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Sunday, 15 March 2026

DOCTOR KARAN VEER SINGH ROHILA CHANDIGARH



लोकस्मृति में जीवित सम्राट: सिद्धराज जयसिंहदेव और सोलंकी शक्ति का उत्कर्ष-

बलवीर सिंह सोलंकी बासनी खलील -

पन्द्रह लख पखरेत, अस्सी लख पाय तुरंगा। 
साठा लाख बड़ दन्त, उपर सवार चतुरंगा ।।

पांच लाख सामन्त, तीन करोड़ सिपलानो।
चौदह लाख बाणेत, एक लाख रावत और राणा।।

घूंधालो धूजे धरा, बीस लाख बाजंत बली।
सिद्धराज जयसिंह सो, मंडे न दूजो मंडली ।।

राव बड़वा,चारण,भाट, दमामी, शुभराज आदि के मुख से राजा सिद्धराज जयसिंहदेव सोलंकी के समय की यह काव्य भी सुनने में आता रहता है जो अतिश्योक्ति से खाली नहीं पाया जाता है।

यह काव्य राजा सिद्धराज जयसिंहदेव सोलंकी के यश, शक्ति और सुशासन का गौरवपूर्ण प्रतीक है। इसमें वर्णित विशाल सेना, सामंतों की एकजुटता और युद्ध-तैयारी उस युग की संगठित प्रशासनिक व्यवस्था, सैन्य अनुशासन और राजकीय सामर्थ्य को उजागर करती है। अतिशयोक्ति होते हुए भी, यह लोककाव्य तत्कालीन समाज के मन में बसे आत्मविश्वास, सुरक्षा-बोध और राजनिष्ठा को सशक्त रूप से प्रकट करता है।

यह रचना दर्शाती है कि सिद्धराज जयसिंहदेव केवल विजेता सम्राट ही नहीं, बल्कि ऐसे शासक थे जिनके नेतृत्व में राज्य स्थिर, समृद्ध और संगठित था। सामंतों, रावतों और राणाओं की व्यापक सहभागिता उनके समावेशी नेतृत्व और प्रभावशाली राजनीतिक कौशल का प्रमाण है।

अंततः यह काव्य सोलंकी युग के वैभव, शक्ति और सांस्कृतिक चेतना का उत्सव है, जो आज भी गौरव, प्रेरणा और एकता का संदेश देता है तथा सिद्धराज जयसिंहदेव को भारतीय इतिहास में एक आदर्श और प्रभावशाली सम्राट के रूप में स्थापित करता है। 

जय सोमनाथ 🙏 🚩

इतिहास गवाह है: 1191 में पृथ्वीराज चौहान से हारने से पहले मुहम्मद गौरी 1178 B. में गुजरात की सोलंकी रानी 'नायकी देवी' से बुरी तरह हारे थे। एक विधवा रानी ने माउंट आबू की तलहटी में एक बच्चे को गोद में बैठाकर सेना का नेतृत्व किया था। यह राजपूतानी शौर्य है। "

रानी वीरांगना देवी और कायदरा के बीच युद्ध (1178 A. का इतिहास) को अक्सर स्कूल की किताबों में वह जगह नहीं मिलती जिसकी वह हकदार है।
जब मुहम्मद गौरी भारत पर हमला करने का प्लान बना रहा था, तो उसने सोचा कि विधवा रानी और एक छोटे बच्चे (मूलराज II) के साथ गुजरात एक आसान टारगेट होगा। लेकिन उसे नहीं पता था कि वह अदम्य साहस के साथ सामना करने वाला है।
1178 E. ऐतिहासिक कायदरा युद्ध
रणनीतिक जानकारी: रानी वीरांगना देवी जानती थीं कि गौरी की घुड़सवार सेना मैदानी इलाकों में भारी पड़ सकती है। इसलिए वे उसे घसीटकर माउंट आबू के नीचे गदरघट्टा (कायदरा) के पहाड़ी इलाके में ले गईं, जहाँ गौरी की सेना की ताकत कमजोर हो गई थी।
युद्ध का नेतृत्व: जैसा कि आपने बताया, रानी ने अपने छोटे बेटे को पीठ पर बांधकर युद्ध के मैदान में तलवार उठाई। उन्होंने न केवल युद्ध का नेतृत्व किया, बल्कि तुर्की सेना का बुरी तरह पीछा किया।
गौरी की शर्मनाक हार: यह हार गौरी के लिए इतनी भयानक थी कि वह अपनी जान बचाने के लिए युद्ध के मैदान से भाग गया। और अगले 13 साल तक उन्होंने गुजरात की तरफ फिर कभी नहीं देखा

,इसी सोलंकी वंश में जन्मे डॉक्टर कर्ण वीर सिंह रोहिला, बर्नवाल,संपूर्ण जीवन परिचय छपा है उनके चित्र के साथ ब्लॉग में उपलब्ध है।
ok
💬⚔️🚩 *महसूस कीजिए कि डॉक्टर कर्णवीर सिंह रोहिला जी की पुण्य आत्मा आपके साथ खड़ी है और अपने जीवंत विचारो को फलीभूत कराने में आपका साथ दे रही है*
*उनका सपना यही था कि विस्थापित होते होते परचून की हालत में बिखरे इस राजपूत समुदाय को उसकी खोई हुई पहचान रोहिला क्षत्रिय के रूप में तभी मिलेगी जब भावी पीढ़ी को अन्य रोजगार मिलेंगे और विपत्ति काल में जीवन यापन के लिए किए गए कार्य बदल जायेंगे,इसके लिए शिक्षा और रोजगार आवश्यक होगा और रोहिला राजपूत क्षत्रिय महाराजा के प्रतीक बिम्ब बनेंगे और उनका प्रचार होगा इतिहास पुनः दोहराएगा तो रोहिला राजपूत समाज का स्वरूप बदलता चला जायेगा*
*आज रोहिला क्षत्रिय समाज के साथ कुछ वैसा ही आप लोग करते जा रहे हैं प्रशिक्षण संस्थान भी है लगभग चार हजार रोहिला क्षत्रिय लड़के स्वरोजगार,सरकारी गैर सरकारी सर्विस से जरिए, अनेको प्रकार से जीवन यापन और परिवार का पालन पोषण कर रहे है और उन परिवारों के रोजगार भी बदलते जा रहे हैं ,रोहिला राजपूत इतिहास को सोशल मीडिया पर राजपूत सिरदारो ने इतना प्रचार किया के कोई भी अछूता नहीं रहा,रोहिला राजपूत समाज को उसका खोया गौरव मिलता जा रहा है*
*मुझे याद है,उनके विचारों से प्रभावित होकर उनके बड़े भाई सहारनपुर में अति प्रतिष्ठित एडवोकेट चौधरी ओम प्रकाश रोहिला जी ने भटनागर धर्म शाला जनक नगर में दिनांक १२ अगस्त १९८८ को कहा था कि जब तक कोई स्थान रुहेला बिरादरी को नही मिलता, कही मंदिर नही बनता ,कोई तीर्थ स्थान नही मिलता जिसके बारे में दूसरे लोग भी जाने कि यह है रुहेलदेव का मंदिर ,जैसे कश्मीर में सुना गया है रोहिल् देव  मंदिर, तब तक आप को पहचान वापस मिलना कठिन कार्य है क्योंकि आपकी मानसिक शक्ति दम तोड चुकी है,कुछ न कुछ बनाओ चाहे एक मंदिर सहारनपुर में रुहेलदेव का ही बना दो जिसे लोग रोजाना देखे मंदिर रूहेलदेव का है*

*उनकी भाषा में जो उन्होंने कहा था तो उनके छोटे भाई डॉक्टर साहब कर्णवीर सिंह  भी सुनते रहे और मन ही मन मुस्कराते रहे*

*मैने तभी बोला था फोटो फाइल में लगा है ,""कि रोहिला राजपूत है"" और उनके पूर्वजों के बलिदानों के कारण आज आप इस तरह की बैठक कर रहे है अन्यथा सजदा करते फिरते क्यों न उन्ही मे से किसी एक वीर राजा महाराजा सनातन रक्षक विधर्मी संहारक का मंदिर बनवा लो,उस समय इतना ही ज्ञान था मुझे*
*डॉक्टर साहब बोले थे-बेटा जी आपकी भावनाएं और सपने तभी पूरे होंगे जब आप इस संगठन से जुड़े रह कर चलोगे और अपनी भावनाओं ,इच्छाओं की पूर्ति में लगे रहोगे यह ऐसा प्लेट फार्म बनेगा जिस पर बैठ कर रोहिला राजपूत समाज गर्व की अनुभूति अवश्य करेगा*

*उनके आशीर्वाद से आज आपके महाराजा रणवीर सिंह रोहिला राजपूत की जन्म जयंती राज घरानों में राजा" भींडर" मेवाड़ रणधीर सिंह भींडर महाराज अपने महल में मनाते है,कुल दीप सिंह रोहिला हरियाणा जटौली वाले का प्रयास रंग लाता है-अनेक राजपूत हस्तियां, कुंवर अजय सिंह राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा,कुंवर राजेंद्र सिंह जी नरूका सेवा निवृत कर्नल राष्ट्रीय अध्यक्ष राष्ट्रीय क्षत्रिय ज्योति मिशन,क्षत्रिय शिरोमणि अदम्य साहसी चौहान की अस्थियों को हजार साल बाद गुलामी की बेडियो से आतंकियों के चंगुल से लाने वाले भाई शेर सिंह राणा जी संस्थापक राजपा, ओकेंद्र राणा फ्रॉम हरियाणा युवाओं के दिलो की धड़कन,दादा महिपाल सिंह मकराना अध्यक्ष श्री राजपूत करणी सेना, दिवंगत हुए दादा सुखदेव सिंह गोगा महेड़ी ठाकुर पूर्ण सिंह  ,कुंवर अजय सिंह राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा रजिस्टर्ड, अभय प्रताप सिंह राणा, जय वीर सिंह राणा श्री राष्ट्रीय राजपूत करणी सेना सहारनपुर अध्यक्ष श्री नीरज चौहान आदि जिनके नाम विश्व विख्यात है सोशल मीडिया पर इनके करोड़ों फोलोवर्स है वे रोहिला राजपूत वीर क्षत्रिय सम्राट महाराजा रणवीर सिंह जी का गुणगान करते है जन्म जयंती पूरे विश्व में मनवाते है,भाई शेर सिंह राणाजी अपने साथी भाई कुलदीप सिंह रोहिला और दादा नरेंद्र सिंह चौहान को साथ लाकर महान वीर विधर्मी विनाशक सनातन रक्षक राजपूत रोहिलखंड सम्राट रणवीर सिंह रोहिला के चित्र पर पूजा करके माल्यार्पण कर रहे है*

*उन्होंने प्राचीन रोहिला किला अपनी टीम के साथ देखा और बोला गंगा से भी पवित्र रोहिलखंड की अपने पूर्वजों के रक्त से रंजित उनके खून और हड्डियों से लतपथ धरती में तुझे आज प्रणाम करता हूं तेरी भूमि की माटी हल्दी घाटी की माटी सी पवित्र है,रोहिलखंड के रामपुर को सर जमीन राजा रणवीर सिंह रोहिला के जन्म से एक राजपूत तीर्थ बन गई है*
*क्या यह किसी चमत्कार से कम नजर आता है??????*

*ऐसे ही सहारनपुर के रामपुर (भांकला गांव) की धरती राजपूताना परंपरा संचालित करने वाले डॉक्टर कर्णवीर सिंह रोहिला के जन्म से पवित्र हुई उन्होंने यहां के एक समृद्ध किसान परिवार सोलंकी बरनवाल रोहिला राजपूत समाज में श्री सुगन सिंह रोहिला जी के घर छ: जून उन्नीस सो छत्तीस(06 जून 1936ईस्वी) को जन्म लिया था और अपने व्यवहार और कार्य से इस राजपूत रोहिला परिवार (भांकला)की भूमि को प्रतिष्ठित करने और राजपूत रोहिला खाप को सम्मान दिलाने में अपना जीवन सत्रह मार्च २००० को होली के दिन समाप्त कर दिया था, समाज के कार्यों में इतने खो गए थे कि राष्ट्र पति श्री शंकर दयाल शर्मा जी के फेमिली चिकित्सक होते हुए भी अपनी परवाह करने को समय नही निकाल पाए और अपना जीवन बलिदान कर दिया,ऐसे गांव(  रामपुर) को मेरा कोटि कोटि प्रणाम जिसने रोहिला राजपूतों में अपनी संस्कृति का संचार करने के लिए ऐसे महान राजपूत सोलंकी बरनवाल रोहिला डॉक्टर कर्णवीर सिंह जी को इस समाज में जन्म देकर पुनरोद्धार और उत्कर्ष की राह दिखाई*
उनकी अभिलाषा  और सपने साकार हो रहे हैं ,पुण्य आत्माए आकार ले रही है,इतिहास पुनः अपना गौरव प्राप्त करता जा रहा है,आज आपके रोहिला राजपूत समाज के साथ भारत का सभी राजपूत समाज कंधे से कंधा मिलाए खड़ा है दादा राजेंद्र सिंह परिहार राष्ट्रीय अध्यक्ष क्षत्रिय अस्तित्व न्याय मोर्चा,रोहिला राजपूत इतिहास संरक्षण में लगे है रोहिला राजपूत युवाओं को जोड़ रहे हैं जागृति चरमोत्कर्ष पर है वो दिन दूर नही रोहिलखंड के राजपूतों का इतिहास स्कूल सेलेब्स में पढ़ाए जायेगा रोहिला क्षत्रिय भी अन्य क्षत्रिय राजपूतों की तरह ही सामान्य जाति की सूची में उल्लिखित कराया जाएगा भारत का संपूर्ण राजपूत समाज आ गया मैदान में रोहिला राजपूतों के सम्मान में*
*एक यही तो है ,यही है आशीर्वाद डॉक्टर करण वीर सिंह रोहिला जी की  पुण्य आत्मा के द्वारा दी जाती रही प्रेरणा का*
*आज एक रुहेल देव (,रोहिला राजपूत लोक देव ,सूर्य वंशी क्षत्रिय महाराजा रणवीर सिंह रोहिला) का मंदिर भी बना है क्षत्रिय सम्राट महाराजा रणवीर सिंह रोहिला चौक ,एक भव्य स्मारक,विश्व में सहारनपुर की शान एतिहासिक राष्ट्रीय धरोहर प्राचीन रोहिला किला के सामने स्थित चौक का नाम है ,आज महाराजा रणवीर सिंह रोहिला चौक ,क्या यह किसी भव्य मंदिर से कम है,सचमुच यही जीवित खड़ा दृष्टव्य रोहिला क्षत्रिय  पवित्र धाम????*
*उनके विचारों और उनके संगठन अखिल भारतीय रोहिला क्षत्रिय विकास परिषद में निष्ठा रखिए आपके सभी कार्य पूर्ण होंगे*
*आज राष्ट्र की राजधानी दिल्ली रोहिणी क्षेत्र में युवा साथी जय प्रकाश रोहिला जी के प्रयास से एक पार्क का नाम भी महान वीर राजपूत सम्राट रणवीर सिंह रोहिला जी के नाम से है,रोहिला क्षत्रिय चौक भी नागलोई में है,और सबसे पहले इस क्षेत्र में बड़ौत नगर में रोहिला राजपूत समाज की ओर से श्री अनूप सिंह रोहिला जी ने कराया था श्री मति सरला मालिक तत्कालीन नगर पालिका चेयर मैन के द्वारा एक मार्ग का नाम राजा रणवीर सिंह रोहिला मार्ग आज उनके पति विधायक के पी मालिक राज्य मंत्री जी भी हमारा साथ देते है ,और प्रेरित करते है कि जहाँ भी उनकी अवश्यकता हो वे खड़े होंगे और महाराजा रणवीर सिंह रोहिला जी के नाम पर नामकरण कराएंगे*
सहारनपुर प्राचीन रोहिला किला जो रोहिला राजाओं द्वारा निर्मित है,जिसमें आज जिला कारागार ब्रिटिश राज से प्रचलित है किंतु 18नवंबर सन 1920ईस्वी को ही अंग्रेजी शासन में जिसे भारतीय पुरातत्व विभाग के संरक्षण में दिया हुआ है,जो आज एक राष्ट्रीय धरोहर है,के सामने स्थित महाराजा रणवीर सिंह रोहिला चौक पर  लगाए गए  शिला लेखों का अनावरण कुंवर बृजेश सिंह राज्य मंत्री लोक निर्माण विभाग उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा किया जाता है,सिडको चेयरमैंन श्री वाई पी सिंह जैसे दिग्गज क्षत्रिय नेता एवं राजनीतिज्ञ इस चौक पर उपस्थिति दर्ज कराते तथा क्षत्रिय सम्राट महाराजा रणवीर सिंह रोहिला जी की भव्य प्रतिमा की अपने काफिले के साथ परिक्रमा करते है,क्या यह क्षत्रिय एकता अखंडता को बनाए रखने की एक परम्परा जो रोहिला क्षत्रिय समाज में डॉक्टर कर्ण वीर सिंह राणा द्वारा संचालित की गई थी उसका जीवित दर्शन नहीं है?

