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Monday, 29 December 2025

RAJPUT ANA ROHILKHANND,ROHILA RAJPUT

*रोहिलखंड*
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उत्तर भारत का ऐतिहासिक क्षेत्र
रोहिलखंड
स्थिति उत्तर प्रदेश
राज्य स्थापित: 447 विक्रमी संवत पूर्व
भाषा हिन्दी , संस्कृत
राजवंश पांचाल ( महाभारत काल)

रोहिला राजपूत
ऐतिहासिक राजधानी रेवेन्यू , लैपटॉप
पृथक सूबे क्रीड़ा , क्रीड़ा , खूतर , शाहजहाँपुर
रोहिलखंड या रुहेलखंड उत्तर प्रदेश का उत्तर-पश्चिम में एक क्षेत्र है। [1] [2] .

रोहिलखंड गंगा उपत्यका के ऊपरी 50 हजार वर्ग किमी क्षेत्र का विवरण है। इसके दक्षिण पश्चिम ओर गंगा है, पश्चिमी ओर उत्तराखंड और नेपाल उत्तर में हैं। पूर्वी ओर अवध है। इसका नाम यहां की एक जनजाति रोहिल्ला के नाम पर पोस्ट किया गया है। महाभारत में इसे रोह शब्द अवरोही धातु से लिया गया है जिसका अर्थ है चढ़ना अवरोही, रोही सावल ला प्रत्या समतुल्य रोहिला अर्थात देखने वाला, पश्चिमी उत्तरीय सीमा प्रांत जैसा भी पर्वतीय रेखांकन रोह के नाम से जाना जाता है।

तीब्र प्रवाह *रोह*, की कहानी कहने वाला भी रोहिला कहलाया।

रोहिला शब्द भारत के गौरवशाली इतिहास का एक विशेष दर्पण है! यह शब्द है जो वीर क्षत्रिय राजवंशों और इतिहास की वीर गाथाओं का परिचय कराता है।

रोहिल्ला 500 ईसा पूर्व पुराना शब्द है (प्राचीन भारत-पृष्ठ-159, बी एम रस्तोगी)

रोहिला एक संघ था, भारत

के उन वीरो का, भारत की पश्चिमी उत्तर सीमा प्रहरियों का किशो स्वयम केट के टुकड़े तक ओर अंतिम शवांस तक ले जाना धूलि के कण के बराबर भी अक्रांताओं को भारत भूमि और कदम रखना नहीं दिया।

रोहिले राजपूत प्राचीनकाल से ही लोकतंत्र के संवाहक रहे हैं

वंस वाद्य जनरेशन वाद्य से दूर है

रोहिल खंड राज्य लोकतन्त्रात्मक गणराज्य था
राजवंशानुक्रम का शासन नहीं था*

वाचाल(वाचेल)चौहान राठौड़ गहलोत (,गहलोत) आदि प्रसिद्ध डेयरडेविल राज वन्सो का शासन था ये सभी कटेहर इया राजपूत कहलाते थे
सुन्दर बालिष्ठ

धारकों(रहेल्ला) को अपने योग्य शासक चुनाव (हाथ उठाना कर) से नियुक्त किया जाता था

इसी के लिए इनमे राजपूतो के सभी वंश शाखाएं उपलब्ध हैं

रणवीर सिंह सूर्य वंस निकुंभ शाखा के राजवंश गोत्र में उत्पन्न हुए थे

उनका प्रवर गोत्र काथी था

इस कटहर रोहिल खंड के राजा के साथ 84 लोहे के कवच धारी अजेय रोहिले सरदार/संतामंती थे

उनके सामने दुस्मन नहीं टिक दिखे थे

इनमे निम्न गोत्रो के योद्धा थे

1- लक्ष्मीर 2- राठौड़/महेच राणा 3- चौहान/वत्स/घोड़ा 4-वाचेल/वाचाल/कूपट/घूमरा

5- मूसले/नार्नसेले/मौसल/मोसले/मुसले

6- कटेहरिया/ काठी/, कठायत/ कठोड़े 7- रहक वाल/रायकवार/सिकरवा

12 पड़िये/ पड़तिया/बारह रोहिले लोहे के कवच धारी हर गोत्रो से थे

सल्तनत काल में दिल्ली के सुल्तान पूर्णत्या कभी भी नहीं मिले

(वासुदेवशरण अग्रवाल)

