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Saturday, 28 February 2026

RAJPUTANA ROHILKHAND KE SANSTHAPAK। MAHARSJA RANVEER SINGH ROHILA

*महाराजा रणवीर सिंह रोहिला*
*कठेहर–रोहिलखण्ड के सूर्यवंशी क्षत्रिय शासक*
भारतीय इतिहास के विस्तृत परिदृश्य में अनेक ऐसे क्षेत्रीय शक्तिकेंद्र रहे हैं जिनकी वीरगाथाएँ मुख्यधारा इतिहास लेखन में सीमित स्थान पा सकीं, किन्तु जनस्मृति, वंशावली, लोकपरंपरा और क्षेत्रीय इतिहास में वे अत्यंत जीवंत हैं। कठेहर–रोहिलखण्ड (वर्तमान उत्तर प्रदेश का उत्तरी भाग) का इतिहास भी ऐसा ही एक अध्याय है। इस क्षेत्र के सूर्यवंशी निकुम्भ वंशीय कठेहरिया क्षत्रियों में जन्मे महाराजा रणवीर सिंह रोहिला 13वीं शताब्दी के उन वीर शासकों में गिने जाते हैं जिन्होंने राजनीतिक स्वाधीनता, धार्मिक आस्था और क्षात्र धर्म की रक्षा के लिए संघर्ष किया।
यह ग्रंथ उनके वंश, ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, कठ/काठी परंपरा, कठेहर राज्य की स्थापना, दिल्ली सल्तनत से संघर्ष, विश्वासघात, बलिदान और ऐतिहासिक विरासत का क्रमबद्ध, शोधपरक और विश्लेषणात्मक प्रस्तुतीकरण है।
अध्याय 1
सूर्यवंश, निकुम्भ वंश और कठ परंपरा
1.1 सूर्यवंश की ऐतिहासिक अवधारणा
भारतीय परंपरा में सूर्यवंश को इक्ष्वाकु कुल से जोड़ा जाता है। पुराणों और राजवंशावलियों के अनुसार इक्ष्वाकु से प्रारंभ यह वंश अनेक शाखाओं में विभक्त हुआ। इन्हीं शाखाओं में निकुम्भ वंश का उल्लेख मिलता है, जो परंपरा के अनुसार अयोध्या के सूर्यवंशी राजाओं से संबंधित माना जाता है।
निकुम्भ वंश की एक शाखा “कठ” अथवा “काठी” के नाम से विख्यात हुई। यही शाखा आगे चलकर कठेहरिया क्षत्रियों के रूप में जानी गई।
1.2 कठ गणराज्य और उत्तर-पश्चिम भारत
ईसा पूर्व चौथी शताब्दी में उत्तर-पश्चिम भारत में अनेक गणराज्य विद्यमान थे। जब Alexander the Great ने 326 ईसा पूर्व भारतीय सीमा में प्रवेश किया, तब रावी नदी के तट पर “कठ” या “कठोई” नामक एक वीर गणराज्य का उल्लेख यूनानी लेखकों ने किया है।
उनकी राजधानी “सांकल” (आधुनिक स्यालकोट से संबद्ध मानी जाती है) बताई जाती है। यूनानी इतिहासकारों ने कठों की—
असाधारण युद्धक क्षमता
शारीरिक सौष्ठव
अनुशासित सैन्य संरचना
की प्रशंसा की है।
कुछ विवरणों में यह भी उल्लेख मिलता है कि कठ लोग सर्वश्रेष्ठ और बलिष्ठ योद्धा को ही शासक चुनते थे।
1.3 संस्कृत ग्रंथों में कठ
संस्कृत व्याकरणाचार्य Panini की अष्टाध्यायी में कठों का उल्लेख मिलता है। यह प्रमाणित करता है कि कठ जनपद वैदिकोत्तर काल में एक प्रतिष्ठित समुदाय था।
महाभाष्यकार Patanjali ने भी कठों का उल्लेख किया है। कठों की वेद शाखा “काठक संहिता” के नाम से प्रसिद्ध रही।
यह उल्लेख इस समुदाय की वैदिक, सांस्कृतिक और सैन्य प्रतिष्ठा को दर्शाता है।
अध्याय 2
कठों का विस्थापन और विस्तार
2.1 सिकंदर के पश्चात राजनीतिक परिवर्तन
उत्तर-पश्चिम भारत में आक्रमणों और सत्ता संघर्षों के परिणामस्वरूप अनेक क्षत्रिय गणराज्य विस्थापित हुए। कठों की विभिन्न टुकड़ियाँ भारत के भिन्न क्षेत्रों में प्रवासित हुईं।
परंपरा के अनुसार:
एक शाखा सौराष्ट्र गई
एक शाखा पंचाल (मध्यदेश) में आई
एक शाखा नेपाल क्षेत्र में पहुँची
2.2 काठियावाड़ की स्थापना
सौराष्ट्र क्षेत्र, जो प्राचीन काल से प्रसिद्ध था, कठ क्षत्रियों के प्रभाव से “काठियावाड़” नाम से विख्यात हुआ। काठी दरबार और काठी क्षत्रिय परंपरा ने वहाँ की सैन्य और सामाजिक संरचना पर गहरी छाप छोड़ी।
लोक कहावत—
“काल भी अगर छोड़ दे, लेकिन काठी नहीं छोड़ता।”
—काठी क्षत्रियों के युद्ध-संकल्प और प्रतिशोधात्मक दृढ़ता का प्रतीक मानी जाती है।
2.3 कठेहर खंड का उद्भव
पंचाल क्षेत्र (वर्तमान उत्तर प्रदेश का उत्तरी भाग) में बसने वाली शाखा ने कठेहर राज्य की नींव रखी। यही क्षेत्र आगे चलकर रोहिलखण्ड के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
कठेहर शब्द का अर्थ है—कठों का क्षेत्र।
अध्याय 3
कठेहर राज्य की स्थापना और प्रारंभिक शासक
3.1 ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
7वीं से 10वीं शताब्दी के मध्य उत्तर भारत में अनेक क्षेत्रीय शक्तियाँ उभरीं। इन्हीं में कठेहर राज्य का भी क्रमिक विकास हुआ।
परंपरा के अनुसार 648–720 ईस्वी के मध्य कठेहर में स्थिर राज्य व्यवस्था विकसित हुई।
3.2 रामपुर की स्थापना
राजा रामसिंह (रामशाह) ने 909 ईस्वी (विक्रमी संवत 966) में रामपुर को राजधानी के रूप में विकसित किया। यह स्थान अहिक्षेत्र (रामनगर के समीप) क्षेत्र में स्थित था।
रामपुर:
सामरिक दृष्टि से सुरक्षित
नदी तंत्र से संरक्षित
कृषि और व्यापार के लिए अनुकूल
क्षेत्र था।
3.3 वंशावली क्रम
परंपरागत वंश सूची के अनुसार प्रमुख शासक:
रामशाह (रामसिंह)
बीजयराज
करणचन्द
विम्रहराज
सावन्त सिंह (जिन्होंने राज्य का विस्तार गंगा पार यमुना तक किया)
जगमाल
रणवीर सिंह
धिंगतराम
गोकुल सिंह
महासहाय
त्रिलोकचन्द
नौरंग देव
यह वंश लगभग 11 पीढ़ियों तक कठेहर पर शासन करता रहा।
अध्याय 4
महाराजा रणवीर सिंह रोहिला – जन्म और प्रारंभिक जीवन
4.1 जन्म
जन्म तिथि: 25 अक्टूबर 1204 ईस्वी
विक्रम संवत: 1261
स्थान: रामपुर, कठेहर
गोत्र: वशिष्ठ
वंश: निकुम्भ वंशी कठेहरिया क्षत्रिय
4.2 शिक्षा और प्रशिक्षण
राजकुमार रणवीर सिंह को:
धनुर्विद्या
तलवारबाजी
घुड़सवारी
दुर्ग रक्षा नीति
शास्त्र एवं धर्म शिक्षा
दी गई।
उनका व्यक्तित्व तेजस्वी, दृढ़निश्चयी और धर्मनिष्ठ बताया जाता है।
4.3 84 कवचधारी रोहिले
उनकी विशिष्ट सैन्य टुकड़ी “84 लोहे के कवचधारी” योद्धाओं की थी। ये रणधेलवंशी वीर, कठोर अनुशासन और अदम्य साहस के लिए प्रसिद्ध थे।
अध्याय 5
13वीं शताब्दी का राजनीतिक परिदृश्य
13वीं शताब्दी में दिल्ली में गुलाम वंश का शासन था। सुल्तान Nasiruddin Mahmud नाममात्र के शासक थे, जबकि वास्तविक शक्ति शक्तिशाली अमीरों, विशेषकर Ghiyas ud din Balban के हाथों में केंद्रित थी।
दिल्ली सल्तनत:
दोआब क्षेत्र पर नियंत्रण चाहती थी
राजस्व विस्तार कर रही थी
सीमावर्ती स्वतंत्र राज्यों को अधीन करना चाहती थी
अध्याय 6
संघर्ष का आरंभ
1253–1254 ईस्वी में दोआब, कठेहर और शिवालिक क्षेत्र में दमनकारी अभियान चलाया गया।
अत्याचारों से क्षुब्ध होकर स्थानीय शक्तियों ने विद्रोह किया। कठेहर में सल्तनती सूबेदार की हत्या कर दी गई।
यह घटना दिल्ली के लिए गंभीर चुनौती थी।
अध्याय 7
रामपुर–पीलीभीत का निर्णायक युद्ध
7.1 युद्ध की तैयारी
रामपुर और पीलीभीत के मध्य मैदान में दिल्ली सल्तनत की लगभग 30,000 सेना और महाराजा रणवीर सिंह की सेना आमने-सामने हुई।
7.2 युद्ध का वर्णन
रोहिला सेना ने संगठित प्रतिरोध किया
84 कवचधारी वीरों ने अग्रिम मोर्चा संभाला
हाथी-दल और घुड़सवारों को रोका गया
परंपरा के अनुसार, सुल्तान को बंदी बनाया गया।
7.3 क्षात्र धर्म का पालन
रणवीर सिंह ने शरणागत शत्रु को क्षमा कर अभयदान दिया। यह राजधर्म और क्षात्र मर्यादा का उदाहरण था।
अध्याय 8
विश्वासघात और बलिदान
8.1 षड्यंत्र
दरबारी पंडित गोकुलराम पाण्डेय को लालच देकर विश्वास में लिया गया। किले की सुरक्षा व्यवस्था की जानकारी शत्रु को दी गई।
8.2 रक्षाबंधन का दिन
शिव मंदिर में शस्त्र पूजा हेतु राजपूत निःशस्त्र थे। इसी अवसर पर किले का दक्षिण द्वार खोल दिया गया।
8.3 अंतिम युद्ध
अचानक आक्रमण
मंदिर परिसर में घमासान युद्ध
महाराजा रणवीर सिंह वीरगति को प्राप्त
महारानी तारादेवी सती हो गईं।
भाई सूरत सिंह परिवार सहित सुरक्षित स्थान पर चले गए।
अध्याय 9
सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत
9.1 भौतिक अवशेष
रामपुर किले के अवशेष
सती तारादेवी मंदिर
स्थानीय स्मारक
9.2 सामाजिक प्रभाव
रोहिला क्षत्रियों में आज भी रणवीर सिंह का नाम श्रद्धा से लिया जाता है।
अध्याय 10
ऐतिहासिक विश्लेषण
10.1 स्रोतों की प्रकृति
वंशावली ग्रंथ
लोक परंपराएँ
क्षेत्रीय पत्रिकाएँ
मौखिक इतिहास
10.2 इतिहास लेखन की चुनौती
मुख्यधारा इतिहास प्रायः साम्राज्य केंद्रित रहा है। क्षेत्रीय शक्तियों के संघर्षों को सीमित स्थान मिला। कठेहर राज्य का इतिहास इसी श्रेणी में आता है।
अध्याय 11
रणवीर सिंह का ऐतिहासिक महत्व
क्षेत्रीय स्वाधीनता के प्रतीक
क्षात्र धर्म के पालन का उदाहरण
धार्मिक आस्था और युद्ध नीति का समन्वय
विश्वासघात के विरुद्ध चेतावनी
निष्कर्ष
महाराजा रणवीर सिंह रोहिला का जीवन भारतीय इतिहास में उस परंपरा का प्रतिनिधित्व करता है जिसमें—
स्वाभिमान सर्वोपरि है
पराधीनता अस्वीकार्य है
शरणागत को अभय देना क्षात्र धर्म है
विश्वासघात अंततः विनाशकारी होता है
उनका बलिदान कठेहर–रोहिलखण्ड की स्वतंत्र चेतना का प्रतीक है। यद्यपि उनका राज्य अंततः राजनीतिक रूप से पराजित हुआ,किंतु लोक स्मृति में अमर है।

Monday, 23 February 2026

SOME GOTRA OF ROHILA KSHTRIYAS

*ROHILA RAJPUT GOTRA*
आठवी सदी से आरंभ हुई
*रोहिल्ला *उपाधि से शूरवीर, अदम्य - साहसी विशेष युद्ध कला में प्रवीण, उच्च कुलीन सेनानायको, और सामन्तों को उनके गुणों के अनुरूप क्षत्रिय वीरों को तदर्थ उपाधि से विभूषित किया जाता था - जैसे - रावत - महारावत, राणा, रूहॆला, ठाकुर, नेगी, रावल, रहकवाल, रोहिला, समरलछन्द, लखमीर,(एक लाख का नायक) आदि। इसी आधार पर उनके वंशज भी आज तक (क्षत्रियों) के सभी गोत्रों में पाए जाते हैं।

रोहिलखण्ड से विस्थापित इन रोहिला परिवारों में क्षत्रिय वंश परम्परा के कुछ प्रमुख गोत्र हैं :-

रोहिला, रूहेला, ठैँगर,ठहित, रोहिल, रावल, द्रोहिया, रल्हन, रूहिलान, रौतेला , रावत,लोहारिया


यौधेय, योतिक, जोहिया, झोझे, पेशावरी

पुण्डीर, पांडला, पंढेर, पुन्ड़ेहार, पुंढीर, पुंडाया

चौहान, जैवर, जौडा, चाहल, चऊहा ,चूहा,चाहिल चावड़ा, खींची, गोगद, गदाइया, सनावर, क्लानियां, चिंगारा, चाहड बालसमंद, बहरासर, बराबर, चोहेल, चेहलान, बालदा, बछ्स (वत्स), बछेर, चयद, झझोड, चौपट, खुम्ब, जांघरा, जंगारा, झांझड,शाण

