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Sunday, 22 February 2026

ANCIENT HISTORY OF RAJPUTANA ROHILKHAND

*प्राचीन रोहिला राजवंश*
*रोहिला क्षत्रिय/राजपूत*

वैववस्त मनु  से  प्रारंभ  हुई, , श्रीराम व  श्री कृष्ण जिस  कालखंड में है, सहस्राब्दियो पूर्व से भारत की पावन भूमि पर आज तक चली आ रही, क्षत्रिय वंशो की अटूट परम्परा को नमन करते हुए, एक राजन्य (राजपुत्र) ही जन्मसिद्ध स्वतंत्रता की रक्षा सदैव सीमाओ पर   KARTA AYA है हिंदुकुश रोहित-गिरि पंचनद तक भरत खण्ड की पश्चिमी उत्तरीय सीमा के क्षत्रिय प्रहरियों का दीर्घ कालीन विकट संघर्ष ही भारत की संस्कृति व सभ्यता की रक्षा करता रहा है। आक्रमणकारियों के लिए रोहितगिरि का उत्तारापथ ही पूर्व काल से एक  प्रवेश  द्वार  था। सूर्य, चन्द्र और नागादि संज्ञक क्षत्रिय वंशो की शाखाओं प्रशाखाओं में बंटे महाजनपद गणराज्यों के शासक ही प्राचीन आर्य सभ्यता को मध्य एशिया तक प्रसारित करने में संघर्षरत थे। यह प्रसार क्रम कई द्वीपों तथा मध्य एषिया तक होता चला गया, जहाँ से उनका आना जाना बसना उजडना लगा रहता था। वर्तमान भारत में बिखरे पड़े हजारों षाखाओं व प्रषाखाओं में विभाजित करोड़ो संताने है जो सूर्य व चन्द्र वंष की दो समानान्तर विकसित सभ्यताओं के रूप में समूचे आर्यवर्त, हिमवर्ष व मध्यएषिया, अरब ईरान, मिश्र आदि तक फैल गये थे तथा अपने व अपने पूर्वजों, धर्मगुरूओं ओर  वंश पुरोहितों, ऋषियों आदि के नाम पर अपने गणराज्य व ठिकाने स्थापित कर रहे थे।।

रोहिला शब्द भी इसी क्रम की एक
 अटूट कड़ी है प्रयाग के पास झूँसी में विकसित प्राचीन चन्द्रवंषी चक्रवर्ती सम्राट पुरूरवा व उसके वंशधरो में प्रख्यात सम्राट ययाति के पांच पुत्र पंचजन कहलाये और उनके पाँच जनपद स्थापित हुए। लगभग सात सहस्त्राब्दी पूर्व मध्य देश आर्यवर्त में विश्व की प्राचीनतम् सभ्यता विकसित हो रही थी, इलाहाबाद, (प्रयाग) के पास झूँसी में चन्द्रवंषी क्षत्रियों व कौशल (अयोध्या) में सूर्य वंशी इक्ष्वाकु के वंशधरो के राज्य खण्ड स्थापित हो रहे थे। उस काल की परम्परा के अनुसार जिस सम्राट के रथ का चक्र अनेक राज्यों में निशंक घूमता हो वह चक्रवर्ती सम्राटों की श्रेणी में मान्य होता था। वन गमन से पूर्व (वानप्रस्थ आश्रम) सम्राट ययाति ने अपने पाँच पुत्रों क्रमश यदु, तुर्वसु, द्रहृाू (उपनाम रोहू) पुरू और अनु के लिए अपने साम्राज्य को पांच भागों में विभक्त कर प्रत्येक पुत्र को अपने-अपने प्रदेशों के शासनाधिकार का उत्तरदायित्व सौंप दिया था*

1. *यदु- दक्षिण पश्चिम में केन-बेतुआ और चम्बल नदी के कांठो का प्रदेश दिया, कालान्तर में यदु के वंशधर यादव कहलाये*।

2. *तुर्वसु-कुरूष प्रदेष वर्तमान बघेल खण्ड तुर्वसु को प्राप्त हुआ, वहां कुरूषजनों को परास्त कर तुर्वसु वंष की स्थापना हुई*।

3. *द्रह्यु- चम्बल नदी के उत्तर पश्चिम, सिन्धु नदी के किनारे तथा यमुना नदी के पष्चिम पचनद (पंजाब) का पूरा प्रान्त द्रह्यु को मिला। द्रुह्यु के वष्ंाधर आगे चल कर उत्तर और पूरब में हिन्दु कुष तथा पामीर ओर पश्चिमोत्तर में वाल्हिक, हरअवती तक के विस्तुत क्षेत्रों पर अपना अधिकार स्थापित करते चले गए और वैदिक संस्कृति का प्रसार किया*।

4. *पुरू- पुरू को प्रतिष्ठान के राज्य सिंहासन पर आसीन किया गया, पुरू के वंष आगे चलकर पौरव कहलाए इसी वंष में भरत का जन्म हुआ, आर्यवर्त, हिमवर्ष, जम्बूद्वीप (मध्यप्रदेष-विन्घ्याचल से हिन्दुकुष रोहित गिरी तक) का नाम भरत खण्ड भारत वर्ष कहलाया*।

5. *अनु- यमुना नदी को पूरब* *और गंगा यमुना के मध्य का देष (दक्षिण पंचाल) तथा अयोध्या के पष्चिम के क्षेत्र अनु को प्राप्त हुए अनु के वंष घर आनव कहलाए*। 



*इस प्रकार चन्द वंश का विस्तार हुआ*।



*आर्यवर्त की उत्तरी सीमा पर स्थित केकय देष भरत को उसकी माता कैकेयी के राज्य के कारण प्राप्त हुआ। भरत के दो पुत्रों तक्ष व पुष्कर ने क्रमषः तक्षषिला व पुष्करावती दो राजधानियां स्थापित की और आर्य संस्कृति को समृद्ध किया। उस काल में संस्कृत ही मातृभाशा थी*।



*भारत की पश्चिमि उत्तरीय सीमाओं पर जिस अवसर पर भी विदेशी आक्रमण हुए सूर्य वंशी भरत और चन्द्र वंशी द्रह्यु के वंशधरों ने मिल कर**
**प्रहरियों के अनुरूप अपना रक्त बहाया। ईसा से लगभग पाँच सौ वर्ष पूर्व से इस पर्वतीय प्रदेष में पचनद तक ‘कठ‘ गणराज्य, छुद्रक गणराज्य, यौधेय गणराज्य, मालव गणराज्य, अश्वक गणराज्य आदि फल फूल रहे थे। इनकी शासन प्रणाली गणतंत्रात्मक* *थी। यहाँ के निवासी सौंदर्यापासक थे और सुन्दर पुरुष ही राजा चुना जाता था। दु्रह्यु देश का नाम कालान्तर में द्रुह्यु के वंशज गंधारसैन के नाम पर गांधार और सूर्यवंषी राजाओं ने अपने शासित प्रदेष को ‘कपिष‘ के नाम से प्रसिद्ध कर काबुल (कुम्भा) नदी के पूर्वोत्तरीय क्षेत्र में अपनी राजधानी का नाम कपिषा रखा*

      *प्राचीन काल में कपिष (लडाकू, उदण्ड पर्वताश्रयी) और गान्धार की भाशा संस्कृत थी, किन्तु मध्यकाल से संस्कृत भाशा का विकृत सरलीकृत रूप ‘ प्राकृत‘ में परिवर्तित हो गया। भाषा के आधार पर यह स्पष्ट है कि इस प्रदेष में सहस्त्रों वर्ष तक भारतीय संस्कृति और सभ्यता स्थापित रही और इस समस्त प्रदेष में दीर्घ काल तक आर्य क्षत्रिय नरेषों का षासन रहा*।

      *अनेक पहाड़ियों (माल्यवत्त-रोहितगिरि-लोहितगिरि-हिन्दकाकेश्षस-रोहतांग आदि) नदियों (कुनार, स्वातु, गोमल, कुर्रम, सिन्धु की सहायक नदियाँ- सतलज, रावी, व्यास तथा घाटियों के कारण सामरिक दृष्टि से भी यह प्रदेष इन पर्वताश्रयी क्षत्रिय नरेषों के लिए महत्वपूर्ण था। यहाँ ठण्डी ऋतु जलवायु की दृष्टि से अति उत्तम रही। इसलिए यहां के निवासी बलिष्ठ, रक्तिम वर्ण (ललिमा चुक्त गोरा रंग) व कद काटी में मजबूब, हठी व गठीले होते रहे है। दुर्गम पहाड़ियों, नदियों व घाटियों के कारण यहां के निवासी पर्वताश्रयी, अश्वारोही थे। अश्वो के लिए प्रसिद्ध रहा यह प्रदेश रोहित गिरिये, रोहित नस्ल के अश्वों के व्यापार का प्रमुख केन्द्र था। क्रमषः *इसी कारण यह प्रदेष घोड़ों का प्रदेष अथवा अष्वकों का प्रदेश* *(अष्वकायन) कहलाता था*
**रोहित (संस्कृत), वर्तमान भाषा में लाल- भूरा रंग के घोड़े और श्येन नस्ल *के घोड़े पाए जाते थे। घोडों अथवा अष्वारोहण के बिना यहां जीवन* *सम्भव नहीं था। विदेषी* *आक्रमणों के समय अष्वों की प्रथम भूमिका थी। गहरे किसमिसी रंग के बहादुर घोड़ों को रोहित नाम से सम्बोधित किया जाता था*।
 *ईरानी व यूनानी विद्वानों के द्वारा भी इस प्रदेश के रोहित नस्ल के घोड़ों की प्रषन्सा की गई है*
* **इस प्रदेश के (महाजनपद) प्राचीन शासक (चन्द्रवंषी) द्रुह्यु का उपनाम भी रोहु था। इसलिए इसका नाम द्रुहयू का देश रोह देश रोहित गिरि रोह प्रदेश (अपभ्रनस होता चला* गया )हो जाना व्यावहारिक व स्वाभाविक था। *
*संस्कृत भाषा में रोह का अर्थ है- सीधे दृढ़-बल युक्त चढ़ना-अवरोहण करना, रक्तिम वर्ण (रोहित), पर्वत (माउण्टेन) इसलिए मध्यकाल तक ये पर्वताश्रयी* *क्षत्रिय शासक रोहित वर्ग से प्रसिद्ध हुए*। 
*पर्वतीय प्रदेश का नाम , रोहित प्रदेश*
  (प्रांकृत संस्कृत में) यहां सेनाओं की युद्ध प्रणाली रोहिल्ला युद्ध (रोहिला वार, लैटिन भाषा में) प्रणाली
 *सीधे दृढ़ बल युक्त पर्वत पर अवरोहण की तरह तीब्रता से शत्रु पर चढ़ जाना*
 *शत्रु सेना पर बाढ़ रोह की तरह, लाल* *होकर (रक्ति वर्ण क्रोधित आक्रोष युक्त) टूट पड़ना, तीब्रता से षत्रु सेना में घुस जाना। रोह (कमानी) के समान षत्रु सेना को भेदते, (काटते जाना) हुए चढ़ाई करना, प्रख्यात हुई* कालांतर में अनेक *क्षत्रिय सेनानायकों को , रोहिल्ला उपधि से विभूषित किया गया*। (मध्यकाल में)

‘‘धृतकौषिक मौद्गल्यौ आलम्यान परषरः।

सौपायनस्तथत्रिश्च वासुकी रोहित स्तथा।‘‘

(राष्ट्रधर्म-भाद्रपद 2067, सितम्बर 2010 के पृष्ठ 31 पर रोहित गोत्र का उपरोक्त श्लोक में वर्णन)

‘‘अरूषा रोहिता रथे बात जुता

वृषभस्यवते स्वतः‘‘ ।।10।।

(ऋग्वेद मण्डल 1, अ0 15 स्0 94 ‘‘ रोहिला क्षत्रियों का क्रमबद्ध इतिहासः पृष्ठ 42)



*मद्रान, रोहित कश्चैव, आगेयान, मालवान अपि गणन सर्वान, विनिजीत्य, प्रहसन्निव,। महाभारत वन पर्व 255-20 प्राचीन रोहित गिरि के नाम का अस्तित्व आज भी रोहतांग घाटी, रोहतांग दर्रानाम से अवस्थित है*।

*महाभारत के सभा पर्व में लोहित (रोहित) (संस्कृत शब्द) प्रदेश के दस मण्डलों का उल्लेख है जो भारत का उत्तर पूर्वी मध्यभाग था। श्री वासूदेव शरण अग्रवाल*

      ‘‘ *पाणिनि कालीन भारत वर्ष पृष्ठ 449 ‘‘ अश्येनस्य जवसा‘‘ वैदिक साहितय ऋग्वेद 1, अ0 17, मत्र 11, सुक्त 118-119 अर्थात- दृढ निश्चय के साथ (अश्येनस्य ) बाज पखेरू के समान (जवसा) तीव्र वेग के समान हम लोगो को आन मिली। (यह श्येन और रोहित नस्ल के घोडों की अश्व के रोहिला सेनाओं का वर्णन है*।)

