को प्रणाम करते हुए, एक राजन्य (राजपुत्र) ही जन्मप्रदत्त स्वतंत्रता की रक्षा के लिए   seemaoका sanrakshan karata Raha 


हिंदुकुश, रोहित-गिरि पंचनद तक भरत खण्ड की पश्चिम उत्तरीय सीमा के क्षत्रिय प्रहरियों का दीर्घ कालीन बड़ा संघर्ष ही भारत की संस्कृति व सभ्यता की रक्षा करता रहा है। आक्रमणकारियों के लिए रोहितगिरि का उत्तारापथ ही पूर्व काल से एक प्रवेष द्वारा था। सूर्य, चन्द्र और नागादि संज्ञक क्षत्रिय वंशो की* *शाखाओं प्रशाखाओं में बंटे महाजनपद गणराज्यों के शासक ही प्राचीन आर्य सभ्यता को मध्य* *एशिया तक प्रसारित करने में संघर्षरत थे। यह प्रसार क्रम कई द्वीपों तथा मध्य एषिया तक होता चला गया, जहाँ से उनका आना जाना बसना* *उजडना लगा रहता था। वर्तमान भारत में बिखरे पड़े हजारों षाखाओं व प्रषाखाओं में* *विभाजित करोड़ो संताने है जो सूर्य व* *चन्द्र वंष की दो समानान्तर विकसित सभ्यताओं के रूप में समूचे आर्यवर्त, हिमवर्ष व मध्यएषिया, अरब ईरान, मिश्र आदि तक फैल गये थे तथा अपने व अपने पूर्वजों, धर्मगुरूओं ओर वंष पुरोहितों, ऋषियों आदि के नाम पर अपने गणराज्य व ठिकाने स्थापित कर रहे थे*

*रोहिला शब्द भी इसी क्रम की एक*
 *अटूट कड़ी है प्रयाग के पास झूँसी में विकसित प्राचीन चन्द्रवंषी चक्रवर्ती* *सम्राट पुरूरवा व उसके वंशधरो में प्रख्यात सम्राट ययाति के पांच पुत्र पंचजन कहलाये और उनके पाँच जनपद स्थापित हुए। लगभग सात सहस्त्राब्दी पूर्व मध्य देश आर्यवर्त में विश्व की प्राचीनतम् सभ्यता विकसित हो रही थी, इलाहाबाद, (प्रयाग) के पास झूँसी में चन्द्रवंषी क्षत्रियों व कौशल (अयोध्या) में सूर्य वंशी इक्ष्वाकु के वंशधरो के राज्य खण्ड स्थापित हो रहे थे। उस काल की परम्परा के अनुसार जिस सम्राट के रथ का चक्र अनेक राज्यों में निशंक घूमता हो वह चक्रवर्ती सम्राटों की श्रेणी में मान्य होता था। वन गमन से पूर्व (वानप्रस्थ आश्रम) सम्राट ययाति ने अपने पाँच पुत्रों क्रमश यदु, तुर्वसु, द्रहृाू (उपनाम रोहू) पुरू और अनु के लिए अपने साम्राज्य को पांच भागों में विभक्त कर प्रत्येक पुत्र को अपने-अपने प्रदेशों के शासनाधिकार का उत्तरदायित्व सौंप दिया था*

1. *यदु- दक्षिण पश्चिम में केन-बेतुआ और चम्बल नदी के कांठो का प्रदेश दिया, कालान्तर में यदु के वंशधर यादव कहलाये*।

2. *तुर्वसु-कुरूष प्रदेष वर्तमान बघेल खण्ड तुर्वसु को प्राप्त हुआ, वहां कुरूषजनों को परास्त कर तुर्वसु वंष की स्थापना हुई*।

3. *द्रह्यु- चम्बल नदी के उत्तर पश्चिम, सिन्धु नदी के किनारे तथा यमुना नदी के पष्चिम पचनद (पंजाब) का पूरा प्रान्त द्रह्यु को मिला। द्रुह्यु के वष्ंाधर आगे चल कर उत्तर और पूरब में हिन्दु कुष तथा पामीर ओर पश्चिमोत्तर में वाल्हिक, हरअवती तक के विस्तुत क्षेत्रों पर अपना अधिकार स्थापित करते चले गए और वैदिक संस्कृति का प्रसार किया*।

