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Wednesday, 22 July 2026

RAJPUTANA KKATHHEHAR KE AJEY YODDHHA

*राजपुताना कठेहर रोहिलखंड*
के एक महान पराक्रमी योद्धा 
सूर्य वंशी क्षत्रिय सम्राट
*एक अजेय योद्धा*
*महाराजा रणवीर सिहं कठेहरिया रोहिला*

      *संक्षिप्त परिचय*
************************* *जन्म दिवस* 25 अक्टूबर, 1204 तदानुसार तत्कालीन कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की प्रथमा तिथि संवत 1261 विक्रमी
#पिता* महाराज त्रिलोक सिंह जी काठी क्षत्रिय 
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*वंश* _सूर्यवंश की निकुंभ शाखा 
वेद _यजुर वेद,उपवेद__धनुर्वेद,प्रवर_एक/तीन , शिखा_दाहिनी, पाद_दाहिनी,सूत्र _गुभेल,देवता__विष्णु (रघुनाथ जी), कुलदेवी _चावड़ा/कालिका माता,ध्वजा__गरुड़,नदी__सरयू,झंडा पंच रंगा,नगाड़ा_रण गंजन , ईष्ट_रघुनाथ/श्री राम चंद्र जी,उद्घोष_हर हर महादेव गोत्र_वशिष्ठ गुणधर्म _काठी (कठोर) गद्दी _ अयोध्या,ठिकाना__रावी व व्यास नदियों के बीच के काठे का क्षेत्र 
*************************
#राज्य विस्तार*
◆गंगा - यमुना दोआब क्षेत्र #दक्षिण पश्चिम में गंगा तक #पश्चिम में उत्तराखंड 
#उत्तर में नेपाल तक
*क्षेत्रफल* 25000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र या 10000 वर्ग मील क्षेत्र तक 

# सूबे* 
पांचाल, 
मध्यदेश,
कठेहर रोहिलखण्ड
*राजधानी* -रामपुर (निकट अहिक्षेत्र, रामनगर) कांपिल्य
##################
(तेहरवीं शताब्दी का पूर्वार्द्ध)

🔆सूर्यवंश🔆
***********************
#आइए इतिहास में चलें*



"*काल भी अगर छोड दे लेकिन काठी नहीं छोडता”* 
*(Time ( Death ) Forgets But Not Kathi )*

क्या हैं - “काठी और काठीयावाड, कठेहर खंड ” ?

काठी दरबार भव्यअतित कि श्रृंखला मे एक प्रसिद्ध नाम , यह एक क्षत्रिय संघ जो वीरता का वैभव , शौर्य का प्रतीक और अपने कठोर स्वाभीमानी गुणो से प्रसिद्ध है। 

*इसलिए इनके बारे प्रसिद्ध कहावत हैं - "काल भी अगर छोड दे लेकिन काठी नहि छोडता”*
सिकंदर के आक्रमण के पश्चात भारत की पश्चिमी उत्तरीय सीमा प्रांत के प्रहरी इन क्षत्रिय वीरों ने मैदानों का रुख किया,एक टुकड़ी सौराष्ट्र आई दूसरी उत्तरी पांचाल में तथा एक टुकड़ी काठी क्षत्रियों की नेपाल गई।
उत्तरी पांचाल को कठेहर खंड /रोहिलखंड के नाम से विकसित कर स्थिर रूप से राज्य स्थापित किया।
नेपाल में काठी क्षत्रियों ने कठेत कटायतkathayat साम्राज्य स्थापित किया।
 एक टुकड़ी ने थोडी कुछ शताब्दियो से उन्होने स्थिर रुप से अपना निवासस्थान सौराष्ट्र को बना लिया और इतना हि नहीं युगों से पुराण प्रसिद्ध सौराष्ट्र नाम इन्हि के कारण पलटकर ' काठीयावाड ' नाम से मशहुर हुआ एसी इन्होने इस विस्तार कि संस्कृति मे अमिट छाप छोडी हैं। 

कठ गणराज्य वाहिक प्रदेश ( हाल के पंजाब ) मे प्रसिद्ध था।इनकी राजधानी ( संगल ) सांकल थी ,(आज का स्याल कोट)एक उल्लेख मिलता है कि इन पंजाब वासी कठो के नाम से आज के अफगानिस्तान के गजनी प्रांत मे ' काटवाज ' क्षेत्र हे । कठ लोगों के शारीरिक सौदर्य और अलौकिक शौर्य की ग्रीक इतिहास लेखकों ने भूरि - भूरि प्रशंसा की है , ग्रीक लेखकों के अनुसार कठों के यहाँ यह प्रथा प्रचलित थी कि वे केवल स्वस्थ एवं बलिष्ठ संतान को ही जीवित रहने देते थे । 

