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Monday, 19 January 2026

Some Facts From History (Rohilla Rajput)

गौरवशाली इतिहास के कुछ स्वर्णाक्षर (रोहिला क्षत्रिय)

  1. भारत वर्ष का क्षेत्रफल 42 ,02 ,500 वर्ग किमी था ।
  2. रोहिला साम्राज्य 25 ,000  वर्ग किमी 10 ,000  वर्गमील में फैला हुआ था ।
  3. रोहिला, राजपूतो की एक खाप, परिवार या परिजन- समूह है जो कठेहर - रोहिलखण्ड के शासक एंव संस्थापक थे |मध्यकालीन भारत में बहुत से राजपूत लडाको को रोहिला की उपाधि से विभूषित किया गया. उनके वंशज आज भी रोहिला परिवारों में पाए जाते हैं ।
  4. रोहिले- राजपूत प्राचीन काल से ही सीमा- प्रांत, मध्य देश (गंगा-yamuna का दोआब),रोहिलखंड पंजाब, काश्मीर, गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश में शासन करते रहे हैं । जबकि मुस्लिम-रोहिला साम्राज्य अठारहवी शताब्दी में इस्लामिक दबाव के पश्चात् स्थापित हुआ. । अफगानों ने इसे उर्दू में "रूहेलखण्ड" कहा ।
  5. 1702 से 1720 ई तक रोहिलखण्ड  में रोहिले राजपूतो का ही शासन था. जिसकी राजधानी बरेली थी ।
  6. रोहिलखंड एक राजपूताना साम्राज्य है। रोहिलखंड एक शुद्ध हिंदी,संस्कृत और प्राकृत भाषा का शब्द है,अरेबिक या उर्दू शब्द नही है।
  7. रोहिले राजपूतो के महान शासक "राजा इन्द्रगिरी" ने रोहिलखण्ड की पश्चिमी सीमा पर रोहिलखंड विस्तार के समय सहारनपुर में एक किला बनवाया,जिसे "प्राचीन रोहिला किला" कहा जाता है । सन 1801 ई में रोहिलखण्ड को अंग्रेजो ने अपने अधिकार में ले लिया था. हिन्दू रोहिले-राजपुत्रो द्वारा बनवाए गये इस प्राचीन रोहिला किला को सन 1806  ईस्वी से सन1858  ईस्वी के मध्य कारागार में परिवर्तित कर दिया गया था । इसी प्राचीन- रोहिला- किला में आज सहारनपुर की जिला- कारागार है । उसके सामने महाराजा रणवीर सिंह रोहिला चौक स्थित है।
  8. "सहारन" राजपूतो का एक गोत्र है जो रोहिले राजपूतो में पाया जाता है. यह सूर्य वंश की एक प्रशाखा है जो राजा भरत  के वंशधरो से प्रचालित हुई थी ।
  9. फिरोज़ तुगलक के आक्रमण के समय "थानेसर" (वर्तमान में हरियाणा में स्थित) का राजा "सहारन" ही  था ।
  10. दिल्ली में गुलाम वंश के समय रोहिलखण्ड की राजधानी "रामपुर" में RANVEER SINGH ROHILA/KATHEHARIYA/ (काठी कोम, निकुम्भ वंश, सूर्यवंश रावी नदी के निकट से विस्थापित कठ गणों के वंशधर) का शासन था । इसी रोहिले राजा ने दिल्ली के सेनापति नसीरुद्दीन चंगेज को हराया था. 'खंड' kshtriyo से सम्बंधित है, जैसे भरतखंड, BUNDELKHAND, VIDHEYLKHAND , रोहिलखंड, KUMAYUNKHHAND, उत्तराखंड आदि ।
  11. प्राचीन भारत  की केवल दो भाषाएँ संस्कृत व प्राकृत (सरलीकृत संस्कृत) थी । रोहिल प्राकृत और खंड संस्कृत के शब्द हैं जो क्षत्रिय राजाओं के प्रमाण हैं । इस्लामिक नाम है दोलताबाद, कुतुबाबाद, मुरादाबाद, जलालाबाद, हैदराबाद, मुबारकबाद, फैजाबाद, आदि ।
  12. रोहिले राजपूतो की उपस्तिथि के प्रमाण हैं । योधेय गणराज्य के सिक्के, गुजरात का (1445 वि ) ' का शिलालेख (रोहिला मालदेव के सम्बन्ध में), उत्तर प्रदेश में स्थित रोहिलखंड रामपुर में राजा रणवीर सिंह के किले के खंडहर, रानी तारादेवी सती का मंदिर , पीलीभीत में राठौर रोहिलो (महिचा- प्रशाखा) की सतियों के मंदिर, कपिल मुनि स्थान पर कलायथ कैथल(हरियाणा)में वीर GANGA SINGH महेचा राठौड़ रोहिला राजपूत   PANIPAT के तीसरे युद्ध KE YODHA की समाधि और उनकी रानी सती माता रामप्यारी का मंदिर जिसे क्षेत्र के सभी राजपूत मिलकर पूजते है। सहारनपुर का प्राचीन रोहिला किलाऔर उसके सामने स्थित क्षत्रिय सम्राट MAHA RAJA RANVEER SINGH ROHILA  चौक, मंडोर का शिलालेख, " बड़ौत  में स्तिथ " RAJA RANVEER SINGH ROHILA MARG"
  13. *दिल्ली के रोहिणी में स्थित है महाराजा रणवीर सिंह रोहिला पार्क,बम्बई में स्थित हैं श्री हर प्रसाद रूहेला मार्ग*
          नगरे नगरे ग्रामै ग्रामै  विलसन्तु संस्कृतवाणी ।
          सदने  - सदने जन - जन बदने , जयतु चिरं कल्याणी ।।
          जोधपुर का शिलालेख, प्रतिहार शासक  HARISH CHANDRA को मिली रोहिल्लाद्व्यंक की उपाधि, कई अन्य
          राजपूतो के वंशो को प्राप्त उपाधियाँ, 'पृथ्वीराज रासो', आल्हाखण्ड - काव्य सभी राजपूत वंशो में पाए
          जाने वाले प्रमुख गोत्र ।
          अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा भारत द्वारा प्रकाशित पावन ग्रन्थ क्षत्रिय वंशाणर्व (रोहिले क्षत्रियों का
          राज्य रोहिलखण्ड  का पूर्व नाम पांचाल व मध्य देश, वर्तमान में अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा से
          अखिल भारतीय रोहिला.क्षत्रिय विकास परिषद रजिस्टर्ड को संबद्धता प्राप्त होना,। वर्तमान में भी रोहिलखण्ड (संस्कृत भाषा में)
          क्षेत्र का नाम यथावत बने रहना, अंग्रेजो द्वारा भी उत्तर रेलवे को "रोहिलखण्ड - रेलवे" का नाम देना जो
          बरेली से देहरादून तक सहारनपुर होते हुए जाती थी, वर्तमान में लाखो की संख्या में पाए जाने वाले
          रोहिला-राजपूत, रोहिले-राजपूतों के सम्पूर्ण भारत में फैले हुए कई अन्य संगठन अखिल भारतीय स्तर
          पर 'राजपूत रत्न' रोहिला शिरोमणि डा. कर्णवीर सिंह द्वारा संगठित एक अखिल भारतीय रोहिला
          क्षत्रिय विकास परिषद पंजीकृत (सम्बद्ध अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा) पंजीकरण संख्या - 545, आदि।
   12.  पानीपत की तीसरी लड़ाई में रोहिले राजपूत- राजा गंगासहाय/गंगा सिंह राठौर (महेचा) के नेतृत्व में
          मराठों
          की ओर से अफगान आक्रान्ता अहमदशाह अब्दाली व रोहिला पठान नजीबदौला के विरुद्ध लड़े व
          वीरगति पाई । इस मराठा युद्ध में लगभग एक हजार चार सौ रोहिले राजपूत वीरगति को प्राप्त हुए ।
           (इतिहास -रोहिला-राजपूत)
   13.  प्रथम स्वतंत्रता संग्राम 1857 में भी रोहिले राजपूतों ने अपना योगदान दिया, ग्वालियर के किले में रानी
          लक्ष्मीबाई को हजारों की संख्या में रोहिले राजपूत मिले, इस महायज्ञ में स्त्री पुरुष सभी ने अपने गहने
          धन  आदि एकत्र कर झाँसी की रानी के साथ अंग्रेजो के विरुद्ध आवाज उठाने के लिए सम्राट बहादुरशाह-
          जफर तक पहुँचाए । अंग्रेजों ने ढूँढ-ढूँढ कर उन्हें काट डाला जिससे रोहिले राजपूतों ने अज्ञातवास की
          शरण ली।
   14.  राजपूतों की हार के प्रमुख कारण थे हाथियों का प्रयोग, सामंत प्रणाली व आपसी मतभेद, ऊँचे व
          भागीदार कुल का भेदभाव (छोटे व बड़े की भावना) आदि।
   15.  सम्वत 825 में बप्पा रावल चित्तौड़ से विधर्मियों को खदेड़ता हुआ ईरान तक गया। बप्पा रावल से समर
          सिंह तक 400 वर्ष होते हैं, गह्लौतों का ही  शासन रहा। इनकी 24 शाखाएँ हैं। जिनके 16 गोत्र (बप्पा
          रावल के वंशधर) रोहिले राजपूतों में पाए जाते हैं।
   16.  चितौड़ के राणा समर सिंह (1193 ई.) की रानी पटना की राजकुमारी थी इसने 9 राजा, 1 रावत और कुछ
          रोहिले साथ लेकर मौ. गोरी के गुलाम कुतुबद्दीन का आक्रमण रोका और उसे ऐसी पराजय दी कि कभी
          उसने चितौड़ की ओर नही देखा।
   17.  रोहिला शब्द क्षेत्रजनित, गुणजनित व 'मूल पुरुष' नाम-जनित है। यह गोत्र जाटों में भी रूहेला, रोहेला,
          रूलिया, रूहेल , रूहिल, रूहिलान नामों से पाया जाता है।
   18.  रूहेला गोत्र जाटों में राजस्थान व उ. प्र. में पाया जाता है। रोहेला गोत्र के जाट जयपुर में बजरंग बिहार
          ओर ईनकम टैक्स कालोनी टौंक रोड में विद्यमान है। झुनझुन, सीकर, चुरू, अलवर, बाडमेर में भी 
          रोहिला गोत्र के जाट विद्यमान हैं । उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले में रोहेला गोत्र के जाटों के बारह 
          गाँव हैं। महाराष्ट्र में रूहिलान गोत्र के जाट वर्धा में केसर व खेड़ा गाँव में विद्यमान हैं।,रोहतक और भिवानी में रोहिल, रूहिल उपनाम के जाट विद्यमान है।
   19.  मुगल सम्राट अकबर ने भी राजपूत राजाओं को विजय प्राप्त करने के पश्चात् रोहिला-उपाधि से
          विभूषित किया था, जैसे राव, रावत, महारावल, राणा, महाराणा, रोहिल्ला, रहकवाल आदि।
   20.  "रोहिला-राजपूत" समाज , क्षत्रियों का वह परिवार है जो सरल ह्रदयी, परिश्रमी,राष्ट्रप्रेमी,स्वधर्मपरायण,
          स्वाभिमानी व वर्तमान में अधिकांश अज्ञातवास के कारण साधनविहीन है। 40 प्रतिशत कृषि कार्य से,30
          प्रतिशत श्रम के सहारे व 30 प्रतिशत व्यापार व लघु उद्योगों के सहारे जीवन यापन कर रहे हैं। इनके 
          पूर्वजो ने हजारों वर्षों तक अपनी आन, मान, मर्यादा की रक्षा के लिए बलिदान दिए हैं और अनेको 
          आक्रान्ताओं को रोके रखने में अपना सर्वस्व मिटाया है । गणराज्य व लोकतंत्रात्मक व्यवस्था को
          सजीव बनाये रखने की भावना के कारण वंश परंपरा के विरुद्ध रहे, करद राज्यों में भी स्वतंत्रता बनाये
          रखी । कठेहर रोहिलखण्ड की स्थापना से लेकर सल्तनत काल की उथल पुथल, मार काट , दमन चक्र
          तक लगभग आठ सौ वर्ष के शासन काल के पश्चात् 1857 के ग़दर के समय तक रोहिले राजपूतों ने
          राष्ट्रहित में बलिदान दिये हैं। 
 क्रूर काल के झंझावालों से संघर्ष करते हुए क्षत्रियों का यह 'रोहिला परिवार' बिखर  BIKHAR गया।
           , इस समाज की पहचान के लिए भी आज स्पष्टीकरण देना पड़ता है। कैसा दुर्भाग्य है? यह
          क्षत्रिय वर्ग का। जो अपनी पहचान को भी टटोलना पड़ रहा है। परन्तु समय के चक्र में सब कुछ सुरक्षित
          है। इतिहास के दर्पण में थिरकते चित्र, बोलते हैं, अतीत झाँकता है, सच सोचता है कि उसके होने के
          प्रमाण धुंधले-धुंधले से क्यों हैं? हे- क्षत्रिय तुम धन्य हो, पहचानो अपने प्रतिबिम्बों को' -
          "क्षत्रिय एकता का बिगुल फूँक 
           सब धुंधला धुंधला छंटने दो।
           हो अखंड भारत के राजपुत्र 
           खण्ड खण्ड में न सबको बंटने दो ।।"
    21.  रोहिलखण्ड से विस्थापित इन रोहिला परिवारों में राजपूत परम्परा के कुछ प्रमुख गोत्र इस प्रकार पाए
           जाते हैं :-
  1. रोहिला, रोहित, रोहिल, रावल, द्रोहिया, रल्हन, रूहिलान, रौतेला , रावत 
  2. यौधेय, योतिक, जोहिया, झोझे, पेशावरी 
  3. पुण्डीर, (पुलस्त्य)पांडला(धौम्य), पंढेर, पुन्ड़ेहार, पुंढीर, पुंडाया  
  4. चौहान, जैवर, जौडा, चाहल, चावड़ा, खींची, गोगद, गदाइया, सनावर, क्लानियां, चिंगारा, चाहड बालसमंद, चोहेल, चेहलान, बालदा, बछ्स (वत्स), बछेर, चयद, झझोड, चौपट, खुम्ब, जांघरा, जंगारा, झांझड    चुहल चूहेल 
  5. निकुम्भ, कठेहरिया, कठौरा, कठैत, कलुठान, कठपाल, कठेडिया, कठड, काठी, कठ, पालवार 
  6. RATHOD महेचा, महेचराना धांधल, रतनौता, बंसूठ जोली, जोलिए, बांकटे, बाटूदा, थाथी, कपोलिया, खोखर, अखनौरिया ,लोहमढ़े, मसानिया 
  7. BUNDELA, उमट, ऊमटवाल 
  8. , भारती, गनान 
  9. नाभावंशी,बटेरिया, बटवाल, बरमटिया 
  10. परमार, जावडा, लखमरा, मूसला, मौसिल, भौंसले, बसूक, जंदडा, पछाड़, पंवारखा, ढेड, मौन 
  11. तोमर, तंवर, मुदगल, देहलीवाल, किशनलाल, सानयाल, सैन, सनाढय  कालरा
  12. GEHLOT, कूपट, पछाड़, थापा, ग्रेवाल, कंकोटक, गोद्देय, पापडा, नथैड़ा, नैपाली, लाठिवाल, पानिशप, पिसोण्ड, चिरडवाल, नवल, चरखवाल, साम्भा, पातलेय, पातलीय, छन्द (चंड), क्षुद्रक,(छिन्ड, इन्छड़, नौछड़क), रज्जडवाल, बोहरा, जसावत, गौर, मलक, मलिक , मूसला 
  13. कछवाहा, कुशवाहा, कोकच्छ, ततवाल, बलद,  कोकचे काक मछेर 
  14. सिसौदिया, भरोलिया, बरनवाल, बरनपाल, बहारा 
  15.  खुमाहड, अवन्ट, ऊँटवाल
  16. सिकरवार, रहकवाल, रायकवार, ममड, गोदे 
  17. सोलंकी, गिलानिया, भुन, बुन, बघेला, ऊन, (उनयारिया)
  18. बडगूजर, सिकरवार, ममड़ा, पुडिया 
  19. कश्यप, काशब, रावल, रहकवाल 
  20. यदु, मेव, छिकारा, तैतवाल, भैनिवाल, उन्हड़, भाटटी बनाफरे, जादो, बागड़ी, सिन्धु, कालड़ा, सारन, छुरियापेड,  लखमेरिया, चराड, जाखड़, सेरावत, देसवाल, पूडिया 
प्रमुख रोहिला क्षत्रिय शासक
  1. अंगार सैन  - गांधार (वैदिक काल)
  2. अश्वकरण - ईसा पूर्व 326 (मश्कावती दुर्ग)
  3. अजयराव - स्यालकोट (सौकंल दुर्ग) ईसा पूर्व 326
  4. प्रचेता - मलेच्छ संहारक 
  5. शाशिगुप्त - साइरस के समकालीन 
  6. सुभाग सैन - मौर्य साम्राज्य के समकालीन 
  7. राजाराम शाह - 929 वि. रामपुर रोहिलखण्ड 
  8. बीजराज - रोहिलखण्ड
  9. करण चन्द्र - रोहिलखण्ड
  10. विग्रह राज - रोहिलखण्ड - गंगापार कर स्रुघ्न जनपद (सुगनापुर) यमुना तक विस्तार दसवीं शताब्दी में सरसावा में किले का निर्माण पश्चिमी सीमा पर, यमुना द्वारा ध्वस्त टीले के रूप में नकुड़ रोड पर देखा जा सकता है।
  11. सावन्त सिंह - रोहिलखण्ड
  12. जगमाल - रोहिलखण्ड
  13. धिंगतराव - रोहिलखण्ड
  14. गोंकुल सिंह - रोहिलखण्ड
  15. महासहाय - रोहिलखण्ड
  16. त्रिलोक चन्द - रोहिलखण्ड
  17. रणवीर सिंह - रोहिलखण्ड
  18. सुन्दर पाल - रोहिलखण्ड
  19. नौरंग देव - रोहिलखण्ड
  20. सूरत सिंह - रोहिलखण्ड
  21. हंसकरण रहकवाल - पृथ्वीराज के सेनापति 
  22. मिथुन देव रायकवार - ईसम सिंह पुण्डीर के मित्र थाना भवन शासक 
  23. सहकरण, विजयराव - उपरोक्त 
  24. राजा हतरा - हिसार 
  25. जगत राय - बरेली 
  26. मुकंदराज - बरेली 1567 ई.
  27. बुधपाल - बदायुं 
  28. महीचंद राठौर - बदायुं
  29. बांसदेव - बरेली 
  30. बरलदेव - बरेली
  31. राजसिंह - बरेली
  32. परमादित्य - बरेली
  33. न्यादरचन्द - बरेली
  34. राजा सहारन - थानेश्वर 
  35. प्रताप राव खींची (चौहान वंश) - गागरोन 
  36. राणा लक्ष्य सिंह - सीकरी 
  37. रोहिला मालदेव - गुजरात 
  38. जबर सिंह - सोनीपत 
  39. रामदयाल महेचराना - कलायत
  40. गंगसहाय - महेचराना *कलायत* 1761 ई.
  41. राणा प्रताप सिंह - कौराली (गंगोह) 1095 ई.
  42. नानक चन्द - अल्मोड़ा 
  43. राजा पूरणचन्द - बुंदेलखंड 
  44. राजा हंस ध्वज - हिसार व राजा हरचंद 
  45. राजा बसंतपाल - रोहिलखण्ड व्रतुसरदार, सामंत वृतपाल 1193 ई.
  46. महान सिंह बडगूजर - बागपत 1184 ई.
  47. राजा यशकरण - अंधली 
  48. गुणाचन्द - जयकरण - चरखी - दादरी 
  49. राजा मोहनपाल देव - करोली 
  50. राजारूप सैन - रोपड़ 
  51. राजा महपाल पंवार - जीन्द 
  52. राजा परपदेड पुंडीर - लाहौर 
  53. राजा लखीराव - स्यालकोट 
  54. राजा जाजा जी तोमर - दिल्ली 
  55. खड़ग सिंह - रोहिलखण्ड लौदी के समकालीन 
  56. राजा हरि सिंह - खिज्रखां के दमन का शिकार हुआ - कुमायुं की पहाड़ियों में अज्ञातवास की शरण ली 
  57. राजा इन्द्रगिरी (रोहिलखण्ड) (इन्द्रसेन) - सहारनपुर में प्राचीन रोहिला किला बनवाया । रोहिला क्षत्रिय वंश भास्कर लेखक आर. आर. राजपूत मुरसेन अलीगढ से प्रस्तुत 
  58. राजा बुद्ध देव रोहिला - 1787 ई., सिंधिया व जयपुर के कछवाहो के खेड़ा व तुंगा के मैदान में हुए युद्ध का प्रमुख पात्र । (राय कुँवर देवेन्द्र सिंह जी राजभाट, तुंगा (राजस्थान)

