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Tuesday, 4 August 2026

ASHWAK GANRAJY KE RAJA ASHVKARAN ROHILA SANKAL DURG

RAJPUTANA ROHILKHAND

जय जय राजपूताना बुंदेलखंड,रोहिलखंड,बघेलखंड,कुमायुखंड उत्तराखंड (भरतखण्ड)
क्षत्रिय अस्तित्व न्याय मोर्चा सभी क्षत्रिय साम्राज्य को खोज खोज कर सामने लाने की मुहिम में है बहुत कुछ छिपाया गया और हमे नही पढ़ाया जाता किंतु क्षत्रिय कभी मिटता नही वह शास्वत है सनातन है उसकी रक्षा स्वयं सृष्टि रचयिता करता है ,क्षत्रिय अस्तित्व न्याय मोर्चा किसी भी क्षत्रिय के अस्तित्व को संरक्षित करने का कार्य कर रहा है,कितना हास्यास्पद है कि वैदिक कालीन उत्तरी पांचाल में स्थापित राजपूताना रोहिलखंड के क्षत्रिय के स्थान पर आक्रांता अफगानों का इतिहास पढ़ाया जाता है अट्ठारहवीं सदी से आगे राजपूत इतिहास को गायब ही कर दिया गया विक्की पीडिया से भी हटा दिया गया है किंतु अब और अन्याय इतिहास के साथ सहन नही किया जायेगा।।