विधानसभा कार

हमारा ही परिवार जो कटेहर रोहिल खंड में रह गए स्थापित नहीं हुए वे

आज भी राजपूतो की मुख्य धारा में ही कठेरिया राजपूत कहलाते हैं और उनका सम्बन्ध इन्ही राजपूतो से होता है

जी गंगा पार कर गैलरी हो पीछे आगये रोहिला कहलाये

जो रामगंगा पार कर कुमाऊं चला गया

काठी कठेत कठायत काठ आयत कहलाये और चांद वाशी राजा के ये रहे

महाराजाधिराज सिंह रोहिल्ला का जन्म ऐसे समय में हुआ था जब राजपूत शक्ति किशन होलेथी और मुस्लिम अक्रांता अपनी सल्तनत की स्थापना करने के लिए शेष राजपूतों का दमन करने में लगे थे, गौरी के आक्रमण से पृथ्वी राज चौहान का साम्राज्य नष्ट कर दिया गया था, वनों का शासन राजस्थान में मेवाड़ या मध्य प्रदेश (उत्तर प्रदेश) में स्थापित हो गया था, रोहिलखंड के कथेहरिया राजपूतो ने दिल्ली के सुल्तान बनने वाले अक्रांता के नाक में दम कर 1206 में सभी राजपूत शक्तियों को अधिकार दिया था। एक साथ कर सामंत व्रतपाल रोहिल्ला ने ऐबक इल्तुतमिश आदि को रोहिलखंड में विश्राम से छोड़ा त्रिलोक सिंह आदि रोहिलखंड पर अधिकार वाले मुस्लिम शासकों को जन्म दिया था,इस विपत्ति काल में रोहिलखंड की पवित्र भूमि पर कार्तिक मास के कृष्ण की प्रथम तिथि यात्रा 25 अक्टूबर 1204 इसवी कोप किले में राजा त्रिलोक सिंह के यहां एक वीर पुत्र का जन्म हुआ जिसका नाम करण के हरिद्वार पंडित गोकुल चंद पांडे के पिता नेरावण सिंह के नाम पर रखा गया था। , जब रणवीर सिंह 21 साल के हुए तो विजयपुर सीकरी के राजा की पुत्री तारा देवी से रणवीर सिंह का विवाह उसी साल हो गया, जब रणवीर सिंह का राजतिलक हुआ, उन से दिल्ली के सुल्तान भय खाने लगे किसी ने रोहिलखंड पर आक्रमण करने का साहस नहीं किया था

कैथरीन रोहिल्लाखंड राजपूत!

ये कटहरिया काठी निकुंभ वन के रोहिलखंड के राजा थे, जो 1253 में अपने शासन काल में दिल्ली सल्तनत के इल्तुतमिश के पुत्र थे। राजपूतो ने घेर लिया और भयंकर युद्ध रोहिले बहादुर थे, लोहे के हथियारधारी थे नासिरुद्दीन चंगेज की सेना में शामिल हो गए बचे हुए मुसलमान भाग गए

नासिरुद्दीन ने प्राणदान मैग्जीन को चुना

सभी धन रामायण सिंह के मंच पर रख गदगदया

राजाराम सिंह कठोड़ा ने क्षत्रिय धर्म रक्षार्थ शरणागत को क्षमा दान दिया

फिर भी वह दिल्ली दरबार से महिमा लेकर आया था क्या मुँह में यह सोच कर के चित्र के दक्षिणी भाग में छिप गया और दूसरी ओर फिर से खड़ा हो गया कि राजा को कैसे पराजित किया जाए

साभार भी मुस्लिम सेना दिल्ली से सह-तालिका रोहला राजपूत बहादुर थे कि उनके सामने नहीं टिकते थे वे छल प्रपंच धोखा देने की सोची

किले के एक दरबारी हरिद्वार निवासी पांडे गोकुल राम नाइक गोकुल चंद को लालच दिया और रक्षा बंधन के दिन शस्त्र पूजन के समय निशस्त्र रोहिले राजपूतो पर आक्रमण करने का परामर्श दिया

चंगेज ने दिल्ली से कुमुद ओर सेना की कमान संभाली ओर जंगलों में छुपे दी पांडे ने सफेद झंडे के साथ चंगेज को राजा से किले का द्वार मिलवाया जबकि राजपूत पांडे का इंतजार कर रहे थे कि कब आए और पूजा शुरू हो गई

पांडे ने तो धोखा कर दिया था राजा ने सफेद झंडा देख सन्धि प्रस्ताब समझ समझ आने का संकेत दिया था

