*प्राचीन रोहिला राजवंश*
*रोहिला क्षत्रिय/राजपूत*
वैववस्त मनु से प्रारंभ हुई, , श्रीराम व श्री कृष्ण जिस कालखंड में है, सहस्राब्दियो पूर्व से भारत की पावन भूमि पर आज तक चली आ रही, क्षत्रिय वंशो की अटूट परम्परा को नमन करते हुए, एक राजन्य (राजपुत्र) ही जन्मसिद्ध स्वतंत्रता की रक्षा सदैव सीमाओ पर KARTA AYA है हिंदुकुश रोहित-गिरि पंचनद तक भरत खण्ड की पश्चिमी उत्तरीय सीमा के क्षत्रिय प्रहरियों का दीर्घ कालीन विकट संघर्ष ही भारत की संस्कृति व सभ्यता की रक्षा करता रहा है। आक्रमणकारियों के लिए रोहितगिरि का उत्तारापथ ही पूर्व काल से एक प्रवेश द्वार था। सूर्य, चन्द्र और नागादि संज्ञक क्षत्रिय वंशो की शाखाओं प्रशाखाओं में बंटे महाजनपद गणराज्यों के शासक ही प्राचीन आर्य सभ्यता को मध्य एशिया तक प्रसारित करने में संघर्षरत थे। यह प्रसार क्रम कई द्वीपों तथा मध्य एषिया तक होता चला गया, जहाँ से उनका आना जाना बसना उजडना लगा रहता था। वर्तमान भारत में बिखरे पड़े हजारों षाखाओं व प्रषाखाओं में विभाजित करोड़ो संताने है जो सूर्य व चन्द्र वंष की दो समानान्तर विकसित सभ्यताओं के रूप में समूचे आर्यवर्त, हिमवर्ष व मध्यएषिया, अरब ईरान, मिश्र आदि तक फैल गये थे तथा अपने व अपने पूर्वजों, धर्मगुरूओं ओर वंश पुरोहितों, ऋषियों आदि के नाम पर अपने गणराज्य व ठिकाने स्थापित कर रहे थे।।
रोहिला शब्द भी इसी क्रम की एक
अटूट कड़ी है प्रयाग के पास झूँसी में विकसित प्राचीन चन्द्रवंषी चक्रवर्ती सम्राट पुरूरवा व उसके वंशधरो में प्रख्यात सम्राट ययाति के पांच पुत्र पंचजन कहलाये और उनके पाँच जनपद स्थापित हुए। लगभग सात सहस्त्राब्दी पूर्व मध्य देश आर्यवर्त में विश्व की प्राचीनतम् सभ्यता विकसित हो रही थी, इलाहाबाद, (प्रयाग) के पास झूँसी में चन्द्रवंषी क्षत्रियों व कौशल (अयोध्या) में सूर्य वंशी इक्ष्वाकु के वंशधरो के राज्य खण्ड स्थापित हो रहे थे। उस काल की परम्परा के अनुसार जिस सम्राट के रथ का चक्र अनेक राज्यों में निशंक घूमता हो वह चक्रवर्ती सम्राटों की श्रेणी में मान्य होता था। वन गमन से पूर्व (वानप्रस्थ आश्रम) सम्राट ययाति ने अपने पाँच पुत्रों क्रमश यदु, तुर्वसु, द्रहृाू (उपनाम रोहू) पुरू और अनु के लिए अपने साम्राज्य को पांच भागों में विभक्त कर प्रत्येक पुत्र को अपने-अपने प्रदेशों के शासनाधिकार का उत्तरदायित्व सौंप दिया था*
1. *यदु- दक्षिण पश्चिम में केन-बेतुआ और चम्बल नदी के कांठो का प्रदेश दिया, कालान्तर में यदु के वंशधर यादव कहलाये*।
2. *तुर्वसु-कुरूष प्रदेष वर्तमान बघेल खण्ड तुर्वसु को प्राप्त हुआ, वहां कुरूषजनों को परास्त कर तुर्वसु वंष की स्थापना हुई*।