  ‘‘ *उत्तरीय सीमा प्रान्त मे ंएक सुरम्य स्थानथा यहाँ का राजा क्षत्रिय था वह अपनी प्रजा को बहुत प्यार करता था, यहाँ विभिन्न प्रकार के अन्न व फलों के वृक्ष थे*
*यहां के निवासी भयानक थे तथा उनकी भाषा रूक्ष संस्कृत थी। ये रजत तथा ताम्र मुद्राओं का प्रयोग करते थे*
 *ये बहुत लडाकू तथा बहादूर थे यह क्षेत्र कुम्भा नदी के उत्तर पूर्व में 155 मील दूर था। ‘‘ एक प्रसिद्ध इतिहासकार टालेमी के अनुसार यह वर्णन चीन पागी युलान-च्वाड्डा ने किया। प्राचीन भारत का ऐतिहासिक भूगोल पृष्ठ 153-154 द्वारा श्री विमलचन्द्र लाहा (रोहिला क्षत्रिय क्रमबद्ध इतिहास से साभार‘‘) पाणिनी ने भी पश्चिमोत्तरीय सीमा प्रान्त के अश्वकायनों, अश्वकों, कठों, यादवों, छुद्रकों, मालवों निवासी सभी क्षत्रिय वर्गो को पर्वतीय और युद्धोपजीवि कहा है*।

      *पर्वतीय (संस्कृत-हिन्दी), माउण्टेनीयर (लैटिन-अंगे्रजी), रोहित, रोहिते, रोहिले (संस्कृत ‘प्राकृत‘ - पश्तों) रोहिले-चढ़ने वाले, चढाई करने वाले अवरोही, अश्वारोही, द्रोही रोह रोहि पक्थजन , आदि समानार्थी शब्दों का सम्बन्ध प्राचीन क्षत्रिय वर्गोक्षत्रिय शासित क्षेत्रों ,पर्वतीय प्रदेशों (रोहितगिरि, रोहताग दर्रा, लोहित गिरि, कोकचा, पर्वत श्रेणी आदि)युद्ध प्रणालियों और नदी घाटी, काॅठो घोड़ों की पीठ पर (चढ़कर करने बहादुरी के साथ लडने वाले गुणों स्वभावों व क्षात्र धार्मो से है। भारतीय इतिहास में रोहिला- क्षत्रिय एक गौरवशाली वंश परम्परा है जिसमें कई प्राचीन क्षत्रिय वंशों के वंशज पाए जाते है। क्येांकि यह शब्द, क्षेत्रीयता (रोहिल देश, रोहित प्रदेश रोहित गिरि आदि द्रोह देश- रोह देश) गुणधर्म (रोहित-रक्तिम वर्ण) (कसमिसि लाल रंग) युद्ध प्रणाली (रोहिल्ला-युद्ध) (पूर्व वर्णित प्रणाली) उपाधि, बहादूीर, शौर्यपदक और क्षत्रिय सम्मान से जुडा है, इसलिए जो भी क्षत्रिय राजपुत्र इन सभी से सम्बन्धित रहा- रोहिला-क्षत्रिय अथवा रोहिल्ला राजपुत्र कहलाया गया। रोहिला-पठान इस्लामीकरण के पश्चात् की पक्भजनों , (क्षत्रिय) की आधुनिक वंश परम्परा है। जबकि क्रमशः रोहिला-क्षत्रिय पुरातन काल से भारतवर्ष में एक प्रहरी के रूप में विद्यमान रहे है*। 
*सहारनपुर के प्रख्यात साहित्यकार श्री कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर ने अपने पावन ग्रन्थ ‘‘ भगवान परशुराम‘‘ में भी रोहिल देश की चर्चा की है*।

      *प्रतिष्ठित ज्योतिषी एवं ग्रन्थकार डा. सुरेश चन्द्र मिश्र ने हिन्दुस्तान दैनिक‘‘ के रविवार 20 नवम्बर 2009 के मेरठ संस्करण के पृष्ठ-2 पर ‘‘ मूल गोत्र तालिका (40गोत्र) के क्रमांक छः पर क्षत्रिय गो़त्र रोहित का वर्णन किया है। वैदिक काल में पांच की वर्ग या समुदाय आर्य क्षत्रियों के थे जो मिलकर पंचजना-पंचजन कहे जाते थे। इनके सम्मिलित निर्णय को सभी लोग विवाद की दशा में मान लेते थे। इसी शब्द की परम्परा से आज पंचायत शब्द प्रचलित है। ये पांच वशं पुरूष या गोत्रकर्ता थे*।

  *यादव कुल पुरुष यदु, पौरव वंश पुरूष पुरू, द्रहयु वंश पुरूष द्रुहयु, तुर्वषु और आनववंश पुरूष अनु, से शेष अन्य समुदाय निकले थे*।









*क्षत्रिय वंश तालिका -14 (गंधार) वं. ता.-5*

     *इन्ही पांच वंशों के पुरूषों से महापंचायत बनती थी। प्रारम्भ में इन्हीं पंचजनों से लगभग 400 क्षत्रिय गोत्रों का प्रसार हुआ*

      *भारत की पष्चिमोत्तरीय सीमा पर विदेषी आक्रमण कारियों के आक्रमणों को विफल करने के लिए वहां के निवासी क्षत्रिय वर्गो एवं शासकों ने आरम्भ से ही प्रत्येक अवसर पर आक्रान्ताओं के विरूद्ध घोर संघर्ष किया किन्तु मैदानी षासकों की दुर्बल सीमान्त निति के कारण उन्हें किसी भी प्रकार की सहायता उपलब्ध हो सकी। इसलिए सीमान्त प्रदेष के वीर प्रहरी वर्ग इन प्रबल सुगठित आकान्ताअें की अपार शक्ति के सम्मूख लगभग पाँच सौ वर्षो से अधिक संघर्ष न कर सके और सिकन्दर के आक्रमण ईसा पूर्व लगभग 326 के पष्चात् से नदियाँ घाटियाँ, पर्वताश्रय पार करने लगे और मैदानी स्थानों की तरफ पूर्व व पूर्वोत्तर की तरफ आने लगे*
*(अध्याय-9) क्षत्रिय कुल ‘ काठी क्रम सं. 5*

      *पष्चिमोत्तरीय-सीमा प्रान्त पंजाब की जातियों व समुदायों का विवरण जो कि - स्व. सर डैंजिल लिबैट्रषन द्वारा पंजाब की जनगणना सन् 1883 और सर एडवर्ड मैकलेजन द्वारा पंजाब की जनगणना 1892 पर आधारित, सर .एच.ए. रोज द्वारा संकलित कोष है*


हमारी गौरवशाली संस्कृति में सबसे गौरवशाली नाम और वैदिक नाम आर्य है, किंतु दुर्भाग्य से बहुत से लोग आर्य शब्द से नफरत करते हैं और तथाकथित मनुष्यों द्वारा दिए गए नाम को मानते हैं। 
यहां वैदिक और लौकिक ग्रंथों से 'आर्य' शब्द के कुछ प्रमाण दिए जा रहे हैं 

१) ऋग्वेद में :-
"कृण्वन्तो विश्वमार्यम ।"
      सारे संसार को 'आर्य' बनाओ, श्रेष्ठ बनाओ ।
२) मनुस्मृति में :-
"मद्द मांसा पराधेषु गाम्या पौराः न लिप्तकाः ।
आर्या ते च निमद्यन्ते सदार्यावर्त्त वासिनः ।।"
     वे ग्राम व नगरवासी, जो मद्द, मांस और अपराधों में लिप्त न हों तथा सदा से आर्यावर्त्त के निवासी हैं, वे 'आर्य' कहे जाते हैं ।
३) वाल्मिकी रामायण में :-
"सर्वदा मिगतः सदिशः समुद्र इव सिन्धुभिः ।
आर्य सर्व समश्चैव व सदैवः प्रिय दर्शनः ।।"
     (बालकाण्ड)
      जिस प्रकार नदियाँ समुद्र के पास जाती है, उसी प्रकार जो सज्जनों के लिए सुलभ हैं, वे 'आर्य' हैं, जो सब पर समदृष्टि रखते हैं, हमेशा प्रसन्नचित्त रहते हैं ।
४) महाभारत में :-
"न वैर मुद्दीपयति प्रशान्त,न दर्पयासे हति नास्तिमेति ।
न दुगेतोपीति करोव्य कार्य,तमार्य शीलं परमाहुरार्या ।।"
     (उद्योग पर्व)
     जो अकारण किसी से वैर नहीं करते तथा गरीब होने पर भी कुकर्म नहीं करते, उन शील पुरुषों को 'आर्य' कहते हैं ।
५) वशिष्ठ स्मृति में :-
"कर्त्तव्यमाचरन काम कर्त्तव्यमाचरन ।
तिष्ठति प्रकृताचारे यः स आर्य स्मृतः ।।"
      जो रंग, रुप, स्वभाव, शिष्टता, धर्म, कर्म, ज्ञान और आचार-विचार तथा शील-स्वभाव में श्रेष्ठ हो, उसे 'आर्य' कहते हैं ।
६) निरुक्त में यास्काचार्य जी लिखते हैं :-
"आर्य ईश्वर पुत्रः ।"
      'आर्य' ईश्वर के पुत्र हैं।
७) विदुर नीति में :-
"आर्य कर्मणि रज्यन्ते भूति कर्माणि कुर्वते ।
हितं च नामा सूचन्ति पण्डिता भरतर्षभ ।।"
      (अध्याय १ श्लोक ३०)
      भरत कुल भूषण ! पण्डितजन्य, जो श्रेष्ठ कर्मों में रुचि रखते हैं, उन्नति के कार्य करते हैं तथा भलाई करने वालों में दोष नहीं निकालते हैं, वही 'आर्य' हैं ।
८) गीता में :-
"अनार्य जुष्टम स्वर्गम् कीर्ति करमर्जुन ।"
        (अध्याय २ श्लोक २)
        हे अर्जुन ! तुझे इस असमय में यह अनार्यों का सा मोह किस हेतु प्राप्त हुआ, क्योंकि न तो यह श्रेष्ठ पुरुषों द्वारा आचरित है और न स्वर्ग को देने वाला है तथा न कीर्ति की और ही ले जाने वाला है । यहां पर अर्जुन के अनार्यता के लक्षण दर्शाये हैं ।
९) चाणक्य नीति में :-
"अभ्यासाद धार्यते विद्या कुले शीलेन धार्यते ।
गुणेन जायते त्वार्य,कोपो नेत्रेण गम्यते ।।"
       (अध्याय ५ श्लोक ८)
       सतत् अभ्यास से विद्या प्राप्त की जाती है, कुल, उत्तम गुण, कर्म, स्वभाव से स्थिर होता है, आर्य श्रेष्ठ गुणों के द्वारा जाना जाता है ।
१०) नीतिकार के शब्दों में :-
"प्रायः कन्दुकपातेनोत्पतत्यार्यः पतन्नपि ।
तथा त्वनार्ष पतति मृत्पिण्ड पतनं यथा ।।"
        आर्य पाप से लिप्त होने पर भी गेन्द के गिरने के समान शीघ्र ऊपर उठ जाता है, अर्थात पतन से अपने आपको बचा लेता है, अनार्य पतित होता है, तो मिट्टी के ढेले के गिरने के समान फिर कभी नहीं उठता ।
११) अमरकोष में :-
"महाकुलीनार्य सभ्य सज्जन साधवः ।"
      (अध्याय२ श्लोक६ भाग३)
      जो आकृति, प्रकृति, सभ्यता, शिष्टता, धर्म, कर्म, विज्ञान, आचार, विचार तथा स्वभाव में सर्वश्रेष्ठ हो, उसे 'आर्य' कहते हैं ।
१२) कौटिल्य अर्थशास्त्र में :-
"व्यवस्थितार्य मर्यादः कृतवर्णाश्रम स्थितिः ।"
         आर्य मर्यादाओं को जो व्यवस्थित कर सके और वर्णाश्रम धर्म का स्थापन कर सके, वही 'आर्य' राज्याधिकारी है ।
१३) पंचतन्त्र में :-
"अहार्यत्वादनर्धत्वाद क्षयत्वाच्च सर्वदा ।"
       सब पदार्थों में उत्तम पदार्थ विद्या को ही कहते हैं ।
१४) धम्मपद में :-
"अरियत्पेवेदिते धम्मे सदा रमति पण्डितो ।"
        पण्डित जन सदा आर्यों के बतलाये धर्म में ही रमण करता है ।
१५) पाणिनि सूत्र में :-
"आर्यो ब्राह्मण कुमारयोः ।"
        ब्राह्मणों में 'आर्य' ही श्रेष्ठ है।
१६) काशी विश्वनाथ मन्दिर के मुख्य द्वार पर :-
"आर्य धर्मेतराणो प्रवेशो निषिद्धः ।"
        आर्य धर्म से इतर लोगों का प्रवेश वर्जित है ।
१७) आर्यों के सम्वत् में :-
"जम्बू दीपे भरतखण्डे आर्यावर्ते अमुक देशान्तर्गते ।"
         ऐसा वाक्य बोलकर पौराणिक भाई भी संकल्प पढ़ते हैं, अर्थात यह आर्यों का देश 'आर्यावर्त्त' है ।
१८) आचार्य चतुरसेन :-
"उठो आर्य पुत्रों नहि सोओ ।
समय नहीं पशुओं सम खोओ ।
भंवर बीच में होकर नायक ।
बनो कहाओ लायक-लायक ।।"
        तुम्हारा जीवन पशुओं के समान निद्रा के वशीभूत होने के लिए निर्माण नहीं हुआ है । यह समय तुम्हें पुरुषार्थ करने का है, यदि जीवन में तुम पुरुषार्थ करोगे तो किसी कहानी के नायक बनकर समाज के आगे उपस्थित होवोगे ।
१९) पं. प्रकाशचन्द कविरत्न :-
"आर्य बाहर से आये नहीं,
देश है इनका भारतवर्ष ।
विदेशों में भी बसे सगर्व,
किया था परम प्राप्त उत्कर्ष ।।
आर्य और द्रविड जाति हैं,
भिन्नचलें यह विदेशियों की चाल ।
खेद है कुछ भारतीय भी,
व्यर्थ बजाते विदेशियों सम गाल ।।"
२०) पं. राधेश्याम कथावाचक बरेली वाले :-
जब पंचवटी में सूर्पणखा राम के पास मोहित होकर अपना विवाह करने की बात राम से कहती है,तब राम उत्तर देते हैं -                        
"हम आर्य जाति के क्षत्रिय हैं,
रघुवंशी वैदिक धर्मी हैं ।
जो करें एक से अधिक विवाह,
कहते वेद उन्हें दुष्कर्मी हैं ।।"
*इसमें रोहिला परिवारों* (राजपूत-क्लेन) का पर्याप्त विवरण है।
*संकलन एवम प्रस्तुति*
*समय सिंह पुंडीर*
*२२अगस्त २०१२*
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*विशेष नोट ____यहां प्रदर्शित सभी चित्र सोसल मीडिया से नेट द्वारा लिए गए है इनका लेखक से कोई संबंध नहीं ये सोसल मीडिया की संपत्ति है यहां केवल प्रतीकात्मक रूप से उड्धृत है।।।