सीक्रीटोस लिखता है कि वे सुंदरतम एवं बलिष्ठतम व्यक्ति को ही अपना शासक चुनते थे , ग्रिक इतिहासकारो ने कठो को कठोइ या काठीयन जैसे नामो से निर्देषीत किया हे , पाणिनी के ' अष्टाध्यायी ' मे कठो का उल्लेख हे , पंतजली के महाभाष्य के मत से कठ वैशपायन के शिष्य थे । इनकि प्रवर्तित वेदसंहिता कि शाखा ' काठक ' नाम से प्रसिद्ध थी । 

काठक कापिष्ठल संहिता जैतारायण , प्रत्धन ( दिवोदासी ) भीमसेनी इन राजाओ का नाम मीलते हे जीन्होने राजसूय यज्ञ किया था । इन्होने कई बार पोरस को हराया था।
सिकंदर को घुटने टेकने पर मजबूर किया,कठगणराज्य की राजकुमारी कार्विका उर्फ कर्णिका ने सिकंदर को अपनी नारी सेना के द्वारा परास्त किया घायल किया। वह तो आंतरिक राजाओं की सहायता से बच निकला था।
Painting : 1880's. ' A kathiavad Sentry’
By Artist - Horace van Ruith . 

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* इस्क्वाकू वंश में सूर्य वंशी महाराज निकुम्भ के वंशधर ई●पू● 326 वर्ष कठगण राज्य (रावी नदी के काठे में) सिकन्दर का आक्रमण काल-राजधानी सांकल दुर्ग (वर्तमान स्यालकोट) 53 वीं पीढ़ी में राजा अजयराव के वंशधर निकुम्भ वंशी राजस्थान अलवर, मंगल गढ़ जैसलमेर होते हुए गुजरात सौराष्ट्र कठियावाड , फिर पांचाल, मध्यदेश गये। 
* एक टुकड़ी नेपाल गई
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*अलवर में दुर्ग निकुम्भ वंशी (कठ क्षत्रिय रावी नदी के काठे से विस्थापित कठ-ंगण जिन्होंने सिकंदर को घुटने टेकने पर मजबूर किया था) क्षत्रियों ने बनवाया (राज्य मंगल गढ़), सौराष्ट्र में काठियावाड़ की स्थापना की ।
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 #मध्यदेश के उत्तरी पांचाल में कठेहर रोहिलखंड राज्य की स्थापन। यहां अहिक्षेत्र के पास रामनगर गांव मे राजधानी स्थापित की, ऊंचा गांव मझगांवा को सैनिक छावनी बनाया। यहां पर शासक हंसदेव, रहे, इनके पुत्र हंसबेध राजा बने-ं816 ई. तक- इसी वंश में राजा रामशाही (राम सिंह जी ) ने रामपुर गांव को एक नगर का रूप दिया और *909 ई में कठेहर- रोहिलखण्ड प्रान्त की राजधानी रामपुर में स्थापित की। 
#यहां पर कठ क्षत्रियों ने 11 पीढ़ी शासन किया इसी वंश75 में महापराक्रमी, विधर्मी संहारक राजा रणवीर
सिंह कठेहरियारोहिला का जन्म कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की प्रथमा तिथि तदानुसार 25 अक्टूबर 1204ईसवी को राजपूत काल के ऐसे समय में हुआ जब महराजा पृथ्वी राज चौहान के शासन अंत के कारण समस्त राजपूत शक्ति क्षीण हो चुकी थी ओर मुस्लिम आक्रांता इस्लामिक सल्तनत कायम करने में लगे थे बची हुई राजपूत शक्तियों का बहुत कठोरता ओर बर्बरता से दमन कर रहे थे हिंदुआ सूर्य चौहान का शासन अस्त हो चुका था ।
वंश वृक्ष इस प्रकार पाया गया
रामपुर संस्थापक राजा राम सिंह उर्फ रामशाह 909 ई. में 966 विक्रमी , 3 पौत्र- बीजयराज 4. करणचन्द 5. विग्रह राज 6. सावन्त सिंह (रोहिलखण्ड कठेहर का विस्तार गंगापार कर यमुना तक किया,) सिरसापाल के राज्य सरसावा में एक किले का निर्माण कराया। (दशवीं शताब्दी का उत्तरार्द्ध) नकुड रोड पर किले को आज यमुना द्वारा ध्वस्त एक टीले के रूप में देखा जा सकता है। 7. जगमाल 8 धिंगतराम 9 गोकुल सिंह 10 महासहाय 11 त्रिलोकसिंह 12रणवीर सिंह( 1204 ),नौरंग देव (पिंगू को परास्त किया) (राजपूत गजट लाहौर 04.06.1940 द्वारा डा0 
सन्त सिंह चैहान)
