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_रोहिला क्षत्रिय: इतिहास, अस्मिता, अस्तित्व और युवाजन चेतना की नई दिशा_
रोहिला क्षत्रियों का इतिहास केवल एक जातीय पहचान की कहानी नहीं, बल्कि संघर्ष, विस्थापन, पुनर्गठन और स्वाभिमान की लंबी यात्रा है। रोहिला क्षत्रिय सदियों तक राजनीतिक, सामाजिक बिखराव और पहचान के संकट से गुजरते रहे फिर भी अपने मूल-क्षत्रिय-राजपूत परंपरा-को पूरी तरह नहीं भूले।
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🛡️ *1. ऐतिहासिक आधार और विस्थापन की पीड़ा*
कठेहर रोहिलखंड में दसवीं सदी से लेकर लगभग चार सौ साल तक क्षत्रियों का शासन रहा, जिनमें लगभग अठारह वंशों व गोत्रों के राजपूतों की शासन व्यवस्था बनी रही। इस क्षेत्र पर दिल्ली सल्तनत ने लगातार आक्रमण करके नरसंहार किया, किंतु स्थानीय क्षत्रियों ने हार नहीं मानी। अत्यधिक दमनकारी आक्रमणों से बड़ी शक्ति का ह्रास होता गया, वस्तुतः कुछ क्षेत्र छूटते भी गए, परंतु समस्त रोहिलखंड के रोहिला राजपूत बार संगठित होकर लोहा लेते रहे, अनेक बार धूल चटाई तथा स्वयं को स्वतंत्र घोषित कर आगे बढ़ते गए। दिल्ली सल्तनत कठेहर रोहिलखंड क्षेत्र पर पूर्णतः कब्जा नहीं कर पाई। लगातार होते रहे इन आक्रमणों के कारण रोहिला राजपूतों की शक्ति क्षीण होती रही और विस्थापन भी होता रहा। अंततः अठारहवीं सदी के आरंभ में कठेहर रोहिलखंड क्षेत्र पर बाहरी आक्रांताओं का आधिपत्य हो गया। उन्होंने क्षत्रियों के संपूर्ण इतिहास को नष्ट कर दिया तथा अपनी शासन व्यवस्था कायम रखने के लिए पूरा इतिहास बदल डाला। उन्होंने सल्तनत काल से लेकर मुगल काल तक क्षत्रियों द्वारा किए गए कार्यां तथा आत्मरक्षार्थ किए गए युद्धों और उनके संपूर्ण बलिदान पर पर्दा डालते हुए अपना इतिहास लिखा। कठेहर रोहिलखंड संस्थापक क्षत्रिय राजाओं के स्थान पर लिखा गया कि रोहिलखंड की स्थापना उनके काल में हुई। इस प्रकार अठारहवीं सदी से पहले का क्षत्रिय इतिहास विलुप्त हो गया। जो इतिहास मुगल काल में लिखा गया, ब्रिटिश काल में भी उसी की पुनरावृत्ति हुई, सच्चाई को यहां भी उल्लिखित नहीं किया गया और रोहिलखंड को पश्तूभाषी अफगानों द्वारा स्थापित लिख दिया गया। मुगल कालीन इतिहासकारों द्वारा बड़ी चतुराई से बदले गए इसी इतिहास को हमें आज तक पढ़ाया जाता रहा है। जबकि मध्यकालीन क्षत्रिय इतिहास में रोहिला क्षत्रियों का उल्लेख कई जगह मिलता है, आठवीं सदी के वर्ष 837ईस्वी में उत्कीर्ण मंडोर के किले में स्थित बाउक के शिलालेख के अनुसार वहां के प्रतिहार शासक हरिश्चंद्र को मिली रोहिलाद्वयंक उपाधि का वर्णन राजपुताने के इतिहास नामक ग्रन्थ में पंडित गौरी शंकर हरिश्चंद ओझा ने पृष्ठ संख्या 147 पर किया है। आल्हाखण्ड काव्य, बुंदेलखंड के हमीरपुर गजेटियर और पृथ्वीराजरासो, इतिहासकार ठाकुर अजीत सिंह परिहार की पुस्तक क्षत्रिय वर्तमान तथा मध्यकालीन भारत आदि में रोहिला राजपूतों की पूर्व से ही उपस्थिति और बहादुरी का वर्णन किया गया है। बीकानेर राजवंश के संग्रहालय की एक क्षत्रियोदय नामक पुस्तक के पृष्ठ संख्या 267 पर रोहिलाध् रूहेला राजवंश को एक उच्च कोटि का राजपूत राजवंश लिखा गया है।