ROHILA KSHTRIYA, ANCIENT HISTORY


‘‘ क्षत्रिय इतिहास के कुछ धुंधले पृष्ठ ‘‘



वैववस्तु मनु से प्रारम्भ हुई, श्रीराम व श्रीकृश्ण आदि जिसके मध्य में है,ं सहस्त्राब्दियों पूर्व से भारत की पावन भूमि पर आज तक चली आ रही, क्षत्रिय वंषों की अटूट परम्परा को प्रणाम करते हुए, एक राजन्य (राजपुत्र) ही जन्मप्रदत्त स्वतंत्रता की रक्षा के लिए सदैव सीमाओं का संरक्षण करता आया है। हिन्दुकुष रोहित-गिरि पंचनद तक भरत खण्ड की परिष्चमोत्तरीय सीमा के क्षत्रिय प्रहरियों का दीर्घ कालीन विकट संघर्ष ही भारत की संस्कृति व सभ्यता की रक्षा करता रहा है। आक्रमणकारियों के लिए रोहितगिरि का उत्तारापथ ही पूर्व काल से एक प्रवेष द्वारा था। सूर्य, चन्द्र और नागादि संज्ञक क्षत्रिय वंषों की षाखाओं प्रषाखाओं में बंटे महाजनपद गणराज्यों के षासक ही प्राचीन आर्य सभ्यता को मध्य एषिया तक प्रसारित करने में संघर्षरत थे। यह प्रसार क्रम कई द्वीपों तथा मध्य एषिया तक होता चला गया, जहाँ से उनका आना जाना बसना उजडना लगा रहता था। वर्तमान भारत में बिखरे पड़े हजारों षाखाओं व प्रषाखाओं में विभाजित करोड़ो  संताने है जो सूर्य व चन्द्र वंष की दो समानान्तर विकसित सभ्यताओं के रूप में समूचे आर्यवर्त, हिमवर्ष व मध्यएषिया, अरब ईरान, मिश्र आदि तक फैल गये थे तथा अपने व अपने पूर्वजों, धर्मगुरूओं ओर वंष पुरोहितों, ऋषियों आदि के नाम पर अपने गणराज्य व ठिकाने स्थापित कर रहे थें। रोहिला षब्द भी इसी क्रम की एक अटूट कड़ी है। प्रयाग के पास झूँसी में विकसित प्राचीन चन्द्रवंषी चक्रवर्ती सम्राट पुरूरवा व उसके वंषधरो में प्रख्यात सम्राट ययाति के पांच पुत्र पंचजन कहलाये और उनके पाँच जनपद स्थापित हुए। लगभग सात सहस्त्राब्दी पूर्व मध्य देष आर्यवर्त में विष्व की प्राचीनतम् सभ्यता विकसित हो रही थी, इलाहाबाद, (प्रयाग) के पास झूँसी में चन्द्रवंषी क्षत्रियों व कौषल (अयोध्या) में सूर्य वंषी इक्ष्वाकु के वंषधरो के खण्ड स्थापित हो रहे थे। उस काल की परम्परा के अनुसार जिस सम्राट के रथ का चक्र अनेक राज्यों में निषंक घूमता हो वह चक्रवर्ती सम्राटों की श्रेणी में मान्य होता था। वन गमन से पूर्व (वानप्रस्थ आश्रम) सम्राट ययाति ने अपने पाँच पुत्रों क्रमषः यदु, तुर्वसु, द्रहृाू (उपनाम रोहू) पुरू और अनु के लिए अपने साम्राज्य को पांच भागों में विभक्त कर प्रत्येक पुत्र को अपने-अपने प्रदेषों के षासनाधिकार का उत्तरदायित्व सौंप दिया था।

1.            यदु- दक्षिण पष्चिम में केन-बेतुआ और चम्बल नदी के कांठो का प्रदेष दिया, कालान्तर में यदु के वंषधर यादव कहलाये।

2.            तुर्वसु-कुरूष प्रदेष वर्तमान बघेल खण्ड तुर्वसु को प्राप्त हुआ, वहां कुरूषजनों को परास्त कर तुर्वसु वंष की स्थापना हुई।

3.            द्रह्यु- चम्बल नदी के उत्तर पष्चिम, सिन्धु नदी के किनारे तथा यमुना नदी के पष्चिम पचनद (पंजाब) का पूरा प्रान्त द्रह्यु को मिला। द्रुह्यु के वष्ंाधर आगे चल कर उत्तर और पूरब में हिन्दु कुष तथा पामीर ओर पष्चिमोत्तर में वाल्हिक, हरअवती तक के विस्तुत क्षेत्रों पर अपना अधिकार स्थापित करते चले गए और वैदिक संस्कृति का प्रसार किया।

4.            पुरू- पुरू को प्रतिष्ठान के राज्य सिंहासन पर आसीन किया गया, पुरू के वंष आगे चलकर पौरव कहलाए इसी वंष में भरत का जन्म हुआ, आर्यवर्त, हिमवर्ष, जम्बूद्वीप (मध्यप्रदेष-विन्घ्याचल से हिन्दुकुष रोहित गिरी तक) का नाम भरत खण्ड भारत वर्ष कहलाया।

5.            अनु- यमुना नदी को पूरब और गंगा यमुना के मध्य का देष (दक्षिण पंचाल) तथा अयोध्या के पष्चिम के क्षेत्र अनु को प्राप्त हुए अनु के वंष घर आनव कहलाए। 



इस प्रकार चन्द वंष का विस्तार हुआ।



आर्यवर्त की उत्तरी सीमा पर स्थित केकय देष भरत को उसकी माता कैकेयी के राज्य के कारण प्राप्त हुआ। भरत के दो पुत्रों तक्ष व पुष्कर ने क्रमषः तक्षषिला व पुष्करावती दो राजधानियां स्थापित की और आर्य संस्कृति को समृद्ध किया। उस काल में संस्कृत ही मातृभाशा थी।



भारत की पष्चिमोत्तरीय सीमाओं पर जिस अवसर पर भी विदेषी आक्रमण हुए सूर्यवंषी भरत और चन्द्रवंषी द्रह्यु के वंषधरों ने मिल कर प्रहरियों के अनुरूप अपना रक्त बहाया। ईसा   से लगभग पाँच सौ वर्ष पूर्व से इस पर्वतीय प्रदेष में पचनद तक ‘कठ‘ गणराज्य, छुद्रक गणराज्य, यौधेय गणराज्य, मालव गणराज्य, अष्वक गणराज्य आदि फल फूल रहे थे। इनकी षासन प्रणाली गणतंत्रात्मक थी। यहाँ के निवासी सौंदर्यापासक थे और सुन्दर पुरूश ही राजा चुना जाता था। दु्रह्यु देष का नाम कालान्तर में द्रुह्यु के वंषराज गंधारसैन के नाम पर गांधार और सूर्यवंषी राजाओं ने अपने षासित प्रदेष को ‘कपिष‘ के नाम से प्रसिद्ध कर काबुल (कुम्भा) नदी के पूर्वोत्तरीय क्षेत्र में अपनी राजधानी का नाम कपिषा रखा।

      प्राचीन काल में कपिष (लडाकू, उदण्ड पर्वताश्रयी) और गान्धार की भाशा संस्कृत थी, किन्तु मध्यकाल से संस्कृत भाशा का विकृत सरलीकृत रूप ‘ प्राकृत‘ में परिवर्तित हो गया। भाषा के आधार पर यह स्पष्ट है कि इस प्रदेष में सहस्त्रों वर्ष तक भारतीय संस्कृति और सभ्यता स्थापित रही और इस समस्त प्रदेष में दीर्घ काल तक आर्य क्षत्रिय नरेषों का षासन रहा।

      अनेक पहाड़ियों (माल्यवत्त-रोहितगिरि-लोहितगिरि-हिन्दकाकेश्षस-रोहतांग आदि) नदियों (कुनार, स्वातु, गोमल, कुर्रम, सिन्धु की सहायक नदियाँ- सतलज, रावी, व्यास तथा घाटियों के कारण सामरिक दृष्टि से भी यह प्रदेष इन पर्वताश्रयी क्षत्रिय नरेषों के लिए महत्वपूर्ण था। यहाँ ठण्डी ऋतु जलवायु की दृष्टि से अति उत्तम रही। इसलिए यहां के निवासी बलिष्ठ, रक्तिम वर्ण (ललिमा चुक्त गोरा रंग) व कद काटी में मजबूब, हठी व गठीले होते रहे है। दुर्गम पहाड़ियों, नदियों व घाटियों के कारण यहां के निवासी पर्वताश्रयी, अष्वारोही थे। अष्वों के लिए प्रसिद्ध रहा यह प्रदेष रोहित गिरिये, रोहित नस्ल के अष्वों के व्यापार का प्रमुख केन्द्र था। क्रमषः इसी कारण यह प्रदेष घोड़ों का प्रदेष अथवा अष्वकों का प्रदेष (अष्वकायन) कहलाता था। रोहित (संस्कृत), वर्तमान भाषा में लाल- भूरा रंग के घोड़े और श्येन नस्ल के घोड़े पाए जाते थे। घोडों अथवा अष्वारोहण के बिना यहां जीवन सम्भव नहीं था। विदेषी आक्रमणों के समय अष्वों की प्रथम भूमिका थी। गहरे किसमिसी रंग के बहादुर घोड़ों को रोहित नाम से सम्बोधित किया जाता था। ईरानी व यूनानी विद्वानों के द्वारा भी इस प्रदेष के रोहित नस्ल के घोड़ों की प्रषन्सा की गई है। इस प्रदेष के (महाजनपद) प्राचीन षासक (चन्द्रवंषी) द्रुह्यु का उपनाम भी रोहु था। इसलिए इसका नाम द्रुहयू का देष, रोह देष, रोहित गिरि रोह प्रदेष (अपभं्रष होता चला गया), हो जाना व्यावहारिक व स्वाभाविक था। संस्कृत भाषा में रोह का अर्थ है- सीधे दृढ़-बल युक्त चढ़ना-अवरोहण करना, रक्तिम वर्ण (रोहित), पर्वत (माउण्टेन) इसलिए मध्यकाल तक ये पर्वताश्रयी क्षत्रिय षासक रोहित वर्ग से प्रसिद्ध हुए। पर्वतीय प्रदेष का नाम , रोहित प्रदेष (प्रांकृत संस्कृत में) यहां सेनाओं की युद्ध प्रणाली रोहिल्ला युद्ध (रोहिला वार, लैटिन भाषा में) प्रणाली सीधे दृढ़ बल युक्त पर्वत पर अवरोहण की तरह तीब्रता से षत्रु पर चढ़ जाना, षत्रु सेना पर बाढ़ रोह की तरह, लाल होकर (रक्ति वर्ण क्रोधित आक्रोष युक्त) टूट पड़ना, तीब्रता से षत्रु सेना में घुस जाना। रोह (कमानी) के समान षत्रु सेना को भेदते, (काटते जाना) हुए चढ़ाई करना, प्रख्यात हुई ओर अनेक क्षत्रिय सेनानायकों को , रोहिल्ला उपधि से विभूषित किया गया। (मध्यकाल में)

‘‘धृतकौषिक मौद्गल्यौ आलम्यान परषरः।

सौपायनस्तथत्रिश्च वासुकी रोहित स्तथा।‘‘

(राष्ट्रधर्म-भाद्रपद 2067, सितम्बर 2010 के पृष्ठ 31 पर रोहित गोत्र का उपरोक्त ष्लोक में वर्णन)