3. *द्रह्यु- चम्बल नदी के उत्तर पश्चिम, सिन्धु नदी के किनारे तथा यमुना नदी के पष्चिम पचनद (पंजाब) का पूरा प्रान्त द्रह्यु को मिला। द्रुह्यु के वष्ंाधर आगे चल कर उत्तर और पूरब में हिन्दु कुष तथा पामीर ओर पश्चिमोत्तर में वाल्हिक, हरअवती तक के विस्तुत क्षेत्रों पर अपना अधिकार स्थापित करते चले गए और वैदिक संस्कृति का प्रसार किया*।
4. *पुरू- पुरू को प्रतिष्ठान के राज्य सिंहासन पर आसीन किया गया, पुरू के वंष आगे चलकर पौरव कहलाए इसी वंष में भरत का जन्म हुआ, आर्यवर्त, हिमवर्ष, जम्बूद्वीप (मध्यप्रदेष-विन्घ्याचल से हिन्दुकुष रोहित गिरी तक) का नाम भरत खण्ड भारत वर्ष कहलाया*।
5. *अनु- यमुना नदी को पूरब* *और गंगा यमुना के मध्य का देष (दक्षिण पंचाल) तथा अयोध्या के पष्चिम के क्षेत्र अनु को प्राप्त हुए अनु के वंष घर आनव कहलाए*।
*इस प्रकार चन्द वंश का विस्तार हुआ*।
*आर्यवर्त की उत्तरी सीमा पर स्थित केकय देष भरत को उसकी माता कैकेयी के राज्य के कारण प्राप्त हुआ। भरत के दो पुत्रों तक्ष व पुष्कर ने क्रमषः तक्षषिला व पुष्करावती दो राजधानियां स्थापित की और आर्य संस्कृति को समृद्ध किया। उस काल में संस्कृत ही मातृभाशा थी*।
*भारत की पश्चिमि उत्तरीय सीमाओं पर जिस अवसर पर भी विदेशी आक्रमण हुए सूर्य वंशी भरत और चन्द्र वंशी द्रह्यु के वंशधरों ने मिल कर**
**प्रहरियों के अनुरूप अपना रक्त बहाया। ईसा से लगभग पाँच सौ वर्ष पूर्व से इस पर्वतीय प्रदेष में पचनद तक ‘कठ‘ गणराज्य, छुद्रक गणराज्य, यौधेय गणराज्य, मालव गणराज्य, अश्वक गणराज्य आदि फल फूल रहे थे। इनकी शासन प्रणाली गणतंत्रात्मक* *थी। यहाँ के निवासी सौंदर्यापासक थे और सुन्दर पुरुष ही राजा चुना जाता था। दु्रह्यु देश का नाम कालान्तर में द्रुह्यु के वंशज गंधारसैन के नाम पर गांधार और सूर्यवंषी राजाओं ने अपने शासित प्रदेष को ‘कपिष‘ के नाम से प्रसिद्ध कर काबुल (कुम्भा) नदी के पूर्वोत्तरीय क्षेत्र में अपनी राजधानी का नाम कपिषा रखा*
*प्राचीन काल में कपिष (लडाकू, उदण्ड पर्वताश्रयी) और गान्धार की भाशा संस्कृत थी, किन्तु मध्यकाल से संस्कृत भाशा का विकृत सरलीकृत रूप ‘ प्राकृत‘ में परिवर्तित हो गया। भाषा के आधार पर यह स्पष्ट है कि इस प्रदेष में सहस्त्रों वर्ष तक भारतीय संस्कृति और सभ्यता स्थापित रही और इस समस्त प्रदेष में दीर्घ काल तक आर्य क्षत्रिय नरेषों का षासन रहा*।