अप्रत्याशित रूप से हुआ कि पांडा किले के चारो दरवाजे खोल दिए गए थे

निहत्थे राजपूतो पर तिब्रता से मुस्लिम सेना चारो तरफ से टूट गई

राजपूतो को शाका कर मरमिटने का आदेश दिया गया और राजकुमार सिंह ने दे दिया और राजकुमारी को सबक सिखाने के लिए मजबूर कर दिया

थे निहत्थे लड़ाके बहुत सारे पनरान्टु मारे गए

राजा रणवीर सिंह का बलिदान हुआ

रानी तारावती सभी क्षत्रियों के साथ डूबकर जौहर कर गयीं

किले को मुसलमान बाकी बचे थे

रणवीर सिंह के भाई सूरत सिंह अपने 338 साथियों के साथ निकल गए और 1254 में हरियाणा में चरखी दादरी यात्रा पर गए

हरिद्वार के पांडो नेरानी सिंह की वंशावली में लिखी कहानी में लिखा है कि उनका औलाद बंजारा हो गया था

तब भी इतिहास लेखन में कितना तुष्टिकरण घटित हुआ था

जबकि रोहिले राजपूतो के राज भट्ट राय भीम राज निवासी बड़वा जी का बड़ा तुंगा जिला जयपुर की पोथी में मिले कि सूरत सिंह चरखी दादरी आ बसा थे

राजा रणवीर सिंह का यह बलिदान याद आबाद हिंदुस्तान

एक शौर्य दिवस

रक्षाबंधन एक गौरव गाथा

आज से 763 वर्ष पूर्व दिल्ली के सुल्तानों को धूल चटाने वाले महाराजाधिराज सिंह रोहिला ने एक गौरवशाली पौराणिक कथाओं के किले में लिखा था, यह शौर्यबात निहत्थे रोहिले राज पूतो पर टूट पड़े थे नासिरुद्दीन के सैनिक शास्त्र विकसन रोहिलो ने महान शौर्य दिवस पर राजा महाराजा सिंह को याद किया

यह तो शास्त्रीय एतिहासिक सत्य/सत्य है

रोहिला क्षत्रिय वास्तव में

विशुद्ध क्षत्रिय राजवंस है

एक चीते के समान ही उसकी अलग पहचान होती है

इतिहास यह बात का प्रमाण है

रोहिले क्षत्रियो ने आज तक

कभी भी राष्ट्र व अपने क्षत्रिय कॉम पर जी जी आचमन न करें

800 सूर्यास्त तक आक्रांताओ को। रोके रखने में अपना सर्वस्व स्थापित किया गया है

विधर्मी का संघटन है

शाका और *मालकिन* है

परन्तु अपना धर्म न परिवर्तन न पुनर्स्थापन।

रोहिला राजवंश के मूल पुरुष चन्द्र वंशी सम्राट ययाति के तीसरे पुत्र द्रह्यु हैं

इसी का अपभ्रंश द्रोह रोहिल्ला हुआ*

रोहिल खंड राज्य लोकतन्त्रात्मक गणराज्य था

राजवंशानुक्रम का शासन नहीं था*

वाचाल(वाचेल)चौहान राठौड़ गहलोत (,गहलोत) आदि प्रसिद्ध डेयरडेविल राज वन्सो का शासन था ये सभी कटेहर इया राजपूत कहलाते थे
सुन्दर बालिष्ठ

धारकों(रहेल्ला) को अपने योग्य शासक चुनाव (हाथ उठाना कर) से नियुक्त किया जाता था

🤺🤺🤺

अयोध्या में इख (गन्ना) ओबने वाले

इश्क़वाकू/सूर्य का उदय हुआ

और प्रयाग के पास झूंसी में चन्द्र वंस

का उदय हुआ

मित्र सम्राट ययाति इसी वंस में हुए

इनके तीसरे पुत्र द्रह्यु के नाम द्रह्यु वंश/गंधार वंश चले

द्रह्यु से रोहिलाओ का मूल है

भारत के चन्द्रवंश के शासक सम्राट

ययाति के पुत्र द्रुह्यु का प्रदेश ही रूह/रोह प्रदेश के नाम से जाना गया

रो का अर्थ है चढ़ना (पर्वतीय)