‘‘अरूषा रोहिता रथे बात जुता

वृषभस्यवते स्वतः‘‘ ।।10।।

(ऋग्वेद मण्डल 1, अ0 15 स्0 94 ‘‘ रोहिला क्षत्रियों का क्रमबद्ध इतिहासः पृष्ठ 42)



मद्रान, रोहित कश्चैव, आगेयान, मालवान अपि गणन सर्वान, विनिजीत्य, प्रहसन्निव,। महाभारत वन पर्व 255-20 प्राचीन रोहित गिरि के नाम का अस्तित्व आज भी रोहतांग घाटी, रोहतांग दर्रानाम से अवस्थित है।

महाभारत के सभा पर्व में लोहित (रोहित) (संस्कृत शब्द) प्रदेश के दस मण्डलों का उल्लेख है जो भारत का उत्तर पूर्वी मध्यभाग था। श्री वासूदेव शरण अग्रवाल

      ‘‘ पाणिनि कालीन भारत वर्ष पृष्ठ 449 ‘‘ अश्येनस्य जवसा‘‘ वैदिक साहितय ऋग्वेद 1, अ0 17, मत्र 11, सुक्त 118-119 अर्थात- दृढ निश्चय के साथ (अश्येनस्य ) बाज पखेरू के समान (जवसा) तीव्र वेग के समान हम लोगो को आन मिली। (यह श्येन और रोहित नस्ल के घोडों की अश्व के रोहिला सेनाओं का वर्णन है।)

  ‘‘ उत्तरीय सीमा प्रान्त मे ंएक सुरम्य स्थानथा यहाँ का राजा क्षत्रिय था वह अपनी प्रजा को बहुत प्यार करता था, यहाँ विभिन्न प्रकार के अन्न व फलों के वृक्ष थे। यहां के निवासी भयानक थे तथा उनकी भाषा रूक्ष संस्कृत थी। ये रजत तथा ताम्र मुद्राओं का प्रयोग करते थे। ये बहुत लडाकू तथा बहादूर थे यह क्षेत्र कुम्भा नदी के उत्तर पूर्व में 155 मील दूर था। ‘‘ एक प्रसिद्ध इतिहासकार टालेमी के अनुसार यह वर्णन चीन पागी युलान-च्वाड्डा ने किया। प्राचीन भारत का ऐतिहासिक भूगोल पृष्ठ 153-154 द्वारा श्री विमलचन्द्र लाहा (रोहिला क्षत्रिय क्रमबद्ध इतिहास से साभार‘‘) पाणिनी ने भी पश्चिमोत्तरीय सीमा प्रान्त के अश्वकायनों, अश्वकों, कठों, यादवों, छुद्रकों, मालवों निवासी सभी क्षत्रिय वर्गो को पर्वतीय और युद्धोपजीवि कहा है।

      पर्वतीय (संस्कृत-हिन्दी), माउण्टेनीयर (लैटिन-अंगे्रजी), रोहित, रोहिते, रोहिले (संस्कृत ‘प्राकृत‘ - पश्तों) रोहिले-चढ़ने वाले, चढाई करने वाले अवरोही, अश्वारोही, द्रोही रोह रोहि पक्थजन , आदि समानार्थी शब्दों का सम्बन्ध प्राचीन क्षत्रिय वर्गोक्षत्रिय शासित क्षेत्रों ,पर्वतीय प्रदेशों (रोहितगिरि, रोहताग दर्रा, लोहित गिरि, कोकचा, पर्वत श्रेणी आदि)युद्ध प्रणालियों और नदी घाटी, काॅठो घोड़ों की पीठ पर (चढ़कर करने बहादुरी के साथ लडने वाले गुणों स्वभावों व क्षात्र धार्मो से है। भारतीय इतिहास में रोहिला- क्षत्रिय एक गौरवशाली वंश परम्परा है जिसमें कई प्राचीन क्षत्रिय वंशों के  वंशज पाए जाते है। क्येांकि यह शब्द, क्षेत्रीयता (रोहिल देश, रोहित प्रदेश रोहित गिरि आदि द्रोह देश- रोह देश) गुणधर्म (रोहित-रक्तिम वर्ण) (कसमिसि लाल रंग) युद्ध प्रणाली (रोहिल्ला-युद्ध) (पूर्व वर्णित प्रणाली) उपाधि, बहादूीर, शौर्यपदक और क्षत्रिय सम्मान से जुडा है, इसलिए जो भी क्षत्रिय राजपुत्र इन सभी से सम्बन्धित रहा- रोहिला-क्षत्रिय अथवा रोहिल्ला राजपुत्र कहलाया गया। रोहिला-पठान इस्लामीकरण के पश्चात् की पक्भजनों , (क्षत्रिय) की आधुनिक वंश परम्परा है। जबकि क्रमशः रोहिला-क्षत्रिय पुरातन काल से भारतवर्ष में एक प्रहरी के रूप में विद्यमान रहे है। सहारनपुर के प्रख्यात साहित्यकार श्री कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर ने अपने पावन ग्रन्थ ‘‘ भगवान परशुराम‘‘ में भी रोहिल देश की चर्चा की है।

      प्रतिष्ठित ज्योतिषी एवं ग्रन्थकार डा. सुरेश चन्द्र मिश्र ने हिन्दुस्तान दैनिक‘‘ के रविवार 20 नवम्बर 2009 के मेरठ संस्करण के पृष्ठ-2 पर ‘‘ मूल गोत्र तालिका  (40गोत्र)  के क्रमांक छः पर क्षत्रिय गो़त्र रोहित का वर्णन किया है। वैदिक काल में पांच की वर्ग या समुदाय आर्य क्षत्रियों के थे जो मिलकर पंचजना-पंचजन कहे जाते थे। इनके सम्मिलित निर्णय को सभी लोग विवाद की दशा में मान लेते थे। इसी शब्द की परम्परा से आज पंचायत शब्द प्रचलित है। ये पांच वशं पुरूष या गोत्रकर्ता थे।

  यादव कुल पुरूष यदु, पौरव वंश पुरूष पुरू, द्रहयु वंश पुरूष द्रुहयु, तुर्वषु और आनववंश पुरूष अनु, से शेष अन्य समुदाय निकले थे।









क्षत्रिय वंश तालिका -14 (गंधार) वं. ता.-5

     इन्ही पांच वंशों के पुरूषों से महापंचायत बनती थी। प्रारम्भ में इन्हीं पंचजनों से लगभग 400 क्षत्रिय गोत्रों का प्रसार हुआ।

      भारत की पष्चिमोत्तरीय सीमा पर विदेषी आक्रमण कारियों के आक्रमणों को विफल करने के लिए वहां के निवासी क्षत्रिय वर्गो एवं शासकों  ने आरम्भ से ही प्रत्येक अवसर पर आक्रान्ताओं के विरूद्ध घोर संघर्ष किया किन्तु मैदानी षासकों की दुर्बल सीमान्त निति के कारण उन्हें किसी भी प्रकार की सहायता उपलब्ध हो सकी। इसलिए सीमान्त प्रदेष के वीर प्रहरी वर्ग इन प्रबल सुगठित आकान्ताअें की अपार शक्ति के सम्मूख लगभग पाँच सौ वर्षो से अधिक संघर्ष न कर सके और सिकन्दर के आक्रमण ईसा पूर्व लगभग 326 के पष्चात् से नदियाँ घाटियाँ, पर्वताश्रय पार करने लगे और मैदानी स्थानों की तरफ पूर्व व पूर्वोत्तर की तरफ आने लगे। (अध्याय-9) क्षत्रिय कुल ‘ काठी क्रम सं. 5

      पष्चिमोत्तरीय-सीमा प्रान्त पंजाब की जातियों व समुदायों का विवरण जो कि - स्व. सर डैंजिल लिबैट्रषन द्वारा पंजाब की जनगणना सन् 1883 और सर एडवर्ड मैकलेजन द्वारा पंजाब की जनगणना 1892 पर आधारित, सर .एच.ए. रोज द्वारा संकलित कोष है। इसमें रोहिला परिवारों (राजपूत-क्लेन) का पर्याप्त विवरण है।




*विशेष नोट__यहां प्रदर्शित सभी चित्र नेट द्वारा सोसल मीडिया से लिए गए है जो केवल प्रतीकात्मक रूप से पाठको को समझाने के उद्देश्य मात्र है इन पर लेखक का कोई हक नही।।

Friday, 20 February 2026

ROHILA RAJPUT GOTRA OF RATHOD VANSH (*रोहिला राजपूतों में राठौड़ वंश की १४ शाखाएं)*

राठौड़ वन्स की 14 शाखाये रोहिले राजपूतो में है
1 धांधल
2महेचा/महेचराना

3 बन्दरिया
4 डंगरथ,डंगरोल
5 जोलिये जोलु जालान
6 बांकुटे
7रतानोट
8थाती
9कपोलिया
10खोखर
11अखनोरिया
12मसानिया
13बिसूथ
14 लोह मढ़े
लोहे के कवच धरि
थे84 सरदार जो कन्नौज पतन के बाद रोहिलखण्ड में रणवीर सिंह की सेना में आ गए थे उनको लखमीर भी कहते थे जो एक लाख का सेना नायक होता था
इसलिए यह गोत्र लखमरा भी कहलाता है
14वी शाखा
प्रवर है सौनिक
ऋषि है अंगिरा
वेद है यजुर्वेद
उपवेद धनुर
शाखा कौथुमी
सूत्र कात्यायन
शिखा है दाहिनी
कुलदेवी है पंखिनी
राजेश्वरी और नाग्निचा, नागणायीचा 
धर्म है वैष्णव
झंडा है पंचरंगा
नगाड़ा रणजीत
गद्दी है कन्नौज
पदवी
रणबांका


कर्नाटक से राजस्थान का सफ़र (साउथ की देवी)
क्या आप जानते हैं कि राठौड़ों की कुलदेवी असल में साउथ इंडिया से आई थीं?
"राठौड़ों की रक्षक साउथ से आई थीं!
राठौड़ों की कुलदेवी 'नागनेची माता' की मूर्ति असल में कर्नाटक (कोंकण) की थी, जहाँ उन्हें 'चक्रेश्वरी' कहा जाता था।
राठौड़ राजा राव धुहड़ उन्हें 13वीं सदी में वहाँ से लाए थे।
शर्त थी 'रास्ते में पीछे मुड़कर मत देखना'।
पचपदरा के पास नागाणा गाँव में राजा ने पीछे मुड़कर देखा और मूर्ति ज़मीन में गिर गई।
तब से इस जगह को 'नागाणा धाम' कहा जाने लगा।

नागणेची माता का इतिहास क्या है?

नागणेची माता का इतिहास बहुत ही रोचक है। वह राठौड़ राजपूतों की कुलदेवी हैं और उनकी उत्पत्ति दक्षिण भारत से हुई थी। कहा जाता है कि उन्हें मूल रूप से कर्नाटक में 'चक्रेश्वरी' के नाम से जाना जाता था।

एक कथा के अनुसार, 13वीं सदी में राठौड़ राजा राव धूहड़ ने उन्हें कर्नाटक से राजस्थान लाया था। इस यात्रा के दौरान, उन्हें एक शर्त का पालन करना था कि वह पीछे मुड़कर नहीं देखेंगे। लेकिन जब वह पचपदरा के पास नागाणा गाँव में पहुँचे, तो उन्होंने पीछे मुड़कर देख लिया, जिससे माता की मूर्ति वहीं जमीन में धंस गई। तब से यह स्थान 'नागाणा धाम' के नाम से जाना जाता है।

नागणेची माता की पूजा राठौड़ राजपूतों द्वारा बड़े आदर और श्रद्धा के साथ की जाती है, और उनकी कृपा और रक्षा की कामना की जाती है।

भाखरवाला गांव में मिले धांधल राठौड़ रोहिला राजपूतों के दुर्लभ शिलालेख







ध्वस्त होती कलात्मक छतरियों की सुध लेने वाला नहीं
इतिहास की कई नई जानकारियां
जोधपुर.
जोधपुर से 15 किलोमीटर दूर भाखरवाला गांव में धांधल राठौड़ों के दुर्लभ शिलालेख मिले हैं। लावारिस पड़े ऐतिहासिक शिलालेखों के आधार पर शोध किया जाए तो जोधपुर से जुड़े इतिहास की कई नई जानकारियां सामने आ सकती है।
 
राजस्थानी शोध संस्थान के अधिकारी व शोधकर्ता डॉ. विक्रमसिंह भाटी के अनुसार पूर्व में धांधल राठौड़ों के प्रमुख ठिकानों में से एक इस गांव को रोयला या रोहिला के नाम से जाना जाता था। यहां धांधल सूरतसिंह, धांधल महेशदास, धांधल केसरीसिंह की भव्य कलात्मक छतरियां और देवली भी है। सूरतसिंह की भव्य, कलात्मक छतरी ध्वस्त होने के कगार पर है। लेकिन पुरातत्व या पर्यटन विभाग की ओर से किसी ने सुध नहीं ली है।
 