इक्कीस वर्ष की आयु में रामपुर के राजा त्रिलोक चंद उर्फ त्रिलोक सिंह के पुत्र रणवीर सिंह रोहिला का विवाह विजयपुर सीकरी की राजकुमारी तारा देवी से हुआ। रणवीर सिंह रोहिला का राजतिलक भी इसी वर्ष इक्कीस वर्ष की आयु में हुआ यानी 1225,ईसवी में हुआ ,इनकी लंबाई लगभग सात फीट थी, कंधो पर सीना कवच लगभग साठ शेर ,सिर पर कवच लोहे का इक्कीस सेर खड़ग का वजन 25, सेर ओर स्वयं उनका वजन 125 सेर था। सन् 1236से1240 तक रजया तुदीन सुल्तान सन 1242 मइजुद्दीन बहराम शाह सन,1246 अलाउद्दीन महमूद शाह आदि दिल्ली सुल्तान सेनाओं से राजा रणवीर सिंह रोहिला , कठेहरिया ने कठेहर रोहिलखंड का लोहा मनवाया ओर किसी भी दिल्ली सुल्तान मामुल्क को रोहिलखंड में प्रवेश नहीं होने दिया । इनके साथ विभिन्न राजवंशों के चौरासी अजेय योद्धा थे ,राठौड़, गोड, चौहान,वारेचा परमार गहलोत वच्छिल आदि थे वे सब लोहे के कवच धारी थे।
दिल्ली सुल्तान के 
गुलाम , सेनापति नासिरूद्दीन चंगेज उर्फ नासिरूद्दीन महमूद ने , सन् 1253 ई0,में दोआब, कठेहर, शिवालिक पंजाब, बिजनौर आदि क्षेत्रों पर विजय पाने के लिए दमनकारी अभियान किया। इतने अत्याचार , मारकाट तबाही मचाई कि विद्रोह करने वाले स्थानीय शासक, बच्चे व स्त्रियां भी सुरक्षित नहीं रही। ऐसी विषम परिस्थिति में रोहिल खण्ड के रोहिला शासकों ने दिल्ली सल्तनत के सूबेदार‘ ताजुल मुल्क इज्जूददीन डोमिशी‘ को मार डाला। दिल्ली सल्तनत के लिये यह घटना भीषण चुनौती समझी गई। इस समय रामपुर के राजा रणवीर सिंह थे । उन्होनें आस पास की समस्त राजपूत शक्तियों को एकता के सूत्र में बांधा ओर दिल्ली सल्तनत के विरूद्ध अपनी क्रान्तिकारी प्रवृत्ति को सजीव बनाये रखा था जिससे दिल्ली सुल्तान कठेहर पर आक्रमण करते हुए भय खाते थे ,नासिरूद्दीन महमूद बहराम गुलाम वंश ( उर्फ चंगेज) इस घटना से उद्वेलित हो उठा और सहारनपुर ‘ उशीनर प्रदेश‘ के मण्डावार व मायापुर से 1253 ई0 में गंगापार कर गया और विद्रोह को दबाता हुआ, रोहिलखण्ड को रौदता हुआ बदांयू पहुंचा। वहां उसे ज्ञात हुआ कि रामपुर में राजा रणवीर सिंह रोहिला के साथ लोहे के कवचधारी 84 रोहिले है जिनसे विजय पाना टेढ़ी खीर है। सूचना दिल्ली भेजी गई। दिल्ली दरबार में सन्नाटा हो गया कि एक छोटे राज्य कठेहर रोहिलखंड के रोहिलों से कैसे छीना जाए। नासिरूद्दीन चंगेज (महमूद) ने तलवार व बीड़ा उठाकर राजा रणवीर सिंह के साथ युद्ध करने की घोषणा की। रामपुर व पीलीभीत के बीच मैदान में नसीरुद्दीन व कठेहर नरेश सूर्य वंशी क्षत्रिय रणवीर सिंह की सेना के बीच भयंकर युद्ध हुआ, 6000 रोहिला राजपूत व 
 84 लोहे के कवचधारी रन्धेलवंशी सेना नायकों की सेना के सामने नासिरूद्दीन की तीस हजारी सेना के पैर उखड़ गये।
      नासिरूद्दीन चंगेज को बन्दी बना लिया गया। बची हुई सेना के हाथी व घोडे तथा एक लाख रूपये महाराज रणवीर सिंह को देने की प्रार्थना पर आगे ऐसा अत्याचार न करने की शपथ लेकर नासिरूद्दीन महमूद ने प्राण दान मांग लिया। क्षात्र धर्म के अनुसार शरणागत को अभयदान देकर राजा रणवीर सिंह ने उसे छोड़ दिया। परन्तु धोखेबाज महमूद जो राजा रणवीर सिंह पर विजय पाने का बीड़ा उठाकर दिल्ली से आया था, षडयंत्रों में लग गया। राजा रणवीर सिंह का एक दरबारी पं. गोकुलराम पाण्डेय था। उसे रामपुर का राजा नियुक्त करने का लालच देकर महमूद ने विश्वास में ले लिया और रामपुर के किले का भेद लेता रहा। पं. गोकुल राम ने लालच के वशीभूत होकर विधर्मी को बता दिया कि रक्षांबधन के दिन सभी राजपूत निःशस्त्र होकर शिव मन्दिर में शस्त्र पूजा करेंगें।यह शिव मन्दिर किले के दक्षिण द्वार के समीप है , यह सुनकर महमूद का चेहरा खिल उठा और दिल्ली से भारी सेना को मंगाकर जमावड़ा प्रारम्भ कर दिया रक्षाबन्धन का दिन आ गया। किले में उपस्थित सभी सैनिक, सेनाायक अपने-ंअपने शस्त्रों को उतार कर पूजा स्थान पर शिव मन्दिर ले जा रहे थे। गोकुल राम पाण्डेय यह सब सूचना विधर्मी तक पहुंचाता रहा। श्वेत ध्वज सामने रखकर दक्षिण द्वार पर पठानों की गुलामवंशी सेना एकत्र हो गयी। पूजा में तल्लीन राज पुत्रों को पाकर गोकुलराम पाण्डेय ने द्वार खोल दिया।