रोहिल्ला उपाधि -

 शूरवीर, अदम्य - साहसी विशेष युद्ध कला में प्रवीण, उच्च कुलीन सेनानायको, और सामन्तों को उनके गुणों के अनुरूप क्षत्रिय वीरों को तदर्थ उपाधि से विभूषित किया जाता था - जैसे - रावत - महारावत, राणा, महाराणा, ठाकुर, नेगी, रावल, रहकवाल, रोहिल्ला, समरलछन्द, लखमीर,(एक लाख का नायक) आदि। इसी आधार पर उनके वंशज भी आजतक राजपूतों के सभी गोत्रों में पाए जाते हैं। "वभूव रोहिल्लद्व्यड्कों वेद शास्त्रार्थ पारग: । द्विज: श्री हरि चन्द्राख्य प्रजापति समो गुरू : ।।2।। ( बाउक का जोधपुर लेख ) - सन 837 ई. चैत्र सुदि पंचमी - हिंदी अर्थ - "वेद शास्त्र में पारंगत रोहिल्लाद्धि उपाधिधारी एक हरिश्चन्द्र नाम का ब्राह्मण था" जो प्रजापति के समान था हुआ ।।6।। ( गुज्जर गौरव मासिक पत्रिका - अंक 10, वर्ष ।।माह जौलाई 1991 पृष्ठ - 13) (राजपुताने का इतिहास पृष्ठ - 147) (इतिहास रोहिला - राजपूत पृष्ठ - 23) (प्राचीन भारत का इतिहास, राजपूत वंश, - कैलाश - प्रकाशन लखनऊ सन 1970 ई. पृष्ठ - 104 -105 - ) रोहिल्लद्व्यड्क रोहिल्लद्धि - अंक वाला या उपाधि वाला । सर्वप्रथम प्रतिहार शासक द्विज हरिश्चन्द्र को रोहिल्लद्धि उपाधि प्राप्त हुई । बाउक,प्रतिहार शासक विप्र हरिश्चन्द्र के पुत्र कवक और श्रीमति पदमनी का पुत्र था वह बड़ा पराक्रमी और नरसिंह वीर था। प्रतिहार एक पद है, किसी विशेष वर्ण का सूचक नही है। विप्र हरिश्चन्द्र प्रतिहार अपने बाहुबल से मांडौर दुर्ग की रक्षा करने वाला था, अदम्य साहस व अन्य किसी विशेष रोहिला शासक के प्रभावनुरूप ही रोहिल्लद्व्यड्क उपाधि को किसी आधार के बिना कोई भी व्यक्ति अपने नाम के साथ सम्बन्ध करने का वैधानिक रूप में अधिकारी नही हो सकता। उपरोक्त से स्पष्ट है कि बहुत प्राचीन काल से ही गुणकर्म के आधार पर क्षत्रिय उपाधि "रोहिल्ला" प्रयुक्त । प्रदत्त करने की वैधानिक व्यवस्था थी। जिसे हिन्दुआसूर्य - महाराजा पृथ्वीराज चौहान ने भी यथावत रखा। पृथ्वीराज चौहान की सेना में एक सौ रोहिल्ला - राजपूत सेना नायक थे । "पृथ्वीराज रासौ" - चहूँप्रान, राठवर, जाति पुण्डीर गुहिल्ला । बडगूजर पामार, कुरभ, जागरा, रोहिल्ला ।। इस कवित्त से स्पष्ट है । कि - प्राचीन - काल में रोहिला- क्षत्रियों का स्थान बहुत ऊँचा था। रोहिला रोहिल्ल आदि शब्द राजपुत्रों अथवा क्षत्रियों के ही द्योतक थे । इस कवित्त के प्रमाणिकता "आइने अकबरी", 'सुरजन चरिता' भी सिद्ध करते हैं । युद्ध में कमानी की तरह (रोह चढ़ाई करके) शत्रु सेना को छिन्न - भिन्न करने वाले को रहकवाल, रावल, रोहिल्ला, महाभट्ट कहा गया है। महाराज पृथ्वीराज चौहान की सेना में पांच गोत्रों के रावल थे - रावल - रोहिला रावल - सिन्धु रावल - घिलौत (गहलौत) रावल - काशव या कश्यप रावल - बलदया बल्द मुग़ल बादशाह अकबर ने भी बहादुरी की रोहिल्ला उपाधि को यथावत बनाए रखा जब अकबर की सेना दूसरे राज्यों को जीत कर आती थी तो अकबर अपनी सेना के सरदारों को,बहादुर जवानों बहादुरी के पदक (ख़िताब,उपाधि) देता था। एक बार जब महाराणा मान सिंह काबुल जीतकर वापिस आए तो अकबर ने उसके बाइस राजपूत सरदारों को यह ख़िताब दी (उपाधि से सम्मानित किया) बाई तेरा हर निरकाला रावत को - रावल जी चौमकिंग सरनाथा को - रावल झंड्कारा कांड्कड को - रोहिल्ला रावत मन्चारा - कांड्कड काम करन, निरकादास रावत को रावराज और रूहेलाल को रोहिला
गौरवशाली इतिहास के कुछ स्वर्णाक्षर (रोहिला क्षत्रिय) भारत वर्ष का क्षेत्रफल 42 ,02 ,500 वर्ग किमी था । रोहिला साम्राज्य 25 ,000 वर्ग किमी 10 ,000 वर्गमील में फैला हुआ था । रोहिला, राजपूतो का एक गोत्र , कबीला (परिवार) या परिजन- समूह है जो कठेहर - रोहिलखण्ड के शासक एंव संस्थापक थे |मध्यकालीन भारत में बहुत से राजपूत लडाको को रोहिला की उपाधि से विभूषित किया गया. उनके वंशज आज भी रोहिला परिवारों में पाए जाते हैं । रोहिले- राजपूत प्राचीन काल से ही सीमा- प्रांत, मध्य देश (गंगा- यमुना का दोआब), पंजाब, काश्मीर, गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश में शासन करते रहे हैं । जबकि मुस्लिम-रोहिला साम्राज्य अठारहवी शताब्दी में इस्लामिक दबाव के पश्चात् स्थापित हुआ. मुसलमानों ने इसे उर्दू में "रूहेलखण्ड" कहा । 1702 से 1720 ई तक रोहिलखण्ड में रोहिले राजपूतो का शासन था. जिसकी राजधानी बरेली थी । रोहिले राजपूतो के महान शासक "राजा इन्द्रगिरी" ने रोहिलखण्ड की पश्चिमी सीमा पर सहारनपुर में एक किला बनवाया,जिसे "प्राचीन रोहिला किला" कहा जाता है । सन 1801 ई में रोहिलखण्ड को अंग्रेजो ने अपने अधिकार में ले लिया था. हिन्दू रोहिले-राजपुत्रो द्वारा बनवाए गये इस प्राचीन रोहिला किला को 1806 से 1857 के मध्य कारागार में परिवर्तित कर दिया गया था । इसी प्राचीन- रोहिला- किला में आज सहारनपुर की जिला- कारागार है । "सहारन" राजपूतो का एक गोत्र है जो रोहिले राजपूतो में पाया जाता है. यह सूर्य वंश की एक प्रशाखा है जो राजा भरत के पुत्र तक्षक के वंशधरो से प्रचालित हुई थी । फिरोज तुगलक के आक्रमण के समय "थानेसर" (वर्तमान में हरियाणा में स्थित) का राजा "सहारन" ही था । दिल्ली में गुलाम वंश के समय रोहिलखण्ड की राजधानी "रामपुर" में राजा रणवीर सिंह कठेहरिया (काठी कोम, निकुम्भ वंश, सूर्यवंश रावी नदी के काठे से विस्थापित कठगणों के वंशधर) का शासन था । इसी रोहिले राजा रणवीर सिंह ने तुगलक के सेनापति नसीरुद्दीन चंगेज को हराया था. 'खंड' क्षत्रिय राजाओं से सम्बंधित है, जैसे भरतखंड, बुंदेलखंड, विन्धयेलखंड , रोहिलखंड, कुमायुखंड, उत्तराखंड आदि । प्राचीन भारत की केवल दो भाषाएँ संस्कृत व प्राकृत (सरलीकृत संस्कृत) थी । रोहिल प्राकृत और खंड संस्कृत के शब्द हैं जो क्षत्रिय राजाओं के प्रमाण हैं । इस्लामिक नाम है दोलताबाद, कुतुबाबाद, मुरादाबाद, जलालाबाद, हैदराबाद, मुबारकबाद, फैजाबाद, आदि । रोहिले राजपूतो की उपस्तिथि के प्रमाण हैं । योधेय गणराज्य के सिक्के, गुजरात का (1445 वि ) ' का शिलालेख (रोहिला मालदेव के सम्बन्ध में), मध्यप्रदेश में स्थित रोहिलखंड रामपुर में राजा रणवीर सिंह के किले के खंडहर, रानी तारादेवी सती का मंदिर , पीलीभीत में राठौर रोहिलो (महिचा- प्रशाखा) की सतियों के सतियों के मंदिर, सहारनपुर का प्राचीन रोहिला किला, मंडोर का शिलालेख, " बड़ौत में स्तिथ " राजा रणवीर सिंह रोहिला मार्ग "
नगरे नगरे ग्रामै ग्रामै विलसन्तु संस्कृतवाणी । सदने - सदने जन - जन बदने , जयतु चिरं कल्याणी ।। जोधपुर का शिलालेख, प्रतिहार शासक हरीशचंद्र को मिली रोहिल्लाद्व्यंक की उपाधि, कई अन्य राजपूतो के वंशो को प्राप्त उपाधियाँ, 'पृथ्वीराज रासो', आल्हाखण्ड - काव्यव, सभी राजपूत वंशो में पाए जाने वाले प्रमुख गोत्र । अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा भारत द्वारा प्रकाशित पावन ग्रन्थ क्षत्रिय वंशाणर्व (रोहिले क्षत्रियों का राज्य रोहिलखण्ड का पूर्व नाम पांचाल व मध्यप्रदेश), वर्तमान में अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा से अखिल भारतीय रो. क्ष. वि. परिषद को संबद्धता प्राप्त होना, वर्तमान में भी रोहिलखण्ड (संस्कृत भाषा में) क्षेत्र का नाम यथावत बने रहना, अंग्रेजो द्वारा भी उत्तर रेलवे को "रोहिलखण्ड - रेलवे" का नाम देना जो बरेली से देहरादून तक सहारनपुर होते हुए जाती थी, वर्तमान में लाखो की संख्या में पाए जाने वाले रोहिला-राजपूत, रोहिले-राजपूतों के सम्पूर्ण भारत में फैले हुए कई अन्य संगठन अखिल भारतीय स्तर पर 'राजपूत रत्न' रोहिला शिरोमणि डा. कर्णवीर सिंह द्वारा संगठित एक अखिल भारतीय रोहिला क्षत्रिय विकास परिषद (सम्बद्ध अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा) पंजीकरण संख्या - 545, आदि। 12. पानीपत की तीसरी लड़ाई (रोहिला वार) में रोहिले राजपूत- राजा गंगासहाय राठौर (महेचा) के नेतृत्व में मराठों की ओर से अफगान आक्रान्ता अहमदशाह अब्दाली व रोहिला पठान नजीबदौला के विरुद्ध लड़े व वीरगति पाई । इस मराठा युद्ध में लगभग एक हजार चार सौ रोहिले राजपूत वीरगति को प्राप्त हुए । (1761-1774 ई .) (इतिहास -रोहिला-राजपूत) 13. प्रथम स्वतंत्रता संग्राम 1857 में भी रोहिले राजपूतों ने अपना योगदान दिया, ग्वालियर के किले में रानी लक्ष्मीबाई को हजारों की संख्या में रोहिले राजपूत मिले, इस महायज्ञ में स्त्री पुरुष सभी ने अपने गहने धन आदि एकत्र कर झाँसी की रानी के साथ अंग्रेजो के विरुद्ध आवाज उठाने के लिए सम्राट बहादुरशाह- जफर तक पहुँचाए । अंग्रेजों ने ढूँढ-ढूँढ कर उन्हें काट डाला जिससे रोहिले राजपूतों ने अज्ञातवास की शरण ली। 14. राजपूतों की हार के प्रमुख कारण थे हाथियों का प्रयोग, सामंत प्रणाली व आपसी मतभेद, ऊँचे व भागीदार कुल का भेदभाव (छोटे व बड़े की भावना) आदि। 15. सम्वत 825 में बप्पा रावल चित्तौड़ से विधर्मियों को खदेड़ता हुआ ईरान तक गया। बप्पा रावल से समर सिंह तक 400 वर्ष होते हैं, गह्लौतों का ही शासन रहा। इनकी 24 शाखाएँ हैं। जिनके 16 गोत्र (बप्पा रावल के वंशधर) रोहिले राजपूतों में पाए जाते हैं। 16. चितौड़ के राणा समर सिंह (1193 ई.) की रानी पटना की राजकुमारी थी इसने 9 राजा, 1 रावत और कुछ रोहिले साथ लेकर मौ. गोरी के गुलाम कुतुबद्दीन का आक्रमण रोका और उसे ऐसी पराजय दी कि कभी उसने चितौड़ की ओर नही देखा। 17. रोहिला शब्द क्षेत्रजनित, गुणजनित व 'मूल पुरुष' नाम-जनित है। यह गोत्र जाटों में भी रूहेला, रोहेला, रूलिया, रूहेल , रूहिल, रूहिलान नामों से पाया जाता है। 18. रूहेला गोत्र जाटों में राजस्थान व उ. प्र. में पाया जाता है। रोहेला गोत्र के जाट जयपुर में बजरंग बिहार ओर ईनकम टैक्स कालोनी टौंक रोड में विद्यमान है। झुनझुन, सीकर, चुरू, अलवर, बाडमेर में भी रोहिला गोत्र के जाट विद्यमान हैं । उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले में रोहेला गोत्र के जाटों के बारह गाँव हैं। महाराष्ट्र में रूहिलान गोत्र के जाट वर्धा में केसर व खेड़ा गाँव में विद्यमान हैं। 19. मुगल सम्राट अकबर ने भी राजपूत राजाओं को विजय प्राप्त करने के पश्चात् रोहिला-उपाधि से विभूषित किया था, जैसे राव, रावत, महारावल, राणा, महाराणा, रोहिल्ला, रहकवाल आदि। 20. "रोहिला-राजपूत" समाज , क्षत्रियों का वह परिवार है जो सरल ह्रदयी, परिश्रमी,राष्ट्रप्रेमी,स्वधर्मपरायण, स्वाभिमानी व वर्तमान में अधिकांश अज्ञातवास के कारण साधनविहीन है। 40 प्रतिशत कृषि कार्य से,30 प्रतिशत श्रम के सहारे व 30 प्रतिशत व्यापार व लघु उद्योगों के सहारे जीवन यापन कर रहे हैं। इनके पूर्वजो ने हजारों वर्षों तक अपनी आन, मान, मर्यादा की रक्षा के लिए बलिदान दिए हैं और अनेको आक्रान्ताओं को रोके रखने में अपना सर्वस्व मिटाया है । गणराज्य व लोकतंत्रात्मक व्यवस्था को सजीव बनाये रखने की भावना के कारण वंश परंपरा के विरुद्ध रहे, करद राज्यों में भी स्वतंत्रता बनाये रखी । कठेहर रोहिलखण्ड की स्थापना से लेकर सल्तनत काल की उथल पुथल, मार काट , दमन चक्र तक लगभग आठ सौ वर्ष के शासन काल के पश्चात् 1857 के ग़दर के समय तक रोहिले राजपूतों ने राष्ट्रहित में बलिदान दिये हैं। क्रूर काल के झंझावालों से संघर्ष करते हुए क्षत्रियों का यह 'रोहिला परिवार' बिखर गया है, इस समाज की पहचान के लिए भी आज स्पष्टीकरण देना पड़ता है। कैसा दुर्भाग्य है? यह क्षत्रिय वर्ग का। जो अपनी पहचान को भी टटोलना पड़ रहा है। परन्तु समय के चक्र में सब कुछ सुरक्षित है। इतिहास के दर्पण में थिरकते चित्र, बोलते हैं, अतीत झाँकता है, सच सोचता है कि उसके होने के प्रमाण धुंधले-धुंधले से क्यों हैं? हे- क्षत्रिय तुम धन्य हो, पहचानो अपने प्रतिबिम्बों को' - "क्षत्रिय एकता का बिगुल फूँक सब धुंधला धुंधला छंटने दो। हो अखंड भारत के राजपुत्र खण्ड खण्ड में न सबको बंटने दो ।।" 21. रोहिलखण्ड से विस्थापित इन रोहिला परिवारों में राजपूत परम्परा के कुछ प्रमुख गोत्र इस प्रकार पाए जाते हैं :- 
रोहिला, रोहित, रोहिल, रावल, द्रोहिया, रल्हन, रूहिलान, रौतेला , रावत यौधेय, योतिक, जोहिया, झोझे, पेशावरी पुण्डीर, पांडला, पंढेर, पुन्ड़ेहार, पुंढीर, पुंडाया चौहान, जैवर, जौडा, चाहल, चावड़ा, खींची, गोगद, गदाइया, सनावर, क्लानियां, चिंगारा, चाहड बालसमंद, चोहेल, चेहलान, बालदा, बछ्स (वत्स), बछेर, चयद, झझोड, चौपट, खुम्ब, जांघरा, जंगारा, झांझड निकुम्भ, कठेहरिया, कठौरा, कठैत, कलुठान, कठपाल, कठेडिया, कठड, काठी, कठ, पालवार राठौर, महेचा, महेचराना, रतनौता, बंसूठ जोली, जोलिए, बांकटे, बाटूदा, थाथी, कपोलिया, खोखर, अखनौरिया ,लोहमढ़े, मसानिया बुन्देला, उमट, ऊमटवाल भारतवंशी, भारती, गनान नाभावंशी,बटेरिया, बटवाल, बरमटिया परमार, जावडा, लखमरा, मूसला, मौसिल, भौंसले, बसूक, जंदडा, पछाड़, पंवारखा, ढेड, मौन तोमर, तंवर, मुदगल, देहलीवाल, किशनलाल, सानयाल, सैन, सनाढय गहलौत, कूपट, पछाड़, थापा, ग्रेवाल, कंकोटक, गोद्देय, पापडा, नथैड़ा, नैपाली, लाठिवाल, पानिशप, पिसोण्ड, चिरडवाल, नवल, चरखवाल, साम्भा, पातलेय, पातलीय, छन्द (चंड), क्षुद्रक,(छिन्ड, इन्छड़, नौछड़क), रज्जडवाल, बोहरा, जसावत, गौर, मलक, मलिक, कोकचे, काक कछवाहा, कुशवाहा, कोकच्छ, ततवाल, बलद, मछेर सिसौदिया, भरोलिया, बरनवाल, बरनपाल, बहारा
खुमाहड, अवन्ट, ऊँटवाल 
सिकरवार, रहकवाल, रायकवार, ममड, गोदे सोलंकी, गिलानिया, भुन, बुन, बघेला, ऊन, (उनयारिया) बडगूजर, सिकरवार, ममड़ा, पुडिया कश्यप, काशब, रावल, रहकवाल यदु, मेव, छिकारा, तैतवाल, भैनिवाल, उन्हड़, भाटटी बनाफरे, जादो, बागड़ी, सिन्धु, कालड़ा, सारन, छुरियापेड, लखमेरिया, चराड, जाखड़, सेरावत, देसवाल, पूडिया प्रमुख रोहिला क्षत्रिय शासक अंगार सैन - गांधार (वैदिक काल) अश्वकरण - ईसा पूर्व 326 (मश्कावती दुर्ग) अजयराव - स्यालकोट (सौकंल दुर्ग) ईसा पूर्व 326 प्रचेता - मलेच्छ संहारक शाशिगुप्त - साइरस के समकालीन सुभाग सैन - मौर्य साम्राज्य के समकालीन राजाराम शाह - 929 वि. रामपुर रोहिलखण्ड बीजराज - रोहिलखण्ड करण चन्द्र - रोहिलखण्ड विग्रह राज - रोहिलखण्ड - गंगापार कर स्रुघ्न जनपद (सुगनापुर) यमुना तक विस्तार दसवीं शताब्दी में सरसावा में किले का निर्माण पश्चिमी सीमा पर, यमुना द्वारा ध्वस्त टीले के रूप में नकुड़ रोड पर देखा जा सकता है। सावन्त सिंह - रोहिलखण्ड जगमाल - रोहिलखण्ड धिंगतराव - रोहिलखण्ड गोंकुल सिंह - रोहिलखण्ड महासहाय - रोहिलखण्ड त्रिलोक चन्द - रोहिलखण्ड रणवीर सिंह - रोहिलखण्ड सुन्दर पाल - रोहिलखण्ड नौरंग देव - रोहिलखण्ड सूरत सिंह - रोहिलखण्ड हंसकरण रहकवाल - पृथ्वीराज के सेनापति मिथुन देव रायकवार - ईसम सिंह पुण्डीर के मित्र थाना भवन शासक सहकरण, विजयराव - उपरोक्त राजा हतरा - हिसार जगत राय - बरेली मुकंदराज - बरेली 1567 ई. बुधपाल - बदायुं महीचंद राठौर - बदायुं बांसदेव - बरेली बरलदेव - बरेली राजसिंह - बरेली परमादित्य - बरेली न्यादरचन्द - बरेली राजा सहारन - थानेश्वर प्रताप राव खींची (चौहान वंश) - गागरोन राणा लक्ष्य सिंह - सीकरी रोहिला मालदेव - गुजरात जबर सिंह - सोनीपत रामदयाल महेचराना - क्लामथ गंगसहाय - महेचराना - क्लामथ 1761 ई. राणा प्रताप सिंह - कौराली (गंगोह) 1095 ई. नानक चन्द - अल्मोड़ा राजा पूरणचन्द - बुंदेलखंड राजा हंस ध्वज - हिसार व राजा हरचंद राजा बसंतपाल - रोहिलखण्ड व्रतुसरदार, सामंत वृतपाल 1193 ई. महान सिंह बडगूजर - बागपत 1184 ई. राजा यशकरण - अंधली गुणाचन्द - जयकरण - चरखी - दादरी राजा मोहनपाल देव - करोली राजारूप सैन - रोपड़ राजा महपाल पंवार - जीन्द राजा परपदेड पुंडीर - लाहौर राजा लखीराव - स्यालकोट राजा जाजा जी तोमर - दिल्ली खड़ग सिंह - रोहिलखण्ड लौदी के समकालीन राजा हरि सिंह - खिज्रखां के दमन का शिकार हुआ - कुमायुं की पहाड़ियों में अज्ञातवास की शरण ली राजा इन्द्रगिरी (रोहिलखण्ड) (इन्द्रसेन) - सहारनपुर में प्राचीन रोहिला किला बनवाया । रोहिला क्षत्रिय वंश भास्कर लेखक आर. आर. राजपूत मुरसेन अलीगढ से प्रस्तुत राजा बुद्ध देव रोहिला - 1787 ई., सिंधिया व जयपुर के कछवाहो के खेड़ा व तुंगा के मैदान में हुए युद्ध का प्रमुख पात्र । (राय कुँवर देवेन्द्र सिंह जी राजभाट, तुंगा (राजस्थान)
रोहिल्ला उपाधि - शूरवीर, अदम्य - साहसी विशेष युद्ध कला में प्रवीण, उच्च कुलीन सेनानायको, और सामन्तों को उनके गुणों के अनुरूप क्षत्रिय वीरों को तदर्थ उपाधि से विभूषित किया जाता था - जैसे - रावत - महारावत, राणा, महाराणा, ठाकुर, नेगी, रावल, रहकवाल, रोहिल्ला, समरलछन्द, लखमीर,(एक लाख का नायक) आदि। इसी आधार पर उनके वंशज भी आजतक राजपूतों के सभी गोत्रों में पाए जाते हैं। "वभूव रोहिल्लद्व्यड्कों वेद शास्त्रार्थ पारग: । द्विज: श्री हरि चन्द्राख्य प्रजापति समो गुरू : ।।2।। ( बाउक का जोधपुर लेख ) - सन 837 ई. चैत्र सुदि पंचमी - हिंदी अर्थ - "वेद शास्त्र में पारंगत रोहिल्लाद्धि उपाधिधारी एक हरिश्चन्द्र नाम का ब्राह्मण था" जो प्रजापति के समान था हुआ ।।6।। ( गुज्जर गौरव मासिक पत्रिका - अंक 10, वर्ष ।।माह जौलाई 1991 पृष्ठ - 13) (राजपुताने का इतिहास पृष्ठ - 147) (इतिहास रोहिला - राजपूत पृष्ठ - 23) (प्राचीन भारत का इतिहास, राजपूत वंश, - कैलाश - प्रकाशन लखनऊ सन 1970 ई. पृष्ठ - 104 -105 - ) रोहिल्लद्व्यड्क रोहिल्लद्धि - अंक वाला या उपाधि वाला । सर्वप्रथम प्रतिहार शासक द्विज हरिश्चन्द्र को रोहिल्लद्धि उपाधि प्राप्त हुई । बाउक,प्रतिहार शासक विप्र हरिश्चन्द्र के पुत्र कवक और श्रीमति पदमनी का पुत्र था वह बड़ा पराक्रमी और नरसिंह वीर था। प्रतिहार एक पद है, किसी विशेष वर्ण का सूचक नही है। विप्र हरिश्चन्द्र प्रतिहार अपने बाहुबल से मांडौर दुर्ग की रक्षा करने वाला था, अदम्य साहस व अन्य किसी विशेष रोहिला शासक के प्रभावनुरूप ही रोहिल्लद्व्यड्क उपाधि को किसी आधार के बिना कोई भी व्यक्ति अपने नाम के साथ सम्बन्ध करने का वैधानिक रूप में अधिकारी नही हो सकता। उपरोक्त से स्पष्ट है कि बहुत प्राचीन काल से ही गुणकर्म के आधार पर क्षत्रिय उपाधि "रोहिल्ला" प्रयुक्त । प्रदत्त करने की वैधानिक व्यवस्था थी। जिसे हिन्दुआसूर्य - महाराजा पृथ्वीराज चौहान ने भी यथावत रखा। पृथ्वीराज चौहान की सेना में एक सौ रोहिल्ला - राजपूत सेना नायक थे । "पृथ्वीराज रासौ" - चहूँप्रान, राठवर, जाति पुण्डीर गुहिल्ला । बडगूजर पामार, कुरभ, जागरा, रोहिल्ला ।। इस कवित्त से स्पष्ट है । कि - प्राचीन - काल में रोहिला- क्षत्रियों का स्थान बहुत ऊँचा था। रोहिला रोहिल्ल आदि शब्द राजपुत्रों अथवा क्षत्रियों के ही द्योतक थे । इस कवित्त के प्रमाणिकता "आइने अकबरी", 'सुरजन चरिता' भी सिद्ध करते हैं । युद्ध में कमानी की तरह (रोह चढ़ाई करके) शत्रु सेना को छिन्न - भिन्न करने वाले को रहकवाल, रावल, रोहिल्ला, महाभट्ट कहा गया है। महाराज पृथ्वीराज चौहान की सेना में पांच गोत्रों के रावल थे - रावल - रोहिला रावल - सिन्धु रावल - घिलौत (गहलौत) रावल - काशव या कश्यप रावल - बलदया बल्द मुग़ल बादशाह अकबर ने भी बहादुरी की रोहिल्ला उपाधि को यथावत बनाए रखा जब अकबर की सेना दूसरे राज्यों को जीत कर आती थी तो अकबर अपनी सेना के सरदारों को,बहादुर जवानों बहादुरी के पदक (ख़िताब,उपाधि) देता था। एक बार जब महाराणा मान सिंह काबुल जीतकर वापिस आए तो अकबर ने उसके बाइस राजपूत सरदारों को यह ख़िताब दी (उपाधि से सम्मानित किया) बाई तेरा हर निरकाला रावत को - रावल जी चौमकिंग सरनाथा को - रावल झंड्कारा कांड्कड को - रोहिल्ला रावत मन्चारा - कांड्कड काम करन, निरकादास रावत को रावराज और रूहेलाल को रोहिला✍️संकलित द्वारा :-समय सिंह पुंडीर,राष्ट्रीय प्रवक्ता,क्षत्रिय अस्तित्व न्याय मोर्चा,आजीवन सदस्य अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा स्थापित१८९७ईस्वी भारत मुख्यालय दिल्ली, 🙏🌹🌷