4. *पुरू- पुरू को प्रतिष्ठान के राज्य सिंहासन पर आसीन किया गया, पुरू के वंष आगे चलकर पौरव कहलाए इसी वंष में भरत का जन्म हुआ, आर्यवर्त, हिमवर्ष, जम्बूद्वीप (मध्यप्रदेष-विन्घ्याचल से हिन्दुकुष रोहित गिरी तक) का नाम भरत खण्ड भारत वर्ष कहलाया*।

5. *अनु- यमुना नदी को पूरब* *और गंगा यमुना के मध्य का देष (दक्षिण पंचाल) तथा अयोध्या के पष्चिम के क्षेत्र अनु को प्राप्त हुए अनु के वंष घर आनव कहलाए*। 



*इस प्रकार चन्द वंश का विस्तार हुआ*।

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*आर्यवर्त की उत्तरी सीमा पर स्थित केकय देष भरत को उसकी माता कैकेयी के राज्य के कारण प्राप्त हुआ। भरत के दो पुत्रों तक्ष व पुष्कर ने क्रमषः तक्षषिला व पुष्करावती दो राजधानियां स्थापित की और आर्य संस्कृति को समृद्ध किया। उस काल में संस्कृत ही मातृभाशा थी*।



*भारत की पश्चिमि उत्तरीय सीमाओं पर जिस अवसर पर भी विदेशी आक्रमण हुए सूर्य वंशी भरत और चन्द्र वंशी द्रह्यु के वंशधरों ने मिल कर**
**प्रहरियों के अनुरूप अपना रक्त बहाया। ईसा से लगभग पाँच सौ वर्ष पूर्व से इस पर्वतीय प्रदेष में पचनद तक ‘कठ‘ गणराज्य, छुद्रक गणराज्य, यौधेय गणराज्य, मालव गणराज्य, अश्वक गणराज्य आदि फल फूल रहे थे। इनकी शासन प्रणाली गणतंत्रात्मक* *थी। यहाँ के निवासी सौंदर्यापासक थे और सुन्दर पुरुष ही राजा चुना जाता था। दु्रह्यु देश का नाम कालान्तर में द्रुह्यु के वंशज गंधारसैन के नाम पर गांधार और सूर्यवंषी राजाओं ने अपने शासित प्रदेष को ‘कपिष‘ के नाम से प्रसिद्ध कर काबुल (कुम्भा) नदी के पूर्वोत्तरीय क्षेत्र में अपनी राजधानी का नाम कपिषा रखा*

      *प्राचीन काल में कपिष (लडाकू, उदण्ड पर्वताश्रयी) और गान्धार की भाशा संस्कृत थी, किन्तु मध्यकाल से संस्कृत भाशा का विकृत सरलीकृत रूप ‘ प्राकृत‘ में परिवर्तित हो गया। भाषा के आधार पर यह स्पष्ट है कि इस प्रदेष में सहस्त्रों वर्ष तक भारतीय संस्कृति और सभ्यता स्थापित रही और इस समस्त प्रदेष में दीर्घ काल तक आर्य क्षत्रिय नरेषों का षासन रहा*।

