📜 19 जनवरी 📜
🌹 महाराणा प्रताप // बलिदान दिवस 🌹
जन्म : 09 मई 1540
मृत्यु : 19 जनवरी 1597
महाराणा प्रताप के पराक्रम से अकबर भी घबराता था. इसलिए युद्ध को टालने और अधीनता स्वीकार कराने के लिए अकबर ने 6 बार अपने दूत और मुग़लों के अधीन मेवाड़ का सिंहासन चलाने की पेशकश की लेकिन महाराणा प्रताप ने इसे हर बार मानने से इंकार कर दिया.
महाराणा प्रताप बेहद बलशाली और युद्ध-कौशल में निपुण थे. उनके रण-भूमि में आते ही दुश्मनों में भय का माहौल बन जाता था. युद्ध में वे अपने चहेते घोड़े चेतक पर सवार होकर जाते थे.
>> महाराणा प्रताप के युद्ध हथियार <<
1. महाराणा प्रताप युद्ध के वक्त हमेशा एक भाला अपने साथ रखते थे, जिसका वजन 81 किलो था. वह इस भाले को एक हाथ से नजाते हुए दुश्मन पर टूट पड़ते थे.
2. युद्ध के वक्त महाराणा प्रताप 72 किलो का कवच पहनते थे.
3. इतिहासकारों के अनुसार महाराणा प्रताप के भाले, कवच, ढाल और दो तलवारों का वजन कुल मिलाकर 208 किलोग्राम होता था.
4. महाराणा प्रताप के हथियार इतिहास के सबसे भारी युद्ध हथियारों में शामिल हैं.
5. महाराणा प्रताप अपने एक वार से ही घोड़े के दो टुकड़े कर देते थे.
>> महाराणा प्रताप : परिचय व परिवार <<
1. महाराणा प्रताप का जन्म 09 मई 1540 को राजस्थान के कुंभलगढ़ में हुआ था.
2. महाराणा प्रताप ने राजनैतिक कारणों से कुल 11 शादियां की थीं.
3. महाराणा प्रताप के कुल 17 बेटे और 05 बेटियां थीं.
4. महारानी अजाब्दे से पैदा हुए पुत्र अमर सिंह को महाराणा प्रताप का उत्तराधिकारी बनाया गया था.
5. अमर सिंह भी अपने पिता महाराणा प्रताप की तरह बहुत बहादुर और पारक्रमी थे.
6. इतिहासकारों के अनुसार हल्दी घाटी युद्ध के वक्त अमर सिंह की आयु 17 वर्ष थी.
7. मेवाड़ की रक्षा करते हुए महाराणा प्रताप की 19 जनवरी 1597 को मृत्यु हुई थी.
8. अकबर जानता था कि धरती पर महाराणा प्रताप जैसा कोई दूसरा वीर नहीं है.
>> महाराणा प्रताप के 10 वाक्य <<
1. समय इतना ताकतवर होता है कि एक राजा को भी घास की रोटी खिला सकता है.
2. मनुष्य का गौरव व आत्म सम्मान उसकी सबसे बड़ी कमाई होती है. इसलिए इनकी सदैव रक्षा करनी चाहिए.
3. अपने व अपने परिवार के साथ जो अपने राष्ट्र के बारे में भी सोचते हैं, वही सच्चे नागरिक होते हैं.
4. तब तक परिश्रम करो, जब तक तुम्हे तुम्हारी मंजिल न मिल जाए.
5. अन्याय व अधर्म आदि का विनाश करना पूरी मानव जाति का कर्तव्य है.
6. जो अत्यंत विकट परिस्थिति में भी हार नहीं मानते हैं, वो हार कर भी जीत जाते हैं.
7. जो सुख में अतिप्रसन्न और विपत्ति में डर कर झुक जाते हैं, उन्हें न तो सफलता मिलती है और न ही इतिहास उन्हें याद रखता है.
8. अगर सांप से प्रेम करोगे तो भी वह अपने स्वभाव अनुरूप कभी न कभी डसेगा ही.
9. शासक का पहला कर्तव्य अपने राज्य का गौरव और सम्मान बचाए रखना होता है.
10. अपना गौरव, मान-मर्यादा और आत्म सम्मान के आगे जीवन की भी कोई कीमत नहीं है.
>> महाराणा प्रताप के 10 रोचक किस्से <<
1. महाराणा प्रताप के सबसे प्रिय घोड़े का नाम चेतक था. महाराणा प्रताप की तरह उनका घोड़ा भी बहुत बहादुर और समझदार था.
2. महाराणा प्रताप को बचपन में प्यार से कीका कहकर बुलाया जाता था.
3. महाराणा प्रताप और मुगल शासक अकबर के बीच हल्दी घाटी का विनाशकारी युद्ध 18 जून 1576 को हुआ था. इतिहास में हल्दी घाटी के युद्ध की तुलना महाभारत के युद्ध से की गई है.