रोहिल्ला उपाधि - शूरवीर, अदम्य - साहसी विशेष युद्ध कला में प्रवीण, उच्च कुलीन सेनानायको, और सामन्तों को उनके गुणों के अनुरूप क्षत्रिय वीरों को तदर्थ उपाधि से विभूषित किया जाता था - जैसे - रावत - महारावत, राणा, महाराणा, ठाकुर, नेगी, रावल, रहकवाल, रोहिल्ला, समरलछन्द, लखमीर,(एक लाख का नायक) आदि। इसी आधार पर उनके वंशज भी आजतक राजपूतों के सभी गोत्रों में पाए जाते हैं।
"वभूव रोहिल्लद्व्यड्कों वेद शास्त्रार्थ पारग: । द्विज: श्री हरि चन्द्राख्य प्रजापति समो गुरू : ।।2।।
    ( बाउक का जोधपुर लेख )
- सन 837 ई. चैत्र सुदि पंचमी - हिंदी अर्थ  - "वेद शास्त्र में पारंगत रोहिल्लाद्धि उपाधिधारी एक हरिश्चन्द्र  नाम का ब्राह्मण था" जो प्रजापति के समान था हुआ ।।6।।
( गुज्जर गौरव मासिक पत्रिका - अंक 10, वर्ष ।।माह जौलाई 1991 पृष्ठ - 13) (राजपुताने का इतिहास पृष्ठ - 147) (इतिहास रोहिला - राजपूत पृष्ठ - 23) (प्राचीन भारत का इतिहास, राजपूत वंश, - कैलाश - प्रकाशन लखनऊ सन 1970 ई. पृष्ठ - 104 -105 - )
रोहिल्लद्व्यड्क रोहिल्लद्धि - अंक वाला या उपाधि वाला ।
सर्वप्रथम प्रतिहार शासक द्विज हरिश्चन्द्र को रोहिल्लद्धि उपाधि प्राप्त हुई । बाउक,प्रतिहार शासक विप्र हरिश्चन्द्र के पुत्र कवक और श्रीमति पदमनी का पुत्र था वह बड़ा पराक्रमी और नरसिंह वीर था।
प्रतिहार एक पद है, किसी विशेष वर्ण का सूचक नही है। विप्र हरिश्चन्द्र प्रतिहार अपने बाहुबल से मांडौर दुर्ग की रक्षा करने वाला था, अदम्य साहस व अन्य किसी विशेष रोहिला शासक के प्रभावनुरूप ही रोहिल्लद्व्यड्क उपाधि को किसी आधार के बिना कोई भी व्यक्ति अपने नाम के साथ सम्बन्ध करने का वैधानिक रूप में अधिकारी नही हो सकता।
उपरोक्त से स्पष्ट है कि बहुत प्राचीन काल से ही गुणकर्म के आधार पर क्षत्रिय उपाधि "रोहिल्ला" प्रयुक्त । प्रदत्त करने की वैधानिक व्यवस्था थी। जिसे हिन्दुआसूर्य - महाराजा पृथ्वीराज चौहान ने भी यथावत रखा। पृथ्वीराज चौहान की सेना में एक सौ रोहिल्ला - राजपूत सेना नायक थे । "पृथ्वीराज रासौ" -
चहूँप्रान, राठवर, जाति पुण्डीर गुहिल्ला । बडगूजर पामार, कुरभ, जागरा, रोहिल्ला ।। इस कवित्त से स्पष्ट है । कि - प्राचीन - काल में रोहिला- क्षत्रियों का स्थान बहुत ऊँचा था। रोहिला रोहिल्ल आदि शब्द राजपुत्रों अथवा क्षत्रियों के ही द्योतक थे । इस कवित्त के प्रमाणिकता "आइने अकबरी", 'सुरजन चरिता' भी सिद्ध करते हैं । युद्ध में कमानी की तरह (रोह चढ़ाई करके) शत्रु सेना को छिन्न - भिन्न करने वाले को रहकवाल, रावल, रोहिल्ला, महाभट्ट कहा गया है।
महाराज पृथ्वीराज चौहान की सेना में पांच गोत्रों के रावल थे -
  1. रावल - रोहिला 
  2. रावल - सिन्धु 
  3. रावल - घिलौत (गहलौत)
  4. रावल -  काशव या कश्यप 
  5. रावल - बलदया बल्द
मुग़ल बादशाह अकबर ने भी बहादुरी की रोहिल्ला उपाधि को यथावत बनाए रखा जब अकबर की सेना दूसरे  राज्यों को जीत कर आती थी तो अकबर अपनी सेना के सरदारों को,बहादुर जवानों बहादुरी के पदक (ख़िताब,उपाधि) देता था। एक बार जब महाराणा मान सिंह काबुल जीतकर वापिस आए तो अकबर ने उसके बाइस राजपूत सरदारों को यह ख़िताब दी (उपाधि से सम्मानित किया)
  1. बाई तेरा हर निरकाला रावत को - रावल जी 
  2. चौमकिंग सरनाथा को - रावल 
  3. झंड्कारा कांड्कड को - रोहिल्ला 
  4. रावत मन्चारा - कांड्कड काम करन, निरकादास रावत को रावराज और रूहेलाल को रोहिला 
  5. स्वतंत्र रोहिलखंड राज्य संस्थापक महाराजा RANVEER SINGH ROHILA 
  6. रक्षा बंधन के दिन रोहिलखंड की वीर भूमि गंगा सी पवित्र राजपूतों के रक्त से रंजित और आक्रांताओं के काल की धरती रामपुर के किले में दिया था कठेहर रोहिलखंड नरेश,महाराजा रणवीर सिंह रोहिला ने अदम्य साहस और अद्भुत शौर्य का परिचय!,दिल्ली सुलतान नासीरुद्दीन बहराम उर्फ चंगेज की चालीस हजार की सेना को दी थी शिकस्त!**तथा घुटने टेकने पर मजबूर किया था दिल्ली सल्तनत का दुर्दांत खूंखवार सेनापति नसीरुद्दीन महमूद को और प्राणदान मांगने पर क्षात्र धर्म रक्षार्थ छोड़ा था।**चंगेज ने अवसर पाकर रक्षा बंधन के दिन दरबारी गोकुल चंद पांडे हरिद्वार को लालच देकर किले के द्वार खुलवा लिए *धोखे के शिकार लगभग तीन हजार राजपूत निहत्थे ही लड़े,!आक्रमण कारियो के अस्त्र शस्त्र छीन छीन किया था शौर्य संग्राम दिल्ली सल्तनत की लगभग आधी गुलाम वंशी सेना को काट डाला था रोहिला राजपूतो ने!!अंत में चंगेज के खूंखवार दरिंदो ने अकेले में घेर लिया था RANVEER SINGH ROHILA को, जिन्हे आमने सामने की लड़ाई में दिल्ली सुलतान कभी नही हरा पाए थे किंतु वे उनके साहस से विस्मित हुए बिना नहीं रह सके ।रणवीर रणभूमि के वीर सपूत रक्त की अंतिम बूंद रहने तक संग्राम रत रहे और कतरा कतरा हो कर खेत रहे(सन 1254ईस्वी),उनका बलिदान रोहिलखंड के राजपूताना इतिहास में स्वर्णाक्षर दे गया!,समस्त राजपूत समाज रक्षा बंधन के दिन हुए इस बलिदान को एक शोर्य दिवस के रूप में मनाता आया है,यूट्यूब पर और अन्य सोसल मीडिया पर स्वतंत्र रोहिलखंड संस्थापक नरेश महाराजा RANVEER SINGH ROHILA की वीर गाथा दी हुई है,सभी क्षत्रिय जन अपने बच्चो को दिखाए ताकि सल्तनत काल में १२५४ ईसवी के इस इतिहास के धुंधले पृष्ठ भी उकेरे जा सके*, रक्षा बंधन को उनका बलिदान दिवस मनाया जाता है,समस्त क्षत्रिय समाज इस SHOURYA दिवस पर उन्हे कोटि कोटि नमन करते हुए उनके। बताए मार्ग पर स्वाधीनता और स्वाभिमान से स्वधर्म रक्षार्थ जीने की शपथ लेता है,यह सच्चाई हमसे स्कूली शिक्षा में छुपाई गई किंतु इतिहास के दर्पण में सब सुरक्षित रहता है जिसे उजागर कर भावी पीढ़ी को बताना ही हरेक क्षत्रिय का नैतिक दायित्व है अतः आप सभी क्षत्रियों से निवेदन है कि भावी पीढ़ी को सच्चाई बताए और स्वाभिमान से जीना दिखाए।।
  7. सूर्य वंशी निकुंभ क्षत्रिय महाराजा RANVEER SINGH ROHILA का जन्म हिंदूवा सूर्य महाराज पृथ्वी राज चौहान के पतन के बाद दिल्ली सल्तनत के बढ़ते कदमों के बीच ऐसे समय में सन१२०४ईस्वी में कठेहर रोहिलखंड की राजधानी रामपुर के किले में राजा त्रिलोक सिंह के यहां हुआ था, जब सभी राजपूत शक्तियां क्षीण और तितर बितर हो चुकी थी,इस्लामिक आक्रांता मध्य भारत की ओर दमन करते हुए आगे बढ़ते रहते थे।।,रणवीर सिंह रोहिला का विवाह विजय पुर सीकरी की राजकुमारी तारा देवी से हुआ तथा पच्चीस वर्ष की आयु में रामपुर की गद्दी पर विराजमान होकर इस्लामीकरण पर रोक लगाई ।। तीस सालों तक दिल्ली सुलतानो को धूल चटाई किंतु रक्षा बंधन के दिन शिव मंदिर गए राजपूतों को रक्षा सूत्र बंधवाते हुए नसीरुद्दीन बहराम ने गोकुल चंद पांडे के द्वारा किले के द्वार खोलने पर घेर लिया और फिर होगया ADBHUT SHOURYA SANGRAM .. विस्तार  भय से संक्षिप्त गाथा वर्णित है जिसे चाटुकार मुगल कालीन और ब्रिटिश इतिहास कारो ने छिपाया*
  8. रोहिलखंड एक राजपूताना राज्य
कन्नौज पतन के बाद रोहिलखण्ड राज्य की स्थापना कठेहरिया राजा राम शाह उर्फ रामसिंह ने की थी अहिक्षेत्र काम्पिल्य के एक गॉंव रामनगर को रामपुर नगर बसाया ओर यह क्षत्रिय राजा राम के नाम पर रखा गया था यहाँ रोहिले राजपूतो ने 11 पीढ़ी लगातार शासन किया राजा रणवीर सिंह रोहिला ने नाइरुद्दीन महमूद,, ओर हरिसिंह रोहिला ने खिज्रखान को धूल चटाई नोरंगदेव ने पिंगू(तैमूर  लंग)को हराया ।।।san ईस्वी के बाद भी कभी भी पूर्णतया रोहिलखंड को दिल्ली दरबार नही जीत पाया अकबर ओर बाद में औरंगजेब ने चाल चली और अफगानों की घुसपैठ करनी आबादी बढ़ानी शुरू की सन 1707ईस्वी में दाऊद खान बरेच अफगान के जाट दत्तक पुत्र जिसका नाम अलीमुहम्मद रखा था ने धोखे से बरेली में रोहिला राजा हरननंद का कत्ल किया और सम्पूर्ण रोहिलखण्ड पर अधिकार कर लिया इन अफगानों ने भी रोहिलखण्ड के नवाब बन जाने के कारणों से स्वयम को रुहेला  सरदार कहा वास्तव में ये रोहिला नही थे जैसे कि रोह देश के अफगान लिखा यह गलत है ।।जिस काल  में अफगान आए  तब अफगानिस्तान को रोह देश नही कहा जाता था ।।
 यह झूठा मुस्लिम तुष्टि करण का इतिहास है ।।16वी सदी में जगत सिंह कठेहरिया रोहिल्ला राजपूत के पुत्रों बाँसदेव व बर्लदेव के नाम पर बरेली नगर की नीव रखी गयी अफगानों ने कोई नगर नही बसाया उन्होंने अपने  काल मे ही  रामपुर का  नाम राम के नाम पर नही रखा। यह भ्रामक झूठ है कि फैज उल्ला खान ने रामपुर को बसाया था अठारहवीं सदी में जबकि रामपुर रियासत की स्थापना दसवीं सदी में राजा रामसिंह रोहिला(काठी कोम के राजपूत) ने की थी