*अनेक पहाड़ियों (माल्यवत्त-रोहितगिरि-लोहितगिरि-हिन्दकाकेश्षस-रोहतांग आदि) नदियों (कुनार, स्वातु, गोमल, कुर्रम, सिन्धु की सहायक नदियाँ- सतलज, रावी, व्यास तथा घाटियों के कारण सामरिक दृष्टि से भी यह प्रदेष इन पर्वताश्रयी क्षत्रिय नरेषों के लिए महत्वपूर्ण था। यहाँ ठण्डी ऋतु जलवायु की दृष्टि से अति उत्तम रही। इसलिए यहां के निवासी बलिष्ठ, रक्तिम वर्ण (ललिमा चुक्त गोरा रंग) व कद काटी में मजबूब, हठी व गठीले होते रहे है। दुर्गम पहाड़ियों, नदियों व घाटियों के कारण यहां के निवासी पर्वताश्रयी, अश्वारोही थे। अश्वो के लिए प्रसिद्ध रहा यह प्रदेश रोहित गिरिये, रोहित नस्ल के अश्वों के व्यापार का प्रमुख केन्द्र था। क्रमषः *इसी कारण यह प्रदेष घोड़ों का प्रदेष अथवा अष्वकों का प्रदेश* *(अष्वकायन) कहलाता था*
**रोहित (संस्कृत), वर्तमान भाषा में लाल- भूरा रंग के घोड़े और श्येन नस्ल *के घोड़े पाए जाते थे। घोडों अथवा अष्वारोहण के बिना यहां जीवन* *सम्भव नहीं था। विदेषी* *आक्रमणों के समय अष्वों की प्रथम भूमिका थी। गहरे किसमिसी रंग के बहादुर घोड़ों को रोहित नाम से सम्बोधित किया जाता था*।
*ईरानी व यूनानी विद्वानों के द्वारा भी इस प्रदेश के रोहित नस्ल के घोड़ों की प्रषन्सा की गई है*
* **इस प्रदेश के (महाजनपद) प्राचीन शासक (चन्द्रवंषी) द्रुह्यु का उपनाम भी रोहु था। इसलिए इसका नाम द्रुहयू का देश रोह देश रोहित गिरि रोह प्रदेश (अपभ्रनस होता चला* गया )हो जाना व्यावहारिक व स्वाभाविक था। *
*संस्कृत भाषा में रोह का अर्थ है- सीधे दृढ़-बल युक्त चढ़ना-अवरोहण करना, रक्तिम वर्ण (रोहित), पर्वत (माउण्टेन) इसलिए मध्यकाल तक ये पर्वताश्रयी* *क्षत्रिय शासक रोहित वर्ग से प्रसिद्ध हुए*।
*पर्वतीय प्रदेश का नाम , रोहित प्रदेश*
(प्रांकृत संस्कृत में) यहां सेनाओं की युद्ध प्रणाली रोहिल्ला युद्ध (रोहिला वार, लैटिन भाषा में) प्रणाली
*सीधे दृढ़ बल युक्त पर्वत पर अवरोहण की तरह तीब्रता से शत्रु पर चढ़ जाना*
*शत्रु सेना पर बाढ़ रोह की तरह, लाल* *होकर (रक्ति वर्ण क्रोधित आक्रोष युक्त) टूट पड़ना, तीब्रता से षत्रु सेना में घुस जाना। रोह (कमानी) के समान षत्रु सेना को भेदते, (काटते जाना) हुए चढ़ाई करना, प्रख्यात हुई* कालांतर में अनेक *क्षत्रिय सेनानायकों को , रोहिल्ला उपधि से विभूषित किया गया*। (मध्यकाल में)
‘‘धृतकौषिक मौद्गल्यौ आलम्यान परषरः।
सौपायनस्तथत्रिश्च वासुकी रोहित स्तथा।‘‘
(राष्ट्रधर्म-भाद्रपद 2067, सितम्बर 2010 के पृष्ठ 31 पर रोहित गोत्र का उपरोक्त श्लोक में वर्णन)
‘‘अरूषा रोहिता रथे बात जुता
वृषभस्यवते स्वतः‘‘ ।।10।।
(ऋग्वेद मण्डल 1, अ0 15 स्0 94 ‘‘ रोहिला क्षत्रियों का क्रमबद्ध इतिहासः पृष्ठ 42)
*मद्रान, रोहित कश्चैव, आगेयान, मालवान अपि गणन सर्वान, विनिजीत्य, प्रहसन्निव,। महाभारत वन पर्व 255-20 प्राचीन रोहित गिरि के नाम का अस्तित्व आज भी रोहतांग घाटी, रोहतांग दर्रानाम से अवस्थित है*।
*महाभारत के सभा पर्व में लोहित (रोहित) (संस्कृत शब्द) प्रदेश के दस मण्डलों का उल्लेख है जो भारत का उत्तर पूर्वी मध्यभाग था। श्री वासूदेव शरण अग्रवाल*