सूरतसिंह के पुत्र महेशदास की 20 खम्भों की छतरी में लगे शिलालेख के अनुसार छतरी निर्माण में पांच हजार एक रुपए की लागत आई थी। धांधल केसरीसिंह की छतरी जोधपुर के तत्कालीन शासक मानसिंह के कालखण्ड से ही है। उनका नाम विश्वास पात्र सेनानायकों में अव्वल था। उस समय के एतिहासिक ग्रंथों में इनका नाम पांच प्रमुख मुसाहीबों के तौर पर दर्ज है। कविराजा बांकीदास ने कई डिंगल गीतों में इन्हें ‘पाल रौ पौतरौ’ अर्थात् ‘पाबूजी का पोता’ और धांधल वंश का सूर्य बताया है।
छतरियों की देवलियां संगमरमर से और गुम्बज ईंटों से बने हैं। कुछ छतरियां 10 खम्भों की हैं। डॉ. भाटी के अनुसार धांधल राठौड़ों का इतिहास गरिमामयी रहा। तत्कालीन जोधपुर राज्य की सेवा में रहते हुए ये प्रधान, मुसाहीब, किलेदार, कोतवाल, रसोड़े और सुतरखाने के दरोगा जैसे महत्वपूर्ण पदों पर रहे।
 
मारवाड़ के तत्कालीन शासक अभयसिंह के समय धांधल सूरतसिंह को रोहिला का पट्टा मिला था। इन्हें केलावा खुर्द, भादराजून परगने के काकरिया, लोरोली और विरामा गांव भी ईनाम में मिले थे। लावारिस पड़े ऐतिहासिक शिलालेखों के आधार पर शोध किया जाए तो जोधपुर से जुड़े इतिहास की कई नई जानकारियां सामने आ सकती है।
इस ठिकाने के सभी धांधल राठौड़ रोहिला राजपूत कहलाए
🚩 "मेरा सिर बिक चुका है, विधवा होना है तो शादी कर लो!": लोक देवता पाबूजी राठौर की अमर गाथा🚩
जय पाबूजी! 🙏

📜 इतिहास पर एक नज़र:

मैं भाद्रपद महीने में एक बारात जा रहा था। यह वीरों की बारात थी जिसने शादी से पहले बताया - 'मेरा सिर बिक चुका है, विधवा होना है तो शादी कर लो!'

ढोली गा रहा था:

🎶 धरती तुम संभागानि, (थारै) इंद्र जेहदो भारत।

कंचुवा पांव, बादल छाए।

सूखे रेगिस्तान में खुशी की झरना बह रहा था, लेकिन किसे पता था कि सेहरा और कलंगी से सजा दूल्हा एक दिन लोगों का पूजनीय देवता बन जाएगा? किसे पता था कि फेरों के बीच कर्तव्य की पुकार उस सजी हुई सभा को बलिदान के युद्ध के मैदान में बदल देगी?

 🔥 वादे और बलिदान:

जिस समय विवाह के मंगल गीत गूंज रहे थे, उसी समय एक चारणी (देवल चारणी) मुझे याद दिलाने आई कि - "राही! तुम्हारे विवाह की तैयारियां कहीं और हो रही हैं... आसमान की गहराइयों में स्वर्ग की अप्सराएं वरमाला लेकर खड़ी हैं।"

और उस वीर 'पाबू' ने सुहागरात के बंधन को ठोकर मारते हुए गठबंधन की गांठ खोली और चौथे फेरे से पहले ही गाय की रक्षा के लिए चल पड़े। भागीरथ की जिद और भीष्म के वादे की तरह कठोर होकर अनंत की गहराइयों में विलीन हो गए।

🐎 केशर कालवी और अधूरी शादी:

इतिहास गवाह है कि जिसने अग्नि के पूरे चक्कर भी नहीं लगाए, वही दुल्हन (सोढ़ी रानी) हाथ में नारियल लेकर अपने स्वर्गीय पति के पास चल पड़ी।

आज भी राजस्थान का कण-कण पाबूजी की बहादुरी को याद करता है। पद और पहाड़ों में उनकी तारीफ़ है - कि पाबू भी क्षत्रिय थे!

📌 ऐतिहासिक तथ्य (गर्व करने वाले तथ्य):

🔸 लेखक: स्वर्गीय श्री तन सिंह (किताब: "बदलते नज़ारे")
🔸 केशर कालवी: पाबूजी की वफ़ादार घोड़ी जिसने इतिहास बदल दिया।
🔸 परंपरा: पाबूजी महाराज ने गायों की रक्षा के लिए फेरों के बीच से उठकर बलिदान दिया था। उनकी याद में आज भी राजपूत समुदाय में शादियों में सिर्फ़ चार फेरे लिए जाते हैं।

🙏 जय जय धांधल पाबू जी राठौड़

आइए जानते हैं राठौड़ों में साफा पहनने का रिवाज कैसे शुरू हुआ - 👇

मारवाड़ के राठौड़ 13वीं सदी में इस रेगिस्तान में आए थे। इतिहासकारों के मुताबिक, राठौड़ उत्तर प्रदेश के बदायूं से मारवाड़ आए थे। पहले आदमी राव सिहाजी थे जिन्होंने मारवाड़ के पाली इलाके पर कब्ज़ा करके राठौड़ सत्ता कायम की। आगे चलकर उनके वंशजों ने खेड़ और मंडोर पर राज किया, वे मारवाड़ के सरदार बने।

राठौड़ मरू प्रदेश के नहीं थे, इसलिए उनकी वेशभूषा यहां के माहौल के हिसाब से नहीं थी, लेकिन यहां आने के बाद कई रिवाज और कई रीति-रिवाज बने, जिनके पीछे पहले हुई कई घटनाएं थीं। इन घटनाओं ने नई परंपराओं को जन्म दिया जो आज एक पहचान बन गई हैं।

इतिहास में एक बहुत ही दिलचस्प घटना है जिसकी वजह से राठौड़ों ने साफा (पगड़ी) पहनना शुरू किया। इसके बारे में बहुत कम जानकारी होने की वजह से लोग इसे नहीं जानते।

राव सिहाजी के छह वंशज राव जलांसीजी हुए। वे बहादुर और हिम्मत वाले थे। 14वीं सदी में उनके राज में एक ऐसी घटना हुई, जिससे उन्हें उमरकोट के सोढो पर हमला करना पड़ा। इस जंग में राव जलांसीजी ने सोढो की साफा (पगड़ी) छीन ली।

उन दिनों साफा का बहुत महत्व था। अगर सिर से पगड़ी गिर जाए या दुश्मन के पैरों में पगड़ी गिर जाए, तो समझो वे हार गए। यह साफा आन-बान और शान का प्रतीक था।

राठोड़ों के पास साफा जीत का निशान होता था, इसलिए वे इसे जीत के प्रतीक के तौर पर अपने सिर पर धारण करते थे और इस तरह राठोड़ों ने उसी दिन से साफा बांधना शुरू कर दिया।

जब मैं मुगलों के संपर्क में आया, तो पगड़ी और साफे के कुछ पैच बदल गए जो ट्रेंड में आ गए लेकिन साफा हमेशा ट्रेंड में रहता है। जंग खास तौर पर साफा बांधी जाती थी। आगे चलकर इसी साफे को बांधने के लिए कई पैच (स्टाइल) बनाए गए जैसे जोधपुरी, जिसके पीछे चुरंगा होता है, गोल साफा आदि।

मारवाड़ का जोधपुरी साफा पूरी दुनिया में मशहूर है। मारवाड़ से निकले सभी राठौड़ बीकानेर, किशनगढ़, सीतामऊ, रतलाम, झाबुआ, इडर वगैरह सभी राज्यों में ट्रेंड कर रहे हैं और कुछ बदलावों के साथ यह साफ-सफाई से बंधा हुआ है।

फैशन चाहे जितना बदल जाए, लेकिन इस मारवाड़ की साफ-सफाई आज भी अपने पैच के लिए मशहूर है। इसका क्रेडिट मारवाड़ के मौजूदा नरेश महाराजा गजसिंहजी को जाता है, जिनका नाम गजशाही साफ-सफाई बहुत मशहूर है।

महाराजा साहिब की प्रेरणा से मालाणी राधाधर के बेटे स्वर्गीय डॉ. महेंद्रसिंहजी नागर साहिब, जो मेहरानगढ़ के पूर्व डायरेक्टर थे, ने राजस्थान की पगड़ियों पर रिसर्च करके एक बहुत ही महत्वपूर्ण किताब लिखी थी, जिससे लोगों को पगड़ियों का महत्व समझ में आया। उन्होंने विदेशों में साफो का प्रदर्शन करके बड़ा नाम कमाया।

राठौड़ों की इस शानदार साफ-सफाई का आगाज उमरकोट सिंध की देन है। आगे चलकर यह सिंध
उमरकोट रियासत भी मारवाड़ के तहत आ गई जो आजादी के समय तक मारवाड़ का एक अभिन्न हिस्सा थी। जनमासा में स्वच्छता की कई कहानियाँ आज भी लोगों के मन में बसी हैं। अगर आज पीढ़ी उन्हें सहेज कर रखे तो यह निश्चित रूप से एक ऐतिहासिक काम होगा। स्वच्छ भारत हर वर्ग के कामों के आधार पर अलग-अलग योजनाएँ बनाता है। जोधपुरी नौ मीटर का स्वच्छ है।

अब लोग इसे साफ-साफ बाँधते हैं लेकिन वे इसका सम्मान करना नहीं जानते। जब तक सम्मान नहीं होगा, तब तक उन्हें स्वच्छ नहीं कहा जाएगा।

✍️ डॉ. महेंद्र सिंह तंवर


एक वीर, जिसने रेगिस्तान को अपना घर बनाया।
13वीं सदी में कन्नौज से आए राव सीहा जी ने ही मारवाड़ में राठौड़ वंश की नींव रखी थी।
पाली के ब्राह्मणों की रक्षा के लिए उन्होंने अकेले दम पर लुटेरों से युद्ध किया। 1273 ई. में गायों की रक्षा करते हुए, 1 लाख दुश्मनों (लाखा झंवर) से लड़कर उन्होंने वीरगति प्राप्त की।

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Wednesday, 18 February 2026

THE THIRD BETTLE OF PANIPAT पानीपत के युद्ध में रोहिला राजपूतों के बलिदान के सबूत जिंदा है

पानीपत की तीसरी लड़ाई से जुड़े इतिहास के साक्ष्य कलायत में भी मौजूद साक्ष्य खोज  रहे है, रोहिला क्षत्रिय सामाजिक संगठन
देश के अतीत से जुड़ी वीर गाथाओं को जन-जन तक पहुंचाने और इनकी स्मृतियों को हमेशा ताजा रखने के लिए रोहिला क्षत्रिय समाज संगठन ने खास पहल की है। इसके तहत कलायत श्री कपिल मुनि तट और वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप चौक के पास पानीपत की तीसरी लड़ाई के इतिहास से जुड़े धार्मिक स्थल हैं
रोहिल्ला क्षत्रिय समाज संगठन के लोगों ने कहा कि मशहूर मरहट्टा जनरैल भाऊ के दीवान गंगा सिंह महचा राठौड़ ने पानीपत की तीसरी लड़ाई में अहमद शाह अब्दाली के खिलाफ लड़ाई लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए थे। इनकी पत्नी रानी रामप्यारी उस जमाने की परंपरा अनुसार सती हुई थी। उनकी स्मृति में कलायत श्री कपिल मुनि तट के पास सौदागर मल के पुत्र अमरनाथ रोहिल्ला निवासी मछूंडा ने बनाई थी। इस तरह देश के गौरवशाली इतिहास के लिए लड़ी गई लड़ाई में रोहिल्ला क्षत्रिय समाज की महत्वपूर्ण भूमिका है। उन्होंने बताया कि पानीपत की लड़ाई में शहीद हुए गंगा सिंह महेचा राठौड़ रोहिला राजपूत थे। पानीपत की तीसरी लड़ाई में ये योद्धा अहमद शाह अब्दाली के विरुद्ध लड़े थे। उस दौरान गंगा सिंह की रानी रामप्यारी और क्षत्राणी अपने बच्चों के साथ कलायत रियासत के अधीन सुरक्षित थे। इस तरह शुरू से ही भारत भूमि पर कलायत का इतिहास गौरवशाली रहा है।
१४,जनवरी दिन बुधवार१७६१ईसवी में मकर सक्रांति के दिन वीर गंगा सिंह महेचा राठौड़ रोहिला राजपूत ने सदा शिव राव भाऊ के सेनापति के रूप में रुहेला सरदार नजीब खान और अब्दाली दुर्रानी के विरुद्ध युद्ध में अपनी सेना सहित वीर गति पाई जबकि उत्तर भारत में किन्ही राजपूत, आदि ने मराठों का साथ नही दिया ,उनकी रानी राम प्यारी सती हुई।

पानीपत का तीसरा युद्ध: एक स्ट्रेटेजिक एनालिसिस (14 जनवरी 1761)
आज के इतिहास में, 18वीं सदी का सबसे भयानक युद्ध पानीपत के मैदान में लड़ा गया था। यह सिर्फ़ दो सैनिकों की टक्कर नहीं थी, बल्कि दो अलग-अलग युद्ध स्टाइल (Warfares) की टक्कर थी। इस खास मैप के ज़रिए उस दिन की ज्योग्राफिकल और स्ट्रेटेजिक स्थिति को समझें।