यह भी एक पर्वतीय प्रदेश है

यह भारत की पश्चिमी उत्तर सीमा का प्रदेश था

इस रोह प्रदेश की पसंद अब गूगल मैप पर देखें

इसके निवासियों ने अलेक्जेंडर को भारत में प्रवेश करने से रोक दिया, 400 साल बाद अक्रांताओं ने रोके रखा जब मैदानों से मदद नहीं मिली तो मैदानों की और स्मारक कर दिया

अथवा सचिवालय

क्षुद्रक गणराज्य

मालव गणराज्य

तक्षक गणराज्य
कठगणराज्य 
अश्वक गणराज्य आदि के शासक ब्रह्मा से टकराते हुए मैदानों में आये

गुजरात में कड़ियावाद

पंचाल में कटेहर राज्य की स्थापना

पंजाब से अज़ान तक यौधे राज्य की स्थापना की

यह क्षत्रिय यहाँ पर

कठेहरिया/, रोहिले रोहिले कहलाये

(राजपूत/क्षत्रिय वाटिका)

(रोहिले क्षत्रियो का क्रमबद्ध इतिहास)

रोही +ला(प्रत्य)----*रोहिला*

रोहिल्ला* इलियन या अवलोकन करने वाला यानि--?
रूह (उर्बानी/फ़ारसी/अरबी) + ला --

आत्मा+ ला----?

ला--का अर्थ वाला

के बीच क्या अंतर है

रोहिला* & रुहेला*

यू

राजा रणवीर सिंह के समय रोहिल खंड की राजधानी में था

1702 से हिंदू रोहिले राजपूतो की राजधानी में हुई

महान राजा इंद्र सेन


/इंद्र गिरी जी महाराज थे वे ही 1761 विक्रमी या 1702 इसवी में रोहिल खंड। पश्चिमी सीमा पर रोहिला किला का निर्माण कार्य था🙏🏽

इस कटहर रोहिल खंड के राजा के साथ 84 लोहे के कवच धारी अजेय रोहिले सरदार/संतामंती थे

उनके सामने मुल्ला नहीं टिक बैठे थे

इनमे निम्न गोत्रो के योद्धा थे

1- लक्ष्मीर 2- राठौड़/महेच राणा 3- चौहान/वत्स/घोड़ा 4-वाचेल/वाचाल/कूपट/घूमरा

5- मूसले/नार्नसेले/मौसल/मोसले/मुसले

6- कतेहरिया

/ काठी/, काठिया/ काठोड़े


https://www.perplexity.ai/search/kaatthii-ktthehr-kaatthiyaavaa-uhWI8GS0ShyXYYP..UkUOg#0


काठी / कठेहर / काठियावाड़ क्षत्रियों का इतिहास संक्षेप में तीन मुख्य हिस्सों में बँटकर समझा जा सकता है।���उत्पत्ति और प्राचीन पृष्ठभूमिकुछ स्रोत काठी या कठ क्षत्रियों को प्राचीन सूर्यवंशी क्षत्रिय परंपरा से जोड़ते हैं, जिन्हें उत्तर-पश्चिम भारत (रावी नदी के काठ) के “कठ‑गण” या कठ जाति से आया माना जाता है।�एक परंपरा के अनुसार ये कठ लोग सिकन्दर के समय रावी क्षेत्र में शक्तिशाली गणराज्य रूप में थे और बाद में अलवर, जैसलमेर होते हुए सौराष्ट्र (काठियावाड़) और फिर मध्यदेश‑पाँचाल की ओर फैले।�काठी और काठियावाड़गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र को काठियावाड़ नाम वहाँ बसे काठी क्षत्रिय/राजपूत समुदाय के कारण पड़ा, जो स्थानीय शासक वर्ग के रूप में प्रतिष्ठित हुए।��कुछ विद्वानों और स्रोतों में काठी जाति को आभीर समूह की शाखा भी माना गया है, जहाँ “काठीक” या “काठीकंरपति” नाम से उनके युग का उल्लेख मिलता है; यही काठी बसाहट काठियावाड़ नाम की आधार मानी जाती है।�कठेहर (रोहिलखण्ड) क्षत्रियमध्यदेश के उत्तरी पाँचाल क्षेत्र में कठ क्षत्रियों ने “कठेहर” या “कठेहर रोहिलखण्ड” राज्य बसाया, जिसकी राजधानी रामपुर और आसपास के क्षेत्र (आज का रोहिलखण्ड, उत्तर प्रदेश का भाग) माने जाते हैं।�परंपरागत वर्णन के अनुसार यहाँ कठिया/कठहर राजपूतों ने कई पीढ़ियों तक शासन किया और दिल्ली सल्तनत के विरुद्ध युद्धों में अपनी क्षत्रिय स्वायत्तता बनाए रखने की कोशिश की, जिनमें राजा रणवीर सिंह कठहरिया रोहिला जैसे योद्धाओं का उल्लेख मिलता है।�काठी राजपूत परंपराकाठी राजपूत या काठी क्षत्रियों के बारे में आधुनिक सामुदायिक साहित्य उन्हें वीर, अश्वारोही और युद्धकला‑कुशल समुदाय के रूप में वर्णित करता है, जो मुख्यतः काठियावाड़ और आसपास के इलाकों में जागीरदार/दरबार वर्ग रहे।���अनेक कथाएँ मुगल काल और उसके बाद के समय में काठी क्षत्रियों के बलिदान, विशेषकर स्थानीय दुर्गों और मंदिरों की रक्षा के प्रसंगों का उल्लेख करती हैं, जो आज भी समुदाय की गौरव‑कथाओं के रूप में सुनाए जाते हैं।��इतिहास‑अध्ययन के लिए सावधानियाँउपलब्ध साहित्य का बड़ा हिस्सा लोक‑परंपरा, सामुदायिक ब्लॉग, सामाजिक मीडिया और मौखिक इतिहास पर आधारित है, इसलिए अकादमिक इतिहास‑लेखन से इसकी भाषा और निष्कर्ष भिन्न हो सकते हैं।����यदि विस्तृत शोध करना हो तो प्राचीन शिलालेखों, प्रतिहार/गुर्जर इतिहास और सौराष्ट्र‑रोहिलखण्ड पर लिखी मानक इतिहास‑पुस्तकों को भी मिलाकर देखना उपयोगी रहेगा, ताकि समुदाय‑कथा और अकादमिक स्रोतों का संतुलित चित्र बन सके।��


"*काल भी अगर छोड दे लेकिन काठी नहीं छोडता”* 
*(Time ( Death ) Forgets But Not Kathi )*

क्या हैं - “काठी और काठीयावाड, कठेहर खंड ” ?

काठी दरबार भव्यअतित कि श्रृंखला मे एक प्रसिद्ध नाम , यह एक क्षत्रिय संघ जो वीरता का वैभव , शौर्य का प्रतीक और अपने कठोर स्वाभीमानी गुणो से प्रसिद्ध है। 

*इसलिए इनके बारे प्रसिद्ध कहावत हैं - "काल भी अगर छोड दे लेकिन काठी नहि छोडता”*
सिकंदर के आक्रमण के पश्चात भारत की पश्चिमी उत्तरीय सीमा प्रांत के प्रहरी इन क्षत्रिय वीरों ने मैदानों का रुख किया,एक टुकड़ी सौराष्ट्र आई दूसरी उत्तरी पांचाल में तथा एक टुकड़ी काठी क्षत्रियों की नेपाल गई।
उत्तरी पांचाल को कठेहर खंड /रोहिलखंड के नाम से विकसित कर स्थिर रूप से राज्य स्थापित किया।
नेपाल में काठी क्षत्रियों ने कठेत कटायतkathayat साम्राज्य स्थापित किया।
 एक टुकड़ी ने थोडी कुछ शताब्दियो से उन्होने स्थिर रुप से अपना निवासस्थान सौराष्ट्र को बना लिया और इतना हि नहीं युगों से पुराण प्रसिद्ध सौराष्ट्र नाम इन्हि के कारण पलटकर ' काठीयावाड ' नाम से मशहुर हुआ एसी इन्होने इस विस्तार कि संस्कृति मे अमिट छाप छोडी हैं। 

कठ गणराज्य वाहिक प्रदेश ( हाल के पंजाब ) मे प्रसिद्ध था।इनकी राजधानी ( संगल ) सांकल थी ,(आज का स्याल कोट)एक उल्लेख मिलता है कि इन पंजाब वासी कठो के नाम से आज के अफगानिस्तान के गजनी प्रांत मे ' काटवाज ' क्षेत्र हे । कठ लोगों के शारीरिक सौदर्य और अलौकिक शौर्य की ग्रीक इतिहास लेखकों ने भूरि - भूरि प्रशंसा की है , ग्रीक लेखकों के अनुसार कठों के यहाँ यह प्रथा प्रचलित थी कि वे केवल स्वस्थ एवं बलिष्ठ संतान को ही जीवित रहने देते थे । 