      *अनेक पहाड़ियों (माल्यवत्त-रोहितगिरि-लोहितगिरि-हिन्दकाकेश्षस-रोहतांग आदि) नदियों (कुनार, स्वातु, गोमल, कुर्रम, सिन्धु की सहायक नदियाँ- सतलज, रावी, व्यास तथा घाटियों के कारण सामरिक दृष्टि से भी यह प्रदेष इन पर्वताश्रयी क्षत्रिय नरेषों के लिए महत्वपूर्ण था। यहाँ ठण्डी ऋतु जलवायु की दृष्टि से अति उत्तम रही। इसलिए यहां के निवासी बलिष्ठ, रक्तिम वर्ण (ललिमा चुक्त गोरा रंग) व कद काटी में मजबूब, हठी व गठीले होते रहे है। दुर्गम पहाड़ियों, नदियों व घाटियों के कारण यहां के निवासी पर्वताश्रयी, अश्वारोही थे। अश्वो के लिए प्रसिद्ध रहा यह प्रदेश रोहित गिरिये, रोहित नस्ल के अश्वों के व्यापार का प्रमुख केन्द्र था। क्रमषः *इसी कारण यह प्रदेष घोड़ों का प्रदेष अथवा अष्वकों का प्रदेश* *(अष्वकायन) कहलाता था*
**रोहित (संस्कृत), वर्तमान भाषा में लाल- भूरा रंग के घोड़े और श्येन नस्ल *के घोड़े पाए जाते थे। घोडों अथवा अष्वारोहण के बिना यहां जीवन* *सम्भव नहीं था। विदेषी* *आक्रमणों के समय अष्वों की प्रथम भूमिका थी। गहरे किसमिसी रंग के बहादुर घोड़ों को रोहित नाम से सम्बोधित किया जाता था*।
 *ईरानी व यूनानी विद्वानों के द्वारा भी इस प्रदेश के रोहित नस्ल के घोड़ों की प्रषन्सा की गई है*
* **इस प्रदेश के (महाजनपद) प्राचीन शासक (चन्द्रवंषी) द्रुह्यु का उपनाम भी रोहु था। इसलिए इसका नाम द्रुहयू का देश रोह देश रोहित गिरि रोह प्रदेश (अपभ्रनस होता चला* गया )हो जाना व्यावहारिक व स्वाभाविक था। *
*संस्कृत भाषा में रोह का अर्थ है- सीधे दृढ़-बल युक्त चढ़ना-अवरोहण करना, रक्तिम वर्ण (रोहित), पर्वत (माउण्टेन) इसलिए मध्यकाल तक ये पर्वताश्रयी* *क्षत्रिय शासक रोहित वर्ग से प्रसिद्ध हुए*। 
*पर्वतीय प्रदेश का नाम , रोहित प्रदेश*
  (प्रांकृत संस्कृत में) यहां सेनाओं की युद्ध प्रणाली रोहिल्ला युद्ध (रोहिला वार, लैटिन भाषा में) प्रणाली
 *सीधे दृढ़ बल युक्त पर्वत पर अवरोहण की तरह तीब्रता से शत्रु पर चढ़ जाना*
 *शत्रु सेना पर बाढ़ रोह की तरह, लाल* *होकर (रक्ति वर्ण क्रोधित आक्रोष युक्त) टूट पड़ना, तीब्रता से षत्रु सेना में घुस जाना। रोह (कमानी) के समान षत्रु सेना को भेदते, (काटते जाना) हुए चढ़ाई करना, प्रख्यात हुई* कालांतर में अनेक *क्षत्रिय सेनानायकों को , रोहिल्ला उपधि से विभूषित किया गया*। (मध्यकाल में)

‘‘धृतकौषिक मौद्गल्यौ आलम्यान परषरः।

सौपायनस्तथत्रिश्च वासुकी रोहित स्तथा।‘‘

(राष्ट्रधर्म-भाद्रपद 2067, सितम्बर 2010 के पृष्ठ 31 पर रोहित गोत्र का उपरोक्त श्लोक में वर्णन)

‘‘अरूषा रोहिता रथे बात जुता

वृषभस्यवते स्वतः‘‘ ।।10।।

(ऋग्वेद मण्डल 1, अ0 15 स्0 94 ‘‘ रोहिला क्षत्रियों का क्रमबद्ध इतिहासः पृष्ठ 42)



*मद्रान, रोहित कश्चैव, आगेयान, मालवान अपि गणन सर्वान, विनिजीत्य, प्रहसन्निव,। महाभारत वन पर्व 255-20 प्राचीन रोहित गिरि के नाम का अस्तित्व आज भी रोहतांग घाटी, रोहतांग दर्रानाम से अवस्थित है*।

*महाभारत के सभा पर्व में लोहित (रोहित) (संस्कृत शब्द) प्रदेश के दस मण्डलों का उल्लेख है जो भारत का उत्तर पूर्वी मध्यभाग था। श्री वासूदेव शरण अग्रवाल*

      ‘‘ *पाणिनि कालीन भारत वर्ष पृष्ठ 449 ‘‘ अश्येनस्य जवसा‘‘ वैदिक साहितय ऋग्वेद 1, अ0 17, मत्र 11, सुक्त 118-119 अर्थात- दृढ निश्चय के साथ (अश्येनस्य ) बाज पखेरू के समान (जवसा) तीव्र वेग के समान हम लोगो को आन मिली। (यह श्येन और रोहित नस्ल के घोडों की अश्व के रोहिला सेनाओं का वर्णन है*।)