4. इतिहासकारों के अनुसार हल्दी घाटी के युद्ध में न तो अकबर की जीत हुई थी और न ही महाराणा प्रताप हारे थे. इसकी वजह महाराणा प्रताप के मन में राज्य की सुरक्षा का अटूट जज्बा था.
5. हल्दी घाटी के युद्ध को टालने के लिए अकबर ने छह बार महाराणा प्रताप के पास अपने शांति दूत भेजे, लेकिन राजपूत राजा ने हर बार अकबर के प्रस्ताव को ठुकरा दिया.
6. हल्दी घाटी के युद्ध में महाराणा प्रताप ने मात्र 20 हजार सैनिकों के साथ मुगल बादशाह अकबर के 80 हजार सैनिकों का डटकर सामना किया था. बावजूद अकबर महाराणा प्रताप को झुका नहीं सका था.
7. महाराणा प्रताप के सबसे प्रिय और वफादार घोड़े ने भी दुश्मनों के सामने अद्भुत वीरता का परिचय दिया था. हालांकि इसी युद्ध में घायल होने से उसकी मौत हुई थी.
8. उदयपुर की हल्दी घाटी में आज भी महाराणा प्रताप के प्रिय घोड़े चेतक की समाधि मौजूद है.
9. चेतक ने अंतिम दम तक महाराणा प्रताप का साथ दिया. युद्ध में मुगल सेना से घिरने पर चेतक महाराणा प्रताप को बैठाकर कई फीट लंबा नाला फांद गया था.
यह भी जानीये..........
नाम -कुँवर प्रताप जी{महाराणा प्रताप}
जन्म - 9 मई, 1540 ई.
जन्म भूमि - राजस्थान कुम्भलगढ़
पुन्य तिथि - 19 जनवरी, 1597 ई.
पिता - महाराणा उदय सिंह जी
माता - राणी जीवत कँवर जी
राज्य सीमा - मेवाड़
शासन काल - 1568–1597ई.
शा. अवधि - 29 वर्ष
वंश - सुर्यवंश
राजवंश - सिसोदिया
राजघराना - राजपूताना
धार्मिक मान्यता - हिंदू धर्म
युद्ध - हल्दीघाटी का युद्ध
राजधानी - उदयपुर
पूर्वाधिकारी - महाराणा उदयसिंह जी
उत्तराधिकारी - राणा अमर सिंह जी
महाराणा प्रताप जी के पास एक सबसे प्रिय घोड़ा था,जिसका नाम 'चेतक' था।
"राजपूत शिरोमणि श्री महाराणा प्रताप जी" उदयपुर, मेवाड़ में।सिसोदिया राजवंश के राजा थे।
वह तिथि धन्य है, जब मेवाड़ की शौर्य-भूमि परमेवाड़-मुकुट
मणि राणा प्रताप जी का जन्म हुआ। श्री प्रताप जी का नाम इतिहास में वीरता और दृढ प्रण के लिये अमर है।
महाराणा प्रतापजी की जयंती विक्रमी सम्वत् कॅलण्डर के अनुसार प्रतिवर्ष ज्येष्ठ, शुक्ल पक्ष तृतीया को मनाई जाती है।
महाराणा प्रताप जी के बारे में कुछरोचक जानकारी :-
1... श्री महाराणा प्रताप सिंह जी एकही झटके में घोड़े समेत दुश्मन सैनिक को काट डालते थे।
2.... जब इब्राहिम लिंकन भारत दौरे पर आ रहे थेतब उन्होने
अपनी माँ सेपूछा कि हिंदुस्तान से आपके लिए क्या लेकर
आए| तब माँ का जवाब मिला ” उस महान देश की वीर भूमि हल्दी घाटी से एक मुट्ठी धूल
लेकरआना जहाँ का राजा अपनी प्रजा केप्रति इतना वफ़ादार
था कि उसने आधे हिंदुस्तान के बदले अपनी मातृभूमि को चुना ”
बदकिस्मती से उनका वो दौरा रद्द हो गया था | “बुक ऑफ़ प्रेसिडेंट यु।एस ए ‘किताब में आप ये बात पढ़ सकते है |
3.... श्री महाराणा प्रताप सिंह जी के भाले का वजन 80 किलो था और कवच का वजन 80 किलो कवच , भाला, ढाल, और हाथ में तलवार का वजन मिलाये तो 207 किलो था।
4.... आज भी महाराणा प्रताप की तलवार कवच आदि सामान उदयपुर राज घराने के संग्रहालय में सुरक्षित हैं |
5.... अकबर ने कहा था कि अगर राणा प्रताप मेरे सामने झुकते है तो आधा हिंदुस्तान के वारिस वो होंगे पर बादशाहत अकबर की ही रहेगी पर श्री महाराणा प्रताप जी ने किसी की भी आधीनता स्वीकार करने से मना कर दिया |
