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Monday, 29 December 2025

ROHILLA THE TITLE

रोहिल्ला उपाधि - शूरवीर, अदम्य - साहसी विशेष युद्ध कला में प्रवीण, उच्च कुलीन सेनानायको, और सामन्तों को उनके गुणों के अनुरूप क्षत्रिय वीरों को तदर्थ उपाधि से विभूषित किया जाता था - जैसे - रावत - महारावत, राणा, महाराणा, ठाकुर, नेगी, रावल, रहकवाल, रोहिल्ला, समरलछन्द, लखमीर,(एक लाख का नायक) आदि। इसी आधार पर उनके वंशज भी आजतक राजपूतों के सभी गोत्रों में पाए जाते हैं। "वभूव रोहिल्लद्व्यड्कों वेद शास्त्रार्थ पारग: । द्विज: श्री हरि चन्द्राख्य प्रजापति समो गुरू : ।।2।। ( बाउक का जोधपुर लेख ) - सन 837 ई. चैत्र सुदि पंचमी - हिंदी अर्थ - "वेद शास्त्र में पारंगत रोहिल्लाद्धि उपाधिधारी एक हरिश्चन्द्र नाम का ब्राह्मण था" जो प्रजापति के समान था हुआ ।।6।। ( गुज्जर गौरव मासिक पत्रिका - अंक 10, वर्ष ।।माह जौलाई 1991 पृष्ठ - 13) (राजपुताने का इतिहास पृष्ठ - 147) (इतिहास रोहिला - राजपूत पृष्ठ - 23) (प्राचीन भारत का इतिहास, राजपूत वंश, - कैलाश - प्रकाशन लखनऊ सन 1970 ई. पृष्ठ - 104 -105 - ) रोहिल्लद्व्यड्क रोहिल्लद्धि - अंक वाला या उपाधि वाला । सर्वप्रथम प्रतिहार शासक द्विज हरिश्चन्द्र को रोहिल्लद्धि उपाधि प्राप्त हुई । बाउक,प्रतिहार शासक विप्र हरिश्चन्द्र के पुत्र कवक और श्रीमति पदमनी का पुत्र था वह बड़ा पराक्रमी और नरसिंह वीर था। प्रतिहार एक पद है, किसी विशेष वर्ण का सूचक नही है। विप्र हरिश्चन्द्र प्रतिहार अपने बाहुबल से मांडौर दुर्ग की रक्षा करने वाला था, अदम्य साहस व अन्य किसी विशेष रोहिला शासक के प्रभावनुरूप ही रोहिल्लद्व्यड्क उपाधि को किसी आधार के बिना कोई भी व्यक्ति अपने नाम के साथ सम्बन्ध करने का वैधानिक रूप में अधिकारी नही हो सकता। उपरोक्त से स्पष्ट है कि बहुत प्राचीन काल से ही गुणकर्म के आधार पर क्षत्रिय उपाधि "रोहिल्ला" प्रयुक्त । प्रदत्त करने की वैधानिक व्यवस्था थी। जिसे हिन्दुआसूर्य - महाराजा पृथ्वीराज चौहान ने भी यथावत रखा। पृथ्वीराज चौहान की सेना में एक सौ रोहिल्ला - राजपूत सेना नायक थे । "पृथ्वीराज रासौ" - चहूँप्रान, राठवर, जाति पुण्डीर गुहिल्ला । बडगूजर पामार, कुरभ, जागरा, रोहिल्ला ।। इस कवित्त से स्पष्ट है । कि - प्राचीन - काल में रोहिला- क्षत्रियों का स्थान बहुत ऊँचा था। रोहिला रोहिल्ल आदि शब्द राजपुत्रों अथवा क्षत्रियों के ही द्योतक थे । इस कवित्त के प्रमाणिकता "आइने अकबरी", 'सुरजन चरिता' भी सिद्ध करते हैं । युद्ध में कमानी की तरह (रोह चढ़ाई करके) शत्रु सेना को छिन्न - भिन्न करने वाले को रहकवाल, रावल, रोहिल्ला, महाभट्ट कहा गया है। महाराज पृथ्वीराज चौहान की सेना में पांच गोत्रों के रावल थे - रावल - रोहिला रावल - सिन्धु रावल - घिलौत (गहलौत) रावल - काशव या कश्यप रावल - बलदया बल्द मुग़ल बादशाह अकबर ने भी बहादुरी की रोहिल्ला उपाधि को यथावत बनाए रखा जब अकबर की सेना दूसरे राज्यों को जीत कर आती थी तो अकबर अपनी सेना के सरदारों को,बहादुर जवानों बहादुरी के पदक (ख़िताब,उपाधि) देता था। एक बार जब महाराणा मान सिंह काबुल जीतकर वापिस आए तो अकबर ने उसके बाइस राजपूत सरदारों को यह ख़िताब दी (उपाधि से सम्मानित किया) बाई तेरा हर निरकाला रावत को - रावल जी चौमकिंग सरनाथा को - रावल झंड्कारा कांड्कड को - रोहिल्ला रावत मन्चारा - कांड्कड काम करन, निरकादास रावत को रावराज और रूहेलाल को रोहिला
गौरवशाली इतिहास के कुछ स्वर्णाक्षर (रोहिला क्षत्रिय) भारत वर्ष का क्षेत्रफल 42 ,02 ,500 वर्ग किमी था । रोहिला साम्राज्य 25 ,000 वर्ग किमी 10 ,000 वर्गमील में फैला हुआ था । रोहिला, राजपूतो का एक गोत्र , कबीला (परिवार) या परिजन- समूह है जो कठेहर - रोहिलखण्ड के शासक एंव संस्थापक थे |मध्यकालीन भारत में बहुत से राजपूत लडाको को रोहिला की उपाधि से विभूषित किया गया. उनके वंशज आज भी रोहिला परिवारों में पाए जाते हैं । रोहिले- राजपूत प्राचीन काल से ही सीमा- प्रांत, मध्य देश (गंगा- यमुना का दोआब), पंजाब, काश्मीर, गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश और बुंदेलखंड के कुछ भागों में शासन करते रहे हैं । जबकि मुस्लिम-रोहिला साम्राज्य अठारहवी शताब्दी में इस्लामिक दबाव के पश्चात् स्थापित हुआ. मुसलमानों ने इसे उर्दू में "रूहेलखण्ड" कहा और खुद को ये अफगान लोग रुहेला सरदार कहलाने लगे । सन 1702 से 1720 ई तक रोहिलखण्ड में रोहिले राजपूतो का शासन था(औरंगजेब के कमजोर पड़ते ही पुनः रोहिला राजपूतों ने रोहिलखंड को स्वतंत्र घोषित कर दिया था). जिसकी राजधानी बरेली थी ।
*रोहिलखंड पूर्णतया अफ़गानों के कब्जे में,1720 में आया था अन्यथा रोहिला रूहेला राजपूत सदैव खुद को आजाद लोकतंत्र घोषित कर राजधानी बदलते रहे जब औरंगजेब की मृत्यु सन1707 में हुई तो उसके सेनापति दाऊद खान की महत्वकांक्षा बढ़ी और पुनः रोहिलखंड को हथ याने की सोचने में लगा तो अफ़गानों की घुसपैठ आरंभ कराई बस्तियां जंगलों में बनवाई गई लाखों अफगान घुस आए यह स्थिति तब के रोहिलखंड राजधानी बरेली तक काबिज नहीं हो पाई थी काफी क्षेत्र अफ़गानों के मुगलों के अधीन हो चुके थे दाऊद खान ने बरेली के रोहिला राजा हरनन्द को सैनिक शक्ति की पेशकश की तथा आक्रमण न हो इसका आश्वासन भी दिया,एक हिंदू जाट के आठ साल के लड़के का अपहरण किया तथा अपना दत्तक पुत्र बताते हुए पालन पोषण हेतु बरेली में नौकरी पर हिंदू रोहिला राजा हरनन्द के यहां छोड़ दिया ,बाद में उसे इस्लाम में दीक्षित किया ब्रेनवाश करते हुए उसे रोहिलखंड का शासन देने का लालच देकर राजा हरनन्द को धोखे से क़त्ल करने को तैयार किया,बिसौली से बरेली लौटते हुए रस्ते में रोहिलखंड के अंतिम रोहिला क्षत्रिय राजा को कत्ल कर दिया और अनेकों अफ़गानों की सेना के साथ बरेली आ धमका जिसे दाऊद खान में अलीमुहम्द नाम देकर रूहेला सरदार घोषित कर दिया ।इस तरह सन 1720में पूर्ण रूप से अफ़गानों के कब्जे रोहिलखंड आ गया।रोहिला क्षत्रिय शासन खत्म हो गया वैसे तो सल्तनत काल से ही रोहिलखंड कई चरणों में खत्म होता रहा किंतु अब पूर्ण रूप से अफगान शासन हो गया ये सभी सच्चा इतिहास गायब किया गया बड़ी चतुराई से लिखा गया कि रोह देश के रोहिला अफ़गानों ने रोहिलखंड की स्थापना की थी रोहिला अफ़गानों से ही रोहिलखंड और रोहिला इतिहास आरंभ किया गया पढ़ाया जाता हे ।। सब कहते है रोहिल्ला तो पश्तू भाषी अफगान होते है जो लाखों की संख्या में जिंदा रोहिला क्षत्रिय बसे है विस्थापित होकर वे किसी को नज़र नहीं आते*