      शिव उपासना में रत सभी उपस्थितों को घेरे में ले लिया गया। समस्त राजपूत भौचक्के रह गए ओर मन्दिर से तुलसी का पत्ता लिया ओर मुंह में दबा कर शाका बोल दिया,घमासान युद्ध छिड़ गया परन्तु ऐसी गद्दारी के कारण राजा रणवीर सिंह ने निशस्त्र लड़ते हुए अदम्य साहस ओर शोर्य का परिचय दिया ओर महमूद के सैनिकों से भिड़ गए अद्भुत दृश्य था रणवीर सिंह चारो ओर से विधर्मी सैनिकों से घिरे युद्ध कर रहे थे विधर्मी की खड़ग छीन ली ओर आक्रांताओं के शीश कट कट गिरने लगे , उस समय रामपुर के किले में केवल तीन हजार राजपूत ही उपस्थित थे ओर वे भी निहत्थे रह गए थे सभी राजपूत बड़ी वीरता से लडे किन्तु संख्या में कम होने के कारण बिखर गए, रणवीर सिंह कठहरिया रोहिला की पीठ पर विधर्मी सेना ने तलवार से वार करके काट डाला ओर अंतिम बूंद रक्त की रहने तक रणवीर धराशाई नहीं हुए यह देख कर नसीरुद्दीन चकित रह गया देखते ही देखते कठेहर नरेश वीरगति को प्राप्त हुए। नासिरूद्दीन ने पं. गोकुल राम से कहा कि जिसका नमक खाया अब तुम उसी के नहीं हुए तो तुम्हारा भी संहार अनिवार्य है। नमक हरामी को जीने का हक नहीं है। गोकुल का धड़ भी सिर से अलग पड़ा था। सभी स्त्री बच्चों को लेकर रणवीर सिंह का भाई सूरत सिंह उर्फ सुजान सिंह किले से पलायन कर गया । महारानी तारादेवी जो विजय पुर सीकरी के राजा की पुत्री थी राजा रणवीर सिंह के साथ सती हो गई। 
रामपुर में किले के खण्डरात, सती तारादेवी का मन्दिर तथा उनका राजमहल अभी तक एक ध्वस्त टीले के रूप में मौजूद है, जो क्षात्र धर्म का परिचायक व रामपुर में रोहिला क्षत्रियों की कठ-शाखा के शासन काल की याद ताजा करता है जिन्होंने अपना सर्वस्व बलिदान कर क्षात्र धर्म की रक्षा की। गुलाम वंश, सल्तनत काल में विधर्मी की पराधीनता कभी स्वीकार नहीं की। अन्तिम सांस तक दिल्ली सल्तनत से युद्ध किया और कितनी ही बार धूल चटाई तथा रोहिलखण्ड को स्वतंत्र राज्य बनाये रखा। निरन्तर संघर्ष करते रहे राजा रणवीर सिंह कठहरिया का बलिदान व्यर्थ नहीं , सदैव तुगलक, मंगोल , मुगलों आदि से विद्रोह किया और स्वतंत्र रहने की भावना को सजीव रखा। राणा रणवीर सिंह के वंशधर आज भी रोहिला-ंक्षत्रियों में पाए जाते हे,जय राजपुताना कठेहर रोहिलखंड
उनकी पावन स्मृति को जीवित रखने व रोहिलखंड कठेहर राजपूताना की वीर गाथा को सजीव बनाए रखने के लिए भारत का समस्त रोहिला क्षत्रिय राजपूत समाज रक्षा बन्धन को शोर्य दिवस तथा पच्चीस अक्टूबर को प्रतिवर्ष स्वाभिमान दिवस के रूप में मनाता हे ओर शस्त्र पूजा करता है । उत्तर भारत के महानगर बड़ौत में राजा रणवीर सिंह रोहिला मार्ग व ऐतिहासिक नगर सहारनपुर में आज महाराजा रण वीर सिंह रोहिला चौक स्थित है। (संदर्भ__इतिहास रोहिला राजपूत द्वारा डॉक्टर के सी सेन,
ठाकुर अजीत सिंह परिहार बालाघाट मध्य प्रदेश, मध्यकालीन भारत बीएम रस्तोगी ,रोहिला क्षत्रियों का क्रमबद्ध इतिहास द्वारा श्री दर्शन लाल रोहिला, रोहिला क्षत्रिय वंश भास्कर द्वारा आर आर राजपूत, रोहिला क्षत्रिय जाति निर्णय द्वारा राय भीम राज राजभाट बड़वा जी का बाड़ा तूंगा राजस्थान, काठी कठेरिया क्षत्रिय व रोहिला राजपूत द्वारा महेश सिंह कठाय त नेपाल , मध्य कालीन भारत द्वारा ठाकुर अजित सिंह परिहार बाला घाट मध्य प्रदेश  
संकलन व लेखन 
समय सिंह पुंडीर
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क्षत्रिय/राजपूत वाटिका
अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा
राष्ट्रीय प्रवक्ता 
*क्षत्रिय अस्तित्व न्याय मोर्चा भारत*
नोट
*सनातन रक्षक,विधर्मी संहारक और लगभग तीस वर्ष तक आक्रांताओं द्वारा किए जा रहे इस्लामी करण को रोकने वाले राजपूत सम्राट रोहिलखंड नरेश महाराजा रणवीर सिंह रोहिला काठी क्षत्रिय की जयंती सभी क्षत्रिय भाई स्वाधीनता और स्वाभिमान दिवस के रूप में मनाते हैं*