*रोहिला क्षत्रिय योद्धाओं का शौर्य साहस, युद्ध कौशल, और अपने कुल व राष्ट्र की रक्षा के प्रति बलिदान की भावना में निहित होता था।* *हमारे क्षत्रिय योद्धा युद्ध भूमि में मृत्यु से* *निर्भय होकर लड़ते थे और उनका* *एकमात्र कर्तव्य राज्य व समाज की रक्षा करना था। शौर्य उनके रक्त में समाया हुआ था, जो युद्ध की ज्वाला में अपने बलिदान के रूप में प्रदर्शित होता था।*
*#क्षत्रिय*
*जय राजपूताना अखंड राजपूताना*
*जय राजपूताना,जय राजपूताना रोहिलखंड ,बुंदेलखंड*
संदर्भ 
इतिहास रोहिला राजपूत
 डॉक्टर के सी सैन
रोहिला क्षत्रिय वंश भास्कर
आर आर राजपूत
कठेहरिया रोहिला राजपूत
रोहिला क्षत्रियों का क्रमबद्ध इतिहास
दर्शन लाल रोहिला
मध्य कालीन भारत का इतिहास
ठाकुर अजीत सिंह परिहार
बालाघाट मध्य प्रदेश
 भारत भूमि और उसके वासी पृष्ठ-230 पंडित जयचंद्र विद्यालंकार
2-दून ज्योति-साप्ताहिक देहरादून 18 फरवरी 1974 
पुरुषोत्तम नागेश ओक व डॉक्टर ओमवीर शर्मा हेड ऑफ हिस्ट्री विभाग
3-क्षत्रिय वर्तमान पृष्ठ 97 व 263 ठाकुर अजित सिंह परिहार बालाघाट
4- प्राचीन भारत पृष्ठ -118,159,162 बीएम रस्तोगी इतिहास कार
5 राजतरँगनी पृष्ठ 31-39 कल्हण कृत अनुवादक नीलम अग्रवाल
6-रोहिला क्षत्रिय वन्स भास्कर ,आर आर राजपूत मूरसेन अलीगढ़
7- इतिहास रोहिला राजपूत 
डॉक्टर के सी सेन
8 - भारत का इतिहास पृष्ठ 138 डॉक्टर दया प्रकाश
9-भारतीय इतिहास मीमांसा पृष्ठ 44 जय चंद विद्यालंकार
10- भारतीय इतिहास की रूप रेखा द्वितीय भाग पृष्ठ 699 बीएम रस्तोगी
11-सीमा संरक्षण पृष्ठ 21-22 हरिकृष्ण प्रेमी
12 टॉड राजस्थान पृष्ठ 457 परिच्छेद 43 अनुवादक केशव कुमार ठाकुर
13- प्राचीन भारत का इतिहास राजपूत वन्स पृष्ठ 104 व 105कैलाश प्रकाशन लखनऊ 1970 व पृष्ठ 147
14 रोहिला क्षत्रियो का क्रमबद्ध इतिहास लेखक दर्शन लाल रोहिला 
15 राजपूत ,/क्षत्रिय वाटिका 
राजनीतिन सिंह रावत अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा
16 रिलेशन बिटवीन रोहिला एंड कठहरिया राजपूत निकुम्भ व श्रीनेत वंश 
महेश सिंह कठायत नेपाल आदि बहुत क्षत्रिय वंशावलियों में उपलबद्ध है।।

MAHARANA PRATAP SINGH SISODIYA SURY VANSHI SHRI RAM KE PUTRA LAV KE VANSHDHER BHARAT KE MAHAN VEER ,HALDIGHATI VIJETA OR UNKE BALIDANI SATHI JIVAN PARICHAY ,EK SHOURY GATHA

📜 19 जनवरी 📜

🌹 महाराणा प्रताप // बलिदान दिवस 🌹

जन्म : 09 मई 1540
मृत्यु : 19 जनवरी 1597

                   
महाराणा प्रताप के पराक्रम से अकबर भी घबराता था. इसलिए युद्ध को टालने और अधीनता स्वीकार कराने के लिए अकबर ने 6 बार अपने दूत और मुग़लों के अधीन मेवाड़ का सिंहासन चलाने की पेशकश की लेकिन महाराणा प्रताप ने इसे हर बार मानने से इंकार कर दिया.
                    
महाराणा प्रताप बेहद बलशाली और युद्ध-कौशल में निपुण थे. उनके रण-भूमि में आते ही दुश्मनों में भय का माहौल बन जाता था. युद्ध में वे अपने चहेते घोड़े चेतक पर सवार होकर जाते थे.
                 
>> महाराणा प्रताप के युद्ध हथियार <<

1. महाराणा प्रताप युद्ध के वक्त हमेशा एक भाला अपने साथ रखते थे, जिसका वजन 81 किलो था. वह इस भाले को एक हाथ से नजाते हुए दुश्मन पर टूट पड़ते थे.
2. युद्ध के वक्त महाराणा प्रताप 72 किलो का कवच पहनते थे.
3. इतिहासकारों के अनुसार महाराणा प्रताप के भाले, कवच, ढाल और दो तलवारों का वजन कुल मिलाकर 208 किलोग्राम होता था.
4. महाराणा प्रताप के हथियार इतिहास के सबसे भारी युद्ध हथियारों में शामिल हैं.
5. महाराणा प्रताप अपने एक वार से ही घोड़े के दो टुकड़े कर देते थे.
               
>> महाराणा प्रताप : परिचय व परिवार <<

1. महाराणा प्रताप का जन्म 09 मई 1540 को राजस्थान के कुंभलगढ़ में हुआ था.
2. महाराणा प्रताप ने राजनैतिक कारणों से कुल 11 शादियां की थीं.
3. महाराणा प्रताप के कुल 17 बेटे और 05 बेटियां थीं.
4. महारानी अजाब्दे से पैदा हुए पुत्र अमर सिंह को महाराणा प्रताप का उत्तराधिकारी बनाया गया था.
5. अमर सिंह भी अपने पिता महाराणा प्रताप की तरह बहुत बहादुर और पारक्रमी थे.
6. इतिहासकारों के अनुसार हल्दी घाटी युद्ध के वक्त अमर सिंह की आयु 17 वर्ष थी.
7. मेवाड़ की रक्षा करते हुए महाराणा प्रताप की 19 जनवरी 1597 को मृत्यु हुई थी.
8. अकबर जानता था कि धरती पर महाराणा प्रताप जैसा कोई दूसरा वीर नहीं है.
               
>> महाराणा प्रताप के 10 वाक्य <<

1. समय इतना ताकतवर होता है कि एक राजा को भी घास की रोटी खिला सकता है.
2. मनुष्य का गौरव व आत्म सम्मान उसकी सबसे बड़ी कमाई होती है. इसलिए इनकी सदैव रक्षा करनी चाहिए.
3. अपने व अपने परिवार के साथ जो अपने राष्ट्र के बारे में भी सोचते हैं, वही सच्चे नागरिक होते हैं.
4. तब तक परिश्रम करो, जब तक तुम्हे तुम्हारी मंजिल न मिल जाए.
5. अन्याय व अधर्म आदि का विनाश करना पूरी मानव जाति का कर्तव्य है.
6. जो अत्यंत विकट परिस्थिति में भी हार नहीं मानते हैं, वो हार कर भी जीत जाते हैं.
7. जो सुख में अतिप्रसन्न और विपत्ति में डर कर झुक जाते हैं, उन्हें न तो सफलता मिलती है और न ही इतिहास उन्हें याद रखता है.
8. अगर सांप से प्रेम करोगे तो भी वह अपने स्वभाव अनुरूप कभी न कभी डसेगा ही.
9. शासक का पहला कर्तव्य अपने राज्य का गौरव और सम्मान बचाए रखना होता है.
10. अपना गौरव, मान-मर्यादा और आत्म सम्मान के आगे जीवन की भी कोई कीमत नहीं है.
           
>> महाराणा प्रताप के 10 रोचक किस्से <<

1. महाराणा प्रताप के सबसे प्रिय घोड़े का नाम चेतक था. महाराणा प्रताप की तरह उनका घोड़ा भी बहुत बहादुर और समझदार था.
2. महाराणा प्रताप को बचपन में प्यार से कीका कहकर बुलाया जाता था.
3. महाराणा प्रताप और मुगल शासक अकबर के बीच हल्दी घाटी का विनाशकारी युद्ध 18 जून 1576 को हुआ था. इतिहास में हल्दी घाटी के युद्ध की तुलना महाभारत के युद्ध से की गई है.
4. इतिहासकारों के अनुसार हल्दी घाटी के युद्ध में न तो अकबर की जीत हुई थी और न ही महाराणा प्रताप हारे थे. इसकी वजह महाराणा प्रताप के मन में राज्य की सुरक्षा का अटूट जज्बा था.
5. हल्दी घाटी के युद्ध को टालने के लिए अकबर ने छह बार महाराणा प्रताप के पास अपने शांति दूत भेजे, लेकिन राजपूत राजा ने हर बार अकबर के प्रस्ताव को ठुकरा दिया.
6. हल्दी घाटी के युद्ध में महाराणा प्रताप ने मात्र 20 हजार सैनिकों के साथ मुगल बादशाह अकबर के 80 हजार सैनिकों का डटकर सामना किया था. बावजूद अकबर महाराणा प्रताप को झुका नहीं सका था.
7. महाराणा प्रताप के सबसे प्रिय और वफादार घोड़े ने भी दुश्मनों के सामने अद्भुत वीरता का परिचय दिया था. हालांकि इसी युद्ध में घायल होने से उसकी मौत हुई थी.
8. उदयपुर की हल्दी घाटी में आज भी महाराणा प्रताप के प्रिय घोड़े चेतक की समाधि मौजूद है.
9. चेतक ने अंतिम दम तक महाराणा प्रताप का साथ दिया. युद्ध में मुगल सेना से घिरने पर चेतक महाराणा प्रताप को बैठाकर कई फीट लंबा नाला फांद गया था.