 रोहिले राजपूतो के महान शासक "राजा इन्द्रगिरी" ने रोहिलखण्ड की पश्चिमी सीमा पर सहारनपुर में एक किला बनवाया,जिसे "प्राचीन रोहिला किला" कहा जाता है । सन 1801 ई में रोहिलखण्ड को अंग्रेजो ने अपने अधिकार में ले लिया था. हिन्दू रोहिले-राजपुत्रो द्वारा बनवाए गये इस प्राचीन रोहिला किला को 1806 से 1858 के मध्य कारागार में परिवर्तित कर दिया गया था । इसी प्राचीन- रोहिला- किला में आज सहारनपुर की जिला- कारागार है । "सहारन" राजपूतो का एक गोत्र है जो रोहिले राजपूतो में पाया जाता है. यह सूर्य वंश की एक प्रशाखा है जो राजा भरत के पुत्र तक्ष के वंशधरो से प्रचालित हुई थी । फिरोज तुगलक के आक्रमण के समय "थानेसर" (वर्तमान में हरियाणा में स्थित) का राजा "सहारन" ही था । दिल्ली में गुलाम वंश के समय रोहिलखण्ड की राजधानी "रामपुर" में राजा रणवीर सिंह कठेहरिया (काठी कोम, निकुम्भ वंश, सूर्यवंश रावी नदी के काठे से विस्थापित कठगणों के वंशधर) का शासन था । इसी रोहिले राजा रणवीर सिंह ने तुगलक के सेनापति नसीरुद्दीन चंगेज,बहराम वंश (नसीरुद्दीन महमूद) को हराया था. 'खंड' क्षत्रिय राजाओं से सम्बंधित है, जैसे भरतखंड, बुंदेलखंड, विन्धयेलखंड , रोहिलखंड, कुमायुखंड, उत्तराखंड आदि । प्राचीन भारत की केवल दो भाषाएँ संस्कृत व प्राकृत (सरलीकृत संस्कृत) थी । रोहिल प्राकृत और खंड संस्कृत के शब्द हैं जो क्षत्रिय राजाओं के प्रमाण हैं । इस्लामिक नाम है दोलताबाद, कुतुबाबाद, मुरादाबाद, जलालाबाद, हैदराबाद, मुबारकबाद, फैजाबाद, आदि । रोहिले राजपूतो की उपस्तिथि के प्रमाण हैं । योधेय गणराज्य के सिक्के, गुजरात का (1445 वि ) ' का शिलालेख (रोहिला मालदेव के सम्बन्ध में), मध्यदेश में स्थित रोहिलखंड रामपुर में राजा रणवीर सिंह के किले के खंडहर, रानी तारादेवी सती का मंदिर , पीलीभीत में राठौर रोहिलो (महिचा- प्रशाखा) की सतियों के सतियों के मंदिर, सहारनपुर का प्राचीन रोहिला किला, मंडोर का शिलालेख, " बड़ौत में स्तिथ " राजा रणवीर सिंह रोहिला मार्ग ",सहारनपुर में प्राचीन रोहिला किला के सामने स्थित सूर्य वंशी क्षत्रिय सम्राट कठेहर रोहिलखंड महाराजा रणवीर सिंह रोहिला चौक,।।
नगरे नगरे ग्रामै ग्रामै विलसन्तु संस्कृतवाणी । सदने - सदने जन - जन बदने , जयतु चिरं कल्याणी ।। जोधपुर का शिलालेख, प्रतिहार शासक हरीशचंद्र को मिली रोहिल्लाद्व्यंक की उपाधि, कई अन्य राजपूतो के वंशो को प्राप्त उपाधियाँ, 'पृथ्वीराज रासो', आल्हाखण्ड - काव्य और, सभी राजपूत वंशो में पाए जाने वाले प्रमुख गोत्र । अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा भारत द्वारा प्रकाशित पावन ग्रन्थ क्षत्रिय वंशाणर्व (रोहिले क्षत्रियों का राज्य रोहिलखण्ड का पूर्व नाम पांचाल व मध्यदेश), वर्तमान में अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा से अखिल भारतीय रो. क्ष. वि. परिषद को संबद्धता प्राप्त होना, वर्तमान में भी रोहिलखण्ड (संस्कृत भाषा में) क्षेत्र का नाम यथावत बने रहना, अंग्रेजो द्वारा भी उत्तर रेलवे को "रोहिलखण्ड - रेलवे" का नाम देना जो बरेली से देहरादून तक सहारनपुर होते हुए जाती थी, वर्तमान में लाखो की संख्या में पाए जाने वाले रोहिला-राजपूत, रोहिले-राजपूतों के सम्पूर्ण भारत में फैले हुए कई अन्य संगठन अखिल भारतीय स्तर पर 'राजपूत रत्न' रोहिला शिरोमणि डा. कर्णवीर सिंह द्वारा संगठित एक अखिल भारतीय रोहिला क्षत्रिय विकास परिषद (सम्बद्ध अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा) पंजीकरण संख्या - 545, आदि,अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा के बहुत से रोहिला क्षत्रियों का आजीवन सदस्य और पदाधिकारी होना। 12. पानीपत की तीसरी लड़ाई (अब्दाली और मराठा वार में) रोहिले राजपूत- राजा गंगासहाय राठौर /गंगा सिंह महेचा राठौड़ रोहिला राजपूत के नेतृत्व में मराठों की ओर से अफगान आक्रान्ता अहमदशाह अब्दाली व पठान नजीबदौला(रुहेला सरदार नजीब खान) के विरुद्ध लड़े व वीरगति पाई । इस मराठा युद्ध में लगभग एक हजार चार सौ रोहिले राजपूत वीरगति को प्राप्त हुए । (1761-ईसवी,दिन बुधवार, मकर सक्रांति,१४जनवरी .) (इतिहास -रोहिला-राजपूत द्वारा डॉक्टर के सी सेन पानीपत, और ,कलायत,हरियाणा में वर्तमान में स्थित शिला लेख और रानी सती रामप्यारी का स्मारक स्थल दर्शनीय है) 13. प्रथम स्वतंत्रता संग्राम 1857 में भी रोहिले राजपूतों ने अपना योगदान दिया, ग्वालियर के किले में रानी लक्ष्मीबाई को हजारों की संख्या में रोहिले राजपूत मिले, इस महायज्ञ में स्त्री पुरुष सभी ने अपने गहने धन आदि एकत्र कर झाँसी की रानी के साथ अंग्रेजो के विरुद्ध आवाज उठाने के लिए सम्राट बहादुरशाह- जफर तक पहुँचाए । अंग्रेजों ने ढूँढ-ढूँढ कर उन्हें काट डाला और शूट एट साइट का नोटिस जारी किया जिससे रोहिले राजपूतों ने अज्ञातवास की शरण ली। 14. राजपूतों की हार के प्रमुख कारण थे हाथियों का प्रयोग, सामंत प्रणाली व आपसी मतभेद, ऊँचे व भागीदार कुल का भेदभाव (छोटे व बड़े की भावना) आदि। 15. सम्वत 825 में बप्पा रावल चित्तौड़ से विधर्मियों को खदेड़ता हुआ ईरान तक गया। बप्पा रावल से समर सिंह तक 400 वर्ष होते हैं, गह्लौतों का ही शासन रहा। इनकी 24 शाखाएँ हैं। जिनके 16 गोत्र (बप्पा रावल के वंशधर) रोहिले राजपूतों में पाए जाते हैं। 16. चितौड़ के राणा समर सिंह (1193 ई.) की रानी पटना की राजकुमारी थी इसने 9 राजा, 1 रावत और कुछ रोहिले साथ लेकर मौ. गोरी के गुलाम कुतुबद्दीन का आक्रमण रोका और उसे ऐसी पराजय दी कि कभी उसने चितौड़ की ओर नही देखा। 17. रोहिला शब्द क्षेत्रजनित, गुणजनित व 'मूल पुरुष' नाम-जनित है। यह गोत्र जाटों में भी रूहेला, रोहेला, रूलिया, रूहेल , रूहिल, रूहिलान नामों से पाया जाता है। 18. रूहेला गोत्र जाटों में राजस्थान व उ. प्र. में पाया जाता है। रोहेला गोत्र के जाट जयपुर में बजरंग बिहार ओर ईनकम टैक्स कालोनी टौंक रोड में विद्यमान है। झुनझुन, सीकर, चुरू, अलवर, बाडमेर में भी रोहिला गोत्र के जाट विद्यमान हैं । उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले में रोहेला गोत्र के जाटों के बारह गाँव हैं। महाराष्ट्र में रूहिलान गोत्र के जाट वर्धा में केसर व खेड़ा गाँव में विद्यमान हैं। 19. मुगल सम्राट अकबर ने भी राजपूत राजाओं को विजय प्राप्त करने के पश्चात् रोहिला-उपाधि से विभूषित किया था, जैसे राव, रावत, महारावल, राणा, महाराणा, रोहिल्ला, रहकवाल आदि। 20. "रोहिला-राजपूत" समाज , क्षत्रियों का वह परिवार है जो सरल ह्रदयी, परिश्रमी,राष्ट्रप्रेमी,स्वधर्मपरायण, स्वाभिमानी व वर्तमान में अधिकांश बिखरा होने के कारण साधनविहीन है। 40 प्रतिशत कृषि कार्य से,30 प्रतिशत श्रम के सहारे व 30 प्रतिशत व्यापार व लघु उद्योगों के सहारे जीवन यापन कर रहे हैं। इनके पूर्वजो ने हजारों वर्षों तक अपनी आन, मान, मर्यादा की रक्षा के लिए बलिदान दिए हैं और अनेको आक्रान्ताओं को रोके रखने में अपना सर्वस्व मिटाया है । गणराज्य व लोकतंत्रात्मक व्यवस्था को सजीव बनाये रखने की भावना के कारण वंश परंपरा के विरुद्ध रहे, करद राज्यों में भी स्वतंत्रता बनाये रखी । कठेहर रोहिलखण्ड की स्थापना से लेकर सल्तनत काल की उथल पुथल, मार काट , दमन चक्र तक लगभग आठ सौ वर्ष के शासन काल के पश्चात् 1857 के ग़दर के समय तक रोहिले राजपूतों ने राष्ट्रहित में बलिदान दिये हैं। क्रूर काल के झंझावालों से संघर्ष करते हुए क्षत्रियों का यह 'रोहिला परिवार' बिखर गया है, इस समाज की पहचान के लिए भी आज स्पष्टीकरण देना पड़ता है। कैसा दुर्भाग्य है? यह क्षत्रिय वर्ग का। जो अपनी पहचान को भी टटोलना पड़ रहा है। परन्तु समय के चक्र में सब कुछ सुरक्षित है। इतिहास के दर्पण में थिरकते चित्र, बोलते हैं, अतीत झाँकता है, सच सोचता है कि उसके होने के प्रमाण धुंधले-धुंधले से क्यों हैं? हे- क्षत्रिय तुम धन्य हो, पहचानो अपने प्रतिबिम्बों को' - "क्षत्रिय एकता का बिगुल फूँक सब धुंधला धुंधला छंटने दो। हो अखंड भारत के राजपुत्र खण्ड खण्ड में न सबको बंटने दो ।।" 21. रोहिलखण्ड से विस्थापित इन रोहिला परिवारों में राजपूत परम्परा के कुछ प्रमुख गोत्र इस प्रकार पाए जाते हैं :- 
रोहिला, रोहित, रोहिल, रावल, द्रोहिया, रल्हन, रूहिलान, रौतेला , रावत यौधेय, योतिक, जोहिया, झोझे, पेशावरी पुण्डीर, पांडला, पंढेर, पुन्ड़ेहार, पुंढीर, पुंडाया चौहान, जैवर, जौडा, चाहल, चावड़ा, खींची, गोगद, गदाइया, सनावर, क्लानियां, चिंगारा, चाहड बालसमंद, चोहेल, चेहलान, बालदा, बछ्स (वत्स), बछेर, चयद, झझोड, चौपट, खुम्ब, जांघरा, जंगारा, झांझड निकुम्भ, कठेहरिया, कठौरा, कठैत, कलुठान, कठपाल, कठेडिया, कठड, काठी, कठ, पालवार राठौर, महेचा, महेचराना, रतनौता, बंसूठ जोली, जोलिए, बांकटे, बाटूदा, थाथी, कपोलिया, खोखर, अखनौरिया ,लोहमढ़े, मसानिया बुन्देला, उमट, ऊमटवाल भारतवंशी, भारती, गनान नाभावंशी,बटेरिया, बटवाल, बरमटिया परमार, जावडा, लखमरा, मूसला, मौसिल, भौंसले, बसूक, जंदडा, पछाड़, पंवारखा, ढेड, मौन तोमर, तंवर, मुदगल, देहलीवाल, किशनलाल, सानयाल, सैन, सनाढय गहलौत, कूपट, पछाड़, थापा, ग्रेवाल, कंकोटक, गोद्देय, पापडा, नथैड़ा, नैपाली, लाठिवाल, पानिशप, पिसोण्ड, चिरडवाल, नवल, चरखवाल, साम्भा, पातलेय, पातलीय, छन्द (चंड), क्षुद्रक,(छिन्ड, इन्छड़, नौछड़क), रज्जडवाल, बोहरा, जसावत, गौर, मलक, मलिक, कोकचे, काक कछवाहा, कुशवाहा, कोकच्छ, ततवाल, बलद, मछेर सिसौदिया, भरोलिया, बरनवाल, बरनपाल, बहारा
खुमाहड, अवन्ट, ऊँटवाल 
सिकरवार, रहकवाल, रायकवार, ममड, गोदे सोलंकी, गिलानिया, भुन, बुन, बघेला, ऊन, (उनयारिया) बडगूजर, सिकरवार, ममड़ा, पुडिया कश्यप, काशब, रावल, रहकवाल यदु, मेव, छिकारा, तैतवाल, भैनिवाल, उन्हड़, भाटटी बनाफरे, जादो, बागड़ी, सिन्धु, कालड़ा, सारन, छुरियापेड, लखमेरिया, चराड, जाखड़, सेरावत, देसवाल, पूडिया प्रमुख रोहिला क्षत्रिय शासक अंगार सैन - गांधार (वैदिक काल) अश्वकरण - ईसा पूर्व 326 (मश्कावती दुर्ग) अजयराव - स्यालकोट (सौकंल दुर्ग) ईसा पूर्व 326 प्रचेता - मलेच्छ संहारक शाशिगुप्त - साइरस के समकालीन सुभाग सैन - मौर्य साम्राज्य के समकालीन राजाराम शाह - 929 वि. रामपुर रोहिलखण्ड बीजराज - रोहिलखण्ड करण चन्द्र - रोहिलखण्ड विग्रह राज - रोहिलखण्ड - गंगापार कर स्रुघ्न जनपद (सुगनापुर) यमुना तक विस्तार दसवीं शताब्दी में सरसावा में किले का निर्माण पश्चिमी सीमा पर, यमुना द्वारा ध्वस्त टीले के रूप में नकुड़ रोड पर देखा जा सकता है। सावन्त सिंह - रोहिलखण्ड जगमाल - रोहिलखण्ड धिंगतराव - रोहिलखण्ड गोंकुल सिंह - रोहिलखण्ड महासहाय - रोहिलखण्ड त्रिलोक चन्द - रोहिलखण्ड रणवीर सिंह - रोहिलखण्ड सुन्दर पाल - रोहिलखण्ड नौरंग देव - रोहिलखण्ड सूरत सिंह - रोहिलखण्ड हंसकरण रहकवाल - पृथ्वीराज के सेनापति मिथुन देव रायकवार - ईसम सिंह पुण्डीर के मित्र थाना भवन शासक सहकरण, विजयराव - उपरोक्त राजा हतरा - हिसार जगत राय - बरेली मुकंदराज - बरेली 1567 ई. बुधपाल - बदायुं महीचंद राठौर - बदायुं बांसदेव - बरेली बरलदेव - बरेली राजसिंह - बरेली परमादित्य - बरेली न्यादरचन्द - बरेली राजा सहारन - थानेश्वर प्रताप राव खींची (चौहान वंश) - गागरोन राणा लक्ष्य सिंह - सीकरी रोहिला मालदेव - गुजरात जबर सिंह - सोनीपत रामदयाल महेचराना - क्लामथ गंगसहाय - महेचराना - क्लामथ 1761 ई. राणा प्रताप सिंह - कौराली (गंगोह) 1095 ई. नानक चन्द - अल्मोड़ा राजा पूरणचन्द - बुंदेलखंड राजा हंस ध्वज - हिसार व राजा हरचंद राजा बसंतपाल - रोहिलखण्ड व्रतुसरदार, सामंत वृतपाल 1193 ई. महान सिंह बडगूजर - बागपत 1184 ई. राजा यशकरण - अंधली गुणाचन्द - जयकरण - चरखी - दादरी राजा मोहनपाल देव - करोली राजारूप सैन - रोपड़ राजा महपाल पंवार - जीन्द राजा परपदेड पुंडीर - लाहौर राजा लखीराव - स्यालकोट राजा जाजा जी तोमर - दिल्ली खड़ग सिंह - रोहिलखण्ड लौदी के समकालीन राजा हरि सिंह - खिज्रखां के दमन का शिकार हुआ - कुमायुं की पहाड़ियों में अज्ञातवास की शरण ली राजा इन्द्रगिरी (रोहिलखण्ड) (इन्द्रसेन) - सहारनपुर में प्राचीन रोहिला किला बनवाया । रोहिला क्षत्रिय वंश भास्कर लेखक आर. आर. राजपूत मुरसेन अलीगढ से प्रस्तुत राजा बुद्ध देव रोहिला - 1787 ई., सिंधिया व जयपुर के कछवाहो के खेड़ा व तुंगा के मैदान में हुए युद्ध का प्रमुख पात्र । (राय कुँवर देवेन्द्र सिंह जी राजभाट, तुंगा (राजस्थान)
रोहिल्ला उपाधि - शूरवीर, अदम्य - साहसी विशेष युद्ध कला में प्रवीण, उच्च कुलीन सेनानायको, और सामन्तों को उनके गुणों के अनुरूप क्षत्रिय वीरों को तदर्थ उपाधि से विभूषित किया जाता था - जैसे - रावत - महारावत, राणा, महाराणा, ठाकुर, नेगी, रावल, रहकवाल, रोहिल्ला, समरलछन्द, लखमीर,(एक लाख का नायक) आदि। इसी आधार पर उनके वंशज भी आजतक राजपूतों के सभी गोत्रों में पाए जाते हैं। "वभूव रोहिल्लद्व्यड्कों वेद शास्त्रार्थ पारग: । द्विज: श्री हरि चन्द्राख्य प्रजापति समो गुरू : ।।2।। ( बाउक का जोधपुर लेख ) - सन 837 ई. चैत्र सुदि पंचमी - हिंदी अर्थ - "वेद शास्त्र में पारंगत रोहिल्लाद्धि उपाधिधारी एक हरिश्चन्द्र नाम का ब्राह्मण था" जो प्रजापति के समान था हुआ ।।6।। ( गुज्जर गौरव मासिक पत्रिका - अंक 10, वर्ष ।।माह जौलाई 1991 पृष्ठ - 13) (राजपुताने का इतिहास पृष्ठ - 147) (इतिहास रोहिला - राजपूत पृष्ठ - 23) (प्राचीन भारत का इतिहास, राजपूत वंश, - कैलाश - प्रकाशन लखनऊ सन 1970 ई. पृष्ठ - 104 -105 - ) रोहिल्लद्व्यड्क रोहिल्लद्धि - अंक वाला या उपाधि वाला । सर्वप्रथम प्रतिहार शासक द्विज हरिश्चन्द्र को रोहिल्लद्धि उपाधि प्राप्त हुई । बाउक,प्रतिहार शासक विप्र हरिश्चन्द्र के पुत्र कवक और श्रीमति पदमनी का पुत्र था वह बड़ा पराक्रमी और नरसिंह वीर था। प्रतिहार एक पद है, किसी विशेष वर्ण का सूचक नही है। विप्र हरिश्चन्द्र प्रतिहार अपने बाहुबल से मांडौर दुर्ग की रक्षा करने वाला था, अदम्य साहस व अन्य किसी विशेष रोहिला शासक के प्रभावनुरूप ही रोहिल्लद्व्यड्क उपाधि को किसी आधार के बिना कोई भी व्यक्ति अपने नाम के साथ सम्बन्ध करने का वैधानिक रूप में अधिकारी नही हो सकता। उपरोक्त से स्पष्ट है कि बहुत प्राचीन काल से ही गुणकर्म के आधार पर क्षत्रिय उपाधि "रोहिल्ला" प्रयुक्त । प्रदत्त करने की वैधानिक व्यवस्था थी। जिसे हिन्दुआसूर्य - महाराजा पृथ्वीराज चौहान ने भी यथावत रखा। पृथ्वीराज चौहान की सेना में एक सौ रोहिल्ला - राजपूत सेना नायक थे । "पृथ्वीराज रासौ" - चहूँप्रान, राठवर, जाति पुण्डीर गुहिल्ला । बडगूजर पामार, कुरभ, जागरा, रोहिल्ला ।। इस कवित्त से स्पष्ट है । कि - प्राचीन - काल में रोहिला- क्षत्रियों का स्थान बहुत ऊँचा था। रोहिला रोहिल्ल आदि शब्द राजपुत्रों अथवा क्षत्रियों के ही द्योतक थे । इस कवित्त के प्रमाणिकता "आइने अकबरी", 'सुरजन चरिता' भी सिद्ध करते हैं । युद्ध में कमानी की तरह (रोह चढ़ाई करके) शत्रु सेना को छिन्न - भिन्न करने वाले को रहकवाल, रावल, रोहिल्ला, महाभट्ट कहा गया है। महाराज पृथ्वीराज चौहान की सेना में पांच गोत्रों के रावल थे - रावल - रोहिला रावल - सिन्धु रावल - घिलौत (गहलौत) रावल - काशव या कश्यप रावल - बलदया बल्द मुग़ल बादशाह अकबर ने भी बहादुरी की रोहिल्ला उपाधि को यथावत बनाए रखा जब अकबर की सेना दूसरे राज्यों को जीत कर आती थी तो अकबर अपनी सेना के सरदारों को,बहादुर जवानों बहादुरी के पदक (ख़िताब,उपाधि) देता था। एक बार जब महाराणा मान सिंह काबुल जीतकर वापिस आए तो अकबर ने उसके बाइस राजपूत सरदारों को यह ख़िताब दी (उपाधि से सम्मानित किया) बाई तेरा हर निरकाला रावत को - रावल जी चौमकिंग सरनाथा को - रावल झंड्कारा कांड्कड को - रोहिल्ला रावत मन्चारा - कांड्कड काम करन, निरकादास रावत को रावराज और रूहेलाल को रोहिला✍️संकलित :
द्वारा_
*समय सिंह पुंडीर*
 *संदर्भ ग्रंथ*
*क्षत्रिय/राजपूत वाटिका*
*प्रकाशित*
*अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा ,मुख्यालय दिल्ली*
*स्थापित१८८९*