  ‘‘ *उत्तरीय सीमा प्रान्त मे ंएक सुरम्य स्थानथा यहाँ का राजा क्षत्रिय था वह अपनी प्रजा को बहुत प्यार करता था, यहाँ विभिन्न प्रकार के अन्न व फलों के वृक्ष थे*
*यहां के निवासी भयानक थे तथा उनकी भाषा रूक्ष संस्कृत थी। ये रजत तथा ताम्र मुद्राओं का प्रयोग करते थे*
 *ये बहुत लडाकू तथा बहादूर थे यह क्षेत्र कुम्भा नदी के उत्तर पूर्व में 155 मील दूर था। ‘‘ एक प्रसिद्ध इतिहासकार टालेमी के अनुसार यह वर्णन चीन पागी युलान-च्वाड्डा ने किया। प्राचीन भारत का ऐतिहासिक भूगोल पृष्ठ 153-154 द्वारा श्री विमलचन्द्र लाहा (रोहिला क्षत्रिय क्रमबद्ध इतिहास से साभार‘‘) पाणिनी ने भी पश्चिमोत्तरीय सीमा प्रान्त के अश्वकायनों, अश्वकों, कठों, यादवों, छुद्रकों, मालवों निवासी सभी क्षत्रिय वर्गो को पर्वतीय और युद्धोपजीवि कहा है*।
#गांधार ( आज का अफगानिस्तान, अपगण स्थान,अथवा ऊपरी क्षेत्र आर्यन  प्रदेश आज का ईरान जहां क्षत्रिय से शासक थे ,के गणराज्यों का स्थान)
आपने महाभारत में #गांधारी का नाम तो सुना ही होगा.....लेकिन क्या आपको पता है कि उनका नाम गांधारी इसलिए था क्योकि वह गांधार देश की राजकुमारी थीं. आपको शायद पता ना हो लेकिन #शकुनी इसी जनपद का राजा था।
महाभारत के अनुसार भारत को मुख्‍यत: 16 जनपदों में स्थापित किया गया था. 
..इन्हीं जनपदों में से एक गांधार था।
महाभारत में हमको गांधार नरेश और गांधारी के होने से यह सबूत मिलता है. यह चंद्र वंशी चक्रवर्ती सम्राट ययाति के तीसरे पुत्र द्रह्यु के वंशज थे,। गांधार कभी भारत का सबसे खुशहाल राज्य या जनपद था. ..बड़े आयुर्वेद अस्पतालों के लिए यह जाना जाता था।आज के पाकिस्तान का पश्चिमी तथा अफगानिस्तान (अपगण स्थान) का पूर्वी क्षेत्र उस काल में भारत का गंधार प्रदेश था।भारत में घुसने के लिए यह एक दरवाजा था. गांधार देश द्रह्यु वंशी का द्रोह या रोह देश से ही अधिकतर व्यापारी भारत में घुसते थे। ईरान आर्यन प्रदेश था वहां आज भी पढ़ाया जाता है कि इस आर्यन प्रदेश में ईरान में आर्य समुदाय भारत से आया था,जबकि भारत में इसका उल्टा पढ़ाया जाता है जो झूठा इतिहास है क्षत्रिय विस्थापित हुए फैले प्रसार किया पुनः आते जाते रहे उसी क्रम को यहां उल्टा किया गया है। ईरान आर्यन प्रदेश था आज भी वहां की उड़ान का नाम आर्यन ही है।
#तक्षशिला जो महाभारत काल में गांधार प्रदेश की राजधानी थी। गांधार ही आज कंधार के नाम से जाना जाता है। जो अफगानिस्तान(अपगण स्थान)में मौजूद है।
हम कहाँ तक थे और आज केवल वर्तमान भारत तक सिकुड़ गए....
सिकंदर के आक्रमण के पश्चात चन्द्रगुप्त मौर्य ने 322 ईसा पूर्व में इस साम्राज्य की स्थापना की । 