निकुम्भ, कठेहरिया,कठोड़ , कठोडा ,कठौरा, कठैत, कलुठान, कठपाल, कठेडिया, कठड, काठी, कठ, पालवार

राठौर, महेचा, महेचराना, रतनौता, बंसूठ जोली,धांधल, जोलिए, बांकटे, बाटूदा, थाथी, कपोलिया, खोखर, अखनौरिया ,लोहमढ़े, मसानिया,लखमार, लखमीर 

बुन्देला, उमट, ऊमटवाल

 भारती, गनान बटेरिया, बटवाल, बरमटिया

परमार, जावडा, लखमरा, मूसला, मौसिल, मूसा ,भौंसले, बसूक, जंदडा, पछाड़, पंवारखा, मौन

तोमर, तंवर, मुदगल, देहलीवाल, किशनलाल, सानयाल, सैन, सनाढय,बंदरीया

गहलौत, कूपट, पछाड़, थापा, ग्रेवाल, कंकोटक, गोद्देय, पापडा, नथैड़ा, नैपाली, लाठिवाल, पानिशप, पिसोण्ड, चिरडवाल, नवल, ऊंट , ऊंटवाल,चरखवाल, साम्भा, पातलेय, पातलीय, छन्द (चंड), क्षुद्रक,(छिन्ड, इन्छड़, नौछड़क), रज्जडवाल, बोहरा, जसावत, गौर, मलक, मलिक, 

कछवाहा, कुशवाहा, कोकच्छ, कोकचा, काक, ततवाल, बलद, मछेर

सिसौदिया, ऊँटवाड़ या ऊँटवाल, भरोलिया, बरनवाल, बरनपाल, बहारा

खुमाहड, अवन्ट, ऊँट, ऊँटवाल

सिकरवार, रहकवाल,गर्ग, रायकवार, ,ममड, गोदे

सोलंकी, गिलानिया, भुन, बुन, बघेला, ऊन, (उनयारिया)

बडगूजर, सिकरवार, ममड़ा, पुडिया

कश्यप, काशब, रावल, रहकवाल

यदु, मेव, छिकारा,,चिकारा तैतवाल, भैनिवाल, उन्हड़, भाटी ,बनाफरे, जादो, बागड़ी, सिन्धु, कालड़ा, सारन, छुरियापेड,(सूर्य वंश के क्षुद्रक छ्त्रपारे छुरिया पेड़ अलग है) लखमेरिया,(परमार लख्मरा ,ओर गहलोत लखमरा अलग है)चराड, जाखड़, सेरावत, देसवाल।

रोहि्ला क्षत्रियों में ऊंटवाल गोत्र चंद्रवंशी एवं सूर्यवंशी दोनों में पाए जाते हैं सूर्यवंशी ऊंटवाल गोत्र मेवाड़ के गहलोत सिसोदिया घराने से हैं और चंद्रवंशी ऊंटवाल जैसलमेर के भाटी है। ये लोग रेगिस्तान में मरुधरा के जहाज कहे जाने वाले ऊँटों की सेना के सेनापति तथा संचालक थे।
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गौत्र और वंश....
गुणसूत्र वंश का वाहक

हमारे धार्मिक ग्रंथ और हमारी सनातन हिन्दू परंपरा के अनुसार पुत्र (बेटा) को कुलदीपक अथवा वंश को आगे बढ़ाने वाला माना जाता है..... 
अर्थात.... उसे गोत्र का वाहक माना जाता है.

क्या आप जानते हैं कि.... आखिर क्यों होता है कि सिर्फ पुत्र को ही वंश का वाहक माना जाता है ????

असल में इसका कारण.... पुरुष प्रधान समाज अथवा पितृसत्तात्मक व्यवस्था नहीं .... 
बल्कि, हमारे जन्म लेने की प्रक्रिया है.

अगर हम जन्म लेने की प्रक्रिया को सूक्ष्म रूप से देखेंगे तो हम पाते हैं कि......

एक स्त्री में गुणसूत्र (Chromosomes) XX होते है.... और, पुरुष में XY होते है. 

इसका मतलब यह हुआ कि.... अगर पुत्र हुआ (जिसमें XY गुणसूत्र है)... तो, उस पुत्र में Y गुणसूत्र पिता से ही आएगा क्योंकि माता में तो Y गुणसूत्र होता ही नही है

और.... यदि पुत्री हुई तो (xx गुणसूत्र) तो यह गुणसूत्र पुत्री में माता व् पिता दोनों से आते है.

XX गुणसूत्र अर्थात पुत्री

अब इस XX गुणसूत्र के जोड़े में एक X गुणसूत्र पिता से तथा दूसरा X गुणसूत्र माता से आता है. 

तथा, इन दोनों गुणसूत्रों का संयोग एक गांठ सी रचना बना लेता है... जिसे, Crossover कहा जाता है.

जबकि... पुत्र में XY गुणसूत्र होता है.

अर्थात.... जैसा कि मैंने पहले ही बताया कि.... पुत्र में Y गुणसूत्र केवल पिता से ही आना संभव है क्योंकि माता में Y गुणसूत्र होता ही नहीं है.

और.... दोनों गुणसूत्र अ-समान होने के कारण.... इन दोनों गुणसूत्र का पूर्ण Crossover नहीं... बल्कि, केवल 5 % तक ही Crossover होता है.

और, 95 % Y गुणसूत्र ज्यों का त्यों (intact) ही बना रहता है.

तो, इस लिहाज से महत्त्वपूर्ण Y गुणसूत्र हुआ.... क्योंकि, Y गुणसूत्र के विषय में हम निश्चिंत है कि.... यह पुत्र में केवल पिता से ही आया है.

बस..... इसी Y गुणसूत्र का पता लगाना ही गौत्र प्रणाली का एकमात्र उदेश्य है जो हजारों/लाखों वर्षों पूर्व हमारे ऋषियों ने जान लिया था.

इस तरह ये बिल्कुल स्पष्ट है कि.... हमारी वैदिक गोत्र प्रणाली, गुणसूत्र पर आधारित है अथवा Y गुणसूत्र को ट्रेस करने का एक माध्यम है.

उदाहरण के लिए .... यदि किसी व्यक्ति का गोत्र शांडिल्य है तो उस व्यक्ति में विद्यमान Y गुणसूत्र शांडिल्य ऋषि से आया है.... या कहें कि शांडिल्य ऋषि उस Y गुणसूत्र के मूल हैं.

अब चूँकि.... Y गुणसूत्र स्त्रियों में नहीं होता है इसीलिए विवाह के पश्चात स्त्रियों को उसके पति के गोत्र से जोड़ दिया जाता है.

वैदिक/ हिन्दू संस्कृति में एक ही गोत्र में विवाह वर्जित होने का मुख्य कारण यह है कि एक ही गोत्र से होने के कारण वह पुरुष व् स्त्री भाई-बहन कहलाए क्योंकि उनका पूर्वज (ओरिजिन) एक ही है..... क्योंकि, एक ही गोत्र होने के कारण...
दोनों के गुणसूत्रों में समानता होगी.

आज की आनुवंशिक विज्ञान के अनुसार भी..... यदि सामान गुणसूत्रों वाले दो व्यक्तियों में विवाह हो तो उनके संतान... आनुवंशिक विकारों का साथ उत्पन्न होगी क्योंकि.... ऐसे दंपत्तियों की संतान में एक सी विचारधारा, पसंद, व्यवहार आदि में कोई नयापन नहीं होता एवं ऐसे बच्चों में रचनात्मकता का अभाव होता है.

विज्ञान द्वारा भी इस संबंध में यही बात कही गई है कि सगौत्र शादी करने पर अधिकांश ऐसे दंपत्ति की संतानों में अनुवांशिक दोष अर्थात् मानसिक विकलांगता, अपंगता, गंभीर रोग आदि जन्मजात ही पाए जाते हैं.
शास्त्रों के अनुसार इन्हीं कारणों से सगौत्र विवाह पर प्रतिबंध लगाया था.
यही कारण था कि शारीरिक बिषमता के कारण अग्रेज राज परिवार में आपसी विवाह बन्द हुए। 
जैसा कि हम जानते हैं कि.... पुत्री में 50% गुणसूत्र माता का और 50% पिता से आता है.

फिर, यदि पुत्री की भी पुत्री हुई तो.... वह डीएनए 50% का 50% रह जायेगा...
और फिर.... यदि उसके भी पुत्री हुई तो उस 25% का 50% डीएनए रह जायेगा.

इस तरह से सातवीं पीढ़ी में पुत्री जन्म में यह % घटकर 1% रह जायेगा.

अर्थात.... एक पति-पत्नी का ही डीएनए सातवीं पीढ़ी तक पुनः पुनः जन्म लेता रहता है....और, यही है "सात जन्मों के साथ का रहस्य".

लेकिन..... यदि संतान पुत्र है तो .... पुत्र का गुणसूत्र पिता के गुणसूत्रों का 95% गुणों को अनुवांशिकी में ग्रहण करता है और माता का 5% (जो कि किन्हीं परिस्थितियों में एक % से कम भी हो सकता है) डीएनए ग्रहण करता है...
और, यही क्रम अनवरत चलता रहता है.

जिस कारण पति और पत्नी के गुणों युक्त डीएनए बारम्बार जन्म लेते रहते हैं.... अर्थात, यह जन्म जन्मांतर का साथ हो जाता है.

इन सब में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि.... माता पिता यदि कन्यादान करते हैं तो इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि वे कन्या को कोई वस्तु समकक्ष समझते हैं...

बल्कि, इस दान का विधान इस निमित किया गया है कि दूसरे कुल की कुलवधू बनने के लिये और उस कुल की कुल धात्री बनने के लिये, उसे गोत्र मुक्त होना चाहिए. 

पुत्रियां..... आजीवन डीएनए मुक्त हो नहीं सकती क्योंकि उसके भौतिक शरीर में वे डीएनए रहेंगे ही, इसलिये मायका अर्थात माता का रिश्ता बना रहता है.

शायद यही कारण है कि..... विवाह के पश्चात लड़कियों के पिता को घर को ""मायका"" ही कहा जाता है.... "'पिताका"" नहीं.

क्योंकि..... उसने अपने जन्म वाले गोत्र अर्थात पिता के गोत्र का त्याग कर दिया है....!

और चूंकि..... कन्या विवाह के बाद कुल वंश के लिये रज का दान कर मातृत्व को प्राप्त करती है... इसीलिए, हर विवाहित स्त्री माता समान पूजनीय हो जाती है.

आश्चर्य की बात है कि.... हमारी ये परंपराएं हजारों-लाखों साल से चल रही है जिसका सीधा सा मतलब है कि हजारों लाखों साल पहले.... जब पश्चिमी देशों के लोग नंग-धड़ंग जंगलों में रह रहा करते थे और चूहा ,बिल्ली, कुत्ता वगैरह मारकर खाया करते थे....

उस समय भी हमारे पूर्वज ऋषि मुनि.... इंसानी शरीर में गुणसूत्र के विभक्तिकरण को समझ गए थे.... और, हमें गोत्र सिस्टम में बांध लिया था.

इस बातों से एक बार फिर ये स्थापित होता है कि....  
हमारा सनातन हिन्दू धर्म पूर्णतः वैज्ञानिक है....

बस, हमें ही इस बात का भान नहीं है.

असल में..... अंग्रेजों ने जो हमलोगों के मन में जो कुंठा बोई है..... उससे बाहर आकर हमें अपने पुरातन विज्ञान को फिर से समझकर उसे अपनी नई पीढियों को बताने और समझाने की जरूरत है.
 गोत्र के महत्व को वैज्ञानिक तरीके से समझे अज्ञानता की हठधर्मिता न करे*
*विशेष नोट__यहां प्रदर्शित चित्र केवल प्रतीकात्मक है जो सोसल मीडिया से लिया गया है इस पर लेखक का कोई हक और लेखक से कोई संबंध नहीं है।।