यह भी जानीये..........
नाम -कुँवर प्रताप जी{महाराणा प्रताप}
जन्म - 9 मई, 1540 ई.
जन्म भूमि - राजस्थान कुम्भलगढ़
पुन्य तिथि - 19 जनवरी, 1597 ई.
पिता - महाराणा उदय सिंह जी
माता - राणी जीवत कँवर जी
राज्य सीमा - मेवाड़
शासन काल - 1568–1597ई.
शा. अवधि - 29 वर्ष
वंश - सुर्यवंश
राजवंश - सिसोदिया
राजघराना - राजपूताना
धार्मिक मान्यता - हिंदू धर्म
युद्ध - हल्दीघाटी का युद्ध
राजधानी - उदयपुर
पूर्वाधिकारी - महाराणा उदयसिंह जी
उत्तराधिकारी - राणा अमर सिंह जी
महाराणा प्रताप जी के पास एक सबसे प्रिय घोड़ा था,जिसका नाम 'चेतक' था।
‌‌‌‌‌‌‌"राजपूत शिरोमणि श्री महाराणा प्रताप जी" उदयपुर, मेवाड़ में।सिसोदिया राजवंश के राजा थे।
वह तिथि धन्य है, जब मेवाड़ की शौर्य-भूमि परमेवाड़-मुकुट
मणि राणा प्रताप जी का जन्म हुआ। श्री प्रताप जी का नाम इतिहास में वीरता और दृढ प्रण के लिये अमर है।
महाराणा प्रतापजी की जयंती विक्रमी सम्वत् कॅलण्डर के अनुसार प्रतिवर्ष ज्येष्ठ, शुक्ल पक्ष तृतीया को मनाई जाती है।
महाराणा प्रताप जी के बारे में कुछरोचक जानकारी :-
1... श्री महाराणा प्रताप सिंह जी एकही झटके में घोड़े समेत दुश्मन सैनिक को काट डालते थे।
2.... जब इब्राहिम लिंकन भारत दौरे पर आ रहे थेतब उन्होने
अपनी माँ सेपूछा कि हिंदुस्तान से आपके लिए क्या लेकर
आए| तब माँ का जवाब मिला ” उस महान देश की वीर भूमि हल्दी घाटी से एक मुट्ठी धूल
लेकरआना जहाँ का राजा अपनी प्रजा केप्रति इतना वफ़ादार
था कि उसने आधे हिंदुस्तान के बदले अपनी मातृभूमि को चुना ”
बदकिस्मती से उनका वो दौरा रद्द हो गया था | “बुक ऑफ़ प्रेसिडेंट यु।एस ए ‘किताब में आप ये बात पढ़ सकते है |
3.... श्री महाराणा प्रताप सिंह जी के भाले का वजन 80 किलो था और कवच का वजन 80 किलो कवच , भाला, ढाल, और हाथ में तलवार का वजन मिलाये तो 207 किलो था।
4.... आज भी महाराणा प्रताप की तलवार कवच आदि सामान उदयपुर राज घराने के संग्रहालय में सुरक्षित हैं |
5.... अकबर ने कहा था कि अगर राणा प्रताप मेरे सामने झुकते है तो आधा हिंदुस्तान के वारिस वो होंगे पर बादशाहत अकबर की ही रहेगी पर श्री महाराणा प्रताप जी ने किसी की भी आधीनता स्वीकार करने से मना कर दिया |
6.... हल्दी घाटी की लड़ाई में मेवाड़ से 20000 सैनिक थे और अकबर की ओर से 85000 सैनिक युद्ध में सम्मिलित हुए |
7.... श्री महाराणा प्रताप जी के घोड़े चेतक का मंदिर भी बना हुवा हैं।जो आज भी हल्दी घाटी में सुरक्षित है |
8.... श्री महाराणा प्रताप जी ने जब महलो का त्याग किया तब उनके साथ लुहार जाति के हजारो लोगो ने भी घर छोड़ा और दिन रात राणा जी कि फौज के लिए तलवारे बनायीं इसी समाज को आज गुजरात
मध्यप्रदेश और राजस्थान में गड़लिया लोहार कहा जाता है मै नमन।करता हूँ एसे लोगो को |
9.... हल्दी घाटी के युद्ध के 300 साल बाद भी वहाँ जमीनों में तलवारें।पायी गयी। आखिरी बार तलवारों का जखीरा 1985 में हल्दी घाटी में।मिला |
10..... श्री महाराणा प्रताप सिंह जी अस्त्र शस्त्र की शिक्षा "श्री जैमल मेड़तिया जी" ने दी थी जो 8000 राजपूत वीरो को लेकर 60000 से लड़े थे। उस युद्ध में 48000 मारे गए थे जिनमे 8000 राजपूत और 40000 मुग़ल थे |
11.... श्री महाराणा प्रताप सिंह जी के देहांत पर अकबर भी रो पड़ा था |
12.... मेवाड़ के आदिवासी भील समाज ने हल्दी घाटी में अकबर की फौज।को अपने तीरो से रौंद डाला था वो श्री महाराणा प्रताप को अपना बेटा मानते थे और राणा जी बिना भेद भाव के उन के साथ रहते थे आज भी मेवाड़ के राजचिन्ह पर एक तरफ राजपूत है तो दूसरी तरफ भील ।
13..... राणा जी का घोडा चेतक महाराणा जी को 26 फीट का दरिया पार करने के बाद वीर गति को प्राप्त हुआ | उसकी एक टांग टूटने के बाद भी वह दरिया पार कर गया। जहा वो घायल हुआ वहीं आज खोड़ी इमली नाम का पेड़ है जहाँ पर चेतक की म्रत्यु हुई वहाँ चेतक मंदिर है।
14...राणा जी का घोडा चेतक भी बहुत ताकतवर था उसके मुँह के आगे दुश्मन के हाथियों को भ्रमीत करने के लिए हाथी की सूंड लगाई जाती थी । यह हेतक और चेतक नाम के दो घोड़े थे ।
15..मरने से पहले महाराणाप्रताप जी ने अपना खोया हुआ 85 % मेवाड फिर से जीत लिया था । सोने चांदी और महलो को छोड़ वो 20 साल मेवाड़ के जंगलो में घूमे ।
16....महाराणा प्रताप जी का वजन 110 किलो और लम्बाई 7 फिट 5इंच थी, वे हाथ मे दो म्यान वाली तलवार और 80 किलो का भाला रखते थे।
द्वंद्व कहां तक पाला जाए, युद्ध कहां तक टाला जाए, 
तू भी है राणा का वंशज है, फेंक जहां तक भाला जाए! 🚩
🚩⚔️हल्दीघाटी युद्ध में वीरगति को प्राप्त होने वाले प्रमुख मेवाड़ी योद्धा" 

1) ग्वालियर के राजा रामशाह तोमर

2) कुंवर शालिवाहन तोमर (रामशाह तोमर के पुत्र व महाराणा प्रताप के बहनोई)

3) कुंवर भान तोमर (रामशाह तोमर के पुत्र)

4) कुंवर प्रताप तोमर (रामशाह तोमर के पुत्र)

5) भंवर धर्मागत तोमर (शालिवाहन तोमर के पुत्र)

6) दुर्गा तोमर (रामशाह तोमर के साथी)

7) बाबू भदौरिया (रामशाह तोमर के साथी)

८) खाण्डेराव तोमर (रामशाह तोमर के साथी)

9) बुद्ध सेन (रामशाह तोमर के साथी)

10) शक्तिसिंह राठौड़ (रामशाह तोमर के साथी)

11) विष्णुदास चौहान (रामशाह तोमर के साथी)

12) डूंगर (रामशाह तोमर के साथी)

13) कीरतसिंह (रामशाह तोमर के साथी)

14) दौलतखान (रामशाह तोमर के साथी)

15) देवीचन्द चौहान (रामशाह तोमर के साथी)

16) छीतर सिंह चौहान (हरिसिंह के पुत्र व रामशाह तोमर के साथी)

17) अभयचन्द्र (रामशाह तोमर के साथी)

18) राघो तोमर (रामशाह तोमर के साथी)

19) राम खींची (रामशाह तोमर के साथी)

20) ईश्वर (रामशाह तोमर के साथी)

21) पुष्कर (रामशाह तोमर के साथी)

22) कल्याण मिश्र (रामशाह तोमर के साथी)

23) बदनोर के ठाकुर रामदास राठौड़ (वीरवर जयमल राठौड़ के 7वें पुत्र) :- ये अपने 9 साथियों समेत काम आए |

24) बदनोर के कुंवर किशनसिंह राठौड़ (ठाकुर रामदास राठौड़ के पुत्र)

25) पाली के मानसिंह सोनगरा चौहान (महाराणा प्रताप के मामा) :- ये अपने 11 साथियों समेत काम आए |

26) कान्ह/कान्हा (महाराणा प्रताप के भाई) :- इनके वंशज आमल्दा व अमरगढ़ में हैं |

27) कल्याणसिंह/कल्ला (महाराणा प्रताप के भाई)

28) कानोड़ के रावत नैतसिंह सारंगदेवोत

29) केशव बारठ (कवि) :- ये सोन्याणा वाले चारणों के पूर्वज थे |

30) जैसा/जयसा बारठ (कवि) :- ये भी सोन्याणा वाले चारणों के पूर्वज थे |

31) कान्हा सांदू (चारण कवि)

32) पृथ्वीराज चुण्डावत (पत्ता चुण्डावत के भाई)

33) आमेट के ठाकुर कल्याणसिंह चुण्डावत (वीरवर पत्ता चुण्डावत के पुत्र) - इनके पीछे रानी बदन कंवर राठौड़ सती हुईं | रानी बदन कंवर मेड़ता के जयमल राठौड़ की पुत्री थीं |

34) देसूरी के खान सौलंकी (ठाकुर सावन्त सिंह सौलंकी के पुत्र)

35) नीमडी के *महेचा* बाघसिंह राठौड़ कल्लावत (मल्लीनाथ के वंशज)

36) देवगढ़ के पहले रावत सांगा चुण्डावत :- ये वीरवर पत्ता चुण्डावत के पिता जग्गा चुण्डावत के भाई थे | रावत सांगा देवगढ़ वालों के मूलपुरुष थे |

37) देवगढ़ के कुंवर जगमाल चुण्डावत (रावत सांगा चुण्डावत के पुत्र)

38) शंकरदास जैतमालोत राठौड़ (ठि. बनोल)

39) रामदास जैतमालोत राठौड़ (ठि. बनोल)

40) केनदास जैतमालोत राठौड़ (ठि. बनोल)

41) नरहरीदास जैतमालोत राठौड़ (ठि. बनोल) :- ये शंकरदास राठौड़ के पुत्र थे |

42) नाहरदास जैतमालोत राठौड़ (ठि. बनोल) :- ये शंकरदास राठौड़ के पुत्र थे |

43) राजपुरोहित नारायणदास पालीवाल के 2 पुत्र

44) किशनदास मेड़तिया

45) सुन्दरदास

46) जावला

47) प्रताप मेड़तिया राठौड़ (वीरमदेव के पुत्र व वीरवर जयमल राठौड़ के भाई)

48) बदनोर के कूंपा राठौड़ (वीरवर जयमल राठौड़ के पुत्र)

49) राव नृसिंह अखैराजोत (पाली के अखैराज के पुत्र)

50) प्रयागदास भाखरोत

51) मानसिंह

52) मेघराज

53) खेमकरण

54) भगवानदास राठौड़ (केलवा के ईश्वरदास राठौड़ के पुत्र)

55) नन्दा पडियार

56) पडियार सेडू

57) साँडू पडियार

58) अचलदास चुण्डावत

59) रावत खेतसिंह चुण्डावत के पुत्र

60) राजराणा झाला मान/झाला बींदा

61) बागड़ के ठाकुर नाथुसिंह मेड़तिया

61) देलवाड़ा के मानसिंह झाला

62) सरदारगढ़ के ठाकुर भीमसिंह डोडिया

63) सरदारगढ़ के कुंवर हम्मीर सिंह डोडिया (ठाकुर भीमसिंह के पुत्र)

64) सरदारगढ़ के कुंवर गोविन्द सिंह डोडिया (ठाकुर भीमसिंह के पुत्र)

65) सरदारगढ़ के ठाकुर भीमसिंह डोडिया के 2 भाई

66) पठान हाकिम खां सूर (शेरशाह सूरी के वंशज, मायरा स्थित शस्त्रागार के प्रमुख व मेवाड़ के सेनापति)

67) मोहम्मद खान पठान

68) जसवन्त सिंह

69) कोठारिया के राव चौहान पूर्बिया

70) रामदास चौहान

71) राजा संग्रामसिंह चौहान

72) विजयराज चौहान

73) राव दलपत चौहान

74) दुर्गादास चौहान (परबत सिंह पूर्बिया के पुत्र)

75) दूरस चौहान (परबत सिंह पूर्बिया के पुत्र)

76) सांभर के राव शेखा चौहान

77) हरिदास चौहान

78) बेदला के भगवानदास चौहान (राव ईश्वरदास के पुत्र)

79) शूरसिंह चौहान

80) रामलाल

81) कल्याणचन्द मिश्र

82) प्रतापगढ़ के कुंवर कमल सिंह

83) धमोतर के ठाकुर कांधल जी :- देवलिया महारावत बीका ने अपने भतीजे ठाकुर कांधल जी को हल्दीघाटी युद्ध में लड़ने भेजा था |

84) अभयचन्द बोगसा चारण

85) खिड़िया चारण

86) रामसिंह चुण्डावत (सलूम्बर रावत कृष्णदास चुण्डावत के भाई)

87) प्रतापसिंह चुण्डावत (सलूम्बर रावत कृष्णदास चुण्डावत के भाई)

88) गवारड़ी (रेलमगरा) के मेनारिया ब्राह्मण कल्याण जी पाणेरी

89) श्रीमाली ब्राह्मण :- इनके पीछे इनकी एक पत्नी सती हुईं | रक्त तलाई (खमनौर) में इन सती माता का स्थान अब तक मौजूद है |

90) कीर्तिसिंह राठौड़

91) जालमसिंह राठौड़

92) आलमसिंह राठौड़

93) भवानीसिंह राठौड़

94) अमानीसिंह राठौड़

95) रामसिंह राठौड़

96) दुर्गादास राठौड़

97) कानियागर के मानसिंह राठौड़

98) राघवदास

99) गोपालदास सिसोदिया

100) मानसिंह सिसोदिया

101) राजा विट्ठलदास

102) भाऊ

103) पुरोहित जगन्नाथ

104) पडियार कल्याण

105) महता जयमल बच्छावत

106) महता रतनचन्द खेमावत

107) महासहानी जगन्नाथ

108) पुरोहित गोपीनाथ

109) बिजौलिया के राव मामरख पंवार (महाराणा प्रताप के ससुर व महारानी अजबदे बाई के पिता)

110) बिजौलिया के कुंवर डूंगरसिंह पंवार (महारानी अजबदे बाई के भाई)

111) बिजौलिया के कुंवर पहाडसिंह पंवार (महारानी अजबदे बाई के भाई)

112) ताराचन्द पंवार (खडा पंवार के पुत्र)

113) सूरज पंवार (खडा पंवार के पुत्र)

114) वीरमदेव पंवार

115) राठौड़ साईंदास पंचायनोत जेतमालोत (कल्ला राठौड़ के पुत्र) :- ये अपने 13 साथियों समेत काम आए |

116) मेघा खावडिया (राठौड़ साईंदास के साथी)

117) सिंधल बागा (राठौड़ साईंदास के साथी)

118) दुर्गा चौहान (राठौड़ साईंदास के साथी)

119) वागडिया (राठौड़ साईंदास के साथी)

120) जयमल (राठौड़ साईंदास के साथी)

121) नागराज
✍🏻नवयुवक मंडल मेवाड़

महाराणा प्रताप जैसे युगपुरुष की प्रतापशील स्मृति को केवल एक दिवस में बाँधने की चर्चा ही असंगत लगती है। उनकी पुण्यतिथि को लेकर 19 और 29 जनवरी का असमंजस भले ही बना रहे, पर मेरे लिए इस प्रश्न ने कभी महत्व नहीं रखा क्योंकि जिनका जीवन ही स्वाभिमान की अखंड साधना था, उन्हें स्मरण करने के लिए प्रत्येक दिन स्वयं में एक पर्व है। महाराणा प्रताप इतिहास का मात्र एक स्वर्णिम अध्याय नहीं हैं, बल्कि अन्याय तथा वर्चस्ववाद के विरुद्ध खड़े हर सजग मनुष्य की चेतना का नाम हैं। शौर्य, स्वाभिमान तथा राष्ट्रधर्म के प्रतीक महान महाराणा प्रताप को सादर प्रणाम 🙏🏻

#वो_मतवाला_वीर_बड़ा_दिलवाला_था ,, 
#मातृभूमि_का_सचा_रखवाला_था !!! 