‘‘ *पाणिनि कालीन भारत वर्ष पृष्ठ 449 ‘‘ अश्येनस्य जवसा‘‘ वैदिक साहितय ऋग्वेद 1, अ0 17, मत्र 11, सुक्त 118-119 अर्थात- दृढ निश्चय के साथ (अश्येनस्य ) बाज पखेरू के समान (जवसा) तीव्र वेग के समान हम लोगो को आन मिली। (यह श्येन और रोहित नस्ल के घोडों की अश्व के रोहिला सेनाओं का वर्णन है*।)
‘‘ *उत्तरीय सीमा प्रान्त मे ंएक सुरम्य स्थानथा यहाँ का राजा क्षत्रिय था वह अपनी प्रजा को बहुत प्यार करता था, यहाँ विभिन्न प्रकार के अन्न व फलों के वृक्ष थे*
*यहां के निवासी भयानक थे तथा उनकी भाषा रूक्ष संस्कृत थी। ये रजत तथा ताम्र मुद्राओं का प्रयोग करते थे*
*ये बहुत लडाकू तथा बहादूर थे यह क्षेत्र कुम्भा नदी के उत्तर पूर्व में 155 मील दूर था। ‘‘ एक प्रसिद्ध इतिहासकार टालेमी के अनुसार यह वर्णन चीन पागी युलान-च्वाड्डा ने किया। प्राचीन भारत का ऐतिहासिक भूगोल पृष्ठ 153-154 द्वारा श्री विमलचन्द्र लाहा (रोहिला क्षत्रिय क्रमबद्ध इतिहास से साभार‘‘) पाणिनी ने भी पश्चिमोत्तरीय सीमा प्रान्त के अश्वकायनों, अश्वकों, कठों, यादवों, छुद्रकों, मालवों निवासी सभी क्षत्रिय वर्गो को पर्वतीय और युद्धोपजीवि कहा है*।
*पर्वतीय (संस्कृत-हिन्दी), माउण्टेनीयर (लैटिन-अंगे्रजी), रोहित, रोहिते, रोहिले (संस्कृत ‘प्राकृत‘ - पश्तों) रोहिले-चढ़ने वाले, चढाई करने वाले अवरोही, अश्वारोही, द्रोही रोह रोहि पक्थजन , आदि समानार्थी शब्दों का सम्बन्ध प्राचीन क्षत्रिय वर्गोक्षत्रिय शासित क्षेत्रों ,पर्वतीय प्रदेशों (रोहितगिरि, रोहताग दर्रा, लोहित गिरि, कोकचा, पर्वत श्रेणी आदि)युद्ध प्रणालियों और नदी घाटी, काॅठो घोड़ों की पीठ पर (चढ़कर करने बहादुरी के साथ लडने वाले गुणों स्वभावों व क्षात्र धार्मो से है। भारतीय इतिहास में रोहिला- क्षत्रिय एक गौरवशाली वंश परम्परा है जिसमें कई प्राचीन क्षत्रिय वंशों के वंशज पाए जाते है। क्येांकि यह शब्द, क्षेत्रीयता (रोहिल देश, रोहित प्रदेश रोहित गिरि आदि द्रोह देश- रोह देश) गुणधर्म (रोहित-रक्तिम वर्ण) (कसमिसि लाल रंग) युद्ध प्रणाली (रोहिल्ला-युद्ध) (पूर्व वर्णित प्रणाली) उपाधि, बहादूीर, शौर्यपदक और क्षत्रिय सम्मान से जुडा है, इसलिए जो भी क्षत्रिय राजपुत्र इन सभी से सम्बन्धित रहा- रोहिला-क्षत्रिय अथवा रोहिल्ला राजपुत्र कहलाया गया। रोहिला-पठान इस्लामीकरण के पश्चात् की पक्भजनों , (क्षत्रिय) की आधुनिक वंश परम्परा है। जबकि क्रमशः रोहिला-क्षत्रिय पुरातन काल से भारतवर्ष में एक प्रहरी के रूप में विद्यमान रहे है*।
*सहारनपुर के प्रख्यात साहित्यकार श्री कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर ने अपने पावन ग्रन्थ ‘‘ भगवान परशुराम‘‘ में भी रोहिल देश की चर्चा की है*।