*डॉक्टर कर्णवीर सिंह रोहिला जी के ""हमे चाहिए स्वाभिमान""के उद्घोष को ध्यान में रखा वर्तमान न्यू जेनरेशन ने,जिस प्रेरणा के कारण आज युवक युवतियां प्रत्येक क्षेत्र में दर्शनीय भागीदारी कर अपना कैरियर बनाने में जुटे है,। अभिनय ,खेल , क्रिकेट कुश्ती,चिकित्सा ,मॉडलिंग एथलीट, बॉक्सिंग,गायन शिक्षा उच्च तम आई आई टी , सी पी एम टी, एन डी ए,आई ए एस,पी सी एस,भारतीय थल,जल तथा वायु सेना ,अंतरिक्ष आदि में अपना और परिवार तथा रोहिला राजपूत समाज का नाम बिना किसी आरक्षण सुविधा  के गौरवान्वित किया है क्या वह किसी सार्थक प्रयास उनकी प्रेरणा  के  श्रोत से उत्पन जिज्ञासाएं प्रतीत नहीं होती ।इसी प्रकार रोहिला क्षत्रिय  युवा शक्ति को  उनके बताए रास्ते पर ही होगा*
रोहिला औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान में भव्य पुस्तकालय  है डिजिटल लाइब्रेरी बनाई गई  है जिससे लाभान्वित होकर  छात्र छात्राएं  आधुनिक शिक्षा प्राप्त करेंगे।
उनके सुपुत्र डॉक्टर शालीन सिंह रोहिला जी ने  रोहिला क्षत्रिय समाज के उत्थान हेतु अनेक कार्य किए,आज वे भी पितृ स्थान पर ही पहुंच चुके है किंतु उनकी धर्मपत्नी डॉक्टर इंद्र जीत सिंह कौर आज भी चिकित्सा के क्षेत्र में उनके आशीर्वाद से ऊंचे आयाम पर है और दिन रात समाज सेवा को निस्वार्थ भाव से करती है,यह है डॉक्टर कर्णवीर सिंह रोहिला जी आत्मा को स्वयं के साथ महसूस करना और आशीर्वाद लेना।।
*सनातन धर्म की रक्षा के लिए उत्तर भारत का अकेला राजपूत वीर गंगा सिंह महेचा राठौड़ रोहिला राजपूत को कलायत (कैथल) के mudahad राजपुतो को साथ लेकर दुर्रानी अब्दाली ,रुहेला नजीब खान से भिड़ गया था और मराठा सेनापति के रूप में वीर गति पाई थी उन्ही की स्मृति में अंबाहेटा नकूड तिराहे पर वीर गंगा सिंह महेचा राठौड़ रोहिला राजपूत का स्मारक और उनकी रानी राम प्यारी देवी की सती समाधि बन कर तैयार किए जाने के प्रस्ताव आ रहे है,राजपूत स्मार्स्को को संरक्षित किया जा रहा है*
उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में क्षत्रिय सम्राट महाराजा रणवीर सिंह रोहिला चौक का प्रस्ताव ,विचाराधीन है,वहां के महापौर ने पूरा आश्वासन दिया है, विश्व प्रसिद्ध नगर रूड़की में भी गंगनहर पर एक घाट तथा एक चौक का नामकरण क्षत्रिय सम्राट महाराजा रणवीर सिंह रोहिला के नाम पर किए जाने की पूरी संभावना है,वहां की युवा शक्ति पूरी लगन के साथ प्रयास कर रही है।
*तीर्थ नगरी हरिद्वार में उत्तराखंड में एक घाट जहा उनकी अस्थियां प्रवाहित हुई थी उस घाट का नाम होगा महाराजा रणवीर सिंह रोहिला घाट* चौक की स्थापना आदि ये सभी सोच और कार्य सम्पादन ही उनकी अभिलाषा थी जिसे आप सभी उनके द्वारा  संस्थापित, अखिल भारतीय रोहिला क्षत्रिय विकास परिषद रजिस्टर्ड,1988 ईस्वी संबद्ध अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा रजिस्टर्ड 1897ईस्वी के सानिध्य में ही बड़ी आशा के साथ पूर्ण करेंगे ।।। 

*#सोलंकी_वंश_वीर_योद्धाओ_का_इतिहास*

*👉 दद्दा चालुक्य पहले राजपूत योद्धा थे जिन्होंने गजनवी को सोमनाथ मंदिर लूटने से रोका था।*

👉 भीमदेव द्वितीय ने मोहम्मद गोरी की सेना को 2 बार बुरी तरह से हराया और मोहम्मद गोरी को दो साल तक गुजरात के कैद खाने में रखा और बाद में छोड़ दिया जिसकी वजह से मोहम्मद गोरी ने तीसरी बार गुजरात की तरफ आँख उठाना तो दूर जुबान पर नाम तक नहीं लिया ।

👉 सोलंकी सिद्धराज जयसिंह इनके बारे में तो जितना कहे कम है 56 वर्ष तक गुजरात पर राज किया सिंधदेश, मध्यप्रदेश, राजस्थान का कुछ भाग, सोराष्ट्र, तक इनका राज्य था सबसे बड़ी बात तो यह है की यह किसी अफगान, और मुग़ल से युद्ध भूमि में हारे नहीं बल्कि उनको धुल चटा देते थे सिद्धराज जयसिंह और कुमारपाल ने व्यापार के नए-नए तरीके खोजे जिससे गुजरात और राजस्थान की आर्थिक स्थितिया सुधर गयी गरीबो को काम मिलने लगा और सब को काम की वजह से उनके घर की स्थितियां सुधर गयी।

👉 पुलकेशी महाराष्ट्रा, कर्नाटक, आँध्रप्रदेश तक इनका राज्य था इनके समय भारत में ना तो मुग़ल आये थे और ना अफगान थे उस समय राजपूत राजा आपस में लड़ाई करते थे अपना राज्य बढ़ाने के लिए।

👉 किल्हनदेव सोलंकी ( टोडा-टोंक ) इन्होने दिल्ली पर हमला कर बादशाह की सारी बेगमो को उठाकर टोंक के नीच जाति के लोगो में बाट दिया क्यूंकि दिल्ली का सुलतान बेगुनाह हिन्दुओ को मारकर उनकी बीवी, बेटियों, बहुओ को उठाकर ले जाता था इनका राज्य टोंक, धर्मराज, दही, इंदौर, मालवा तक फैला हुआ था।

👉 मांडलगढ़ के बल्लू दादा ने अकेले ही अकबर के दो खास ख्वाजा अब्दुलमाजिद और असरफ खान की सेना का डट कर मुकाबला किया और मौत के घाट उतार दिया हल्दीघाटी में महाराणा प्रताप के साथ युद्ध में काम आये बल्लू दादा के बाद उनके पुत्र नंदराय ने मांडलगढ़ – मेवाड की कमान अपने हाथों में ली इन्होने मांडलगढ़ की बहुत अच्छी तरह देखभाल की लेकिन इनके समय महाराणा प्रताप जंगलो में जिवन गुजार रहे थे और अकबर ने मान सिंह के साथ मिलकर मांडलगढ़ पर हमला कर दिया और सभी सोलंकियों ने उनका मुकाबला किया और लड़ते हुए वीरगति प्राप्त की।

👉 वच्छराज सोलंकी इन्होने गौ हथ्यारो को अकेले ही बिना सैन्य बल के लड़ते हुए धड काटने के बाद भी 32 किलोमीटर तक लड़ते हुए गए अपने घोड़े पर और गाय चोरो को एक भी गाय नहीं ले जने दी और सब को मौत के घात उतार कर अंत में वीरगति को प्राप्त हो गए जिसकी वजह से आज भी गुजरात की जनता इनकी पूजती है और राधनपुर-पालनपुर में इनका एक मंदिर भी बनाया हुआ है।

👉 भीमदेव प्रथम जब 10-11 वर्ष के थे तब इन्होने अपने तीरे अंदाज का नमूना महमूद गजनवी को कम उमर में ही दिखा दिया था महमूद गजनवी को कोई घायल नहीं कर पाया लेकिन इन्होने दद्दा चालुक्य की भतीजी शोभना चालुक्य (शोभा) के साथ मिलकर महमूद गजनवी को घायल कर दिया और वापस गजनी-अफगानिस्तान जाने पर विवश कर दिया जिसके कारण गजनवी को सोमनाथ मंदिर लूटने का विचार बदलकर वापस अफगानिस्तान जाना पड़ा।

👉 कुमारपाल इन्होने जैन धर्म की स्थापना की और जैनों का साथ दिया गुजरात और राजस्थान के व्यापारियों को इन्होने व्यापार करने के नए – नए तरीके बताये और वो तरीके राजस्थान के राजाओ को भी बेहद पसंद आये और इससे दोनों राज्यों की शक्ति और मनोबल और बढ़ गया और गुजरात, राजस्थान की जनता को काम मिलने लगे जिससे उनके घरो का गुजारा होने लगा।

👉 राव सुरतान के समय मांडू सुल्तान ने टोडा पर अधिकार कर लिया तब बदनोर – मेवाड की जागीर मिली राणा रायमल उस समय मेवाड के उतराधिकारी थे राव सुरतान की बेटी ने शर्त रखी मैं उसी राजपूत से शादी करुँगी जो मुझे मेरी जन्म भूमि टोडा दिलाएगा।
तब राणा रायमल के बेटे राणा पृथ्वीराज ने उनका साथ दिया पृथ्वीराज बहुत बहादूर था और जोशीला बहुत ज्यादा था चित्तोड़ के राणा पृथ्वीराज, राव सुरतान सिंह और राजकुमारी तारा बाई ने टोडा-टोंक पर हमला किया और मांडू सुलतान को तारा बाई ने मौत के घाट उतार दिया और टोडा पर फिर से सोलंकियों का राज्य कायम किया।

👉 तारा बाई बहुत बहादूर थी उसने अपने वचन के मुताबिक राणा पृथ्वीराज से विवाह किया ऐसी सोलंकिनी राजकुमारी को सत सत नमन यहाँ पर मान सिंह और अकबर खुद आया था युद्ध करने और पूरे टोडा को 1 लाख मुगलों ने चारो और से गैर लिया सोलंकी सैनिको ने भी अकबर की सेना का सामना किया और अकबर के बहुत से सैनिको को मार गिराया और अंत में सब ने लड़ते हुए वीरगति पाई।

जय राजपूताना जय मां भवानी क्षत्रिय धर्म युगे युगे।

*रोहिला क्षत्रिय शिरोमणि डॉक्टर कर्ण वीर सिंह रोहिला जी जी की 91वी जयंती 06/06/ 2026दिन रविवार को एक युवा जनचेतना महोत्सव के रूप में मनाई जाएगी हर वर्ष उनकी जयंती छ जून को स्वाभिमान दिवस के रूप में मनाई जाती है।

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डॉक्टर कर्ण वीर सिंह रोहिला अमर रहे।
 राजमाता रामकुमारी देवी अमर रहे।
डॉक्टर शालीन सिंह रोहिला अमर रहे।
डॉक्टर इंद्र जीत सिंह कौर जिंदाबाद।
जय जय भवानी,जय कालिका चामुण्डा माता,
*जय जय मां शाकंभरी*
जय राजपूताना रोहिलखंड,बुंदेलखंड,
*जय जय राजपूताना*
*क्षत्रिय एकता जिंदाबाद*
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Saturday, 14 March 2026

ROHILA RAJPUT OF TOMAR (तंवर)VANSH GOTRA

तोमर वंश की पांडववीर अर्जुन से दिल्लीपति 
महाराजा अनंगपाल तक की वंशावली :-
1. अर्जुन
2. अभिमन्यु
3. परिक्षत
4. जनमेजय
5. अश्वमेघ
6. दलीप
7. छत्रपाल
8. चित्ररथ
9. पुष्टशल्य
10. उग्रसेन
11. कुमारसेन
12. भवनति
13. रणजीत
14. ऋषिक
15. सुखदेव
16.नरहरिदेव
17. सूचीरथ
18. शूरसेन
19. दलीप द्वितीय
20. पर्वतसेन
21. सोमवीर
22. मेघाता
23. भीमदेव
24. नरहरिदेव द्वितीय
25. पूर्णमल
26. कर्दबीन
27. आपभीक
28. उदयपाल
29. युदनपाल
30. दयातराज
31. भीमपाल
32. क्षेमक
33. अनक्षामी
34. पुरसेन
35. बिसरवा
36. प्रेमसेन
37. सजरा
38. अभयपाल
39. वीरसाल
40. अमरचुड़
41. हरिजीवि
42. अजीतपाल
43. सर्पदन
44. वीरसेन
45. महेशदत्त
46. महानिम
47. समुद्रसेन
48. शत्रुपाल
49. धर्मध्वज
50. तेजपाल
51. वालिपाल
52. सहायपाल
53. देवपाल
54. गोविन्दपाल
55. हरिपाल
56. गोविन्दपाल द्वितीय
57. नरसिंह पाल
58. अमृतपाल
59. प्रेमपाल
60. हरिश्चंद्र
61. महेंद्रपाल
62. छत्रपाल
63. कल्याणसेन
64. केशवसेन
65. गोपालसेन
66. महाबाहु
67. भद्रसेन
68. सोमचंद्र
69. रघुपाल
70. नारायण
71. भनुपाद
72. पदमपाद
73. दामोदरसेन
74. चतरशाल
75. महेशपाल
76. ब्रजागसेन
77. अभयपाल
78. मनोहरदास
79. सुखराज
80. तंगराज
81. तुंगपाल – 
इनके नाम से इनके वंशज तोमर या तंवर राजपूत कहलाते हैं।
82. अनंगपाल तंवर (तोमर) – 
दिल्ली राज्य के संस्थापक, इस वंशावली से पता चलता है कि अनंगपाल तंवर और तंवर(तोमर) वंश चंद्रवंशी क्षत्रिय हैं, और इनका संबंध पाण्डु-पुत्र-अर्जुन से जुड़ता हैं।

🇮🇳⚔️ दिल्ली की स्थापना - तोमर राजपूतों की शानदार विरासत
बहुत कम लोग जानते हैं कि भारत की राजधानी दिल्ली की स्थापना का क्रेडिट तोमर राजपूतों को जाता है।
इतिहास के पन्नों में दर्ज है कि हरियाणा और आस-पास के इलाकों के मूल निवासी तोमर राजपूतों ने दिल्ली को एक ऑर्गनाइज़्ड और मज़बूत शहर बनाया।
⚔️ 8वीं सदी में राजा अनंगपाल तोमर प्रथम ने तोमर वंश की नींव रखी।
इसके बाद उनके वंशजों ने इस इलाके में अपनी ताकत और शासन को मज़बूत किया।
एक बार फिर महान राजा अनंगपाल तोमर II हुए, जिन्होंने 11वीं सदी में दिल्ली को फिर से ऑर्गनाइज़ किया और इसे एक पावरफुल पॉलिटिकल सेंटर बनाया।
उनके राज में रेड कोट किला बनाया गया, जिसे दिल्ली का पहला बड़ा किला माना जाता है।
बाद में यह किला राय पिथौरा के नाम से मशहूर हुआ, जब चौहान वंश ने दिल्ली की सत्ता संभाली।
⚔️ तोमर राजपूतों की बहादुरी, दूर की सोच और ऑर्गनाइज़ेशन पावर ने इस इलाके को सुरक्षित और खुशहाल बनाया। इसी मज़बूत नींव पर आगे बढ़ते हुए दिल्ली भारत के सबसे अहम शहरों में से एक बन गया।
इतिहास यह साफ़ बताता है।
दिल्ली को असल में बसाने का क्रेडिट तोमर राजपूतों को जाता है।
🙏 तोमर वंश के उन महान वीरों को कोटि-कोटि नमन, जिनकी दूरदर्शिता और बहादुरी ने भारत के इतिहास में अमिट छाप छोड़ी।
अगर आपको अपने शानदार इतिहास पर गर्व है — तो सच्चाई जाने । दिल्ली से। तोमर, तंवर राजपूत उत्तर भारत में बहुत फैले तथा बहु गोत्र उप गोत्रों में बिखरते गए।
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💬"जय राजपूताना ⚔️"
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तंवर/तोमर वंश की अनेक  शाखाएं इस प्रकार है तंवर वंश को अर्जुनायन वंश भी कहा गया है.इसकी 22 मुख्य शाखाएँ है जो पूरे उत्तर एवं मध्य भारत में फैलीं हुई है। तवंर वंश के मूल पुरुष पांडूपुत्र अर्जुन के पौत्र परीक्षित जी को बताया जाता है। तंवर वंश की 22 प्रमुख शाखाएं इस प्रकार है.....