मैप पर क्या देखें

🚩 मराठा तोपखाना (बाईं ओर):
इब्राहिम खान गार्दी के नेतृत्व में मराठा तोपखाना (आर्टिलरी) सीधी लाइन में तैनात थी। यह उस समय एशिया की सबसे बेहतरीन तोपों में से एक थी, लेकिन भारी होने के कारण इसे तेज़ी से आगे बढ़ाना मुश्किल था।

🐎 दुर्रानी की 'आधा-चाँद' स्ट्रेटेजी (दाईं ओर):
अहमद शाह अब्दाली की सेना ने पारंपरिक सीधी लड़ाई के बजाय फ्लेक्सिबल 'क्रेसेंट फॉर्मेशन' अपनाया। मैप पर दाईं ओर देखें कि कैसे अफ़गान घुड़सवारों (कैवलरी) ने मराठा सेना को घेरने की कोशिश की।

 ⚠️ सप्लाई लाइन का संकट:
मराठा कैंप (कैंप) पीछे की तरफ दिख रहा है। युद्ध से पहले, दुर्रानी सेना ने मराठों की लॉजिस्टिक्स (सप्लाई लाइन) काट दी थी जिससे सेना और जानवर भूख से कमज़ोर हो गए थे।

🌍 ज्योग्राफिकल फैक्टर:
युद्ध के नतीजे में खुले मैदान और यमुना नदी की स्थिति ने बड़ी भूमिका निभाई।

नतीजा:
हालांकि मराठा वीरों ने अदम्य साहस का परिचय दिया, लेकिन लॉजिस्टिक्स की कमी और तोपखानों की स्थिरता (स्टैटिक नेचर) भारी पड़ी। इस युद्ध की वजह से उत्तर भारत में पावर बैलेंस में बदलाव आया।

📜 इतिहास के पन्नों से एक बहादुरी की कहानी।


Saturday, 14 February 2026

PANIPAT @ROHILA VEER GANGA SINGH MAHECHA RATHOD ROHILA RAJPUT AND THE BATTLE OF PANIPAT

*इतिहास के पन्नो में दर्ज है वीर गंगा सिंह महेचा राठौड़ और अन्य रोहिला राजपूतों का पराक्रम*
*पानीपत के तीसरे युद्ध में हुआ था वीर गंगा सिंह महेचा राठौड़ रोहिला राजपूत और उसकी सेना का बलिदान*

*14 जनवरी सन 1761 ईसवी दिन बुधवार मकर सक्रांति को दिया हिंदुत्व के लिए सर्वोच्च बलिदान**🤺🤺🤺🤺🎠🎠🎠🏇🏼
🏇🏼🏇🏼🏇🏼
*पानीपत के मैदान में समय 2बजे** *अपराह्न,जनवरी की हाड़ कंपाने वाली सर्दी,कोहरा और बिजली की गड़गड़ाहट से बारिश के भयावह मौसम में*
*1400 रोहिले राजपूत वीर गंगा सिंह उर्फ गंगा सहाय महेचा राठौड़ रोहिला राजपूत के नेतृत्व में कूद पड़े हिन्दू धर्म रक्षार्थ युद्ध भूमि पर रुहेला सरदार नजीब खान(नजीबुद्दोला) बंगस व आक्रांता अहमद शाह दुर्रानी अब्दाली के विरुद्ध लड़ रहे मराठो की ओर से* 😇😇🎠🎠🤺🤺🏇🏼🏇🏼🏇🏼 *छिड़ गया घमासान युद्ध! कट कट गिर रहे अब्दाली के सैनिक ।कट कट गिर रहे थे गद्दार रुहेले नजीब खान के रूहेले बंगस बारेच पठान*।
*परन्तु हुआ क्या, गार्दी की टॉप सामने आ गयी* *और8 मुसलमानों के चिथड़े उड़ने लगे 1400 रोहिले राजपूतो की एक टुकड़ी मुख्य सेना से बिछुड़ गयी और अफगानों ने उन्हें घेर लिया वीर राठौड़ गंगा सिंह रोहिला ऊर्फ गंगा सहाय महेचा व उनके साथी हजारो अफगानों का संहार करते हुए सांय पांच बजे वीर गति को प्राप्त हुए* ।
*मराठो की हार हुई अपनी ही तोप के सामने अपनी ही सेना आ गई थी ! उधर सदाशिव राव भाऊ के भतीजे विश्वास राव घायल होकर गिरे तो भाऊ हाथी से उतर के घोड़े पर आ गए युद्ध करने हेतु तो हाथी पर भाऊ को न देख कर सेना भागने लगी और तितर बितर हो गई ।क्या दुखद हार हुई !!जीती हुई* *पानीपत की तीसरी लड़ाई को मराठे जीत कर भी एक घण्टे में हार गए* ।
उत्तर भारत की रक्षार्थ आये मराठो का साथ अन्य राजपूतो जाटो गुज्जरों ने नही दिया क्योंकि मराठे उनसे कर वसूलते थे,और अकेले पड़े हिंदुत्व के लिए लड़े मराठो का साथ सदा शिव राव भाऊ के सेनापति के रूप में सेना में भर्ती हो वीर रोहिला गंगा सिंह महेचावत ने अपना जीवन का सर्वोच्च बलिदान देकर भी दिया ।
वीर गंगा सिंह रोहिला की रानी रामप्यारी देवी mudahad राजपूत रियासत कलायत के कपिल मुनि आश्रम में सती हुई और वही वीर रोहिला गंगा सिंह की समाधि स्थापित की गई।
इसी वंश के
*भवानी सिंह महेचा राठौड़ रोहिला राजपूत तांत्या टोपे की सेना में सेनापति थे जब झांसी की रानी को ह्यूरोज ने घायल किया तो जनरल भवानी सिंह महेचराना ने अपने 16 सेनिको के साथ रक्षा कवच तैयार कर अंग्रेजो से उनकी रक्षा करते रहे और लक्ष्मी बाई को सुरक्षित एक जंगल में कुटिया तक पहुंचाया था किंतु अंग्रेजो के हाथ नही पड़ने दिया*,
 *सन 1858 ईसवी।*

*आज भी महेचा राठौड़ रोहिला राजपूत कलायत ,अंबाला और यमुना पार कर पूरब की ओर उत्तर प्रदेश के जनपद सहारनपुर के दस गांव में आबाद है,इसी वंश के ठाकुर हरिसिंह रोहिला एक महान स्वतंत्रता सेनानी थे ,जिनकी घोड़ी छोटी ट्रेन से भी तेज दौड़ती थी। उनके वंशज आज भी गांव घाठेड़ा,सहारनपुर और करनाल में रहते है।।
🏇🏼🏇🏼🏇🏼🏇🏼🏇🏼🏇🏼🤺🤺🤺🤺🤺🎠🎠🎠🎠 *बुक्स तांत्या टोपे व हिन्दू रोहिला क्षत्रिय इतिहास में उपलब्ध लेख*🏇🏼🏇🏼🏇🏼🏇🏼🎠🎠🎠🤺🤺🤺



*विशेष नोट "__यहां प्रदर्शित सभी चित्र सोसल मीडिया से उद्धरत है इन पर लेखक का कोई अधिकार नहीं है ये पाठको को समझाने हेतु प्रतीकात्मक रूप से दर्शाए गए है।। ये सभी सोसल मीडिया की संपत्ति है।।

Tuesday, 10 February 2026

गोत्र का महत्व एक डी एन ए की तरह है

*क्या आपको अपने गोत्र की असली शक्ति का पता है?*

*न कोई अनुष्ठान। न कोई अंधविश्वास। यह आपका प्राचीन कोड है।*

*इस पूरे थ्रेड को ऐसे पढ़िए जैसे आपका अतीत इसी पर निर्भर करता हो।*

*गोत्र आपका उपनाम नहीं है। यह आपकी आध्यात्मिक डीएनए है।*

आइए जानते हैं सबसे अजीब बात क्या है?

*हम में से ज्यादातर लोग यह भी नहीं जानते कि हमारा गोत्र क्या है।*
*हम सोचते हैं यह तो बस वो लाइन है जो पंडितजी पूजा में बोलते हैं। लेकिन ये उससे कहीं ज़्यादा है।*

*गोत्र का मतलब है — आप किस ऋषि के मन से जुड़े हुए हैं।*

*खून से नहीं। बल्कि विचार, ऊर्जा, तरंग और ज्ञान से।*

*हर हिंदू आध्यात्मिक रूप से किसी एक ऋषि से जुड़ा हुआ है। वो ऋषि आपके बौद्धिक पूर्वज हैं। उनका ज्ञान, उनका मानसिक स्वरूप, उनकी आंतरिक ऊर्जा — ये सब आप में प्रवाहित होती है।*
*गोत्र का मतलब जाति नहीं है।*
आजकल लोग इसे गड़बड़ा देते हैं।

*गोत्र का ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र से कोई लेना-देना नहीं है। यह जातियों से पहले, उपनामों से पहले, यहाँ तक कि राजाओं से भी पहले से है।*

*यह सबसे प्राचीन पहचान प्रणाली थी — शक्ति नहीं, ज्ञान के आधार पर।*
*हर किसी का गोत्र होता था — यहां तक कि ऋषि भी अपने सच्चे शिष्यों को गोत्र देते थे। यह सीख के बल पर अर्जित होता था।*

*गोत्र कोई लेबल नहीं है। यह एक आध्यात्मिक विरासत की मोहर है।*


*हर गोत्र एक ऋषि से आता है — एक सुपरमाइंड से।*

मान लीजिए आपका गोत्र वशिष्ठ है।

*तो इसका मतलब आपके पूर्वज ऋषि वशिष्ठ थे — वही जिन्होंने भगवान राम और राजा दशरथ को मार्गदर्शन दिया था।*

*इसी तरह, भारद्वाज गोत्र?*
*तो आप उस ऋषि से जुड़े हैं जिन्होंने वेदों के बड़े भाग लिखे और योद्धाओं व विद्वानों को प्रशिक्षित किया।*

*कुल मिलाकर 49 प्रमुख गोत्र हैं। हर एक ऐसे ऋषि से जुड़ा है जो खगोल- शास्त्री, चिकित्सक, योद्धा, मंत्र विशेषज्ञ या प्रकृति वैज्ञानिक थे।*

*बुज़ुर्ग एक ही गोत्र में विवाह क्यों मना करते थे?*

*अब आती है वो बात जो स्कूल में नहीं पढ़ाई जाती*:-
*प्राचीन भारत में गोत्र का उपयोग जेनेटिक लाइन (वंशानुक्रम) को ट्रैक करने के लिए किया जाता था।*

*गोत्र पितृवंश से चलता है अर्थात् पुत्र ऋषि की वंशरेखा को आगे बढ़ाता है।*

*इसलिए यदि एक ही गोत्र के दो व्यक्ति विवाह करें, तो वे आनुवंशिक रूप से भाई-बहन जैसे होते हैं। ऐसे बच्चों में मानसिक और शारीरिक दोष होने की संभावना रहती है।*

*गोत्र प्रणाली = प्राचीन भारतीय डीएनए विज्ञान।*

*और हमें ये हज़ारों साल पहले पता था — पश्चिमी विज्ञान के जेनेटिक्स से पहले।*


*गोत्र = आपका मानसिक प्रोग्रामिंग।*
अब इसे निजी बनाते हैं।
*कुछ लोग जन्म से विचारशील होते हैं। कुछ में गहरी आध्यात्मिक भूख होती है। कुछ को प्रकृति में शांति मिलती है। कुछ स्वाभाविक नेता या सत्य-साधक होते हैं।*

क्यों?