*प्रतिष्ठित ज्योतिषी एवं ग्रन्थकार डा. सुरेश चन्द्र मिश्र ने हिन्दुस्तान दैनिक‘‘ के रविवार 20 नवम्बर 2009 के मेरठ संस्करण के पृष्ठ-2 पर ‘‘ मूल गोत्र तालिका (40गोत्र) के क्रमांक छः पर क्षत्रिय गो़त्र रोहित का वर्णन किया है। वैदिक काल में पांच की वर्ग या समुदाय आर्य क्षत्रियों के थे जो मिलकर पंचजना-पंचजन कहे जाते थे। इनके सम्मिलित निर्णय को सभी लोग विवाद की दशा में मान लेते थे। इसी शब्द की परम्परा से आज पंचायत शब्द प्रचलित है। ये पांच वशं पुरूष या गोत्रकर्ता थे*।
*यादव कुल पुरुष यदु, पौरव वंश पुरूष पुरू, द्रहयु वंश पुरूष द्रुहयु, तुर्वषु और आनववंश पुरूष अनु, से शेष अन्य समुदाय निकले थे*।
*क्षत्रिय वंश तालिका -14 (गंधार) वं. ता.-5*
*इन्ही पांच वंशों के पुरूषों से महापंचायत बनती थी। प्रारम्भ में इन्हीं पंचजनों से लगभग 400 क्षत्रिय गोत्रों का प्रसार हुआ*
*भारत की पष्चिमोत्तरीय सीमा पर विदेषी आक्रमण कारियों के आक्रमणों को विफल करने के लिए वहां के निवासी क्षत्रिय वर्गो एवं शासकों ने आरम्भ से ही प्रत्येक अवसर पर आक्रान्ताओं के विरूद्ध घोर संघर्ष किया किन्तु मैदानी षासकों की दुर्बल सीमान्त निति के कारण उन्हें किसी भी प्रकार की सहायता उपलब्ध हो सकी। इसलिए सीमान्त प्रदेष के वीर प्रहरी वर्ग इन प्रबल सुगठित आकान्ताअें की अपार शक्ति के सम्मूख लगभग पाँच सौ वर्षो से अधिक संघर्ष न कर सके और सिकन्दर के आक्रमण ईसा पूर्व लगभग 326 के पष्चात् से नदियाँ घाटियाँ, पर्वताश्रय पार करने लगे और मैदानी स्थानों की तरफ पूर्व व पूर्वोत्तर की तरफ आने लगे*
*(अध्याय-9) क्षत्रिय कुल ‘ काठी क्रम सं. 5*
*पष्चिमोत्तरीय-सीमा प्रान्त पंजाब की जातियों व समुदायों का विवरण जो कि - स्व. सर डैंजिल लिबैट्रषन द्वारा पंजाब की जनगणना सन् 1883 और सर एडवर्ड मैकलेजन द्वारा पंजाब की जनगणना 1892 पर आधारित, सर .एच.ए. रोज द्वारा संकलित कोष है*
हमारी गौरवशाली संस्कृति में सबसे गौरवशाली नाम और वैदिक नाम आर्य है, किंतु दुर्भाग्य से बहुत से लोग आर्य शब्द से नफरत करते हैं और तथाकथित मनुष्यों द्वारा दिए गए नाम को मानते हैं।
यहां वैदिक और लौकिक ग्रंथों से 'आर्य' शब्द के कुछ प्रमाण दिए जा रहे हैं
१) ऋग्वेद में :-
"कृण्वन्तो विश्वमार्यम ।"
सारे संसार को 'आर्य' बनाओ, श्रेष्ठ बनाओ ।
२) मनुस्मृति में :-
"मद्द मांसा पराधेषु गाम्या पौराः न लिप्तकाः ।
आर्या ते च निमद्यन्ते सदार्यावर्त्त वासिनः ।।"
वे ग्राम व नगरवासी, जो मद्द, मांस और अपराधों में लिप्त न हों तथा सदा से आर्यावर्त्त के निवासी हैं, वे 'आर्य' कहे जाते हैं ।
३) वाल्मिकी रामायण में :-
"सर्वदा मिगतः सदिशः समुद्र इव सिन्धुभिः ।