#छाती_फटने_लगती_दुश्मनो_की_उसकी_हूँकार_सुनकर,,, 
#करोडो_मे_से_एक_वो_समर_मतवाला_था !!! 

#अजर_अमर_वो_शूरवीर_था_अपार_शक्तिशाली,, 
#मुगलो_की_जिसने_रातो_की_नींदे_उड़ा_डाली !!! 

#गरीबो_के_प्रति_था_बहुत_दिल_था_बहुत_प्रेम_उसके ,,, 
#उनकी_खुशियों_के_लिए_अपनी_पहचान_लुटा_डाली !!! 

#वंश_का_गौरव_था_सूर्य_सा_उसमे_तेज_था ,,, 
#प्रजा_के_प्रति_ह्वदय_मे_अपार_प्रेम_था !!! 

#अपने_तेज_से_राज्य_को_प्रफुल्लित_करता ,,, 
#दुश्मन_को_को_राख_बना_दे_ऐसा_उसमे_तेज_था !!! 

#जब_भी_विवश_होकर_वो_महावीर_समर_भूमि_मे_उतरता_था ,,, 

#दुश्मनो_की_छाती_चिरता_हुआ_आगे_बढ़ता_था !!! 

#खौफ_खाते_थे_सारे_आक्रांता_उसके_तपोबल_से ,,, 
#वो_वीरपराकर्मी_जीधर_बढ़ता_मानो_मृत्युंज्य_बनता_था !!! 

#क्षत्रिय_सम्राट_वीर_शिरोमणि_महाराणा_प्रताप_सिंह_जी_की_429_वी_पुण्यतिथि_पर_शत_शत_नमन 🙏🙏🙏🙏🙏

🚩🏹 #जय_जय_श्रीराम 🏹🚩
🙏❤ #महादेव_नमन ❤🙏
🚩🔱 #जय_माँ_भवानी 🔱🚩
🚩⚔ #जय_महाराणा_प्रताप_जी_की ⚔🚩
🚩⚔ #जय_जय_राजपुताना ⚔🚩
साभार


🚩🚩

*वीरता ,स्वाभिमान की प्रतिमूर्ति , अखंड स्वाभिमानी वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप जी की पुण्यतिथि पर कोटि कोटि नमन🙏🙏*

*महाराणा प्रताप जी की जीवनी*
*हर व्यक्ति को पढ़नी चाहिए, ताकि स्वाभिमान कभी न सोए*

अंग्रेजी तिथि अनुसार वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप का जन्म 9 मई, 1540 ई. व विक्रम संवत अनुसार ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया को कुंभलगढ़ में हुआ।

1552 ई. में कुंभलगढ़ से चित्तौड़गढ़ प्रस्थान किया। कुँवर प्रताप ने 1554 ई. में 14 वर्ष की उम्र में जैताणा के युद्ध में करण सिंह को मारकर वागड़ की फ़ौज को परास्त किया। कुछ समय बाद छप्पन व गोडवाड़ के क्षेत्रों को जीत लिया।

1557 ई. में बिजोलिया की राजकुमारी अजबदे बाई सा से विवाह हुआ। 1563 ई. में भोमठ पर विजय प्राप्त की। 1572 ई. में महाराणा प्रताप मेवाड़ के शासक बने व सिरोही पर कल्ला देवड़ा के ज़रिए अधिकार किया, कुछ समय बाद सिरोही राव सुरताण से मित्रता कर ली।

1572 ई. में महाराणा प्रताप द्वारा मंदसौर के मुगल थानों पर आक्रमण व विजय प्राप्त की गई। 1573 ई. में महाराणा ने गुजरात से आगरा जाती हुई मुगल फौज पर आक्रमण किया व दण्डस्वरूप खजाना लिया।

महाराणा प्रताप ने 1572 ई. से 1573 ई. के बीच अकबर द्वारा भेजे गए 4 सन्धि प्रस्तावों को खारिज किया :- 1) जलाल खां 2) राजा मानसिंह 3) राजा भगवानदास 4) राजा टोडरमल

1574 ई. में चुंडावत जी के ज़रिए सिन्हा राठौड़ को परास्त कर सलूम्बर पर विजय प्राप्त की। 1576 ई. में हल्दीघाटी का विश्व प्रसिद्ध युद्ध हुआ, जो कि अनिर्णित रहा। हालांकि दोनों पक्षों ने अपनी-अपनी विजय बयां की है।
23 जून, 1576 ई. को राजा मानसिंह ने गोगुन्दा पर हमला किया। यहां तैनात 20 मेवाड़ी बहादुर काम आए। अगस्त, 1576 ई. में महाराणा प्रताप द्वारा अजमेर, गोडवाड़ व उदयपुर की मुगल छावनियों पर आक्रमण किए गए।

सितम्बर, 1576 ई. में महाराणा प्रताप ने गोगुन्दा पर आक्रमण किया व कईं मुगलों को मारकर गोगुन्दा पर अधिकार किया। अक्टूबर, 1576 ई. में मुगल बादशाह अकबर 80 हज़ार सवारों समेत स्वयं मेवाड़ अभियान हेतु रवाना हुआ।

अकबर एक वर्ष तक मेवाड़ व उसके आसपास ही रहा व महाराणा प्रताप पर कईं हमले किए, पर हर बार नाकामयाबी मिली। अकबर ने कुतुबुद्दीन, राजा भगवानदास व राजा मानसिंह को गोगुन्दा पर हमला करने भेजा।
छोटे-बड़े कई हमलों के बाद अंततः गोगुन्दा पर महाराणा प्रताप की दोबारा विजय हुई। महाराणा प्रताप के खौफ से हज यात्रियों के जुलूस की हिफाजत में अकबर द्वारा 2 फौजें भेजी गईं।

महाराणा प्रताप ने राव दूदा हाडा को बूंदी जीतने में फ़ौजी मदद की। 1577 ई. में ईडर के दूसरे युद्ध में महाराणा प्रताप ने अपने श्वसुर राय नारायणदास राठौड़ को ईडर की गद्दी दिलाने का प्रयास किया, पर सफलता नहीं मिली।

मई-सितम्बर, 1577 ई. में महाराणा प्रताप ने गोगुन्दा व उदयपुर में तैनात मुगल थाने उखाड़ फेंके। अक्टूबर, 1577 ई. में महाराणा प्रताप ने मेवाड़ के सबसे बड़े मुगल थाने मोही पर आक्रमण किया। थानेदार मुजाहिद बेग कत्ल हुआ व मोही पर महाराणा का अधिकार हुआ।

अक्टूबर, 1577 ई. में अकबर ने शाहबाज खां को फौज समेत मेवाड़ भेजा। नवम्बर, 1577 ई. में महाराणा प्रताप द्वारा केलवाड़ा मुगल थाने पर आक्रमण किया गया व 4 मुगल हाथी पकड़े गए।

1578 ई. में कुम्भलगढ़ का युद्ध हुआ, जिसमें शाहबाज खां ने कुम्भलगढ़ पर अधिकार किया। महाराणा प्रताप ने कुम्भलगढ़ की पराजय के प्रतिशोध स्वरुप जालौर व सिरोंज के सभी मुगल थाने जलाकर खाक किये।

1578 ई. में वागड़ की फौजों से हुए युद्ध में महाराणा प्रताप द्वारा भेजे गए रावत भाण सारंगदेवोत की विजय हुई। 15 दिसम्बर, 1578 ई. में अकबर ने शाहबाज खां को दूसरी बार मेवाड़ अभियान हेतु भेजा।

1578 ई. में महाराणा प्रताप ने भामाशाह जी को फौज देकर मालवा पर आक्रमण करने भेजा। 15 नवम्बर, 1579 ई. को अकबर ने शाहबाज खां को तीसरी बार मेवाड़ अभियान हेतु

भेजा, पर वह असफल हुआ। 1580 ई. में अकबर ने अब्दुर्रहीम खान-ए-खाना को फौज

सहित मेवाड़ भेजा। महाराणा प्रताप ने कुँवर अमरसिंह द्वारा बंदी बनाई गई रहीम की बेगमों को मुक्त कर क्षात्र धर्म का पालन किया। रहीम इस अभियान में बुरी तरह असफल रहा।

1580 ई. में मालवा में भामाशाह के भाई ताराचंद के ज़ख़्मी होने पर महाराणा प्रताप मालवा से ताराचंद को सुरक्षित चावण्ड ले आए व रास्ते में आने वाली मुगल चौकियों को तहस-नहस कर दिया, साथ ही मंदसौर के सबसे बड़े मुगल थाने पर आक्रमण कर विजय प्राप्त की।

अक्टूबर, 1582 ई. में दिवेर का युद्ध हुआ। महाराणा प्रताप द्वारा मुग़ल सेनापति सुल्तान खां को परास्त किया गया। कुँवर अमरसिंह द्वारा सुल्तान खां का वध किया गया।

1583 ई. में महाराणा ने हमीरपाल झील पर तैनात मुगल छावनी हटाई। 1583 ई. में कुम्भलगढ़ का दूसरा युद्ध हुआ, जिसमें महाराणा प्रताप ने मुगल सेनापति को परास्त कर दुर्ग पर अधिकार किया।

1583 ई. में महाराणा प्रताप द्वारा मांडल के थाने पर आक्रमण करके विजय प्राप्त की गई। मुगलों की तरफ से इस थाने के मुख्तार राव खंगार कछवाहा व नाथा कछवाहा काम आए। राव खंगार की छतरी विद्यमान है, जिसपे इस लड़ाई में मरने वालों के नाम खुदे हैं।

1583 ई. में बांसवाड़ा में मानसिंह चौहान से युद्ध हुआ। 1584 ई. में उदयपुर के राजमहलों में तैनात मुगलों पर महाराणा प्रताप ने आक्रमण कर विजय पाई। अकबर द्वारा 1576 ई. में उदयपुर का नाम 'मुहम्मदाबाद' रखने पर महाराणा द्वारा फिर से नाम बदलकर उदयपुर रख दिया गया।

1584 ई. में अकबर ने जगन्नाथ कछवाहा को फौज समेत मेवाड़ भेजा, पर जगन्नाथ कछवाहा भी 2 वर्ष तक मेवाड़ में रहकर असफल होकर लौट गए। 1584 ई. में अकबर ने अब्दुर्रहीम खान-ए-खाना को दोबारा मेवाड़ अभियान पर भेजा।

1585 ई. में महाराणा प्रताप ने लूणा चावण्डिया को पराजित कर चावण्ड पर अधिकार किया व चावण्ड को राजधानी बनाई। 1586 ई. में मेवाड़ में लूटमार करने वाले नवाब अली खां का दमन किया।

1585 से 1587 ई. के मध्य महाराणा प्रताप व कुँवर अमरसिंह द्वारा मोही, मदारिया समेत कुल 36 मुगल थानों पर आक्रमण करके विजय प्राप्त की गई। 1588 ई. में महाराणा प्रताप ने जहाजपुर पर विजय प्राप्त की।

1589 ई. में महाराणा प्रताप द्वारा सूरत के शाही थानों पर आक्रमण किया गया। महाराणा ने हाथी पर सवार सूरत के मुगल सूबेदार को भाले से कत्ल किया। 1591 ई. में राजनगर के युद्ध में महाराणा की फौज द्वारा दलेल खां की पराजय हुई।

1591 ई. में दिलावर खां से कनेचण का युद्ध हुआ। जनवरी, 1597 ई. में वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप का देहान्त हुआ।

आप पढ़ते-पढ़ते थक गए होंगे। महाराणा प्रताप ने कितना कुछ सहा, क्या कुछ झेला, इसकी कल्पना हम और आप जैसे साधारण लोगों के बस की बात नहीं। निसन्देह महाराणा प्रताप संघर्ष व स्वाभिमान के पर्याय थे, हैं व रहेंगे।