*क्योंकि आपके गोत्र ऋषि का मन अभी भी आपकी प्रवृत्तियों को आकार देता है।*

*जैसे आपका मन आज भी उसी ऋषि की तरंगों से ट्यून है — जैसे वह सोचते, महसूस करते, प्रार्थना करते और शिक्षा देते थे।*

*यदि आपका गोत्र किसी योद्धा ऋषि से है, तो आपमें साहस की भावना होगी।यदि वह किसी चिकित्सक ऋषि से है, तो आप आयुर्वेद या चिकित्सा की ओर आकर्षित होंगे।*

यह कोई संयोग नहीं है — यह गहरी प्रोग्रामिंग है।

*गोत्र का उपयोग शिक्षा को व्यक्तिगत बनाने में होता था। प्राचीन गुरुकुलों में सबको एक जैसा नहीं पढ़ाया जाता था।*

*गुरु का पहला प्रश्न होता था* — *बेटा, तुम्हारा गोत्र क्या है? क्यों? क्योंकि इससे पता चलता था कि छात्र किस तरह से सीखता है। कौन सी विद्या उसके लिए उपयुक्त है। कौन से मंत्र उसकी ऊर्जा से मेल खाते हैं।*

*अत्रि गोत्र का छात्र ध्यान और मंत्र में प्रशिक्षित होता।कश्यप गोत्र का छात्र आयुर्वेद में गहराई तक जाता।*

*गोत्र सिर्फ पहचान नहीं था — यह सीखने की शैली और जीवन पथ था।*


*अंग्रेजों ने इसका मज़ाक उड़ाया। बॉलीवुड ने हँसी बनाई। और हम भूल गए।*

*जब अंग्रेज आए, उन्होंने इस प्रणाली को अंधविश्वास कहा।*

*वे गोत्र को समझ नहीं सके — इसलिए उसे बकवास बता दिया।*

*बॉलीवुड ने फिर मजाक बनाया। पंडितजी फिर गोत्र पूछ रहे हैं! — जैसे यह कोई बेकार पुरानी बात हो।*

*और धीरे-धीरे, हमने अपने दादाजी - दादीजी या नानाजी - नानीजी से पूछना बंद कर दिया। हमने अपने बच्चों को बताना छोड़ दिया।*

सिर्फ 100 साल में, 10,000 साल पुरानी व्यवस्था गायब हो रही है।

*उन्होंने इसे मारा नहीं। हमने इसे मरने दिया।*


*यदि आप अपना गोत्र नहीं जानते — आपने एक नक्शा खो दिया है।*

*कल्पना कीजिए कि आप एक प्राचीन शाही परिवार के सदस्य हैं — लेकिन अपना उपनाम भी नहीं जानते।*

यही गंभीरता है।

*आपका गोत्र आपके पूर्वजों का जीपीएस है — जो आपको मार्ग दिखाता है:*

*सही मंत्र, सही अनुष्ठान, सही ऊर्जा उपचार, सही आध्यात्मिक मार्ग, विवाह में सही मेल। इसके बिना, हम अपने ही धर्म में अंधे होकर चल रहे हैं।*


*गोत्र की परंपराएँ "सिर्फ दिखावा" नहीं थीं।*

*जब पंडित जी पूजा में आपका गोत्र बोलते हैं — वो सिर्फ औपचारिकता नहीं कर रहे। वो आपको ऋषि की ऊर्जा से जोड़ रहे हैं। आपकी आध्यात्मिक वंश परंपरा को बुला रहे हैं। ताकि वह साक्षी बने और आशीर्वाद दे।*

*इसीलिए संकल्प में गोत्र बोलना महत्वपूर्ण है — जैसे कहा जा रहा हो।*

*मैं, भारद्वाज ऋषि का वंशज, पूर्ण आत्म - जागरूकता के साथ ईश्वर से सहायता मांगता हूँ।*

यह सुंदर है। पवित्र है। और सच्चा है।

*अपने गोत्र को फिर से जानिए — इससे पहले कि बहुत देर हो जाए। अपने माता-पिता से पूछिए। अपने दादा-दादी या नाना-नानी से पूछिए। ज़रूरत हो तो शोध कीजिए। लेकिन इस हिस्से को जाने बिना न जिएं।*

*इसे लिख लीजिए। अपने बच्चों को बताइए। गर्व से कहिए।*

*आप सिर्फ 1990 या 2000 में जन्मे कोई आम व्यक्ति नहीं हैं। आप एक अनंत ज्वाला के वाहक हैं, जिसे हजारों साल पहले किसी ऋषि ने प्रज्वलित किया था।*

*आप उस कहानी का अभी तक का अंतिम अध्याय हैं — जो महाभारत, रामायण, यहां तक कि समय की गिनती शुरू होने से भी पहले शुरू हुई थी।*

*आपका गोत्र आपकी आत्मा का भुलाया हुआ पासवर्ड है।*

*आज के युग में हम वाई-फाई पासवर्ड याद रखते हैं, ईमेल लॉगिन्स, नेटफ्लिक्स कोड…लेकिन हम अपना सबसे प्राचीन पासकोड भूल जाते हैं — अपना गोत्र।*

*वह एक शब्द, एक पूरी धारा खोल सकता है — पूर्वजों का ज्ञान, मानसिक प्रवृत्तियाँ, कर्मिक स्मृतियाँ, यहां तक कि आपकी आध्यात्मिक कमज़ोरियाँ और ताकतें।*

*यह सिर्फ एक लेबल नहीं — एक चाबी है। आप या तो इसका उपयोग करते हैं… या इसे खो देते हैं।*

*महिलाएं विवाह के बाद अपना गोत्र "खोती" नहीं हैं — वे उसे चुपचाप संभालती हैं।*
*बहुत लोग मानते हैं कि महिलाएं विवाह के बाद अपना गोत्र बदल देती हैं। लेकिन सनातन धर्म बहुत सूक्ष्म है।*

*श्राद्ध जैसे अनुष्ठानों में भी, स्त्री का गोत्र उसके पिता के वंश से लिया जाता है। क्यों? क्योंकि गोत्र वाई - क्रोमोसोम (पुरुष वंश) से चलता है।*

*स्त्रियाँ उस ऊर्जा को धारण करती हैं, लेकिन आनुवंशिक रूप से आगे नहीं बढ़ातीं।*

*इसलिए नहीं — स्त्री का गोत्र विवाह के बाद समाप्त नहीं होता। वह उसमें जीवित रहता है।*

*देवता भी गोत्र नियमों का पालन करते थे। रामायण में जब भगवान श्रीराम और सीता का विवाह हुआ — तब भी उनके गोत्र की जाँच की गई थी।*

*राम: इक्ष्वाकु वंश, वशिष्ठ गोत्र*

*सीता: जनक की पुत्री, कश्यप गोत्र वंश*

*उन्होंने सिर्फ प्रेम के नाम पर विवाह नहीं किया। दिव्य रूपों ने भी धर्म का पालन किया।*

*यह प्रणाली कितनी पवित्र थी — और आज भी है।*

गोत्र और प्रारब्ध कर्म का गहरा संबंध है

*क्या कभी ऐसा लगा है कि कुछ आदतें, प्रवृत्तियाँ, इच्छाएँ — बचपन से ही आपके अंदर हैं?*

*यह आपके प्रारब्ध कर्म का हिस्सा हो सकता है — जो इस जीवन में फल देने लगे हैं।*

और गोत्र इस पर प्रभाव डालता है।

*हर ऋषि की अपनी कर्मिक प्रवृत्तियाँ थीं। आप, उनकी ऊर्जा को लेकर, उन्हीं कर्मों की ओर आकर्षित हो सकते हैं — जब तक आप उसे तोड़ने का संकल्प न लें।*

*गोत्र जानना = अपने कर्म पथ को समझना और शुद्ध करना।*

*हर गोत्र का अपना देवता और बीज मंत्र होता है। गोत्र सिर्फ मानसिक वंश नहीं हैं — ये विशिष्ट देवताओं और बीज मंत्रों से जुड़े होते हैं, जो आपकी आत्मा की आवृत्ति से मेल खाते हैं।*

*कभी ऐसा लगा कि कोई मंत्र आप पर असर नहीं कर रहा?*

*शायद आप अपने फोन को गलत चार्जर से चार्ज करने की कोशिश कर रहे हैं।*

*सही मंत्र + आपका गोत्र = आध्यात्मिक करंट का प्रवाह।*

*यह जानना आपकी साधना, ध्यान और उपचार की शक्ति को 10 गुना बढ़ा सकता है।*


*जब भ्रम हो — गोत्र आपकी आंतरिक दिशा है*
*आज की दुनिया में हर कोई खोया हुआ है।*

*जीवन का उद्देश्य, रिश्ते, करियर, धर्म — हर चीज़ में उलझन है।*

*लेकिन यदि आप चुपचाप बैठें और अपने गोत्र, अपने ऋषि, अपनी पूर्वज प्रवृत्तियों पर ध्यान करें — तो आंतरिक स्पष्टता मिलने लगेगी।*

*आपके ऋषि उलझन में नहीं जीते थे। उनका विचार प्रवाह अभी भी आपकी नसों में बह रहा है।*

*उससे जुड़ जाइए — और खोए हुए नहीं, जड़ों से जुड़े महसूस करने लगेंगे।*
*हर महान हिंदू राजा गोत्र का सम्मान करता था*

*चंद्रगुप्त मौर्य से लेकर हर्षवर्धन, शिवाजी महाराज तक — सभी राजाओं के पास राजगुरु होते थे, जो कुल, गोत्र और संप्रदाय का रिकॉर्ड रखते थे।*

*यहां तक कि राजनीति और युद्ध के निर्णय भी गोत्र संबंधों, मेलों और रक्त संबंधों के आधार पर होते थे।*

*क्यों? क्योंकि गोत्र को नजरअंदाज करना ऐसा था जैसे अपनी रीढ़ को नजरअंदाज करना।*

*गोत्र प्रणाली ने महिलाओं को शोषण से बचाया।*

*इसे “पिछड़ा” कहने से पहले समझिए — प्राचीन काल में गोत्र का पालन अनाचार को रोकने, कुल की मर्यादा बनाए रखने और लड़कियों की गरिमा की रक्षा के लिए होता था।*

*यहां तक कि यदि कोई महिला युद्ध में बिछड़ जाए या अगवा हो जाए — तो उसका गोत्र उसे पहचानने और सम्मान दिलाने में मदद करता था।*

*यह पिछड़ापन नहीं — यह दूरदर्शी व्यवस्था थी। गोत्र = ब्रह्मांडीय खेल में आपकी भूमिका।*

*हर ऋषि केवल ध्यान नहीं करते थे — वे ब्रह्मांड के लिए कर्तव्य निभाते थे।*

*कोई शरीर के उपचार पर केंद्रित था। कोई ग्रह-नक्षत्रों को समझ रहा था।*

*कोई धर्म की रक्षा कर रहा था, कोई न्याय प्रणाली बना रहा था।*

*आपका गोत्र उस उद्देश्य की गूंज अपने अंदर रखता है।*

*यदि जीवन में खालीपन लगता है — शायद आपने अपनी ब्रह्मांडीय भूमिका को भूल दिया है।*

गोत्र खोजिए। आप खुद को पा लेंगे।

*यह धर्म की बात नहीं — यह पहचान की बात है।*

*चाहे कोई नास्तिक हो… या सिर्फ आध्यात्मिक… या फिर अनुष्ठानों से उलझन में — गोत्र फिर भी मायने रखता है।*

*क्योंकि यह धर्म से परे है।यह पूर्वज चेतना है। यह भारत की वह गहराई है, जो ज़बरदस्ती नहीं करती — बस चुपचाप मार्गदर्शन देती है।*

*आपको इसमें “विश्वास” करने की ज़रूरत नहीं। बस इसे याद रखने की ज़रूरत है।*

अंतिम शब्द:
*आपका नाम भले ही आधुनिक हो।*
*आपकी जीवनशैली भले ही वैश्विक हो।*
*लेकिन आपका गोत्र समय से परे है।*

*और यदि आप इसे अनदेखा करते हैं, तो आप उस नदी की तरह हैं — जो नहीं जानती कि वह कहाँ से आई है।*

*गोत्र आपका “अतीत” नहीं है यह भविष्य के ज्ञान का पासवर्ड है।*

*इसे खोलिए — इससे पहले कि अगली पीढ़ी भूल जाए कि ऐसा कुछ था भी*।

क्या आप अपने गोत्र की असली शक्ति को जानते हैं?

यह कोई परंपरा नहीं है। कोई अंधविश्वास नहीं है। यह आपका प्राचीन कोड है।

यह पूरा लेख पढ़िए — मानो आपका अतीत इसी पर टिका हो।

1. गोत्र आपका उपनाम नहीं है। यह आपकी आध्यात्मिक डीएनए है।
पता है सबसे अजीब क्या है?
अधिकतर लोग जानते ही नहीं कि वे किस गोत्र से हैं।
हमें लगता है कि यह बस एक लाइन है जो पंडितजी पूजा में कहते हैं। लेकिन यह सिर्फ इतना नहीं है।

आपका गोत्र दर्शाता है — आप किस ऋषि की मानसिक ऊर्जा से जुड़े हुए हैं।
खून से नहीं, बल्कि विचार, ऊर्जा, तरंग और ज्ञान से।

हर हिंदू आध्यात्मिक रूप से एक ऋषि से जुड़ा होता है।
वो ऋषि आपके बौद्धिक पूर्वज हैं।
उनकी सोच, ऊर्जा, और चेतना आज भी आपमें बह रही है।

2. गोत्र का अर्थ जाति नहीं होता।
आज लोग इसे गड़बड़ा देते हैं।
गोत्र ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र नहीं दर्शाता।
यह जातियों से पहले, उपनामों से पहले, राजाओं से भी पहले अस्तित्व में था।

यह सबसे प्राचीन पहचान का तरीका था — ज्ञान पर आधारित, शक्ति पर नहीं।
हर किसी का गोत्र होता था।
ऋषि अपने शिष्यों को गोत्र देते थे जब वे उनकी शिक्षाओं को ईमानदारी से अपनाते थे।

इसलिए, गोत्र कोई लेबल नहीं — यह आध्यात्मिक विरासत की मुहर है।

3. हर गोत्र एक ऋषि से जुड़ा होता है — एक “सुपरमाइंड” से
मान लीजिए आप वशिष्ठ गोत्र से हैं — तो आप वशिष्ठ ऋषि से जुड़े हैं, वही जिन्होंने श्रीराम और दशरथ को मार्गदर्शन दिया था।

भृगु गोत्र?
आप उस ऋषि से जुड़े हैं जिन्होंने वेदों का हिस्सा लिखा और योद्धाओं को प्रशिक्षण दिया।