सीक्रीटोस लिखता है कि वे सुंदरतम एवं बलिष्ठतम व्यक्ति को ही अपना शासक चुनते थे , ग्रिक इतिहासकारो ने कठो को कठोइ या काठीयन जैसे नामो से निर्देषीत किया हे , पाणिनी के ' अष्टाध्यायी ' मे कठो का उल्लेख हे , पंतजली के महाभाष्य के मत से कठ वैशपायन के शिष्य थे । इनकि प्रवर्तित वेदसंहिता कि शाखा ' काठक ' नाम से प्रसिद्ध थी । 

काठक कापिष्ठल संहिता जैतारायण , प्रत्धन ( दिवोदासी ) भीमसेनी इन राजाओ का नाम मीलते हे जीन्होने राजसूय यज्ञ किया था । इन्होने कई बार पोरस को हराया था।
सिकंदर को घुटने टेकने पर मजबूर किया,कठगणराज्य की राजकुमारी कार्विका उर्फ कर्णिका ने सिकंदर को अपनी नारी सेना के द्वारा परास्त किया घायल किया। वह तो आंतरिक राजाओं की सहायता से बच निकला था।
Painting : 1880's. ' A kathiavad Sentry’
By Artist - Horace van Ruith . 

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राजपूतो की यह रोहिल्ला खाफ सदैव संघर्ष करती रही और दिल्ली के सुल्तान ने कभी भी 16 शताब्दी तक पूर्णताया रोहिले राजपूतो को जीत नहीं मिली

हरिसिंह खड्ग सिंह राव नरसिंह आदि जगत सिंह बर्लदेव बांसदेव वर्षा ऋतु तक रोहिले भारी पड़े और मुल्ला देखते रहे

अकबर ने अफ़गानों के हाथों धोखे से रोहिला राजा को मरवाया ओर अलीमुहम्मद आदि ने रहमत खा रुहेला ने रोहिला राजपूतो से रोहिलखंड को छीन लिया और रुहेलखंड का दर्शन लागे

फिर 18वीं सदी में रोहिले को एकजुट किया गया और 1702 में रोहिले को स्वतंत्र रोहिल्लाखंड राज्य घोषित किया गया 1720 तक शासन किया गया


संदर्भ--

भारत भूमि और उसका वासी पृष्ठ-230 पंडित जयचंद्र विद्यालंकार

2-दून ज्योति-साप्ताहिक मेमोरियल 18 फरवरी 1974

प्रमुख नागेश ओक और डॉक्टर ओमवीर शर्मा, प्रमुख ऑफ क्रॉनिकेशन विभाग

3-क्षत्रिय वर्तमान पृष्ठ 97 व 263 ठाकुर अजीत सिंह परिहार बालाघाट

4- प्राचीन भारत पृष्ठ -118,159,162 बीएम रस्तोगी इतिहास कार

5 राजतरंगनी पृष्ठ 31-39 कल्हण क्रत् दण्डक निज़ामलिन

6-रोहिला क्षत्रिय वन्स भास्कर, आर आर राजपूत मूरसेन क्रिएटिव

7- इतिहास रोहिल्ला राजपूत

डॉक्टर के सी सेन

8 - भारत का इतिहास पृष्ठ 138 डॉक्टर मर्सी प्रकाश

9-भारतीय इतिहास मीमांसा पृष्ठ 44 जयचंद विद्यालंकार

10- भारतीय इतिहास की रूप रेखा द्वितीय भाग पृष्ठ 699 बीएम रस्तोगी

11-सीमा संरक्षण पृष्ठ 21-22 हरिकृष्ण प्रेमी

12 टोड राजस्थान पृष्ठ 457 परिचय 43 विवरण केशव कुमार ठाकुर

13- प्राचीन भारत का इतिहास राजपूत वन पृष्ठ 104 व 105कैलाश प्रकाशन लखनऊ 1970 व पृष्ठ 147