==========जावला तंवर ===========
जावला या अनंगपाल के वंशज जावला तंवर कहलाए,रुनेचा,असील जी के तंवर,जाटू,सांपला(सिम्पल) आदि इनकी शाखाएँ हैं,सांपला(सिम्पल),रुनेचा जैसलमेर में मिलते हैं,लोकदेवता रामदेव इसी रुनेचा शाखा से थे,

========ग्वालेरा तंवर==============
दिल्ली छूटने के बाद ग्वालियर पर शासन करने के कारण यहाँ के तोमर ग्वालेरा कहलाए 

===========जाटू तंवर ==============
जाटू तंवर राजपूत वंश राजा अंगपाल द्वितीय के पौत्र व राजा शालीवाहन तंवर के पुत्र राव जैरथ जी जिन्हे जाटू जी कहा जाता था,के कुटुंब से आगे बढ़ा। राव जाटू के साथ उनके भाई रघु व अंगपाल तंवर प्रथम के पुत्र सतरौला का कुटुंब आज हरयाणा के रोहतक , महेंद्रगढ़ , हिसार, कैथल , कुरुक्षेत्र और खासकर भिवानी में वास करता है। एक समय में इनके राज्य के अधीन लगभग 1440 गाँव थे। आज जाटू तंवरों के चौरासी गाँव भिवानी और आस पास के जिलों में वास करती है। पूर्व जनरल वीके सिंह भी तंवरों की इसी शाखा से है। भिवानी शहर की स्थापना भी इन्ही तंवरों ने की। अब से कुछ समय पहले तक भी सरकारी दस्तावेजों में इस इलाके को तीन टप्पों या टप्पा में बसा हुआ माना व जाना जाता था जो की जाटू, रघु व सतरौला राजाओ की परागनाएँ थी।

इन तीनो तंवरो के वंशजों को अपनी जागीरें बढ़ने के अवसर मिले , जिनमे जाटू के वंशज काफी फैले और उम्र सिंह ने तोशाम का इलाका कब्जे में ले लिया इस कारण इलाका उमरैण टप्पा कहलाया जाने लगा। ऐसे ही भिवानी बछोअन टप्पा कहलाता था। जाटू के सिवानी वाले वंशजों को रईस कहा जाता था और तलवंडी में बसे वंशजों को राणा कहा जाने लगा।

======== जंघारा तंवर ============

जंघारा तंवर तंवरों में सबसे लड़ाकू शाख मानी जाती है। जंघारा शब्द ही जंग व अहारा शब्द को जोड़ कर बना है जिसका अर्थ है जो वंश जंग के लिए भूखा हो। जंघारा तंवरों की वंशावली अंगपाल के पोत्र राव जगपाल से होती है। यह तंवर इन्दौरिया तंवरो के भी भाई है। दिल्ली में चौहानो के कब्जे के बाद जंघारा तंवर तंवरों की मुख्या शाखा से अलग हो रोहिलखण्ड के इलाके की ओर राजकुमार धापू धाम के नेतृत्व में कूच कर गए। जंघारा राजपूतों ने बरेली व आस पास से चौदवीं शताब्दी में ग्वालों अहीरों व कठेरिया राजपूतों को युद्ध में हरा कर बहार निकाला। इन्होने रूहेला पठानों को भी कभी चैन से नहीं बैठने दिया , जंघारा राजपूतो की बहादुरी व लड़ाकूपन को देखते हुए ब्रिटिश काल में इनकी भर्ती सेना में ऊँचे ओहदों पर की जाती थी।

=========पठानिया तंवर============

पठानिया तंवर राजा अनंगपाल तंवर के अनुज राजा जैतपाल के वंशज है जिन्होंने उत्तर भारत में धमेरी नाम के राज्य की स्थापना की और पठानकोट नामक शहर बसाया। धमेरी राज्य का नाम बाद में जा कर नूरपुर पड़ा। यह वंश सं 1849 तक विदेशी आक्रमणकारियों के विरुध अपने संघर्षों के लिए जाना जाता है चाहे मुस्लमान हो या अंग्रेज। सं 1849 में नूरपुर अंग्रेजो के अधीन हो गया। इस वंश के राजा राम सिंह पठानिया अंग्रेजों के विरुद्ध अपनी वीरता के लिए विख्यात हैं,यह वंश इतना बहादुर व झुझारू है के आजादी के बाद भी पठानिया राजपूतों ने 3 महावीर चक्र प्राप्त किये। आज पठानिया राजपूत उत्तर पंजाब व हिमाचल में फैले हुए है।

============जंजुआ वंश ==============

जंजुआ वंश भी तंवर राजपूतों की तरह अर्जुन के वंशज माने जाते है। जंजुआ राजपूतों की उत्पत्ति व नाम अर्जुन के वंशज राजा जनमेजय से मानी जाती है जिनके ऊपर इनके वंश का नाम पड़ा। जंजुआ वंश तंवर वंश के भाई के रूप में देखा जाता है।जंजुआ राजपूतों के राज्य पूर्वी पाकिस्तान के इलाके में रहे है। इस वंश के ऊपर डिटेल्ड पोस्ट आने वाले समय में की जाएगी। ज्यादातर जंजुआ राजपूतों की खाप आज के पाकिस्तान में पायी जाती है जो मुस्लिम बन चुके है। कुछ जंजुआ राजपूतो के गाँव आज भी पंजाब में मौजूद है और वो हिन्दू राजपूत है। जंजुआ एक बहुत ही झुझारू व बहादुर वंश माना जाता है।पाकिस्तान के कई बड़े आर्मी जनरल जंजुआ राजपूत हैं,अंग्रेजो ने भी जंजुआ राजपूतो को पंजाब की सबसे लड़ाकू कौम बताया था.कबूल का प्रसिद्ध शाही वंश भी जंजुआ राजपूत वंश ही माना जाता है,जिन्होंने गजनवी से लम्बे समय तक संघर्ष किया था.यही नहीं इसके वंशज वीर पोरस को भी अपना पूर्वज मानते हैं जिन्होंने सिकन्दर को भी हरा दिया था.

===========जर्राल वंश ===============

ये भी तंवर वंश की शाखा हैं,इन्होने तराइन के दोनों युद्धों में प्रथ्विराज चौहान के साथ मिलकर गौरी का मुकाबला किया था,इसके बाद किसी कारणवश इस्लाम स्वीकार कर लिया,मध्य काल में इनका राज्य हरियाणा के कलानौर,जम्मू कश्मीर के राजौरी में था,इन्होने पठानों,सिखों,ब्रिटिशों और डोगरो से खूब लड़ाई लड़ी और कभी भी आसानी से किसी के काबू नहीं आये,आज इनकी आबादी अधिकतर जम्मू कश्मीर,पाकिस्तान में मिलती है,

============बेरुआर वंश

बेरुआर वंश तंवर वंश की ही एक शाखा है जिसने पूर्वी उत्तरप्रदेश के बलिया व मुज़्ज़फ़्फ़रपुर जिले पर राज किया। भाटों के अनुसार पूर्वी उत्तर प्रदेश में बेरुर नाम की जन जाती को पराजय कर कर बेरुआरी तंवरों ने राज्य स्थापित किया जिस कारण इनका नाम बेरु + आरी यानि दुश्मन पर पड़ा। बेरुआर वंश के कई गाँव आज बिहार के मिथिलांचल इलाके,फ़ैजाबाद,बलिया,गाजीपुर,बनारस,छपरा आदि जिलो में पाए जाते है,यह वंश पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार सीमा पर सबसे शक्तिशाली राजपूत वंशो में एक है.

===========इन्दौरिया / इंदोलिया तंवर =========
इन्दौरिया तंवर सम्राट अनंगपाल तोमर के पुत्र इंदुपाल के वंशज है। इन्दौरिया तंवरों के ठिकाने आज झाँसी दतिया धौलपुर आदि में पाए जाते है। दिल्ली के गौरी द्वारा ध्वस्त हो जाने के बाद यह शाख भी इन इलाकों में आ बसी।

============= इन्दा तंवर ============
यह खाप आज के मध्य प्रदेश के ग्वालियर के आस पास के इलाके में बसी हुई है। इस खाप को लडूवा तंवर भी कहते है।

=========बिलदारिया तंवर ============
राजा बंसोली के वंशज भागपाल ने बीदासर में राज्य स्थापित किया। बीदासर से जो तंवर निकले वे तंवर बिलदारिया कहलाये। इनके गाँव उत्तर प्रदेश के कानपूर बलिया उन्नाव आदि जिलों में है।

========खाती तंवर ===========
यह तंवर गढ़वाल के खात्मस्यु के अधिकारी थे। इससे पहले इनका निकास आगरा मुरेना के तोमरधार से माना गया है। आज यह शाख गढ़वाल में बस्ती है।

=============सतरावला तंवर========= 
अंगपाल के पुत्र सतरौल के वंशज। भिवानी हरियाणा के आस पास रहते है।

===============सोम वंश ============
सम्राट अनंगपाल उर्फ़ जावल के पुत्र सोम के वंशज। इन्हे सुमाल भी कहा जाता है। 
कुछ लोग इन्हें पांडू पुत्र भीम का वंश भी मानते हैं ।ईस्ट यूपी के सोमवंशी राजपूत इनसे अलग हैं।
सुमाल आज भी दिल्ली के रिठाला गाँव के मूल निवासी है। सुमाल रिठाला के आस पास के गाँवो के अलावा उत्तर प्रदेश के मुज़्ज़फरनगर व मेरठ के 24 गाँवो में पाए जाते है यहाँ इन्हे सोम कहा जाता है। उत्तर प्रदेश के मशहूर भाजपा नेता संगीत सोम इसी वंश से है।

============= कोड्यां तंवर============= 
जावाल के पुत्र पर ही इस खाप का नाम पड़ा। आज राजस्थान के सीकर जिले में डाबला के आस पास इनके गाँव पड़ते है।

============निहाल तंवर ============
ये भी दिल्ली पति अनंगपाल उर्फ़ जावल के वंश से है आज मध्यप्रदेश में पाए जाते है।
============सेलेरिया तंवर ==========
ये भी दिल्ली पति जावल के वंश से है। इन्हे सुनियार भी कहा जाता है ये मध्य प्रदेश के विदिशा में बस्ते है।

===============घोड़ेवा तंवर ===========
नूरपुर हिमाचल के तंवर घोड़ेवा शाशक कहलाए।

===========तिलोता तंवर =========
बिहार के आरा शाहबाद भोजपुर और यूपी के झाँसी जालौन जिले में निवास करते है।

===============जनवार राजपूत ============ 
उत्तर प्रदेश के बलरामपुर गंगवाल ऑइल प्रयागपुर इनके ठिकाने है। जनवार राजपूत झाँसी दतिया और बुंदेलखंड में भी पाए जाते है. जनवार तंवरों की शाखा के बजाये भाई बंध माने जाते है जो राजा तुंगपाल से पहले इस वंश से अलग हो गए।

================कटियार तंवर =========
धर्मपुर राज्य जिला हरदोई उत्तर प्रदेश कटियार तंवर राजपूतों का है

============पालीवार तंवर ============
उत्तरप्रदेश के गोरखपुर व फैज़ाबाद जिलो में इनके गाँव है।

================द्वार तंवर ============
यु पी के जालौन झाँसी व हमीरपुर जिलों में पाए जाते है

==============जरोलिया तंवर ====
यु पी के बुलंद शहर के आस पास के तंवर जरोलिया कह लाते है।कुछ जगह इन्हें गौड़ वंश की शाखा भी लिखा है।

=============रघु तंवर ===============
रघु तंवर जाटू तंवर के भाई माने जाते है और भिवानी के आस पास आज बसे हुए है।
===========अन्य तंवर शाखाये :=============
रैक्वाल तिलोता किसनातिल चंदेरिया रिटालिया मोहाल जोधाण अनवार बिलोड़िया अंगडिया मगरोठिया पन्ना बोधयाणा कोढयाना बेबत भैपा तुनिहान आदि '.

=========मराठा क्षत्रियों में तंवर वंश =========
मराठा तंवर मराठा तौर ठाकुर नाम से जाना जाता है.तौर ठाकुर के मराठवाडा प्रांत मे गोदावरी नदी के तीर पर २२ गाँव है.इस प्रांत को गंगथडी भी कहा जाता है,इसके अलावा मराठो में तावडे या तान्वरे,शिर्के भी तंवर वंशी हैं.

चन्द्रवंशी तंवर (तोमर) राजपूतो का इतिहास

तोमर या तंवर उत्तर-पश्चिम भारत का एक राजपूत वंश है। तोमर राजपूत क्षत्रियो में चन्द्रवंश की एक शाखा है और इन्हें पाण्डु पुत्र अर्जुन का वंशज माना जाता है.इनका गोत्र अत्री एवं व्याघ्रपद अथवा गार्गेय्य होता है। क्षत्रिय वंश भास्कर,पृथ्वीराज रासो,बीकानेर वंशावली में भी यह वंश चन्द्रवंशी लिखा हुआ है,यही नहीं कर्नल जेम्स टॉड जैसे विदेशी इतिहासकार भी तंवर वंश को पांडव वंश ही मानते हैं।

उत्तर मध्य काल में ये वंश बहुत ताकतवर वंश था और उत्तर पश्चिमी भारत के बड़े हिस्से पर इनका शाशन था। देहली जिसका प्राचीन नाम ढिल्लिका था, इस वंश की राजधानी थी और उसकी स्थापना का श्रेय इसी वंश को जाता है।

नामकरण---------

तंवर अथवा तोमर वंश के नामकरण की कई मान्यताएं प्रचलित हैं,कुछ विद्वानों का मानना है कि राजा तुंगपाल के नाम पर तंवर वंश का नाम पड़ा,पर सर्वाधिक उपयुक्त मान्यता ये प्रतीत होती है 

इतिहासकार ईश्वर सिंह मडाड की राजपूत वंशावली के पृष्ठ संख्या 228 के अनुसार,,,,,,,

"पांडव वंशी अर्जुन ने नागवंशी क्षत्रियो को अपना दुश्मन बना लिया था,नागवंशी क्षत्रियो ने पांड्वो को मारने का प्रण ले लिया था,पर पांडवो के राजवैध धन्वन्तरी के होते हुए वे पांड्वो का कुछ न बिगाड़ पाए !अतः उन्होंने धन्वन्तरी को मार डाला !इसके बाद अभिमन्यु पुत्र परीक्षित को मार डाला !परीक्षित के बाद उसका पुत्र जन्मेजय राजा बना !अपने पिता का बदला लेने के लिए जन्मेजय ने नागवंश के नो कुल समाप्त कर दिए !नागवंश को समाप्त होता देख उनके गुरु आस्तिक जो की जत्कारू के पुत्र थे,जन्मेजय के दरबार मैं गए व् सुझाव दिया की किसी वंश को समूल नष्ट नहीं किया जाना चाहिए व सुझाव दिया की इस हेतु आप यज्ञ करे !महाराज जन्मेजय के पुरोहित कवष के पुत्र तुर इस यज्ञ के अध्यक्ष बने !

इस यग्य में जन्मेजय के पुत्र,पोत्र अदि दीक्षित हुए !क्योकि इन सभी को तुर ने दीक्षित किया था इस कारण ये पांडव तुर,तोंर या बाद तांवर तंवर या तोमर कहलाने लगे !ऋषि तुर द्वारा इस यज्ञ का वर्णन पुराणों में भी मिलता है.