रक्त रंजीत हुई धरा रोहिलखंड रामपुर की ,सिर कटा ,धड़ लड़ता रहा रणबांके रणवीर का

रक्त रंजीत हुई धरा तीन हजार राजपूतों का संहार निहत्थे किया गया।*तेरहवीं शदाब्दी के आरंभ में उत्तर प्रदेश के बहुत बड़े भूभाग पर रोहिला राजपूतों का शासन था,जिसकी स्थापना सूर्य वंशी क्षत्रिय महाराजा रणवीर सिंह रोहिला जी ने एक स्वतंत्र राज्य के रूप में की थी। उस समय दिल्ली के सुलतानों ने आतंक मचा रखा था और सल्तनत विस्तार करने और धर्मांतरण करने में दिल्ली की पूरी शक्ति काम कर रही थी किंतु रोहिलखंड नरेश महाराजा रणवीर सिंह रोहिला से दिल्ली के सुल्तान भय खाते थे क्योंकि तीस साल तक आक्रमण करते रहने के बाद भी वे कभी रोहिलखंड पर कब्जा नहीं कर पाए।महाराजा रणवीर सिंह रोहिला सनातन धर्म के रक्षक और विधर्मी संहारक के रूप में उभर रहे थे समस्त राजपूत शक्तियों को एक मंच पर रोहिलखंड में एकत्र करके उन्होंने अनेको बार आक्रांताओ को धूल चटाई और रोहिलखंड की स्वतंत्रता पर आंच नहीं आने दी। सन 1254ईस्वी में रक्षा बंधन के दिन जब निशस्त्र राजपूत किले में राखी का त्योहार मना रहे थे और बहिनों से रक्षा सूत्र बंधवा रहे थे तो पूर्व नियोजित गद्दारी के कारण दिल्ली सुल्तान नसीरुद्दीन महमूद ने गद्दार द्वारा किले के चारो द्वार खोल देने पर अचानक निहत्थे राजपूतों पर तीस हजार की सेना लेकर लग भाग दस बजे हमला कर दिया,सभी राजपूत संख्या में कम लगभग तीन हजार होने बाद भी बड़ी बहादुरी से लड़े,राजा रणवीर सिंह रोहिला ने अद्भुत वीरता का प्रदर्शन करते हुए सांय पांच बजे तक भीषण संग्राम किया और दिल्ली की सेना को उनके ही हथियार छीन कर गाजर मूली की तरह काट डाला अंत में अकरांताओ के एक दुर्दांत खूंखवार दल ने उन्हे चारो ओर से घेर लिया ,रक्त की अंतिम बूंद रहने तक महाराजा रणवीर सिंह रोहिला ने साहस नहीं छोड़ा और दुश्मनों का काल बने रहे,संख्या में अधिक आक्रांता होने के कारण उनके टुकड़े टुकड़े कर दिए गए और बचे तो केवल हड्डियो के टुकड़े ही इतना दुर्दांत राक्षसी तरीके से राजा रणवीर सिंह को काट डाला उनकी इस वीरता को देख कर नसीरुद्दीन किले से बाहर आ गया और बचे स्त्री बच्चो को छोड़ गया लूट कर किले को चला गया पुस्तकालय को आग लगा दी। राजा रणवीर सिंह के रक्षा बंधन के दिन हुए इस बलिदान को समस्त सनातन रक्षक क्षत्रियजन शौर्य और स्वाभिमान दिवस के रूप में मनाते है।इस वर्ष सोमवार दिनांक19 अगस्त2024को क्षत्रिय सम्राट रोहिलखंड नरेश का 771वा बलिदान दिवस है। सभी से निवेदन है महापुरुषों को सम्मान देने और इतिहास संरक्षण की कड़ी में रक्षा बंधन को शौर्य दिवस के रूप में मनाए । महाराजा रणवीर सिंह रोहिला जी के नाम पर नामित चौक ,चौराहे,भवनों , पार्कों और सड़को पर सांय काल दीपक जलाएं और सनातन रक्षक के बलिदान को याद करे,प्रतिमाओं पर माल्यार्पण पर पुष्पांजलि दे और श्रद्धा सुमन अर्पित करे।अपने अपने घरों नगरों गांवों में जैसी भी व्यवस्था हो सामूहिक या व्यक्तिगत रक्षा बंधन को सांय काल अवश्य महान वीर सनातन रक्षक विधर्मी संहारक को याद करे ताकि इतिहास जिंदा रहे और भावी पीढ़ी को देश प्रेम की प्रेरणा मिले।*

*रोहिला क्षत्रिय समाज के महान वीरों को सच्ची श्रद्धांजलि तभी होगी जब रोहिला क्षत्रियों के अस्तित्व की रक्षा होगी अन्यथा राजनीति के शिकार कुछ षड्यंत्र कारी अन्य समाज में इस क्षत्रिय समाज को घटक बता कर विलीन करना चाहते है*
*उनके बहकावे में न आकर रोहिला क्षत्रिय समाज की रक्षा करे और भावी पीढ़ी का मार्ग दर्शन करे*
*गिरा जहां पर खून वहां का , पत्थर पत्थर जिंदा है ।*
*जिस्म नही है मगर नाम का ,अक्षर अक्षर जिंदा है ।।*

*जीवन मे यह अमर कहानी , अक्षर अक्षर गढ़ लेना ।*
*शौर्य कभी सो जाएं तो ,राजा रणवीर सिंह और राणा प्रताप को पढ़ लेना ।।*


कटिया सिर अरु धड़ लड़े... ई तो राजपूती रीत!
अर्थ: सिर कटने के बाद भी धड़ का लड़ते रहना...यही तो राजपूतों की असली रीत है!
दुनिया में लोग मौत से डरते हैं,
और एक राजपूताने का इतिहास है जहाँ वीरों ने मौत को भी डरा कर रखा था।
जब तक तलवार हाथ में है, तब तक हार नहीं मानी जाती।

क्षत्रिय_ऑफ़_इंडिया
*देश के इतिहास में त्याग बलिदान और वीरता की सबसे मिसाल महान सपूत और वीर योद्धा महाराजा रणवीर सिंह रोहिला को उनकी पुण्यतिथि पर शत-शत नमन।*

 *उनकी जीवन-गाथा साहस, शौर्य, स्वाभिमान और पराक्रम का प्रतीक है, जिससे देशवासियों को सदा राष्ट्रभक्ति की प्रेरणा मिलती रहेगी*




*जय जय महाराजा रणवीर सिंह रोहिला*
*जय जय राजपूताना रोहिलखंड*
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ROHILA RAJPUT,THE GREAT WARRIOR OF INDIA

*रक्षा बंधन के दिन रोहिलखंड की वीर भूमि गंगा सी पवित्र राजपूतों के रक्त से रंजित और आक्रांताओं के काल की धरती रामपुर के किले में दिया था कठेहर रोहिलखंड नरेश,महाराजा रणवीर सिंह रोहिला ने अदम्य साहस और अद्भुत शौर्य का परिचय!,दिल्ली सुलतान नासीरुद्दीन बहराम उर्फ चंगेज की चालीस हजार की सेना को दी थी शिकस्त!*
*तथा घुटने टेकने पर मजबूर किया था दिल्ली सल्तनत का दुर्दांत खूंखवार सेनापति नसीरुद्दीन महमूद को*!
*और प्राणदान मांगने पर क्षात्र धर्म रक्षार्थ छोड़ा था।*
*चंगेज ने अवसर पाकर रक्षा बंधन के दिन दरबारी गोकुल चंद पांडे हरिद्वार को लालच देकर किले के द्वार खुलवा लिए*
 *धोखे के शिकार लगभग तीन हजार राजपूत निहत्थे ही लड़े,!आक्रमण कारियो के अस्त्र शस्त्र छीन छीन किया था शौर्य संग्राम दिल्ली सल्तनत की लगभग आधी गुलाम वंशी सेना को काट डाला था रोहिला राजपूतो ने!!अंत में चंगेज के खूंखवार दरिंदो ने अकेले में घेर लिया था रणवीर सिंह रोहिला को, जिन्हे आमने सामने की लड़ाई में दिल्ली सुलतान कभी नही हरा पाए थे किंतु वे उनके साहस से विस्मित हुए बिना नहीं रह सके ।रणवीर रणभूमि के वीर सपूत रक्त की अंतिम बूंद रहने तक संग्राम रत रहे और कतरा कतरा हो कर खेत रहे(सन 1254ईस्वी),उनका बलिदान रोहिलखंड के राजपूताना इतिहास में स्वर्णाक्षर दे गया!,समस्त राजपूत समाज रक्षा बंधन के दिन हुए इस बलिदान को एक शोर्य दिवस के रूप में मनाता आया है,यूट्यूब पर और अन्य सोसल मीडिया पर स्वतंत्र रोहिलखंड संस्थापक नरेश महाराजा रणवीर सिंह रोहिला की वीर गाथा दी हुई है,सभी क्षत्रिय जन अपने बच्चो को दिखाए ताकि सल्तनत काल में १२५४ ईसवी के इस इतिहास के धुंधले पृष्ठ भी उकेरे जा सके*
*, रक्षा बंधन को उनका बलिदान दिवस मनाया जाता है,समस्त क्षत्रिय समाज इस शौर्य दिवस पर उन्हे कोटि कोटि नमन करते हुए उनके। बताए मार्ग पर स्वाधीनता और स्वाभिमान से स्वधर्म रक्षार्थ जीने की शपथ लेता है,यह सच्चाई हमसे स्कूली शिक्षा में छुपाई गई किंतु इतिहास के दर्पण में सब सुरक्षित रहता है जिसे उजागर कर भावी पीढ़ी को बताना ही हरेक क्षत्रिय का नैतिक दायित्व है अतः आप सभी क्षत्रियों से निवेदन है कि भावी पीढ़ी को सच्चाई बताए और स्वाभिमान से जीना दिखाए*
*सूर्य वंशी निकुंभ क्षत्रिय महाराजा रणवीर सिंह रोहिला का जन्म हिंदूवा सूर्य महाराज पृथ्वी राज चौहान के पतन के बाद दिल्ली सल्तनत के बढ़ते कदमों के बीच ऐसे समय में सन१२०४ईस्वी में कठेहर रोहिलखंड की राजधानी रामपुर के किले में राजा त्रिलोक सिंह के यहां हुआ था, जब सभी राजपूत शक्तियां क्षीण और तितर बितर हो चुकी थी,इस्लामिक आक्रांता मध्य भारत की ओर दमन करते हुए आगे बढ़ते रहते थे।।,रणवीर सिंह रोहिला का विवाह विजय पुर सीकरी की राजकुमारी तारा देवी से हुआ तथा पच्चीस वर्ष की आयु में रामपुर की गद्दी पर विराजमान होकर इस्लामीकरण पर रोक लगाई ।। तीस सालों तक दिल्ली सुलतानो को धूल चटाई किंतु रक्षा बंधन के दिन शिव मंदिर गए राजपूतों को रक्षा सूत्र बंधवाते हुए नसीरुद्दीन बहराम ने गोकुल चंद पांडे के द्वारा किले के द्वार खोलने पर घेर लिया और फिर होगया अद्भुत शौर्य संग्राम*
*विस्तार भय से संक्षिप्त गाथा वर्णित है जिसे चाटुकार मुगल कालीन और ब्रिटिश इतिहास कारो ने छिपाया*

*जय जय राजपूताना रोहिलखंड*
*जय क्षत्रिय सम्राट महाराजा रणवीर सिंह रोहिला सनातन रक्षक*



नोट __यहां प्रदर्शित चित्र नेट द्वारा सोसल मीडिया से लिए गए केवल प्रतीकात्मक रूप है इनका लेखक से कोई संबंध नहीं है।।


Wednesday, 18 February 2026

THE THIRD BETTLE OF PANIPAT पानीपत के युद्ध में रोहिला राजपूतों के बलिदान के सबूत जिंदा है

पानीपत की तीसरी लड़ाई से जुड़े इतिहास के साक्ष्य कलायत में भी मौजूद साक्ष्य खोज  रहे है, रोहिला क्षत्रिय सामाजिक संगठन
देश के अतीत से जुड़ी वीर गाथाओं को जन-जन तक पहुंचाने और इनकी स्मृतियों को हमेशा ताजा रखने के लिए रोहिला क्षत्रिय समाज संगठन ने खास पहल की है। इसके तहत कलायत श्री कपिल मुनि तट और वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप चौक के पास पानीपत की तीसरी लड़ाई के इतिहास से जुड़े धार्मिक स्थल हैं
रोहिल्ला क्षत्रिय समाज संगठन के लोगों ने कहा कि मशहूर मरहट्टा जनरैल भाऊ के दीवान गंगा सिंह महचा राठौड़ ने पानीपत की तीसरी लड़ाई में अहमद शाह अब्दाली के खिलाफ लड़ाई लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए थे। इनकी पत्नी रानी रामप्यारी उस जमाने की परंपरा अनुसार सती हुई थी। उनकी स्मृति में कलायत श्री कपिल मुनि तट के पास सौदागर मल के पुत्र अमरनाथ रोहिल्ला निवासी मछूंडा ने बनाई थी। इस तरह देश के गौरवशाली इतिहास के लिए लड़ी गई लड़ाई में रोहिल्ला क्षत्रिय समाज की महत्वपूर्ण भूमिका है। उन्होंने बताया कि पानीपत की लड़ाई में शहीद हुए गंगा सिंह महेचा राठौड़ रोहिला राजपूत थे। पानीपत की तीसरी लड़ाई में ये योद्धा अहमद शाह अब्दाली के विरुद्ध लड़े थे। उस दौरान गंगा सिंह की रानी रामप्यारी और क्षत्राणी अपने बच्चों के साथ कलायत रियासत के अधीन सुरक्षित थे। इस तरह शुरू से ही भारत भूमि पर कलायत का इतिहास गौरवशाली रहा है।
१४,जनवरी दिन बुधवार१७६१ईसवी में मकर सक्रांति के दिन वीर गंगा सिंह महेचा राठौड़ रोहिला राजपूत ने सदा शिव राव भाऊ के सेनापति के रूप में रुहेला सरदार नजीब खान और अब्दाली दुर्रानी के विरुद्ध युद्ध में अपनी सेना सहित वीर गति पाई जबकि उत्तर भारत में किन्ही राजपूत, आदि ने मराठों का साथ नही दिया ,उनकी रानी राम प्यारी सती हुई।

पानीपत का तीसरा युद्ध: एक स्ट्रेटेजिक एनालिसिस (14 जनवरी 1761)
आज के इतिहास में, 18वीं सदी का सबसे भयानक युद्ध पानीपत के मैदान में लड़ा गया था। यह सिर्फ़ दो सैनिकों की टक्कर नहीं थी, बल्कि दो अलग-अलग युद्ध स्टाइल (Warfares) की टक्कर थी। इस खास मैप के ज़रिए उस दिन की ज्योग्राफिकल और स्ट्रेटेजिक स्थिति को समझें।

मैप पर क्या देखें

🚩 मराठा तोपखाना (बाईं ओर):
इब्राहिम खान गार्दी के नेतृत्व में मराठा तोपखाना (आर्टिलरी) सीधी लाइन में तैनात थी। यह उस समय एशिया की सबसे बेहतरीन तोपों में से एक थी, लेकिन भारी होने के कारण इसे तेज़ी से आगे बढ़ाना मुश्किल था।

🐎 दुर्रानी की 'आधा-चाँद' स्ट्रेटेजी (दाईं ओर):
अहमद शाह अब्दाली की सेना ने पारंपरिक सीधी लड़ाई के बजाय फ्लेक्सिबल 'क्रेसेंट फॉर्मेशन' अपनाया। मैप पर दाईं ओर देखें कि कैसे अफ़गान घुड़सवारों (कैवलरी) ने मराठा सेना को घेरने की कोशिश की।

 ⚠️ सप्लाई लाइन का संकट:
मराठा कैंप (कैंप) पीछे की तरफ दिख रहा है। युद्ध से पहले, दुर्रानी सेना ने मराठों की लॉजिस्टिक्स (सप्लाई लाइन) काट दी थी जिससे सेना और जानवर भूख से कमज़ोर हो गए थे।

🌍 ज्योग्राफिकल फैक्टर:
युद्ध के नतीजे में खुले मैदान और यमुना नदी की स्थिति ने बड़ी भूमिका निभाई।