THE FOUNDERS OF RAJPUTANA KATHHEHAR ROHILKHANND

*KSHTRIYA SAMRAT MAHARAJA RANVEER SINGH ROHILA,THE FOUNDER OF ROHILKHANND*
🙏 क्रमबद्ध, विस्तृत एवं प्रभावशाली ऐतिहासिक जीवन परिचय प्रस्तुत है।
(लेखन शैली: संतुलित – इतिहास + प्रेरणात्मक, शोधपरक संरचना सहित)
महाराजा रणवीर सिंह रोहिला
कठेहर–रोहिलखण्ड के अजेय क्षत्रिय शासक
(जन्म: 25 अक्टूबर 1204 ई., बलिदान: 13वीं शताब्दी मध्य)
1. प्रस्तावना
भारतीय इतिहास में अनेक ऐसे वीर क्षत्रिय हुए जिन्होंने सीमित संसाधनों में भी विदेशी आक्रमणकारियों का डटकर सामना किया। कठेहर–रोहिलखण्ड (वर्तमान उत्तर प्रदेश का उत्तरी भाग) के पराक्रमी शासक महाराजा रणवीर सिंह रोहिला उन्हीं में से एक थे। उन्होंने दिल्ली सल्तनत के विस्तारवादी अभियानों का विरोध करते हुए स्वतंत्रता और क्षात्र धर्म की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व बलिदान कर दिया।
उनका जीवन केवल एक क्षेत्रीय शासक की कथा नहीं, बल्कि आत्मसम्मान, युद्धनीति और राष्ट्ररक्षा का आदर्श उदाहरण है।
भाग 1
काठी, कठेहर और काठियावाड़ का ऐतिहासिक आधार
2. सूर्यवंश और निकुम्भ वंश
महाराजा रणवीर सिंह रोहिला सूर्यवंशी क्षत्रिय परंपरा से संबंधित माने जाते हैं। परंपरागत वंशावली के अनुसार यह वंश इक्ष्वाकु कुल से उत्पन्न हुआ, जिसे भगवान राम की वंश परंपरा माना जाता है। निकुम्भ नामक पराक्रमी राजा से निकुम्भ वंश की स्थापना मानी जाती है।
इस वंश की एक शाखा “कठ” या “काठी” कहलायी।
3. कठ गणराज्य और सिकंदर काल
ईसा पूर्व 326 में जब Alexander the Great ने उत्तर-पश्चिम भारत पर आक्रमण किया, उस समय रावी नदी के तट पर कठ गणराज्य का उल्लेख मिलता है। इसकी राजधानी “सांकल” (वर्तमान स्यालकोट) बताई जाती है।
यूनानी लेखकों ने कठों (Kathoi/Kathaeans) की वीरता, शारीरिक सौष्ठव और युद्ध कौशल की प्रशंसा की है। कुछ ग्रंथों में उल्लेख है कि वे स्वस्थ और बलिष्ठ संतानों को ही जीवित रखते थे तथा सर्वश्रेष्ठ योद्धा को शासक चुनते थे।
संस्कृत व्याकरणाचार्य Panini की अष्टाध्यायी में कठों का उल्लेख मिलता है। महाभाष्यकार Patanjali ने भी कठों का उल्लेख किया है।
4. काठियावाड़ और कठेहर का विकास
सिकंदर के आक्रमणों के पश्चात कठ क्षत्रियों के विभिन्न समूहों ने भारत के विभिन्न क्षेत्रों में प्रवास किया—
एक शाखा सौराष्ट्र गई — जहाँ “सौराष्ट्र” क्षेत्र “काठियावाड़” नाम से प्रसिद्ध हुआ।
एक शाखा उत्तर भारत के पंचाल क्षेत्र में बसी — जो आगे चलकर “कठेहर खण्ड” या “रोहिलखण्ड” कहलाया।
एक शाखा नेपाल क्षेत्र में गई — जहाँ “कटायत” परंपरा का उल्लेख मिलता है।
काठी वीरों के विषय में कहावत प्रचलित हुई:
“काल भी अगर छोड़ दे, लेकिन काठी नहीं छोड़ता।”
भाग 2
कठेहर राज्य की स्थापना
5. रामपुर की स्थापना
लगभग 7वीं–10वीं शताब्दी के मध्य कठेहर क्षेत्र में स्थायी राज्य की स्थापना हुई।