महाभारत काल के बाद तंवर वंश का वर्णन----------

महाभारत काल के बाद पांडव वंश का वर्णन पहले तो 1000 ईसा पूर्व के ग्रंथो में आता है जब हस्तिनापुर राज्य को युधिष्ठर वंश बताया गया,पर इसके बाद से लेकर बौद्धकाल,मौर्य युग से लेकर गुप्तकाल तक इस वंश के बारे में कोई जानकारी नहीं मिलती,समुद्रगुप्त के शिलालेख से पाता चलता है कि उन्होंने मध्य और पश्चिम भारत की यौधेय और अर्जुनायन क्षत्रियों को अपने अधीन किया था,यौधेय वंश युधिष्ठर का वंश माना जा सकता है और इसके वंशज आज भी चन्द्रवंशी जोहिया राजपूत कहलाते हैं जो अब अधिकतर मुसलमान हो गए हैं,इन्ही के आसपास रहने वाले अर्जुनायन को अर्जुन का वंशज माना जा सकता है और ये उसी क्षेत्रो में पाए जाते थे जहाँ आज भी तंवरावाटी और तंवरघार है,यानि पांडव वंश ही उस समय तक अर्जुनायन के नाम से जाना जाता था और कुछ समय बाद वही वंश अपने पुरोहित ऋषि तुर द्वारा यज्ञ में दीक्षित होने पर तुंवर, तंवर,तूर,या तोमर के नाम से जाना गया.(इतिहासकार महेन्द्र सिंह तंवर खेतासर भी अर्जुनायन को ही तंवर वंश मानते हैं)

तंवर वंश और दिल्ली की स्थापना ------------

ईश्वर का चमत्कार देखिये कि हजारो साल बाद पांडव वंश को पुन इन्द्रप्रस्थ को बसाने का मौका मिला,और ये श्रेय मिला अनंगपाल तोमर प्रथम को.
दिल्ली के तोमर शासको के अधीन दिल्ली के अलावा पंजाब ,हरियाणा,पश्चिमी उत्तर प्रदेश भी था,इनके छोटे राज्य पिहोवा,सूरजकुंड,हांसी,थानेश्वर में होने के भी अभिलेखों में उल्लेख मिलते हैं.इस वंश ने बड़ी वीरता के साथ तुर्कों का सामना किया और कई सदी तक उन्हें अपने क्षेत्र में अतिक्रमण करने नहीं दिया

दिल्ली के तंवर(तोमर) शासक (736-1193 ई)------

1.अनगपाल तोमर प्रथम (736-754 ई)-दिल्ली के संस्थापक राजा थे जिनके अनेक नाम मिलते हैं जैसे बीलनदेव, जाऊल इत्यादि।
2.राजा वासुदेव (754-773)
3.राजा गंगदेव (773-794)
4.राजा पृथ्वीमल (794-814)-बंगाल के राजा धर्म पाल के साथ युद्ध
5.जयदेव (814-834)
6.राजा नरपाल (834-849)
7.राजा उदयपाल (849-875)
8.राजा आपृच्छदेव (875-897)
9.राजा पीपलराजदेव (897-919)
10.राज रघुपाल (919-940)
11.राजा तिल्हणपाल (940-961)
12.राजा गोपाल देव (961-979)-इनके समय साम्भर के राजा सिहराज और लवणखेडा के तोमर सामंत सलवण के मध्य युद्ध हुआ जिसमें सलवण मारा गया तथा उसके पश्चात दिल्ली के राजा गोपाल देव ने सिंहराज पर आक्रमण करके उन्हें युद्ध में मारा
12.सुलक्षणपाल तोमर (979-1005)-महमूद गजनवी के साथ युद्ध किया
13.जयपालदेव (1005-1021)-महमूद गजनवी के साथ युद्ध किया, महमूद ने थानेश्वसर ओर मथुरा को लूटा
14.कुमारपाल (1021-1051)-मसूद के साथ युद्ध किया और 1038 में हाँसी के गढ का पतन हुआ, पाच वर्ष बाद कुमारपाल ने हासी, थानेश्वसर के साथ साथ कांगडा भी जीत लिया

16.अनगपाल द्वितीय (1051-1081)-लालकोट का निर्माण करवाया और लोह स्तंभ की स्थापना की, अनंगपाल द्वितीय ने 27 महल और मन्दिर बनवाये थे।दिल्ली सम्राट अनगपाल द्वितीय ने तुर्क इबराहीम को पराजित किया

17.तेजपाल प्रथम(1081-1105)
18.महिपाल(1105-1130)-महिलापुर बसाया और शिव मंदिर का निर्माण करवाया
19.विजयपाल (1130-1151)-मथुरा में केशवदेव का मंदिर

20.मदनपाल(1151-1167)-
मदनपाल अथवा अनंगपाल तृतीय के समय अजमेर के प्रतापी शासक विग्रहराज चौहान उर्फ़ बीसलदेव ने दिल्ली राज्य पर अपना अधिकार कर लिया और संधि के कारण मदनपाल को ही दिल्ली का शासक बना रहने दिया,मदनपाल ने बीसलदेव के साथ मिलकर तुर्कों के हमलो के विरुद्ध युद्ध किया और उन्हें मार भगाया,मदलपाल तोमर ने विग्रहराज चौहान उर्फ़ बीसलदेव के शोर्य से प्रभावित होकर उससे अपनी पुत्री देसलदेवी का विवाह किया,पृथ्वीराज रासो में बाद में किसी ने काल्पनिक कहानी जोड़ दी है कि दिल्ली के राजा अनंगपाल ने अपनी दो पुत्रियों की शादी एक कन्नौज के जयचंद के साथ और दूसरी कमला देवी का विवाह पृथ्वीराज चौहान के साथ की,जिससे पृथ्वीराज चौहान का जन्म हुआ,जबकि सबसे प्रमाणिक ग्रन्थ पृथ्वीराज विजय के अनुसार सच्चाई ये है कि पृथ्वीराज चौहान की माता चेदी राज्य की कर्पूरी देवी थी,और पृथ्वीराज चौहान न तो अनंगपाल तोमर का धेवता था न ही जयचंद उसका मौसा था,ये सारी कहानी काल्पनिक थी.

21.पृथ्वीराज तोमर(1167-1189)-अजमेर के राजा सोमेश्वर और पृथ्वीराज चव्हाण इनके समकालीन थे
22.चाहाडपाल/गोविंदराज (1189-1192)-पृथ्वीराज चौहान के साथ मिलकर गोरी के साथ युद्ध किया,तराईन दुसरे युद्ध मे मारा गया।पृथ्वीराज रासो के अनुसार 
तराईन के पहले युद्ध में मौहम्मद गौरी और गोविन्दराज तोमर का आमना सामना हुआ था,जिसमे दोनों घायल हुए थे और गौरी भाग रहा था। भागते हुए गौरी को धीरसिंह पुंडीर ने पकडकर बंदी बना लिया था। जिसे उदारता दिखाते हुए पृथ्वीराज चौहान ने छोड़ दिया। हालाँकि गौरी के मुस्लिम इतिहासकार इस घटना को छिपाते हैं।

23.तेजपाल द्वितीय (1192-1193 ई)-दिल्ली का अन्तिम तोमर राजा , जिन्होंने स्वतन्त्र 15 दिन तक शासन किया, और कुतुबुद्दीन ने दिल्ली पर आक्रमण कर हमेशा के लिए दिल्ली पर कब्जा कर लिया।
ग्वालियर,चम्बल,ऐसाह गढ़ी का तोमर वंश--------

दिल्ली छूटने के बाद वीर सिंह तंवर ने चम्बल घाटी के ऐसाह गढ़ी में अपना राज स्थापित किया जो इससे पहले भी अर्जुनायन तंवर वंश के समय से उनके अधिकार में था,बाद में इस वंश ने ग्वालियर पर भी अधिकार कर मध्य भारत में एक बड़े राज्य की स्थापना की,यह शाखा ग्वालियर स्थापना के कारण ग्वेलेरा कहलाती है,माना जाता है कि ग्वालियर का विश्वप्रसिद्ध किला भी तोमर शासको ने बनवाया था.यह क्षेत्र आज भी तंवरघार कहा जाता है और इस क्षेत्र में तोमर राजपूतो के 1400 गाँव कहे जाते हैं.
वीर सिंह के बाद उद्दरण,वीरम,गणपति,डूंगर सिंह,कीर्तिसिंह,कल्याणमल,और राजा मानसिंह हुए,
राजा मानसिंह तोमर बड़े प्रतापी शासक हुए,उनके दिल्ली के सुल्तानों से निरंतर युद्ध हुए,उनकी नो रानियाँ राजपूत थी,पर एक दीनहींन गुज्जर जाति की लडकी मृगनयनी पर मुग्ध होकर उससे भी विवाह कर लिया,जिसे नीची जाति की मानकर रानियों ने महल में स्थान देने से मना कर दिया जिसके कारण मानसिंह ने छोटी जाति की होते हुए भी मृगनयनी गूजरी के लिए अलग से ग्वालियर में गूजरी महल बनवाया.इस गूजरी रानी पर राजपूत राजा मानसिंह इतने आसक्त थे कि गूजरी महल तक जाने के लिए उन्होंने एक सुरंग भी बनवाई थी,जो अभी भी मौजूद है पर इसे अब बंद कर दिया गया है.
मानसिंह के बाद विक्रमादित्य राजा हुए,उन्होंने पानीपत की लड़ाई में अपना बलिदान दिया,उनके बाद रामशाह तोमर राजा हुए,उनका राज्य 1567 ईस्वी में अकबर ने जीत लिया,इसके बाद राजा रामशाह तोमर ने मुगलों से कोई संधि नहीं की और अपने परिवार के साथ महाराणा उदयसिंह मेवाड़ के पास आ गए,हल्दीघाटी के युद्ध में राजा रामशाह तोमर ने अपने पुत्र शालिवाहन तोमर के साथ वीरता का असाधारण प्रदर्शन कर अपने परिवारजनों समेत महान बलिदान दिया,उनके बलिदान को आज भी मेवाड़ राजपरिवार द्वारा आदरपूर्वक याद किया जाता है.

मालवा में रायसेन में भी तंवर राजपूतो का शासन था ,यहाँ के शासक सिलहदी उर्फ़ शिलादित्य तंवर राणा सांगा के दामाद थे और खानवा के युद्ध में राणा सांगा की और से लडे थे,कुछ इतिहासकार इन पर राणा सांगा से धोखे का भी आरोप लगाते हैं ,पर इसके प्रमाण पुष्ट नही हैं,सिल्ह्दी पर गुजरात के बादशाह बहादुर शाह ने 1532 इसवी में हमला किया,इस हमले में सिलहदी तंवर की पत्नी जो राणा सांगा की पुत्री थी उन्होंने 700 राजपूतानियो और अपने दो छोटे बच्चों के साथ जौहर किया और सिल्हदी तंवर अपने भाई के साथ वीरगति को प्राप्त हुए,
बाद में रायसेन को पूरनमल को दे दिया गया,कुछ वर्षो बाद 1543 इसवी में रायसेन के मुल्लाओ की शिकायत पर शेरशाह सूरी ने इसके राज्य पर हमला किया और पूरणमल की रानियों ने जौहर कर लिया और पूरणमल मारे गये इस प्रकार इस राज्य की समाप्ति हुई.

तंवरावाटी और तंवर ठिकाने ---------------
देहली में तोमरो के पतन के बाद तोमर राजपूत विभिन्न दिशाओ में फ़ैल गए। एक शाखा ने उत्तरी राजस्थान के पाटन में जाकर अपना राज स्थापित किया जो की जयपुर राज्य का एक भाग था। ये अब 'तँवरवाटी'(तोरावाटी) कहलाता है और वहाँ तँवरों के ठिकाने हैं। मुख्य ठिकाना पाटण का ही है,एक ठिकाना खेतासर भी है,इनके अलावा पोखरण में भी तंवर राजपूतो के ठिकाने हैं,बाबा रामदेव तंवर वंश से ही थे जो बहुत बड़े संत माने जाते हैं,आज भी वो पीर के रूप में पूजे जाते हैं.

मेवाड़ के सलुम्बर में भी तंवर राजपूतो के कई ठिकाने हैं जिनमे बोरज तंवरान एक ठिकाना है,
इसके अतिरिक्त हिमाचल प्रदेश में बेजा ठिकाना और कोटि जेलदारी,बीकानेर में दाउदसर ठिकाना,mandholi जागीर,भी तंवर राजपूतो के ठिकाने हैं,धौलपुर की स्थापना भी तंवर राजपूत धोलनदेव ने की थी। 18 वी सदी के आसपास अंग्रेजो ने जाटों को धौलपुर दे दिया। ये जाट गोहद से सिंधिया द्वारा विस्थापित किये गए थे और पूर्व में इनके पूर्वज राजा मानसिंह तोमर की सेवा में थे और उनके द्वारा ही इन्हें गोहद में बसाया गया था।अब भी धौलपुर में कायस्थपाड़ा तंवर राजपूतो का ठिकाना है।

तंवरवंश की शाखाएँ------

तंवर वंश की प्रमुख शाखाएँ रुनेचा,ग्वेलेरा,बेरुआर,बिल्दारिया,खाति,इन्दोरिया,जाटू,जंघहारा,सोमवाल हैं,इसके अतिरिक्त पठानिया वंश भी पांडव वंश ही माना जाता है,इसका प्रसिद्ध राज्य नूरपुर है,इसमें वजीर राम सिंह पठानिया बहुत प्रसिद्ध यौद्धा हुए हैं.जिन्होंने अंग्रेजो को नाको चने चबवा दिए थे.
इन शाखाओं में रूनेचा राजस्थान में,ग्वेलेरा चम्बल क्षेत्र में,बेरुआर यूपी बिहार सीमा पर,बिलदारिया कानपूर उन्नाव के पास,इन्दोरिया मथुरा, बुलन्दशहर,आगरा में मिलते हैं,मेरठ मुजफरनगर के सोमाल वंश भी पांडव वंश माना जाता है,जाटू तंवर राजपूतो की भिवानी हरियाणा में 1440 गाँव की रियासत थी,इस शाखा के तंवर राजपूत हरियाणा में मिलते हैं,जंघारा राजपूत यूपी के अलीगढ,बदायूं,बरेली शाहजहांपुर आदि जिलो में मिलते हैं,ये बहुत वीर यौद्धा माने जाते हैं इन्होने रुहेले पठानों को कभी चैन से नहीं बैठने दिया,और अहिरो को भगाकर अपना राज स्थापित किया...
पूर्वी उत्तर प्रदेश का जनवार राजपूत वंश भी पांडववंशी जन्मेजय का वंशज माना जाता है। इस वंश की बलरामपुर समेत कई बड़ी स्टेट पूर्वी यूपी में हैं।

इनके अतिरिक्त पाकिस्तान में मुस्लिम जंजुआ राजपूत भी पांडव वंशी कहे जाते हैं जंजुआ वंश ही शाही वंश था जिसमे जयपाल,आनंदपाल,जैसे वीर हुए जिन्होंने तुर्क महमूद गजनवी का मुकाबला बड़ी वीरता से किया था,जंजुआ राजपूत बड़े वीर होते हैं और पाकिस्तान की सेना में इनकी बडी संख्या में भर्ती होती है.इसके अलावा वहां का जर्राल वंश भी खुद को पांडव वंशी मानता है,
मराठो में भी एक वंश तंवरवंशी है जो तावरे या तावडे कहलाता है ,महादजी सिंधिया का एक सेनापति फाल्किया खुद को बड़े गर्व से तंवर वंशी मानता था.