*जय मां भवानी*🚩
*क्षत्रिय धर्म युगेयुगे*🚩


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वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप जी की मौत पर अकबर का दुख 🙏🚩⚔️
अकबर महाराणा प्रताप के सबसे बड़े राजनीतिक विरोधी थे, लेकिन यह संघर्ष किसी निजी नफ़रत का नतीजा नहीं था। यह दो विचारधाराओं का टकराव था—
एक और साम्राज्य विस्तार की नीति, और दूसरी ओर मातृभूमि की आज़ादी का पक्का इरादा।
महाराणा प्रताप ने ज़िंदगी भर आज़ादी को सबसे ऊपर माना। वे ऐसे हीरो थे जिन्होंने किसी भी हालत में आत्म-सम्मान से समझौता नहीं किया।
इसलिए महाराणा प्रताप की मौत की खबर सुनकर अकबर बहुत दुखी हुए। दिल से वे महाराणा प्रताप की बहादुरी, आत्म-सम्मान और बलिदान के मुरीद थे। कहा जाता है कि यह खबर सुनकर अकबर चुप हो गए और उनकी आंखों से आंसू बह निकले।
महाराणा प्रताप की मौत के समय अकबर लाहौर में थे। वहीं उन्हें यह खबर मिली। उस पल अकबर के मूड को उनके दरबारी कवि दुरसा आढ़ा ने राजस्थानी कविताओं में इस तरह बताया है। राजस्थानी शौक
यह लेगो अनस्टेन्ड पग लेगो अननेम्ड है
गो आदा गावदाई जी, कई घुरवामी
नवरोज न गयो न गो आसतां नवल्ली
डोंट गो विंडो हेठ जेठ दुनियां दहली
गहलोत राणा वॉन दसन मुंड रसना दासी
निसा साइलेंट आइज़ आर डेड शाह प्रतापसी
हिंदी भाई ट्रांसलेशन
हे राणा प्रताप सिंह इन गहलोत!
तुम्हारी मौत पर बादशाह अकबर ने दांतों तले जीभ दबाई और आंखों से आंसू बह निकले।
क्योंकि तुमने कभी अपने घोड़ों पर दाग नहीं लगने दिया,
तुमने कभी किसी के सामने अपनी पगड़ी नहीं झुकाई।
भले ही तुमने अपना राज खो दिया,
लेकिन तुमने हमेशा अपने कंधों पर आत्म-सम्मान का भार उठाया।
तुम कभी नवरोज नहीं गए, न ही शाही कैंप में खड़े हुए।
कभी खिड़की के नीचे सिर नहीं झुकाया।
तो इतिहास गवाह है—
तुम हर तरह से जीते, और राजा हार गया। अपनी मातृभूमि की आज़ादी के लिए जान देने वाले
वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप
और उनके अपने भक्त घोड़ा चेतक
आपको शत-शत नमन।
🚩🇮🇳
 से साभार उद्धृत
*Asweekran DISCLAIMER*

*उपरोक्त प्रकाशित लेख सामग्री फोटोज सभी सोशल मीडिया पर उपलब्ध हैं केवल साभार संकलित किये है ताकि एक साथ सभी आवश्यक सूचनाएं संग्रहित होकर आप तक पहुंचे इसमें  सबका आभार ,ब्लॉग लेखक की कोई संपति सामग्री नहीं है ।पाठकों का आभार जनजन तक पहुंचाए । उचित लगे जय महाराणा लिखे कमेंट में टिप्पणी अवश्य दे। धन्यवाद
जय राजपूताना अखंड राजपूताना जय महाराणा।



*गिरा जहां पर खून वहां का , पत्थर पत्थर जिंदा है ।*
*जिस्म नही है मगर नाम का ,अक्षर अक्षर जिंदा है ।।*

*जीवन मे यह अमर कहानी , अक्षर अक्षर गढ़ लेना ।*
*शौर्य कभी सो जाएं तो ,राणा प्रताप को पढ़ लेना ।।*

*देश के इतिहास में त्याग बलिदान और वीरता की सबसे मिसाल महान सपूत और वीर योद्धा महाराणा प्रताप को उनकी पुण्यतिथि पर शत-शत नमन।*

 *उनकी जीवन-गाथा साहस, शौर्य, स्वाभिमान और पराक्रम का प्रतीक है, जिससे देशवासियों को सदा राष्ट्रभक्ति की प्रेरणा मिलती रहेगी*

Friday, 16 January 2026

सहारनपुर , का नाम क्षत्रिय राजा सहारण वीर सिंह के नाम पर प्रचलित हुआ । SAHARANPUR NAGAR NAME

*ऐतिहासिक नगर सहारनपुर के नामकरण को बिलखते शब्द ,बिखरा अतीत और थिरकता इतिहास*

* *एक विचारणीय प्रश्न*

*सहारनपुर के नामकरण को प्रमाणिकता देने के लिए त्रिलोचंदी बैंस राजपूतों का एक ऐतिहासिक लेख प्रस्तुत है,जिसके अनुसार सहारनपुर को बसाने नाम सहारनपुर देने वाले विस्तार देने वाले क्षत्रिय ही थे सूर्य वंशी बैंस राजपूतों के वंशधर त्रिलोक बैंस के वंश त्रिलोकचंदी बैंस सहारण वीर सिंह (सहारन एक क्षत्रिय सूर्य वंशी राजपूतों का गोत्र है)//सहारन वीर सिंह जिन्होंने बाद में जैन धर्म स्वीकार किया ,व्यापार किया तथा नगर की भव्य स्थापना कर विस्तार किया एक नव निर्माण किया इन क्षत्रियों ने आज वैश्य जैन त्रिलोकचंदी सहारनपुर में विराजमान है जिनका संगठन आज भी राजा त्रिलोक चंद बैंस की याद ताज़ा कराता है*
*पुर तथा खंड शब्द हिंदी संस्कृत प्राकृत भाषा में है,जिन शब्दों का प्रयोग वैदिक कालीन क्षत्रिय सभ्यता स्थापत्य से ही किया जाता रहा यही सनातन परंपरा है,जैसे भरत खंड,आदि और पुर का अर्थ नगर स्थापित करने से होता है*
*इसी कारण पुर अन्त्यांतक शब्द सनातन है और क्षत्रिय संस्कृति है जैसे सहारण से सहारनपुर ,शाह हारून के साथ पुर नहीं जोड़ा जा सकता किसी भी भाषा या व्याकरण की दृष्टि से( यह तुष्टिकरित मनघड़ंत और कुर्ताकिक लगता है)अब*
*पूरा लेख ध्यान पूर्वक पढ़ें जिससे सहारनपुर के नामकरण में फैला भ्रम दूर हो जाएगा*
*सहारन गोत्र क्षत्रिय गोत्र भी है जो सूर्य वंश की शाखा है,सहारण गोत्र बैंस वंशी क्षत्रियों में भी है*
*सहारन गोत्र रोहिलखंड के रोहिला राजपूतों व अन्य क्षत्रियों में भी पाया जाता है*
*त्रिलोक चंद बैंस क्षत्रिय के वंशज ही जैन धर्म स्वीकार करने के बाद त्रिलोकचंदी जैन कहे गए*
*जानिए ऐतिहासिक प्रमाण*

मित्रों आज हम आपको मध्य और पूर्वी उत्तर प्रदेश के बहुत सशक्त राजपूत वंश बैस क्षत्रियों के बारे में जानकारी देंगे, कृपया शेयर जरूर करें। 

बैस राजपूतो के गोत्र,प्रवर,आदि -

*वंश-बैंस सूर्यवंशी क्षत्रिय कुल है।हालाँकि कुछ विद्वान इन्हें नागवंशी भी बताते हैं।*

गोत्र-भारद्वाज है
प्रवर-तीन है : भारद्वाज ; बार्हस्पत्य और अंगिरस
वेद-यजुर्वेद 
कुलदेवी-कालिका माता
इष्ट देव-शिव जी 
ध्वज-आसमानी और नाग चिन्ह 
वंश नाम उचारण---
BAIS RAJPUT
Bhais Rajput
Bhains Rajput
Bhainse Rajput
Bains Rajput
Bens Rajput
Bhens Rajput
Bhense Rajput
Baise Rajput
Bes Rajput
Bayas Rajput
Vais Rajput

प्रसिद्ध बैस व्यक्तित्व---

शालिवाहन,हर्षवर्धन,त्रिलोकचंद,सुहेलदेव,अभयचंद,
राणा बेनीमाधवबख्श सिंह,मेजर ध्यानचंद आदि 

शाखाएँ---

कोट बहार बैस,कठ बैस,डोडिया बैस,त्रिलोकचंदी(राव,राजा,नैथम,सैनवासी) बैस,प्रतिष्ठानपुरी बैस,रावत,कुम्भी,नरवरिया,भाले सुल्तान,चंदोसिया,आदि

प्राचीन एवं वर्तमान राज्य और ठिकाने---

प्रतिष्ठानपुरी,स्यालकोट,स्थानेश्वर, मुंगीपट्टम्म,कन्नौज,बैसवाडा, कस्मांदा, बसन्तपुर, खजूरगाँव थालराई ,कुर्रिसुदौली, देवगांव,मुरारमउ, गौंडा, थानगाँव,कटधर आदि 

परम्पराएँ---

*बैस राजपूत नागो को नहीं मारते* हैं,नागपूजा का इनके लिए विशेष महत्व है,इनमे ज्येष्ठ भ्राता को टिकायत कहा जाता था,और सम्पत्ति का बड़ा हिस्सा आजादी से पहले तक उसे ही मिलता था। मुख्य गढ़ी में टिकायत परिवार ही रहता था और शेष भाई अलग किला/मकान बनाकर रहते थे। बैस राजपूतो में आपसी भाईचारा बहुत ज्यादा होता है। बिहार के सोनपुर का पशु मेला बैस राजपूतों ने ही प्रारम्भ किया था।

वर्तमान निवास---

यूपी के अवध में स्थित बैसवाडा, मैनपुरी, एटा, बदायूं, कानपूर,इलाहबाद,बनारस,आजमगढ़,बलिया,बाँदा, हमीरपुर,प्रतापगढ़,सीतापुर,रायबरेली,उन्नाव,लखनऊ,हरदोई,फतेहपुर,गोरखपुर,बस्ती,मिर्जापुर,गाजीपुर,गोंडा,बहराइच,बाराबंकी,बिहार,पंजाब,पाक अधिकृत कश्मीर,पाकिस्तान में बड़ी आबादी है और मध्य प्रदेश और राजस्थान के कुछ हिस्सों में भी थोड़ी आबादी है।

-बैस क्षत्रियों कि उत्पत्ति---

बैस राजपूतों कि उतपत्ति के बारे में कई मत प्रचलित हैं---

1-ठाकुर ईश्वर सिंह मढ़ाड कृत राजपूत वंशावली के पृष्ठ संख्या 112-114 के अनुसार सूर्यवंशी राजा वासु जो बसाति जनपद के राजा थे, उनके वंशज बैस राजपूत कहलाते हैं। बसाति जनपद का अस्तित्व महाभारत काल तक रहा है।

2-देवी सिंह मंडावा कृत राजपूत शाखाओं का इतिहास के पृष्ठ संख्या 67-74 के अनुसार वैशाली से निकास के कारण ही यह वंश वैस या बैस या वैश कहलाया,इनके अनुसार बैस सूर्यवंशी हैं। इनके किसी पूर्वज ने किसी नागवंशी राजा कि सहायता से उन्नति कि,इसीलिए बैस राजपूत नाग पूजा करते हैं और इनका चिन्ह भी नाग है। 

3-महाकवि बाणभट ने सम्राट हर्षवर्धन जो कि बैस क्षत्रिय थे उनकी बहन राज्यश्री और कन्नौज के मौखरी(मखवान,झाला) वंशी महाराजा गृहवर्मा के विवाह को सूर्य और चन्द्र वंश का मिलन बताया है,मौखरी चंद्रवंशी थे अत: बैस सूर्यवंशी सिद्ध होते हैं।

*4-महान इतिहासकार गौरिशंकर ओझा जी कृत राजपूताने का इतिहास के पृष्ठ संख्या 154-162 में भी बैस राजपूतों को सूर्यवंशी सिद्ध किया गया है*।

5-श्री रघुनाथ सिंह कालीपहाड़ी कृत क्षत्रिय राजवंश के अनुसार भी बैस सूर्यवंशी क्षत्रिय हैं।

6-डा देवीलाल पालीवाल कि कर्नल जेम्स टॉड कृत राजपूत जातियों का इतिहास के प्रष्ठ संख्या 182 के अनुसार भी बैस सूर्यवंशी क्षत्रिय हैं।

7-ठाकुर बहादुर सिंह बीदासर कृत क्षत्रिय वंशावली एवं जाति भास्कर में बैस वंश को स्पष्ट सूर्यवंशी बताया गया है।

8-इनके झंडे में नाग का चिन्ह होने के कारण कई विद्वान इन्हें *नागवंशी मानते हैं*। लक्ष्मण को शेषनाग का अवतार भी माना जाता है,*अत: कुछ विद्वान बैस राजपूतो को लक्ष्मण का वंशज और नागवंशी मानते हैं।* कुछ विद्वानों के अनुसार भरत के पुत्र तक्ष से तक्षक नागवंश चला जिसने तक्षिला कि स्थापना की,बाद में *तक्षक नाग के वंशज* वैशाली आये और उन्ही से बैस राजपूत शाखा प्रारम्भ हुई।

*9-कुछ विद्वानों के अनुसार बैस राजपूतों के आदि पुरुष शालिवाहन के पुत्र का नाम सुन्दरभान या वयस कुमार था जिससे यह वंश वैस या बैस कहलाया,जिन्होंने सहारनपुर कि स्थापना की।*

10-कुछ विद्वानों के अनुसार गौतम राजा धीर सिंह पुंडीर ने 12 वी सदी के अंत में राजा अभयचन्द्र को 22 परगने दहेज़ में दिए इन बाईस परगनों के कारण यह वंश बाईसा या बैस कहलाने लगा।

11-कुछ विद्वान इन्हें गौतमी पुत्र शातकर्णी जिन्हें शालिवाहन भी कहा जाता है उनका वंशज मानते हैं, वहीं कुछ के अनुसार बैस शब्द का अर्थ है वो क्षत्रिय जिन्होंने बहुत सारी भूमि अपने अधिकार में ले ली हो।

----बैस वंश कि उत्पत्ति के सभी मतों का विश्लेष्ण एवं निष्कर्ष----

*बैस राजपूत नाग कि पूजा करते हैं* और इनके झंडे में नाग चिन्ह होने का यह अर्थ नहीं है कि *बैस नागवंशी हैं*। महाकवि बाणभट ने सम्राट हर्षवर्धन जो कि बैस क्षत्रिय थे उनकी बहन राज्यश्री और कन्नौज के मौखरी(मखवान,झाला) वंशी महाराजा गृहवर्मा के विवाह को सूर्य और चन्द्र वंश का मिलन बताया है,मौखरी चंद्रवंशी थे अत: बैस सूर्यवंशी सिद्ध होते हैं।

लक्ष्मण जी को शेषनाग का अवतार माना जाता है किन्तु लक्ष्मन जी नागवंशी नहीं रघुवंशी ही थे और उनके वंशज आज के प्रतिहार(परिहार) और मल्ल राजपूत है।