राजा रामसिंह (रामशाह) ने 909 ईस्वी (विक्रमी 966) में रामपुर नगर को राजधानी के रूप में विकसित किया। यह क्षेत्र अहिक्षेत्र (वर्तमान रामनगर के निकट) के आसपास स्थित था।
इसके बाद 11 पीढ़ियों तक कठ क्षत्रियों ने शासन किया।
वंशावली में उल्लेखित प्रमुख नाम:
रामशाह (रामसिंह)
बीजयराज
करणचन्द
विम्रहराज
सावन्त सिंह
जगमाल
रणवीर सिंह
धिंगतराम
गोकुल सिंह
महासहाय
त्रिलोकचन्द
नौरंग देव
भाग 3
महाराजा रणवीर सिंह रोहिला
6. जन्म और व्यक्तित्व
जन्म: 25 अक्टूबर 1204 ईस्वी
विक्रम संवत: 1261
स्थान: रामपुर, कठेहर-रोहिलखण्ड
गोत्र: वशिष्ठ
वंश: निकुम्भ वंशी कठेहरिया क्षत्रिय
वे युद्धकला, घुड़सवारी और शस्त्र संचालन में निपुण थे। उनके साथ 84 कवचधारी रोहिला वीरों की विशिष्ट सेना रहती थी।
7. दिल्ली सल्तनत से संघर्ष
13वीं शताब्दी में दिल्ली में गुलाम वंश का शासन था। उस समय सुल्तान Nasiruddin Mahmud नाममात्र का शासक था, जबकि वास्तविक सत्ता Ghiyas ud din Balban जैसे शक्तिशाली अमीरों के हाथों में थी।
1253–1254 ईस्वी में दोआब, कठेहर और शिवालिक क्षेत्रों में दमनकारी अभियान चलाया गया। स्थानीय शासकों और जनता पर अत्याचार हुए।
रोहिलखण्ड में विद्रोह भड़क उठा और दिल्ली सल्तनत के सूबेदार की हत्या कर दी गई।
8. निर्णायक युद्ध
रामपुर और पीलीभीत के मध्य मैदान में दिल्ली सल्तनत की लगभग 30,000 सेना और रणवीर सिंह के नेतृत्व में रोहिला योद्धाओं के बीच भयंकर युद्ध हुआ।
परंपरा के अनुसार:
84 कवचधारी रणधेलवंशी वीरों ने असाधारण पराक्रम दिखाया
शत्रु सेना के हाथी-घोड़े परास्त हुए
नासिरूद्दीन को बंदी बनाया गया
क्षात्र धर्म के अनुसार शरणागत को अभयदान देकर रणवीर सिंह ने उसे छोड़ दिया।
9. विश्वासघात और बलिदान
दिल्ली दरबार ने पुनः षड्यंत्र रचा।
दरबारी पंडित गोकुलराम पाण्डेय को लालच देकर विश्वास में लिया गया।
रक्षाबंधन के दिन, जब शिव मंदिर में शस्त्र पूजा हेतु राजपूत निःशस्त्र थे, तब किले का द्वार खोल दिया गया। भारी सेना ने आक्रमण किया।
घमासान युद्ध हुआ।
महाराजा रणवीर सिंह वीरगति को प्राप्त हुए।
महारानी तारादेवी सती हो गईं।
उनके भाई सूरत सिंह शेष परिवार सहित सुरक्षित स्थान पर चले गए।
भाग 4
ऐतिहासिक विरासत
रामपुर के किले के अवशेष
सती तारादेवी मंदिर
स्थानीय परंपराएँ और वंशज
महाराजा रणवीर सिंह ने अंतिम सांस तक पराधीनता स्वीकार नहीं की। उनका बलिदान रोहिलखण्ड की स्वतंत्र चेतना का प्रतीक बना।
निष्कर्ष
महाराजा रणवीर सिंह रोहिला का जीवन भारतीय क्षत्रिय परंपरा, स्वाभिमान और स्वतंत्रता की रक्षा का सशक्त उदाहरण है।
उन्होंने सीमित संसाधनों में भी दिल्ली सल्तनत की शक्तिशाली सेना का सामना किया और क्षात्र धर्म का पालन करते हुए शरणागत को अभयदान दिया — यद्यपि अंततः उन्हें विश्वासघात का सामना करना पड़ा।
उनकी गाथा इतिहास के उन पृष्ठों में स्थान पाने योग्य है जहाँ क्षेत्रीय स्वतंत्रता संग्राम और स्थानीय शौर्य को उचित सम्मान दिया जाए।
 🚩

