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Wednesday, 18 February 2026

THE THIRD BETTLE OF PANIPAT पानीपत के युद्ध में रोहिला राजपूतों के बलिदान के सबूत जिंदा है

पानीपत की तीसरी लड़ाई से जुड़े इतिहास के साक्ष्य कलायत में भी मौजूद साक्ष्य खोज  रहे है, रोहिला क्षत्रिय सामाजिक संगठन
देश के अतीत से जुड़ी वीर गाथाओं को जन-जन तक पहुंचाने और इनकी स्मृतियों को हमेशा ताजा रखने के लिए रोहिला क्षत्रिय समाज संगठन ने खास पहल की है। इसके तहत कलायत श्री कपिल मुनि तट और वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप चौक के पास पानीपत की तीसरी लड़ाई के इतिहास से जुड़े धार्मिक स्थल हैं
रोहिल्ला क्षत्रिय समाज संगठन के लोगों ने कहा कि मशहूर मरहट्टा जनरैल भाऊ के दीवान गंगा सिंह महचा राठौड़ ने पानीपत की तीसरी लड़ाई में अहमद शाह अब्दाली के खिलाफ लड़ाई लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए थे। इनकी पत्नी रानी रामप्यारी उस जमाने की परंपरा अनुसार सती हुई थी। उनकी स्मृति में कलायत श्री कपिल मुनि तट के पास सौदागर मल के पुत्र अमरनाथ रोहिल्ला निवासी मछूंडा ने बनाई थी। इस तरह देश के गौरवशाली इतिहास के लिए लड़ी गई लड़ाई में रोहिल्ला क्षत्रिय समाज की महत्वपूर्ण भूमिका है। उन्होंने बताया कि पानीपत की लड़ाई में शहीद हुए गंगा सिंह महेचा राठौड़ रोहिला राजपूत थे। पानीपत की तीसरी लड़ाई में ये योद्धा अहमद शाह अब्दाली के विरुद्ध लड़े थे। उस दौरान गंगा सिंह की रानी रामप्यारी और क्षत्राणी अपने बच्चों के साथ कलायत रियासत के अधीन सुरक्षित थे। इस तरह शुरू से ही भारत भूमि पर कलायत का इतिहास गौरवशाली रहा है।
१४,जनवरी दिन बुधवार१७६१ईसवी में मकर सक्रांति के दिन वीर गंगा सिंह महेचा राठौड़ रोहिला राजपूत ने सदा शिव राव भाऊ के सेनापति के रूप में रुहेला सरदार नजीब खान और अब्दाली दुर्रानी के विरुद्ध युद्ध में अपनी सेना सहित वीर गति पाई जबकि उत्तर भारत में किन्ही राजपूत, आदि ने मराठों का साथ नही दिया ,उनकी रानी राम प्यारी सती हुई।

पानीपत का तीसरा युद्ध: एक स्ट्रेटेजिक एनालिसिस (14 जनवरी 1761)
आज के इतिहास में, 18वीं सदी का सबसे भयानक युद्ध पानीपत के मैदान में लड़ा गया था। यह सिर्फ़ दो सैनिकों की टक्कर नहीं थी, बल्कि दो अलग-अलग युद्ध स्टाइल (Warfares) की टक्कर थी। इस खास मैप के ज़रिए उस दिन की ज्योग्राफिकल और स्ट्रेटेजिक स्थिति को समझें।

मैप पर क्या देखें

🚩 मराठा तोपखाना (बाईं ओर):
इब्राहिम खान गार्दी के नेतृत्व में मराठा तोपखाना (आर्टिलरी) सीधी लाइन में तैनात थी। यह उस समय एशिया की सबसे बेहतरीन तोपों में से एक थी, लेकिन भारी होने के कारण इसे तेज़ी से आगे बढ़ाना मुश्किल था।

🐎 दुर्रानी की 'आधा-चाँद' स्ट्रेटेजी (दाईं ओर):
अहमद शाह अब्दाली की सेना ने पारंपरिक सीधी लड़ाई के बजाय फ्लेक्सिबल 'क्रेसेंट फॉर्मेशन' अपनाया। मैप पर दाईं ओर देखें कि कैसे अफ़गान घुड़सवारों (कैवलरी) ने मराठा सेना को घेरने की कोशिश की।

 ⚠️ सप्लाई लाइन का संकट:
मराठा कैंप (कैंप) पीछे की तरफ दिख रहा है। युद्ध से पहले, दुर्रानी सेना ने मराठों की लॉजिस्टिक्स (सप्लाई लाइन) काट दी थी जिससे सेना और जानवर भूख से कमज़ोर हो गए थे।

🌍 ज्योग्राफिकल फैक्टर:
युद्ध के नतीजे में खुले मैदान और यमुना नदी की स्थिति ने बड़ी भूमिका निभाई।

नतीजा:
हालांकि मराठा वीरों ने अदम्य साहस का परिचय दिया, लेकिन लॉजिस्टिक्स की कमी और तोपखानों की स्थिरता (स्टैटिक नेचर) भारी पड़ी। इस युद्ध की वजह से उत्तर भारत में पावर बैलेंस में बदलाव आया।

📜 इतिहास के पन्नों से एक बहादुरी की कहानी।


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