6.... हल्दी घाटी की लड़ाई में मेवाड़ से 20000 सैनिक थे और अकबर की ओर से 85000 सैनिक युद्ध में सम्मिलित हुए |
7.... श्री महाराणा प्रताप जी के घोड़े चेतक का मंदिर भी बना हुवा हैं।जो आज भी हल्दी घाटी में सुरक्षित है |
8.... श्री महाराणा प्रताप जी ने जब महलो का त्याग किया तब उनके साथ लुहार जाति के हजारो लोगो ने भी घर छोड़ा और दिन रात राणा जी कि फौज के लिए तलवारे बनायीं इसी समाज को आज गुजरात
मध्यप्रदेश और राजस्थान में गड़लिया लोहार कहा जाता है मै नमन।करता हूँ एसे लोगो को |
9.... हल्दी घाटी के युद्ध के 300 साल बाद भी वहाँ जमीनों में तलवारें।पायी गयी। आखिरी बार तलवारों का जखीरा 1985 में हल्दी घाटी में।मिला |
10..... श्री महाराणा प्रताप सिंह जी अस्त्र शस्त्र की शिक्षा "श्री जैमल मेड़तिया जी" ने दी थी जो 8000 राजपूत वीरो को लेकर 60000 से लड़े थे। उस युद्ध में 48000 मारे गए थे जिनमे 8000 राजपूत और 40000 मुग़ल थे |
11.... श्री महाराणा प्रताप सिंह जी के देहांत पर अकबर भी रो पड़ा था |
12.... मेवाड़ के आदिवासी भील समाज ने हल्दी घाटी में अकबर की फौज।को अपने तीरो से रौंद डाला था वो श्री महाराणा प्रताप को अपना बेटा मानते थे और राणा जी बिना भेद भाव के उन के साथ रहते थे आज भी मेवाड़ के राजचिन्ह पर एक तरफ राजपूत है तो दूसरी तरफ भील ।
13..... राणा जी का घोडा चेतक महाराणा जी को 26 फीट का दरिया पार करने के बाद वीर गति को प्राप्त हुआ | उसकी एक टांग टूटने के बाद भी वह दरिया पार कर गया। जहा वो घायल हुआ वहीं आज खोड़ी इमली नाम का पेड़ है जहाँ पर चेतक की म्रत्यु हुई वहाँ चेतक मंदिर है।
14...राणा जी का घोडा चेतक भी बहुत ताकतवर था उसके मुँह के आगे दुश्मन के हाथियों को भ्रमीत करने के लिए हाथी की सूंड लगाई जाती थी । यह हेतक और चेतक नाम के दो घोड़े थे ।
15..मरने से पहले महाराणाप्रताप जी ने अपना खोया हुआ 85 % मेवाड फिर से जीत लिया था । सोने चांदी और महलो को छोड़ वो 20 साल मेवाड़ के जंगलो में घूमे ।
16....महाराणा प्रताप जी का वजन 110 किलो और लम्बाई 7 फिट 5इंच थी, वे हाथ मे दो म्यान वाली तलवार और 80 किलो का भाला रखते थे।
द्वंद्व कहां तक पाला जाए, युद्ध कहां तक टाला जाए,
तू भी है राणा का वंशज है, फेंक जहां तक भाला जाए! 🚩
🚩⚔️हल्दीघाटी युद्ध में वीरगति को प्राप्त होने वाले प्रमुख मेवाड़ी योद्धा"
1) ग्वालियर के राजा रामशाह तोमर
2) कुंवर शालिवाहन तोमर (रामशाह तोमर के पुत्र व महाराणा प्रताप के बहनोई)
3) कुंवर भान तोमर (रामशाह तोमर के पुत्र)
4) कुंवर प्रताप तोमर (रामशाह तोमर के पुत्र)
5) भंवर धर्मागत तोमर (शालिवाहन तोमर के पुत्र)
6) दुर्गा तोमर (रामशाह तोमर के साथी)
7) बाबू भदौरिया (रामशाह तोमर के साथी)
८) खाण्डेराव तोमर (रामशाह तोमर के साथी)
9) बुद्ध सेन (रामशाह तोमर के साथी)
10) शक्तिसिंह राठौड़ (रामशाह तोमर के साथी)
11) विष्णुदास चौहान (रामशाह तोमर के साथी)
12) डूंगर (रामशाह तोमर के साथी)
13) कीरतसिंह (रामशाह तोमर के साथी)
14) दौलतखान (रामशाह तोमर के साथी)
15) देवीचन्द चौहान (रामशाह तोमर के साथी)
16) छीतर सिंह चौहान (हरिसिंह के पुत्र व रामशाह तोमर के साथी)
17) अभयचन्द्र (रामशाह तोमर के साथी)