KATHE HAR ROHILKHAND NARESH UNTOLD STORY OF A GREAT WARRIOR

राजपूताना कठेहर रोहिलखंड के अमर अपराजित योद्धा ,
सूर्यवंशी क्षत्रिय सम्राट महाराजा रणवीर सिंह रोहिला
25 अक्टूबर — स्वाभिमान दिवस | रक्षा बंधन — शौर्य एवं बलिदान दिवस
⚔️ “धर्म, स्वाभिमान और मातृभूमि की रक्षा हेतु जिसने अंतिम सांस तक संघर्ष किया” ⚔️
भारतीय इतिहास के पन्नों में अनेक ऐसे वीर हुए जिन्होंने विदेशी आक्रांताओं के सामने कभी सिर नहीं झुकाया। उन्हीं अमर योद्धाओं में एक तेजस्वी नाम है —
महाराजा रणवीर सिंह रोहिला
जो राजपूताना कठेहर रोहिलखंड के महान सूर्यवंशी क्षत्रिय सम्राट थे।
उनका जीवन केवल युद्ध गाथा नहीं, बल्कि धर्म रक्षा, राष्ट्र गौरव, क्षात्र मर्यादा और आत्मबलिदान का अद्वितीय उदाहरण है।
🛕 जन्म एवं वंश परिचय
जन्म : 25 अक्टूबर 1204 ईस्वी
तिथि : कार्तिक मास, कृष्ण पक्ष, प्रथमा
संवत : 1261 विक्रमी
पिता : महाराजा त्रिलोक सिंह जी
वंश : रघुवंशी सूर्यवंश — निकुंभ शाखा
गोत्र : वशिष्ठ
इष्टदेव : भगवान रघुनाथ जी
उद्घोष : हर हर महादेव
महाराजा रणवीर सिंह उस गौरवशाली सूर्यवंश से संबंधित थे जिसकी परंपरा भगवान श्रीराम तक जाती है। यह वंश वीरता, त्याग और धर्मपालन के लिए प्रसिद्ध रहा।
🌄 कठेहर रोहिलखंड राज्य की स्थापना
निकुंभ वंशी कठ क्षत्रियों का मूल क्षेत्र रावी नदी के तटवर्ती भाग माना जाता है। समय के साथ यह वंश राजस्थान, सौराष्ट्र और फिर पांचाल-मध्यदेश क्षेत्र में पहुँचा।
कन्नौज के पतन के बाद इस वीर क्षत्रिय वंश ने कठेहर रोहिलखंड राज्य की स्थापना की और अहिक्षेत्र के समीप रामनगर तथा बाद में रामपुर को राजधानी बनाया।
राज्य विस्तार
गंगा-यमुना दोआब
उत्तराखंड सीमा तक
नेपाल की तराई तक
लगभग 25,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र
यह राज्य उस समय उत्तर भारत की प्रमुख स्वतंत्र राजपूत शक्तियों में गिना जाता था।
🗡️ महाराजा रणवीर सिंह का उदय
1225 ईस्वी में मात्र 21 वर्ष की आयु में महाराजा रणवीर सिंह का राजतिलक हुआ। उसी वर्ष उनका विवाह विजयपुर सीकरी की राजकुमारी तारा देवी से हुआ।
उनके व्यक्तित्व का वर्णन अत्यंत अद्भुत मिलता है—
लगभग 7 फीट ऊँचा शरीर
60 सेर का कवच
25 सेर की विशाल तलवार
असाधारण युद्ध कौशल
उनके साथ 84 महान कवचधारी राजपूत योद्धाओं की सेना रहती थी, जिनमें राठौड़, चौहान, परमार, गोड़, वच्छिल आदि वीर शामिल थे।
⚔️ दिल्ली सल्तनत से संघर्ष
जब पृथ्वीराज चौहान के बाद अधिकांश राजपूत शक्तियाँ कमजोर पड़ चुकी थीं, उस समय दिल्ली सल्तनत उत्तर भारत में अपना विस्तार कर रही थी।
किन्तु कठेहर रोहिलखंड की धरती पर महाराजा रणवीर सिंह ने विदेशी सत्ता को कभी स्वीकार नहीं किया।
उन्होंने —
दिल्ली सल्तनत की अनेक सेनाओं को पराजित किया
रोहिलखंड में मुस्लिम सल्तनत का प्रवेश रोका