जिन विद्वानों ने 12 वी सदी में धीर सिंह पुंडीर को अर्गल का गौतमवंशी राजा लिख दिया और उनके द्वारा दहेज में अभयचन्द्र को 22 परगने दहेज़ में देने से बैस नामकरण होने का अनुमान किया है वो बिलकुल गलत है,क्योंकि धीरपुंडीर गौतम वंशी नहीं पुंडीर क्षत्रिय थे जो उस समय हरिद्वार के राजा थे,बाणभट और चीनी यात्री ह्वेंस्वांग ने सातवी सदी में सम्राट हर्ष को स्पष्ट रूप से बैस या वैश वंशी कहा है तो 12 वी सदी में बैस वंशनाम कि उतपत्ति का सवाल ही नहीं है,किन्तु यहाँ एक प्रश्न उठता है कि *अगर बैस वंश कि मान्यताओं के अनुसार शालिवाहन के वंशज वयस कुमार या सुंदरभान सहारनपुर आये थे तो उनके वंशज कहाँ गए?*

*बैस वंश कि एक शाखा त्रिलोकचंदी है और सहारनपुर के वैश्य जैन समुदाय कि भी एक शाखा त्रिलोकचंदी है इन्ही जैनियो के एक व्यक्ति राजा साहरनवीर सिंह ने अकबर के समय सहारनपुर नगर बसाया था*,आज के सहारनपुर,हरिद्वार का क्षेत्र उस समय हरिद्वार के पुंडीर शासको के नियन्त्रण में था तो हो सकता है शालिवाहन के जो वंशज इस क्षेत्र में आये होंगे उन्हें राजा धीर पुंडीर ने दहेज़ में सहारनपुर के कुछ परगने दिए हों और बाद में ये *त्रिलोकचंदी बैस राजपूत ही जैन धर्म ग्रहण करके व्यापारी हो जाने के कारण वैश्य बन गए हों और इन्ही त्रिलोकचंदी जैनियों के वंशज राजा साहरनवीर ने अकबर के समय सहारनपुर नगर कि स्थापना कि हो, और बाद में इन सभी मान्यताओं में घालमेल हो गया हो।* अर्गल के गौतम राजा अलग थे उन्होंने वर्तमान बैसवारे का इलाका हर्षवर्धन के वंशज बैस वंशी राजा अभयचन्द्र को दहेज़ में दिया था।

गौतमी पुत्र शातकर्णी को कुछ विद्वान बैस वंशावली के शालिवाहन से जोड़ते हैं किन्तु नासिक शिलालेख में गौतमी पुत्र श्री शातकर्णी को एक ब्राह्मण (अद्वितिय ब्राह्मण) तथा खतिय-दप-मान-मदन अर्थात क्षत्रियों का मान मर्दन करने वाला आदि उपाधियों से सुशेभित किया है। इसी शिलालेख के लेखक ने गौतमीपुत्र की तुलना परशुराम से की है। साथ ही दात्रीशतपुतलिका में भी शालीवाहनों को मिश्रित ब्राह्मण जाति तथा नागजाति से उत्पन्न माना गया है।अत:गौतमीपुत्र शातकर्णी अथवा शालिवाहन को बैस वंशी शालिवाहन से जोड़ना उचित प्रतीत नहीं होता क्योंकि बैसवंशी सूर्यवंशी क्षत्रिय हैं।

उपरोक्त सभी मतो का अधयन्न करने पर हमारा निष्कर्ष है कि बैस राजपूत सूर्यवंशी हैं। प्राचीन काल में सूर्यवंशी इक्ष्वाकु वंशी राजा विशाल ने वैशाली राज्य कि स्थापना कि थी,विशाल का एक पुत्र लिच्छवी था यहीं से सुर्यवंश कि लिच्छवी, शाक्य(गौतम), मोरिय(मौर्य), कुशवाहा(कछवाहा) ,बैस शाखाएँ अलग हुई।

जब मगध के राजा ने वैशाली पर अधिकार कर लिया और मगध में शूद्र नन्दवंश का शासन स्थापित हो गया और उसने क्षत्रियों पर जुल्म करने शुरू कर दिए तो वैशाली से सूर्यवंशी क्षत्रिय पंजाब,तक्षिला,महाराष्ट्र,स्थानेश्वर,दिल्ली आदि में आ बसे। दिल्ली क्षेत्र पर भी कुछ समय बैस वंशियों ने शासन किया और एक शाखा पंजाब में भी आ बसी। इन्होंने पंजाब में एक नगर श्री कंठ पर अधिकार किया, जिसका नाम आगे चलकर थानेश्वर हुआ।

*दिल्ली क्षेत्र थानेश्वर के नजदीक है अत:दिल्ली शाखा,थानेश्वर शाखा,सहारनपुर शाखा का आपस में जरुर सम्बन्ध होगा।*
*(एक किंवदंती तथा क्षत्रिय वंश भास्कर के अनुसार थानेश्वर के सहारण तक्षक वंशी राजा पर फिरोज तुगलक ने भारी सेना लेकर आक्रमण किया तथा,जबरदस्ती राजा स्थानेश्वर सहारन की बहिन का अपहरण कर राजा को इस्लाम ग्रहण कराया तथा घोड़े के पीछे बांध कर ले भागा रास्ते में बस्तियों को रौंदता हुआ यमुनापार कर रोहिलखंड की ओर बढ़ा तथा श्रुघ्न जनपद में बहते बाबा हरनंद(आज की हिंडन नदी) के जंगलों की दलदल में फैंक दिया, और आक्रमणकारी गंगापार करने को हरिद्वार की तरफ चला गया राजा दुख सहन नहीं कर सका वह सूफी संत बन गया तथा सूंघनानपुर के जंगल में ही रहा)*

*बैसवंशी सम्राट हर्षवर्धन अपनी राजधानी थानेश्वर से हटाकर कन्नौज ले गए।* हर्षवर्धन ने अपने राज्य का विस्तार बंगाल,असम,पंजाब,राजपूताने,मालवा,नेपाल तक किया और स्वयं राजपुत्र शिलादित्य कि उपाधि धारण की।

हर्षवर्द्धन के पश्चात् इस वंश का शासन समाप्त हो गया और इनके वंशज कन्नौज से आगे बढकर अवध तथा रोहिलखंड के क्षेत्र में फ़ैल गए। *इन्ही में आगे चलकर त्रिलोकचंद नाम के प्रसिद्ध व्यक्ति हुए इनसे बैस वंश कि कई शाखाएँ चली।* इनके बड़े पुत्र बिडारदेव के वंशज भालेसुल्तान वंश के बैस हुए जिन्होंने सुल्तानपुर कि स्थापना की। इन्ही बिडारदेव के वंशज राजा सुहेलदेव हुए जिन्होंने महमूद गजनवी के भतीजे सैय्यद सलार मसूद गाजी को बहराइच के युद्ध में उसकी सेना सहित मौत के घाट उतार दिया था और खुद भी शहीद हो गए थे।

चंदावर के युद्ध में हर्षवर्धन के वंशज केशवदेव भी जयचंद के साथ युद्ध लड़ते हुए शहीद हो गए, बाद में उनके वंशज अभयचंद ने अर्गल के गौतम राजा कि पत्नी को तुर्कों से बचाया जिसके कारण गौतम राजा ने अभयचंद से अपनी पुत्री का विवाह कर उसे 1440 गाँव दहेज़ में दे दिए जिसमें विद्रोही भर जाति का दमन कर अभयचंद ने बैस राज्य कि नीव रखी जिसे आज बैसवाड़ा या बैसवारा कहा जाता है। इस प्रकार सूर्यवंशी बैस राजपूत आर्यावृत के एक बड़े भू भाग में फ़ैल गए।

----बैसवंशी राजपूतों का सम्राट हर्षवर्धन से पूर्व का इतिहास

बैस राजपूत मानते हैं कि उनका राज्य पहले मुर्गीपाटन पर था और जब इस पर शत्रु ने अधिकार कर लिया तो ये प्रतिष्ठानपुर आ गए,वहां इस वंश में राजा शालिवाहन हुए,जिन्होंने विक्रमादित्य को हराया और शक सम्वत इन्होने ही चलाया,कुछ ने गौतमी पुत्र शातकर्णी को शालिवाहन मानकर उन्हें बैस वंशावली का शालिवाहन बताया है,और पैठण को प्रतिष्ठानपुर बताया और कुछ ने स्यालकोट को प्रतिष्ठानपुर बताया है, किन्तु यह मत सही प्रतीत नहीं होते। कई वंशो बाद के इतिहास में यह गलतियाँ कि गई कि उसी नाम के किसी प्रसिद्ध व्यक्ति को यह सम्मान देने लग गए,शालिवाहन नाम के इतिहास में कई अलग अलग वंशो में प्रसिद्ध व्यक्ति हुए हैं। भाटी वंश में भी शालिवाहन हुए हैं और सातवाहन वंशी गौतमीपुत्र शातकर्णी को भी शालिवाहन कहा जाता था।

विक्रमादित्य के विक्रम सम्वत और शालिवाहन के शक सम्वत में पूरे 135 वर्ष का फासला है अत:ये दोनों समकालीन नहीं हो सकते। दक्षिण के गौतमीपुत्र शातकर्णी को नासिक शिलालेख में स्पष्ट:ब्राह्मण लिखा है अत:इसका सूर्यवंशी बैस वंश से सम्बन्ध होना संभव नहीं है।
वस्तुत: बैस इतिहास का प्रतिष्ठानपुर न तो दक्षिण का पैठण है और न ही पंजाब का स्यालकोट है यह प्रतिष्ठानपुर इलाहबाद(प्रयाग) के निकट और झूंसी के पास था। 

किन्तु इतना अवश्य है कि बैस वंश में शालिवाहन नाम के एक प्रसिद्ध राजा अवश्य हुए जिन्होंने प्रतिष्ठानपूरी में एक बड़ा बैस राज्य स्थापित किया। शालिवाहन कई राज्यों को जीतकर उनकी कन्याओं को अपने महल में ले आये,जिससे उनकी पहली तीन क्षत्राणी रानियाँ खिन्न होकर अपने पिता के घर चली गयी। इन तीन रानियों के वंशज बाद में भी बैस कहलाते रहे और बाद कि रानियों के वंशज कठबैस कहलाये, ये प्रतिष्ठानपुर(प्रयाग)के शासक थे।

इन्ही शालिवाहन के वंशज त्रिलोकचंद बैस ने दिल्ली(उस समय कुछ और नाम होगा) पर अधिकार कर लिया। स्वामी दयानंद सरस्वती के अनुसार दिल्ली पर सन 404 ईस्वी में राजा मुलखचंद उर्फ़ त्रिलोकचंद प्रथम ने विक्रमपाल को हराकर शासन स्थापित किया। इसके बाद विक्र्मचन्द, कर्तिकचंद, रामचंद्र, अधरचन्द्र, कल्याणचन्द्र, भीमचंद्र, बोधचन्द्र, गोविन्दचन्द्र और प्रेमो देवी ने दो सो से अधिक वर्ष तक शासन किया। वस्तुत ये दिल्ली के बैस शासक स्वतंत्र न होकर गुप्त वंश और बाद में हर्षवर्धन बैस के सामंत के रूप में यहाँ पर होंगे। इसके बाद यह वंश दिल्ली से समाप्त हो गया,और सातवी सदी के बाद में पांडववंशी अर्जुनायन तंवर क्षत्रियों(अनंगपाल प्रथम) ने प्राचीन इन्द्रप्रस्थ के स्थान पर दिल्ली कि स्थापना की।

वस्तुत:बैसवारा ही बैस राज्य था।(देवी सिंह मंडावा कृत राजपूत शाखाओं का इतिहास पृष्ठ संख्या 70,एवं ईश्वर सिंह मढ़ाड कृत राजपूत वंशावली पृष्ठ संख्या 113,114)

---बैस वंश कि शाखाएँ---

कोट बाहर बैस---शालिवाहन कि जो रानियाँ अपने पीहर चली गयी उनकी संतान कोट बाहर बैस कहलाती है।
कठ बैस---शालिवाहन कि जो जीती हुई रानियाँ बाद में महल में आई उनकी संतान कोट बैस या कठ बैस कहलाती हैं।
डोडिया बैस---डोडिया खेडा में रहने के कारण राज्य हल्दौर जिला बिजनौर। 
त्रिलोकचंदी बैस---त्रिलोकचंद के वंशज इनकी चार उपशाखाएँ हैं राव,राजा,नैथम,सैनवासी।
प्रतिष्ठानपुरी बैस---प्रतिष्ठानपुर में रहने के कारण।
चंदोसिया---ठाकुर उदय बुधसिंह बैस्वाड़े से सुल्तानपुर के चंदोर में बसे थे उनकी संतान चंदोसिया बैस कहलाती है।

रावत--फतेहपुर,उन्नाव में 
भाले सुल्तान--ये भाले से लड़ने में माहिर थे। मसूद गाजी को मारने वाले सुहेलदेव बैस संभवत: इसी वंश के थे,रायबरेली,लखनऊ,उन्नाव में मिलते हैँ।
कुम्भी एवं नरवरिया--बैसवारा में मिलते हैं।

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--बैसवंशी राजपूतो कि वर्तमान स्थिति---

*बैस राजपूत वंश वर्तमान में भी बहुत ससक्त वंश माना जाता है। ब्रिटिश गजेटियर में भी इस वंश कि सम्पन्नता और कुलीनता के बारे में विस्तार से लिखा गया है।* अवध,पूर्वी उत्तरप्रदेश के बैसवारा में बहुत से बड़े जमीदार बैस वंश से थे। बैस वंशी राणा बेनीमाधव सिंह, रामबक्श सिंह और दूसरे बैस जमीदारों ने सन 1857 इसवी में अवध क्षेत्र में अंग्रेजो से जमकर लोहा लिया था। विद्रोही सिपाहियो में सबसे बड़ी संख्या अवध के बैसवाड़े की ही थी। बैस राजपूतों द्वारा अंग्रेजो का जोरदार विरोध करने के बावजूद अंग्रेजो कि हिम्मत इनकी जमिदारियां खत्म करने कि नहीं हुई। बैस राजपूत अपने इलाको के सरताज माने जाते हैं और सबसे महंगे सलीकेदार वस्त्र धारण करने से इनकी अलग ही पहचान हो जाती थी। अंग्रेजी ज़माने से ही इनके पक्के ऊँचे आवास इनकी अलग पहचान कराते थे,इनके बारे में अंग्रेजो ने लिखा है कि- 

"The Bais Rajput became so rich at a time it is recorded that each Bais Rajput held Lakhs (Hundreds of thousands) of rupees a piece which could buy them nearly anything. To hold this amount of money you would have to have been extremely rich.
This wealth caused the Bais Rajput to become the "best dressed and housed people"[22] in the areas they resided. This had an influence on the areas of Baiswara and beyond as recorded the whole area between Baiswara and Fyzabad was"