RAJPUT ANA ROHILKHANND,ROHILA RAJPUT

*रोहिलखंड*
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उत्तर भारत का ऐतिहासिक क्षेत्र
रोहिलखंड
स्थिति उत्तर प्रदेश
राज्य स्थापित: 447 विक्रमी संवत पूर्व
भाषा हिन्दी , संस्कृत
राजवंश पांचाल ( महाभारत काल)

रोहिला राजपूत
ऐतिहासिक राजधानी रेवेन्यू , लैपटॉप
पृथक सूबे क्रीड़ा , क्रीड़ा , खूतर , शाहजहाँपुर
रोहिलखंड या रुहेलखंड उत्तर प्रदेश का उत्तर-पश्चिम में एक क्षेत्र है। [1] [2] .

रोहिलखंड गंगा उपत्यका के ऊपरी 50 हजार वर्ग किमी क्षेत्र का विवरण है। इसके दक्षिण पश्चिम ओर गंगा है, पश्चिमी ओर उत्तराखंड और नेपाल उत्तर में हैं। पूर्वी ओर अवध है। इसका नाम यहां की एक जनजाति रोहिल्ला के नाम पर पोस्ट किया गया है। महाभारत में इसे रोह शब्द अवरोही धातु से लिया गया है जिसका अर्थ है चढ़ना अवरोही, रोही सावल ला प्रत्या समतुल्य रोहिला अर्थात देखने वाला, पश्चिमी उत्तरीय सीमा प्रांत जैसा भी पर्वतीय रेखांकन रोह के नाम से जाना जाता है।

तीब्र प्रवाह *रोह*, की कहानी कहने वाला भी रोहिला कहलाया।

रोहिला शब्द भारत के गौरवशाली इतिहास का एक विशेष दर्पण है! यह शब्द है जो वीर क्षत्रिय राजवंशों और इतिहास की वीर गाथाओं का परिचय कराता है।

रोहिल्ला 500 ईसा पूर्व पुराना शब्द है (प्राचीन भारत-पृष्ठ-159, बी एम रस्तोगी)

रोहिला एक संघ था, भारत

के उन वीरो का, भारत की पश्चिमी उत्तर सीमा प्रहरियों का किशो स्वयम केट के टुकड़े तक ओर अंतिम शवांस तक ले जाना धूलि के कण के बराबर भी अक्रांताओं को भारत भूमि और कदम रखना नहीं दिया।

रोहिले राजपूत प्राचीनकाल से ही लोकतंत्र के संवाहक रहे हैं

वंस वाद्य जनरेशन वाद्य से दूर है

रोहिल खंड राज्य लोकतन्त्रात्मक गणराज्य था
राजवंशानुक्रम का शासन नहीं था*

वाचाल(वाचेल)चौहान राठौड़ गहलोत (,गहलोत) आदि प्रसिद्ध डेयरडेविल राज वन्सो का शासन था ये सभी कटेहर इया राजपूत कहलाते थे
सुन्दर बालिष्ठ

धारकों(रहेल्ला) को अपने योग्य शासक चुनाव (हाथ उठाना कर) से नियुक्त किया जाता था

इसी के लिए इनमे राजपूतो के सभी वंश शाखाएं उपलब्ध हैं

रणवीर सिंह सूर्य वंस निकुंभ शाखा के राजवंश गोत्र में उत्पन्न हुए थे

उनका प्रवर गोत्र काथी था

इस कटहर रोहिल खंड के राजा के साथ 84 लोहे के कवच धारी अजेय रोहिले सरदार/संतामंती थे

उनके सामने दुस्मन नहीं टिक दिखे थे

इनमे निम्न गोत्रो के योद्धा थे

1- लक्ष्मीर 2- राठौड़/महेच राणा 3- चौहान/वत्स/घोड़ा 4-वाचेल/वाचाल/कूपट/घूमरा

5- मूसले/नार्नसेले/मौसल/मोसले/मुसले

6- कटेहरिया/ काठी/, कठायत/ कठोड़े 7- रहक वाल/रायकवार/सिकरवा

12 पड़िये/ पड़तिया/बारह रोहिले लोहे के कवच धारी हर गोत्रो से थे

सल्तनत काल में दिल्ली के सुल्तान पूर्णत्या कभी भी नहीं मिले

(वासुदेवशरण अग्रवाल)

विधानसभा कार

हमारा ही परिवार जो कटेहर रोहिल खंड में रह गए स्थापित नहीं हुए वे

आज भी राजपूतो की मुख्य धारा में ही कठेरिया राजपूत कहलाते हैं और उनका सम्बन्ध इन्ही राजपूतो से होता है

जी गंगा पार कर गैलरी हो पीछे आगये रोहिला कहलाये

जो रामगंगा पार कर कुमाऊं चला गया

काठी कठेत कठायत काठ आयत कहलाये और चांद वाशी राजा के ये रहे

महाराजाधिराज सिंह रोहिल्ला का जन्म ऐसे समय में हुआ था जब राजपूत शक्ति किशन होलेथी और मुस्लिम अक्रांता अपनी सल्तनत की स्थापना करने के लिए शेष राजपूतों का दमन करने में लगे थे, गौरी के आक्रमण से पृथ्वी राज चौहान का साम्राज्य नष्ट कर दिया गया था, वनों का शासन राजस्थान में मेवाड़ या मध्य प्रदेश (उत्तर प्रदेश) में स्थापित हो गया था, रोहिलखंड के कथेहरिया राजपूतो ने दिल्ली के सुल्तान बनने वाले अक्रांता के नाक में दम कर 1206 में सभी राजपूत शक्तियों को अधिकार दिया था। एक साथ कर सामंत व्रतपाल रोहिल्ला ने ऐबक इल्तुतमिश आदि को रोहिलखंड में विश्राम से छोड़ा त्रिलोक सिंह आदि रोहिलखंड पर अधिकार वाले मुस्लिम शासकों को जन्म दिया था,इस विपत्ति काल में रोहिलखंड की पवित्र भूमि पर कार्तिक मास के कृष्ण की प्रथम तिथि यात्रा 25 अक्टूबर 1204 इसवी कोप किले में राजा त्रिलोक सिंह के यहां एक वीर पुत्र का जन्म हुआ जिसका नाम करण के हरिद्वार पंडित गोकुल चंद पांडे के पिता नेरावण सिंह के नाम पर रखा गया था। , जब रणवीर सिंह 21 साल के हुए तो विजयपुर सीकरी के राजा की पुत्री तारा देवी से रणवीर सिंह का विवाह उसी साल हो गया, जब रणवीर सिंह का राजतिलक हुआ, उन से दिल्ली के सुल्तान भय खाने लगे किसी ने रोहिलखंड पर आक्रमण करने का साहस नहीं किया था

कैथरीन रोहिल्लाखंड राजपूत!