नतीजा:
हालांकि मराठा वीरों ने अदम्य साहस का परिचय दिया, लेकिन लॉजिस्टिक्स की कमी और तोपखानों की स्थिरता (स्टैटिक नेचर) भारी पड़ी। इस युद्ध की वजह से उत्तर भारत में पावर बैलेंस में बदलाव आया।

📜 इतिहास के पन्नों से एक बहादुरी की कहानी।


Monday, 9 February 2026

GOTRA LIST___OF ROHILA RAJPUT COMMUNITY IN INDIAरोहिला राजपूत गोत्र लिस्ट

रोहिलखण्ड से विस्थापित इन रोहिला परिवारों में क्षत्रिय परम्परा के कुछ प्रमुख गोत्र हैं :- [2]

रोहिला, रूहेला, ठैँगर,ठहित, रोहिल, रावल, द्रोहिया, रल्हन, रूहिलान, रौतेला , रावत,लोहारिया

वो क्षत्रिय वंश जिन को रोहिल्ला उपाधि से नवाजा गया

यौधेय, योतिक, जोहिया, झोझे, पेशावरी

पुण्डीर, पांडला, पंढेर, पुन्ड़ेहार, पुंढीर, पुंडाया

चौहान, जैवर, जौडा, चाहल, चावड़ा, खींची, गोगद, गदाइया, सनावर, क्लानियां, चिंगारा, चाहड बालसमंद, बहरासर, बराबर, चोहेल, चेहलान,  चूहा ,मूसा,(अपभ्रंश,अशुद्ध)बालदा, बछ्स (वत्स), बछेर, चयद, झझोड, चौपट, खुम्ब, जांघरा, जंगारा, झांझड,शाण

निकुम्भ, कठेहरिया, कठौरा, कठैत, कलुठान, कठपाल, कठेडिया, कठड, कठोड़ा , काठी, कठ, पालवार

राठौर, महेचा,महेचवत्त महेचराना, रतनौता, धांधल बंसूठ जोली, जोलिए, बांकटे, बाटूदा, थाथी, कपोलिया, खोखर, अखनौरिया ,लोहमढ़े, मसानिया

बुन्देला, बांदरिया, अववट उमट, ऊमटवाल

, भारती, गनान, गर्ग

, बटेरिया, बरमटिया

परमार, जावडा, लखमरा, मूसला, मौसिल, भौंसले, बसूक, जंदडा, पछाड़, पंवारखा, मौन

तोमर, तंवर, मुदगल, देहलीवाल, किशनलाल, सानयाल, सैन, सनाढय,बंदरीया

गहलौत, कूपट, पछाड़, थापा, ग्रेवाल, जालान ,जोलीय (मारवाड़ से। विस्थापित व्यापार में गये), कंकोटक, गोद्देय,गद्दे, पापडा, नथैड़ा, नैपाली, लाठिवाल, पानिशप, पिसोण्ड, चिरडवाल, नवल, चरखवाल, साम्भा, पातलेय, पातलीय, छन्द (चंड), क्षुद्रक,(छिन्ड, इन्छड़, नौछड़क), रज्जडवाल, बोहरा, जसावत, गौर, मलक, मलिक, कोकचे,कटोच काक



*मूसल /मौसले/ लठवाल लटवाल गोत्र का वंश परिचय*
*वंश___श्री राम के पुत्र लव के वंशधर(गहलोत, सिसौदिया)*

*चित्तौड़ का विश्व प्रसिद्ध राजवंश गहलोत सिसौदिया*
* *चित्तौड़ के राणा सांगा /संग्राम सिंह के भाई पृथ्वी राज के बारह पुत्रों में से दूसरे पुत्र,कल्याण सिंह का वंश कल्याणोत कहलाया,जिसे लाटवाड़ा की जागीर मिली,यही से गहलौत वंश के ये सिसोदिया राजपूत अपने भाई बनवीर के पुत्रों के साथ चित्तौड़ छोड़ कर संवत 1590विक्रमी तदनुसार सन 1533ईस्वी में रोहिलखंड में आकर सम्मिलित हुए क्योंकि राणा उदय सिंह की हत्या की साजिश रची जाने और पन्ना दाई माता के द्वारा अपने पुत्र का बलिदान देकर राणा उदय सिंह के बच जाने के कारण उत्पन हुए भय से ये परिवार जन रियासत लटवाड छोड़ कर रोहिलखंड आ बसे तथा अपना गोत्र लटवाल प्रचलित किया*
* *यह विवरण मेवाड़ गौरव पृष्ठ संख्या 9 पर आठवीं लाइन में उल्लिखित है*
* *(रोहिला वंश भास्कर ,पृष्ठ संख्या 86 व 87,लेखक आर आर राजपूत)*
* *(क्षत्रिय वंशारनव ,पृष्ठ संख्या 138,लेखक सूबेदार भगवान दीन सिंह ,प्रतापगढ़ उत्तर प्रदेश)*
* *बनवीर के कुछ पुत्र दक्षिण चले गए वहां उनके खुमान दास और मालदास हुए जिनसे मोसील मूसल गोत्र चला मोसले भोंसले कहे गए यही नागपुर में महाराष्ट्र में रहे जिन्हें मराठा क्षत्रिय बोलते है इसी वंश में छत्र पति वीर शिवाजी का अवतरण हुआ था*
*वेद___यजुर्वेद*
*उपवेद '_धनुर्वेद*
*शाखा __माधोजनी*
*सूत्र__कात्यायन*
*प्रवर__एक वशिष्ठ कछ*
*शिखा ___दाहिनी*
*पाद__,दाहिना*
*देवता _शिव*
*इष्ट देव रघुनाथ जी देवी__कलंक,कुलदेवी_वानासुरि*
*गुरु__वशिष्ठ*
*ऋषि__भारद्वाज,वशिष्ठ*
*ध्वज झंडा__,पचरंगा*
*नदी___सरयू*
*नगाड़ा __बोरिसल*
*निशान_रणजीत*
*धर्म__वैष्णव*
*गद्दी__अयोध्या*
*इष्ट__रघुनाथ जी*
*ध्वजा __गरुड़*
*ठिकाना__लाटवाडा*
*गोत्र कर्ता मूल पुरुष__कल्याण सिंह ,कल्याणोत*(रोहिलखंड)
*और खुमान दास व मालदास*(दक्षिण)
*जय जय रघुनाथ जी की*
*जय श्री राम*
*जय माता बाणासुरी*
कछवाहा, कुशवाहा, कोकच्छ, ततवाल, बलद, मछेर,कोकचा

सिसौदिया, ऊँटवाड़ या ऊँटवाल, भरोलिया, बरनवाल, बरनपाल, बहारा

खुमाहड, अवन्ट, ऊँट, ऊँटवाल

सिकरवार, रहकवाल, रायकवार, ममड, गोदे

सोलंकी, गिलानिया, भुन, बुन, बघेला, ऊन, (उनयारिया),बरनवाल

बडगूजर, सिकरवार, ममड़ा, पुडिया

कश्यप, काशब, रावल, रहकवाल

यदु, मेव, छिकारा,चिकारा,बटवाल तैतवाल, भैनिवाल, उन्हड़, भाटटी बनाफरे, जादो, बागड़ी, सिन्धु, कालड़ा, सारन, छुरियापेड, लखमेरिया, चराड, जाखड़, सेरावत, देसवाल।

गोत्र क्या है..? 
जिनके गोत्र अज्ञात हैं , उनका क्या होगा ?
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प्रश्न : - यदि माता-पिता में से पिता विधर्मी ( अलग धर्म से ) हो तो संतानों का गोत्र क्या होगा ?

इस प्रश्न ने मुझे बहुत प्रभावित किया था और मैंने इसका विस्तृत व्याख्यात्मक उत्तर दिया था । वो तो अब मुझसे संपर्क में हैं नहीं किन्तु उसका प्रश्न वर्तमान परिप्रेक्ष्य में परम् प्रासंगिक हैं ।

मुझे घोर आश्चर्य तब होता हैं जब सनातन धर्मानुयायियों को इतने गम्भीर तकनीकी प्रश्न पर निरुत्तर पाता हूँ । 
गोत्र मानवमात्र का होता हैं ; चाहे उसकी मान्यता गोत्रों में हो या चाहे न हो , चाहे वो सनातन धर्मानुयायी हो या न हो । आज इस लेख के माध्यम से मैं “गोत्र” इस विषय को स्पष्ट करने का प्रयत्न करूंगा।

सुविधा एवम् सरलता की दृष्टि से पोस्ट को मैंने दो भागों में बांटा है :-

1) गोत्र होते क्या हैं ?
2) जिनके गोत्र अज्ञात हैं , उनका क्या होगा ? 

1. गोत्र क्या हैं ?
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गोत्र मोटे तौर पर उन लोगों के समूह को कहते हैं जिनका वंश एक मूल पुरुष पूर्वज से अटूट क्रम में जुड़ा है । गोत्र जिसका अर्थ वंश भी है , यह एक ऋषि के माध्यम से शुरू होता है और हमें हमारे पूर्वजों की याद दिलाता है और हमें हमारे कर्तव्यों के बारे में बताता है । व्याकरण के प्रयोजनों के लिये पाणिनि में गोत्र की परिभाषा है 'अपात्यम पौत्रप्रभ्रति गोत्रम्' (४.१.१६२), अर्थात 'गोत्र शब्द का अर्थ है बेटे के बेटे के साथ शुरू होने वाली (एक ऋषि की) संतान् । गोत्र, कुल या वंश की संज्ञा है जो उसके किसी मूल पुरुष के अनुसार होती है ।

महाभारत के शान्तिपर्व (296-17, 18) में वर्णन है कि मूल चार गोत्र थे ; अंगिरा , कश्यप , वशिष्ठ और भृगु । बाद में आठ हो गए जब जमदन्गि, अत्रि, विश्वामित्र तथा अगस्त्य के नाम जुड़ गए । एक अन्य मान्यता है कि प्रारंभ में सात गोत्र थे कालांतर में दूसरे ऋषियों के सानिध्य के कारण अन्य गोत्र अस्तित्व में आये ।

*मेरे विचार*- एक मान्यता के अनुसार सात पीढ़ी बाद सगापन खत्म हो जाता है अर्थात सात पीढ़ी बाद गोत्र का मान बदल जाता है और आठवी पीढ़ी के पुरुष के नाम से नया गोत्र आरम्भ होता है (हम इस मान्यता के प्रबल समर्थक हैं) । हम गोत्र को Scientific व्यवस्था मानते हैं एवम् जीवन के (और जीवन के बाद भी) प्रत्येक क्षेत्र में “गोत्रों” का व्यापक महत्त्व स्वीकार करते हैं ।
व्यावहारिक रूप में "गोत्र" से आशय पहचान से है , जो ब्राह्मणों के लिए उनके ऋषिकुल से होती है ।

2. जिनके गोत्र अज्ञात हैं , उनका क्या होगा ?
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प्रत्येक मानव का गोत्र होता हैं , गोत्र एक Scientific व्यवस्था हैं । हिन्दू , मुस्लिम , ईसाई , अधर्मी , विधर्मी इन सबके गोत्र होते हैं – चाहे माने या न माने । कल्पना कीजिए एक बच्चा जिसे अपने माता-पिता के विषय में कुछ नहीं मालूम , उसका क्या होगा ?

- उसे “कश्यप गोत्रीय” अर्थात “कश्यप गोत्र” का माना जाएगा ।
इसकी शास्त्रोक्त व्यवस्था देखिए :-
“गोत्रस्य त्वपरिज्ञाने काश्यपं गोत्रमुच्यते।
यस्मादाह श्रुतिस्सर्वाः प्रजाः कश्यपसंभवाः।।“ (हेमाद्रि चन्द्रिका)

जिसका गोत्र अज्ञात हो उसे “कश्यप गोत्रीय" (कश्यप गोत्र का) माना जाएगा और यह एक शास्त्र सम्मत व्यवस्था है अर्थात् पूर्णतः निर्दोष व्यवस्था है।
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गौत्र और वंश....
गुणसूत्र वंश का वाहक

हमारे धार्मिक ग्रंथ और हमारी सनातन हिन्दू परंपरा के अनुसार पुत्र (बेटा) को कुलदीपक अथवा वंश को आगे बढ़ाने वाला माना जाता है..... 
अर्थात.... उसे गोत्र का वाहक माना जाता है.

क्या आप जानते हैं कि.... आखिर क्यों होता है कि सिर्फ पुत्र को ही वंश का वाहक माना जाता है ????

असल में इसका कारण.... पुरुष प्रधान समाज अथवा पितृसत्तात्मक व्यवस्था नहीं .... 
बल्कि, हमारे जन्म लेने की प्रक्रिया है.

अगर हम जन्म लेने की प्रक्रिया को सूक्ष्म रूप से देखेंगे तो हम पाते हैं कि......

एक स्त्री में गुणसूत्र (Chromosomes) XX होते है.... और, पुरुष में XY होते है. 

इसका मतलब यह हुआ कि.... अगर पुत्र हुआ (जिसमें XY गुणसूत्र है)... तो, उस पुत्र में Y गुणसूत्र पिता से ही आएगा क्योंकि माता में तो Y गुणसूत्र होता ही नही है

और.... यदि पुत्री हुई तो (xx गुणसूत्र) तो यह गुणसूत्र पुत्री में माता व् पिता दोनों से आते है.

XX गुणसूत्र अर्थात पुत्री

अब इस XX गुणसूत्र के जोड़े में एक X गुणसूत्र पिता से तथा दूसरा X गुणसूत्र माता से आता है. 

तथा, इन दोनों गुणसूत्रों का संयोग एक गांठ सी रचना बना लेता है... जिसे, Crossover कहा जाता है.

जबकि... पुत्र में XY गुणसूत्र होता है.

अर्थात.... जैसा कि मैंने पहले ही बताया कि.... पुत्र में Y गुणसूत्र केवल पिता से ही आना संभव है क्योंकि माता में Y गुणसूत्र होता ही नहीं है.

और.... दोनों गुणसूत्र अ-समान होने के कारण.... इन दोनों गुणसूत्र का पूर्ण Crossover नहीं... बल्कि, केवल 5 % तक ही Crossover होता है.

और, 95 % Y गुणसूत्र ज्यों का त्यों (intact) ही बना रहता है.