ANCIENT HISTORY OF RAJPUTANA ROHILKHAND


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ROHILA KSHTRIYA/RAJPUT

 प्राचीन रोहिला क्षत्रिय राज वंश 
*रोहिला क्षत्रिय/राजपूत*

*वैववस्तु मनु से  आरंभ हुई, श्रीराम व  कृष्ण जिस kaalkhand  में है,ं सहस्त्राब्दियों पूर्व से भारत की पावन भूमि पर आज तक चली आ रही, क्षत्रिय vansho की अटूट परम्परा को प्रणाम करते हुए, एक राजन्य (राजपुत्र) ही जन्मप्रदत्त स्वतंत्रता की रक्षा के लिए   seemaoका sanrakshan karata Raha 


हिंदुकुश, रोहित-गिरि पंचनद तक भरत खण्ड की पश्चिम उत्तरीय सीमा के क्षत्रिय प्रहरियों का दीर्घ कालीन बड़ा संघर्ष ही भारत की संस्कृति व सभ्यता की रक्षा करता रहा है। आक्रमणकारियों के लिए रोहितगिरि का उत्तारापथ ही पूर्व काल से एक प्रवेष द्वारा था। सूर्य, चन्द्र और नागादि संज्ञक क्षत्रिय वंशो की* *शाखाओं प्रशाखाओं में बंटे महाजनपद गणराज्यों के शासक ही प्राचीन आर्य सभ्यता को मध्य* *एशिया तक प्रसारित करने में संघर्षरत थे। यह प्रसार क्रम कई द्वीपों तथा मध्य एषिया तक होता चला गया, जहाँ से उनका आना जाना बसना* *उजडना लगा रहता था। वर्तमान भारत में बिखरे पड़े हजारों षाखाओं व प्रषाखाओं में* *विभाजित करोड़ो संताने है जो सूर्य व* *चन्द्र वंष की दो समानान्तर विकसित सभ्यताओं के रूप में समूचे आर्यवर्त, हिमवर्ष व मध्यएषिया, अरब ईरान, मिश्र आदि तक फैल गये थे तथा अपने व अपने पूर्वजों, धर्मगुरूओं ओर वंष पुरोहितों, ऋषियों आदि के नाम पर अपने गणराज्य व ठिकाने स्थापित कर रहे थे*

*रोहिला शब्द भी इसी क्रम की एक*
 *अटूट कड़ी है प्रयाग के पास झूँसी में विकसित प्राचीन चन्द्रवंषी चक्रवर्ती* *सम्राट पुरूरवा व उसके वंशधरो में प्रख्यात सम्राट ययाति के पांच पुत्र पंचजन कहलाये और उनके पाँच जनपद स्थापित हुए। लगभग सात सहस्त्राब्दी पूर्व मध्य देश आर्यवर्त में विश्व की प्राचीनतम् सभ्यता विकसित हो रही थी, इलाहाबाद, (प्रयाग) के पास झूँसी में चन्द्रवंषी क्षत्रियों व कौशल (अयोध्या) में सूर्य वंशी इक्ष्वाकु के वंशधरो के राज्य खण्ड स्थापित हो रहे थे। उस काल की परम्परा के अनुसार जिस सम्राट के रथ का चक्र अनेक राज्यों में निशंक घूमता हो वह चक्रवर्ती सम्राटों की श्रेणी में मान्य होता था। वन गमन से पूर्व (वानप्रस्थ आश्रम) सम्राट ययाति ने अपने पाँच पुत्रों क्रमश यदु, तुर्वसु, द्रहृाू (उपनाम रोहू) पुरू और अनु के लिए अपने साम्राज्य को पांच भागों में विभक्त कर प्रत्येक पुत्र को अपने-अपने प्रदेशों के शासनाधिकार का उत्तरदायित्व सौंप दिया था*

1. *यदु- दक्षिण पश्चिम में केन-बेतुआ और चम्बल नदी के कांठो का प्रदेश दिया, कालान्तर में यदु के वंशधर यादव कहलाये*।

2. *तुर्वसु-कुरूष प्रदेष वर्तमान बघेल खण्ड तुर्वसु को प्राप्त हुआ, वहां कुरूषजनों को परास्त कर तुर्वसु वंष की स्थापना हुई*।

3. *द्रह्यु- चम्बल नदी के उत्तर पश्चिम, सिन्धु नदी के किनारे तथा यमुना नदी के पष्चिम पचनद (पंजाब) का पूरा प्रान्त द्रह्यु को मिला। द्रुह्यु के वष्ंाधर आगे चल कर उत्तर और पूरब में हिन्दु कुष तथा पामीर ओर पश्चिमोत्तर में वाल्हिक, हरअवती तक के विस्तुत क्षेत्रों पर अपना अधिकार स्थापित करते चले गए और वैदिक संस्कृति का प्रसार किया*।

4. *पुरू- पुरू को प्रतिष्ठान के राज्य सिंहासन पर आसीन किया गया, पुरू के वंष आगे चलकर पौरव कहलाए इसी वंष में भरत का जन्म हुआ, आर्यवर्त, हिमवर्ष, जम्बूद्वीप (मध्यप्रदेष-विन्घ्याचल से हिन्दुकुष रोहित गिरी तक) का नाम भरत खण्ड भारत वर्ष कहलाया*।

5. *अनु- यमुना नदी को पूरब* *और गंगा यमुना के मध्य का देष (दक्षिण पंचाल) तथा अयोध्या के पष्चिम के क्षेत्र अनु को प्राप्त हुए अनु के वंष घर आनव कहलाए*। 



*इस प्रकार चन्द वंश का विस्तार हुआ*।

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*आर्यवर्त की उत्तरी सीमा पर स्थित केकय देष भरत को उसकी माता कैकेयी के राज्य के कारण प्राप्त हुआ। भरत के दो पुत्रों तक्ष व पुष्कर ने क्रमषः तक्षषिला व पुष्करावती दो राजधानियां स्थापित की और आर्य संस्कृति को समृद्ध किया। उस काल में संस्कृत ही मातृभाशा थी*।