14 रोहिल्ला क्षत्रियो का क्रमबद्ध इतिहास लेखक दर्शन लाल रोहिल्ला

15 राजपूत,/क्षत्रिय वाटिका

राजनीतिन सिंह रावत अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा

16 संबंध बिटवीन रोहिला और कठरिया राजपूत निकुंभ और श्रीनेत राजवंश

महेश सिंह कायत नेपाल


*वर्तमान_क्षत्रिय कठेहरिया_राजपूत_शूरवीरो_क़ी_शौर्यगाथाएँ*

*कठ_काठी_कठोड़े_कुलठान_कठपाल_वर्तमान*
*कठेहरिया_ठाकुर ही काठी क्षत्रिय है*
*राजपूताना रोहिलखंड,*
*क्षत्रिय_राजपूताना_रोहिलखंड* 
योद्धा विलाप करते हैं, साम्राज्य का पतन होता है: सिकंदर महान की विरासत इतिहास के सबसे उल्लेखनीय साम्राज्यों में से एक के कड़वे-मीठे अंत को दर्शाती है। 323 ईसा पूर्व में सिकंदर की मृत्यु के बाद, उसने जो विशाल साम्राज्य बनाया था, जो ग्रीस से लेकर भारत तक फैला हुआ था, वह जल्दी ही बिखर गया। 32 वर्ष की कम उम्र में उसके अचानक निधन के बाद कोई स्पष्ट उत्तराधिकारी नहीं बचा, और उसके सेनापति, जिन्हें डायडोची के नाम से जाना जाता था, ने उसके क्षेत्रों पर नियंत्रण के लिए भयंकर युद्ध किया। एक बार एकीकृत साम्राज्य युद्धरत राज्यों में विभाजित हो गया, जिसने बेजोड़ सैन्य विजय के युग का अंत कर दिया। फिर भी, सिकंदर की विरासत युद्ध के मैदान से कहीं आगे तक चली गई। उसके अभियानों ने ग्रीक संस्कृति, भाषा और विचारों को पूरे ज्ञात विश्व में फैलाया, उन्हें स्थानीय परंपराओं के साथ मिलाया, जिसे हेलेनिस्टिक युग के रूप में जाना जाता है। साम्राज्य के पतन के बावजूद, कला, विज्ञान, दर्शन और राजनीतिक विचारों पर सिकंदर की दृष्टि और प्रभाव ने आने वाली सदियों तक सभ्यताओं को आकार देना जारी रखा, जिससे इतिहास के सबसे महान और सबसे प्रभावशाली व्यक्तियों में से एक के रूप में उसका स्थान सुनिश्चित हुआ।
काठी योद्धाओं ने ही उत्तरी पांचाल मध्य देश पर अधिकार किया और एक स्वतंत्र राज्य कठेहर रोहिलखंड की स्थापना की,राजा राम साह कठहरिया ने रामपुर को राजधानी बनाया,यहां उनकी ग्यारह पीढ़ियों तक शासन रहा। इसी वंश में जन्मे थे क्षत्रिय सम्राट महाराजा रणवीर सिंह रोहिला जिसने दिल्ली सुलतानों को अनेकों बार धूल चटाई और कठेहर रोहिलखंड का लोहा मनवाया।
रोहिला, राजपूत / कठेहरिया राजपूतों का ही एक उपवर्ग है, जो मध्यकालीन भारत में रोहिलखंड क्षेत्र में शासक और संस्थापक थे। कुछ स्रोतों के अनुसार, रोहिला एक राजपूत वंश है, जो सौर जाति के उच्च भूमिवासी राजा थे, जिन्होंने 8वीं से 18वीं शताब्दी तक उत्तरी पांचाल पर शासन किया. 
विस्तार से:
रोहिला राजपूत: काठी राजपूत कठ गणराज्य से विस्थापित कठ शाखा के
रोहिला, राजपूतों का एक परिवार या गोत्र है, जो कठेहर-रोहिलखंड के शासक और संस्थापक थे. 
रोहिला का अर्थ:
"रोहिला" शब्द का अर्थ "युद्ध में शत्रु सेना को छिन्न-भिन्न करने वाला" होता है, जो युद्ध कौशल में उनकी वीरता को दर्शाता है. 
शासक और संस्थापक:
रोहिला राजपूतों ने मध्यकालीन भारत में कठेहर रोहिलखंड क्षेत्र पर शासन किया और इसे स्थापित किया. 
विभिन्न क्षेत्रों में:
रोहिला राजपूतों का शासन पंजाब, कश्मीर, गुजरात, राजस्थान और मध्य प्रदेश , मध्य देश(उतरी पांचाल अहिक्षेत्र )जैसे क्षेत्रों में भी रहा है. 
18 कुल:
रोहिला राजपूतों में राजपूत वंश के 18 कुल शामिल हैं, जैसे चौहान, राठौड़, गहलोत, सिसोदिया, निकुंभ और पुंडीर. 
रोहिला उपाधि:
कुछ राजपूतों को बहादुरी के लिए "रोहिला" उपाधि से भी नवाजा गया था, जैसे कि महाराणा प्रताप के समय में. 
स्वतंत्रता संग्राम:
रोहिला राजपूतों ने 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और ब्रिटिश शासन का विरोध किया. 
अन्य नाम:
कुछ स्रोतों में रोहिला को "कठेहरिया" या "कठेहरिया राजपूत" भी कहा गया है, जो कठेहर क्षेत्र से उनके संबंध को दर्शाता है. 