तो, इस लिहाज से महत्त्वपूर्ण Y गुणसूत्र हुआ.... क्योंकि, Y गुणसूत्र के विषय में हम निश्चिंत है कि.... यह पुत्र में केवल पिता से ही आया है.

बस..... इसी Y गुणसूत्र का पता लगाना ही गौत्र प्रणाली का एकमात्र उदेश्य है जो हजारों/लाखों वर्षों पूर्व हमारे ऋषियों ने जान लिया था.

इस तरह ये बिल्कुल स्पष्ट है कि.... हमारी वैदिक गोत्र प्रणाली, गुणसूत्र पर आधारित है अथवा Y गुणसूत्र को ट्रेस करने का एक माध्यम है.

उदाहरण के लिए .... यदि किसी व्यक्ति का गोत्र शांडिल्य है तो उस व्यक्ति में विद्यमान Y गुणसूत्र शांडिल्य ऋषि से आया है.... या कहें कि शांडिल्य ऋषि उस Y गुणसूत्र के मूल हैं.

अब चूँकि.... Y गुणसूत्र स्त्रियों में नहीं होता है इसीलिए विवाह के पश्चात स्त्रियों को उसके पति के गोत्र से जोड़ दिया जाता है.

वैदिक/ हिन्दू संस्कृति में एक ही गोत्र में विवाह वर्जित होने का मुख्य कारण यह है कि एक ही गोत्र से होने के कारण वह पुरुष व् स्त्री भाई-बहन कहलाए क्योंकि उनका पूर्वज (ओरिजिन) एक ही है..... क्योंकि, एक ही गोत्र होने के कारण...
दोनों के गुणसूत्रों में समानता होगी.

आज की आनुवंशिक विज्ञान के अनुसार भी..... यदि सामान गुणसूत्रों वाले दो व्यक्तियों में विवाह हो तो उनके संतान... आनुवंशिक विकारों का साथ उत्पन्न होगी क्योंकि.... ऐसे दंपत्तियों की संतान में एक सी विचारधारा, पसंद, व्यवहार आदि में कोई नयापन नहीं होता एवं ऐसे बच्चों में रचनात्मकता का अभाव होता है.

विज्ञान द्वारा भी इस संबंध में यही बात कही गई है कि सगौत्र शादी करने पर अधिकांश ऐसे दंपत्ति की संतानों में अनुवांशिक दोष अर्थात् मानसिक विकलांगता, अपंगता, गंभीर रोग आदि जन्मजात ही पाए जाते हैं.
शास्त्रों के अनुसार इन्हीं कारणों से सगौत्र विवाह पर प्रतिबंध लगाया था.
यही कारण था कि शारीरिक बिषमता के कारण अग्रेज राज परिवार में आपसी विवाह बन्द हुए। 
जैसा कि हम जानते हैं कि.... पुत्री में 50% गुणसूत्र माता का और 50% पिता से आता है.

फिर, यदि पुत्री की भी पुत्री हुई तो.... वह डीएनए 50% का 50% रह जायेगा...
और फिर.... यदि उसके भी पुत्री हुई तो उस 25% का 50% डीएनए रह जायेगा.

इस तरह से सातवीं पीढ़ी में पुत्री जन्म में यह % घटकर 1% रह जायेगा.

अर्थात.... एक पति-पत्नी का ही डीएनए सातवीं पीढ़ी तक पुनः पुनः जन्म लेता रहता है....और, यही है "सात जन्मों के साथ का रहस्य".

लेकिन..... यदि संतान पुत्र है तो .... पुत्र का गुणसूत्र पिता के गुणसूत्रों का 95% गुणों को अनुवांशिकी में ग्रहण करता है और माता का 5% (जो कि किन्हीं परिस्थितियों में एक % से कम भी हो सकता है) डीएनए ग्रहण करता है...
और, यही क्रम अनवरत चलता रहता है.

जिस कारण पति और पत्नी के गुणों युक्त डीएनए बारम्बार जन्म लेते रहते हैं.... अर्थात, यह जन्म जन्मांतर का साथ हो जाता है.

इन सब में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि.... माता पिता यदि कन्यादान करते हैं तो इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि वे कन्या को कोई वस्तु समकक्ष समझते हैं...

बल्कि, इस दान का विधान इस निमित किया गया है कि दूसरे कुल की कुलवधू बनने के लिये और उस कुल की कुल धात्री बनने के लिये, उसे गोत्र मुक्त होना चाहिए. 

पुत्रियां..... आजीवन डीएनए मुक्त हो नहीं सकती क्योंकि उसके भौतिक शरीर में वे डीएनए रहेंगे ही, इसलिये मायका अर्थात माता का रिश्ता बना रहता है.

शायद यही कारण है कि..... विवाह के पश्चात लड़कियों के पिता को घर को ""मायका"" ही कहा जाता है.... "'पिताका"" नहीं.

क्योंकि..... उसने अपने जन्म वाले गोत्र अर्थात पिता के गोत्र का त्याग कर दिया है....!

और चूंकि..... कन्या विवाह के बाद कुल वंश के लिये रज का दान कर मातृत्व को प्राप्त करती है... इसीलिए, हर विवाहित स्त्री माता समान पूजनीय हो जाती है.

आश्चर्य की बात है कि.... हमारी ये परंपराएं हजारों-लाखों साल से चल रही है जिसका सीधा सा मतलब है कि हजारों लाखों साल पहले.... जब पश्चिमी देशों के लोग नंग-धड़ंग जंगलों में रह रहा करते थे और चूहा ,बिल्ली, कुत्ता वगैरह मारकर खाया करते थे....

उस समय भी हमारे पूर्वज ऋषि मुनि.... इंसानी शरीर में गुणसूत्र के विभक्तिकरण को समझ गए थे.... और, हमें गोत्र सिस्टम में बांध लिया था.

इस बातों से एक बार फिर ये स्थापित होता है कि....  
हमारा सनातन हिन्दू धर्म पूर्णतः वैज्ञानिक है....

बस, हमें ही इस बात का भान नहीं है.

असल में..... अंग्रेजों ने जो हमलोगों के मन में जो कुंठा बोई है..... उससे बाहर आकर हमें अपने पुरातन विज्ञान को फिर से समझकर उसे अपनी नई पीढियों को बताने और समझाने की जरूरत है.
*गोत्र एक डी एन ए की तरह ही है गोत्र के महत्व को वैज्ञानिक तरीके से समझे अज्ञानता की हठधर्मिता न करे*

रोहि्ला क्षत्रियों में ऊंटवाल गोत्र चंद्रवंशी एवं सूर्यवंशी दोनों में पाए जाते हैं सूर्यवंशी ऊंटवाल गोत्र मेवाड़ के गहलोत सिसोदिया घराने से हैं और चंद्रवंशी ऊंटवाल जैसलमेर के भाटी घराने से है।


क्या आप अपने गोत्र की असली शक्ति को जानते हैं?

यह कोई परंपरा नहीं है। कोई अंधविश्वास नहीं है। यह आपका प्राचीन कोड है।

यह पूरा लेख पढ़िए — मानो आपका अतीत इसी पर टिका हो।

1. गोत्र आपका उपनाम नहीं है। यह आपकी आध्यात्मिक डीएनए है।
पता है सबसे अजीब क्या है?
अधिकतर लोग जानते ही नहीं कि वे किस गोत्र से हैं।
हमें लगता है कि यह बस एक लाइन है जो पंडितजी पूजा में कहते हैं। लेकिन यह सिर्फ इतना नहीं है।

आपका गोत्र दर्शाता है — आप किस ऋषि की मानसिक ऊर्जा से जुड़े हुए हैं।
खून से नहीं, बल्कि विचार, ऊर्जा, तरंग और ज्ञान से।

हर हिंदू आध्यात्मिक रूप से एक ऋषि से जुड़ा होता है।
वो ऋषि आपके बौद्धिक पूर्वज हैं।
उनकी सोच, ऊर्जा, और चेतना आज भी आपमें बह रही है।

2. गोत्र का अर्थ जाति नहीं होता।
आज लोग इसे गड़बड़ा देते हैं।
गोत्र ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र नहीं दर्शाता।
यह जातियों से पहले, उपनामों से पहले, राजाओं से भी पहले अस्तित्व में था।

यह सबसे प्राचीन पहचान का तरीका था — ज्ञान पर आधारित, शक्ति पर नहीं।
हर किसी का गोत्र होता था।
ऋषि अपने शिष्यों को गोत्र देते थे जब वे उनकी शिक्षाओं को ईमानदारी से अपनाते थे।

इसलिए, गोत्र कोई लेबल नहीं — यह आध्यात्मिक विरासत की मुहर है।

3. हर गोत्र एक ऋषि से जुड़ा होता है — एक “सुपरमाइंड” से
मान लीजिए आप वशिष्ठ गोत्र से हैं — तो आप वशिष्ठ ऋषि से जुड़े हैं, वही जिन्होंने श्रीराम और दशरथ को मार्गदर्शन दिया था।

भृगु गोत्र?
आप उस ऋषि से जुड़े हैं जिन्होंने वेदों का हिस्सा लिखा और योद्धाओं को प्रशिक्षण दिया।

कुल 49 मुख्य गोत्र हैं — हर एक ऋषियों से जुड़ा जो ज्योतिषी, वैद्य, योद्धा, मंत्रद्रष्टा या प्रकृति वैज्ञानिक थे।

4. क्यों बुज़ुर्ग एक ही गोत्र में विवाह मना करते थे?
यह बात स्कूल में नहीं सिखाई जाती।

प्राचीन भारत में गोत्र एक जेनेटिक ट्रैकर था।
यह पितृवंश से चलता है — यानी पुत्र ऋषि की लाइन आगे बढ़ाते हैं।

इसलिए अगर एक ही गोत्र के दो लोग विवाह करें, तो वे आनुवंशिक रूप से भाई-बहन जैसे होंगे।
इससे संतान में मानसिक और शारीरिक विकार आ सकते हैं।

गोत्र व्यवस्था = प्राचीन भारतीय डीएनए विज्ञान
और यह हम हजारों साल पहले जानते थे — जब पश्चिमी विज्ञान को जेनेटिक्स का भी अंदाजा नहीं था।

5. गोत्र = आपका मानसिक प्रोग्रामिंग
चलो इसे व्यक्तिगत बनाते हैं।

कुछ लोग गहरे विचारक होते हैं।
कुछ में गहरी आध्यात्मिक भूख होती है।
कुछ को प्रकृति में शांति मिलती है।
कुछ नेता या सत्य के खोजी होते हैं।

क्यों?
क्योंकि आपके गोत्र के ऋषि का मन आज भी आपके अंदर गूंजता है।

अगर आपका गोत्र किसी योद्धा ऋषि का है — आपको साहस महसूस होगा।
अगर वह किसी वैद्य ऋषि से है — तो आयुर्वेद या चिकित्सा में रुचि हो सकती है।

यह संयोग नहीं — यह गहराई से जुड़ा प्रोग्राम है।

6. पहले गोत्र के आधार पर शिक्षा दी जाती थी
प्राचीन गुरुकुलों में सबको एक जैसा नहीं सिखाया जाता था।
गुरु का पहला प्रश्न होता था:
“बेटा, तुम्हारा गोत्र क्या है?”

क्यों?
क्योंकि इससे गुरु समझ जाते थे कि छात्र कैसे सीखता है, कौन सी विद्या उसके लिए उपयुक्त है।

अत्रि गोत्र वाला छात्र — ध्यान और मंत्रों में प्रशिक्षित होता।

कश्यप गोत्र वाला — आयुर्वेद में गहराई से जाता।

गोत्र सिर्फ पहचान नहीं, जीवनपथ था।

7. ब्रिटिशों ने इसका मज़ाक उड़ाया, बॉलीवुड ने हंसी बनाई, और हमने इसे भुला दिया
जब ब्रिटिश भारत आए, उन्होंने इसे अंधविश्वास कहा।

फिर फिल्मों में मज़ाक बना —
“पंडितजी फिर से गोत्र पूछ रहे हैं!” — जैसे यह कोई बेमतलब रस्म हो।

धीरे-धीरे हमने अपने बुज़ुर्गों से पूछना छोड़ दिया।
अपने बच्चों को बताना छोड़ दिया।

100 साल में 10,000 साल पुरानी व्यवस्था लुप्त हो रही है।

उसे किसी ने खत्म नहीं किया। हमने ही उसे मरने दिया।

8. अगर आप अपना गोत्र नहीं जानते — तो आपने एक नक्शा खो दिया है
कल्पना कीजिए कि आप किसी प्राचीन राजघराने से हों — पर अपना उपनाम तक नहीं जानते।

आपका गोत्र = आपकी आत्मा का GPS है।

सही मंत्र

सही साधना

सही विवाह

सही मार्गदर्शन

इसके बिना हम अपने ही धर्म में अंधे होकर चल रहे हैं।

9. गोत्र की पुकार सिर्फ रस्म नहीं होती
जब पंडित पूजा में आपका गोत्र बोलते हैं, तो वे सिर्फ औपचारिकता नहीं निभा रहे।

वे आपको आपकी ऋषि ऊर्जा से दोबारा जोड़ रहे होते हैं।

यह एक पवित्र संवाद होता है:
“मैं, भारद्वाज ऋषि की संतान, अपने आत्मिक वंशजों की उपस्थिति में यह संकल्प करता हूँ।”

यह सुंदर है। पवित्र है। सच्चा है।

10. इसे फिर से जीवित करो — इसके लुप्त होने से पहले
अपने माता-पिता से पूछो।
दादी-दादा से पूछो।
शोध करो, पर इसे जाने मत दो।

इसे लिखो, अपनी संतानों को बताओ। गर्व से कहो:

आप सिर्फ 1990 या 2000 में जन्मे इंसान नहीं हैं —
आप एक ऐसी ज्योति के वाहक हैं जो हजारों साल पहले किसी ऋषि ने जलाई थी।

11. आपका गोत्र = आत्मा का पासवर्ड
आज हम वाई-फाई पासवर्ड, नेटफ्लिक्स लॉगिन याद रखते हैं...