*भारत की पश्चिमि उत्तरीय सीमाओं पर जिस अवसर पर भी विदेशी आक्रमण हुए सूर्य वंशी भरत और चन्द्र वंशी द्रह्यु के वंशधरों ने मिल कर**
**प्रहरियों के अनुरूप अपना रक्त बहाया। ईसा से लगभग पाँच सौ वर्ष पूर्व से इस पर्वतीय प्रदेष में पचनद तक ‘कठ‘ गणराज्य, छुद्रक गणराज्य, यौधेय गणराज्य, मालव गणराज्य, अश्वक गणराज्य आदि फल फूल रहे थे। इनकी शासन प्रणाली गणतंत्रात्मक* *थी। यहाँ के निवासी सौंदर्यापासक थे और सुन्दर पुरुष ही राजा चुना जाता था। दु्रह्यु देश का नाम कालान्तर में द्रुह्यु के वंशज गंधारसैन के नाम पर गांधार और सूर्यवंषी राजाओं ने अपने शासित प्रदेष को ‘कपिष‘ के नाम से प्रसिद्ध कर काबुल (कुम्भा) नदी के पूर्वोत्तरीय क्षेत्र में अपनी राजधानी का नाम कपिषा रखा*

      *प्राचीन काल में कपिष (लडाकू, उदण्ड पर्वताश्रयी) और गान्धार की भाशा संस्कृत थी, किन्तु मध्यकाल से संस्कृत भाशा का विकृत सरलीकृत रूप ‘ प्राकृत‘ में परिवर्तित हो गया। भाषा के आधार पर यह स्पष्ट है कि इस प्रदेष में सहस्त्रों वर्ष तक भारतीय संस्कृति और सभ्यता स्थापित रही और इस समस्त प्रदेष में दीर्घ काल तक आर्य क्षत्रिय नरेषों का षासन रहा*।

      *अनेक पहाड़ियों (माल्यवत्त-रोहितगिरि-लोहितगिरि-हिन्दकाकेश्षस-रोहतांग आदि) नदियों (कुनार, स्वातु, गोमल, कुर्रम, सिन्धु की सहायक नदियाँ- सतलज, रावी, व्यास तथा घाटियों के कारण सामरिक दृष्टि से भी यह प्रदेष इन पर्वताश्रयी क्षत्रिय नरेषों के लिए महत्वपूर्ण था। यहाँ ठण्डी ऋतु जलवायु की दृष्टि से अति उत्तम रही। इसलिए यहां के निवासी बलिष्ठ, रक्तिम वर्ण (ललिमा चुक्त गोरा रंग) व कद काटी में मजबूब, हठी व गठीले होते रहे है। दुर्गम पहाड़ियों, नदियों व घाटियों के कारण यहां के निवासी पर्वताश्रयी, अश्वारोही थे। अश्वो के लिए प्रसिद्ध रहा यह प्रदेश रोहित गिरिये, रोहित नस्ल के अश्वों के व्यापार का प्रमुख केन्द्र था। क्रमषः *इसी कारण यह प्रदेष घोड़ों का प्रदेष अथवा अष्वकों का प्रदेश* *(अष्वकायन) कहलाता था*
**रोहित (संस्कृत), वर्तमान भाषा में लाल- भूरा रंग के घोड़े और श्येन नस्ल *के घोड़े पाए जाते थे। घोडों अथवा अष्वारोहण के बिना यहां जीवन* *सम्भव नहीं था। विदेषी* *आक्रमणों के समय अष्वों की प्रथम भूमिका थी। गहरे किसमिसी रंग के बहादुर घोड़ों को रोहित नाम से सम्बोधित किया जाता था*।
 *ईरानी व यूनानी विद्वानों के द्वारा भी इस प्रदेश के रोहित नस्ल के घोड़ों की प्रषन्सा की गई है*
* **इस प्रदेश के (महाजनपद) प्राचीन शासक (चन्द्रवंषी) द्रुह्यु का उपनाम भी रोहु था। इसलिए इसका नाम द्रुहयू का देश रोह देश रोहित गिरि रोह प्रदेश (अपभ्रनस होता चला* गया )हो जाना व्यावहारिक व स्वाभाविक था। *
*संस्कृत भाषा में रोह का अर्थ है- सीधे दृढ़-बल युक्त चढ़ना-अवरोहण करना, रक्तिम वर्ण (रोहित), पर्वत (माउण्टेन) इसलिए मध्यकाल तक ये पर्वताश्रयी* *क्षत्रिय शासक रोहित वर्ग से प्रसिद्ध हुए*। 
*पर्वतीय प्रदेश का नाम , रोहित प्रदेश*
  (प्रांकृत संस्कृत में) यहां सेनाओं की युद्ध प्रणाली रोहिल्ला युद्ध (रोहिला वार, लैटिन भाषा में) प्रणाली
 *सीधे दृढ़ बल युक्त पर्वत पर अवरोहण की तरह तीब्रता से शत्रु पर चढ़ जाना*
 *शत्रु सेना पर बाढ़ रोह की तरह, लाल* *होकर (रक्ति वर्ण क्रोधित आक्रोष युक्त) टूट पड़ना, तीब्रता से षत्रु सेना में घुस जाना। रोह (कमानी) के समान षत्रु सेना को भेदते, (काटते जाना) हुए चढ़ाई करना, प्रख्यात हुई* कालांतर में अनेक *क्षत्रिय सेनानायकों को , रोहिल्ला उपधि से विभूषित किया गया*। (मध्यकाल में)

‘‘धृतकौषिक मौद्गल्यौ आलम्यान परषरः।

सौपायनस्तथत्रिश्च वासुकी रोहित स्तथा।‘‘

(राष्ट्रधर्म-भाद्रपद 2067, सितम्बर 2010 के पृष्ठ 31 पर रोहित गोत्र का उपरोक्त श्लोक में वर्णन)

‘‘अरूषा रोहिता रथे बात जुता

वृषभस्यवते स्वतः‘‘ ।।10।।

(ऋग्वेद मण्डल 1, अ0 15 स्0 94 ‘‘ रोहिला क्षत्रियों का क्रमबद्ध इतिहासः पृष्ठ 42)



*मद्रान, रोहित कश्चैव, आगेयान, मालवान अपि गणन सर्वान, विनिजीत्य, प्रहसन्निव,। महाभारत वन पर्व 255-20 प्राचीन रोहित गिरि के नाम का अस्तित्व आज भी रोहतांग घाटी, रोहतांग दर्रानाम से अवस्थित है*।

*महाभारत के सभा पर्व में लोहित (रोहित) (संस्कृत शब्द) प्रदेश के दस मण्डलों का उल्लेख है जो भारत का उत्तर पूर्वी मध्यभाग था। श्री वासूदेव शरण अग्रवाल*

      ‘‘ *पाणिनि कालीन भारत वर्ष पृष्ठ 449 ‘‘ अश्येनस्य जवसा‘‘ वैदिक साहितय ऋग्वेद 1, अ0 17, मत्र 11, सुक्त 118-119 अर्थात- दृढ निश्चय के साथ (अश्येनस्य ) बाज पखेरू के समान (जवसा) तीव्र वेग के समान हम लोगो को आन मिली। (यह श्येन और रोहित नस्ल के घोडों की अश्व के रोहिला सेनाओं का वर्णन है*।)

  ‘‘ *उत्तरीय सीमा प्रान्त मे ंएक सुरम्य स्थानथा यहाँ का राजा क्षत्रिय था वह अपनी प्रजा को बहुत प्यार करता था, यहाँ विभिन्न प्रकार के अन्न व फलों के वृक्ष थे*
*यहां के निवासी भयानक थे तथा उनकी भाषा रूक्ष संस्कृत थी। ये रजत तथा ताम्र मुद्राओं का प्रयोग करते थे*
 *ये बहुत लडाकू तथा बहादूर थे यह क्षेत्र कुम्भा नदी के उत्तर पूर्व में 155 मील दूर था। ‘‘ एक प्रसिद्ध इतिहासकार टालेमी के अनुसार यह वर्णन चीन पागी युलान-च्वाड्डा ने किया। प्राचीन भारत का ऐतिहासिक भूगोल पृष्ठ 153-154 द्वारा श्री विमलचन्द्र लाहा (रोहिला क्षत्रिय क्रमबद्ध इतिहास से साभार‘‘) पाणिनी ने भी पश्चिमोत्तरीय सीमा प्रान्त के अश्वकायनों, अश्वकों, कठों, यादवों, छुद्रकों, मालवों निवासी सभी क्षत्रिय वर्गो को पर्वतीय और युद्धोपजीवि कहा है*।
#गांधार ( आज का अफगानिस्तान, अपगण स्थान,अथवा ऊपरी क्षेत्र आर्यन  प्रदेश आज का ईरान जहां क्षत्रिय से शासक थे ,के गणराज्यों का स्थान)
आपने महाभारत में #गांधारी का नाम तो सुना ही होगा.....लेकिन क्या आपको पता है कि उनका नाम गांधारी इसलिए था क्योकि वह गांधार देश की राजकुमारी थीं. आपको शायद पता ना हो लेकिन #शकुनी इसी जनपद का राजा था।
महाभारत के अनुसार भारत को मुख्‍यत: 16 जनपदों में स्थापित किया गया था. 
..इन्हीं जनपदों में से एक गांधार था।
महाभारत में हमको गांधार नरेश और गांधारी के होने से यह सबूत मिलता है. यह चंद्र वंशी चक्रवर्ती सम्राट ययाति के तीसरे पुत्र द्रह्यु के वंशज थे,। गांधार कभी भारत का सबसे खुशहाल राज्य या जनपद था. ..बड़े आयुर्वेद अस्पतालों के लिए यह जाना जाता था।आज के पाकिस्तान का पश्चिमी तथा अफगानिस्तान (अपगण स्थान) का पूर्वी क्षेत्र उस काल में भारत का गंधार प्रदेश था।भारत में घुसने के लिए यह एक दरवाजा था. गांधार देश द्रह्यु वंशी का द्रोह या रोह देश से ही अधिकतर व्यापारी भारत में घुसते थे। ईरान आर्यन प्रदेश था वहां आज भी पढ़ाया जाता है कि इस आर्यन प्रदेश में ईरान में आर्य समुदाय भारत से आया था,जबकि भारत में इसका उल्टा पढ़ाया जाता है जो झूठा इतिहास है क्षत्रिय विस्थापित हुए फैले प्रसार किया पुनः आते जाते रहे उसी क्रम को यहां उल्टा किया गया है। ईरान आर्यन प्रदेश था आज भी वहां की उड़ान का नाम आर्यन ही है।
#तक्षशिला जो महाभारत काल में गांधार प्रदेश की राजधानी थी। गांधार ही आज कंधार के नाम से जाना जाता है। जो अफगानिस्तान(अपगण स्थान)में मौजूद है।
हम कहाँ तक थे और आज केवल वर्तमान भारत तक सिकुड़ गए....
सिकंदर के आक्रमण के पश्चात चन्द्रगुप्त मौर्य ने 322 ईसा पूर्व में इस साम्राज्य की स्थापना की । 

सिकंदर जैसा कोई अन्य व्यक्ति भारत की ओर आंखें उठाकर देखने का फिर साहस न कर सके , इसलिए चंद्रगुप्त मौर्य और उनके गुरु चाणक्य ने भारत की पश्चिम की सीमाओं का गहनता से अध्ययन किया और अपने साम्राज्य को विशेष शक्ति संपन्न बनाकर उस ओर ही विस्तृत करने का सराहनीय, ऐतिहासिक और देशभक्ति पूर्ण कार्य किया।

 एक विशाल साम्राज्य खड़ा करके भारत की सीमाओं की सुरक्षा का तंत्र इन दोनों महान नायकों ने उस समय इतनी मजबूती से खड़ा किया कि अगले कई सौ वर्ष तक विदेशी आक्रमणकारी इस ओर झांक भी नहीं सके।

   उस समय भारत की एकता और अखंडता के लिए खतरा बने छोटे-छोटे राज्यों को इन दोनों इतिहास पुरुषों ने समाप्त कर विशाल साम्राज्य खड़ा करके भारत में राष्ट्रवाद की पुरानी परंपरा को सफलतापूर्वक स्थापित किया। 

    इन दोनों महापुरुषों के इस प्रयास से हमें इस भ्रम से बाहर निकलना चाहिए कि भारत में राष्ट्रवाद की भावना कभी नहीं रही और राष्ट्रीय एकता स्थापित करने में मुगलों या किसी अन्य विदेशी शक्ति सत्ता का विशेष योगदान रहा है। 

   इन दोनों के पुरूषार्थ से यह पता चलता है कि उन्होंने भारत के आर्य शासकों की पुरानी परंपरा को स्थापित कर भारत में चक्रवर्ती सम्राटों की परंपरा को आगे बढ़ाया।