सिकंदर जैसा कोई अन्य व्यक्ति भारत की ओर आंखें उठाकर देखने का फिर साहस न कर सके , इसलिए चंद्रगुप्त मौर्य और उनके गुरु चाणक्य ने भारत की पश्चिम की सीमाओं का गहनता से अध्ययन किया और अपने साम्राज्य को विशेष शक्ति संपन्न बनाकर उस ओर ही विस्तृत करने का सराहनीय, ऐतिहासिक और देशभक्ति पूर्ण कार्य किया।

 एक विशाल साम्राज्य खड़ा करके भारत की सीमाओं की सुरक्षा का तंत्र इन दोनों महान नायकों ने उस समय इतनी मजबूती से खड़ा किया कि अगले कई सौ वर्ष तक विदेशी आक्रमणकारी इस ओर झांक भी नहीं सके।

   उस समय भारत की एकता और अखंडता के लिए खतरा बने छोटे-छोटे राज्यों को इन दोनों इतिहास पुरुषों ने समाप्त कर विशाल साम्राज्य खड़ा करके भारत में राष्ट्रवाद की पुरानी परंपरा को सफलतापूर्वक स्थापित किया। 

    इन दोनों महापुरुषों के इस प्रयास से हमें इस भ्रम से बाहर निकलना चाहिए कि भारत में राष्ट्रवाद की भावना कभी नहीं रही और राष्ट्रीय एकता स्थापित करने में मुगलों या किसी अन्य विदेशी शक्ति सत्ता का विशेष योगदान रहा है। 

   इन दोनों के पुरूषार्थ से यह पता चलता है कि उन्होंने भारत के आर्य शासकों की पुरानी परंपरा को स्थापित कर भारत में चक्रवर्ती सम्राटों की परंपरा को आगे बढ़ाया।

       316 ईसा पूर्व तक मौर्यवंश ने पूरे उत्तरी पश्चिमी भारत पर अधिकार कर लिया था। 
तथा गणराज्यों क्षुद्रक ,कठ ,मालव  यौद्धेय आदि का एकीकरण करके सुदृढ़ साम्राज्य स्थापित किया।
चक्रवर्ती सम्राट अशोक के राज्य में मौर्यवंश का वृहद स्तर पर विस्तार हुआ। सम्राट अशोक के कारण ही मौर्य साम्राज्य सबसे महान एवं शक्तिशाली बनकर विश्वभर में प्रसिद्ध हुआ। 

      यद्यपि अशोक ने जिस प्रकार बौद्ध धर्म की अहिंसा को अपनाया, उससे भारतीय क्षत्रिय धर्म की परंपरा को क्षति भी उठानी पड़ी।
      *पर्वतीय (संस्कृत-हिन्दी), माउण्टेनीयर (लैटिन-अंगे्रजी), रोहित, रोहिते, रोहिले (संस्कृत ‘प्राकृत‘ - पश्तों) रोहिले-चढ़ने वाले, चढाई करने वाले अवरोही, अश्वारोही, द्रोही रोह रोहि पक्थजन , आदि समानार्थी शब्दों का सम्बन्ध प्राचीन क्षत्रिय वर्गोक्षत्रिय शासित क्षेत्रों ,पर्वतीय प्रदेशों (रोहितगिरि, रोहताग दर्रा, लोहित गिरि, कोकचा, पर्वत श्रेणी आदि)युद्ध प्रणालियों और नदी घाटी, काॅठो घोड़ों की पीठ पर (चढ़कर करने बहादुरी के साथ लडने वाले गुणों स्वभावों व क्षात्र धार्मो से है। भारतीय इतिहास में रोहिला- क्षत्रिय एक गौरवशाली वंश परम्परा है जिसमें कई प्राचीन क्षत्रिय वंशों के वंशज पाए जाते है। क्येांकि यह शब्द, क्षेत्रीयता (रोहिल देश, रोहित प्रदेश रोहित गिरि आदि द्रोह देश- रोह देश) गुणधर्म (रोहित-रक्तिम वर्ण) (कसमिसि लाल रंग) युद्ध प्रणाली (रोहिल्ला-युद्ध) (पूर्व वर्णित प्रणाली) उपाधि, बहादूीर, शौर्यपदक और क्षत्रिय सम्मान से जुडा है, इसलिए जो भी क्षत्रिय राजपुत्र इन सभी से सम्बन्धित रहा- रोहिला-क्षत्रिय अथवा रोहिल्ला राजपुत्र कहलाया गया। रोहिला-पठान इस्लामीकरण के पश्चात् की पक्भजनों , (क्षत्रिय) की आधुनिक वंश परम्परा है। जबकि क्रमशः रोहिला-क्षत्रिय पुरातन काल से भारतवर्ष में एक प्रहरी के रूप में विद्यमान रहे है*। 
*सहारनपुर के प्रख्यात साहित्यकार श्री कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर ने अपने पावन ग्रन्थ ‘‘ भगवान परशुराम‘‘ में भी रोहिल देश की चर्चा की है*।