पर अपने गोत्र को भूल जाते हैं।

वो एक शब्द — आपके भीतर की

चेतना

आदतें

पूर्व कर्म

आध्यात्मिक शक्तियां

…सब खोल सकता है।

यह लेबल नहीं — यह चाबी है।

12. महिलाएं विवाह के बाद गोत्र “खोती” नहीं हैं
लोग सोचते हैं कि विवाह के बाद स्त्री का गोत्र बदल जाता है। पर सनातन धर्म सूक्ष्म है।

श्राद्ध आदि में स्त्री का गोत्र पिता से लिया जाता है।
क्योंकि गोत्र पुरुष रेखा से चलता है (Y-क्रोमोज़ोम से)।
स्त्री ऊर्जा को वहन करती है, लेकिन आनुवंशिक रूप से उसे आगे नहीं बढ़ाती।

इसलिए स्त्री का गोत्र समाप्त नहीं होता — वह उसमें मौन रूप से जीवित रहता है।

13. भगवानों ने भी गोत्र का पालन किया
रामायण में श्रीराम और सीता के विवाह में भी गोत्र जांचा गया:

राम: इक्ष्वाकु वंश, वशिष्ठ गोत्र

सीता: जनक की पुत्री, कश्यप गोत्र



जय सिया राम
*विशेष नोट___यहां प्रदर्शित सभी चित्र नेट से लिए गए है जो केवल समझाने के उद्देश्य की पूर्ति हेतु चस्पा किए गए है जिनका लेखक से कोई संबंध नहीं है केवल प्रतीकात्मक रूप से उद्धरित किए और प्रदर्शित किए गए है।।

Wednesday, 4 February 2026

HISTORY OF ROHILA RAJPUTS

जय जय राजपूताना बुंदेलखंड,रोहिलखंड,बघेलखंड,कुमायुखंड उत्तराखंड (भरतखण्ड)
क्षत्रिय अस्तित्व न्याय मोर्चा सभी क्षत्रिय साम्राज्य को खोज खोज कर सामने लाने की मुहिम में है बहुत कुछ छिपाया गया और हमे नही पढ़ाया जाता किंतु क्षत्रिय कभी मिटता नही वह शास्वत है सनातन है उसकी रक्षा स्वयं सृष्टि रचयिता करता है ,क्षत्रिय अस्तित्व न्याय मोर्चा किसी भी क्षत्रिय के अस्तित्व को संरक्षित करने का कार्य कर रहा है,कितना हास्यास्पद है कि वैदिक कालीन उत्तरी पांचाल में स्थापित राजपूताना रोहिलखंड के क्षत्रिय के स्थान पर आक्रांता अफगानों का इतिहास पढ़ाया जाता है अट्ठारहवीं सदी से आगे राजपूत इतिहास को गायब ही कर दिया गया विक्की पीडिया से भी हटा दिया गया है किंतु अब और अन्याय इतिहास केhttps://youtu.be/JrR9PAOsYis?si=buq2Fpej4u3vBIjf साथ सहन नही किया जायेगा।।