ये कटहरिया काठी निकुंभ वन के रोहिलखंड के राजा थे, जो 1253 में अपने शासन काल में दिल्ली सल्तनत के इल्तुतमिश के पुत्र थे। राजपूतो ने घेर लिया और भयंकर युद्ध रोहिले बहादुर थे, लोहे के हथियारधारी थे नासिरुद्दीन चंगेज की सेना में शामिल हो गए बचे हुए मुसलमान भाग गए

नासिरुद्दीन ने प्राणदान मैग्जीन को चुना

सभी धन रामायण सिंह के मंच पर रख गदगदया

राजाराम सिंह कठोड़ा ने क्षत्रिय धर्म रक्षार्थ शरणागत को क्षमा दान दिया

फिर भी वह दिल्ली दरबार से महिमा लेकर आया था क्या मुँह में यह सोच कर के चित्र के दक्षिणी भाग में छिप गया और दूसरी ओर फिर से खड़ा हो गया कि राजा को कैसे पराजित किया जाए

साभार भी मुस्लिम सेना दिल्ली से सह-तालिका रोहला राजपूत बहादुर थे कि उनके सामने नहीं टिकते थे वे छल प्रपंच धोखा देने की सोची

किले के एक दरबारी हरिद्वार निवासी पांडे गोकुल राम नाइक गोकुल चंद को लालच दिया और रक्षा बंधन के दिन शस्त्र पूजन के समय निशस्त्र रोहिले राजपूतो पर आक्रमण करने का परामर्श दिया

चंगेज ने दिल्ली से कुमुद ओर सेना की कमान संभाली ओर जंगलों में छुपे दी पांडे ने सफेद झंडे के साथ चंगेज को राजा से किले का द्वार मिलवाया जबकि राजपूत पांडे का इंतजार कर रहे थे कि कब आए और पूजा शुरू हो गई

पांडे ने तो धोखा कर दिया था राजा ने सफेद झंडा देख सन्धि प्रस्ताब समझ समझ आने का संकेत दिया था

अप्रत्याशित रूप से हुआ कि पांडा किले के चारो दरवाजे खोल दिए गए थे

निहत्थे राजपूतो पर तिब्रता से मुस्लिम सेना चारो तरफ से टूट गई

राजपूतो को शाका कर मरमिटने का आदेश दिया गया और राजकुमार सिंह ने दे दिया और राजकुमारी को सबक सिखाने के लिए मजबूर कर दिया

थे निहत्थे लड़ाके बहुत सारे पनरान्टु मारे गए

राजा रणवीर सिंह का बलिदान हुआ

रानी तारावती सभी क्षत्रियों के साथ डूबकर जौहर कर गयीं

किले को मुसलमान बाकी बचे थे

रणवीर सिंह के भाई सूरत सिंह अपने 338 साथियों के साथ निकल गए और 1254 में हरियाणा में चरखी दादरी यात्रा पर गए

हरिद्वार के पांडो नेरानी सिंह की वंशावली में लिखी कहानी में लिखा है कि उनका औलाद बंजारा हो गया था

तब भी इतिहास लेखन में कितना तुष्टिकरण घटित हुआ था

जबकि रोहिले राजपूतो के राज भट्ट राय भीम राज निवासी बड़वा जी का बड़ा तुंगा जिला जयपुर की पोथी में मिले कि सूरत सिंह चरखी दादरी आ बसा थे

राजा रणवीर सिंह का यह बलिदान याद आबाद हिंदुस्तान

एक शौर्य दिवस

रक्षाबंधन एक गौरव गाथा

आज से 763 वर्ष पूर्व दिल्ली के सुल्तानों को धूल चटाने वाले महाराजाधिराज सिंह रोहिला ने एक गौरवशाली पौराणिक कथाओं के किले में लिखा था, यह शौर्यबात निहत्थे रोहिले राज पूतो पर टूट पड़े थे नासिरुद्दीन के सैनिक शास्त्र विकसन रोहिलो ने महान शौर्य दिवस पर राजा महाराजा सिंह को याद किया

यह तो शास्त्रीय एतिहासिक सत्य/सत्य है

रोहिला क्षत्रिय वास्तव में

विशुद्ध क्षत्रिय राजवंस है

एक चीते के समान ही उसकी अलग पहचान होती है

इतिहास यह बात का प्रमाण है

रोहिले क्षत्रियो ने आज तक

कभी भी राष्ट्र व अपने क्षत्रिय कॉम पर जी जी आचमन न करें

800 सूर्यास्त तक आक्रांताओ को। रोके रखने में अपना सर्वस्व स्थापित किया गया है

विधर्मी का संघटन है

शाका और *मालकिन* है

परन्तु अपना धर्म न परिवर्तन न पुनर्स्थापन।

रोहिला राजवंश के मूल पुरुष चन्द्र वंशी सम्राट ययाति के तीसरे पुत्र द्रह्यु हैं

इसी का अपभ्रंश द्रोह रोहिल्ला हुआ*

रोहिल खंड राज्य लोकतन्त्रात्मक गणराज्य था

राजवंशानुक्रम का शासन नहीं था*

वाचाल(वाचेल)चौहान राठौड़ गहलोत (,गहलोत) आदि प्रसिद्ध डेयरडेविल राज वन्सो का शासन था ये सभी कटेहर इया राजपूत कहलाते थे
सुन्दर बालिष्ठ

धारकों(रहेल्ला) को अपने योग्य शासक चुनाव (हाथ उठाना कर) से नियुक्त किया जाता था

🤺🤺🤺

अयोध्या में इख (गन्ना) ओबने वाले

इश्क़वाकू/सूर्य का उदय हुआ

और प्रयाग के पास झूंसी में चन्द्र वंस

का उदय हुआ

मित्र सम्राट ययाति इसी वंस में हुए

इनके तीसरे पुत्र द्रह्यु के नाम द्रह्यु वंश/गंधार वंश चले

द्रह्यु से रोहिलाओ का मूल है

भारत के चन्द्रवंश के शासक सम्राट

ययाति के पुत्र द्रुह्यु का प्रदेश ही रूह/रोह प्रदेश के नाम से जाना गया

रो का अर्थ है चढ़ना (पर्वतीय)

यह भी एक पर्वतीय प्रदेश है

यह भारत की पश्चिमी उत्तर सीमा का प्रदेश था

इस रोह प्रदेश की पसंद अब गूगल मैप पर देखें

इसके निवासियों ने अलेक्जेंडर को भारत में प्रवेश करने से रोक दिया, 400 साल बाद अक्रांताओं ने रोके रखा जब मैदानों से मदद नहीं मिली तो मैदानों की और स्मारक कर दिया

अथवा सचिवालय

क्षुद्रक गणराज्य

मालव गणराज्य

तक्षक गणराज्य
कठगणराज्य 
अश्वक गणराज्य आदि के शासक ब्रह्मा से टकराते हुए मैदानों में आये

गुजरात में कड़ियावाद

पंचाल में कटेहर राज्य की स्थापना

पंजाब से अज़ान तक यौधे राज्य की स्थापना की

यह क्षत्रिय यहाँ पर

कठेहरिया/, रोहिले रोहिले कहलाये

(राजपूत/क्षत्रिय वाटिका)

(रोहिले क्षत्रियो का क्रमबद्ध इतिहास)

रोही +ला(प्रत्य)----*रोहिला*

रोहिल्ला* इलियन या अवलोकन करने वाला यानि--?
रूह (उर्बानी/फ़ारसी/अरबी) + ला --

आत्मा+ ला----?

ला--का अर्थ वाला

के बीच क्या अंतर है

रोहिला* & रुहेला*

यू

राजा रणवीर सिंह के समय रोहिल खंड की राजधानी में था

1702 से हिंदू रोहिले राजपूतो की राजधानी में हुई

महान राजा इंद्र सेन


/इंद्र गिरी जी महाराज थे वे ही 1761 विक्रमी या 1702 इसवी में रोहिल खंड। पश्चिमी सीमा पर रोहिला किला का निर्माण कार्य था🙏🏽

इस कटहर रोहिल खंड के राजा के साथ 84 लोहे के कवच धारी अजेय रोहिले सरदार/संतामंती थे

उनके सामने मुल्ला नहीं टिक बैठे थे

इनमे निम्न गोत्रो के योद्धा थे

1- लक्ष्मीर 2- राठौड़/महेच राणा 3- चौहान/वत्स/घोड़ा 4-वाचेल/वाचाल/कूपट/घूमरा

5- मूसले/नार्नसेले/मौसल/मोसले/मुसले

6- कतेहरिया

/ काठी/, काठिया/ काठोड़े


https://www.perplexity.ai/search/kaatthii-ktthehr-kaatthiyaavaa-uhWI8GS0ShyXYYP..UkUOg#0


काठी / कठेहर / काठियावाड़ क्षत्रियों का इतिहास संक्षेप में तीन मुख्य हिस्सों में बँटकर समझा जा सकता है।���उत्पत्ति और प्राचीन पृष्ठभूमिकुछ स्रोत काठी या कठ क्षत्रियों को प्राचीन सूर्यवंशी क्षत्रिय परंपरा से जोड़ते हैं, जिन्हें उत्तर-पश्चिम भारत (रावी नदी के काठ) के “कठ‑गण” या कठ जाति से आया माना जाता है।�एक परंपरा के अनुसार ये कठ लोग सिकन्दर के समय रावी क्षेत्र में शक्तिशाली गणराज्य रूप में थे और बाद में अलवर, जैसलमेर होते हुए सौराष्ट्र (काठियावाड़) और फिर मध्यदेश‑पाँचाल की ओर फैले।�काठी और काठियावाड़गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र को काठियावाड़ नाम वहाँ बसे काठी क्षत्रिय/राजपूत समुदाय के कारण पड़ा, जो स्थानीय शासक वर्ग के रूप में प्रतिष्ठित हुए।��कुछ विद्वानों और स्रोतों में काठी जाति को आभीर समूह की शाखा भी माना गया है, जहाँ “काठीक” या “काठीकंरपति” नाम से उनके युग का उल्लेख मिलता है; यही काठी बसाहट काठियावाड़ नाम की आधार मानी जाती है।�कठेहर (रोहिलखण्ड) क्षत्रियमध्यदेश के उत्तरी पाँचाल क्षेत्र में कठ क्षत्रियों ने “कठेहर” या “कठेहर रोहिलखण्ड” राज्य बसाया, जिसकी राजधानी रामपुर और आसपास के क्षेत्र (आज का रोहिलखण्ड, उत्तर प्रदेश का भाग) माने जाते हैं।�परंपरागत वर्णन के अनुसार यहाँ कठिया/कठहर राजपूतों ने कई पीढ़ियों तक शासन किया और दिल्ली सल्तनत के विरुद्ध युद्धों में अपनी क्षत्रिय स्वायत्तता बनाए रखने की कोशिश की, जिनमें राजा रणवीर सिंह कठहरिया रोहिला जैसे योद्धाओं का उल्लेख मिलता है।�काठी राजपूत परंपराकाठी राजपूत या काठी क्षत्रियों के बारे में आधुनिक सामुदायिक साहित्य उन्हें वीर, अश्वारोही और युद्धकला‑कुशल समुदाय के रूप में वर्णित करता है, जो मुख्यतः काठियावाड़ और आसपास के इलाकों में जागीरदार/दरबार वर्ग रहे।���अनेक कथाएँ मुगल काल और उसके बाद के समय में काठी क्षत्रियों के बलिदान, विशेषकर स्थानीय दुर्गों और मंदिरों की रक्षा के प्रसंगों का उल्लेख करती हैं, जो आज भी समुदाय की गौरव‑कथाओं के रूप में सुनाए जाते हैं।��इतिहास‑अध्ययन के लिए सावधानियाँउपलब्ध साहित्य का बड़ा हिस्सा लोक‑परंपरा, सामुदायिक ब्लॉग, सामाजिक मीडिया और मौखिक इतिहास पर आधारित है, इसलिए अकादमिक इतिहास‑लेखन से इसकी भाषा और निष्कर्ष भिन्न हो सकते हैं।����यदि विस्तृत शोध करना हो तो प्राचीन शिलालेखों, प्रतिहार/गुर्जर इतिहास और सौराष्ट्र‑रोहिलखण्ड पर लिखी मानक इतिहास‑पुस्तकों को भी मिलाकर देखना उपयोगी रहेगा, ताकि समुदाय‑कथा और अकादमिक स्रोतों का संतुलित चित्र बन सके।��


"*काल भी अगर छोड दे लेकिन काठी नहीं छोडता”* 
*(Time ( Death ) Forgets But Not Kathi )*

क्या हैं - “काठी और काठीयावाड, कठेहर खंड ” ?