18) राघो तोमर (रामशाह तोमर के साथी)
19) राम खींची (रामशाह तोमर के साथी)
20) ईश्वर (रामशाह तोमर के साथी)
21) पुष्कर (रामशाह तोमर के साथी)
22) कल्याण मिश्र (रामशाह तोमर के साथी)
23) बदनोर के ठाकुर रामदास राठौड़ (वीरवर जयमल राठौड़ के 7वें पुत्र) :- ये अपने 9 साथियों समेत काम आए |
24) बदनोर के कुंवर किशनसिंह राठौड़ (ठाकुर रामदास राठौड़ के पुत्र)
25) पाली के मानसिंह सोनगरा चौहान (महाराणा प्रताप के मामा) :- ये अपने 11 साथियों समेत काम आए |
26) कान्ह/कान्हा (महाराणा प्रताप के भाई) :- इनके वंशज आमल्दा व अमरगढ़ में हैं |
27) कल्याणसिंह/कल्ला (महाराणा प्रताप के भाई)
28) कानोड़ के रावत नैतसिंह सारंगदेवोत
29) केशव बारठ (कवि) :- ये सोन्याणा वाले चारणों के पूर्वज थे |
30) जैसा/जयसा बारठ (कवि) :- ये भी सोन्याणा वाले चारणों के पूर्वज थे |
31) कान्हा सांदू (चारण कवि)
32) पृथ्वीराज चुण्डावत (पत्ता चुण्डावत के भाई)
33) आमेट के ठाकुर कल्याणसिंह चुण्डावत (वीरवर पत्ता चुण्डावत के पुत्र) - इनके पीछे रानी बदन कंवर राठौड़ सती हुईं | रानी बदन कंवर मेड़ता के जयमल राठौड़ की पुत्री थीं |
34) देसूरी के खान सौलंकी (ठाकुर सावन्त सिंह सौलंकी के पुत्र)
35) नीमडी के *महेचा* बाघसिंह राठौड़ कल्लावत (मल्लीनाथ के वंशज)
36) देवगढ़ के पहले रावत सांगा चुण्डावत :- ये वीरवर पत्ता चुण्डावत के पिता जग्गा चुण्डावत के भाई थे | रावत सांगा देवगढ़ वालों के मूलपुरुष थे |
37) देवगढ़ के कुंवर जगमाल चुण्डावत (रावत सांगा चुण्डावत के पुत्र)
38) शंकरदास जैतमालोत राठौड़ (ठि. बनोल)
39) रामदास जैतमालोत राठौड़ (ठि. बनोल)
40) केनदास जैतमालोत राठौड़ (ठि. बनोल)
41) नरहरीदास जैतमालोत राठौड़ (ठि. बनोल) :- ये शंकरदास राठौड़ के पुत्र थे |
42) नाहरदास जैतमालोत राठौड़ (ठि. बनोल) :- ये शंकरदास राठौड़ के पुत्र थे |
43) राजपुरोहित नारायणदास पालीवाल के 2 पुत्र
44) किशनदास मेड़तिया
45) सुन्दरदास
46) जावला
47) प्रताप मेड़तिया राठौड़ (वीरमदेव के पुत्र व वीरवर जयमल राठौड़ के भाई)
48) बदनोर के कूंपा राठौड़ (वीरवर जयमल राठौड़ के पुत्र)
49) राव नृसिंह अखैराजोत (पाली के अखैराज के पुत्र)
50) प्रयागदास भाखरोत
51) मानसिंह
52) मेघराज
53) खेमकरण
54) भगवानदास राठौड़ (केलवा के ईश्वरदास राठौड़ के पुत्र)
55) नन्दा पडियार
56) पडियार सेडू
57) साँडू पडियार
58) अचलदास चुण्डावत
59) रावत खेतसिंह चुण्डावत के पुत्र
60) राजराणा झाला मान/झाला बींदा
61) बागड़ के ठाकुर नाथुसिंह मेड़तिया
61) देलवाड़ा के मानसिंह झाला
62) सरदारगढ़ के ठाकुर भीमसिंह डोडिया
63) सरदारगढ़ के कुंवर हम्मीर सिंह डोडिया (ठाकुर भीमसिंह के पुत्र)
64) सरदारगढ़ के कुंवर गोविन्द सिंह डोडिया (ठाकुर भीमसिंह के पुत्र)
65) सरदारगढ़ के ठाकुर भीमसिंह डोडिया के 2 भाई
66) पठान हाकिम खां सूर (शेरशाह सूरी के वंशज, मायरा स्थित शस्त्रागार के प्रमुख व मेवाड़ के सेनापति)
67) मोहम्मद खान पठान
68) जसवन्त सिंह
69) कोठारिया के राव चौहान पूर्बिया
70) रामदास चौहान
71) राजा संग्रामसिंह चौहान
72) विजयराज चौहान
73) राव दलपत चौहान
74) दुर्गादास चौहान (परबत सिंह पूर्बिया के पुत्र)
75) दूरस चौहान (परबत सिंह पूर्बिया के पुत्र)