       316 ईसा पूर्व तक मौर्यवंश ने पूरे उत्तरी पश्चिमी भारत पर अधिकार कर लिया था। 
तथा गणराज्यों क्षुद्रक ,कठ ,मालव  यौद्धेय आदि का एकीकरण करके सुदृढ़ साम्राज्य स्थापित किया।
चक्रवर्ती सम्राट अशोक के राज्य में मौर्यवंश का वृहद स्तर पर विस्तार हुआ। सम्राट अशोक के कारण ही मौर्य साम्राज्य सबसे महान एवं शक्तिशाली बनकर विश्वभर में प्रसिद्ध हुआ। 

      यद्यपि अशोक ने जिस प्रकार बौद्ध धर्म की अहिंसा को अपनाया, उससे भारतीय क्षत्रिय धर्म की परंपरा को क्षति भी उठानी पड़ी।
      *पर्वतीय (संस्कृत-हिन्दी), माउण्टेनीयर (लैटिन-अंगे्रजी), रोहित, रोहिते, रोहिले (संस्कृत ‘प्राकृत‘ - पश्तों) रोहिले-चढ़ने वाले, चढाई करने वाले अवरोही, अश्वारोही, द्रोही रोह रोहि पक्थजन , आदि समानार्थी शब्दों का सम्बन्ध प्राचीन क्षत्रिय वर्गोक्षत्रिय शासित क्षेत्रों ,पर्वतीय प्रदेशों (रोहितगिरि, रोहताग दर्रा, लोहित गिरि, कोकचा, पर्वत श्रेणी आदि)युद्ध प्रणालियों और नदी घाटी, काॅठो घोड़ों की पीठ पर (चढ़कर करने बहादुरी के साथ लडने वाले गुणों स्वभावों व क्षात्र धार्मो से है। भारतीय इतिहास में रोहिला- क्षत्रिय एक गौरवशाली वंश परम्परा है जिसमें कई प्राचीन क्षत्रिय वंशों के वंशज पाए जाते है। क्येांकि यह शब्द, क्षेत्रीयता (रोहिल देश, रोहित प्रदेश रोहित गिरि आदि द्रोह देश- रोह देश) गुणधर्म (रोहित-रक्तिम वर्ण) (कसमिसि लाल रंग) युद्ध प्रणाली (रोहिल्ला-युद्ध) (पूर्व वर्णित प्रणाली) उपाधि, बहादूीर, शौर्यपदक और क्षत्रिय सम्मान से जुडा है, इसलिए जो भी क्षत्रिय राजपुत्र इन सभी से सम्बन्धित रहा- रोहिला-क्षत्रिय अथवा रोहिल्ला राजपुत्र कहलाया गया। रोहिला-पठान इस्लामीकरण के पश्चात् की पक्भजनों , (क्षत्रिय) की आधुनिक वंश परम्परा है। जबकि क्रमशः रोहिला-क्षत्रिय पुरातन काल से भारतवर्ष में एक प्रहरी के रूप में विद्यमान रहे है*। 
*सहारनपुर के प्रख्यात साहित्यकार श्री कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर ने अपने पावन ग्रन्थ ‘‘ भगवान परशुराम‘‘ में भी रोहिल देश की चर्चा की है*।

      *प्रतिष्ठित ज्योतिषी एवं ग्रन्थकार डा. सुरेश चन्द्र मिश्र ने हिन्दुस्तान दैनिक‘‘ के रविवार 20 नवम्बर 2009 के मेरठ संस्करण के पृष्ठ-2 पर ‘‘ मूल गोत्र तालिका (40गोत्र) के क्रमांक छः पर क्षत्रिय गो़त्र रोहित का वर्णन किया है। वैदिक काल में पांच की वर्ग या समुदाय आर्य क्षत्रियों के थे जो मिलकर पंचजना-पंचजन कहे जाते थे। इनके सम्मिलित निर्णय को सभी लोग विवाद की दशा में मान लेते थे। इसी शब्द की परम्परा से आज पंचायत शब्द प्रचलित है। ये पांच वशं पुरूष या गोत्रकर्ता थे*।

  *यादव कुल पुरुष यदु, पौरव वंश पुरूष पुरू, द्रहयु वंश पुरूष द्रुहयु, तुर्वषु और आनववंश पुरूष अनु, से शेष अन्य समुदाय निकले थे*।









*क्षत्रिय वंश तालिका -14 (गंधार) वं. ता.-5*

     *इन्ही पांच वंशों के पुरूषों से महापंचायत बनती थी। प्रारम्भ में इन्हीं पंचजनों से लगभग 400 क्षत्रिय गोत्रों का प्रसार हुआ*

      *भारत की पष्चिमोत्तरीय सीमा पर विदेषी आक्रमण कारियों के आक्रमणों को विफल करने के लिए वहां के निवासी क्षत्रिय वर्गो एवं शासकों ने आरम्भ से ही प्रत्येक अवसर पर आक्रान्ताओं के विरूद्ध घोर संघर्ष किया किन्तु मैदानी षासकों की दुर्बल सीमान्त निति के कारण उन्हें किसी भी प्रकार की सहायता उपलब्ध हो सकी। इसलिए सीमान्त प्रदेष के वीर प्रहरी वर्ग इन प्रबल सुगठित आकान्ताअें की अपार शक्ति के सम्मूख लगभग पाँच सौ वर्षो से अधिक संघर्ष न कर सके और सिकन्दर के आक्रमण ईसा पूर्व लगभग 326 के पष्चात् से नदियाँ घाटियाँ, पर्वताश्रय पार करने लगे और मैदानी स्थानों की तरफ पूर्व व पूर्वोत्तर की तरफ आने लगे*
*(अध्याय-9) क्षत्रिय कुल ‘ काठी क्रम सं. 5*

      *पष्चिमोत्तरीय-सीमा प्रान्त पंजाब की जातियों व समुदायों का विवरण जो कि - स्व. सर डैंजिल लिबैट्रषन द्वारा पंजाब की जनगणना सन् 1883 और सर एडवर्ड मैकलेजन द्वारा पंजाब की जनगणना 1892 पर आधारित, सर .एच.ए. रोज द्वारा संकलित कोष है*
*इसमें रोहिला परिवारों* (राजपूत-क्लेन) का पर्याप्त विवरण है।
*संकलन एवम प्रस्तुति*
*समय सिंह पुंडीर*
*२२अगस्त २०१२*
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*विशेष नोट___*यहां प्रदर्शित सभी चित्र प्रतीकात्मक है जिनका लेखक से कोई संबंध नहीं है ये केवल पाठको  की रुचि वृद्धि हेतु नेट से लिए गए है ये सोसल मीडिया की संपत्ति है लेखक से कोई लेना देना नही है।।।

MAHARAJA, RANVEER SINGH ROHILA,THE BRAVE KING OF ROHILKHAND

🚩 राजपूताना कठेहर रोहिलखंड के अमर अपराजित योद्धा ,एक अजेय वीर 🚩
⚔️ सूर्यवंशी क्षत्रिय सम्राट ⚔️
महाराजा रणवीर सिंह रोहिला
25 अक्टूबर — स्वाभिमान दिवस
रक्षा बंधन — शौर्य एवं बलिदान दिवस
🌞 वंश एवं कुल परिचय 🌞
महाराजा रणवीर सिंह रोहिला भारत की प्राचीन गौरवशाली रघुवंशी सूर्यवंशी निकुंभ शाखा से संबंधित थे। यह वही तेजस्वी वंश है जिसकी परंपरा मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम तक जाती है।
📜 वंश परंपरा
वंश : रघुवंश
कुल : सूर्यवंश
शाखा : निकुंभ शाखा
गोत्र : वशिष्ठ
प्रवर : वशिष्ठ
वेद : यजुर्वेद
उपवेद : धनुर्वेद
सूत्र : गुभेल
देवता : भगवान विष्णु (रघुनाथ जी)
इष्टदेव : श्री रघुनाथ जी
कुलदेवी : चावड़ा माता
उद्घोष : हर हर महादेव
ध्वजा : गरुड़ ध्वज
झंडा : पंचरंगा ध्वज
नगाड़ा : रण गंजन
नदी : सरयू
गद्दी : अयोध्या
गुणधर्म : काठी (कठोर क्षात्र स्वभाव)
मूल क्षेत्र : रावी और व्यास नदियों के मध्य का “काठे” क्षेत्र
🛕 जन्म एवं परिवार
जन्म : 25 अक्टूबर 1204 ईस्वी
तिथि : कार्तिक मास, कृष्ण पक्ष, प्रथमा
संवत : 1261 विक्रमी
पिता : महाराजा त्रिलोक सिंह जी
बलिदान दिवस : श्रावण पूर्णिमा, रक्षा बंधन (1254 ईस्वी)
महाराजा रणवीर सिंह का जन्म उस काल में हुआ जब भारत पर विदेशी इस्लामिक आक्रमण तीव्र हो चुके थे और पृथ्वीराज चौहान के पश्चात राजपूत शक्ति अत्यंत कठिन दौर से गुजर रही थी।
ऐसे समय में कठेहर रोहिलखंड की भूमि पर एक ऐसा सूर्य उदित हुआ जिसने विदेशी सल्तनत के सामने कभी सिर नहीं झुकाया।
🏰 कठेहर रोहिलखंड राज्य की स्थापना
निकुंभ वंशी कठ क्षत्रियों का इतिहास अत्यंत प्राचीन माना जाता है।
ऐतिहासिक परंपराओं के अनुसार सिकंदर के आक्रमण काल में कठगण राज्य रावी क्षेत्र में विद्यमान था जिसकी राजधानी सांकल दुर्ग (वर्तमान स्यालकोट क्षेत्र) मानी जाती है।
समय के साथ यह वीर वंश—
➡️ राजस्थान
➡️ अलवर
➡️ मंगलगढ़
➡️ जैसलमेर
➡️ सौराष्ट्र-काठियावाड़
➡️ पांचाल एवं मध्यदेश
की ओर अग्रसर हुआ।
⚔️ काठियावाड़ एवं कठेहर की स्थापना
अलवर क्षेत्र में निकुंभ वंशी कठ क्षत्रियों ने दुर्ग निर्माण करवाए।
सौराष्ट्र में “काठियावाड़” की स्थापना की।
बाद में पांचाल क्षेत्र में “कठेहर रोहिलखंड राज्य” स्थापित किया।
🛡️ राज्य विस्तार
महाराजा रणवीर सिंह के पूर्वजों द्वारा स्थापित कठेहर रोहिलखंड राज्य का विस्तार—
गंगा-यमुना दोआब तक
पश्चिम में उत्तराखंड तक
उत्तर में नेपाल तराई तक
फैला हुआ था।
📍 प्रमुख क्षेत्र
पांचाल
मध्यदेश
कठेहर (रोहिलखंड)
🏛️ राजधानी
प्रारंभिक राजधानी : रामनगर (अहिक्षेत्र के समीप)
बाद की राजधानी : रामपुर
👑 वंशावली
रामपुर संस्थापक राजा रामशाह (राम सिंह) से लेकर महाराजा रणवीर सिंह तक वंश परंपरा इस प्रकार वर्णित है—
राजा रामशाह (909 ई.)
बीजयराज
करणचंद
विम्रहराज
सावंत सिंह
जगमाल
धिंगतराम
गोकुल सिंह
महासहाय
त्रिलोक सिंह
महाराजा रणवीर सिंह रोहिला
⚔️ महाराजा रणवीर सिंह का व्यक्तित्व
1225 ईस्वी में मात्र 21 वर्ष की आयु में महाराजा रणवीर सिंह का राजतिलक हुआ। उसी वर्ष उनका विवाह विजयपुर सीकरी की राजकुमारी महारानी तारा देवी से हुआ।
🔥 अद्भुत शौर्य
लगभग 7 फीट लंबा शरीर
60 सेर का लौह कवच
25 सेर की विशाल तलवार
125 सेर शारीरिक भार
अद्वितीय युद्ध कौशल
उनके साथ 84 अजेय कवचधारी राजपूत वीर रहते थे।
🗡️ दिल्ली सल्तनत से संघर्ष
महाराजा रणवीर सिंह ने—
✅ दिल्ली सल्तनत की सेनाओं को बार-बार पराजित किया
✅ रोहिलखंड को स्वतंत्र बनाए रखा
✅ राजपूत शक्तियों को संगठित किया
✅ विदेशी अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष जारी रखा
उनकी वीरता से दिल्ली सल्तनत तक भयभीत रहती थी।
🔥 1253 ईस्वी का महासंग्राम
दिल्ली सल्तनत के सेनापति नासिरुद्दीन महमूद (चंगेज) ने विशाल सेना के साथ रोहिलखंड पर आक्रमण किया।
रामपुर और पीलीभीत के मध्य हुए युद्ध में—
⚔️ 6000 रोहिला राजपूत
⚔️ 84 लौह कवचधारी वीर
ने दिल्ली सल्तनत की लगभग 30,000 सेना को धूल चटा दी।
इतिहास वर्णन करता है कि नासिरुद्दीन महमूद बंदी बना लिया गया था, किन्तु क्षात्र धर्म निभाते हुए महाराजा रणवीर सिंह ने उसे अभयदान देकर मुक्त कर दिया।
⚠️ विश्वासघात और अमर बलिदान
पराजित महमूद ने छल का सहारा लिया।
रक्षा बंधन के दिन जब सभी राजपूत शिव मंदिर में शस्त्र पूजन हेतु निःशस्त्र थे, तब विश्वासघात कर किले के द्वार खोल दिए गए।
⚔️ अंतिम युद्ध
निहत्थे होने के बावजूद राजपूत वीरों ने युद्ध किया
महाराजा रणवीर सिंह ने अकेले अनेक शत्रुओं का संहार किया
अंतिम रक्त बूंद तक लड़ते रहे
पीठ पर वार होने के बाद भी रणभूमि नहीं छोड़ी
श्रावण पूर्णिमा, रक्षा बंधन के दिन
महाराजा रणवीर सिंह रोहिला वीरगति को प्राप्त हुए।
🔥 महारानी तारा देवी का त्याग
महाराजा के बलिदान के पश्चात् महारानी तारा देवी सती हो गईं।
आज भी रामपुर क्षेत्र में किले के अवशेष, सती स्थल एवं ऐतिहासिक ध्वस्त टीले उस वीरगाथा के मौन साक्षी माने जाते हैं।
🚩 आज भी जीवित है यह गौरवगाथा
रोहिला क्षत्रिय समाज आज भी—
🔸 25 अक्टूबर
स्वाभिमान दिवस
🔸 रक्षा बंधन
शौर्य एवं बलिदान दिवस
के रूप में मनाता है।
इस दिन शस्त्र पूजन, वीर स्मरण और समाज जागरण कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।
📜 इतिहास का संदेश
महाराजा रणवीर सिंह रोहिला का जीवन हमें सिखाता है—
✅ धर्म रक्षा सर्वोपरि है
✅ स्वाभिमान पर समझौता नहीं
✅ संगठन ही शक्ति है
✅ विश्वासघात राष्ट्र का सबसे बड़ा शत्रु है
✅ क्षात्र धर्म त्याग और बलिदान की परंपरा है
⚔️ अमर उद्घोष ⚔️
🚩 जय राजपुताना — जय कठेहर रोहिलखंड 🚩
🌞 जय सूर्यवंश 🌞
🔱 हर हर महादेव 🔱