तोमर/तंवर राजपूतो की वर्तमान आबादी-------

तोमर राजपूत वंश और इसकी सभी शाखाएँ न सिर्फ भारत बल्कि पाकिस्तान में भी बड़ी संख्या में मिलती है,चम्बल क्षेत्र में ही तोमर राजपूतो के 1400 गाँव हैं,इसके अलावा पश्चिमी उत्तर प्रदेश के पिलखुआ के पास तोमरो के 84 गाँव हैं,भिवानी में 84 गाँव जिनमे बापोड़ा प्रमुख है,,मेरठ में गढ़ रोड पर 12 गाँव जिनमे सिसोली और बढ्ला बड़े गाँव हैं,
कुरुक्षेत्र में 12 गाँव,गढ़मुक्तेश्वर में 42 गाँव हैं जिनमे भदस्याना और भैना प्रसिद्ध हैं. बुलन्दशहर में 24 गाँव,खुर्जा के पास 5 गाँव तोमर राजपूतो के हैं,हरियाणा में मेवात के नूह के पास 24 गाँव हैं जिनमे बिघवाली प्रमुख है.
ये सिर्फ वेस्ट यूपी और हरियाणा का थोडा सा ही विवरण दिया गया है,इनकी जनसँख्या का,अगर इनकी सभी प्रदेशो और पाकिस्तान में हर शाखाओ की संख्या जोड़ दी जाये तो इनके कुल गाँव की संख्या कम से कम 6000 होगी,चौहान राजपूतो के अलावा राजपूतो में शायद ही कोई वंश होगा जिसकी इतनी बड़ी संख्या हो.

जाट, गूजर और अहीर में तोमर राजपूतो से निकले गोत्र-----------

कुछ तोमर राजपूत अवनत होकर या तोमर राजपूतो के दूसरी जाती की स्त्रियों से सम्बन्ध होने से तोमर वंश जाट, गूजर और अहीर जैसी जातियो में भी चला गया।जाटों में कई गोत्र है जो अपने को तोमर राजपूतो से निकला हुआ मानते है जैसे सहरावत ,राठी ,पिलानिया, नैन, मल्लन,बेनीवाल, लाम्बा,खटगर, खरब, ढंड, भादो, खरवाल, सोखिरा,ठेनुवा,रोनिल,सकन,बेरवाल और नारू। ये लोग पहले तोमर या तंवर उपनाम नहीँ लगाते थे लेकिन इनमे से कई गोत्र अब तोमर या तंवर लगाने लगे है। उत्तर प्रदेश के बड़ौत क्षेत्र के सलखलेन् जाट भी अपने को किसी सलखलेन् का वंशज बताते है जिसे ये अनंगपाल तोमर का धेवता बताते है और इस आधार पर अपने को तोमर बताने लगे है।गूँजरो में भी तोमर राजपूतो के अवशेष मिलते है। खटाना गूजर अपने को तोमर राजपूतो से निकला हुआ मानते है। ग्वालियर के पास तोंगर गूजर मिलते है जो ग्वालियर के राजा मान सिंह तोमर की गूजरी रानी मृगनयनी के वंशज है जिन्हें गूजरी माँ की औलाद होने के कारण राजपूतों ने स्वीकार नहीँ किया। दक्षिणी दिल्ली में भी तँवर गूजरों के गाँव मिलते है। मुस्लिम शाशनकाल में जब तोमर राजपूत दिल्ली से निष्काषित होकर बाकी जगहों पर राज करने चले गए तो उनमे से कुछ ने गूजर में शादी ब्याह कर मुस्लिम शासकों के अधीन रहना स्वीकार किया।इसके अलावा सहारनपुर में छुटकन गुर्जर भी खुद को तंवर वंश से निकला मानते हैं और करनाल,पानीपत ,सोहना के पास भी कुछ गुज्जर इसी तरह तंवर सरनेम लिखने लगे हैं,हरयाणा के अहिरो में भी दयार गोत्र मिलती है जो अपने को तोमर राजपूतो से निकला हुआ मानते है।दिल्ली में रवा राजपूत समाज में भी तंवर वंश शामिल हो गया है.....

इस प्रकार हम देखते हैं कि चन्द्रवंशी पांडव वंश तोमर/तंवर राजपूतो का इतिहास बहुत शानदार रहा है,वर्तमान में भी तोमर राजपूत राजनीति,सेना,प्रशासन,में अपना दबदबा कायम किये हुए है,पूर्व थलसेनाध्यक्ष जनरल वी के सिंह भिवानी हरियाणा के तंवर राजपूत हैं,और आज केंद्र सरकार में मंत्री भी हैं,मध्य प्रदेश के नरेंद्र सिंह तोमर भी केंद्र सरकार में मंत्री हैं,प्रसिद्ध एथलीट और बाद में मशहूर बागी पान सिंह तोमर के बारे में सभी जानते ही हैं,स्वतंत्रता सेनानी रामप्रसाद बिस्मिल भी तोमर राजपूत थे,इनके अतिरिक्त सैंकड़ो राजनीतिज्ञ,प्रशासनिक अधिकारी,समाजसेवी,सैन्य अधिकारी,खिलाडी तंवर वंशी राजपूत हैं 
तोमर क्षत्रिय राजपूतो के बारे में कहा गया है की 

"अर्जुन के सुत सो अभिमन्यु नाम उदार.
तिन्हते उत्तम कुल भये तोमर क्षत्रिय उदार."
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रोहिला क्षत्रियों में भी तोमर तंवर वंश पांडु के वंशधर अनेक गोत्र हे दिल्ली से विस्थापित बहुत सी तोमर शाखाएं रोहिला राजपूत गोत्रों में विद्यमान है।
#जय_भवानी 🙏🚩🗡️तोमर ,तंवर,तुंवर ( पांडु वंसी चन्द्र वन्स,तुवरसू वंसी चन्द्र वन्स), राजपूतो की निम्न शाखाये रोहिले राजपूतो में है
1, जंघारा
2सोमवाल
3बटोला
4बढ़ वार
5 जाडिया 
6इन्दौलिया
7कटियार/कटोच
8गोगड़
9गंगवार
10बनाफ़रे(एक यदु वन्स बनाफर अलग है)
11पठानिया
12 काठी(सूर्य वंश की निकुंभ काठी शाखा अलग है)
13 जडोलिया
14सिकरवार
15किशन लाल,कुशनवाल किशनवाल
*गद्दी*--इंद्रप्रस्थ(दिल्ली)
*ठिकाने*--बुद्धमूउ (बंदायू )रोहिलखण्ड,
दतिया,(,बुंदेलखंड)
धर्मपुर(हरदोई)
आदि
ऋषि गोत्र -गार्गेय,पराशर,मुदगल,
प्रवर -तीन
वेद--,यजुर्वेद
शाखा --वाजसनेयी
सूत्र--पारस्कर,गुह्य सूत्र
*कुलदेवी*--योगेश्वरी
निशान --हरा
देवता --शिव
नगाडा -रणगंजन

शस्त्र--खड्ग
पर्व --विजय दशमी
उद्घोष-हरर हर महादेव
उन्माद -विजय या वीर गति
पूर्वज 
पुरुरवा
ययाति
पुरु
शान्तनु
:
:
:
:
पाण्डव
:
:
:क्षेमक
(ईसापूर्व 424)
:
:
:
अनंगपाल प्रथम (742 ईसवी में उजड़ी दिलली को पुनः बसाया)
इनकी 16 वी पीढ़ी में सोलहवाँ अनंगपाल हुवा इसने क्वार सुदी एकादशी दिन सोमवार को लालकोट(वर्तमान लालकिला) की नींव डाली
17वां अनंगपाल उर्फ तेजपाल हुवा इन्होंने आगरे में तेज महल बनवाया(वर्तमान ताज महल)
इसी तेजपाल के दो पुत्र
महेश पाल ओर जीत पाल(अजयपाल)
थे। महेश पाल इंद्रप्रस्थ दिल्ली की गद्दी पर ही रहा ओर अजयपाल वहाँ से चल कर कठहर रोहिलखण्ड के बुद्धमऊ के राजा बुधपाल के यहां आया और अपना राज्य स्थापित कर वन्स चलाया अजय पाल के पुत्र महिपाल ने माघ सुदी पंचमी दिन मंगल वार को बुद्धमूउ बंदायू के किले की नीव रखी 
इनके प्रपौत्र थे किसन सिंह उर्फ किशन सेन ओर सुख सेन 1253 ईसवी में रामपुर के राजा रणवीर सिंह रोहिला के सेनापति की हैसियत से दिल्ली सुल्तान नसीरूदीन महमूद बहराम उर्फ चंगेज की तीस हजारी सेना को धूल चटाई इनके प्रपौत्र राजा सोहन पाल देव ने करोली में ठिकाना स्थाई कर अपने दादा श्री किशन सेन उर्फ किशन सिंह के नाम पर अपने वंशजो के गोत्र को किशनलाल या किसन वाल नाम से प्रचलित किया इन्ही के वंसज बुंदेलखंड दतिया गए वहां वे किशन लाल राजपूत है ।इसी तरह रोहिलखण्ड में जिन जिन वन्स के राजपूतो ने 909 ईसवी से 1720ईसवी तक शासन किया वही है 
*रोहिला राजपूत*
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Wednesday, 11 March 2026

RAJPUTANA KKATHHEHAR KE AJEY YODDHHA

*राजपुताना कठेहर रोहिलखंड*
के एक महान पराक्रमी योद्धा 
सूर्य वंशी क्षत्रिय सम्राट
*एक अजेय योद्धा*
*महाराजा रणवीर सिहं कठेहरिया रोहिला*

      *संक्षिप्त परिचय*
************************* *जन्म दिवस* 25 अक्टूबर, 1204 तदानुसार तत्कालीन कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की प्रथमा तिथि संवत 1261 विक्रमी
#पिता* महाराज त्रिलोक सिंह जी काठी क्षत्रिय 
*************************
*वंश* _सूर्यवंश की निकुंभ शाखा 
वेद _यजुर वेद,उपवेद__धनुर्वेद,प्रवर_एक/तीन , शिखा_दाहिनी, पाद_दाहिनी,सूत्र _गुभेल,देवता__विष्णु (रघुनाथ जी), कुलदेवी _चावड़ा/कालिका माता,ध्वजा__गरुड़,नदी__सरयू,झंडा पंच रंगा,नगाड़ा_रण गंजन , ईष्ट_रघुनाथ/श्री राम चंद्र जी,उद्घोष_हर हर महादेव गोत्र_वशिष्ठ गुणधर्म _काठी (कठोर) गद्दी _ अयोध्या,ठिकाना__रावी व व्यास नदियों के बीच के काठे का क्षेत्र 
*************************
#राज्य विस्तार*
◆गंगा - यमुना दोआब क्षेत्र #दक्षिण पश्चिम में गंगा तक #पश्चिम में उत्तराखंड 
#उत्तर में नेपाल तक
*क्षेत्रफल* 25000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र या 10000 वर्ग मील क्षेत्र तक 

# सूबे* 
पांचाल, 
मध्यदेश,
कठेहर रोहिलखण्ड
*राजधानी* -रामपुर (निकट अहिक्षेत्र, रामनगर) कांपिल्य
##################
(तेहरवीं शताब्दी का पूर्वार्द्ध)

🔆सूर्यवंश🔆
***********************
#आइए इतिहास में चलें*



"*काल भी अगर छोड दे लेकिन काठी नहीं छोडता”* 
*(Time ( Death ) Forgets But Not Kathi )*

क्या हैं - “काठी और काठीयावाड, कठेहर खंड ” ?

काठी दरबार भव्यअतित कि श्रृंखला मे एक प्रसिद्ध नाम , यह एक क्षत्रिय संघ जो वीरता का वैभव , शौर्य का प्रतीक और अपने कठोर स्वाभीमानी गुणो से प्रसिद्ध है। 

*इसलिए इनके बारे प्रसिद्ध कहावत हैं - "काल भी अगर छोड दे लेकिन काठी नहि छोडता”*
सिकंदर के आक्रमण के पश्चात भारत की पश्चिमी उत्तरीय सीमा प्रांत के प्रहरी इन क्षत्रिय वीरों ने मैदानों का रुख किया,एक टुकड़ी सौराष्ट्र आई दूसरी उत्तरी पांचाल में तथा एक टुकड़ी काठी क्षत्रियों की नेपाल गई।
उत्तरी पांचाल को कठेहर खंड /रोहिलखंड के नाम से विकसित कर स्थिर रूप से राज्य स्थापित किया।
नेपाल में काठी क्षत्रियों ने कठेत कटायतkathayat साम्राज्य स्थापित किया।
 एक टुकड़ी ने थोडी कुछ शताब्दियो से उन्होने स्थिर रुप से अपना निवासस्थान सौराष्ट्र को बना लिया और इतना हि नहीं युगों से पुराण प्रसिद्ध सौराष्ट्र नाम इन्हि के कारण पलटकर ' काठीयावाड ' नाम से मशहुर हुआ एसी इन्होने इस विस्तार कि संस्कृति मे अमिट छाप छोडी हैं। 

कठ गणराज्य वाहिक प्रदेश ( हाल के पंजाब ) मे प्रसिद्ध था।इनकी राजधानी ( संगल ) सांकल थी ,(आज का स्याल कोट)एक उल्लेख मिलता है कि इन पंजाब वासी कठो के नाम से आज के अफगानिस्तान के गजनी प्रांत मे ' काटवाज ' क्षेत्र हे । कठ लोगों के शारीरिक सौदर्य और अलौकिक शौर्य की ग्रीक इतिहास लेखकों ने भूरि - भूरि प्रशंसा की है , ग्रीक लेखकों के अनुसार कठों के यहाँ यह प्रथा प्रचलित थी कि वे केवल स्वस्थ एवं बलिष्ठ संतान को ही जीवित रहने देते थे । 

सीक्रीटोस लिखता है कि वे सुंदरतम एवं बलिष्ठतम व्यक्ति को ही अपना शासक चुनते थे , ग्रिक इतिहासकारो ने कठो को कठोइ या काठीयन जैसे नामो से निर्देषीत किया हे , पाणिनी के ' अष्टाध्यायी ' मे कठो का उल्लेख हे , पंतजली के महाभाष्य के मत से कठ वैशपायन के शिष्य थे । इनकि प्रवर्तित वेदसंहिता कि शाखा ' काठक ' नाम से प्रसिद्ध थी । 

काठक कापिष्ठल संहिता जैतारायण , प्रत्धन ( दिवोदासी ) भीमसेनी इन राजाओ का नाम मीलते हे जीन्होने राजसूय यज्ञ किया था । इन्होने कई बार पोरस को हराया था।
सिकंदर को घुटने टेकने पर मजबूर किया,कठगणराज्य की राजकुमारी कार्विका उर्फ कर्णिका ने सिकंदर को अपनी नारी सेना के द्वारा परास्त किया घायल किया। वह तो आंतरिक राजाओं की सहायता से बच निकला था।
Painting : 1880's. ' A kathiavad Sentry’
By Artist - Horace van Ruith . 