76) सांभर के राव शेखा चौहान
77) हरिदास चौहान
78) बेदला के भगवानदास चौहान (राव ईश्वरदास के पुत्र)
79) शूरसिंह चौहान
80) रामलाल
81) कल्याणचन्द मिश्र
82) प्रतापगढ़ के कुंवर कमल सिंह
83) धमोतर के ठाकुर कांधल जी :- देवलिया महारावत बीका ने अपने भतीजे ठाकुर कांधल जी को हल्दीघाटी युद्ध में लड़ने भेजा था |
84) अभयचन्द बोगसा चारण
85) खिड़िया चारण
86) रामसिंह चुण्डावत (सलूम्बर रावत कृष्णदास चुण्डावत के भाई)
87) प्रतापसिंह चुण्डावत (सलूम्बर रावत कृष्णदास चुण्डावत के भाई)
88) गवारड़ी (रेलमगरा) के मेनारिया ब्राह्मण कल्याण जी पाणेरी
89) श्रीमाली ब्राह्मण :- इनके पीछे इनकी एक पत्नी सती हुईं | रक्त तलाई (खमनौर) में इन सती माता का स्थान अब तक मौजूद है |
90) कीर्तिसिंह राठौड़
91) जालमसिंह राठौड़
92) आलमसिंह राठौड़
93) भवानीसिंह राठौड़
94) अमानीसिंह राठौड़
95) रामसिंह राठौड़
96) दुर्गादास राठौड़
97) कानियागर के मानसिंह राठौड़
98) राघवदास
99) गोपालदास सिसोदिया
100) मानसिंह सिसोदिया
101) राजा विट्ठलदास
102) भाऊ
103) पुरोहित जगन्नाथ
104) पडियार कल्याण
105) महता जयमल बच्छावत
106) महता रतनचन्द खेमावत
107) महासहानी जगन्नाथ
108) पुरोहित गोपीनाथ
109) बिजौलिया के राव मामरख पंवार (महाराणा प्रताप के ससुर व महारानी अजबदे बाई के पिता)
110) बिजौलिया के कुंवर डूंगरसिंह पंवार (महारानी अजबदे बाई के भाई)
111) बिजौलिया के कुंवर पहाडसिंह पंवार (महारानी अजबदे बाई के भाई)
112) ताराचन्द पंवार (खडा पंवार के पुत्र)
113) सूरज पंवार (खडा पंवार के पुत्र)
114) वीरमदेव पंवार
115) राठौड़ साईंदास पंचायनोत जेतमालोत (कल्ला राठौड़ के पुत्र) :- ये अपने 13 साथियों समेत काम आए |
116) मेघा खावडिया (राठौड़ साईंदास के साथी)
117) सिंधल बागा (राठौड़ साईंदास के साथी)
118) दुर्गा चौहान (राठौड़ साईंदास के साथी)
119) वागडिया (राठौड़ साईंदास के साथी)
120) जयमल (राठौड़ साईंदास के साथी)
121) नागराज
✍🏻नवयुवक मंडल मेवाड़
महाराणा प्रताप जैसे युगपुरुष की प्रतापशील स्मृति को केवल एक दिवस में बाँधने की चर्चा ही असंगत लगती है। उनकी पुण्यतिथि को लेकर 19 और 29 जनवरी का असमंजस भले ही बना रहे, पर मेरे लिए इस प्रश्न ने कभी महत्व नहीं रखा क्योंकि जिनका जीवन ही स्वाभिमान की अखंड साधना था, उन्हें स्मरण करने के लिए प्रत्येक दिन स्वयं में एक पर्व है। महाराणा प्रताप इतिहास का मात्र एक स्वर्णिम अध्याय नहीं हैं, बल्कि अन्याय तथा वर्चस्ववाद के विरुद्ध खड़े हर सजग मनुष्य की चेतना का नाम हैं। शौर्य, स्वाभिमान तथा राष्ट्रधर्म के प्रतीक महान महाराणा प्रताप को सादर प्रणाम 🙏🏻
#वो_मतवाला_वीर_बड़ा_दिलवाला_था ,,
#मातृभूमि_का_सचा_रखवाला_था !!!
#छाती_फटने_लगती_दुश्मनो_की_उसकी_हूँकार_सुनकर,,,
#करोडो_मे_से_एक_वो_समर_मतवाला_था !!!
#अजर_अमर_वो_शूरवीर_था_अपार_शक्तिशाली,,
#मुगलो_की_जिसने_रातो_की_नींदे_उड़ा_डाली !!!
#गरीबो_के_प्रति_था_बहुत_दिल_था_बहुत_प्रेम_उसके ,,,
#उनकी_खुशियों_के_लिए_अपनी_पहचान_लुटा_डाली !!!
#वंश_का_गौरव_था_सूर्य_सा_उसमे_तेज_था ,,,
#प्रजा_के_प्रति_ह्वदय_मे_अपार_प्रेम_था !!!
#अपने_तेज_से_राज्य_को_प्रफुल्लित_करता ,,,
#दुश्मन_को_को_राख_बना_दे_ऐसा_उसमे_तेज_था !!!