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📜 *2. रोहिला क्षत्रिय पहचान का सरकारी अभिलेखों में ऐतिहासिक प्रमाण*
सन् 1930-31 की जातिगत जनगणना एक महत्वपूर्ण पड़ाव साबित हुई। उस समय संगठनों के अभाव के बावजूद भी लोगों ने स्वयं को “रोहिला क्षत्रिय” के रूप में उल्लिखित कराया।
यह तथ्य स्पष्ट करता है किः
यह पहचान स्वाभाविक और ऐतिहासिक है। इसे रोहिला क्षत्रियों ने स्वयं के प्राचीन समृद्ध इतिहास के कारण ही स्वीकार किया, किसी बाहरी दबाव में नहीं। यहा�स सबसे पहले ऐतिहासिक पहचान रोहिला क्षत्रिय का उल्लेख हुआ। इससे पहले रोहिला को इतिहास में पश्तून भाषी अफगान के नाम से प्रचलित किया जाता रहा था। जबकि कठेहर रोहिलखंड तथा रोहिला शब्द अफगानों से पूर्व ही अस्तित्व में रहा तथा रोहिला क्षत्रिय भी उल्लिखित रहा।
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⚔️ *3. संगठन और पुनर्जागरण की प्रक्रिया*
1930 के दशक से लेकर स्वतंत्रता के बाद तक रोहिला क्षत्रियों ने धीरे-धीरे संगठित होने का प्रयास किया। विभिन्न संगठनों ने इतिहास संकलन, गोत्र सूची निर्माण और बिखरे परिवारों को जोड़ने का कार्य किया। जगाधरी में रोहिला राजपूत सभा नामक संगठन ने शोध परक ऐतिहासिक ग्रन्थ लिखवाने के लिए राजस्थान से वंशावली लिखने वाले भाट को आमंत्रित कर राजपूतों की बहियां निकलवाई और ‘‘इतिहास रोहिला राजपूत‘ नामक पुस्तक का सन1935 में प्रकाशन कराया। जिसका प्रभाव यह हुआ कि समस्त बिखरी हुई रोहिला राजपूत शक्तियां एकजुट होने लगी। इसी समय के आस पास पानीपत में भी डॉक्टर के सी सैन ने भी ’इतिहास रोहिला राजपूत नाम की पुस्तक लिखी। इनके प्रभाव से रोहिला क्षत्रिय और भी सशक्त तथा गौरवान्वित हुए। यह ऐतिहासिक आधार संगठित होने का कारण भी बना।
1980 के दशक में यह प्रयास एक सशक्त आंदोलन के रूप में उभरा, जब रोहिला क्षत्रिय पहचान को सुरक्षित रखने के उद्देश्य से बड़े राष्ट्रीय स्तर के संगठन के गठन पर विचार हुआ। सन 1984-1986 तक अखिल भारतीय रोहिला क्षत्रिय विकास परिषद नामक संगठन का गठन हो गया, औपचारिक रूप से सन 1988 में पूर्ण रूपेण परिषद की स्थापना हुई तथा इस संगठन को अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा से संबद्ध होने का गौरव प्राप्त हुआ (अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजर्षी कुंवर श्री पाल सिंह जी महाराजा सिंगरामऊ रियासत जौनपुर का पत्र दिनांक 10 सितंबर 1989 ईस्वी) और रोहिला क्षत्रियों को समस्त क्षत्रिय राजपूत समाज का एक अभिन्न अंग माना। रोहिला क्षत्रियों को समस्त क्षत्रिय जनसमूह के मध्य विशेष सम्मान दिया गया।