आसपास की राजपूत शक्तियों को संगठित किया
स्वतंत्रता और धर्म रक्षा की लौ जीवित रखी
🔥 1253 ईस्वी का ऐतिहासिक युद्ध
दिल्ली सल्तनत के सेनापति नासिरुद्दीन महमूद (चंगेज) ने रोहिलखंड को जीतने के लिए विशाल सेना के साथ आक्रमण किया।
रामपुर और पीलीभीत के मध्य हुए भीषण युद्ध में—
महाराजा रणवीर सिंह की लगभग 6000 सेना
और 84 कवचधारी वीरों ने
दिल्ली सल्तनत की 30,000 सेना को परास्त कर दिया
इतिहास के अनुसार नासिरुद्दीन महमूद को बंदी बना लिया गया था।
किन्तु क्षात्र धर्म का पालन करते हुए महाराजा रणवीर सिंह ने उसे अभयदान देकर मुक्त कर दिया।
⚠️ विश्वासघात और बलिदान
पराजय से अपमानित नासिरुद्दीन ने छल का सहारा लिया।
राजदरबार के एक व्यक्ति गोकुलराम पांडेय को लालच देकर उसने किले की गुप्त जानकारी प्राप्त की। रक्षा बंधन के दिन जब सभी राजपूत शिव मंदिर में शस्त्र पूजा हेतु निःशस्त्र थे, तभी विश्वासघात कर किले का द्वार खोल दिया गया।
फिर क्या हुआ?
निहत्थे राजपूतों ने भीषण युद्ध किया
महाराजा रणवीर सिंह ने अकेले सैकड़ों शत्रुओं का संहार किया
अंतिम रक्त बूंद तक युद्ध करते रहे
पीठ पर वार होने के बाद भी धराशायी नहीं हुए
अंततः रक्षा बंधन के पावन दिन
महाराजा रणवीर सिंह रोहिला वीरगति को प्राप्त हुए।
🔥 महारानी तारा देवी का जौहर
महाराजा के बलिदान के पश्चात् महारानी तारा देवी ने सती होकर क्षत्राणी धर्म का पालन किया।
आज भी रामपुर क्षेत्र में किले के अवशेष, सती स्थल और ऐतिहासिक टीले उस गौरवगाथा के साक्षी माने जाते हैं।
🛡️ क्यों महत्वपूर्ण है यह इतिहास?
महाराजा रणवीर सिंह का जीवन हमें सिखाता है—
✅ धर्म की रक्षा सर्वोपरि है
✅ विश्वासघात सबसे बड़ा शत्रु है
✅ राष्ट्र और स्वाभिमान हेतु संघर्ष कभी व्यर्थ नहीं जाता
✅ छोटी शक्ति भी संगठन और साहस से बड़ी साम्राज्यवादी ताकतों को चुनौती दे सकती है
📜 आज भी जीवित है उनकी स्मृति
रोहिला क्षत्रिय समाज आज भी—
25 अक्टूबर को स्वाभिमान दिवस
तथा
रक्षा बंधन को शौर्य एवं बलिदान दिवस
के रूप में मनाता है।
शस्त्र पूजन, वीर स्मरण और समाज जागरण कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।
🚩 अमर संदेश
“क्षात्र धर्म केवल युद्ध नहीं, बल्कि सत्य, संस्कृति और स्वाभिमान की रक्षा का संकल्प है।”
महाराजा रणवीर सिंह रोहिला का बलिदान भारतीय इतिहास की उन अमर गाथाओं में से है जिन्हें आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाना आवश्यक है।
📚 संदर्भ स्रोत
इतिहास रोहिला राजपूत — डॉ. के.सी. सेन
रोहिला क्षत्रियों का क्रमबद्ध इतिहास — दर्शन लाल रोहिला
रोहिला क्षत्रिय वंश भास्कर — आर.आर. राजपूत
मध्यकालीन भारत — ठाकुर अजित सिंह परिहार
अन्य पारंपरिक राजपूत वंशावली स्रोत
🚩 जय राजपुताना — जय कठेहर रोहिलखंड 🚩
⚔️ हर हर महादेव ⚔️