#जब_भी_विवश_होकर_वो_महावीर_समर_भूमि_मे_उतरता_था ,,,
#दुश्मनो_की_छाती_चिरता_हुआ_आगे_बढ़ता_था !!!
#खौफ_खाते_थे_सारे_आक्रांता_उसके_तपोबल_से ,,,
#वो_वीरपराकर्मी_जीधर_बढ़ता_मानो_मृत्युंज्य_बनता_था !!!
#क्षत्रिय_सम्राट_वीर_शिरोमणि_महाराणा_प्रताप_सिंह_जी_की_429_वी_पुण्यतिथि_पर_शत_शत_नमन 🙏🙏🙏🙏🙏
🚩🏹 #जय_जय_श्रीराम 🏹🚩
🙏❤ #महादेव_नमन ❤🙏
🚩🔱 #जय_माँ_भवानी 🔱🚩
🚩⚔ #जय_महाराणा_प्रताप_जी_की ⚔🚩
🚩⚔ #जय_जय_राजपुताना ⚔🚩
साभार
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*वीरता ,स्वाभिमान की प्रतिमूर्ति , अखंड स्वाभिमानी वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप जी की पुण्यतिथि पर कोटि कोटि नमन🙏🙏*
*महाराणा प्रताप जी की जीवनी*
*हर व्यक्ति को पढ़नी चाहिए, ताकि स्वाभिमान कभी न सोए*
अंग्रेजी तिथि अनुसार वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप का जन्म 9 मई, 1540 ई. व विक्रम संवत अनुसार ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया को कुंभलगढ़ में हुआ।
1552 ई. में कुंभलगढ़ से चित्तौड़गढ़ प्रस्थान किया। कुँवर प्रताप ने 1554 ई. में 14 वर्ष की उम्र में जैताणा के युद्ध में करण सिंह को मारकर वागड़ की फ़ौज को परास्त किया। कुछ समय बाद छप्पन व गोडवाड़ के क्षेत्रों को जीत लिया।
1557 ई. में बिजोलिया की राजकुमारी अजबदे बाई सा से विवाह हुआ। 1563 ई. में भोमठ पर विजय प्राप्त की। 1572 ई. में महाराणा प्रताप मेवाड़ के शासक बने व सिरोही पर कल्ला देवड़ा के ज़रिए अधिकार किया, कुछ समय बाद सिरोही राव सुरताण से मित्रता कर ली।
1572 ई. में महाराणा प्रताप द्वारा मंदसौर के मुगल थानों पर आक्रमण व विजय प्राप्त की गई। 1573 ई. में महाराणा ने गुजरात से आगरा जाती हुई मुगल फौज पर आक्रमण किया व दण्डस्वरूप खजाना लिया।
महाराणा प्रताप ने 1572 ई. से 1573 ई. के बीच अकबर द्वारा भेजे गए 4 सन्धि प्रस्तावों को खारिज किया :- 1) जलाल खां 2) राजा मानसिंह 3) राजा भगवानदास 4) राजा टोडरमल
1574 ई. में चुंडावत जी के ज़रिए सिन्हा राठौड़ को परास्त कर सलूम्बर पर विजय प्राप्त की। 1576 ई. में हल्दीघाटी का विश्व प्रसिद्ध युद्ध हुआ, जो कि अनिर्णित रहा। हालांकि दोनों पक्षों ने अपनी-अपनी विजय बयां की है।
23 जून, 1576 ई. को राजा मानसिंह ने गोगुन्दा पर हमला किया। यहां तैनात 20 मेवाड़ी बहादुर काम आए। अगस्त, 1576 ई. में महाराणा प्रताप द्वारा अजमेर, गोडवाड़ व उदयपुर की मुगल छावनियों पर आक्रमण किए गए।
सितम्बर, 1576 ई. में महाराणा प्रताप ने गोगुन्दा पर आक्रमण किया व कईं मुगलों को मारकर गोगुन्दा पर अधिकार किया। अक्टूबर, 1576 ई. में मुगल बादशाह अकबर 80 हज़ार सवारों समेत स्वयं मेवाड़ अभियान हेतु रवाना हुआ।
अकबर एक वर्ष तक मेवाड़ व उसके आसपास ही रहा व महाराणा प्रताप पर कईं हमले किए, पर हर बार नाकामयाबी मिली। अकबर ने कुतुबुद्दीन, राजा भगवानदास व राजा मानसिंह को गोगुन्दा पर हमला करने भेजा।
छोटे-बड़े कई हमलों के बाद अंततः गोगुन्दा पर महाराणा प्रताप की दोबारा विजय हुई। महाराणा प्रताप के खौफ से हज यात्रियों के जुलूस की हिफाजत में अकबर द्वारा 2 फौजें भेजी गईं।
महाराणा प्रताप ने राव दूदा हाडा को बूंदी जीतने में फ़ौजी मदद की। 1577 ई. में ईडर के दूसरे युद्ध में महाराणा प्रताप ने अपने श्वसुर राय नारायणदास राठौड़ को ईडर की गद्दी दिलाने का प्रयास किया, पर सफलता नहीं मिली।