      *प्रतिष्ठित ज्योतिषी एवं ग्रन्थकार डा. सुरेश चन्द्र मिश्र ने हिन्दुस्तान दैनिक‘‘ के रविवार 20 नवम्बर 2009 के मेरठ संस्करण के पृष्ठ-2 पर ‘‘ मूल गोत्र तालिका (40गोत्र) के क्रमांक छः पर क्षत्रिय गो़त्र रोहित का वर्णन किया है। वैदिक काल में पांच की वर्ग या समुदाय आर्य क्षत्रियों के थे जो मिलकर पंचजना-पंचजन कहे जाते थे। इनके सम्मिलित निर्णय को सभी लोग विवाद की दशा में मान लेते थे। इसी शब्द की परम्परा से आज पंचायत शब्द प्रचलित है। ये पांच वशं पुरूष या गोत्रकर्ता थे*।

  *यादव कुल पुरुष यदु, पौरव वंश पुरूष पुरू, द्रहयु वंश पुरूष द्रुहयु, तुर्वषु और आनववंश पुरूष अनु, से शेष अन्य समुदाय निकले थे*।









*क्षत्रिय वंश तालिका -14 (गंधार) वं. ता.-5*

     *इन्ही पांच वंशों के पुरूषों से महापंचायत बनती थी। प्रारम्भ में इन्हीं पंचजनों से लगभग 400 क्षत्रिय गोत्रों का प्रसार हुआ*

      *भारत की पष्चिमोत्तरीय सीमा पर विदेषी आक्रमण कारियों के आक्रमणों को विफल करने के लिए वहां के निवासी क्षत्रिय वर्गो एवं शासकों ने आरम्भ से ही प्रत्येक अवसर पर आक्रान्ताओं के विरूद्ध घोर संघर्ष किया किन्तु मैदानी षासकों की दुर्बल सीमान्त निति के कारण उन्हें किसी भी प्रकार की सहायता उपलब्ध हो सकी। इसलिए सीमान्त प्रदेष के वीर प्रहरी वर्ग इन प्रबल सुगठित आकान्ताअें की अपार शक्ति के सम्मूख लगभग पाँच सौ वर्षो से अधिक संघर्ष न कर सके और सिकन्दर के आक्रमण ईसा पूर्व लगभग 326 के पष्चात् से नदियाँ घाटियाँ, पर्वताश्रय पार करने लगे और मैदानी स्थानों की तरफ पूर्व व पूर्वोत्तर की तरफ आने लगे*
*(अध्याय-9) क्षत्रिय कुल ‘ काठी क्रम सं. 5*

      *पष्चिमोत्तरीय-सीमा प्रान्त पंजाब की जातियों व समुदायों का विवरण जो कि - स्व. सर डैंजिल लिबैट्रषन द्वारा पंजाब की जनगणना सन् 1883 और सर एडवर्ड मैकलेजन द्वारा पंजाब की जनगणना 1892 पर आधारित, सर .एच.ए. रोज द्वारा संकलित कोष है*
*इसमें रोहिला परिवारों* (राजपूत-क्लेन) का पर्याप्त विवरण है।
*संकलन एवम प्रस्तुति*
*समय सिंह पुंडीर*
*२२अगस्त २०१२*
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MAHARAJA, RANVEER SINGH ROHILA,THE BRAVE KING OF ROHILKHAND