ROHILA KSHTRIYA, ANCIENT HISTORY


‘‘ क्षत्रिय इतिहास के कुछ धुंधले पृष्ठ ‘‘



वैववस्तु मनु से प्रारम्भ हुई, श्रीराम व श्रीकृश्ण आदि जिसके मध्य में है,ं सहस्त्राब्दियों पूर्व से भारत की पावन भूमि पर आज तक चली आ रही, क्षत्रिय वंषों की अटूट परम्परा को प्रणाम करते हुए, एक राजन्य (राजपुत्र) ही जन्मप्रदत्त स्वतंत्रता की रक्षा के लिए सदैव सीमाओं का संरक्षण करता आया है। हिन्दुकुष रोहित-गिरि पंचनद तक भरत खण्ड की परिष्चमोत्तरीय सीमा के क्षत्रिय प्रहरियों का दीर्घ कालीन विकट संघर्ष ही भारत की संस्कृति व सभ्यता की रक्षा करता रहा है। आक्रमणकारियों के लिए रोहितगिरि का उत्तारापथ ही पूर्व काल से एक प्रवेष द्वारा था। सूर्य, चन्द्र और नागादि संज्ञक क्षत्रिय वंषों की षाखाओं प्रषाखाओं में बंटे महाजनपद गणराज्यों के षासक ही प्राचीन आर्य सभ्यता को मध्य एषिया तक प्रसारित करने में संघर्षरत थे। यह प्रसार क्रम कई द्वीपों तथा मध्य एषिया तक होता चला गया, जहाँ से उनका आना जाना बसना उजडना लगा रहता था। वर्तमान भारत में बिखरे पड़े हजारों षाखाओं व प्रषाखाओं में विभाजित करोड़ो  संताने है जो सूर्य व चन्द्र वंष की दो समानान्तर विकसित सभ्यताओं के रूप में समूचे आर्यवर्त, हिमवर्ष व मध्यएषिया, अरब ईरान, मिश्र आदि तक फैल गये थे तथा अपने व अपने पूर्वजों, धर्मगुरूओं ओर वंष पुरोहितों, ऋषियों आदि के नाम पर अपने गणराज्य व ठिकाने स्थापित कर रहे थें। रोहिला षब्द भी इसी क्रम की एक अटूट कड़ी है। प्रयाग के पास झूँसी में विकसित प्राचीन चन्द्रवंषी चक्रवर्ती सम्राट पुरूरवा व उसके वंषधरो में प्रख्यात सम्राट ययाति के पांच पुत्र पंचजन कहलाये और उनके पाँच जनपद स्थापित हुए। लगभग सात सहस्त्राब्दी पूर्व मध्य देष आर्यवर्त में विष्व की प्राचीनतम् सभ्यता विकसित हो रही थी, इलाहाबाद, (प्रयाग) के पास झूँसी में चन्द्रवंषी क्षत्रियों व कौषल (अयोध्या) में सूर्य वंषी इक्ष्वाकु के वंषधरो के खण्ड स्थापित हो रहे थे। उस काल की परम्परा के अनुसार जिस सम्राट के रथ का चक्र अनेक राज्यों में निषंक घूमता हो वह चक्रवर्ती सम्राटों की श्रेणी में मान्य होता था। वन गमन से पूर्व (वानप्रस्थ आश्रम) सम्राट ययाति ने अपने पाँच पुत्रों क्रमषः यदु, तुर्वसु, द्रहृाू (उपनाम रोहू) पुरू और अनु के लिए अपने साम्राज्य को पांच भागों में विभक्त कर प्रत्येक पुत्र को अपने-अपने प्रदेषों के षासनाधिकार का उत्तरदायित्व सौंप दिया था।

1.            यदु- दक्षिण पष्चिम में केन-बेतुआ और चम्बल नदी के कांठो का प्रदेष दिया, कालान्तर में यदु के वंषधर यादव कहलाये।

2.            तुर्वसु-कुरूष प्रदेष वर्तमान बघेल खण्ड तुर्वसु को प्राप्त हुआ, वहां कुरूषजनों को परास्त कर तुर्वसु वंष की स्थापना हुई।

3.            द्रह्यु- चम्बल नदी के उत्तर पष्चिम, सिन्धु नदी के किनारे तथा यमुना नदी के पष्चिम पचनद (पंजाब) का पूरा प्रान्त द्रह्यु को मिला। द्रुह्यु के वष्ंाधर आगे चल कर उत्तर और पूरब में हिन्दु कुष तथा पामीर ओर पष्चिमोत्तर में वाल्हिक, हरअवती तक के विस्तुत क्षेत्रों पर अपना अधिकार स्थापित करते चले गए और वैदिक संस्कृति का प्रसार किया।

4.            पुरू- पुरू को प्रतिष्ठान के राज्य सिंहासन पर आसीन किया गया, पुरू के वंष आगे चलकर पौरव कहलाए इसी वंष में भरत का जन्म हुआ, आर्यवर्त, हिमवर्ष, जम्बूद्वीप (मध्यप्रदेष-विन्घ्याचल से हिन्दुकुष रोहित गिरी तक) का नाम भरत खण्ड भारत वर्ष कहलाया।

5.            अनु- यमुना नदी को पूरब और गंगा यमुना के मध्य का देष (दक्षिण पंचाल) तथा अयोध्या के पष्चिम के क्षेत्र अनु को प्राप्त हुए अनु के वंष घर आनव कहलाए। 



इस प्रकार चन्द वंष का विस्तार हुआ।



आर्यवर्त की उत्तरी सीमा पर स्थित केकय देष भरत को उसकी माता कैकेयी के राज्य के कारण प्राप्त हुआ। भरत के दो पुत्रों तक्ष व पुष्कर ने क्रमषः तक्षषिला व पुष्करावती दो राजधानियां स्थापित की और आर्य संस्कृति को समृद्ध किया। उस काल में संस्कृत ही मातृभाशा थी।



भारत की पष्चिमोत्तरीय सीमाओं पर जिस अवसर पर भी विदेषी आक्रमण हुए सूर्यवंषी भरत और चन्द्रवंषी द्रह्यु के वंषधरों ने मिल कर प्रहरियों के अनुरूप अपना रक्त बहाया। ईसा   से लगभग पाँच सौ वर्ष पूर्व से इस पर्वतीय प्रदेष में पचनद तक ‘कठ‘ गणराज्य, छुद्रक गणराज्य, यौधेय गणराज्य, मालव गणराज्य, अष्वक गणराज्य आदि फल फूल रहे थे। इनकी षासन प्रणाली गणतंत्रात्मक थी। यहाँ के निवासी सौंदर्यापासक थे और सुन्दर पुरूश ही राजा चुना जाता था। दु्रह्यु देष का नाम कालान्तर में द्रुह्यु के वंषराज गंधारसैन के नाम पर गांधार और सूर्यवंषी राजाओं ने अपने षासित प्रदेष को ‘कपिष‘ के नाम से प्रसिद्ध कर काबुल (कुम्भा) नदी के पूर्वोत्तरीय क्षेत्र में अपनी राजधानी का नाम कपिषा रखा।

      प्राचीन काल में कपिष (लडाकू, उदण्ड पर्वताश्रयी) और गान्धार की भाशा संस्कृत थी, किन्तु मध्यकाल से संस्कृत भाशा का विकृत सरलीकृत रूप ‘ प्राकृत‘ में परिवर्तित हो गया। भाषा के आधार पर यह स्पष्ट है कि इस प्रदेष में सहस्त्रों वर्ष तक भारतीय संस्कृति और सभ्यता स्थापित रही और इस समस्त प्रदेष में दीर्घ काल तक आर्य क्षत्रिय नरेषों का षासन रहा।