मई-सितम्बर, 1577 ई. में महाराणा प्रताप ने गोगुन्दा व उदयपुर में तैनात मुगल थाने उखाड़ फेंके। अक्टूबर, 1577 ई. में महाराणा प्रताप ने मेवाड़ के सबसे बड़े मुगल थाने मोही पर आक्रमण किया। थानेदार मुजाहिद बेग कत्ल हुआ व मोही पर महाराणा का अधिकार हुआ।
अक्टूबर, 1577 ई. में अकबर ने शाहबाज खां को फौज समेत मेवाड़ भेजा। नवम्बर, 1577 ई. में महाराणा प्रताप द्वारा केलवाड़ा मुगल थाने पर आक्रमण किया गया व 4 मुगल हाथी पकड़े गए।
1578 ई. में कुम्भलगढ़ का युद्ध हुआ, जिसमें शाहबाज खां ने कुम्भलगढ़ पर अधिकार किया। महाराणा प्रताप ने कुम्भलगढ़ की पराजय के प्रतिशोध स्वरुप जालौर व सिरोंज के सभी मुगल थाने जलाकर खाक किये।
1578 ई. में वागड़ की फौजों से हुए युद्ध में महाराणा प्रताप द्वारा भेजे गए रावत भाण सारंगदेवोत की विजय हुई। 15 दिसम्बर, 1578 ई. में अकबर ने शाहबाज खां को दूसरी बार मेवाड़ अभियान हेतु भेजा।
1578 ई. में महाराणा प्रताप ने भामाशाह जी को फौज देकर मालवा पर आक्रमण करने भेजा। 15 नवम्बर, 1579 ई. को अकबर ने शाहबाज खां को तीसरी बार मेवाड़ अभियान हेतु
भेजा, पर वह असफल हुआ। 1580 ई. में अकबर ने अब्दुर्रहीम खान-ए-खाना को फौज
सहित मेवाड़ भेजा। महाराणा प्रताप ने कुँवर अमरसिंह द्वारा बंदी बनाई गई रहीम की बेगमों को मुक्त कर क्षात्र धर्म का पालन किया। रहीम इस अभियान में बुरी तरह असफल रहा।
1580 ई. में मालवा में भामाशाह के भाई ताराचंद के ज़ख़्मी होने पर महाराणा प्रताप मालवा से ताराचंद को सुरक्षित चावण्ड ले आए व रास्ते में आने वाली मुगल चौकियों को तहस-नहस कर दिया, साथ ही मंदसौर के सबसे बड़े मुगल थाने पर आक्रमण कर विजय प्राप्त की।
अक्टूबर, 1582 ई. में दिवेर का युद्ध हुआ। महाराणा प्रताप द्वारा मुग़ल सेनापति सुल्तान खां को परास्त किया गया। कुँवर अमरसिंह द्वारा सुल्तान खां का वध किया गया।
1583 ई. में महाराणा ने हमीरपाल झील पर तैनात मुगल छावनी हटाई। 1583 ई. में कुम्भलगढ़ का दूसरा युद्ध हुआ, जिसमें महाराणा प्रताप ने मुगल सेनापति को परास्त कर दुर्ग पर अधिकार किया।
1583 ई. में महाराणा प्रताप द्वारा मांडल के थाने पर आक्रमण करके विजय प्राप्त की गई। मुगलों की तरफ से इस थाने के मुख्तार राव खंगार कछवाहा व नाथा कछवाहा काम आए। राव खंगार की छतरी विद्यमान है, जिसपे इस लड़ाई में मरने वालों के नाम खुदे हैं।
1583 ई. में बांसवाड़ा में मानसिंह चौहान से युद्ध हुआ। 1584 ई. में उदयपुर के राजमहलों में तैनात मुगलों पर महाराणा प्रताप ने आक्रमण कर विजय पाई। अकबर द्वारा 1576 ई. में उदयपुर का नाम 'मुहम्मदाबाद' रखने पर महाराणा द्वारा फिर से नाम बदलकर उदयपुर रख दिया गया।
1584 ई. में अकबर ने जगन्नाथ कछवाहा को फौज समेत मेवाड़ भेजा, पर जगन्नाथ कछवाहा भी 2 वर्ष तक मेवाड़ में रहकर असफल होकर लौट गए। 1584 ई. में अकबर ने अब्दुर्रहीम खान-ए-खाना को दोबारा मेवाड़ अभियान पर भेजा।
1585 ई. में महाराणा प्रताप ने लूणा चावण्डिया को पराजित कर चावण्ड पर अधिकार किया व चावण्ड को राजधानी बनाई। 1586 ई. में मेवाड़ में लूटमार करने वाले नवाब अली खां का दमन किया।
1585 से 1587 ई. के मध्य महाराणा प्रताप व कुँवर अमरसिंह द्वारा मोही, मदारिया समेत कुल 36 मुगल थानों पर आक्रमण करके विजय प्राप्त की गई। 1588 ई. में महाराणा प्रताप ने जहाजपुर पर विजय प्राप्त की।