जमीदारी के अतिरिक्त बैस राजपूत राजनीती और व्यापार के क्षेत्र में भी कीर्तिमान बना रहे हैं। कई बड़े व्यापारी और राजनेता भारत और पाकिस्तान में बैस बंश से हैं जो विदेशो में भी व्यापार कर रहे हैं। राजनीती और व्यापार के अतिरिक्त खेलो कि दुनियां में मेजर ध्यानचंद जैसे महान हॉकी खिलाडी,उनके भाई कैप्टन रूप सिंह आदि बड़े खिलाडी बैस वंश में पैदा हुए हैं। कई प्रशासनिक अधिकारी,सैन्य अधिकारी बैस वंश का नाम रोशन कर रहे हैं। 

वस्तुत: जिस सूर्यवंशी बैस वंश में शालिवाहन,हर्षवर्धन,त्रिलोकचंद,सुहेलदेव,अभयचंद, राणा बेनीमाधवबख्श सिंह,मेजर ध्यानचंद आदि महान व्यक्तित्व हुए हैं उन्ही के वंशज भारत,पाकिस्तान,पाक अधिकृत कश्मीर,कनाडा,यूरोप में बसा हुआ बैस राजपूत वंश आज भी पूरे परिश्रम,योग्यता से अपनी सम्पन्नता और प्रभुत्व समाज में कायम किये हुए है और अपने पूर्वजो कि गौरवशाली परम्परा का पालन कर रहा है।
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*"सरलता" परम सौंदर्य है।* 
*"सत्यता" अनमोल संस्कार है।*
*"क्षमा" परम बल है।*
*"विनम्रता" सर्वोच्च गुण है और*
*"अपनापन" सर्वोत्तम संबंध है।*


*🙏 महाराज अग्रसेन जी ने नाग देवता को “मामा” क्यों कहा? 🐍*
*यह प्रसंग श्रद्धा, लोक-परंपरा और सम्मान से जुड़ा हुआ है।*
*मान्यता के अनुसार कथा —*
*महाराज अग्रसेन जी के वंश की* *कुलदेवी नागवंशी परंपरा से जुड़ी मानी जाती हैं।*
*नाग देवता को रक्षक, कुलदेव और मार्गदर्शक के रूप में पूजा जाता था।*
*भारतीय परंपरा में— 👉 माता पक्ष के देवता या रक्षक को “मामा” कहा जाता है*

*महाराजा अग्रसेन का विवाह रानी माधवी से हुआ था।*
*इस विवाह से जुड़े कुछ प्रमुख और रोचक तथ्य यहाँ दिए गए हैं:*
*नागवंश और सूर्यवंश का मिलन: रानी माधवी नागराज कुमुद की कन्या थीं। महाराजा अग्रसेन सूर्यवंशी क्षत्रिय थे* *और रानी* *माधवी नागवंशी थीं। इस विवाह को दो अलग-अलग कुलों और संस्कृतियों के मिलन के रूप में देखा जाता है।*

*👉 जो सदा संरक्षण और आशीर्वाद देता है*
*इसी कारण महाराज अग्रसेन जी ने*
*🐍 नाग देवता को आदरपूर्वक “मामा” कहा*
*त्रिलोकचंदी जैन*

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Thursday, 15 January 2026

सिकंदर को धूल चटाने वाली रोहिला क्षत्रियो के काठ गणराज्य की राजकुमारी भारत की प्रथम नारी सेना की संस्थापक वीरांगना कार्विका उर्फ कर्णिका

#ऐतिहासिक_तथ्य_सिकन्दर_की_पराजय

 सिकंदर को हराने वाली कठगणराज्य की राजकुमारी कार्विका के बारे में जानिये सच।
राजकुमारी कार्विका सिंधु नदी के उत्तर में कठगणराज्य की राज्य की राजकुमारी थी । राजकुमारी कार्विका बहुत ही कुशल योद्धा थी। रणनीति और दुश्मनों के युद्ध चक्रव्यूह को तोड़ने में पारंगत थी। राजकुमारी कार्विका ने अपने बचपन की सहेलियों के साथ फ़ौज बनाई थी। इनका बचपन के खेल में भी शत्रुओं से देश को मुक्त करवाना और फिर शत्रुओं को दण्ड प्रदान करना यही सब होते थे। राजकुमारी में वीरता और देशभक्ति बचपन से ही थी। जिस उम्र में लड़कियाँ गुड्डे गुड्डी का शादी रचना इत्यादि खेल खेलते थे उस उम्र में कार्विका राजकुमारी को शत्रु सेना का दमन कर के देश को मुक्त करवाना शिकार करना इत्यादि ऐसे खेल खेलना पसंद थे। राजकुमारी धनुर्विद्या के सारे कलाओं में निपुर्ण थी , तलवारबाजी जब करने उतरती थी दोनों हाथो में तलवार लिये लड़ती थी और एक तलवार कमर पे लटकी हुई रहती थी। अपने गुरु से जीत कर राजकुमारी कार्विका ने सबसे सुरवीर शिष्यों में अपना नामदर्ज करवा लिया था। दोनों हाथो में तलवार लिए जब अभ्यास करने उतरती थी साक्षात् माँ काली का स्वरुप लगती थी। भाला फेकने में अचूक निसाँचि थी , राजकुमारी कार्विका गुरुकुल शिक्षा पूर्ण कर के एक निर्भीक और शूरवीरों के शूरवीर बन कर लौटी अपने राज्य में।

 कुछ साल बीतने के साथ साथ यह ख़बर मिला राजदरबार से सिकंदर लूटपाट करते हुए कठगणराज्य की और बढ़ रहा हैं भयंकर तबाही मचाते हुए सिकंदर की सेना नारियों के साथ दुष्कर्म करते हुए हर राज्य को लूटते हुए आगे बढ़ रही थी, इसी खबर के साथ वह अपनी महिला सेना जिसका नाम राजकुमारी कार्विका ने चंडी सेना रखी थी जो कि ८००० से ८५०० नारियों की सेना थी। कठगणराज्य की यह इतिहास की पहली सेना रही जिसमे महज ८००० से ८५०० विदुषी नारियाँ थी। कठगणराज्य जो की एक छोटी सा राज्य था। इसलिए अत्यधिक सैन्यबल की इस राज्य को कभी आवस्यकता ही नहीं पड़ी थी।

 ३२५(इ.पूर्व) में सिकन्दर के अचानक आक्रमण से राज्य को थोडा बहुत नुक्सान हुआ पर राजकुमारी कार्विका पहली योद्धा थी जिन्होंने सिकंदर से युद्ध किया था। सिकन्दर की सेना लगभग १,५०,००० थी और कठगणराज्य की राजकुमारी कार्विका के साथ आठ हज़ार वीरांगनाओं की सेना थी यह एक ऐतिहासिक लड़ाई थी जिसमे कोई पुरुष नहीं था सेना में सिर्फ विदुषी वीरांगनाएँ थी। राजकुमारी और उनकी सेना अदम्य वीरता का परिचय देते हुए सिकंदर की सेना पर टूट पड़ी, युद्धनीति बनाने में जो कुशल होता हैं युद्ध में जीत उसी की होती हैं रण कौशल का परिचय देते हुए राजकुमारी ने सिकंदर से युद्ध की थी।

सिकंदर ने पहले सोचा "सिर्फ नारी की फ़ौज है मुट्ठीभर सैनिक काफी होंगे” पहले २५००० की सेना का दस्ता भेजा गया उनमे से एक भी ज़िन्दा वापस नहीं आ पाया , और राजकुमारी कार्विका की सेना को मानो स्वयं माँ भवानी का वरदान प्राप्त हुआ हो बिना रुके देखते ही देखते सिकंदर की २५,००० सेना दस्ता को गाजर मूली की तरह काटती चली गयी। राजकुमारी की सेना में ५० से भी कम वीरांगनाएँ घायल हुई थी पर मृत्यु किसी को छु भी नहीं पायी थी। सिकंदर की सेना में शायद ही कोई ज़िन्दा वापस लौट पाया थे।
दूसरी युद्धनीति के अनुसार अब सिकंदर ने ४०,००० का दूसरा दस्ता भेजा उत्तर पूरब पश्चिम तीनों और से घेराबन्दी बना दिया परंतु राजकुमारी सिकंदर जैसा कायर नहीं थी खुद सैन्यसंचालन कर रही थी उनके निर्देशानुसार सेना तीन भागो में बंट कर लड़ाई किया राजकुमारी के हाथों बुरी तरह से पस्त हो गयी सिकंदर की सेना।

तीसरी और अंतिम ८५,०००० दस्ताँ का मोर्चा लिए खुद सिकंदर आया सिकंदर के सेना में मार काट मचा दिया नंगी तलवार लिये राजकुमारी कार्विका ने अपनी सेना के साथ सिकंदर को अपनी सेना लेकर सिंध के पार भागने पर मजबूर कर दिया इतनी भयंकर तवाही से पूरी तरह से डर कर सैन्य के साथ पीछे हटने पर सिकंदर मजबूर होगया। इस महाप्रलयंकारी अंतिम युद्ध में कठगणराज्य के ८,५०० में से २७५० साहसी वीरांगनाओं ने भारत माता को अपना रक्ताभिषेक चढ़ा कर वीरगति को प्राप्त कर लिया जिसमे से नाम कुछ ही मिलते हैं। इतिहास के दस्ताबेजों में गरिण्या, मृदुला, सौरायमिनि, जया यह कुछ नाम मिलते हैं। इस युद्ध में जिन्होंने प्राणों की बलिदानी देकर सिकंदर को सिंध के पार खदेड़ दिया था। सिकंदर की १,५०,००० की सेना में से २५,००० के लगभग सेना शेष बची थी , हार मान कर प्राणों की भीख मांग लिया और कठगणराज्य में दोबारा आक्रमण नहीं करने का लिखित संधी पत्र दिया राजकुमारी कार्विका को ।

संदर्व-:
१) कुछ दस्ताबेज से लिया गया हैं पुराणी लेख नामक दस्ताबेज
२) राय चौधरी- 'पोलिटिकल हिस्ट्री आव एशेंट इंडिया'- पृ. 220)
३) ग्रीस के दस्ताबेज मसेडोनिया का इतिहास ,
Hellenistic Babylon नामक दस्ताबेज में इस युद्ध की जिक्र किया गया हैं।
राजकुमारी कार्विका की समूल इतिहास को नष्ठ कर दिया गया था। इस वीरांगना के इतिहास को बहुत ढूंढने पर केवल दो ही जगह पर दो ही पन्नों में ही खत्म कर दिया गया था। यह पहली योद्धा थी जिन्होंने सिकंदर को परास्त किया था ३२५(ई.पूर्व) में। समय के साथ साथ इन इतिहासों को नष्ठ कर दिया गया था और भारत का इतिहास वामपंथी और इक्कसवीं सदी के नवीनतम इतिहासकार जैसे रोमिला थाप्पर और भी बहुत सारे इतिहासकार ने भारतीय वीरांगनाओं के नाम कोई दस्तावेज़ नहीं लिखा था।
यह भी कह सकते हैं भारतीय नारियों को राजनीति से दूर करने के लिए सनातन धर्म में नारियों को हमेशा घूँघट धारी और अबला दिखाया हैं। इतिहासकारों ने भारत को ऋषिमुनि का एवं सनातन धर्म को पुरुषप्रधान एवं नारी विरोधी संकुचित विचारधारा वाला धर्म साबित करने के लिये इन इतिहासो को मिटा दिया था। इन वामपंथी और खान्ग्रेस्सी इतिहासकारो का बस चलता तो रानी लक्ष्मीबाई का भी इतिहास गायब करवा देते पर ऐसा नहीं कर पाये क्यों की १८५७ की ऐतिहासिक लड़ाई को हर कोई जानता हैं । 
लव जिहाद तब रुकेगा जब इतिहासकार ग़ुलामी और धर्मनिरपेक्षता का चादर फ़ेंक कर असली इतिहास रखेंगे। जकुमारी कार्विका जैसी वीरांगनाओं ने सिर्फ सनातन धर्म में ही जन्म लिए हैं। ऐसी वीरांगनाओं का जन्म केवल सनातन धर्म में ही संभव हैं। जिस सदी में इन वीरांगनाओं ने देश पर राज करना शुरू किया था उस समय शायद ही किसी दूसरे मजहब या रिलिजन में नारियों को इतनी स्वतंत्रता होगी । सनातन धर्म का सर है नारी और धड़ पुरुष हैं। जिस प्रकार सर के बिना धड़ बेकार हैं उसी प्रकार सनातन धर्म नारी के बिना अपूर्ण है।
जितना भी हो पाया इस वीरांगना का खोया हुआ इतिहास आप सबके सामने प्रस्तुत है।
भारत सरकार से अनुरोध है महामान्य प्रधानमंत्री महोदय जी से की सच सामने लाने की अनुमति दें इंडियन कॉउंसिल ऑफ़ हिस्टोरिकल रिसर्च को ।योद्धा विलाप करते हैं, साम्राज्य का पतन होता है: सिकंदर महान की विरासत इतिहास के सबसे उल्लेखनीय साम्राज्यों में से एक के कड़वे-मीठे अंत को दर्शाती है। 323 ईसा पूर्व में सिकंदर की मृत्यु के बाद, उसने जो विशाल साम्राज्य बनाया था, जो ग्रीस से लेकर भारत तक फैला हुआ था, वह जल्दी ही बिखर गया। 32 वर्ष की कम उम्र में उसके अचानक निधन के बाद कोई स्पष्ट उत्तराधिकारी नहीं बचा, और उसके सेनापति, जिन्हें डायडोची के नाम से जाना जाता था, ने उसके क्षेत्रों पर नियंत्रण के लिए भयंकर युद्ध किया। एक बार एकीकृत साम्राज्य युद्धरत राज्यों में विभाजित हो गया, जिसने बेजोड़ सैन्य विजय के युग का अंत कर दिया। फिर भी, सिकंदर की विरासत युद्ध के मैदान से कहीं आगे तक चली गई। उसके अभियानों ने ग्रीक संस्कृति, भाषा और विचारों को पूरे ज्ञात विश्व में फैलाया, उन्हें स्थानीय परंपराओं के साथ मिलाया, जिसे हेलेनिस्टिक युग के रूप में जाना जाता है। साम्राज्य के पतन के बावजूद, कला, विज्ञान, दर्शन और राजनीतिक विचारों पर सिकंदर की दृष्टि और प्रभाव ने आने वाली सदियों तक सभ्यताओं को आकार देना जारी रखा, जिससे इतिहास के सबसे महान और सबसे प्रभावशाली व्यक्तियों में से एक के रूप में उसका स्थान सुनिश्चित हुआ।

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