काठी दरबार भव्यअतित कि श्रृंखला मे एक प्रसिद्ध नाम , यह एक क्षत्रिय संघ जो वीरता का वैभव , शौर्य का प्रतीक और अपने कठोर स्वाभीमानी गुणो से प्रसिद्ध है। 

*इसलिए इनके बारे प्रसिद्ध कहावत हैं - "काल भी अगर छोड दे लेकिन काठी नहि छोडता”*
सिकंदर के आक्रमण के पश्चात भारत की पश्चिमी उत्तरीय सीमा प्रांत के प्रहरी इन क्षत्रिय वीरों ने मैदानों का रुख किया,एक टुकड़ी सौराष्ट्र आई दूसरी उत्तरी पांचाल में तथा एक टुकड़ी काठी क्षत्रियों की नेपाल गई।
उत्तरी पांचाल को कठेहर खंड /रोहिलखंड के नाम से विकसित कर स्थिर रूप से राज्य स्थापित किया।
नेपाल में काठी क्षत्रियों ने कठेत कटायतkathayat साम्राज्य स्थापित किया।
 एक टुकड़ी ने थोडी कुछ शताब्दियो से उन्होने स्थिर रुप से अपना निवासस्थान सौराष्ट्र को बना लिया और इतना हि नहीं युगों से पुराण प्रसिद्ध सौराष्ट्र नाम इन्हि के कारण पलटकर ' काठीयावाड ' नाम से मशहुर हुआ एसी इन्होने इस विस्तार कि संस्कृति मे अमिट छाप छोडी हैं। 

कठ गणराज्य वाहिक प्रदेश ( हाल के पंजाब ) मे प्रसिद्ध था।इनकी राजधानी ( संगल ) सांकल थी ,(आज का स्याल कोट)एक उल्लेख मिलता है कि इन पंजाब वासी कठो के नाम से आज के अफगानिस्तान के गजनी प्रांत मे ' काटवाज ' क्षेत्र हे । कठ लोगों के शारीरिक सौदर्य और अलौकिक शौर्य की ग्रीक इतिहास लेखकों ने भूरि - भूरि प्रशंसा की है , ग्रीक लेखकों के अनुसार कठों के यहाँ यह प्रथा प्रचलित थी कि वे केवल स्वस्थ एवं बलिष्ठ संतान को ही जीवित रहने देते थे । 

सीक्रीटोस लिखता है कि वे सुंदरतम एवं बलिष्ठतम व्यक्ति को ही अपना शासक चुनते थे , ग्रिक इतिहासकारो ने कठो को कठोइ या काठीयन जैसे नामो से निर्देषीत किया हे , पाणिनी के ' अष्टाध्यायी ' मे कठो का उल्लेख हे , पंतजली के महाभाष्य के मत से कठ वैशपायन के शिष्य थे । इनकि प्रवर्तित वेदसंहिता कि शाखा ' काठक ' नाम से प्रसिद्ध थी । 

काठक कापिष्ठल संहिता जैतारायण , प्रत्धन ( दिवोदासी ) भीमसेनी इन राजाओ का नाम मीलते हे जीन्होने राजसूय यज्ञ किया था । इन्होने कई बार पोरस को हराया था।
सिकंदर को घुटने टेकने पर मजबूर किया,कठगणराज्य की राजकुमारी कार्विका उर्फ कर्णिका ने सिकंदर को अपनी नारी सेना के द्वारा परास्त किया घायल किया। वह तो आंतरिक राजाओं की सहायता से बच निकला था।
Painting : 1880's. ' A kathiavad Sentry’
By Artist - Horace van Ruith . 

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राजपूतो की यह रोहिल्ला खाफ सदैव संघर्ष करती रही और दिल्ली के सुल्तान ने कभी भी 16 शताब्दी तक पूर्णताया रोहिले राजपूतो को जीत नहीं मिली

हरिसिंह खड्ग सिंह राव नरसिंह आदि जगत सिंह बर्लदेव बांसदेव वर्षा ऋतु तक रोहिले भारी पड़े और मुल्ला देखते रहे

अकबर ने अफ़गानों के हाथों धोखे से रोहिला राजा को मरवाया ओर अलीमुहम्मद आदि ने रहमत खा रुहेला ने रोहिला राजपूतो से रोहिलखंड को छीन लिया और रुहेलखंड का दर्शन लागे

फिर 18वीं सदी में रोहिले को एकजुट किया गया और 1702 में रोहिले को स्वतंत्र रोहिल्लाखंड राज्य घोषित किया गया 1720 तक शासन किया गया


संदर्भ--

भारत भूमि और उसका वासी पृष्ठ-230 पंडित जयचंद्र विद्यालंकार

2-दून ज्योति-साप्ताहिक मेमोरियल 18 फरवरी 1974

प्रमुख नागेश ओक और डॉक्टर ओमवीर शर्मा, प्रमुख ऑफ क्रॉनिकेशन विभाग

3-क्षत्रिय वर्तमान पृष्ठ 97 व 263 ठाकुर अजीत सिंह परिहार बालाघाट

4- प्राचीन भारत पृष्ठ -118,159,162 बीएम रस्तोगी इतिहास कार

5 राजतरंगनी पृष्ठ 31-39 कल्हण क्रत् दण्डक निज़ामलिन

6-रोहिला क्षत्रिय वन्स भास्कर, आर आर राजपूत मूरसेन क्रिएटिव

7- इतिहास रोहिल्ला राजपूत

डॉक्टर के सी सेन

8 - भारत का इतिहास पृष्ठ 138 डॉक्टर मर्सी प्रकाश

9-भारतीय इतिहास मीमांसा पृष्ठ 44 जयचंद विद्यालंकार

10- भारतीय इतिहास की रूप रेखा द्वितीय भाग पृष्ठ 699 बीएम रस्तोगी

11-सीमा संरक्षण पृष्ठ 21-22 हरिकृष्ण प्रेमी

12 टोड राजस्थान पृष्ठ 457 परिचय 43 विवरण केशव कुमार ठाकुर

13- प्राचीन भारत का इतिहास राजपूत वन पृष्ठ 104 व 105कैलाश प्रकाशन लखनऊ 1970 व पृष्ठ 147

14 रोहिल्ला क्षत्रियो का क्रमबद्ध इतिहास लेखक दर्शन लाल रोहिल्ला

15 राजपूत,/क्षत्रिय वाटिका

राजनीतिन सिंह रावत अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा

16 संबंध बिटवीन रोहिला और कठरिया राजपूत निकुंभ और श्रीनेत राजवंश

महेश सिंह कायत नेपाल


*वर्तमान_क्षत्रिय कठेहरिया_राजपूत_शूरवीरो_क़ी_शौर्यगाथाएँ*

*कठ_काठी_कठोड़े_कुलठान_कठपाल_वर्तमान*
*कठेहरिया_ठाकुर ही काठी क्षत्रिय है*
*राजपूताना रोहिलखंड,*
*क्षत्रिय_राजपूताना_रोहिलखंड* 
योद्धा विलाप करते हैं, साम्राज्य का पतन होता है: सिकंदर महान की विरासत इतिहास के सबसे उल्लेखनीय साम्राज्यों में से एक के कड़वे-मीठे अंत को दर्शाती है। 323 ईसा पूर्व में सिकंदर की मृत्यु के बाद, उसने जो विशाल साम्राज्य बनाया था, जो ग्रीस से लेकर भारत तक फैला हुआ था, वह जल्दी ही बिखर गया। 32 वर्ष की कम उम्र में उसके अचानक निधन के बाद कोई स्पष्ट उत्तराधिकारी नहीं बचा, और उसके सेनापति, जिन्हें डायडोची के नाम से जाना जाता था, ने उसके क्षेत्रों पर नियंत्रण के लिए भयंकर युद्ध किया। एक बार एकीकृत साम्राज्य युद्धरत राज्यों में विभाजित हो गया, जिसने बेजोड़ सैन्य विजय के युग का अंत कर दिया। फिर भी, सिकंदर की विरासत युद्ध के मैदान से कहीं आगे तक चली गई। उसके अभियानों ने ग्रीक संस्कृति, भाषा और विचारों को पूरे ज्ञात विश्व में फैलाया, उन्हें स्थानीय परंपराओं के साथ मिलाया, जिसे हेलेनिस्टिक युग के रूप में जाना जाता है। साम्राज्य के पतन के बावजूद, कला, विज्ञान, दर्शन और राजनीतिक विचारों पर सिकंदर की दृष्टि और प्रभाव ने आने वाली सदियों तक सभ्यताओं को आकार देना जारी रखा, जिससे इतिहास के सबसे महान और सबसे प्रभावशाली व्यक्तियों में से एक के रूप में उसका स्थान सुनिश्चित हुआ।
काठी योद्धाओं ने ही उत्तरी पांचाल मध्य देश पर अधिकार किया और एक स्वतंत्र राज्य कठेहर रोहिलखंड की स्थापना की,राजा राम साह कठहरिया ने रामपुर को राजधानी बनाया,यहां उनकी ग्यारह पीढ़ियों तक शासन रहा। इसी वंश में जन्मे थे क्षत्रिय सम्राट महाराजा रणवीर सिंह रोहिला जिसने दिल्ली सुलतानों को अनेकों बार धूल चटाई और कठेहर रोहिलखंड का लोहा मनवाया।
रोहिला, राजपूत / कठेहरिया राजपूतों का ही एक उपवर्ग है, जो मध्यकालीन भारत में रोहिलखंड क्षेत्र में शासक और संस्थापक थे। कुछ स्रोतों के अनुसार, रोहिला एक राजपूत वंश है, जो सौर जाति के उच्च भूमिवासी राजा थे, जिन्होंने 8वीं से 18वीं शताब्दी तक उत्तरी पांचाल पर शासन किया. 
विस्तार से:
रोहिला राजपूत: काठी राजपूत कठ गणराज्य से विस्थापित कठ शाखा के
रोहिला, राजपूतों का एक परिवार या गोत्र है, जो कठेहर-रोहिलखंड के शासक और संस्थापक थे. 
रोहिला का अर्थ:
"रोहिला" शब्द का अर्थ "युद्ध में शत्रु सेना को छिन्न-भिन्न करने वाला" होता है, जो युद्ध कौशल में उनकी वीरता को दर्शाता है. 
शासक और संस्थापक:
रोहिला राजपूतों ने मध्यकालीन भारत में कठेहर रोहिलखंड क्षेत्र पर शासन किया और इसे स्थापित किया. 
विभिन्न क्षेत्रों में:
रोहिला राजपूतों का शासन पंजाब, कश्मीर, गुजरात, राजस्थान और मध्य प्रदेश , मध्य देश(उतरी पांचाल अहिक्षेत्र )जैसे क्षेत्रों में भी रहा है. 
18 कुल:
रोहिला राजपूतों में राजपूत वंश के 18 कुल शामिल हैं, जैसे चौहान, राठौड़, गहलोत, सिसोदिया, निकुंभ और पुंडीर. 
रोहिला उपाधि:
कुछ राजपूतों को बहादुरी के लिए "रोहिला" उपाधि से भी नवाजा गया था, जैसे कि महाराणा प्रताप के समय में. 
स्वतंत्रता संग्राम:
रोहिला राजपूतों ने 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और ब्रिटिश शासन का विरोध किया. 
अन्य नाम:
कुछ स्रोतों में रोहिला को "कठेहरिया" या "कठेहरिया राजपूत" भी कहा गया है, जो कठेहर क्षेत्र से उनके संबंध को दर्शाता है. 