🚩 राजपूताना कठेहर रोहिलखंड के अमर अपराजित योद्धा ,एक अजेय वीर 🚩
⚔️ सूर्यवंशी क्षत्रिय सम्राट ⚔️
महाराजा रणवीर सिंह रोहिला
25 अक्टूबर — स्वाभिमान दिवस
रक्षा बंधन — शौर्य एवं बलिदान दिवस
🌞 वंश एवं कुल परिचय 🌞
महाराजा रणवीर सिंह रोहिला भारत की प्राचीन गौरवशाली रघुवंशी सूर्यवंशी निकुंभ शाखा से संबंधित थे। यह वही तेजस्वी वंश है जिसकी परंपरा मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम तक जाती है।
📜 वंश परंपरा
वंश : रघुवंश
कुल : सूर्यवंश
शाखा : निकुंभ शाखा
गोत्र : वशिष्ठ
प्रवर : वशिष्ठ
वेद : यजुर्वेद
उपवेद : धनुर्वेद
सूत्र : गुभेल
देवता : भगवान विष्णु (रघुनाथ जी)
इष्टदेव : श्री रघुनाथ जी
कुलदेवी : चावड़ा माता
उद्घोष : हर हर महादेव
ध्वजा : गरुड़ ध्वज
झंडा : पंचरंगा ध्वज
नगाड़ा : रण गंजन
नदी : सरयू
गद्दी : अयोध्या
गुणधर्म : काठी (कठोर क्षात्र स्वभाव)
मूल क्षेत्र : रावी और व्यास नदियों के मध्य का “काठे” क्षेत्र
🛕 जन्म एवं परिवार
जन्म : 25 अक्टूबर 1204 ईस्वी
तिथि : कार्तिक मास, कृष्ण पक्ष, प्रथमा
संवत : 1261 विक्रमी
पिता : महाराजा त्रिलोक सिंह जी
बलिदान दिवस : श्रावण पूर्णिमा, रक्षा बंधन (1254 ईस्वी)
महाराजा रणवीर सिंह का जन्म उस काल में हुआ जब भारत पर विदेशी इस्लामिक आक्रमण तीव्र हो चुके थे और पृथ्वीराज चौहान के पश्चात राजपूत शक्ति अत्यंत कठिन दौर से गुजर रही थी।
ऐसे समय में कठेहर रोहिलखंड की भूमि पर एक ऐसा सूर्य उदित हुआ जिसने विदेशी सल्तनत के सामने कभी सिर नहीं झुकाया।
🏰 कठेहर रोहिलखंड राज्य की स्थापना
निकुंभ वंशी कठ क्षत्रियों का इतिहास अत्यंत प्राचीन माना जाता है।
ऐतिहासिक परंपराओं के अनुसार सिकंदर के आक्रमण काल में कठगण राज्य रावी क्षेत्र में विद्यमान था जिसकी राजधानी सांकल दुर्ग (वर्तमान स्यालकोट क्षेत्र) मानी जाती है।
समय के साथ यह वीर वंश—
➡️ राजस्थान
➡️ अलवर
➡️ मंगलगढ़
➡️ जैसलमेर
➡️ सौराष्ट्र-काठियावाड़
➡️ पांचाल एवं मध्यदेश
की ओर अग्रसर हुआ।
⚔️ काठियावाड़ एवं कठेहर की स्थापना
अलवर क्षेत्र में निकुंभ वंशी कठ क्षत्रियों ने दुर्ग निर्माण करवाए।
सौराष्ट्र में “काठियावाड़” की स्थापना की।
बाद में पांचाल क्षेत्र में “कठेहर रोहिलखंड राज्य” स्थापित किया।
🛡️ राज्य विस्तार
महाराजा रणवीर सिंह के पूर्वजों द्वारा स्थापित कठेहर रोहिलखंड राज्य का विस्तार—
गंगा-यमुना दोआब तक
पश्चिम में उत्तराखंड तक
उत्तर में नेपाल तराई तक
फैला हुआ था।
📍 प्रमुख क्षेत्र
पांचाल
मध्यदेश
कठेहर (रोहिलखंड)
🏛️ राजधानी
प्रारंभिक राजधानी : रामनगर (अहिक्षेत्र के समीप)
बाद की राजधानी : रामपुर
👑 वंशावली
रामपुर संस्थापक राजा रामशाह (राम सिंह) से लेकर महाराजा रणवीर सिंह तक वंश परंपरा इस प्रकार वर्णित है—
राजा रामशाह (909 ई.)
बीजयराज
करणचंद