      अनेक पहाड़ियों (माल्यवत्त-रोहितगिरि-लोहितगिरि-हिन्दकाकेश्षस-रोहतांग आदि) नदियों (कुनार, स्वातु, गोमल, कुर्रम, सिन्धु की सहायक नदियाँ- सतलज, रावी, व्यास तथा घाटियों के कारण सामरिक दृष्टि से भी यह प्रदेष इन पर्वताश्रयी क्षत्रिय नरेषों के लिए महत्वपूर्ण था। यहाँ ठण्डी ऋतु जलवायु की दृष्टि से अति उत्तम रही। इसलिए यहां के निवासी बलिष्ठ, रक्तिम वर्ण (ललिमा चुक्त गोरा रंग) व कद काटी में मजबूब, हठी व गठीले होते रहे है। दुर्गम पहाड़ियों, नदियों व घाटियों के कारण यहां के निवासी पर्वताश्रयी, अष्वारोही थे। अष्वों के लिए प्रसिद्ध रहा यह प्रदेष रोहित गिरिये, रोहित नस्ल के अष्वों के व्यापार का प्रमुख केन्द्र था। क्रमषः इसी कारण यह प्रदेष घोड़ों का प्रदेष अथवा अष्वकों का प्रदेष (अष्वकायन) कहलाता था। रोहित (संस्कृत), वर्तमान भाषा में लाल- भूरा रंग के घोड़े और श्येन नस्ल के घोड़े पाए जाते थे। घोडों अथवा अष्वारोहण के बिना यहां जीवन सम्भव नहीं था। विदेषी आक्रमणों के समय अष्वों की प्रथम भूमिका थी। गहरे किसमिसी रंग के बहादुर घोड़ों को रोहित नाम से सम्बोधित किया जाता था। ईरानी व यूनानी विद्वानों के द्वारा भी इस प्रदेष के रोहित नस्ल के घोड़ों की प्रषन्सा की गई है। इस प्रदेष के (महाजनपद) प्राचीन षासक (चन्द्रवंषी) द्रुह्यु का उपनाम भी रोहु था। इसलिए इसका नाम द्रुहयू का देष, रोह देष, रोहित गिरि रोह प्रदेष (अपभं्रष होता चला गया), हो जाना व्यावहारिक व स्वाभाविक था। संस्कृत भाषा में रोह का अर्थ है- सीधे दृढ़-बल युक्त चढ़ना-अवरोहण करना, रक्तिम वर्ण (रोहित), पर्वत (माउण्टेन) इसलिए मध्यकाल तक ये पर्वताश्रयी क्षत्रिय षासक रोहित वर्ग से प्रसिद्ध हुए। पर्वतीय प्रदेष का नाम , रोहित प्रदेष (प्रांकृत संस्कृत में) यहां सेनाओं की युद्ध प्रणाली रोहिल्ला युद्ध (रोहिला वार, लैटिन भाषा में) प्रणाली सीधे दृढ़ बल युक्त पर्वत पर अवरोहण की तरह तीब्रता से षत्रु पर चढ़ जाना, षत्रु सेना पर बाढ़ रोह की तरह, लाल होकर (रक्ति वर्ण क्रोधित आक्रोष युक्त) टूट पड़ना, तीब्रता से षत्रु सेना में घुस जाना। रोह (कमानी) के समान षत्रु सेना को भेदते, (काटते जाना) हुए चढ़ाई करना, प्रख्यात हुई ओर अनेक क्षत्रिय सेनानायकों को , रोहिल्ला उपधि से विभूषित किया गया। (मध्यकाल में)

‘‘धृतकौषिक मौद्गल्यौ आलम्यान परषरः।

सौपायनस्तथत्रिश्च वासुकी रोहित स्तथा।‘‘

(राष्ट्रधर्म-भाद्रपद 2067, सितम्बर 2010 के पृष्ठ 31 पर रोहित गोत्र का उपरोक्त ष्लोक में वर्णन)

‘‘अरूषा रोहिता रथे बात जुता

वृषभस्यवते स्वतः‘‘ ।।10।।

(ऋग्वेद मण्डल 1, अ0 15 स्0 94 ‘‘ रोहिला क्षत्रियों का क्रमबद्ध इतिहासः पृष्ठ 42)



मद्रान, रोहित कश्चैव, आगेयान, मालवान अपि गणन सर्वान, विनिजीत्य, प्रहसन्निव,। महाभारत वन पर्व 255-20 प्राचीन रोहित गिरि के नाम का अस्तित्व आज भी रोहतांग घाटी, रोहतांग दर्रानाम से अवस्थित है।

महाभारत के सभा पर्व में लोहित (रोहित) (संस्कृत शब्द) प्रदेश के दस मण्डलों का उल्लेख है जो भारत का उत्तर पूर्वी मध्यभाग था। श्री वासूदेव शरण अग्रवाल

      ‘‘ पाणिनि कालीन भारत वर्ष पृष्ठ 449 ‘‘ अश्येनस्य जवसा‘‘ वैदिक साहितय ऋग्वेद 1, अ0 17, मत्र 11, सुक्त 118-119 अर्थात- दृढ निश्चय के साथ (अश्येनस्य ) बाज पखेरू के समान (जवसा) तीव्र वेग के समान हम लोगो को आन मिली। (यह श्येन और रोहित नस्ल के घोडों की अश्व के रोहिला सेनाओं का वर्णन है।)

  ‘‘ उत्तरीय सीमा प्रान्त मे ंएक सुरम्य स्थानथा यहाँ का राजा क्षत्रिय था वह अपनी प्रजा को बहुत प्यार करता था, यहाँ विभिन्न प्रकार के अन्न व फलों के वृक्ष थे। यहां के निवासी भयानक थे तथा उनकी भाषा रूक्ष संस्कृत थी। ये रजत तथा ताम्र मुद्राओं का प्रयोग करते थे। ये बहुत लडाकू तथा बहादूर थे यह क्षेत्र कुम्भा नदी के उत्तर पूर्व में 155 मील दूर था। ‘‘ एक प्रसिद्ध इतिहासकार टालेमी के अनुसार यह वर्णन चीन पागी युलान-च्वाड्डा ने किया। प्राचीन भारत का ऐतिहासिक भूगोल पृष्ठ 153-154 द्वारा श्री विमलचन्द्र लाहा (रोहिला क्षत्रिय क्रमबद्ध इतिहास से साभार‘‘) पाणिनी ने भी पश्चिमोत्तरीय सीमा प्रान्त के अश्वकायनों, अश्वकों, कठों, यादवों, छुद्रकों, मालवों निवासी सभी क्षत्रिय वर्गो को पर्वतीय और युद्धोपजीवि कहा है।

      पर्वतीय (संस्कृत-हिन्दी), माउण्टेनीयर (लैटिन-अंगे्रजी), रोहित, रोहिते, रोहिले (संस्कृत ‘प्राकृत‘ - पश्तों) रोहिले-चढ़ने वाले, चढाई करने वाले अवरोही, अश्वारोही, द्रोही रोह रोहि पक्थजन , आदि समानार्थी शब्दों का सम्बन्ध प्राचीन क्षत्रिय वर्गोक्षत्रिय शासित क्षेत्रों ,पर्वतीय प्रदेशों (रोहितगिरि, रोहताग दर्रा, लोहित गिरि, कोकचा, पर्वत श्रेणी आदि)युद्ध प्रणालियों और नदी घाटी, काॅठो घोड़ों की पीठ पर (चढ़कर करने बहादुरी के साथ लडने वाले गुणों स्वभावों व क्षात्र धार्मो से है। भारतीय इतिहास में रोहिला- क्षत्रिय एक गौरवशाली वंश परम्परा है जिसमें कई प्राचीन क्षत्रिय वंशों के  वंशज पाए जाते है। क्येांकि यह शब्द, क्षेत्रीयता (रोहिल देश, रोहित प्रदेश रोहित गिरि आदि द्रोह देश- रोह देश) गुणधर्म (रोहित-रक्तिम वर्ण) (कसमिसि लाल रंग) युद्ध प्रणाली (रोहिल्ला-युद्ध) (पूर्व वर्णित प्रणाली) उपाधि, बहादूीर, शौर्यपदक और क्षत्रिय सम्मान से जुडा है, इसलिए जो भी क्षत्रिय राजपुत्र इन सभी से सम्बन्धित रहा- रोहिला-क्षत्रिय अथवा रोहिल्ला राजपुत्र कहलाया गया। रोहिला-पठान इस्लामीकरण के पश्चात् की पक्भजनों , (क्षत्रिय) की आधुनिक वंश परम्परा है। जबकि क्रमशः रोहिला-क्षत्रिय पुरातन काल से भारतवर्ष में एक प्रहरी के रूप में विद्यमान रहे है। सहारनपुर के प्रख्यात साहित्यकार श्री कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर ने अपने पावन ग्रन्थ ‘‘ भगवान परशुराम‘‘ में भी रोहिल देश की चर्चा की है।

      प्रतिष्ठित ज्योतिषी एवं ग्रन्थकार डा. सुरेश चन्द्र मिश्र ने हिन्दुस्तान दैनिक‘‘ के रविवार 20 नवम्बर 2009 के मेरठ संस्करण के पृष्ठ-2 पर ‘‘ मूल गोत्र तालिका  (40गोत्र)  के क्रमांक छः पर क्षत्रिय गो़त्र रोहित का वर्णन किया है। वैदिक काल में पांच की वर्ग या समुदाय आर्य क्षत्रियों के थे जो मिलकर पंचजना-पंचजन कहे जाते थे। इनके सम्मिलित निर्णय को सभी लोग विवाद की दशा में मान लेते थे। इसी शब्द की परम्परा से आज पंचायत शब्द प्रचलित है। ये पांच वशं पुरूष या गोत्रकर्ता थे।

  यादव कुल पुरूष यदु, पौरव वंश पुरूष पुरू, द्रहयु वंश पुरूष द्रुहयु, तुर्वषु और आनववंश पुरूष अनु, से शेष अन्य समुदाय निकले थे।









क्षत्रिय वंश तालिका -14 (गंधार) वं. ता.-5

     इन्ही पांच वंशों के पुरूषों से महापंचायत बनती थी। प्रारम्भ में इन्हीं पंचजनों से लगभग 400 क्षत्रिय गोत्रों का प्रसार हुआ।

      भारत की पष्चिमोत्तरीय सीमा पर विदेषी आक्रमण कारियों के आक्रमणों को विफल करने के लिए वहां के निवासी क्षत्रिय वर्गो एवं शासकों  ने आरम्भ से ही प्रत्येक अवसर पर आक्रान्ताओं के विरूद्ध घोर संघर्ष किया किन्तु मैदानी षासकों की दुर्बल सीमान्त निति के कारण उन्हें किसी भी प्रकार की सहायता उपलब्ध हो सकी। इसलिए सीमान्त प्रदेष के वीर प्रहरी वर्ग इन प्रबल सुगठित आकान्ताअें की अपार शक्ति के सम्मूख लगभग पाँच सौ वर्षो से अधिक संघर्ष न कर सके और सिकन्दर के आक्रमण ईसा पूर्व लगभग 326 के पष्चात् से नदियाँ घाटियाँ, पर्वताश्रय पार करने लगे और मैदानी स्थानों की तरफ पूर्व व पूर्वोत्तर की तरफ आने लगे। (अध्याय-9) क्षत्रिय कुल ‘ काठी क्रम सं. 5

      पष्चिमोत्तरीय-सीमा प्रान्त पंजाब की जातियों व समुदायों का विवरण जो कि - स्व. सर डैंजिल लिबैट्रषन द्वारा पंजाब की जनगणना सन् 1883 और सर एडवर्ड मैकलेजन द्वारा पंजाब की जनगणना 1892 पर आधारित, सर .एच.ए. रोज द्वारा संकलित कोष है। इसमें रोहिला परिवारों (राजपूत-क्लेन) का पर्याप्त विवरण है।




*विशेष नोट__यहां प्रदर्शित सभी चित्र नेट द्वारा सोसल मीडिया से लिए गए है जो केवल प्रतीकात्मक रूप से पाठको को समझाने के उद्देश्य मात्र है इन पर लेखक का कोई हक नही।।

ANCIENT HISTORY OF RAJPUTANA ROHILKHAND

*प्राचीन रोहिला राजवंश*
*रोहिला क्षत्रिय/राजपूत*

वैववस्त मनु  से  प्रारंभ  हुई, , श्रीराम व  श्री कृष्ण जिस  कालखंड में है, सहस्राब्दियो पूर्व से भारत की पावन भूमि पर आज तक चली आ रही, क्षत्रिय वंशो की अटूट परम्परा को नमन करते हुए, एक राजन्य (राजपुत्र) ही जन्मसिद्ध स्वतंत्रता की रक्षा सदैव सीमाओ पर   KARTA AYA है हिंदुकुश रोहित-गिरि पंचनद तक भरत खण्ड की पश्चिमी उत्तरीय सीमा के क्षत्रिय प्रहरियों का दीर्घ कालीन विकट संघर्ष ही भारत की संस्कृति व सभ्यता की रक्षा करता रहा है। आक्रमणकारियों के लिए रोहितगिरि का उत्तारापथ ही पूर्व काल से एक  प्रवेश  द्वार  था। सूर्य, चन्द्र और नागादि संज्ञक क्षत्रिय वंशो की शाखाओं प्रशाखाओं में बंटे महाजनपद गणराज्यों के शासक ही प्राचीन आर्य सभ्यता को मध्य एशिया तक प्रसारित करने में संघर्षरत थे। यह प्रसार क्रम कई द्वीपों तथा मध्य एषिया तक होता चला गया, जहाँ से उनका आना जाना बसना उजडना लगा रहता था। वर्तमान भारत में बिखरे पड़े हजारों षाखाओं व प्रषाखाओं में विभाजित करोड़ो संताने है जो सूर्य व चन्द्र वंष की दो समानान्तर विकसित सभ्यताओं के रूप में समूचे आर्यवर्त, हिमवर्ष व मध्यएषिया, अरब ईरान, मिश्र आदि तक फैल गये थे तथा अपने व अपने पूर्वजों, धर्मगुरूओं ओर  वंश पुरोहितों, ऋषियों आदि के नाम पर अपने गणराज्य व ठिकाने स्थापित कर रहे थे।।