काठी दरबार भव्यअतित कि श्रुंखला मे एक प्रसिद्ध नाम,यह एक क्षत्रिय संघ जो वीरता का वैभव,शौर्य का प्रतिक और अपने कठोर स्वाभीमानी गुणो से प्रसिद्ध हे।
    इनके बारे मे यह भी कहा जाता हे कि,
"काल भी अगर छोड दे लेकिन काठी नहीं छोडता"
    (Time (Death) Forgets But Not Kathi)
 थोडी कुछ शताब्दियो से उन्होने स्थिर रुप से अपना निवासस्थान सौराष्ट्र को बना लिया,और इतना हि नहि युगो से पुराण प्रसिद्ध सौराष्ट्र नाम इन्हि के कारण पलटकर 'काठीयावाड' नाम से प्रसिद्ध हुआ ऐसी इन्होने इस विस्तार कि संस्कृति मे अमीट छाप छोडी हे।
कठ गणराज्य वाहिक प्रदेश(हाल के पंजाब) मे प्रसिध्ध था इनकि राजधानी (संगल)सांकल थी,
एक उल्लेख मिलता हे कि इन पंजाब वासी कठो के नाम से अफगानिस्तान के गजनी प्रांत मे ‘काटवाज’ क्षेत्र हे।
 कठ लोगों के शारीरिक सौदंर्य और अलौकिक शौर्य की ग्रीक इतिहास लेखकों ने भूरि-भूरि प्रशंसा की है, ग्रीक लेखकों के अनुसार कठों के यहाँ यह प्रथा प्रचलित थी कि वे केवल स्वस्थ एवं बलिष्ठ संतान को ही जीवित रहने देते थे। ओने सीक्रीटोस लिखता है कि वे सुंदरतम एवं बलिष्ठतम व्यक्ति को ही अपना शासक चुनते थे, ग्रिक इतिहासकारो ने कठो को कठोइ या काठीयन जैसे नामो से निर्देषीत किया हे, पाणिनी के ‘अष्टाध्यायी’ मे कठो का उल्लेख हे, पंतजली के महाभाष्य के मत से कठ वैंशपायन के शिष्य थे।इनकि प्रवर्तित वेदसंहिता कि शाखा ‘काठक’ नाम से प्रसिध्ध थी । काठक कापिष्ठल संहिता जैतारायण, प्रत्धर्न(दिवोदासी) ,भीमसेनी इन राजाओ का नाम मिलते हे जीन्होने राजसूय यज्ञ किया था।
   इन्होने कइ बार पोरस को हराया था।इसा पूर्व ३२६ मे सिकंदर की विशाल सेना हिंदकुश कि पर्वतमाला के इस पार अश्वक और अष्टको के राज्य को हराकर झेलम पार कर पोरस से भीडने आ पहोंची,पोरस का पुत्र मारा गया,पोरस ने संधी कर ली जीसमे सैनीक सहायता के बदले ब्यास नदी तक के आगे जीते जाने वाले प्रदेशो पर पोरस सिंकदर के सहायक के तौर पर शासन करेगा, इसके बाद अधृष्ट(अद्रेसाइ) ने बिना लडे आधीनता स्वीकार कर ली, बाद मे कठ के नगर पर सेना आ खडी हुइ, कठ स्वतंत्रता प्रेमी थे, जो अपने साहस के लिए सबसे अधीक विख्यात थे,उन्होने शकट व्युह रचकर सिंकदर कि सेना पर भीतर तक भीषण आक्रमण किया और जिसमें खुद सिंकदर हताहत हो गया, संधी अनुसार पोरस ने २०,००० सैनीको का दल सिंकदर कि सहायता मे भेजा जीसमे हाथी भी थे जीनसे शकट व्युह तुट सकता था, तब कठो कि पराजय मुमकिन हो पाइ, करीबन १७००० कठ मारे गये और कइ बंदि बनाए गये, वहा पर नारीयो ने जौहर भी 

Monday, 22 December 2025

Maharaja Ranveer Singh Rohilla ( Rohilkhand)

महाराजा रणवीर सिहं रोहिला
राज्य-पांचाल, (मध्यदेश)), कठेहर,रोहिलखण्ड राजधानी-रामपुर (निकट अहिक्षेत्र, रामनगर)
(तेहरवीं शताब्दी का पूर्वार्द्ध)
*एक अजेय योद्धा, विधर्मी संहारक*सूर्यवंश-  सूर्य वंश में इस्क्वाकु की तेरहवीं पीढ़ी में महान पराक्रमी राजा निकुंभ से ही निकुंभ वंश स्थापित है जो अयोध्या के राजा थे इसी  निकुंभ   वंश की कठ शाखा ,(निकुंभ वंश की दूसरी शाखा श्रीनेत भी है)  ईसा पूर्व 326 वर्ष कठगण राज्य (रावी नदी के काठे में) सिकन्दर का आक्रमण काल-राजधानी सांकल दुर्ग (वर्तमान स्यालकोट) 53 वीं पीढ़ी ,राज्य अजयराव के वंशधर निकुम्भ वंशी, काठी कठेहरिया क्षत्रिय राजस्थान अलवर, मंगल गढ़, जैसलमेर होते हुए गुजरात, सौराष्ट्र गये, फिर पांचाल, मध्यदेश गये। अलवर में दुर्ग निकुम्भ वंशी (कठ क्षत्रिय रावी नदी के काठे से (विस्थापित कठ-ंगण) क्षत्रियों ने बनवाया (राज्य मंगलगढ़), सौराष्ट्र में काठियावाड़ की स्थापना की ।
काठी कठेहर काठियावाड़ इतिहास की ओर से 
"*काल भी अगर छोड दे लेकिन काठी नहीं छोडता”* 
*(Time ( Death ) Forgets But Not Kathi )*

क्या हैं - “काठी और काठीयावाड, कठेहर खंड ” ?

काठी दरबार भव्यअतित कि श्रृंखला मे एक प्रसिद्ध नाम , यह एक क्षत्रिय संघ जो वीरता का वैभव , शौर्य का प्रतीक और अपने कठोर स्वाभीमानी गुणो से प्रसिद्ध है। 

*इसलिए इनके बारे प्रसिद्ध कहावत हैं - "काल भी अगर छोड दे लेकिन काठी नहि छोडता”*
सिकंदर के आक्रमण के पश्चात भारत की पश्चिमी उत्तरीय सीमा प्रांत के प्रहरी इन क्षत्रिय वीरों ने मैदानों का रुख किया,एक टुकड़ी सौराष्ट्र आई दूसरी उत्तरी पांचाल में तथा एक टुकड़ी काठी क्षत्रियों की नेपाल गई।
उत्तरी पांचाल को कठेहर खंड /रोहिलखंड के नाम से विकसित कर स्थिर रूप से राज्य स्थापित किया।
नेपाल में काठी क्षत्रियों ने कठेत कटायतkathayat साम्राज्य स्थापित किया।
 एक टुकड़ी ने थोडी कुछ शताब्दियो से उन्होने स्थिर रुप से अपना निवासस्थान सौराष्ट्र को बना लिया और इतना हि नहीं युगों से पुराण प्रसिद्ध सौराष्ट्र नाम इन्हि के कारण पलटकर ' काठीयावाड ' नाम से मशहुर हुआ एसी इन्होने इस विस्तार कि संस्कृति मे अमिट छाप छोडी हैं। 

कठ गणराज्य वाहिक प्रदेश ( हाल के पंजाब ) मे प्रसिद्ध था।इनकी राजधानी ( संगल ) सांकल थी ,(आज का स्याल कोट)एक उल्लेख मिलता है कि इन पंजाब वासी कठो के नाम से आज के अफगानिस्तान के गजनी प्रांत मे ' काटवाज ' क्षेत्र हे । कठ लोगों के शारीरिक सौदर्य और अलौकिक शौर्य की ग्रीक इतिहास लेखकों ने भूरि - भूरि प्रशंसा की है , ग्रीक लेखकों के अनुसार कठों के यहाँ यह प्रथा प्रचलित थी कि वे केवल स्वस्थ एवं बलिष्ठ संतान को ही जीवित रहने देते थे । 

सीक्रीटोस लिखता है कि वे सुंदरतम एवं बलिष्ठतम व्यक्ति को ही अपना शासक चुनते थे , ग्रिक इतिहासकारो ने कठो को कठोइ या काठीयन जैसे नामो से निर्देषीत किया हे , पाणिनी के ' अष्टाध्यायी ' मे कठो का उल्लेख हे , पंतजली के महाभाष्य के मत से कठ वैशपायन के शिष्य थे । इनकि प्रवर्तित वेदसंहिता कि शाखा ' काठक ' नाम से प्रसिद्ध थी । 

काठक कापिष्ठल संहिता जैतारायण , प्रत्धन ( दिवोदासी ) भीमसेनी इन राजाओ का नाम मीलते हे जीन्होने राजसूय यज्ञ किया था । इन्होने कई बार पोरस को हराया था।
सिकंदर को घुटने टेकने पर मजबूर किया,कठगणराज्य की राजकुमारी कार्विका उर्फ कर्णिका ने सिकंदर को अपनी नारी सेना के द्वारा परास्त किया घायल किया। वह तो आंतरिक राजाओं की सहायता से बच निकला था।
Painting : 1880's. ' A kathiavad Sentry’
By Artist - Horace van Ruith . 

#kathiyawad #history #gujrat #mumbai #indianhistory #rajput #kathi #indianhistory #rajputhistory #sentry #sword #shield
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(नव युवक मंडल मेवाड़)
 मध्यदेश के पांचाल में कठेहर राज्य की स्थापना सन् 648 से 720 ई. तक। यहां अहिक्षेत्र के पास रामनगर गांव मे ंराजधानी स्थापित की, ऊंचा गांव मझ गांवा को सैनिक छावनी बनाया। यहां पर शासक हंसदेव, रहे, इनके पुत्र हंसबेध राजा बने-ं816 ई. तक- इसी वंश में निकुम्भवंश कठेहरिया रामश्शाही (राम सिंह जी ) ने रामपुर गांव को एक नगर का रूप दिया और 909 ई तदनुसार 966 विक्रमी संवत में कठेहर- रोहिलखण्ड प्रान्त की राजधानी रामपुर में स्थापित की। यहां पर  कठ क्षत्रियों ने 11 पीढ़ी शासन किया इसी वंश में महापराक्रमी, विधर्मी संहारक महाराजा  रणवीर
सिंह रोहिला का जन्म 25अक्टूबर , सन 1204ईस्वी  तदनुसार कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की प्रथम तिथि ,संवत 1261विक्रमी में हुआ।
वंश वृक्ष इस प्रकार पाया गया
रामपुर संस्थापक राजा राम सिंह उर्फ रामशाह 909 ई. संवत में 966 विक्रमी , 3 पौत्र- बीजयराज 4. करणचन्द 5. विम्रहराज 6. सावन्त  सिंह (रोहिलखण्ड का विस्तार गंगापार कर यमुना तक किया,) सिरसापाल के राज्य सरसावा में एक किले का निर्माण कराया। (दशवीं शताब्दी का उत्तरार्द्ध) नकुड रोड पर किले को आज यमुना द्वारा ध्वस्त एक टीले के रूप में देखा जा सकता है। 7. जगमाल 8. रणवीर सिंह 9. धिंगतराम 10 गोकुल सिंह 11 महासहाय 12. त्रिलोकचन्द 13. नौरंग देव (पिंगू/तैमूर  लंग को परास्त किया) (राजपूत गजट लाहौर 04.06.1940 द्वारा डा0 
सन्त सिंह चैहान)