विम्रहराज
सावंत सिंह
जगमाल
धिंगतराम
गोकुल सिंह
महासहाय
त्रिलोक सिंह
महाराजा रणवीर सिंह रोहिला
⚔️ महाराजा रणवीर सिंह का व्यक्तित्व
1225 ईस्वी में मात्र 21 वर्ष की आयु में महाराजा रणवीर सिंह का राजतिलक हुआ। उसी वर्ष उनका विवाह विजयपुर सीकरी की राजकुमारी महारानी तारा देवी से हुआ।
🔥 अद्भुत शौर्य
लगभग 7 फीट लंबा शरीर
60 सेर का लौह कवच
25 सेर की विशाल तलवार
125 सेर शारीरिक भार
अद्वितीय युद्ध कौशल
उनके साथ 84 अजेय कवचधारी राजपूत वीर रहते थे।
🗡️ दिल्ली सल्तनत से संघर्ष
महाराजा रणवीर सिंह ने—
✅ दिल्ली सल्तनत की सेनाओं को बार-बार पराजित किया
✅ रोहिलखंड को स्वतंत्र बनाए रखा
✅ राजपूत शक्तियों को संगठित किया
✅ विदेशी अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष जारी रखा
उनकी वीरता से दिल्ली सल्तनत तक भयभीत रहती थी।
🔥 1253 ईस्वी का महासंग्राम
दिल्ली सल्तनत के सेनापति नासिरुद्दीन महमूद (चंगेज) ने विशाल सेना के साथ रोहिलखंड पर आक्रमण किया।
रामपुर और पीलीभीत के मध्य हुए युद्ध में—
⚔️ 6000 रोहिला राजपूत
⚔️ 84 लौह कवचधारी वीर
ने दिल्ली सल्तनत की लगभग 30,000 सेना को धूल चटा दी।
इतिहास वर्णन करता है कि नासिरुद्दीन महमूद बंदी बना लिया गया था, किन्तु क्षात्र धर्म निभाते हुए महाराजा रणवीर सिंह ने उसे अभयदान देकर मुक्त कर दिया।
⚠️ विश्वासघात और अमर बलिदान
पराजित महमूद ने छल का सहारा लिया।
रक्षा बंधन के दिन जब सभी राजपूत शिव मंदिर में शस्त्र पूजन हेतु निःशस्त्र थे, तब विश्वासघात कर किले के द्वार खोल दिए गए।
⚔️ अंतिम युद्ध
निहत्थे होने के बावजूद राजपूत वीरों ने युद्ध किया
महाराजा रणवीर सिंह ने अकेले अनेक शत्रुओं का संहार किया
अंतिम रक्त बूंद तक लड़ते रहे
पीठ पर वार होने के बाद भी रणभूमि नहीं छोड़ी
श्रावण पूर्णिमा, रक्षा बंधन के दिन
महाराजा रणवीर सिंह रोहिला वीरगति को प्राप्त हुए।
🔥 महारानी तारा देवी का त्याग
महाराजा के बलिदान के पश्चात् महारानी तारा देवी सती हो गईं।
आज भी रामपुर क्षेत्र में किले के अवशेष, सती स्थल एवं ऐतिहासिक ध्वस्त टीले उस वीरगाथा के मौन साक्षी माने जाते हैं।
🚩 आज भी जीवित है यह गौरवगाथा
रोहिला क्षत्रिय समाज आज भी—
🔸 25 अक्टूबर
स्वाभिमान दिवस
🔸 रक्षा बंधन
शौर्य एवं बलिदान दिवस
के रूप में मनाता है।
इस दिन शस्त्र पूजन, वीर स्मरण और समाज जागरण कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।
📜 इतिहास का संदेश
महाराजा रणवीर सिंह रोहिला का जीवन हमें सिखाता है—
✅ धर्म रक्षा सर्वोपरि है
✅ स्वाभिमान पर समझौता नहीं
✅ संगठन ही शक्ति है
✅ विश्वासघात राष्ट्र का सबसे बड़ा शत्रु है
✅ क्षात्र धर्म त्याग और बलिदान की परंपरा है
⚔️ अमर उद्घोष ⚔️
🚩 जय राजपुताना — जय कठेहर रोहिलखंड 🚩
🌞 जय सूर्यवंश 🌞
🔱 हर हर महादेव 🔱