आर्य सर्व समश्चैव व सदैवः प्रिय दर्शनः ।।"
(बालकाण्ड)
जिस प्रकार नदियाँ समुद्र के पास जाती है, उसी प्रकार जो सज्जनों के लिए सुलभ हैं, वे 'आर्य' हैं, जो सब पर समदृष्टि रखते हैं, हमेशा प्रसन्नचित्त रहते हैं ।
४) महाभारत में :-
"न वैर मुद्दीपयति प्रशान्त,न दर्पयासे हति नास्तिमेति ।
न दुगेतोपीति करोव्य कार्य,तमार्य शीलं परमाहुरार्या ।।"
(उद्योग पर्व)
जो अकारण किसी से वैर नहीं करते तथा गरीब होने पर भी कुकर्म नहीं करते, उन शील पुरुषों को 'आर्य' कहते हैं ।
५) वशिष्ठ स्मृति में :-
"कर्त्तव्यमाचरन काम कर्त्तव्यमाचरन ।
तिष्ठति प्रकृताचारे यः स आर्य स्मृतः ।।"
जो रंग, रुप, स्वभाव, शिष्टता, धर्म, कर्म, ज्ञान और आचार-विचार तथा शील-स्वभाव में श्रेष्ठ हो, उसे 'आर्य' कहते हैं ।
६) निरुक्त में यास्काचार्य जी लिखते हैं :-
"आर्य ईश्वर पुत्रः ।"
'आर्य' ईश्वर के पुत्र हैं।
७) विदुर नीति में :-
"आर्य कर्मणि रज्यन्ते भूति कर्माणि कुर्वते ।
हितं च नामा सूचन्ति पण्डिता भरतर्षभ ।।"
(अध्याय १ श्लोक ३०)
भरत कुल भूषण ! पण्डितजन्य, जो श्रेष्ठ कर्मों में रुचि रखते हैं, उन्नति के कार्य करते हैं तथा भलाई करने वालों में दोष नहीं निकालते हैं, वही 'आर्य' हैं ।
८) गीता में :-
"अनार्य जुष्टम स्वर्गम् कीर्ति करमर्जुन ।"
(अध्याय २ श्लोक २)
हे अर्जुन ! तुझे इस असमय में यह अनार्यों का सा मोह किस हेतु प्राप्त हुआ, क्योंकि न तो यह श्रेष्ठ पुरुषों द्वारा आचरित है और न स्वर्ग को देने वाला है तथा न कीर्ति की और ही ले जाने वाला है । यहां पर अर्जुन के अनार्यता के लक्षण दर्शाये हैं ।
९) चाणक्य नीति में :-
"अभ्यासाद धार्यते विद्या कुले शीलेन धार्यते ।
गुणेन जायते त्वार्य,कोपो नेत्रेण गम्यते ।।"
(अध्याय ५ श्लोक ८)
सतत् अभ्यास से विद्या प्राप्त की जाती है, कुल, उत्तम गुण, कर्म, स्वभाव से स्थिर होता है, आर्य श्रेष्ठ गुणों के द्वारा जाना जाता है ।
१०) नीतिकार के शब्दों में :-
"प्रायः कन्दुकपातेनोत्पतत्यार्यः पतन्नपि ।
तथा त्वनार्ष पतति मृत्पिण्ड पतनं यथा ।।"
आर्य पाप से लिप्त होने पर भी गेन्द के गिरने के समान शीघ्र ऊपर उठ जाता है, अर्थात पतन से अपने आपको बचा लेता है, अनार्य पतित होता है, तो मिट्टी के ढेले के गिरने के समान फिर कभी नहीं उठता ।
११) अमरकोष में :-
"महाकुलीनार्य सभ्य सज्जन साधवः ।"
(अध्याय२ श्लोक६ भाग३)
जो आकृति, प्रकृति, सभ्यता, शिष्टता, धर्म, कर्म, विज्ञान, आचार, विचार तथा स्वभाव में सर्वश्रेष्ठ हो, उसे 'आर्य' कहते हैं ।
१२) कौटिल्य अर्थशास्त्र में :-
"व्यवस्थितार्य मर्यादः कृतवर्णाश्रम स्थितिः ।"
आर्य मर्यादाओं को जो व्यवस्थित कर सके और वर्णाश्रम धर्म का स्थापन कर सके, वही 'आर्य' राज्याधिकारी है ।