रोहिल्ला उपाधि -

 शूरवीर, अदम्य - साहसी विशेष युद्ध कला में प्रवीण, उच्च कुलीन सेनानायको, और सामन्तों को उनके गुणों के अनुरूप क्षत्रिय वीरों को तदर्थ उपाधि से विभूषित किया जाता था - जैसे - रावत - महारावत, राणा, महाराणा, ठाकुर, नेगी, रावल, रहकवाल, रोहिल्ला, समरलछन्द, लखमीर,(एक लाख का नायक) आदि। इसी आधार पर उनके वंशज भी आजतक राजपूतों के सभी गोत्रों में पाए जाते हैं। "वभूव रोहिल्लद्व्यड्कों वेद शास्त्रार्थ पारग: । द्विज: श्री हरि चन्द्राख्य प्रजापति समो गुरू : ।।2।। ( बाउक का जोधपुर लेख ) - सन 837 ई. चैत्र सुदि पंचमी - हिंदी अर्थ - "वेद शास्त्र में पारंगत रोहिल्लाद्धि उपाधिधारी एक हरिश्चन्द्र नाम का ब्राह्मण था" जो प्रजापति के समान था हुआ ।।6।। ( गुज्जर गौरव मासिक पत्रिका - अंक 10, वर्ष ।।माह जौलाई 1991 पृष्ठ - 13) (राजपुताने का इतिहास पृष्ठ - 147) (इतिहास रोहिला - राजपूत पृष्ठ - 23) (प्राचीन भारत का इतिहास, राजपूत वंश, - कैलाश - प्रकाशन लखनऊ सन 1970 ई. पृष्ठ - 104 -105 - ) रोहिल्लद्व्यड्क रोहिल्लद्धि - अंक वाला या उपाधि वाला । सर्वप्रथम प्रतिहार शासक द्विज हरिश्चन्द्र को रोहिल्लद्धि उपाधि प्राप्त हुई । बाउक,प्रतिहार शासक विप्र हरिश्चन्द्र के पुत्र कवक और श्रीमति पदमनी का पुत्र था वह बड़ा पराक्रमी और नरसिंह वीर था। प्रतिहार एक पद है, किसी विशेष वर्ण का सूचक नही है। विप्र हरिश्चन्द्र प्रतिहार अपने बाहुबल से मांडौर दुर्ग की रक्षा करने वाला था, अदम्य साहस व अन्य किसी विशेष रोहिला शासक के प्रभावनुरूप ही रोहिल्लद्व्यड्क उपाधि को किसी आधार के बिना कोई भी व्यक्ति अपने नाम के साथ सम्बन्ध करने का वैधानिक रूप में अधिकारी नही हो सकता। उपरोक्त से स्पष्ट है कि बहुत प्राचीन काल से ही गुणकर्म के आधार पर क्षत्रिय उपाधि "रोहिल्ला" प्रयुक्त । प्रदत्त करने की वैधानिक व्यवस्था थी। जिसे हिन्दुआसूर्य - महाराजा पृथ्वीराज चौहान ने भी यथावत रखा। पृथ्वीराज चौहान की सेना में एक सौ रोहिल्ला - राजपूत सेना नायक थे । "पृथ्वीराज रासौ" - चहूँप्रान, राठवर, जाति पुण्डीर गुहिल्ला । बडगूजर पामार, कुरभ, जागरा, रोहिल्ला ।। इस कवित्त से स्पष्ट है । कि - प्राचीन - काल में रोहिला- क्षत्रियों का स्थान बहुत ऊँचा था। रोहिला रोहिल्ल आदि शब्द राजपुत्रों अथवा क्षत्रियों के ही द्योतक थे । इस कवित्त के प्रमाणिकता "आइने अकबरी", 'सुरजन चरिता' भी सिद्ध करते हैं । युद्ध में कमानी की तरह (रोह चढ़ाई करके) शत्रु सेना को छिन्न - भिन्न करने वाले को रहकवाल, रावल, रोहिल्ला, महाभट्ट कहा गया है। महाराज पृथ्वीराज चौहान की सेना में पांच गोत्रों के रावल थे - रावल - रोहिला रावल - सिन्धु रावल - घिलौत (गहलौत) रावल - काशव या कश्यप रावल - बलदया बल्द मुग़ल बादशाह अकबर ने भी बहादुरी की रोहिल्ला उपाधि को यथावत बनाए रखा जब अकबर की सेना दूसरे राज्यों को जीत कर आती थी तो अकबर अपनी सेना के सरदारों को,बहादुर जवानों बहादुरी के पदक (ख़िताब,उपाधि) देता था। एक बार जब महाराणा मान सिंह काबुल जीतकर वापिस आए तो अकबर ने उसके बाइस राजपूत सरदारों को यह ख़िताब दी (उपाधि से सम्मानित किया) बाई तेरा हर निरकाला रावत को - रावल जी चौमकिंग सरनाथा को - रावल झंड्कारा कांड्कड को - रोहिल्ला रावत मन्चारा - कांड्कड काम करन, निरकादास रावत को रावराज और रूहेलाल को रोहिला
गौरवशाली इतिहास के कुछ स्वर्णाक्षर (रोहिला क्षत्रिय) भारत वर्ष का क्षेत्रफल 42 ,02 ,500 वर्ग किमी था । रोहिला साम्राज्य 25 ,000 वर्ग किमी 10 ,000 वर्गमील में फैला हुआ था । रोहिला, राजपूतो का एक गोत्र , कबीला (परिवार) या परिजन- समूह है जो कठेहर - रोहिलखण्ड के शासक एंव संस्थापक थे |मध्यकालीन भारत में बहुत से राजपूत लडाको को रोहिला की उपाधि से विभूषित किया गया. उनके वंशज आज भी रोहिला परिवारों में पाए जाते हैं । रोहिले- राजपूत प्राचीन काल से ही सीमा- प्रांत, मध्य देश (गंगा- यमुना का दोआब), पंजाब, काश्मीर, गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश में शासन करते रहे हैं । जबकि मुस्लिम-रोहिला साम्राज्य अठारहवी शताब्दी में इस्लामिक दबाव के पश्चात् स्थापित हुआ. मुसलमानों ने इसे उर्दू में "रूहेलखण्ड" कहा । 1702 से 1720 ई तक रोहिलखण्ड में रोहिले राजपूतो का शासन था. जिसकी राजधानी बरेली थी । रोहिले राजपूतो के महान शासक "राजा इन्द्रगिरी" ने रोहिलखण्ड की पश्चिमी सीमा पर सहारनपुर में एक किला बनवाया,जिसे "प्राचीन रोहिला किला" कहा जाता है । सन 1801 ई में रोहिलखण्ड को अंग्रेजो ने अपने अधिकार में ले लिया था. हिन्दू रोहिले-राजपुत्रो द्वारा बनवाए गये इस प्राचीन रोहिला किला को 1806 से 1857 के मध्य कारागार में परिवर्तित कर दिया गया था । इसी प्राचीन- रोहिला- किला में आज सहारनपुर की जिला- कारागार है । "सहारन" राजपूतो का एक गोत्र है जो रोहिले राजपूतो में पाया जाता है. यह सूर्य वंश की एक प्रशाखा है जो राजा भरत के पुत्र तक्षक के वंशधरो से प्रचालित हुई थी । फिरोज तुगलक के आक्रमण के समय "थानेसर" (वर्तमान में हरियाणा में स्थित) का राजा "सहारन" ही था । दिल्ली में गुलाम वंश के समय रोहिलखण्ड की राजधानी "रामपुर" में राजा रणवीर सिंह कठेहरिया (काठी कोम, निकुम्भ वंश, सूर्यवंश रावी नदी के काठे से विस्थापित कठगणों के वंशधर) का शासन था । इसी रोहिले राजा रणवीर सिंह ने तुगलक के सेनापति नसीरुद्दीन चंगेज को हराया था. 'खंड' क्षत्रिय राजाओं से सम्बंधित है, जैसे भरतखंड, बुंदेलखंड, विन्धयेलखंड , रोहिलखंड, कुमायुखंड, उत्तराखंड आदि । प्राचीन भारत की केवल दो भाषाएँ संस्कृत व प्राकृत (सरलीकृत संस्कृत) थी । रोहिल प्राकृत और खंड संस्कृत के शब्द हैं जो क्षत्रिय राजाओं के प्रमाण हैं । इस्लामिक नाम है दोलताबाद, कुतुबाबाद, मुरादाबाद, जलालाबाद, हैदराबाद, मुबारकबाद, फैजाबाद, आदि । रोहिले राजपूतो की उपस्तिथि के प्रमाण हैं । योधेय गणराज्य के सिक्के, गुजरात का (1445 वि ) ' का शिलालेख (रोहिला मालदेव के सम्बन्ध में), मध्यप्रदेश में स्थित रोहिलखंड रामपुर में राजा रणवीर सिंह के किले के खंडहर, रानी तारादेवी सती का मंदिर , पीलीभीत में राठौर रोहिलो (महिचा- प्रशाखा) की सतियों के सतियों के मंदिर, सहारनपुर का प्राचीन रोहिला किला, मंडोर का शिलालेख, " बड़ौत में स्तिथ " राजा रणवीर सिंह रोहिला मार्ग "
नगरे नगरे ग्रामै ग्रामै विलसन्तु संस्कृतवाणी । सदने - सदने जन - जन बदने , जयतु चिरं कल्याणी ।। जोधपुर का शिलालेख, प्रतिहार शासक हरीशचंद्र को मिली रोहिल्लाद्व्यंक की उपाधि, कई अन्य राजपूतो के वंशो को प्राप्त उपाधियाँ, 'पृथ्वीराज रासो', आल्हाखण्ड - काव्यव, सभी राजपूत वंशो में पाए जाने वाले प्रमुख गोत्र । अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा भारत द्वारा प्रकाशित पावन ग्रन्थ क्षत्रिय वंशाणर्व (रोहिले क्षत्रियों का राज्य रोहिलखण्ड का पूर्व नाम पांचाल व मध्यप्रदेश), वर्तमान में अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा से अखिल भारतीय रो. क्ष. वि. परिषद को संबद्धता प्राप्त होना, वर्तमान में भी रोहिलखण्ड (संस्कृत भाषा में) क्षेत्र का नाम यथावत बने रहना, अंग्रेजो द्वारा भी उत्तर रेलवे को "रोहिलखण्ड - रेलवे" का नाम देना जो बरेली से देहरादून तक सहारनपुर होते हुए जाती थी, वर्तमान में लाखो की संख्या में पाए जाने वाले रोहिला-राजपूत, रोहिले-राजपूतों के सम्पूर्ण भारत में फैले हुए कई अन्य संगठन अखिल भारतीय स्तर पर 'राजपूत रत्न' रोहिला शिरोमणि डा. कर्णवीर सिंह द्वारा संगठित एक अखिल भारतीय रोहिला क्षत्रिय विकास परिषद (सम्बद्ध अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा) पंजीकरण संख्या - 545, आदि। 12. पानीपत की तीसरी लड़ाई (रोहिला वार) में रोहिले राजपूत- राजा गंगासहाय राठौर (महेचा) के नेतृत्व में मराठों की ओर से अफगान आक्रान्ता अहमदशाह अब्दाली व रोहिला पठान नजीबदौला के विरुद्ध लड़े व वीरगति पाई । इस मराठा युद्ध में लगभग एक हजार चार सौ रोहिले राजपूत वीरगति को प्राप्त हुए । (1761-1774 ई .) (इतिहास -रोहिला-राजपूत) 13. प्रथम स्वतंत्रता संग्राम 1857 में भी रोहिले राजपूतों ने अपना योगदान दिया, ग्वालियर के किले में रानी लक्ष्मीबाई को हजारों की संख्या में रोहिले राजपूत मिले, इस महायज्ञ में स्त्री पुरुष सभी ने अपने गहने धन आदि एकत्र कर झाँसी की रानी के साथ अंग्रेजो के विरुद्ध आवाज उठाने के लिए सम्राट बहादुरशाह- जफर तक पहुँचाए । अंग्रेजों ने ढूँढ-ढूँढ कर उन्हें काट डाला जिससे रोहिले राजपूतों ने अज्ञातवास की शरण ली। 14. राजपूतों की हार के प्रमुख कारण थे हाथियों का प्रयोग, सामंत प्रणाली व आपसी मतभेद, ऊँचे व भागीदार कुल का भेदभाव (छोटे व बड़े की भावना) आदि। 15. सम्वत 825 में बप्पा रावल चित्तौड़ से विधर्मियों को खदेड़ता हुआ ईरान तक गया। बप्पा रावल से समर सिंह तक 400 वर्ष होते हैं, गह्लौतों का ही शासन रहा। इनकी 24 शाखाएँ हैं। जिनके 16 गोत्र (बप्पा रावल के वंशधर) रोहिले राजपूतों में पाए जाते हैं। 16. चितौड़ के राणा समर सिंह (1193 ई.) की रानी पटना की राजकुमारी थी इसने 9 राजा, 1 रावत और कुछ रोहिले साथ लेकर मौ. गोरी के गुलाम कुतुबद्दीन का आक्रमण रोका और उसे ऐसी पराजय दी कि कभी उसने चितौड़ की ओर नही देखा। 17. रोहिला शब्द क्षेत्रजनित, गुणजनित व 'मूल पुरुष' नाम-जनित है। यह गोत्र जाटों में भी रूहेला, रोहेला, रूलिया, रूहेल , रूहिल, रूहिलान नामों से पाया जाता है। 18. रूहेला गोत्र जाटों में राजस्थान व उ. प्र. में पाया जाता है। रोहेला गोत्र के जाट जयपुर में बजरंग बिहार ओर ईनकम टैक्स कालोनी टौंक रोड में विद्यमान है। झुनझुन, सीकर, चुरू, अलवर, बाडमेर में भी रोहिला गोत्र के जाट विद्यमान हैं । उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले में रोहेला गोत्र के जाटों के बारह गाँव हैं। महाराष्ट्र में रूहिलान गोत्र के जाट वर्धा में केसर व खेड़ा गाँव में विद्यमान हैं। 19. मुगल सम्राट अकबर ने भी राजपूत राजाओं को विजय प्राप्त करने के पश्चात् रोहिला-उपाधि से विभूषित किया था, जैसे राव, रावत, महारावल, राणा, महाराणा, रोहिल्ला, रहकवाल आदि। 20. "रोहिला-राजपूत" समाज , क्षत्रियों का वह परिवार है जो सरल ह्रदयी, परिश्रमी,राष्ट्रप्रेमी,स्वधर्मपरायण, स्वाभिमानी व वर्तमान में अधिकांश अज्ञातवास के कारण साधनविहीन है। 40 प्रतिशत कृषि कार्य से,30 प्रतिशत श्रम के सहारे व 30 प्रतिशत व्यापार व लघु उद्योगों के सहारे जीवन यापन कर रहे हैं। इनके पूर्वजो ने हजारों वर्षों तक अपनी आन, मान, मर्यादा की रक्षा के लिए बलिदान दिए हैं और अनेको आक्रान्ताओं को रोके रखने में अपना सर्वस्व मिटाया है । गणराज्य व लोकतंत्रात्मक व्यवस्था को सजीव बनाये रखने की भावना के कारण वंश परंपरा के विरुद्ध रहे, करद राज्यों में भी स्वतंत्रता बनाये रखी । कठेहर रोहिलखण्ड की स्थापना से लेकर सल्तनत काल की उथल पुथल, मार काट , दमन चक्र तक लगभग आठ सौ वर्ष के शासन काल के पश्चात् 1857 के ग़दर के समय तक रोहिले राजपूतों ने राष्ट्रहित में बलिदान दिये हैं। क्रूर काल के झंझावालों से संघर्ष करते हुए क्षत्रियों का यह 'रोहिला परिवार' बिखर गया है, इस समाज की पहचान के लिए भी आज स्पष्टीकरण देना पड़ता है। कैसा दुर्भाग्य है? यह क्षत्रिय वर्ग का। जो अपनी पहचान को भी टटोलना पड़ रहा है। परन्तु समय के चक्र में सब कुछ सुरक्षित है। इतिहास के दर्पण में थिरकते चित्र, बोलते हैं, अतीत झाँकता है, सच सोचता है कि उसके होने के प्रमाण धुंधले-धुंधले से क्यों हैं? हे- क्षत्रिय तुम धन्य हो, पहचानो अपने प्रतिबिम्बों को' - "क्षत्रिय एकता का बिगुल फूँक सब धुंधला धुंधला छंटने दो। हो अखंड भारत के राजपुत्र खण्ड खण्ड में न सबको बंटने दो ।।" 21. रोहिलखण्ड से विस्थापित इन रोहिला परिवारों में राजपूत परम्परा के कुछ प्रमुख गोत्र इस प्रकार पाए जाते हैं :- 
रोहिला, रोहित, रोहिल, रावल, द्रोहिया, रल्हन, रूहिलान, रौतेला , रावत यौधेय, योतिक, जोहिया, झोझे, पेशावरी पुण्डीर, पांडला, पंढेर, पुन्ड़ेहार, पुंढीर, पुंडाया चौहान, जैवर, जौडा, चाहल, चावड़ा, खींची, गोगद, गदाइया, सनावर, क्लानियां, चिंगारा, चाहड बालसमंद, चोहेल, चेहलान, बालदा, बछ्स (वत्स), बछेर, चयद, झझोड, चौपट, खुम्ब, जांघरा, जंगारा, झांझड निकुम्भ, कठेहरिया, कठौरा, कठैत, कलुठान, कठपाल, कठेडिया, कठड, काठी, कठ, पालवार राठौर, महेचा, महेचराना, रतनौता, बंसूठ जोली, जोलिए, बांकटे, बाटूदा, थाथी, कपोलिया, खोखर, अखनौरिया ,लोहमढ़े, मसानिया बुन्देला, उमट, ऊमटवाल भारतवंशी, भारती, गनान नाभावंशी,बटेरिया, बटवाल, बरमटिया परमार, जावडा, लखमरा, मूसला, मौसिल, भौंसले, बसूक, जंदडा, पछाड़, पंवारखा, ढेड, मौन तोमर, तंवर, मुदगल, देहलीवाल, किशनलाल, सानयाल, सैन, सनाढय गहलौत, कूपट, पछाड़, थापा, ग्रेवाल, कंकोटक, गोद्देय, पापडा, नथैड़ा, नैपाली, लाठिवाल, पानिशप, पिसोण्ड, चिरडवाल, नवल, चरखवाल, साम्भा, पातलेय, पातलीय, छन्द (चंड), क्षुद्रक,(छिन्ड, इन्छड़, नौछड़क), रज्जडवाल, बोहरा, जसावत, गौर, मलक, मलिक, कोकचे, काक कछवाहा, कुशवाहा, कोकच्छ, ततवाल, बलद, मछेर सिसौदिया, भरोलिया, बरनवाल, बरनपाल, बहारा
खुमाहड, अवन्ट, ऊँटवाल 
सिकरवार, रहकवाल, रायकवार, ममड, गोदे सोलंकी, गिलानिया, भुन, बुन, बघेला, ऊन, (उनयारिया) बडगूजर, सिकरवार, ममड़ा, पुडिया कश्यप, काशब, रावल, रहकवाल यदु, मेव, छिकारा, तैतवाल, भैनिवाल, उन्हड़, भाटटी बनाफरे, जादो, बागड़ी, सिन्धु, कालड़ा, सारन, छुरियापेड, लखमेरिया, चराड, जाखड़, सेरावत, देसवाल, पूडिया प्रमुख रोहिला क्षत्रिय शासक अंगार सैन - गांधार (वैदिक काल) अश्वकरण - ईसा पूर्व 326 (मश्कावती दुर्ग) अजयराव - स्यालकोट (सौकंल दुर्ग) ईसा पूर्व 326 प्रचेता - मलेच्छ संहारक शाशिगुप्त - साइरस के समकालीन सुभाग सैन - मौर्य साम्राज्य के समकालीन राजाराम शाह - 929 वि. रामपुर रोहिलखण्ड बीजराज - रोहिलखण्ड करण चन्द्र - रोहिलखण्ड विग्रह राज - रोहिलखण्ड - गंगापार कर स्रुघ्न जनपद (सुगनापुर) यमुना तक विस्तार दसवीं शताब्दी में सरसावा में किले का निर्माण पश्चिमी सीमा पर, यमुना द्वारा ध्वस्त टीले के रूप में नकुड़ रोड पर देखा जा सकता है। सावन्त सिंह - रोहिलखण्ड जगमाल - रोहिलखण्ड धिंगतराव - रोहिलखण्ड गोंकुल सिंह - रोहिलखण्ड महासहाय - रोहिलखण्ड त्रिलोक चन्द - रोहिलखण्ड रणवीर सिंह - रोहिलखण्ड सुन्दर पाल - रोहिलखण्ड नौरंग देव - रोहिलखण्ड सूरत सिंह - रोहिलखण्ड हंसकरण रहकवाल - पृथ्वीराज के सेनापति मिथुन देव रायकवार - ईसम सिंह पुण्डीर के मित्र थाना भवन शासक सहकरण, विजयराव - उपरोक्त राजा हतरा - हिसार जगत राय - बरेली मुकंदराज - बरेली 1567 ई. बुधपाल - बदायुं महीचंद राठौर - बदायुं बांसदेव - बरेली बरलदेव - बरेली राजसिंह - बरेली परमादित्य - बरेली न्यादरचन्द - बरेली राजा सहारन - थानेश्वर प्रताप राव खींची (चौहान वंश) - गागरोन राणा लक्ष्य सिंह - सीकरी रोहिला मालदेव - गुजरात जबर सिंह - सोनीपत रामदयाल महेचराना - क्लामथ गंगसहाय - महेचराना - क्लामथ 1761 ई. राणा प्रताप सिंह - कौराली (गंगोह) 1095 ई. नानक चन्द - अल्मोड़ा राजा पूरणचन्द - बुंदेलखंड राजा हंस ध्वज - हिसार व राजा हरचंद राजा बसंतपाल - रोहिलखण्ड व्रतुसरदार, सामंत वृतपाल 1193 ई. महान सिंह बडगूजर - बागपत 1184 ई. राजा यशकरण - अंधली गुणाचन्द - जयकरण - चरखी - दादरी राजा मोहनपाल देव - करोली राजारूप सैन - रोपड़ राजा महपाल पंवार - जीन्द राजा परपदेड पुंडीर - लाहौर राजा लखीराव - स्यालकोट राजा जाजा जी तोमर - दिल्ली खड़ग सिंह - रोहिलखण्ड लौदी के समकालीन राजा हरि सिंह - खिज्रखां के दमन का शिकार हुआ - कुमायुं की पहाड़ियों में अज्ञातवास की शरण ली राजा इन्द्रगिरी (रोहिलखण्ड) (इन्द्रसेन) - सहारनपुर में प्राचीन रोहिला किला बनवाया । रोहिला क्षत्रिय वंश भास्कर लेखक आर. आर. राजपूत मुरसेन अलीगढ से प्रस्तुत राजा बुद्ध देव रोहिला - 1787 ई., सिंधिया व जयपुर के कछवाहो के खेड़ा व तुंगा के मैदान में हुए युद्ध का प्रमुख पात्र । (राय कुँवर देवेन्द्र सिंह जी राजभाट, तुंगा (राजस्थान)
रोहिल्ला उपाधि - शूरवीर, अदम्य - साहसी विशेष युद्ध कला में प्रवीण, उच्च कुलीन सेनानायको, और सामन्तों को उनके गुणों के अनुरूप क्षत्रिय वीरों को तदर्थ उपाधि से विभूषित किया जाता था - जैसे - रावत - महारावत, राणा, महाराणा, ठाकुर, नेगी, रावल, रहकवाल, रोहिल्ला, समरलछन्द, लखमीर,(एक लाख का नायक) आदि। इसी आधार पर उनके वंशज भी आजतक राजपूतों के सभी गोत्रों में पाए जाते हैं। "वभूव रोहिल्लद्व्यड्कों वेद शास्त्रार्थ पारग: । द्विज: श्री हरि चन्द्राख्य प्रजापति समो गुरू : ।।2।। ( बाउक का जोधपुर लेख ) - सन 837 ई. चैत्र सुदि पंचमी - हिंदी अर्थ - "वेद शास्त्र में पारंगत रोहिल्लाद्धि उपाधिधारी एक हरिश्चन्द्र नाम का ब्राह्मण था" जो प्रजापति के समान था हुआ ।।6।। ( गुज्जर गौरव मासिक पत्रिका - अंक 10, वर्ष ।।माह जौलाई 1991 पृष्ठ - 13) (राजपुताने का इतिहास पृष्ठ - 147) (इतिहास रोहिला - राजपूत पृष्ठ - 23) (प्राचीन भारत का इतिहास, राजपूत वंश, - कैलाश - प्रकाशन लखनऊ सन 1970 ई. पृष्ठ - 104 -105 - ) रोहिल्लद्व्यड्क रोहिल्लद्धि - अंक वाला या उपाधि वाला । सर्वप्रथम प्रतिहार शासक द्विज हरिश्चन्द्र को रोहिल्लद्धि उपाधि प्राप्त हुई । बाउक,प्रतिहार शासक विप्र हरिश्चन्द्र के पुत्र कवक और श्रीमति पदमनी का पुत्र था वह बड़ा पराक्रमी और नरसिंह वीर था। प्रतिहार एक पद है, किसी विशेष वर्ण का सूचक नही है। विप्र हरिश्चन्द्र प्रतिहार अपने बाहुबल से मांडौर दुर्ग की रक्षा करने वाला था, अदम्य साहस व अन्य किसी विशेष रोहिला शासक के प्रभावनुरूप ही रोहिल्लद्व्यड्क उपाधि को किसी आधार के बिना कोई भी व्यक्ति अपने नाम के साथ सम्बन्ध करने का वैधानिक रूप में अधिकारी नही हो सकता। उपरोक्त से स्पष्ट है कि बहुत प्राचीन काल से ही गुणकर्म के आधार पर क्षत्रिय उपाधि "रोहिल्ला" प्रयुक्त । प्रदत्त करने की वैधानिक व्यवस्था थी। जिसे हिन्दुआसूर्य - महाराजा पृथ्वीराज चौहान ने भी यथावत रखा। पृथ्वीराज चौहान की सेना में एक सौ रोहिल्ला - राजपूत सेना नायक थे । "पृथ्वीराज रासौ" - चहूँप्रान, राठवर, जाति पुण्डीर गुहिल्ला । बडगूजर पामार, कुरभ, जागरा, रोहिल्ला ।। इस कवित्त से स्पष्ट है । कि - प्राचीन - काल में रोहिला- क्षत्रियों का स्थान बहुत ऊँचा था। रोहिला रोहिल्ल आदि शब्द राजपुत्रों अथवा क्षत्रियों के ही द्योतक थे । इस कवित्त के प्रमाणिकता "आइने अकबरी", 'सुरजन चरिता' भी सिद्ध करते हैं । युद्ध में कमानी की तरह (रोह चढ़ाई करके) शत्रु सेना को छिन्न - भिन्न करने वाले को रहकवाल, रावल, रोहिल्ला, महाभट्ट कहा गया है। महाराज पृथ्वीराज चौहान की सेना में पांच गोत्रों के रावल थे - रावल - रोहिला रावल - सिन्धु रावल - घिलौत (गहलौत) रावल - काशव या कश्यप रावल - बलदया बल्द मुग़ल बादशाह अकबर ने भी बहादुरी की रोहिल्ला उपाधि को यथावत बनाए रखा जब अकबर की सेना दूसरे राज्यों को जीत कर आती थी तो अकबर अपनी सेना के सरदारों को,बहादुर जवानों बहादुरी के पदक (ख़िताब,उपाधि) देता था। एक बार जब महाराणा मान सिंह काबुल जीतकर वापिस आए तो अकबर ने उसके बाइस राजपूत सरदारों को यह ख़िताब दी (उपाधि से सम्मानित किया) बाई तेरा हर निरकाला रावत को - रावल जी चौमकिंग सरनाथा को - रावल झंड्कारा कांड्कड को - रोहिल्ला रावत मन्चारा - कांड्कड काम करन, निरकादास रावत को रावराज और रूहेलाल को रोहिला✍️संकलित :-समय सिंह पुंडीर,राष्ट्रीय प्रचारक,क्षत्रिय अस्तित्व न्याय मोर्चा,आजीवन सदस्य अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा स्थापित१८९७ईस्वी भारत मुख्यालय दिल्ली, 🙏🌹🌷