#kathiyawad #history #gujrat #mumbai #indianhistory #rajput #kathi #indianhistory #rajputhistory #sentry #sword #shield
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* इस्क्वाकू वंश में सूर्य वंशी महाराज निकुम्भ के वंशधर ई●पू● 326 वर्ष कठगण राज्य (रावी नदी के काठे में) सिकन्दर का आक्रमण काल-राजधानी सांकल दुर्ग (वर्तमान स्यालकोट) 53 वीं पीढ़ी में राजा अजयराव के वंशधर निकुम्भ वंशी राजस्थान अलवर, मंगल गढ़ जैसलमेर होते हुए गुजरात सौराष्ट्र कठियावाड , फिर पांचाल, मध्यदेश गये। 
* एक टुकड़ी नेपाल गई
*************************
*अलवर में दुर्ग निकुम्भ वंशी (कठ क्षत्रिय रावी नदी के काठे से विस्थापित कठ-ंगण जिन्होंने सिकंदर को घुटने टेकने पर मजबूर किया था) क्षत्रियों ने बनवाया (राज्य मंगल गढ़), सौराष्ट्र में काठियावाड़ की स्थापना की ।
*************************
 #मध्यदेश के उत्तरी पांचाल में कठेहर रोहिलखंड राज्य की स्थापन। यहां अहिक्षेत्र के पास रामनगर गांव मे राजधानी स्थापित की, ऊंचा गांव मझगांवा को सैनिक छावनी बनाया। यहां पर शासक हंसदेव, रहे, इनके पुत्र हंसबेध राजा बने-ं816 ई. तक- इसी वंश में राजा रामशाही (राम सिंह जी ) ने रामपुर गांव को एक नगर का रूप दिया और *909 ई में कठेहर- रोहिलखण्ड प्रान्त की राजधानी रामपुर में स्थापित की। 
#यहां पर कठ क्षत्रियों ने 11 पीढ़ी शासन किया इसी वंश75 में महापराक्रमी, विधर्मी संहारक राजा रणवीर
सिंह कठेहरियारोहिला का जन्म कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की प्रथमा तिथि तदानुसार 25 अक्टूबर 1204ईसवी को राजपूत काल के ऐसे समय में हुआ जब महराजा पृथ्वी राज चौहान के शासन अंत के कारण समस्त राजपूत शक्ति क्षीण हो चुकी थी ओर मुस्लिम आक्रांता इस्लामिक सल्तनत कायम करने में लगे थे बची हुई राजपूत शक्तियों का बहुत कठोरता ओर बर्बरता से दमन कर रहे थे हिंदुआ सूर्य चौहान का शासन अस्त हो चुका था ।
वंश वृक्ष इस प्रकार पाया गया
रामपुर संस्थापक राजा राम सिंह उर्फ रामशाह 909 ई. में 966 विक्रमी , 3 पौत्र- बीजयराज 4. करणचन्द 5. विग्रह राज 6. सावन्त सिंह (रोहिलखण्ड कठेहर का विस्तार गंगापार कर यमुना तक किया,) सिरसापाल के राज्य सरसावा में एक किले का निर्माण कराया। (दशवीं शताब्दी का उत्तरार्द्ध) नकुड रोड पर किले को आज यमुना द्वारा ध्वस्त एक टीले के रूप में देखा जा सकता है। 7. जगमाल 8 धिंगतराम 9 गोकुल सिंह 10 महासहाय 11 त्रिलोकसिंह 12रणवीर सिंह( 1204 ),नौरंग देव (पिंगू को परास्त किया) (राजपूत गजट लाहौर 04.06.1940 द्वारा डा0 
सन्त सिंह चैहान)
इक्कीस वर्ष की आयु में रामपुर के राजा त्रिलोक चंद उर्फ त्रिलोक सिंह के पुत्र रणवीर सिंह रोहिला का विवाह विजयपुर सीकरी की राजकुमारी तारा देवी से हुआ। रणवीर सिंह रोहिला का राजतिलक भी इसी वर्ष इक्कीस वर्ष की आयु में हुआ यानी 1225,ईसवी में हुआ ,इनकी लंबाई लगभग सात फीट थी, कंधो पर सीना कवच लगभग साठ शेर ,सिर पर कवच लोहे का इक्कीस सेर खड़ग का वजन 25, सेर ओर स्वयं उनका वजन 125 सेर था। सन् 1236से1240 तक रजया तुदीन सुल्तान सन 1242 मइजुद्दीन बहराम शाह सन,1246 अलाउद्दीन महमूद शाह आदि दिल्ली सुल्तान सेनाओं से राजा रणवीर सिंह रोहिला , कठेहरिया ने कठेहर रोहिलखंड का लोहा मनवाया ओर किसी भी दिल्ली सुल्तान मामुल्क को रोहिलखंड में प्रवेश नहीं होने दिया । इनके साथ विभिन्न राजवंशों के चौरासी अजेय योद्धा थे ,राठौड़, गोड, चौहान,वारेचा परमार गहलोत वच्छिल आदि थे वे सब लोहे के कवच धारी थे।
दिल्ली सुल्तान के 
गुलाम , सेनापति नासिरूद्दीन चंगेज उर्फ नासिरूद्दीन महमूद ने , सन् 1253 ई0,में दोआब, कठेहर, शिवालिक पंजाब, बिजनौर आदि क्षेत्रों पर विजय पाने के लिए दमनकारी अभियान किया। इतने अत्याचार , मारकाट तबाही मचाई कि विद्रोह करने वाले स्थानीय शासक, बच्चे व स्त्रियां भी सुरक्षित नहीं रही। ऐसी विषम परिस्थिति में रोहिल खण्ड के रोहिला शासकों ने दिल्ली सल्तनत के सूबेदार‘ ताजुल मुल्क इज्जूददीन डोमिशी‘ को मार डाला। दिल्ली सल्तनत के लिये यह घटना भीषण चुनौती समझी गई। इस समय रामपुर के राजा रणवीर सिंह थे । उन्होनें आस पास की समस्त राजपूत शक्तियों को एकता के सूत्र में बांधा ओर दिल्ली सल्तनत के विरूद्ध अपनी क्रान्तिकारी प्रवृत्ति को सजीव बनाये रखा था जिससे दिल्ली सुल्तान कठेहर पर आक्रमण करते हुए भय खाते थे ,नासिरूद्दीन महमूद बहराम गुलाम वंश ( उर्फ चंगेज) इस घटना से उद्वेलित हो उठा और सहारनपुर ‘ उशीनर प्रदेश‘ के मण्डावार व मायापुर से 1253 ई0 में गंगापार कर गया और विद्रोह को दबाता हुआ, रोहिलखण्ड को रौदता हुआ बदांयू पहुंचा। वहां उसे ज्ञात हुआ कि रामपुर में राजा रणवीर सिंह रोहिला के साथ लोहे के कवचधारी 84 रोहिले है जिनसे विजय पाना टेढ़ी खीर है। सूचना दिल्ली भेजी गई। दिल्ली दरबार में सन्नाटा हो गया कि एक छोटे राज्य कठेहर रोहिलखंड के रोहिलों से कैसे छीना जाए। नासिरूद्दीन चंगेज (महमूद) ने तलवार व बीड़ा उठाकर राजा रणवीर सिंह के साथ युद्ध करने की घोषणा की। रामपुर व पीलीभीत के बीच मैदान में नसीरुद्दीन व कठेहर नरेश सूर्य वंशी क्षत्रिय रणवीर सिंह की सेना के बीच भयंकर युद्ध हुआ, 6000 रोहिला राजपूत व 
 84 लोहे के कवचधारी रन्धेलवंशी सेना नायकों की सेना के सामने नासिरूद्दीन की तीस हजारी सेना के पैर उखड़ गये।
      नासिरूद्दीन चंगेज को बन्दी बना लिया गया। बची हुई सेना के हाथी व घोडे तथा एक लाख रूपये महाराज रणवीर सिंह को देने की प्रार्थना पर आगे ऐसा अत्याचार न करने की शपथ लेकर नासिरूद्दीन महमूद ने प्राण दान मांग लिया। क्षात्र धर्म के अनुसार शरणागत को अभयदान देकर राजा रणवीर सिंह ने उसे छोड़ दिया। परन्तु धोखेबाज महमूद जो राजा रणवीर सिंह पर विजय पाने का बीड़ा उठाकर दिल्ली से आया था, षडयंत्रों में लग गया। राजा रणवीर सिंह का एक दरबारी पं. गोकुलराम पाण्डेय था। उसे रामपुर का राजा नियुक्त करने का लालच देकर महमूद ने विश्वास में ले लिया और रामपुर के किले का भेद लेता रहा। पं. गोकुल राम ने लालच के वशीभूत होकर विधर्मी को बता दिया कि रक्षांबधन के दिन सभी राजपूत निःशस्त्र होकर शिव मन्दिर में शस्त्र पूजा करेंगें।यह शिव मन्दिर किले के दक्षिण द्वार के समीप है , यह सुनकर महमूद का चेहरा खिल उठा और दिल्ली से भारी सेना को मंगाकर जमावड़ा प्रारम्भ कर दिया रक्षाबन्धन का दिन आ गया। किले में उपस्थित सभी सैनिक, सेनाायक अपने-ंअपने शस्त्रों को उतार कर पूजा स्थान पर शिव मन्दिर ले जा रहे थे। गोकुल राम पाण्डेय यह सब सूचना विधर्मी तक पहुंचाता रहा। श्वेत ध्वज सामने रखकर दक्षिण द्वार पर पठानों की गुलामवंशी सेना एकत्र हो गयी। पूजा में तल्लीन राज पुत्रों को पाकर गोकुलराम पाण्डेय ने द्वार खोल दिया।
      शिव उपासना में रत सभी उपस्थितों को घेरे में ले लिया गया। समस्त राजपूत भौचक्के रह गए ओर मन्दिर से तुलसी का पत्ता लिया ओर मुंह में दबा कर शाका बोल दिया,घमासान युद्ध छिड़ गया परन्तु ऐसी गद्दारी के कारण राजा रणवीर सिंह ने निशस्त्र लड़ते हुए अदम्य साहस ओर शोर्य का परिचय दिया ओर महमूद के सैनिकों से भिड़ गए अद्भुत दृश्य था रणवीर सिंह चारो ओर से विधर्मी सैनिकों से घिरे युद्ध कर रहे थे विधर्मी की खड़ग छीन ली ओर आक्रांताओं के शीश कट कट गिरने लगे , उस समय रामपुर के किले में केवल तीन हजार राजपूत ही उपस्थित थे ओर वे भी निहत्थे रह गए थे सभी राजपूत बड़ी वीरता से लडे किन्तु संख्या में कम होने के कारण बिखर गए, रणवीर सिंह कठहरिया रोहिला की पीठ पर विधर्मी सेना ने तलवार से वार करके काट डाला ओर अंतिम बूंद रक्त की रहने तक रणवीर धराशाई नहीं हुए यह देख कर नसीरुद्दीन चकित रह गया देखते ही देखते कठेहर नरेश वीरगति को प्राप्त हुए। नासिरूद्दीन ने पं. गोकुल राम से कहा कि जिसका नमक खाया अब तुम उसी के नहीं हुए तो तुम्हारा भी संहार अनिवार्य है। नमक हरामी को जीने का हक नहीं है। गोकुल का धड़ भी सिर से अलग पड़ा था। सभी स्त्री बच्चों को लेकर रणवीर सिंह का भाई सूरत सिंह उर्फ सुजान सिंह किले से पलायन कर गया । महारानी तारादेवी जो विजय पुर सीकरी के राजा की पुत्री थी राजा रणवीर सिंह के साथ सती हो गई। 
रामपुर में किले के खण्डरात, सती तारादेवी का मन्दिर तथा उनका राजमहल अभी तक एक ध्वस्त टीले के रूप में मौजूद है, जो क्षात्र धर्म का परिचायक व रामपुर में रोहिला क्षत्रियों की कठ-शाखा के शासन काल की याद ताजा करता है जिन्होंने अपना सर्वस्व बलिदान कर क्षात्र धर्म की रक्षा की। गुलाम वंश, सल्तनत काल में विधर्मी की पराधीनता कभी स्वीकार नहीं की। अन्तिम सांस तक दिल्ली सल्तनत से युद्ध किया और कितनी ही बार धूल चटाई तथा रोहिलखण्ड को स्वतंत्र राज्य बनाये रखा। निरन्तर संघर्ष करते रहे राजा रणवीर सिंह कठहरिया का बलिदान व्यर्थ नहीं , सदैव तुगलक, मंगोल , मुगलों आदि से विद्रोह किया और स्वतंत्र रहने की भावना को सजीव रखा। राणा रणवीर सिंह के वंशधर आज भी रोहिला-ंक्षत्रियों में पाए जाते हे,जय राजपुताना कठेहर रोहिलखंड
उनकी पावन स्मृति को जीवित रखने व रोहिलखंड कठेहर राजपूताना की वीर गाथा को सजीव बनाए रखने के लिए भारत का समस्त रोहिला क्षत्रिय राजपूत समाज रक्षा बन्धन को शोर्य दिवस तथा पच्चीस अक्टूबर को प्रतिवर्ष स्वाभिमान दिवस के रूप में मनाता हे ओर शस्त्र पूजा करता है । उत्तर भारत के महानगर बड़ौत में राजा रणवीर सिंह रोहिला मार्ग व ऐतिहासिक नगर सहारनपुर में आज महाराजा रण वीर सिंह रोहिला चौक स्थित है। (संदर्भ__इतिहास रोहिला राजपूत द्वारा डॉक्टर के सी सेन,
ठाकुर अजीत सिंह परिहार बालाघाट मध्य प्रदेश, मध्यकालीन भारत बीएम रस्तोगी ,रोहिला क्षत्रियों का क्रमबद्ध इतिहास द्वारा श्री दर्शन लाल रोहिला, रोहिला क्षत्रिय वंश भास्कर द्वारा आर आर राजपूत, रोहिला क्षत्रिय जाति निर्णय द्वारा राय भीम राज राजभाट बड़वा जी का बाड़ा तूंगा राजस्थान, काठी कठेरिया क्षत्रिय व रोहिला राजपूत द्वारा महेश सिंह कठाय त नेपाल , मध्य कालीन भारत द्वारा ठाकुर अजित सिंह परिहार बाला घाट मध्य प्रदेश  
संकलन व लेखन 
समय सिंह पुंडीर
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क्षत्रिय/राजपूत वाटिका
अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा
राष्ट्रीय प्रवक्ता 
*क्षत्रिय अस्तित्व न्याय मोर्चा भारत*
नोट
*सनातन रक्षक,विधर्मी संहारक और लगभग तीस वर्ष तक आक्रांताओं द्वारा किए जा रहे इस्लामी करण को रोकने वाले राजपूत सम्राट रोहिलखंड नरेश महाराजा रणवीर सिंह रोहिला काठी क्षत्रिय की जयंती सभी क्षत्रिय भाई स्वाधीनता और स्वाभिमान दिवस के रूप में मनाते हैं*

Sunday, 8 March 2026

ROHILA RAJPUT GOTRA OF RATHOD VANSH (*रोहिला राजपूतों में राठौड़ वंश की १४ शाखाएं)*

राठौड़ वन्स की 14 शाखाये रोहिले राजपूतो में है
1 धांधल
2महेचा/महेचराना

3 बन्दरिया
4 डंगरथ,डंगरोल
5 जोलिये जोलु जालान
6 बांकुटे
7रतानोट
8थाती
9कपोलिया
10खोखर
11अखनोरिया
12मसानिया
13बिसूथ
14 लोह मढ़े
लोहे के कवच धरि
थे84 सरदार जो कन्नौज पतन के बाद रोहिलखण्ड में रणवीर सिंह की सेना में आ गए थे उनको लखमीर भी कहते थे जो एक लाख का सेना नायक होता था
इसलिए यह गोत्र लखमरा भी कहलाता है
14वी शाखा
प्रवर है सौनिक
ऋषि है अंगिरा
वेद है यजुर्वेद
उपवेद धनुर
शाखा कौथुमी
सूत्र कात्यायन
शिखा है दाहिनी
कुलदेवी है पंखिनी
राजेश्वरी और नाग्निचा, नागणायीचा 
धर्म है वैष्णव
झंडा है पंचरंगा
नगाड़ा रणजीत
गद्दी है कन्नौज
पदवी
रणबांका


कर्नाटक से राजस्थान का सफ़र (साउथ की देवी)
क्या आप जानते हैं कि राठौड़ों की कुलदेवी असल में साउथ इंडिया से आई थीं?
"राठौड़ों की रक्षक साउथ से आई थीं!
राठौड़ों की कुलदेवी 'नागनेची माता' की मूर्ति असल में कर्नाटक (कोंकण) की थी, जहाँ उन्हें 'चक्रेश्वरी' कहा जाता था।
राठौड़ राजा राव धुहड़ उन्हें 13वीं सदी में वहाँ से लाए थे।
शर्त थी 'रास्ते में पीछे मुड़कर मत देखना'।
पचपदरा के पास नागाणा गाँव में राजा ने पीछे मुड़कर देखा और मूर्ति ज़मीन में गिर गई।
तब से इस जगह को 'नागाणा धाम' कहा जाने लगा।

नागणेची माता का इतिहास क्या है?