(रामपुर का रोहिला किला), *राजा रणवीर सिंह रोहिला, दिल्ली में गुलामवंश का शासन*
गुलाम सेनापति नासिरूद्दीन चंगेज उर्फ नासिरूद्दीन महमूद, सन् 1253 ई0, बहराम वंश ने दोआब, कठेहर, शिवालिक पंजाब, बिजनौर आदि क्षेत्रों पर विजय पाने के लिए दमनकारी अभियान किया। इतने अत्याचार , मारकाट तबाही मचाई कि विदे्राह करने वाले स्थानीय शासक,  बच्चे व स्त्रियंा भी सुरक्षित नहीं रही। ऐसी विषम परिस्थिति में रोहिल खण्ड के रोहिला शासकों ने दिल्ली सल्तनत के सूबेदार‘ ताजुल मुल्क इज्जूददीन डोमिशी‘ को मार डाला। दिल्ली सल्तनत के लिये यह घटना भीषण चुनौती समझी गई। इस समय रामपुर के राजा रणवीर सिंह रोहिला थे । उन्होने दिल्ली सल्तनत के विरूद्ध अपनी क्रान्तिकारी प्रवृत्ति को सजीव बनाये रखा। नासिरूद्दीन महमूद (चंगेज) इस घटना से उद्वेलित हो उठा और सहारनपुर ‘( उशीनर प्रदेश‘) के मण्डावार व मायापुर से 1254 ई0 में गंगापार कर गया और विद्रोह को दबाता हुआ, रोहिलखण्ड को रौदता हुआ बदांयू पहुंचा। वहां उसे ज्ञात हुआ कि रामपुर में राजा रणवीर सिंह के साथ लोहे के कवचधारी 84 अजेय रोहिले  योद्धा है जिनसे विजय पाना टेढ़ी खीर है। इस समय दिल्ली की शासन व्यवस्था बलबन के हाथों में थी। सूचना दिल्ली भेजी  गई। दिल्ली दरबार में सन्नाटा हो गया कि एक छोटे राज्य कठेहरखण्ड /रोहिलखंड को रोहिलों से कैसे छीना जाए। नासिरूद्दीन चंगेज (महमूद) ने तलवार व बीड़ा  उठाकर राजा रणवीर सिंह के साथ युद्ध करने की घोषणा की। रामपुर व पीलीभीत के बीच मैदान में दिल्ली सल्तनत की भारी तीस हजारी सेना व रोहिलों में भयंकर संघर्ष हुआ। वशिष्ठ गोत्र के 84 लोहे के कवचधारी रन्धेलवंशी सेना नायकों की सेना के सामने नासिरूद्दीन की सेना के पैर उखड़ गये।
      नासिरूद्दीन चंगेज को बन्दी बना लिया गया। बची हुई सेना के हाथी व घोडे तथा एक लाख रूपये महाराज रणवीर सिंह को देने की प्रार्थना पर आगे ऐसा अत्याचार न करने की शपथ लेकर नासिरूद्दीन महमूद ने  प्राण दान मांग लिया। क्षात्र धर्म के अनुसार शरणागत को अभयदान देकर राजा रणवीर सिंह ने उसे छोड़ दिया। परन्तु धोखेबाज महमूद जो राजा रणवीर सिंह पर विजय पाने का बीड़ा उठाकर दिल्ली से आया था, षडयंत्रों में लग गया। राजा रणवीर सिंह का एक दरबारी पं. गोकुलराम पाण्डेय  था। उसे रामपुर का राजा नियुक्त करने का लालच देकर महमूद ने विश्वास में ले लिया और रामपुर के किले का भेद लेता रहा। पं. गोकुल राम ने लालच के वशीभूत होकर विधर्मी को बता दिया कि रक्षांबधन के दिन सभी राजपूत निःशस्त्र होकर शिव मन्दिर मंे शस्त्र पूजा करेंगें। वशिष्ठ गोत्र के कठेहरिया राजपूतों मंे शिव  उपासना कर शक्ति प्राप्त करने की भावना जीवित है।यह शिव मन्दिर किले के दक्षिण द्वार के समीप है। यह सुनकर महमूद का चेहरा खिल उठा और दिल्ली से भारी सेना को मंगाकर जमावड़ा प्रारम्भ कर दिया रक्षाबन्धन का दिन आ गया। सभी किले में उपस्थित  सैनिक, सेनाायक अपने-ंअपने शस्त्रों को उतार कर पूजा स्थान पर शिव मन्दिर ले जा रहे थे। गोकुल राम पाण्डेय यह सब सूचना विधर्मी तक पहुचंता रहा। सामने श्वेत ध्वज रखकर दक्षिण द्वार पर पठानों की गुलामवंशी सेना एकत्र हो गयी। पूजा में तल्लीन राज पुत्रों को पाकर गोकुलराम पाण्डेय ने द्वार खोल दिया।
      शिव उपासना में रत सभी उपस्थितों को घेरे में ले लिया गया। घमासान युद्ध छिड़ गया परन्तु ऐसी गद्दारी के कारण राजा रणवीर सिंह वीरगति को प्राप्त हुए। नासिरूद्दीन ने पं. गोकुल राम से कहा कि जिसका नमक खाया अब तुम उसी के नहीं हुए तो तुम्हारा भी संहार अनिवार्य है। नमक हरामी को जीने का हक नहीं है। गोकुल का धड़ भी सिर से अलग पड़ा था। सभी स्त्री बच्चों को लेकर रणवीर सिंह का  भाई सूरत सिंह किले से पलायन कर चरखी दादरी में अज्ञातवास को चला गया। महारानी तारादेवी राजा रणवीर सिंह  के साथ सती हो गई। 
रामपुर में किले के खण्डरात, सती तारादेवी का मन्दिर तथा उनका राजमहल अभी तक मौजूद है, जो क्षात्र धर्म का परिचायक व रामपुर में रेहिले क्षत्रियों की कठ-शाखा के शासन काल की याद ताजा करता है जिन्होंने अपना सर्वस्व बलिदान कर क्षात्र धर्म की रक्षा की। गुलाम वंश, सल्तनत काल में विधर्मी की पराधीनता कभी स्वीकार नहीं की। अन्तिम सांस तक दिल्ली सल्तनत से युद्ध किया और रोहिलखण्ड को स्वतंत्र राज्य बनाये रखा। निरन्तर संघर्ष करते रहे राजा रणवीर सिंह का बलिदान व्यर्थ नहीं , सदैव तुगलक, मंगोल , मुगलों आदि से विद्रोह किया और स्वतंत्र रहने की भावना को सजीव रखा। राणा रणवीर सिंह के वंशधर आज भी रोहिला-ंक्षत्रियों में पाए जाते है।

राजपूताना कठेहर रोहिलखंड के क्षत्रिय सम्राट सूर्य वंश की निकुंभ शाखा के महाराजा रणवीर सिंह रोहिला

*राजपुताना कठेहर रोहिलखंड*
के एक महान पराक्रमी योद्धा 
सूर्य वंशी क्षत्रिय सम्राट
*एक अजेय योद्धा*
*महाराजा रणवीर सिहं कठेहरिया रोहिला*

      *संक्षिप्त परिचय*
************************* *जन्म दिवस* 25 अक्टूबर, 1204 तदानुसार तत्कालीन कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की प्रथमा तिथि संवत 1261 विक्रमी
#पिता* महाराज त्रिलोक सिंह जी काठी क्षत्रिय 
*************************
*वंश* _सूर्यवंश की निकुंभ शाखा 
वेद _यजुर वेद,उपवेद__धनुर्वेद,प्रवर_एक/तीन , शिखा_दाहिनी, पाद_दाहिनी,सूत्र _गुभेल,देवता__विष्णु (रघुनाथ जी), कुलदेवी _चामुंडा/कालिका माता,ध्वजा__गरुड़,नदी__सरयू,झंडा पंच रंगा,नगाड़ा_रण गंजन , ईष्ट_रघुनाथ/श्री राम चंद्र जी,उद्घोष_हर हर महादेव गोत्र_वशिष्ठ गुणधर्म _काठी (कठोर) गद्दी _ अयोध्या,ठिकाना__रावी व व्यास नदियों के बीच के काठे का क्षेत्र 
*************************
#राज्य विस्तार*
◆गंगा - यमुना दोआब क्षेत्र #दक्षिण पश्चिम में गंगा तक #पश्चिम में उत्तराखंड 
#उत्तर में नेपाल तक
*क्षेत्रफल* 25000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र या 10000 वर्ग मील क्षेत्र तक 

# सूबे* 
पांचाल, 
मध्यदेश,
कठेहर रोहिलखण्ड
*राजधानी* -रामपुर (निकट अहिक्षेत्र, रामनगर) कांपिल्य
##################
(तेहरवीं शताब्दी का पूर्वार्द्ध)

🔆सूर्यवंश🔆
***********************
#आइए इतिहास में चलें*



"*काल भी अगर छोड दे लेकिन काठी नहीं छोडता”* 
*(Time ( Death ) Forgets But Not Kathi )*

क्या हैं - “काठी और काठीयावाड, कठेहर खंड ” ?

काठी दरबार भव्यअतित कि श्रृंखला मे एक प्रसिद्ध नाम , यह एक क्षत्रिय संघ जो वीरता का वैभव , शौर्य का प्रतीक और अपने कठोर स्वाभीमानी गुणो से प्रसिद्ध है। 

*इसलिए इनके बारे प्रसिद्ध कहावत हैं - "काल भी अगर छोड दे लेकिन काठी नहि छोडता”*
सिकंदर के आक्रमण के पश्चात भारत की पश्चिमी उत्तरीय सीमा प्रांत के प्रहरी इन क्षत्रिय वीरों ने मैदानों का रुख किया,एक टुकड़ी सौराष्ट्र आई दूसरी उत्तरी पांचाल में तथा एक टुकड़ी काठी क्षत्रियों की नेपाल गई।
उत्तरी पांचाल को कठेहर खंड /रोहिलखंड के नाम से विकसित कर स्थिर रूप से राज्य स्थापित किया।
नेपाल में काठी क्षत्रियों ने कठेत कटायतkathayat साम्राज्य स्थापित किया।
 एक टुकड़ी ने थोडी कुछ शताब्दियो से उन्होने स्थिर रुप से अपना निवासस्थान सौराष्ट्र को बना लिया और इतना हि नहीं युगों से पुराण प्रसिद्ध सौराष्ट्र नाम इन्हि के कारण पलटकर ' काठीयावाड ' नाम से मशहुर हुआ एसी इन्होने इस विस्तार कि संस्कृति मे अमिट छाप छोडी हैं। 

कठ गणराज्य वाहिक प्रदेश ( हाल के पंजाब ) मे प्रसिद्ध था।इनकी राजधानी ( संगल ) सांकल थी ,(आज का स्याल कोट)एक उल्लेख मिलता है कि इन पंजाब वासी कठो के नाम से आज के अफगानिस्तान के गजनी प्रांत मे ' काटवाज ' क्षेत्र हे । कठ लोगों के शारीरिक सौदर्य और अलौकिक शौर्य की ग्रीक इतिहास लेखकों ने भूरि - भूरि प्रशंसा की है , ग्रीक लेखकों के अनुसार कठों के यहाँ यह प्रथा प्रचलित थी कि वे केवल स्वस्थ एवं बलिष्ठ संतान को ही जीवित रहने देते थे । 

सीक्रीटोस लिखता है कि वे सुंदरतम एवं बलिष्ठतम व्यक्ति को ही अपना शासक चुनते थे , ग्रिक इतिहासकारो ने कठो को कठोइ या काठीयन जैसे नामो से निर्देषीत किया हे , पाणिनी के ' अष्टाध्यायी ' मे कठो का उल्लेख हे , पंतजली के महाभाष्य के मत से कठ वैशपायन के शिष्य थे । इनकि प्रवर्तित वेदसंहिता कि शाखा ' काठक ' नाम से प्रसिद्ध थी । 

काठक कापिष्ठल संहिता जैतारायण , प्रत्धन ( दिवोदासी ) भीमसेनी इन राजाओ का नाम मीलते हे जीन्होने राजसूय यज्ञ किया था । इन्होने कई बार पोरस को हराया था।
सिकंदर को घुटने टेकने पर मजबूर किया,कठगणराज्य की राजकुमारी कार्विका उर्फ कर्णिका ने सिकंदर को अपनी नारी सेना के द्वारा परास्त किया घायल किया। वह तो आंतरिक राजाओं की सहायता से बच निकला था।
Painting : 1880's. ' A kathiavad Sentry’
By Artist - Horace van Ruith . 