यह संगठन रोहिला क्षत्रिय शिरोमणि डॉक्टर कर्ण वीर सिंह रोहिला जी के अटूट प्रयास के कारण विकसित हो पाया आज पूरे भारत में रोहिला क्षत्रियों का यह सबसे पुराना तथा लोक प्रिय संगठन है।
इस संगठन की स्थापना का उद्वेश्य कोई अल्पकालिक सुविधा, लाभ अथवा क्षणिक पहचान साबित करना नहीं था। इसका दृष्टिकोण दूरगामी व रोहिला क्षत्रियों के लिए पुनरोत्थान तथा भावी पीढ़ी के ऐतिहासिक स्वाभिमान को शाश्वत रखने के लिए था। बिखरे हुए रोहिला क्षत्रियों को विस्थापन के पश्चात से अपने पूर्वजों के इतिहास के अल्प ज्ञान के कारण अनेक कार्यों से सम्बंधित जातियों में विलीन होने से बचाने के लिए था। रोहिला क्षत्रियों को उनकी मूल ऐतिहासिक पहचान दिलाने और एक सुनहरा भविष्य निर्माण करना संगठन का उद्वेश्य और मूलभूत सिद्धांत रहा है। परिषद की इस दूरगामी सोच से प्रभावित होकर रोहिला क्षत्रियों का एक महासम्मेलन सहारनपुर में दिनांक 22 अक्टूबर 1989 को आयोजित हुआ जिसमें देश के कोने कोने से लगभग दस हजार रोहिला क्षत्रिय प्रतिनिधि तथा अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा के पदाधिकारी भी सम्मिलित हुए। इसके द्वारा रोहिला क्षत्रियों को संगठित करने में बड़ा बल मिला।
ऐतिहासिक अभिलेखों का संकलन किया गया, रोहिला क्षत्रियों के क्रमबद्ध इतिहास का पुनर्लेखन और प्रकाशन कराया गया। सामाजिक और सांस्कृतिक गौरव को पुनर्स्थापित किया गया, सार्वजनिक स्थलों पर अनेक माध्यम से पहचान को स्थायित्व मिला। यह काल रोहिला क्षत्रियों के पुनरोत्थान का स्वर्णिम चरण कहा जा सकता है।
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🏹 *4. राजनीतिक हस्तक्षेप और रोहिला राजपूत क्षत्रिय पहचान का पुनः संकट*
समय के साथ सन 1995 में कुछ क्षेत्रों में “रोहिला” नाम को अन्य जातियों के साथ जोड़कर उनमें शामिल करने के प्रयास हुए। जबकि रोहिला क्षत्रियों से उन जातियों का कोई ऐतिहासिक और सामाजिक संबंध ही नहीं था। यह स्थिति कई कारणों से चिंताजनक है क्योंकि ऐसे प्रयास कई बार होते रहे है तथा आज भी ऐसे कार्य किए जा रहे हैं। अल्पकालिक राजनीतिक लाभ के लिए की गई ऐसी पहल रोहिला क्षत्रियों की ऐतिहासिक पहचान को कमजोर कर सकती है तथा अस्तित्व अस्थिर हो सकता है।
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💻 *5. वर्तमान परिदृश्य: डिजिटल युग और युवा शक्ति*
आज का युग सूचना, तकनीक और ’कृत्रिम बुद्धिमत्ता (ए.आई) का है। इस परिवेश में समाज की प्रगति का आधार जातीय वर्गीकरण की सोच नहीं बल्कि शिक्षा, कौशल विकास, आर्थिक आत्मनिर्भरता, सामाजिक जागरूकता एवं आधुनिक तकनीकी है। युवा पीढ़ी अब इन तथ्यों को समझ रही है, वह अपनी पहचान पर गर्व करते हुए मुख्यधारा में सम्मानजनक स्थान प्राप्त करना चाहती है। आज की युवा पीढ़ी की आवश्यकता है उसके बढ़ते कदमों को गति मिलना न कि किसी अल्पकालिक लाभ हेतु उसे भ्रमित करना।