१३) पंचतन्त्र में :-
"अहार्यत्वादनर्धत्वाद क्षयत्वाच्च सर्वदा ।"
सब पदार्थों में उत्तम पदार्थ विद्या को ही कहते हैं ।
१४) धम्मपद में :-
"अरियत्पेवेदिते धम्मे सदा रमति पण्डितो ।"
पण्डित जन सदा आर्यों के बतलाये धर्म में ही रमण करता है ।
१५) पाणिनि सूत्र में :-
"आर्यो ब्राह्मण कुमारयोः ।"
ब्राह्मणों में 'आर्य' ही श्रेष्ठ है।
१६) काशी विश्वनाथ मन्दिर के मुख्य द्वार पर :-
"आर्य धर्मेतराणो प्रवेशो निषिद्धः ।"
आर्य धर्म से इतर लोगों का प्रवेश वर्जित है ।
१७) आर्यों के सम्वत् में :-
"जम्बू दीपे भरतखण्डे आर्यावर्ते अमुक देशान्तर्गते ।"
ऐसा वाक्य बोलकर पौराणिक भाई भी संकल्प पढ़ते हैं, अर्थात यह आर्यों का देश 'आर्यावर्त्त' है ।
१८) आचार्य चतुरसेन :-
"उठो आर्य पुत्रों नहि सोओ ।
समय नहीं पशुओं सम खोओ ।
भंवर बीच में होकर नायक ।
बनो कहाओ लायक-लायक ।।"
तुम्हारा जीवन पशुओं के समान निद्रा के वशीभूत होने के लिए निर्माण नहीं हुआ है । यह समय तुम्हें पुरुषार्थ करने का है, यदि जीवन में तुम पुरुषार्थ करोगे तो किसी कहानी के नायक बनकर समाज के आगे उपस्थित होवोगे ।
१९) पं. प्रकाशचन्द कविरत्न :-
"आर्य बाहर से आये नहीं,
देश है इनका भारतवर्ष ।
विदेशों में भी बसे सगर्व,
किया था परम प्राप्त उत्कर्ष ।।
आर्य और द्रविड जाति हैं,
भिन्नचलें यह विदेशियों की चाल ।
खेद है कुछ भारतीय भी,
व्यर्थ बजाते विदेशियों सम गाल ।।"
२०) पं. राधेश्याम कथावाचक बरेली वाले :-
जब पंचवटी में सूर्पणखा राम के पास मोहित होकर अपना विवाह करने की बात राम से कहती है,तब राम उत्तर देते हैं -
"हम आर्य जाति के क्षत्रिय हैं,
रघुवंशी वैदिक धर्मी हैं ।
जो करें एक से अधिक विवाह,
कहते वेद उन्हें दुष्कर्मी हैं ।।"
*इसमें रोहिला परिवारों* (राजपूत-क्लेन) का पर्याप्त विवरण है।
*संकलन एवम प्रस्तुति*
*समय सिंह पुंडीर*
*२२अगस्त २०१२*
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*विशेष नोट ____यहां प्रदर्शित सभी चित्र सोसल मीडिया से नेट द्वारा लिए गए है इनका लेखक से कोई संबंध नहीं ये सोसल मीडिया की संपत्ति है यहां केवल प्रतीकात्मक रूप से उड्धृत है।।।
बहुत दुर्लभ जानकारी रोहिला क्षत्रिय वैदिक कालीन क्षत्रिय राजवंश है
ReplyDeleteबहुत दुर्लभ जानकारी रोहिला क्षत्रिय वैदिक कालीन क्षत्रिय राजवंश है
ReplyDeleteJai ma Bhawani Ji
ReplyDeleteजय भवानी जय राजपूताना रोहिलखंड
DeleteSir आपका ब्लॉग अच्छा लगा । जय भवानी जय rajputana जय rohillkhand
ReplyDeleteअमित जी आपको ऐसी महत्व पूर्ण जानकारी पसंद आई धन्यवाद
Deleteधन्यवाद अमित जी
ReplyDeleteJai shree Ram
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