#kathiyawad #history #gujrat #mumbai #indianhistory #rajput #kathi #indianhistory #rajputhistory #sentry #sword #shield
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* इस्क्वाकू वंश में सूर्य वंशी महाराज निकुम्भ के वंशधर ई●पू● 326 वर्ष कठगण राज्य (रावी नदी के काठे में) सिकन्दर का आक्रमण काल-राजधानी सांकल दुर्ग (वर्तमान स्यालकोट) 53 वीं पीढ़ी में राजा अजयराव के वंशधर निकुम्भ वंशी राजस्थान अलवर, मंगल गढ़ जैसलमेर होते हुए गुजरात सौराष्ट्र कठियावाड , फिर पांचाल, मध्यदेश गये। 
* एक टुकड़ी नेपाल गई
*************************
*अलवर में दुर्ग निकुम्भ वंशी (कठ क्षत्रिय रावी नदी के काठे से विस्थापित कठ-ंगण जिन्होंने सिकंदर को घुटने टेकने पर मजबूर किया था) क्षत्रियों ने बनवाया (राज्य मंगल गढ़), सौराष्ट्र में काठियावाड़ की स्थापना की ।
*************************
 #मध्यदेश के उत्तरी पांचाल में कठेहर रोहिलखंड राज्य की स्थापन। यहां अहिक्षेत्र के पास रामनगर गांव मे राजधानी स्थापित की, ऊंचा गांव मझगांवा को सैनिक छावनी बनाया। यहां पर शासक हंसदेव, रहे, इनके पुत्र हंसबेध राजा बने-ं816 ई. तक- इसी वंश में राजा रामशाही (राम सिंह जी ) ने रामपुर गांव को एक नगर का रूप दिया और *909 ई में कठेहर- रोहिलखण्ड प्रान्त की राजधानी रामपुर में स्थापित की। 
#यहां पर कठ क्षत्रियों ने 11 पीढ़ी शासन किया इसी वंश75 में महापराक्रमी, विधर्मी संहारक राजा रणवीर
सिंह कठेहरियारोहिला का जन्म कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की प्रथमा तिथि तदानुसार 25 अक्टूबर 1204ईसवी को राजपूत काल के ऐसे समय में हुआ जब महराजा पृथ्वी राज चौहान के शासन अंत के कारण समस्त राजपूत शक्ति क्षीण हो चुकी थी ओर मुस्लिम आक्रांता इस्लामिक सल्तनत कायम करने में लगे थे बची हुई राजपूत शक्तियों का बहुत कठोरता ओर बर्बरता से दमन कर रहे थे हिंदुआ सूर्य चौहान का शासन अस्त हो चुका था ।
वंश वृक्ष इस प्रकार पाया गया
रामपुर संस्थापक राजा राम सिंह उर्फ रामशाह 909 ई. में 966 विक्रमी , 3 पौत्र- बीजयराज 4. करणचन्द 5. विग्रह राज 6. सावन्त सिंह (रोहिलखण्ड कठेहर का विस्तार गंगापार कर यमुना तक किया,) सिरसापाल के राज्य सरसावा में एक किले का निर्माण कराया। (दशवीं शताब्दी का उत्तरार्द्ध) नकुड रोड पर किले को आज यमुना द्वारा ध्वस्त एक टीले के रूप में देखा जा सकता है। 7. जगमाल 8 धिंगतराम 9 गोकुल सिंह 10 महासहाय 11 त्रिलोकसिंह 12रणवीर सिंह( 1204 ),नौरंग देव (पिंगू को परास्त किया) (राजपूत गजट लाहौर 04.06.1940 द्वारा डा0 
सन्त सिंह चैहान)
इक्कीस वर्ष की आयु में रामपुर के राजा त्रिलोक चंद उर्फ त्रिलोक सिंह के पुत्र रणवीर सिंह रोहिला का विवाह विजयपुर सीकरी की राजकुमारी तारा देवी से हुआ। रणवीर सिंह रोहिला का राजतिलक भी इसी वर्ष इक्कीस वर्ष की आयु में हुआ यानी 1225,ईसवी में हुआ ,इनकी लंबाई लगभग सात फीट थी, कंधो पर सीना कवच लगभग साठ शेर ,सिर पर कवच लोहे का इक्कीस सेर खड़ग का वजन 25, सेर ओर स्वयं उनका वजन 125 सेर था। सन् 1236से1240 तक रजया तुदीन सुल्तान सन 1242 मइजुद्दीन बहराम शाह सन,1246 अलाउद्दीन महमूद शाह आदि दिल्ली सुल्तान सेनाओं से राजा रणवीर सिंह रोहिला , कठेहरिया ने कठेहर रोहिलखंड का लोहा मनवाया ओर किसी भी दिल्ली सुल्तान मामुल्क को रोहिलखंड में प्रवेश नहीं होने दिया । इनके साथ विभिन्न राजवंशों के चौरासी अजेय योद्धा थे ,राठौड़, गोड, चौहान,वारेचा परमार गहलोत वच्छिल आदि थे वे सब लोहे के कवच धारी थे।
दिल्ली सुल्तान के 
गुलाम , सेनापति नासिरूद्दीन चंगेज उर्फ नासिरूद्दीन महमूद ने , सन् 1253 ई0,में दोआब, कठेहर, शिवालिक पंजाब, बिजनौर आदि क्षेत्रों पर विजय पाने के लिए दमनकारी अभियान किया। इतने अत्याचार , मारकाट तबाही मचाई कि विद्रोह करने वाले स्थानीय शासक, बच्चे व स्त्रियां भी सुरक्षित नहीं रही। ऐसी विषम परिस्थिति में रोहिल खण्ड के रोहिला शासकों ने दिल्ली सल्तनत के सूबेदार‘ ताजुल मुल्क इज्जूददीन डोमिशी‘ को मार डाला। दिल्ली सल्तनत के लिये यह घटना भीषण चुनौती समझी गई। इस समय रामपुर के राजा रणवीर सिंह थे । उन्होनें आस पास की समस्त राजपूत शक्तियों को एकता के सूत्र में बांधा ओर दिल्ली सल्तनत के विरूद्ध अपनी क्रान्तिकारी प्रवृत्ति को सजीव बनाये रखा था जिससे दिल्ली सुल्तान कठेहर पर आक्रमण करते हुए भय खाते थे ,नासिरूद्दीन महमूद बहराम गुलाम वंश ( उर्फ चंगेज) इस घटना से उद्वेलित हो उठा और सहारनपुर ‘ उशीनर प्रदेश‘ के मण्डावार व मायापुर से 1253 ई0 में गंगापार कर गया और विद्रोह को दबाता हुआ, रोहिलखण्ड को रौदता हुआ बदांयू पहुंचा। वहां उसे ज्ञात हुआ कि रामपुर में राजा रणवीर सिंह रोहिला के साथ लोहे के कवचधारी 84 रोहिले है जिनसे विजय पाना टेढ़ी खीर है। सूचना दिल्ली भेजी गई। दिल्ली दरबार में सन्नाटा हो गया कि एक छोटे राज्य कठेहर रोहिलखंड के रोहिलों से कैसे छीना जाए। नासिरूद्दीन चंगेज (महमूद) ने तलवार व बीड़ा उठाकर राजा रणवीर सिंह के साथ युद्ध करने की घोषणा की। रामपुर व पीलीभीत के बीच मैदान में नसीरुद्दीन व कठेहर नरेश सूर्य वंशी क्षत्रिय रणवीर सिंह की सेना के बीच भयंकर युद्ध हुआ, 6000 रोहिला राजपूत व 
 84 लोहे के कवचधारी रन्धेलवंशी सेना नायकों की सेना के सामने नासिरूद्दीन की तीस हजारी सेना के पैर उखड़ गये।
      नासिरूद्दीन चंगेज को बन्दी बना लिया गया। बची हुई सेना के हाथी व घोडे तथा एक लाख रूपये महाराज रणवीर सिंह को देने की प्रार्थना पर आगे ऐसा अत्याचार न करने की शपथ लेकर नासिरूद्दीन महमूद ने प्राण दान मांग लिया। क्षात्र धर्म के अनुसार शरणागत को अभयदान देकर राजा रणवीर सिंह ने उसे छोड़ दिया। परन्तु धोखेबाज महमूद जो राजा रणवीर सिंह पर विजय पाने का बीड़ा उठाकर दिल्ली से आया था, षडयंत्रों में लग गया। राजा रणवीर सिंह का एक दरबारी पं. गोकुलराम पाण्डेय था। उसे रामपुर का राजा नियुक्त करने का लालच देकर महमूद ने विश्वास में ले लिया और रामपुर के किले का भेद लेता रहा। पं. गोकुल राम ने लालच के वशीभूत होकर विधर्मी को बता दिया कि रक्षांबधन के दिन सभी राजपूत निःशस्त्र होकर शिव मन्दिर में शस्त्र पूजा करेंगें।यह शिव मन्दिर किले के दक्षिण द्वार के समीप है , यह सुनकर महमूद का चेहरा खिल उठा और दिल्ली से भारी सेना को मंगाकर जमावड़ा प्रारम्भ कर दिया रक्षाबन्धन का दिन आ गया। किले में उपस्थित सभी सैनिक, सेनाायक अपने-ंअपने शस्त्रों को उतार कर पूजा स्थान पर शिव मन्दिर ले जा रहे थे। गोकुल राम पाण्डेय यह सब सूचना विधर्मी तक पहुंचाता रहा। श्वेत ध्वज सामने रखकर दक्षिण द्वार पर पठानों की गुलामवंशी सेना एकत्र हो गयी। पूजा में तल्लीन राज पुत्रों को पाकर गोकुलराम पाण्डेय ने द्वार खोल दिया।
      शिव उपासना में रत सभी उपस्थितों को घेरे में ले लिया गया। समस्त राजपूत भौचक्के रह गए ओर मन्दिर से तुलसी का पत्ता लिया ओर मुंह में दबा कर शाका बोल दिया,घमासान युद्ध छिड़ गया परन्तु ऐसी गद्दारी के कारण राजा रणवीर सिंह ने निशस्त्र लड़ते हुए अदम्य साहस ओर शोर्य का परिचय दिया ओर महमूद के सैनिकों से भिड़ गए अद्भुत दृश्य था रणवीर सिंह चारो ओर से विधर्मी सैनिकों से घिरे युद्ध कर रहे थे विधर्मी की खड़ग छीन ली ओर आक्रांताओं के शीश कट कट गिरने लगे , उस समय रामपुर के किले में केवल तीन हजार राजपूत ही उपस्थित थे ओर वे भी निहत्थे रह गए थे सभी राजपूत बड़ी वीरता से लडे किन्तु संख्या में कम होने के कारण बिखर गए, रणवीर सिंह कठहरिया रोहिला की पीठ पर विधर्मी सेना ने तलवार से वार करके काट डाला ओर अंतिम बूंद रक्त की रहने तक रणवीर धराशाई नहीं हुए यह देख कर नसीरुद्दीन चकित रह गया देखते ही देखते कठेहर नरेश वीरगति को प्राप्त हुए। नासिरूद्दीन ने पं. गोकुल राम से कहा कि जिसका नमक खाया अब तुम उसी के नहीं हुए तो तुम्हारा भी संहार अनिवार्य है। नमक हरामी को जीने का हक नहीं है। गोकुल का धड़ भी सिर से अलग पड़ा था। सभी स्त्री बच्चों को लेकर रणवीर सिंह का भाई सूरत सिंह उर्फ सुजान सिंह किले से पलायन कर गया । महारानी तारादेवी जो विजय पुर सीकरी के राजा की पुत्री थी राजा रणवीर सिंह के साथ सती हो गई। 
रामपुर में किले के खण्डरात, सती तारादेवी का मन्दिर तथा उनका राजमहल अभी तक एक ध्वस्त टीले के रूप में मौजूद है, जो क्षात्र धर्म का परिचायक व रामपुर में रोहिला क्षत्रियों की कठ-शाखा के शासन काल की याद ताजा करता है जिन्होंने अपना सर्वस्व बलिदान कर क्षात्र धर्म की रक्षा की। गुलाम वंश, सल्तनत काल में विधर्मी की पराधीनता कभी स्वीकार नहीं की। अन्तिम सांस तक दिल्ली सल्तनत से युद्ध किया और कितनी ही बार धूल चटाई तथा रोहिलखण्ड को स्वतंत्र राज्य बनाये रखा। निरन्तर संघर्ष करते रहे राजा रणवीर सिंह कठहरिया का बलिदान व्यर्थ नहीं , सदैव तुगलक, मंगोल , मुगलों आदि से विद्रोह किया और स्वतंत्र रहने की भावना को सजीव रखा। राणा रणवीर सिंह के वंशधर आज भी रोहिला-ंक्षत्रियों में पाए जाते हे,जय राजपुताना कठेहर रोहिलखंड
उनकी पावन स्मृति को जीवित रखने व रोहिलखंड कठेहर राजपूताना की वीर गाथा को सजीव बनाए रखने के लिए भारत का समस्त रोहिला क्षत्रिय राजपूत समाज रक्षा बन्धन को शोर्य दिवस तथा पच्चीस अक्टूबर को प्रतिवर्ष स्वाभिमान दिवस के रूप में मनाता हे ओर शस्त्र पूजा करता है । उत्तर भारत के महानगर बड़ौत में राजा रणवीर सिंह रोहिला मार्ग व ऐतिहासिक नगर सहारनपुर में आज महाराजा रण वीर सिंह रोहिला चौक स्थित है। (संदर्भ__इतिहास रोहिला राजपूत द्वारा डॉक्टर के सी सेन,
ठाकुर अजीत सिंह परिहार बालाघाट मध्य प्रदेश, मध्यकालीन भारत बीएम रस्तोगी ,रोहिला क्षत्रियों का क्रमबद्ध इतिहास द्वारा श्री दर्शन लाल रोहिला, रोहिला क्षत्रिय वंश भास्कर द्वारा आर आर राजपूत, रोहिला क्षत्रिय जाति निर्णय द्वारा राय भीम राज राजभाट बड़वा जी का बाड़ा तूंगा राजस्थान, काठी कठेरिया क्षत्रिय व रोहिला राजपूत द्वारा महेश सिंह कठाय त नेपाल , मध्य कालीन भारत द्वारा ठाकुर अजित सिंह परिहार बाला घाट मध्य प्रदेश  
संकलन व लेखन 
समय सिंह पुंडीर
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क्षत्रिय/राजपूत वाटिका
अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा
राष्ट्रीय प्रवक्ता 
*क्षत्रिय अस्तित्व न्याय मोर्चा भारत*
नोट
*सनातन रक्षक,विधर्मी संहारक और लगभग तीस वर्ष तक आक्रांताओं द्वारा किए जा रहे इस्लामी करण को रोकने वाले राजपूत सम्राट रोहिलखंड नरेश महाराजा रणवीर सिंह रोहिला काठी क्षत्रिय की जयंती सभी क्षत्रिय भाई स्वाधीनता और स्वाभिमान दिवस के रूप में मनाते हैं*