काठी दरबार भव्यअतित कि श्रुंखला मे एक प्रसिद्ध नाम,यह एक क्षत्रिय संघ जो वीरता का वैभव,शौर्य का प्रतिक और अपने कठोर स्वाभीमानी गुणो से प्रसिद्ध हे।
    इनके बारे मे यह भी कहा जाता हे कि,
"काल भी अगर छोड दे लेकिन काठी नहीं छोडता"
    (Time (Death) Forgets But Not Kathi)
 थोडी कुछ शताब्दियो से उन्होने स्थिर रुप से अपना निवासस्थान सौराष्ट्र को बना लिया,और इतना हि नहि युगो से पुराण प्रसिद्ध सौराष्ट्र नाम इन्हि के कारण पलटकर 'काठीयावाड' नाम से प्रसिद्ध हुआ ऐसी इन्होने इस विस्तार कि संस्कृति मे अमीट छाप छोडी हे।
कठ गणराज्य वाहिक प्रदेश(हाल के पंजाब) मे प्रसिध्ध था इनकि राजधानी (संगल)सांकल थी,
एक उल्लेख मिलता हे कि इन पंजाब वासी कठो के नाम से अफगानिस्तान के गजनी प्रांत मे ‘काटवाज’ क्षेत्र हे।
 कठ लोगों के शारीरिक सौदंर्य और अलौकिक शौर्य की ग्रीक इतिहास लेखकों ने भूरि-भूरि प्रशंसा की है, ग्रीक लेखकों के अनुसार कठों के यहाँ यह प्रथा प्रचलित थी कि वे केवल स्वस्थ एवं बलिष्ठ संतान को ही जीवित रहने देते थे। ओने सीक्रीटोस लिखता है कि वे सुंदरतम एवं बलिष्ठतम व्यक्ति को ही अपना शासक चुनते थे, ग्रिक इतिहासकारो ने कठो को कठोइ या काठीयन जैसे नामो से निर्देषीत किया हे, पाणिनी के ‘अष्टाध्यायी’ मे कठो का उल्लेख हे, पंतजली के महाभाष्य के मत से कठ वैंशपायन के शिष्य थे।इनकि प्रवर्तित वेदसंहिता कि शाखा ‘काठक’ नाम से प्रसिध्ध थी । काठक कापिष्ठल संहिता जैतारायण, प्रत्धर्न(दिवोदासी) ,भीमसेनी इन राजाओ का नाम मिलते हे जीन्होने राजसूय यज्ञ किया था।
   इन्होने कइ बार पोरस को हराया था।इसा पूर्व ३२६ मे सिकंदर की विशाल सेना हिंदकुश कि पर्वतमाला के इस पार अश्वक और अष्टको के राज्य को हराकर झेलम पार कर पोरस से भीडने आ पहोंची,पोरस का पुत्र मारा गया,पोरस ने संधी कर ली जीसमे सैनीक सहायता के बदले ब्यास नदी तक के आगे जीते जाने वाले प्रदेशो पर पोरस सिंकदर के सहायक के तौर पर शासन करेगा, इसके बाद अधृष्ट(अद्रेसाइ) ने बिना लडे आधीनता स्वीकार कर ली, बाद मे कठ के नगर पर सेना आ खडी हुइ, कठ स्वतंत्रता प्रेमी थे, जो अपने साहस के लिए सबसे अधीक विख्यात थे,उन्होने शकट व्युह रचकर सिंकदर कि सेना पर भीतर तक भीषण आक्रमण किया और जिसमें खुद सिंकदर हताहत हो गया, संधी अनुसार पोरस ने २०,००० सैनीको का दल सिंकदर कि सहायता मे भेजा जीसमे हाथी भी थे जीनसे शकट व्युह तुट सकता था, तब कठो कि पराजय मुमकिन हो पाइ, करीबन १७००० कठ मारे गये और कइ बंदि बनाए गये, वहा पर नारीयो ने जौहर भी 

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