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🔥 *6. युवाजनचेतना की आवश्यकता*
आज सबसे बड़ी आवश्यकता है युवा ही वह शक्ति है जोः इतिहास को समझ सकती है। वर्तमान की चुनौतियों का विश्लेषण कर सकती है। भविष्य की दिशा तय कर सकती है। युवाओं को चाहिए कि वे रोहिला क्षत्रिय इतिहास का सही अध्ययन करें, भ्रम और मिथ्या प्रचार से दूर रहें, सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म का सकारात्मक उपयोग करें, शिक्षा, रोजगार और नवाचार पर ध्यान केंद्रित करें, दूरगामी सोच बनाए कि आज तीब्रता से बदल रही दुनिया में कल क्या चाहिएगा इस पर गहन विचार करते हुए आगे बढ़े। जहां मानव रहित कार्य प्रणाली आएगी, बढ़ती जनसंख्या में रोहिला क्षत्रिय राजपूत की युवा जनशक्ति की भागीदारी कितनी होंगी इन्हीं जैसे ज्वलंत प्रश्न विचार हेतु सम्मुख खड़े है उन पर मंथन करे।
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🤝 *7. संगठनों की भूमिका: जिम्मेदारी और दिशा*
सामाजिक संगठनों का दायित्व केवल पहचान की रक्षा तक सीमित नहीं, बल्कि भविष्य निर्माण भी है। उन्हें चाहिए किः वे राजनीतिक स्वार्थों से ऊपर उठें पारदर्शी और सामूहिक निर्णय लें, युवाओं को नेतृत्व में स्थान दें, शिक्षा, रोजगार और सामाजिक उत्थान के कार्यक्रम चलाएं न कि भावी पीढ़ी को स्वाभिमान खोकर विभिन्न जातियों में विलीन होने की मुहिम चलाए। जो दूरगामी सोच रखते हुए रोहिला क्षत्रिय सामाजिक संगठन बने थे उसी सोच पर स्थिर रहे। वर्तमान में हो रही जनगणना में भी रोहिला क्षत्रिय का उल्लेख किया जाए इसके लिए सभी संगठनों को आगे आकर जनमानस को संज्ञानित कराना होगा ताकि पूर्व की भांति रोहिला क्षत्रिय पहचान की प्रविष्टि सरकारी अभिलेख में हो तभी अस्तित्व को स्थिरता तथा शासकीय पहचान मिल सकेगी।
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*निष्कर्ष* रोहिला क्षत्रिय समाज का इतिहास हमें सिखाता है कि परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, यदि समाज अपनी जड़ों से जुड़ा रहे और भविष्य के प्रति सजग हो, तो उसका अस्तित्व सुरक्षित रहता है। आज आवश्यकता हैकृ एकता, शिक्षा, जागरूकता और युवाओं के नेतृत्व में नव निर्माण की। यदि हम अतीत से प्रेरणा लेकर वर्तमान में सही निर्णय लें, तो भविष्य न केवल सुरक्षित होगा, बल्कि गौरवशाली भी बनेगा। “वक्त बदलता है, परंतु पहचान और स्वाभिमान तभी तक जीवित रहते हैं जब तक उन्हें सहेजने वाली चेतना जागृत रहती है।”
*प्रस्तुति - समय सिंह पुंडीर*
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