Sunday, 1 February 2026

SHIV DATT SINGH ROHILA GZD

*आदरणीय सभापति श्रीमहेश बेनाडीकर पाटिल, सदन नेता श्री कुंवर अजय सिंह, श्री सुखदेव गोगामेडी, ............ सम्मानित मंच देश के कोने कोने से पधारे विभिन्न रजवाडे रियासतों सूबो और राज्यो से संबंधित महान वीर पुत्रों * मैं शिव दत्त सिंह रोहिला,संयोजक अखिल भारतीय रोहिला क्षत्रिय विकास परिषद रजिस्टर्ड,संसद सदस्य गवर्निंग कोंसिल राष्ट्रीय क्षत्रिय जन संसद व संयोजक क्षत्रिय अधिकार न्याय मोर्चा समस्त क्षत्रिय महानुभावों को बोलता हूं जय भवानी जय श्री राम और सभी को मेरा नमस्कार। मैं उत्तर प्रदेश के एक बहुत बडे भाग रोहिलखण्ड राजपूताना का प्रतिनिधित्व कर रहा हूं गवर्निंग कोंसिल संसद सदस्य होने के नाते मैं समस्त देश में विभिन्न नामों उपनामों को धारण किए हुए बिखरे पड़े क्षत्रियों जैसे बुंदेला,चंदेला, बघेला रोहिला ,खंगार, रवा,ओड,लोधी, सिक्ख, मराठा,अर्कवंशी,गोरखा,रवानी, कोलिए,अग्नि वंशी ,चोल , पांड्या गगोई आदि सभी संगठनों के प्रमुखों और गवर्निंग कोंसिल सदस्यों ,क्षत्रिय अधिकार न्याय मोर्चा संयोजको आदि पदाधिकारियों से निवेदन करता हूं कि हम जो लगभग छ हजार टुकड़ों में बिखरे पड़े समस्त क्षत्रियों की एकता व जो सिंह शावक इस्लामिक आक्रांताओं द्वार मचाई हुई भयंकर मारकाट की भगदड़ में मेमने के झुंडो में गुम गए उन्हे अपनी सिंह नाद सुना कर वापस लाने हेतु क्षत्रिय समाज के सामने बहुत विषम परिस्थितियां खड़ी है जिन पर विचार करना और निर्णय आवश्यक हो गया है जैसे सूर्य वंशी क्षत्रिय मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम जन्म भूमि ट्रस्ट में क्षत्रियों की भागीदारी ,वामपंथियों द्वारा लिखित इतिहास को वास्तविक रूप देना उस इतिहास को बदला जाना जिसमे मुस्लिम अक्रांता शासकों का महिमा मंडन किया गया और स्थानीय बलिदानी क्षत्रिय राजाओं को विद्रोही लिखा गया है,जितने भी मार्गो नाम शहरो के नाम मुस्लिम आक्रांताओं ने अपने नाम पर किए या चाटुकार सरकारों ने मुस्लिमो के नाम पर रखे उन्हे बदला जाना और क्षत्रिय राजाओं के नाम पर रखा जाना क्योंकि उन्होंने ही प्रजा की रक्षा की तथा अपना जीवन का सर्वोच्च बलिदान देकर देश को बचाया लोक तंत्र के लिए अपना सर्वस्व दे दिया जितनी भी राष्ट्रीय धरोहर है सभी क्षत्रिय स्थापत्य है उनके रख रखाव के लिए क्षत्रियों का रखा जाना और सबसे घातक आरक्षण है जिसने क्षत्रिय समाज की रीढ़ तोड़ दी है,इसके लालच में क्षत्रिय समाज का विघटन हो रहा है खंड खंड हो विभिन्न जातियों में बंट गया है इस आरक्षण को समाप्त कराना और एस सी एस टी एक्ट जिसमे उल्लिखित है कि केवल एस सी को एस सी कहने मात्र से सवर्ण जाति को तुरंत गिरफ्तार किया जाए यह धारा हटवाना आदि अति आवश्यक व ज्वलंत मुद्दों पर कीर्यानवन तभी संभव है जब अपनी कोई राजनीतिक पकड़ हो,अपनी पार्टी हो अपनी सरकार हो,इसके लिए समस्त क्षत्रियों को एक मंच पर लाया जाए और एक राजनीतिक पार्टी का गठन हो,जैसे अखिल भारतीय क्षत्रिय विकास पार्टी ,राष्ट्रीय क्षत्रिय जन विकास पार्टी, राष्ट्रीय क्षत्रिय उत्थान मोर्चा आदि , हे क्षत्रिय वीर पुत्रों आज समय आ गया है कि जो आपके बलिदान स्वरूप आपको नही मिला वह पाना होगा,कुछ स्वहितार्थ कर दिखाना होगा*
   बुंदेलखंड जहां पहले बनाफर राजपूतों की रियासत थी ओर फिर चंदेल राजपूतों ने शासन किया उसी से लगता हुआ उत्तर पूर्व का राज्य राजपुताना रोहिलखंड हैं ,जिसने महान सम्राट चक्रवर्ती हिंदुआसुर्य्य प्रथ्वीराज चौहान के बाद शेष राजपूतों को कन्नौज पतन के बाद राजपूत एकता का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए तत्कालीन दिल्ली सलतनत को धूल चटाई ओर लगभग चार सौ साल संघर्ष करते हुए अपना सर्वस्व बलिदान कर दिया उन्ही महान वीर क्षत्रियों की संतान सूर्य वंशी ,रघुवंश निकुंभ काठी खाप के महाराजा रणवीर सिंह कठेहर रोहिलखंड नरेश की 817वी जयंती अक्टूबर 25, 2020 को बडी धूमधाम से समस्त राजपूत समाज ने पूरे उत्तर भारत में मनायी गयी। इसी प्रकार सभी क्षत्रिय वीर महाराजाओं की जयंती मनाई जाए। अट्ठारहवीं सदी तक इस्लामिक दबाव के चलते कुछ राजपूत कठेहर रोहिलखंड से भारत के अन्य भागों में गए और रोहिला राजपूत कहलाए। कठेहर रोहिलखंड को औरंगजेब के कमजोर पड़ते ही तुरंत स्वतंत्र घोषित कर रोहिलखंड की पश्चिमी सीमा पर गंगा पार करके सहारनपुर में महान शासक राजा इन्द्र सेन ने 1702 ईसवी तदानुसार 1761 विक्रमी में एक किले का निर्माण कराया जो आज प्राचीन रोहिला किला के नाम से प्रसिद्ध हे भारत के पुरातत्व विभाग ने इसे अपने संरक्षण में लेकर राष्ट्रीय धरोहर घोषित किया हुआ है, उसी प्राचीन रोहिला किला को ब्रिटिश राज में गदर के बाद एक कारागार के रूप में प्रयोग किया ओर आज़ादी के सेनानियों की जेल बना डाली आज भी उसमे जिला कारागार स्थित है ,उसी प्राचीन रोहिला किला के सामने स्थित चौक का नाम सूर्य वंशी क्षत्रिय कठेहर नरेश के नाम पर महाराजा रणवीर सिंह रोहिला चौक कराया गया हे , बड़ौत नगर में एक मार्ग का नाम राजा रणवीर सिंह रोहिला मार्ग हे। इसी प्रकार नगर नगर गांव गांव में चौराहों ,मार्गो और भवनों के नामकरण उन क्षत्रिय राजाओं के नाम पर कराए जाने चाहिए जिन्हे भुलाने में कोई कमी नही छोड़ी गई है।
   *अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा ने समस्त क्षत्रियों की एकता के लिए जो बीड़ा उठाया था उसी महान विश्व विजेता क्षत्रिय संगठन के एकता हेतु किए गए महान कार्यों के कारण आज रोहिलखंड के क्षत्रिय भी आपके सम्मुख आपने भाइयों से मिल सके ओर भारत भूमि के अनेक महान क्षत्रिय वंशजों के दर्शन कर सके। हम अखिल भारतीय रोहिला क्षत्रिय विकास परिषद रजिस्टर्ड की ओर से माननीय सभा पति जी कुंवर अजय सिंह जी व महेश मोहनराव पाटिल बेनाडीकर का आभार प्रकट करते हे जो अपने बिछुड़े क्षत्रियों को मिलाने ओर एकता करने के लिए कटी ब्द्ध है आज के परिवेश में जहा पर क्षत्रियों के विरूद्ध स्वतंत्रता के बाद से ही कुचक्र चल रहे हे,राष्ट्रीय क्षत्रिय जन संसद का गठन अति आवश्यक था समय की पुकार हे कि क्षत्रिय अधिकार न्याय मोर्चा समस्त क्षत्रियों के लिए आवश्यक अधिकार की मांग करे ओर पूरा कराए, अपनी जमीन राज्य आदि सब कुछ लोक तंत्र को सौंपने के बाद भी क्षत्रिय आज अपने बलिदानों की परिणिती को क्यों तरस रहा है यही जानने हेतु आज आप हम सब देश के विभिन्न क्षेत्रों से एकत्र हुए हे कि भारत में हो रही क्षत्रियों की उपेक्षा के चलते किस तरह क्षत्रिय एकता बनाए जाएं ।
एकता न बन पाने के मुख्य कारण हे क्षत्रिय इतिहास जो भारत का गौरव शाली इतिहास है उसे वामपंथियों ओर चाटुकारों द्वारा लिखा जाना जिससे क्षत्रिय संस्कृत ओर विरासत भ्रमित हो भावी पीढ़ी को मार्ग दर्शन न किया जाना, जिससे मानसिक क्षमता ओर इतिहास के प्रति जागरूकता कम हुई।*
*मेरा राजपूत भाइयों से अनुरोध है कि सरकार पर हरेक क्षेत्र में दबाव बनाया जाए कि भारत के महान बलिदानी राजाओं सभ्यताओं की जानकारी पाठ्यक्रम में लाई जाए जिसे आज के सेलेब्स ने पूर्णतया नकार रखा हे,राजपुताना संस्कृती विरासत ओर सभ्यता को यदि भावी पीढ़ी को बताने की बात आए तो इतनी गहरी जड़ें हे इतिहास के पन्ने कम पड़ जाए। उत्तर प्रदेश की ही बात है बेंसवाडा में बेंस राजपूतों न शासन किया मैनपुरी में चौहान ने,दिल्ली में तोमर राजपूतों ने, वृंदावन व मथुरा में सोम वंश ने बुंदेलखंड में चंदेल ओर बनाफर ओर बुंदेला ने, रोहिलखंड में रोहिला कठेरिया राजपूतों ने , विजयपुर सीकरी में सूर्य वंशी सिकरवार राजपूत शासन था अकबर ने ध्वस्त कर फतेहपुर सीकरी किया रोहिलखंड के राजपुताना पर अफगानों को काबिज कर रूहेलखंड लिखा यह सब कोई उल्लेख नहीं है क्या यह इतिहास कारो की महान भूल है या सरकार ही नहीं चाहती कि भावी पीढ़ी क्षत्रिय बलिदान से अवगत हो कहने को बहुत है अंत में यही कहना है कि यदि आज इन ज्वलंत मुद्दों पर क्षत्रिय जन संसद विचार नहीं करती तो यह क्षत्रिय समाज उस वाटिका के समान विकर्षण को प्राप्त हो जाएगा जिसमे पोधे तो विभिन्न प्रकार के है किन्तु सुवासित पुष्प बसंत से रूठ जाए।*

*जय भवानी*
*जय MAHARANA*
*जय चौहान*
*जयMAHARAJA RANVEER SINGH ROHILA*