कुल 49 मुख्य गोत्र हैं — हर एक ऋषियों से जुड़ा जो ज्योतिषी, वैद्य, योद्धा, मंत्रद्रष्टा या प्रकृति वैज्ञानिक थे।

4. क्यों बुज़ुर्ग एक ही गोत्र में विवाह मना करते थे?
यह बात स्कूल में नहीं सिखाई जाती।

प्राचीन भारत में गोत्र एक जेनेटिक ट्रैकर था।
यह पितृवंश से चलता है — यानी पुत्र ऋषि की लाइन आगे बढ़ाते हैं।

इसलिए अगर एक ही गोत्र के दो लोग विवाह करें, तो वे आनुवंशिक रूप से भाई-बहन जैसे होंगे।
इससे संतान में मानसिक और शारीरिक विकार आ सकते हैं।

गोत्र व्यवस्था = प्राचीन भारतीय डीएनए विज्ञान
और यह हम हजारों साल पहले जानते थे — जब पश्चिमी विज्ञान को जेनेटिक्स का भी अंदाजा नहीं था।

5. गोत्र = आपका मानसिक प्रोग्रामिंग
चलो इसे व्यक्तिगत बनाते हैं।

कुछ लोग गहरे विचारक होते हैं।
कुछ में गहरी आध्यात्मिक भूख होती है।
कुछ को प्रकृति में शांति मिलती है।
कुछ नेता या सत्य के खोजी होते हैं।

क्यों?
क्योंकि आपके गोत्र के ऋषि का मन आज भी आपके अंदर गूंजता है।

अगर आपका गोत्र किसी योद्धा ऋषि का है — आपको साहस महसूस होगा।
अगर वह किसी वैद्य ऋषि से है — तो आयुर्वेद या चिकित्सा में रुचि हो सकती है।

यह संयोग नहीं — यह गहराई से जुड़ा प्रोग्राम है।

6. पहले गोत्र के आधार पर शिक्षा दी जाती थी
प्राचीन गुरुकुलों में सबको एक जैसा नहीं सिखाया जाता था।
गुरु का पहला प्रश्न होता था:
“बेटा, तुम्हारा गोत्र क्या है?”

क्यों?
क्योंकि इससे गुरु समझ जाते थे कि छात्र कैसे सीखता है, कौन सी विद्या उसके लिए उपयुक्त है।

अत्रि गोत्र वाला छात्र — ध्यान और मंत्रों में प्रशिक्षित होता।

कश्यप गोत्र वाला — आयुर्वेद में गहराई से जाता।

गोत्र सिर्फ पहचान नहीं, जीवनपथ था।

7. ब्रिटिशों ने इसका मज़ाक उड़ाया, बॉलीवुड ने हंसी बनाई, और हमने इसे भुला दिया
जब ब्रिटिश भारत आए, उन्होंने इसे अंधविश्वास कहा।

फिर फिल्मों में मज़ाक बना —
“पंडितजी फिर से गोत्र पूछ रहे हैं!” — जैसे यह कोई बेमतलब रस्म हो।

धीरे-धीरे हमने अपने बुज़ुर्गों से पूछना छोड़ दिया।
अपने बच्चों को बताना छोड़ दिया।

100 साल में 10,000 साल पुरानी व्यवस्था लुप्त हो रही है।

उसे किसी ने खत्म नहीं किया। हमने ही उसे मरने दिया।

8. अगर आप अपना गोत्र नहीं जानते — तो आपने एक नक्शा खो दिया है
कल्पना कीजिए कि आप किसी प्राचीन राजघराने से हों — पर अपना उपनाम तक नहीं जानते।

आपका गोत्र = आपकी आत्मा का GPS है।

सही मंत्र

सही साधना

सही विवाह

सही मार्गदर्शन

इसके बिना हम अपने ही धर्म में अंधे होकर चल रहे हैं।

9. गोत्र की पुकार सिर्फ रस्म नहीं होती
जब पंडित पूजा में आपका गोत्र बोलते हैं, तो वे सिर्फ औपचारिकता नहीं निभा रहे।

वे आपको आपकी ऋषि ऊर्जा से दोबारा जोड़ रहे होते हैं।

यह एक पवित्र संवाद होता है:
“मैं, भारद्वाज ऋषि की संतान, अपने आत्मिक वंशजों की उपस्थिति में यह संकल्प करता हूँ।”

यह सुंदर है। पवित्र है। सच्चा है।

10. इसे फिर से जीवित करो — इसके लुप्त होने से पहले
अपने माता-पिता से पूछो।
दादी-दादा से पूछो।
शोध करो, पर इसे जाने मत दो।

इसे लिखो, अपनी संतानों को बताओ। गर्व से कहो:

आप सिर्फ 1990 या 2000 में जन्मे इंसान नहीं हैं —
आप एक ऐसी ज्योति के वाहक हैं जो हजारों साल पहले किसी ऋषि ने जलाई थी।

11. आपका गोत्र = आत्मा का पासवर्ड
आज हम वाई-फाई पासवर्ड, नेटफ्लिक्स लॉगिन याद रखते हैं...

पर अपने गोत्र को भूल जाते हैं।

वो एक शब्द — आपके भीतर की

चेतना

आदतें

पूर्व कर्म

आध्यात्मिक शक्तियां

…सब खोल सकता है।

यह लेबल नहीं — यह चाबी है।

12. महिलाएं विवाह के बाद गोत्र “खोती” नहीं हैं
लोग सोचते हैं कि विवाह के बाद स्त्री का गोत्र बदल जाता है। पर सनातन धर्म सूक्ष्म है।

श्राद्ध आदि में स्त्री का गोत्र पिता से लिया जाता है।
क्योंकि गोत्र पुरुष रेखा से चलता है (Y-क्रोमोज़ोम से)।
स्त्री ऊर्जा को वहन करती है, लेकिन आनुवंशिक रूप से उसे आगे नहीं बढ़ाती।

इसलिए स्त्री का गोत्र समाप्त नहीं होता — वह उसमें मौन रूप से जीवित रहता है।

13. भगवानों ने भी गोत्र का पालन किया
रामायण में श्रीराम और सीता के विवाह में भी गोत्र जांचा गया:

राम: इक्ष्वाकु वंश, वशिष्ठ गोत्र

सीता: जनक की पुत्री, कश्यप गोत्र

जय सिया राम

श्री कुलदेवी स्तोत्रम्__एक स्त्रोत्र से होंगी कुलदेवी प्रसन्न 

यह कुलदेवी स्तोत्र प्रत्येक कुल (परिवार/वंश) की अधिष्ठात्री दिव्य शक्ति "कुलदेवी" की स्तुति का पावन ग्रंथ है। कुलदेवी वह आदि शक्ति हैं जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी परिवार की रक्षा, मार्गदर्शन एवं समृद्धि का आशीर्वाद देती हैं। इस स्तोत्र के नित्य पाठ से कुलदेवी प्रसन्न होकर साधक के पूरे परिवार पर अपनी कृपा बरसाती हैं, कुल की प्रतिष्ठा बढ़ाती हैं, आंतरिक एकता मजबूत करती हैं और सभी प्रकार के कुलदोषों एवं बाधाओं का निवारण करती हैं। यह स्तोत्र घर-परिवार में सुख-शांति, संपत्ति, स्वास्थ्य और सद्भावना लाने वाला माना गया है।

मूल स्तोत्र पाठ (नित्य एक बार अवश्य पढ़ें या सुनें)

नमस्ते श्रीकुलदेवी कुलाराध्या कुलेश्वरी।
कुलसंरक्षणी माता कौलिक ज्ञान प्रकाशिनी॥१॥

वन्दे श्री कुल पूज्या त्वाम् कुलाम्बा कुलरक्षिणी।
वेदमाता जगन्माता लोक माता हितैषिणी॥२॥

आदि शक्ति समुद्भूता त्वया ही कुल स्वामिनी।
विश्ववंद्यां महाघोरां त्राहिमां शरणागतम्॥३॥

त्रैलोक्य ह्रदयं शोभे देवी त्वं परमेश्वरी।
भक्तानुग्रह कारिणी कुलदेवी नमोस्तुते॥४॥

महादेव प्रियंकरी बालानां हितकारिणी।
कुलवृद्धि करी माता त्राहिमां शरणागतम्॥५॥

चिदग्निमण्डल संभुता राज्य वैभव कारिणी।
प्रकटितां सुरेशानी वन्दे त्वां "कुल गौरवम्"॥६॥

त्वदीये कुले जात: त्वामेव शरणम गत:।
त्वत वत्सलोऽहं आद्ये त्वं रक्ष रक्षाधुना॥७॥

पुत्रं देहि धनं देहि साम्राज्यं प्रदेहि मे।
सर्वदास्माकं कुले भूयात् मंगलानुशासनम्॥८॥

कुलाष्टकमिदं पुण्यं नित्यं य: सुकृति पठेत्।
तस्य वृद्धि कुले जात: प्रसन्ना कुलेश्वरी॥९॥

कुलदेवी स्तोत्रमिदं सुपुण्यं ललितं तथा।
अर्पयामि भवत भक्त्या त्राहिमां शिव गेहिनी॥१०॥

॥ श्री कुलदेव्यार्पणमस्तु ॥
॥ श्री कुलदेव्यार्पणमस्तु ॥
॥ श्री कुलदेव्यार्पणमस्तु ॥

॥ इति श्रीकुलदेवी स्तोत्रम्॥

स्तोत्र का सरल अर्थ एवं भावार्थ

1. श्लोक १: उस कुलदेवी को नमन है, जो कुल द्वारा पूजित हैं, कुल की ईश्वरी हैं, कुल की संरक्षक माता हैं और कौलिक ज्ञान को प्रकट करने वाली हैं।
2. श्लोक २: मैं उस पूजनीय कुलमाता को प्रणाम करता हूँ, जो कुल की रक्षा करती हैं, वेदों की माता, संसार की माता और सभी प्राणियों का हित चाहने वाली हैं।
3. श्लोक ३: आप आदि शक्ति से प्रकट हुई हैं और आप ही कुल की स्वामिनी हैं। समस्त विश्व द्वारा वंदनीय, महाभयंकर (शत्रुओं के लिए) देवी! इस शरणागत की रक्षा कीजिए।
4. श्लोक ४: हे देवी! आप तीनों लोकों के हृदय में विराजमान हैं, परमेश्वरी हैं, भक्तों पर अनुग्रह करने वाली हैं। हे कुलदेवी! मैं आपको नमस्कार करता हूँ।
5. श्लोक ५: आप महादेव (शिव) को प्रिय करने वाली, बालकों का हित करने वाली और कुल की वृद्धि करने वाली माता हैं। इस शरणागत की रक्षा कीजिए।
6. श्लोक ६: आप चेतना रूपी अग्नि मंडल से उत्पन्न हुई हैं, राज्य और वैभव प्रदान करने वाली हैं। हे देवों की ईशानी! मैं आपको "कुल के गौरव" के रूप में वंदन करता हूँ।
7. श्लोक ७: आपके ही कुल में उत्पन्न हुआ, मैं आपकी ही शरण में आया हूँ। हे आद्य शक्ति! आप वात्सल्य स्वरूपा हैं, अब मेरी रक्षा कीजिए, रक्षा कीजिए।
8. श्लोक ८: (हे माता!) मुझे सुपुत्र दीजिए, धन दीजिए और साम्राज्य (उत्तम जीवन/सफलता) प्रदान कीजिए। हमारे कुल में सदा मंगल ही मंगल का शासन हो।
9. श्लोक ९: यह पवित्र कुलाष्टक (कुलदेवी स्तोत्र) जो नित्य पुण्यात्मा व्यक्ति पढ़ता है, उसके कुल में उत्पन्न सभी (साधक सहित) की वृद्धि होती है, क्योंकि कुलेश्वरी प्रसन्न हो जाती हैं।
10. श्लोक १०: हे शिवगेहिनी (पार्वती)! मैं आपकी भक्ति से इस पुण्यदायी और सुंदर कुलदेवी स्तोत्र को आपको अर्पित करता हूँ। मेरी रक्षा कीजिए।

पाठ की विधि एवं लाभ

· समय: प्रातः स्नानादि से निवृत्त होकर या सायंकाल घर के पूजा स्थल पर। नित्य एक बार अवश्य पढ़ें।
· विधि: शुद्ध आसन पर बैठकर, कुलदेवी या देवी दुर्गा/पार्वती के चित्र के समक्ष दीप जलाकर, पुष्प अर्पित करके इस स्तोत्र का पाठ करें। अंत में "श्री कुलदेव्यार्पणमस्तु" बोलकर स्तोत्र को समर्पित कर दें।
· लाभ:
  1. कुलदेवी की विशेष कृपा एवं सुरक्षा प्राप्त होती है।
  2. पारिवारिक कलह, वंशानुगत समस्याएँ (कुलदोष) दूर होती हैं।
  3. घर-परिवार में सुख-शांति, समृद्धि एवं मंगलमय वातावरण बनता है।
  4. संतान, धन, स्वास्थ्य एवं मान-सम्मान में वृद्धि होती है।
  5. आध्यात्मिक ज्ञान (कौलिक ज्ञान) की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है।


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साभार प्रस्तुति
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