नागणेची माता का इतिहास बहुत ही रोचक है। वह राठौड़ राजपूतों की कुलदेवी हैं और उनकी उत्पत्ति दक्षिण भारत से हुई थी। कहा जाता है कि उन्हें मूल रूप से कर्नाटक में 'चक्रेश्वरी' के नाम से जाना जाता था।

एक कथा के अनुसार, 13वीं सदी में राठौड़ राजा राव धूहड़ ने उन्हें कर्नाटक से राजस्थान लाया था। इस यात्रा के दौरान, उन्हें एक शर्त का पालन करना था कि वह पीछे मुड़कर नहीं देखेंगे। लेकिन जब वह पचपदरा के पास नागाणा गाँव में पहुँचे, तो उन्होंने पीछे मुड़कर देख लिया, जिससे माता की मूर्ति वहीं जमीन में धंस गई। तब से यह स्थान 'नागाणा धाम' के नाम से जाना जाता है।

नागणेची माता की पूजा राठौड़ राजपूतों द्वारा बड़े आदर और श्रद्धा के साथ की जाती है, और उनकी कृपा और रक्षा की कामना की जाती है।

भाखरवाला गांव में मिले धांधल राठौड़ रोहिला राजपूतों के दुर्लभ शिलालेख







ध्वस्त होती कलात्मक छतरियों की सुध लेने वाला नहीं
इतिहास की कई नई जानकारियां
जोधपुर.
जोधपुर से 15 किलोमीटर दूर भाखरवाला गांव में धांधल राठौड़ों के दुर्लभ शिलालेख मिले हैं। लावारिस पड़े ऐतिहासिक शिलालेखों के आधार पर शोध किया जाए तो जोधपुर से जुड़े इतिहास की कई नई जानकारियां सामने आ सकती है।
 
राजस्थानी शोध संस्थान के अधिकारी व शोधकर्ता डॉ. विक्रमसिंह भाटी के अनुसार पूर्व में धांधल राठौड़ों के प्रमुख ठिकानों में से एक इस गांव को रोयला या रोहिला के नाम से जाना जाता था। यहां धांधल सूरतसिंह, धांधल महेशदास, धांधल केसरीसिंह की भव्य कलात्मक छतरियां और देवली भी है। सूरतसिंह की भव्य, कलात्मक छतरी ध्वस्त होने के कगार पर है। लेकिन पुरातत्व या पर्यटन विभाग की ओर से किसी ने सुध नहीं ली है।
 
सूरतसिंह के पुत्र महेशदास की 20 खम्भों की छतरी में लगे शिलालेख के अनुसार छतरी निर्माण में पांच हजार एक रुपए की लागत आई थी। धांधल केसरीसिंह की छतरी जोधपुर के तत्कालीन शासक मानसिंह के कालखण्ड से ही है। उनका नाम विश्वास पात्र सेनानायकों में अव्वल था। उस समय के एतिहासिक ग्रंथों में इनका नाम पांच प्रमुख मुसाहीबों के तौर पर दर्ज है। कविराजा बांकीदास ने कई डिंगल गीतों में इन्हें ‘पाल रौ पौतरौ’ अर्थात् ‘पाबूजी का पोता’ और धांधल वंश का सूर्य बताया है।
छतरियों की देवलियां संगमरमर से और गुम्बज ईंटों से बने हैं। कुछ छतरियां 10 खम्भों की हैं। डॉ. भाटी के अनुसार धांधल राठौड़ों का इतिहास गरिमामयी रहा। तत्कालीन जोधपुर राज्य की सेवा में रहते हुए ये प्रधान, मुसाहीब, किलेदार, कोतवाल, रसोड़े और सुतरखाने के दरोगा जैसे महत्वपूर्ण पदों पर रहे।
 
मारवाड़ के तत्कालीन शासक अभयसिंह के समय धांधल सूरतसिंह को रोहिला का पट्टा मिला था। इन्हें केलावा खुर्द, भादराजून परगने के काकरिया, लोरोली और विरामा गांव भी ईनाम में मिले थे। लावारिस पड़े ऐतिहासिक शिलालेखों के आधार पर शोध किया जाए तो जोधपुर से जुड़े इतिहास की कई नई जानकारियां सामने आ सकती है।
इस ठिकाने के सभी धांधल राठौड़ रोहिला राजपूत कहलाए
🚩 "मेरा सिर बिक चुका है, विधवा होना है तो शादी कर लो!": लोक देवता पाबूजी राठौर की अमर गाथा🚩
जय पाबूजी! 🙏

📜 इतिहास पर एक नज़र:

मैं भाद्रपद महीने में एक बारात जा रहा था। यह वीरों की बारात थी जिसने शादी से पहले बताया - 'मेरा सिर बिक चुका है, विधवा होना है तो शादी कर लो!'

ढोली गा रहा था:

🎶 धरती तुम संभागानि, (थारै) इंद्र जेहदो भारत।

कंचुवा पांव, बादल छाए।

सूखे रेगिस्तान में खुशी की झरना बह रहा था, लेकिन किसे पता था कि सेहरा और कलंगी से सजा दूल्हा एक दिन लोगों का पूजनीय देवता बन जाएगा? किसे पता था कि फेरों के बीच कर्तव्य की पुकार उस सजी हुई सभा को बलिदान के युद्ध के मैदान में बदल देगी?

 🔥 वादे और बलिदान:

जिस समय विवाह के मंगल गीत गूंज रहे थे, उसी समय एक चारणी (देवल चारणी) मुझे याद दिलाने आई कि - "राही! तुम्हारे विवाह की तैयारियां कहीं और हो रही हैं... आसमान की गहराइयों में स्वर्ग की अप्सराएं वरमाला लेकर खड़ी हैं।"

और उस वीर 'पाबू' ने सुहागरात के बंधन को ठोकर मारते हुए गठबंधन की गांठ खोली और चौथे फेरे से पहले ही गाय की रक्षा के लिए चल पड़े। भागीरथ की जिद और भीष्म के वादे की तरह कठोर होकर अनंत की गहराइयों में विलीन हो गए।

🐎 केशर कालवी और अधूरी शादी:

इतिहास गवाह है कि जिसने अग्नि के पूरे चक्कर भी नहीं लगाए, वही दुल्हन (सोढ़ी रानी) हाथ में नारियल लेकर अपने स्वर्गीय पति के पास चल पड़ी।

आज भी राजस्थान का कण-कण पाबूजी की बहादुरी को याद करता है। पद और पहाड़ों में उनकी तारीफ़ है - कि पाबू भी क्षत्रिय थे!

📌 ऐतिहासिक तथ्य (गर्व करने वाले तथ्य):

🔸 लेखक: स्वर्गीय श्री तन सिंह (किताब: "बदलते नज़ारे")
🔸 केशर कालवी: पाबूजी की वफ़ादार घोड़ी जिसने इतिहास बदल दिया।
🔸 परंपरा: पाबूजी महाराज ने गायों की रक्षा के लिए फेरों के बीच से उठकर बलिदान दिया था। उनकी याद में आज भी राजपूत समुदाय में शादियों में सिर्फ़ चार फेरे लिए जाते हैं।

🙏 जय जय धांधल पाबू जी राठौड़

आइए जानते हैं राठौड़ों में साफा पहनने का रिवाज कैसे शुरू हुआ - 👇

मारवाड़ के राठौड़ 13वीं सदी में इस रेगिस्तान में आए थे। इतिहासकारों के मुताबिक, राठौड़ उत्तर प्रदेश के बदायूं से मारवाड़ आए थे। पहले आदमी राव सिहाजी थे जिन्होंने मारवाड़ के पाली इलाके पर कब्ज़ा करके राठौड़ सत्ता कायम की। आगे चलकर उनके वंशजों ने खेड़ और मंडोर पर राज किया, वे मारवाड़ के सरदार बने।

राठौड़ मरू प्रदेश के नहीं थे, इसलिए उनकी वेशभूषा यहां के माहौल के हिसाब से नहीं थी, लेकिन यहां आने के बाद कई रिवाज और कई रीति-रिवाज बने, जिनके पीछे पहले हुई कई घटनाएं थीं। इन घटनाओं ने नई परंपराओं को जन्म दिया जो आज एक पहचान बन गई हैं।

इतिहास में एक बहुत ही दिलचस्प घटना है जिसकी वजह से राठौड़ों ने साफा (पगड़ी) पहनना शुरू किया। इसके बारे में बहुत कम जानकारी होने की वजह से लोग इसे नहीं जानते।

राव सिहाजी के छह वंशज राव जलांसीजी हुए। वे बहादुर और हिम्मत वाले थे। 14वीं सदी में उनके राज में एक ऐसी घटना हुई, जिससे उन्हें उमरकोट के सोढो पर हमला करना पड़ा। इस जंग में राव जलांसीजी ने सोढो की साफा (पगड़ी) छीन ली।

उन दिनों साफा का बहुत महत्व था। अगर सिर से पगड़ी गिर जाए या दुश्मन के पैरों में पगड़ी गिर जाए, तो समझो वे हार गए। यह साफा आन-बान और शान का प्रतीक था।

राठोड़ों के पास साफा जीत का निशान होता था, इसलिए वे इसे जीत के प्रतीक के तौर पर अपने सिर पर धारण करते थे और इस तरह राठोड़ों ने उसी दिन से साफा बांधना शुरू कर दिया।

जब मैं मुगलों के संपर्क में आया, तो पगड़ी और साफे के कुछ पैच बदल गए जो ट्रेंड में आ गए लेकिन साफा हमेशा ट्रेंड में रहता है। जंग खास तौर पर साफा बांधी जाती थी। आगे चलकर इसी साफे को बांधने के लिए कई पैच (स्टाइल) बनाए गए जैसे जोधपुरी, जिसके पीछे चुरंगा होता है, गोल साफा आदि।

मारवाड़ का जोधपुरी साफा पूरी दुनिया में मशहूर है। मारवाड़ से निकले सभी राठौड़ बीकानेर, किशनगढ़, सीतामऊ, रतलाम, झाबुआ, इडर वगैरह सभी राज्यों में ट्रेंड कर रहे हैं और कुछ बदलावों के साथ यह साफ-सफाई से बंधा हुआ है।

फैशन चाहे जितना बदल जाए, लेकिन इस मारवाड़ की साफ-सफाई आज भी अपने पैच के लिए मशहूर है। इसका क्रेडिट मारवाड़ के मौजूदा नरेश महाराजा गजसिंहजी को जाता है, जिनका नाम गजशाही साफ-सफाई बहुत मशहूर है।

महाराजा साहिब की प्रेरणा से मालाणी राधाधर के बेटे स्वर्गीय डॉ. महेंद्रसिंहजी नागर साहिब, जो मेहरानगढ़ के पूर्व डायरेक्टर थे, ने राजस्थान की पगड़ियों पर रिसर्च करके एक बहुत ही महत्वपूर्ण किताब लिखी थी, जिससे लोगों को पगड़ियों का महत्व समझ में आया। उन्होंने विदेशों में साफो का प्रदर्शन करके बड़ा नाम कमाया।

राठौड़ों की इस शानदार साफ-सफाई का आगाज उमरकोट सिंध की देन है। आगे चलकर यह सिंध
उमरकोट रियासत भी मारवाड़ के तहत आ गई जो आजादी के समय तक मारवाड़ का एक अभिन्न हिस्सा थी। जनमासा में स्वच्छता की कई कहानियाँ आज भी लोगों के मन में बसी हैं। अगर आज पीढ़ी उन्हें सहेज कर रखे तो यह निश्चित रूप से एक ऐतिहासिक काम होगा। स्वच्छ भारत हर वर्ग के कामों के आधार पर अलग-अलग योजनाएँ बनाता है। जोधपुरी नौ मीटर का स्वच्छ है।

अब लोग इसे साफ-साफ बाँधते हैं लेकिन वे इसका सम्मान करना नहीं जानते। जब तक सम्मान नहीं होगा, तब तक उन्हें स्वच्छ नहीं कहा जाएगा।

✍️ डॉ. महेंद्र सिंह तंवर


एक वीर, जिसने रेगिस्तान को अपना घर बनाया।
13वीं सदी में कन्नौज से आए राव सीहा जी ने ही मारवाड़ में राठौड़ वंश की नींव रखी थी।
पाली के ब्राह्मणों की रक्षा के लिए उन्होंने अकेले दम पर लुटेरों से युद्ध किया। 1273 ई. में गायों की रक्षा करते हुए, 1 लाख दुश्मनों (लाखा झंवर) से लड़कर उन्होंने वीरगति प्राप्त की।

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Saturday, 28 February 2026

THE FOUNDERS OF RAJPUTANA KKATHHEHAR ROHILKHANND

*KSHTRIYA SAMRAT MAHARAJA RANVEER SINGH ROHILA,THE FOUNDER OF ROHILKHANND*
🙏 क्रमबद्ध, विस्तृत एवं प्रभावशाली ऐतिहासिक जीवन परिचय प्रस्तुत है।
(लेखन शैली: संतुलित – इतिहास + प्रेरणात्मक, शोधपरक संरचना सहित)
महाराजा रणवीर सिंह रोहिला
कठेहर–रोहिलखण्ड के अजेय क्षत्रिय शासक
(जन्म: 25 अक्टूबर 1204 ई., बलिदान: 13वीं शताब्दी मध्य)
1. प्रस्तावना
भारतीय इतिहास में अनेक ऐसे वीर क्षत्रिय हुए जिन्होंने सीमित संसाधनों में भी विदेशी आक्रमणकारियों का डटकर सामना किया। कठेहर–रोहिलखण्ड (वर्तमान उत्तर प्रदेश का उत्तरी भाग) के पराक्रमी शासक महाराजा रणवीर सिंह रोहिला उन्हीं में से एक थे। उन्होंने दिल्ली सल्तनत के विस्तारवादी अभियानों का विरोध करते हुए स्वतंत्रता और क्षात्र धर्म की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व बलिदान कर दिया।
उनका जीवन केवल एक क्षेत्रीय शासक की कथा नहीं, बल्कि आत्मसम्मान, युद्धनीति और राष्ट्ररक्षा का आदर्श उदाहरण है।
भाग 1
काठी, कठेहर और काठियावाड़ का ऐतिहासिक आधार
2. सूर्यवंश और निकुम्भ वंश
महाराजा रणवीर सिंह रोहिला सूर्यवंशी क्षत्रिय परंपरा से संबंधित माने जाते हैं। परंपरागत वंशावली के अनुसार यह वंश इक्ष्वाकु कुल से उत्पन्न हुआ, जिसे भगवान राम की वंश परंपरा माना जाता है। निकुम्भ नामक पराक्रमी राजा से निकुम्भ वंश की स्थापना मानी जाती है।
इस वंश की एक शाखा “कठ” या “काठी” कहलायी।
3. कठ गणराज्य और सिकंदर काल
ईसा पूर्व 326 में जब Alexander the Great ने उत्तर-पश्चिम भारत पर आक्रमण किया, उस समय रावी नदी के तट पर कठ गणराज्य का उल्लेख मिलता है। इसकी राजधानी “सांकल” (वर्तमान स्यालकोट) बताई जाती है।
यूनानी लेखकों ने कठों (Kathoi/Kathaeans) की वीरता, शारीरिक सौष्ठव और युद्ध कौशल की प्रशंसा की है। कुछ ग्रंथों में उल्लेख है कि वे स्वस्थ और बलिष्ठ संतानों को ही जीवित रखते थे तथा सर्वश्रेष्ठ योद्धा को शासक चुनते थे।
संस्कृत व्याकरणाचार्य Panini की अष्टाध्यायी में कठों का उल्लेख मिलता है। महाभाष्यकार Patanjali ने भी कठों का उल्लेख किया है।
4. काठियावाड़ और कठेहर का विकास
सिकंदर के आक्रमणों के पश्चात कठ क्षत्रियों के विभिन्न समूहों ने भारत के विभिन्न क्षेत्रों में प्रवास किया—
एक शाखा सौराष्ट्र गई — जहाँ “सौराष्ट्र” क्षेत्र “काठियावाड़” नाम से प्रसिद्ध हुआ।
एक शाखा उत्तर भारत के पंचाल क्षेत्र में बसी — जो आगे चलकर “कठेहर खण्ड” या “रोहिलखण्ड” कहलाया।
एक शाखा नेपाल क्षेत्र में गई — जहाँ “कटायत” परंपरा का उल्लेख मिलता है।
काठी वीरों के विषय में कहावत प्रचलित हुई:
“काल भी अगर छोड़ दे, लेकिन काठी नहीं छोड़ता।”
भाग 2
कठेहर राज्य की स्थापना
5. रामपुर की स्थापना
लगभग 7वीं–10वीं शताब्दी के मध्य कठेहर क्षेत्र में स्थायी राज्य की स्थापना हुई।
राजा रामसिंह (रामशाह) ने 909 ईस्वी (विक्रमी 966) में रामपुर नगर को राजधानी के रूप में विकसित किया। यह क्षेत्र अहिक्षेत्र (वर्तमान रामनगर के निकट) के आसपास स्थित था।
इसके बाद 11 पीढ़ियों तक कठ क्षत्रियों ने शासन किया।
वंशावली में उल्लेखित प्रमुख नाम:
रामशाह (रामसिंह)
बीजयराज
करणचन्द
विम्रहराज
सावन्त सिंह
जगमाल
रणवीर सिंह
धिंगतराम
गोकुल सिंह
महासहाय
त्रिलोकचन्द
नौरंग देव
भाग 3
महाराजा रणवीर सिंह रोहिला
6. जन्म और व्यक्तित्व
जन्म: 25 अक्टूबर 1204 ईस्वी
विक्रम संवत: 1261
स्थान: रामपुर, कठेहर-रोहिलखण्ड
गोत्र: वशिष्ठ
वंश: निकुम्भ वंशी कठेहरिया क्षत्रिय
वे युद्धकला, घुड़सवारी और शस्त्र संचालन में निपुण थे। उनके साथ 84 कवचधारी रोहिला वीरों की विशिष्ट सेना रहती थी।
7. दिल्ली सल्तनत से संघर्ष
13वीं शताब्दी में दिल्ली में गुलाम वंश का शासन था। उस समय सुल्तान Nasiruddin Mahmud नाममात्र का शासक था, जबकि वास्तविक सत्ता Ghiyas ud din Balban जैसे शक्तिशाली अमीरों के हाथों में थी।
1253–1254 ईस्वी में दोआब, कठेहर और शिवालिक क्षेत्रों में दमनकारी अभियान चलाया गया। स्थानीय शासकों और जनता पर अत्याचार हुए।
रोहिलखण्ड में विद्रोह भड़क उठा और दिल्ली सल्तनत के सूबेदार की हत्या कर दी गई।
8. निर्णायक युद्ध
रामपुर और पीलीभीत के मध्य मैदान में दिल्ली सल्तनत की लगभग 30,000 सेना और रणवीर सिंह के नेतृत्व में रोहिला योद्धाओं के बीच भयंकर युद्ध हुआ।
परंपरा के अनुसार:
84 कवचधारी रणधेलवंशी वीरों ने असाधारण पराक्रम दिखाया
शत्रु सेना के हाथी-घोड़े परास्त हुए
नासिरूद्दीन को बंदी बनाया गया
क्षात्र धर्म के अनुसार शरणागत को अभयदान देकर रणवीर सिंह ने उसे छोड़ दिया।
9. विश्वासघात और बलिदान
दिल्ली दरबार ने पुनः षड्यंत्र रचा।
दरबारी पंडित गोकुलराम पाण्डेय को लालच देकर विश्वास में लिया गया।
रक्षाबंधन के दिन, जब शिव मंदिर में शस्त्र पूजा हेतु राजपूत निःशस्त्र थे, तब किले का द्वार खोल दिया गया। भारी सेना ने आक्रमण किया।
घमासान युद्ध हुआ।
महाराजा रणवीर सिंह वीरगति को प्राप्त हुए।
महारानी तारादेवी सती हो गईं।
उनके भाई सूरत सिंह शेष परिवार सहित सुरक्षित स्थान पर चले गए।
भाग 4
ऐतिहासिक विरासत
रामपुर के किले के अवशेष
सती तारादेवी मंदिर
स्थानीय परंपराएँ और वंशज
महाराजा रणवीर सिंह ने अंतिम सांस तक पराधीनता स्वीकार नहीं की। उनका बलिदान रोहिलखण्ड की स्वतंत्र चेतना का प्रतीक बना।
निष्कर्ष
महाराजा रणवीर सिंह रोहिला का जीवन भारतीय क्षत्रिय परंपरा, स्वाभिमान और स्वतंत्रता की रक्षा का सशक्त उदाहरण है।
उन्होंने सीमित संसाधनों में भी दिल्ली सल्तनत की शक्तिशाली सेना का सामना किया और क्षात्र धर्म का पालन करते हुए शरणागत को अभयदान दिया — यद्यपि अंततः उन्हें विश्वासघात का सामना करना पड़ा।
उनकी गाथा इतिहास के उन पृष्ठों में स्थान पाने योग्य है जहाँ क्षेत्रीय स्वतंत्रता संग्राम और स्थानीय शौर्य को उचित सम्मान दिया जाए।
 🚩