1589 ई. में महाराणा प्रताप द्वारा सूरत के शाही थानों पर आक्रमण किया गया। महाराणा ने हाथी पर सवार सूरत के मुगल सूबेदार को भाले से कत्ल किया। 1591 ई. में राजनगर के युद्ध में महाराणा की फौज द्वारा दलेल खां की पराजय हुई।
1591 ई. में दिलावर खां से कनेचण का युद्ध हुआ। जनवरी, 1597 ई. में वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप का देहान्त हुआ।
आप पढ़ते-पढ़ते थक गए होंगे। महाराणा प्रताप ने कितना कुछ सहा, क्या कुछ झेला, इसकी कल्पना हम और आप जैसे साधारण लोगों के बस की बात नहीं। निसन्देह महाराणा प्रताप संघर्ष व स्वाभिमान के पर्याय थे, हैं व रहेंगे।
*जय मां भवानी*🚩
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वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप जी की मौत पर अकबर का दुख 🙏🚩⚔️
अकबर महाराणा प्रताप के सबसे बड़े राजनीतिक विरोधी थे, लेकिन यह संघर्ष किसी निजी नफ़रत का नतीजा नहीं था। यह दो विचारधाराओं का टकराव था—
एक और साम्राज्य विस्तार की नीति, और दूसरी ओर मातृभूमि की आज़ादी का पक्का इरादा।
महाराणा प्रताप ने ज़िंदगी भर आज़ादी को सबसे ऊपर माना। वे ऐसे हीरो थे जिन्होंने किसी भी हालत में आत्म-सम्मान से समझौता नहीं किया।
इसलिए महाराणा प्रताप की मौत की खबर सुनकर अकबर बहुत दुखी हुए। दिल से वे महाराणा प्रताप की बहादुरी, आत्म-सम्मान और बलिदान के मुरीद थे। कहा जाता है कि यह खबर सुनकर अकबर चुप हो गए और उनकी आंखों से आंसू बह निकले।
महाराणा प्रताप की मौत के समय अकबर लाहौर में थे। वहीं उन्हें यह खबर मिली। उस पल अकबर के मूड को उनके दरबारी कवि दुरसा आढ़ा ने राजस्थानी कविताओं में इस तरह बताया है। राजस्थानी शौक
यह लेगो अनस्टेन्ड पग लेगो अननेम्ड है
गो आदा गावदाई जी, कई घुरवामी
नवरोज न गयो न गो आसतां नवल्ली
डोंट गो विंडो हेठ जेठ दुनियां दहली
गहलोत राणा वॉन दसन मुंड रसना दासी
निसा साइलेंट आइज़ आर डेड शाह प्रतापसी
हिंदी भाई ट्रांसलेशन
हे राणा प्रताप सिंह इन गहलोत!
तुम्हारी मौत पर बादशाह अकबर ने दांतों तले जीभ दबाई और आंखों से आंसू बह निकले।
क्योंकि तुमने कभी अपने घोड़ों पर दाग नहीं लगने दिया,
तुमने कभी किसी के सामने अपनी पगड़ी नहीं झुकाई।
भले ही तुमने अपना राज खो दिया,
लेकिन तुमने हमेशा अपने कंधों पर आत्म-सम्मान का भार उठाया।
तुम कभी नवरोज नहीं गए, न ही शाही कैंप में खड़े हुए।
कभी खिड़की के नीचे सिर नहीं झुकाया।
तो इतिहास गवाह है—
तुम हर तरह से जीते, और राजा हार गया। अपनी मातृभूमि की आज़ादी के लिए जान देने वाले
वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप
और उनके अपने भक्त घोड़ा चेतक
आपको शत-शत नमन।
🚩🇮🇳
से साभार उद्धृत
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जय राजपूताना अखंड राजपूताना जय महाराणा।
*गिरा जहां पर खून वहां का , पत्थर पत्थर जिंदा है ।*
*जिस्म नही है मगर नाम का ,अक्षर अक्षर जिंदा है ।।*
*जीवन मे यह अमर कहानी , अक्षर अक्षर गढ़ लेना ।*
*शौर्य कभी सो जाएं तो ,राणा प्रताप को पढ़ लेना ।।*
*देश के इतिहास में त्याग बलिदान और वीरता की सबसे मिसाल महान सपूत और वीर योद्धा महाराणा प्रताप को उनकी पुण्यतिथि पर शत-शत नमन।*
*उनकी जीवन-गाथा साहस, शौर्य, स्वाभिमान और पराक्रम का प्रतीक है, जिससे देशवासियों को सदा राष्ट्रभक्ति की प्रेरणा मिलती रहेगी*