RAJPUTANA ROHILKHAND KE SANSTHAPAK। MAHARSJA RANVEER SINGH ROHILA

*महाराजा रणवीर सिंह रोहिला*
*कठेहर–रोहिलखण्ड के सूर्यवंशी क्षत्रिय शासक*
भारतीय इतिहास के विस्तृत परिदृश्य में अनेक ऐसे क्षेत्रीय शक्तिकेंद्र रहे हैं जिनकी वीरगाथाएँ मुख्यधारा इतिहास लेखन में सीमित स्थान पा सकीं, किन्तु जनस्मृति, वंशावली, लोकपरंपरा और क्षेत्रीय इतिहास में वे अत्यंत जीवंत हैं। कठेहर–रोहिलखण्ड (वर्तमान उत्तर प्रदेश का उत्तरी भाग) का इतिहास भी ऐसा ही एक अध्याय है। इस क्षेत्र के सूर्यवंशी निकुम्भ वंशीय कठेहरिया क्षत्रियों में जन्मे महाराजा रणवीर सिंह रोहिला 13वीं शताब्दी के उन वीर शासकों में गिने जाते हैं जिन्होंने राजनीतिक स्वाधीनता, धार्मिक आस्था और क्षात्र धर्म की रक्षा के लिए संघर्ष किया।
यह ग्रंथ उनके वंश, ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, कठ/काठी परंपरा, कठेहर राज्य की स्थापना, दिल्ली सल्तनत से संघर्ष, विश्वासघात, बलिदान और ऐतिहासिक विरासत का क्रमबद्ध, शोधपरक और विश्लेषणात्मक प्रस्तुतीकरण है।
अध्याय 1
सूर्यवंश, निकुम्भ वंश और कठ परंपरा
1.1 सूर्यवंश की ऐतिहासिक अवधारणा
भारतीय परंपरा में सूर्यवंश को इक्ष्वाकु कुल से जोड़ा जाता है। पुराणों और राजवंशावलियों के अनुसार इक्ष्वाकु से प्रारंभ यह वंश अनेक शाखाओं में विभक्त हुआ। इन्हीं शाखाओं में निकुम्भ वंश का उल्लेख मिलता है, जो परंपरा के अनुसार अयोध्या के सूर्यवंशी राजाओं से संबंधित माना जाता है।
निकुम्भ वंश की एक शाखा “कठ” अथवा “काठी” के नाम से विख्यात हुई। यही शाखा आगे चलकर कठेहरिया क्षत्रियों के रूप में जानी गई।
1.2 कठ गणराज्य और उत्तर-पश्चिम भारत
ईसा पूर्व चौथी शताब्दी में उत्तर-पश्चिम भारत में अनेक गणराज्य विद्यमान थे। जब Alexander the Great ने 326 ईसा पूर्व भारतीय सीमा में प्रवेश किया, तब रावी नदी के तट पर “कठ” या “कठोई” नामक एक वीर गणराज्य का उल्लेख यूनानी लेखकों ने किया है।
उनकी राजधानी “सांकल” (आधुनिक स्यालकोट से संबद्ध मानी जाती है) बताई जाती है। यूनानी इतिहासकारों ने कठों की—
असाधारण युद्धक क्षमता
शारीरिक सौष्ठव
अनुशासित सैन्य संरचना
की प्रशंसा की है।
कुछ विवरणों में यह भी उल्लेख मिलता है कि कठ लोग सर्वश्रेष्ठ और बलिष्ठ योद्धा को ही शासक चुनते थे।
1.3 संस्कृत ग्रंथों में कठ
संस्कृत व्याकरणाचार्य Panini की अष्टाध्यायी में कठों का उल्लेख मिलता है। यह प्रमाणित करता है कि कठ जनपद वैदिकोत्तर काल में एक प्रतिष्ठित समुदाय था।
महाभाष्यकार Patanjali ने भी कठों का उल्लेख किया है। कठों की वेद शाखा “काठक संहिता” के नाम से प्रसिद्ध रही।
यह उल्लेख इस समुदाय की वैदिक, सांस्कृतिक और सैन्य प्रतिष्ठा को दर्शाता है।
अध्याय 2
कठों का विस्थापन और विस्तार
2.1 सिकंदर के पश्चात राजनीतिक परिवर्तन
उत्तर-पश्चिम भारत में आक्रमणों और सत्ता संघर्षों के परिणामस्वरूप अनेक क्षत्रिय गणराज्य विस्थापित हुए। कठों की विभिन्न टुकड़ियाँ भारत के भिन्न क्षेत्रों में प्रवासित हुईं।
परंपरा के अनुसार:
एक शाखा सौराष्ट्र गई
एक शाखा पंचाल (मध्यदेश) में आई
एक शाखा नेपाल क्षेत्र में पहुँची
2.2 काठियावाड़ की स्थापना
सौराष्ट्र क्षेत्र, जो प्राचीन काल से प्रसिद्ध था, कठ क्षत्रियों के प्रभाव से “काठियावाड़” नाम से विख्यात हुआ। काठी दरबार और काठी क्षत्रिय परंपरा ने वहाँ की सैन्य और सामाजिक संरचना पर गहरी छाप छोड़ी।
लोक कहावत—
“काल भी अगर छोड़ दे, लेकिन काठी नहीं छोड़ता।”
—काठी क्षत्रियों के युद्ध-संकल्प और प्रतिशोधात्मक दृढ़ता का प्रतीक मानी जाती है।
2.3 कठेहर खंड का उद्भव
पंचाल क्षेत्र (वर्तमान उत्तर प्रदेश का उत्तरी भाग) में बसने वाली शाखा ने कठेहर राज्य की नींव रखी। यही क्षेत्र आगे चलकर रोहिलखण्ड के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
कठेहर शब्द का अर्थ है—कठों का क्षेत्र।
अध्याय 3
कठेहर राज्य की स्थापना और प्रारंभिक शासक
3.1 ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
7वीं से 10वीं शताब्दी के मध्य उत्तर भारत में अनेक क्षेत्रीय शक्तियाँ उभरीं। इन्हीं में कठेहर राज्य का भी क्रमिक विकास हुआ।
परंपरा के अनुसार 648–720 ईस्वी के मध्य कठेहर में स्थिर राज्य व्यवस्था विकसित हुई।
3.2 रामपुर की स्थापना
राजा रामसिंह (रामशाह) ने 909 ईस्वी (विक्रमी संवत 966) में रामपुर को राजधानी के रूप में विकसित किया। यह स्थान अहिक्षेत्र (रामनगर के समीप) क्षेत्र में स्थित था।
रामपुर:
सामरिक दृष्टि से सुरक्षित
नदी तंत्र से संरक्षित
कृषि और व्यापार के लिए अनुकूल
क्षेत्र था।
3.3 वंशावली क्रम
परंपरागत वंश सूची के अनुसार प्रमुख शासक:
रामशाह (रामसिंह)
बीजयराज
करणचन्द
विम्रहराज
सावन्त सिंह (जिन्होंने राज्य का विस्तार गंगा पार यमुना तक किया)
जगमाल
रणवीर सिंह
धिंगतराम
गोकुल सिंह
महासहाय
त्रिलोकचन्द
नौरंग देव
यह वंश लगभग 11 पीढ़ियों तक कठेहर पर शासन करता रहा।
अध्याय 4
महाराजा रणवीर सिंह रोहिला – जन्म और प्रारंभिक जीवन
4.1 जन्म
जन्म तिथि: 25 अक्टूबर 1204 ईस्वी
विक्रम संवत: 1261
स्थान: रामपुर, कठेहर
गोत्र: वशिष्ठ
वंश: निकुम्भ वंशी कठेहरिया क्षत्रिय
4.2 शिक्षा और प्रशिक्षण
राजकुमार रणवीर सिंह को:
धनुर्विद्या
तलवारबाजी
घुड़सवारी
दुर्ग रक्षा नीति
शास्त्र एवं धर्म शिक्षा
दी गई।
उनका व्यक्तित्व तेजस्वी, दृढ़निश्चयी और धर्मनिष्ठ बताया जाता है।
4.3 84 कवचधारी रोहिले
उनकी विशिष्ट सैन्य टुकड़ी “84 लोहे के कवचधारी” योद्धाओं की थी। ये रणधेलवंशी वीर, कठोर अनुशासन और अदम्य साहस के लिए प्रसिद्ध थे।
अध्याय 5
13वीं शताब्दी का राजनीतिक परिदृश्य
13वीं शताब्दी में दिल्ली में गुलाम वंश का शासन था। सुल्तान Nasiruddin Mahmud नाममात्र के शासक थे, जबकि वास्तविक शक्ति शक्तिशाली अमीरों, विशेषकर Ghiyas ud din Balban के हाथों में केंद्रित थी।
दिल्ली सल्तनत:
दोआब क्षेत्र पर नियंत्रण चाहती थी
राजस्व विस्तार कर रही थी
सीमावर्ती स्वतंत्र राज्यों को अधीन करना चाहती थी
अध्याय 6
संघर्ष का आरंभ
1253–1254 ईस्वी में दोआब, कठेहर और शिवालिक क्षेत्र में दमनकारी अभियान चलाया गया।
अत्याचारों से क्षुब्ध होकर स्थानीय शक्तियों ने विद्रोह किया। कठेहर में सल्तनती सूबेदार की हत्या कर दी गई।
यह घटना दिल्ली के लिए गंभीर चुनौती थी।
अध्याय 7
रामपुर–पीलीभीत का निर्णायक युद्ध
7.1 युद्ध की तैयारी
रामपुर और पीलीभीत के मध्य मैदान में दिल्ली सल्तनत की लगभग 30,000 सेना और महाराजा रणवीर सिंह की सेना आमने-सामने हुई।
7.2 युद्ध का वर्णन
रोहिला सेना ने संगठित प्रतिरोध किया
84 कवचधारी वीरों ने अग्रिम मोर्चा संभाला
हाथी-दल और घुड़सवारों को रोका गया
परंपरा के अनुसार, सुल्तान को बंदी बनाया गया।
7.3 क्षात्र धर्म का पालन
रणवीर सिंह ने शरणागत शत्रु को क्षमा कर अभयदान दिया। यह राजधर्म और क्षात्र मर्यादा का उदाहरण था।
अध्याय 8
विश्वासघात और बलिदान
8.1 षड्यंत्र
दरबारी पंडित गोकुलराम पाण्डेय को लालच देकर विश्वास में लिया गया। किले की सुरक्षा व्यवस्था की जानकारी शत्रु को दी गई।
8.2 रक्षाबंधन का दिन
शिव मंदिर में शस्त्र पूजा हेतु राजपूत निःशस्त्र थे। इसी अवसर पर किले का दक्षिण द्वार खोल दिया गया।
8.3 अंतिम युद्ध
अचानक आक्रमण
मंदिर परिसर में घमासान युद्ध
महाराजा रणवीर सिंह वीरगति को प्राप्त
महारानी तारादेवी सती हो गईं।
भाई सूरत सिंह परिवार सहित सुरक्षित स्थान पर चले गए।
अध्याय 9
सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत
9.1 भौतिक अवशेष
रामपुर किले के अवशेष
सती तारादेवी मंदिर
स्थानीय स्मारक
9.2 सामाजिक प्रभाव
रोहिला क्षत्रियों में आज भी रणवीर सिंह का नाम श्रद्धा से लिया जाता है।
अध्याय 10
ऐतिहासिक विश्लेषण
10.1 स्रोतों की प्रकृति
वंशावली ग्रंथ
लोक परंपराएँ
क्षेत्रीय पत्रिकाएँ
मौखिक इतिहास
10.2 इतिहास लेखन की चुनौती
मुख्यधारा इतिहास प्रायः साम्राज्य केंद्रित रहा है। क्षेत्रीय शक्तियों के संघर्षों को सीमित स्थान मिला। कठेहर राज्य का इतिहास इसी श्रेणी में आता है।
अध्याय 11
रणवीर सिंह का ऐतिहासिक महत्व
क्षेत्रीय स्वाधीनता के प्रतीक
क्षात्र धर्म के पालन का उदाहरण
धार्मिक आस्था और युद्ध नीति का समन्वय
विश्वासघात के विरुद्ध चेतावनी
निष्कर्ष
महाराजा रणवीर सिंह रोहिला का जीवन भारतीय इतिहास में उस परंपरा का प्रतिनिधित्व करता है जिसमें—
स्वाभिमान सर्वोपरि है
पराधीनता अस्वीकार्य है
शरणागत को अभय देना क्षात्र धर्म है
विश्वासघात अंततः विनाशकारी होता है
उनका बलिदान कठेहर–रोहिलखण्ड की स्वतंत्र चेतना का प्रतीक है। यद्यपि उनका राज्य अंततः राजनीतिक रूप से पराजित हुआ,किंतु लोक स्मृति में अमर है।