रोहिला शब्द भी इसी क्रम की एक
 अटूट कड़ी है प्रयाग के पास झूँसी में विकसित प्राचीन चन्द्रवंषी चक्रवर्ती सम्राट पुरूरवा व उसके वंशधरो में प्रख्यात सम्राट ययाति के पांच पुत्र पंचजन कहलाये और उनके पाँच जनपद स्थापित हुए। लगभग सात सहस्त्राब्दी पूर्व मध्य देश आर्यवर्त में विश्व की प्राचीनतम् सभ्यता विकसित हो रही थी, इलाहाबाद, (प्रयाग) के पास झूँसी में चन्द्रवंषी क्षत्रियों व कौशल (अयोध्या) में सूर्य वंशी इक्ष्वाकु के वंशधरो के राज्य खण्ड स्थापित हो रहे थे। उस काल की परम्परा के अनुसार जिस सम्राट के रथ का चक्र अनेक राज्यों में निशंक घूमता हो वह चक्रवर्ती सम्राटों की श्रेणी में मान्य होता था। वन गमन से पूर्व (वानप्रस्थ आश्रम) सम्राट ययाति ने अपने पाँच पुत्रों क्रमश यदु, तुर्वसु, द्रहृाू (उपनाम रोहू) पुरू और अनु के लिए अपने साम्राज्य को पांच भागों में विभक्त कर प्रत्येक पुत्र को अपने-अपने प्रदेशों के शासनाधिकार का उत्तरदायित्व सौंप दिया था*

1. *यदु- दक्षिण पश्चिम में केन-बेतुआ और चम्बल नदी के कांठो का प्रदेश दिया, कालान्तर में यदु के वंशधर यादव कहलाये*।

2. *तुर्वसु-कुरूष प्रदेष वर्तमान बघेल खण्ड तुर्वसु को प्राप्त हुआ, वहां कुरूषजनों को परास्त कर तुर्वसु वंष की स्थापना हुई*।

3. *द्रह्यु- चम्बल नदी के उत्तर पश्चिम, सिन्धु नदी के किनारे तथा यमुना नदी के पष्चिम पचनद (पंजाब) का पूरा प्रान्त द्रह्यु को मिला। द्रुह्यु के वष्ंाधर आगे चल कर उत्तर और पूरब में हिन्दु कुष तथा पामीर ओर पश्चिमोत्तर में वाल्हिक, हरअवती तक के विस्तुत क्षेत्रों पर अपना अधिकार स्थापित करते चले गए और वैदिक संस्कृति का प्रसार किया*।

4. *पुरू- पुरू को प्रतिष्ठान के राज्य सिंहासन पर आसीन किया गया, पुरू के वंष आगे चलकर पौरव कहलाए इसी वंष में भरत का जन्म हुआ, आर्यवर्त, हिमवर्ष, जम्बूद्वीप (मध्यप्रदेष-विन्घ्याचल से हिन्दुकुष रोहित गिरी तक) का नाम भरत खण्ड भारत वर्ष कहलाया*।

5. *अनु- यमुना नदी को पूरब* *और गंगा यमुना के मध्य का देष (दक्षिण पंचाल) तथा अयोध्या के पष्चिम के क्षेत्र अनु को प्राप्त हुए अनु के वंष घर आनव कहलाए*। 



*इस प्रकार चन्द वंश का विस्तार हुआ*।



*आर्यवर्त की उत्तरी सीमा पर स्थित केकय देष भरत को उसकी माता कैकेयी के राज्य के कारण प्राप्त हुआ। भरत के दो पुत्रों तक्ष व पुष्कर ने क्रमषः तक्षषिला व पुष्करावती दो राजधानियां स्थापित की और आर्य संस्कृति को समृद्ध किया। उस काल में संस्कृत ही मातृभाशा थी*।



*भारत की पश्चिमि उत्तरीय सीमाओं पर जिस अवसर पर भी विदेशी आक्रमण हुए सूर्य वंशी भरत और चन्द्र वंशी द्रह्यु के वंशधरों ने मिल कर**
**प्रहरियों के अनुरूप अपना रक्त बहाया। ईसा से लगभग पाँच सौ वर्ष पूर्व से इस पर्वतीय प्रदेष में पचनद तक ‘कठ‘ गणराज्य, छुद्रक गणराज्य, यौधेय गणराज्य, मालव गणराज्य, अश्वक गणराज्य आदि फल फूल रहे थे। इनकी शासन प्रणाली गणतंत्रात्मक* *थी। यहाँ के निवासी सौंदर्यापासक थे और सुन्दर पुरुष ही राजा चुना जाता था। दु्रह्यु देश का नाम कालान्तर में द्रुह्यु के वंशज गंधारसैन के नाम पर गांधार और सूर्यवंषी राजाओं ने अपने शासित प्रदेष को ‘कपिष‘ के नाम से प्रसिद्ध कर काबुल (कुम्भा) नदी के पूर्वोत्तरीय क्षेत्र में अपनी राजधानी का नाम कपिषा रखा*

      *प्राचीन काल में कपिष (लडाकू, उदण्ड पर्वताश्रयी) और गान्धार की भाशा संस्कृत थी, किन्तु मध्यकाल से संस्कृत भाशा का विकृत सरलीकृत रूप ‘ प्राकृत‘ में परिवर्तित हो गया। भाषा के आधार पर यह स्पष्ट है कि इस प्रदेष में सहस्त्रों वर्ष तक भारतीय संस्कृति और सभ्यता स्थापित रही और इस समस्त प्रदेष में दीर्घ काल तक आर्य क्षत्रिय नरेषों का षासन रहा*।

      *अनेक पहाड़ियों (माल्यवत्त-रोहितगिरि-लोहितगिरि-हिन्दकाकेश्षस-रोहतांग आदि) नदियों (कुनार, स्वातु, गोमल, कुर्रम, सिन्धु की सहायक नदियाँ- सतलज, रावी, व्यास तथा घाटियों के कारण सामरिक दृष्टि से भी यह प्रदेष इन पर्वताश्रयी क्षत्रिय नरेषों के लिए महत्वपूर्ण था। यहाँ ठण्डी ऋतु जलवायु की दृष्टि से अति उत्तम रही। इसलिए यहां के निवासी बलिष्ठ, रक्तिम वर्ण (ललिमा चुक्त गोरा रंग) व कद काटी में मजबूब, हठी व गठीले होते रहे है। दुर्गम पहाड़ियों, नदियों व घाटियों के कारण यहां के निवासी पर्वताश्रयी, अश्वारोही थे। अश्वो के लिए प्रसिद्ध रहा यह प्रदेश रोहित गिरिये, रोहित नस्ल के अश्वों के व्यापार का प्रमुख केन्द्र था। क्रमषः *इसी कारण यह प्रदेष घोड़ों का प्रदेष अथवा अष्वकों का प्रदेश* *(अष्वकायन) कहलाता था*
**रोहित (संस्कृत), वर्तमान भाषा में लाल- भूरा रंग के घोड़े और श्येन नस्ल *के घोड़े पाए जाते थे। घोडों अथवा अष्वारोहण के बिना यहां जीवन* *सम्भव नहीं था। विदेषी* *आक्रमणों के समय अष्वों की प्रथम भूमिका थी। गहरे किसमिसी रंग के बहादुर घोड़ों को रोहित नाम से सम्बोधित किया जाता था*।
 *ईरानी व यूनानी विद्वानों के द्वारा भी इस प्रदेश के रोहित नस्ल के घोड़ों की प्रषन्सा की गई है*
* **इस प्रदेश के (महाजनपद) प्राचीन शासक (चन्द्रवंषी) द्रुह्यु का उपनाम भी रोहु था। इसलिए इसका नाम द्रुहयू का देश रोह देश रोहित गिरि रोह प्रदेश (अपभ्रनस होता चला* गया )हो जाना व्यावहारिक व स्वाभाविक था। *
*संस्कृत भाषा में रोह का अर्थ है- सीधे दृढ़-बल युक्त चढ़ना-अवरोहण करना, रक्तिम वर्ण (रोहित), पर्वत (माउण्टेन) इसलिए मध्यकाल तक ये पर्वताश्रयी* *क्षत्रिय शासक रोहित वर्ग से प्रसिद्ध हुए*। 
*पर्वतीय प्रदेश का नाम , रोहित प्रदेश*
  (प्रांकृत संस्कृत में) यहां सेनाओं की युद्ध प्रणाली रोहिल्ला युद्ध (रोहिला वार, लैटिन भाषा में) प्रणाली
 *सीधे दृढ़ बल युक्त पर्वत पर अवरोहण की तरह तीब्रता से शत्रु पर चढ़ जाना*
 *शत्रु सेना पर बाढ़ रोह की तरह, लाल* *होकर (रक्ति वर्ण क्रोधित आक्रोष युक्त) टूट पड़ना, तीब्रता से षत्रु सेना में घुस जाना। रोह (कमानी) के समान षत्रु सेना को भेदते, (काटते जाना) हुए चढ़ाई करना, प्रख्यात हुई* कालांतर में अनेक *क्षत्रिय सेनानायकों को , रोहिल्ला उपधि से विभूषित किया गया*। (मध्यकाल में)

‘‘धृतकौषिक मौद्गल्यौ आलम्यान परषरः।

सौपायनस्तथत्रिश्च वासुकी रोहित स्तथा।‘‘

(राष्ट्रधर्म-भाद्रपद 2067, सितम्बर 2010 के पृष्ठ 31 पर रोहित गोत्र का उपरोक्त श्लोक में वर्णन)

‘‘अरूषा रोहिता रथे बात जुता

वृषभस्यवते स्वतः‘‘ ।।10।।

(ऋग्वेद मण्डल 1, अ0 15 स्0 94 ‘‘ रोहिला क्षत्रियों का क्रमबद्ध इतिहासः पृष्ठ 42)



*मद्रान, रोहित कश्चैव, आगेयान, मालवान अपि गणन सर्वान, विनिजीत्य, प्रहसन्निव,। महाभारत वन पर्व 255-20 प्राचीन रोहित गिरि के नाम का अस्तित्व आज भी रोहतांग घाटी, रोहतांग दर्रानाम से अवस्थित है*।

*महाभारत के सभा पर्व में लोहित (रोहित) (संस्कृत शब्द) प्रदेश के दस मण्डलों का उल्लेख है जो भारत का उत्तर पूर्वी मध्यभाग था। श्री वासूदेव शरण अग्रवाल*

      ‘‘ *पाणिनि कालीन भारत वर्ष पृष्ठ 449 ‘‘ अश्येनस्य जवसा‘‘ वैदिक साहितय ऋग्वेद 1, अ0 17, मत्र 11, सुक्त 118-119 अर्थात- दृढ निश्चय के साथ (अश्येनस्य ) बाज पखेरू के समान (जवसा) तीव्र वेग के समान हम लोगो को आन मिली। (यह श्येन और रोहित नस्ल के घोडों की अश्व के रोहिला सेनाओं का वर्णन है*।)

  ‘‘ *उत्तरीय सीमा प्रान्त मे ंएक सुरम्य स्थानथा यहाँ का राजा क्षत्रिय था वह अपनी प्रजा को बहुत प्यार करता था, यहाँ विभिन्न प्रकार के अन्न व फलों के वृक्ष थे*
*यहां के निवासी भयानक थे तथा उनकी भाषा रूक्ष संस्कृत थी। ये रजत तथा ताम्र मुद्राओं का प्रयोग करते थे*
 *ये बहुत लडाकू तथा बहादूर थे यह क्षेत्र कुम्भा नदी के उत्तर पूर्व में 155 मील दूर था। ‘‘ एक प्रसिद्ध इतिहासकार टालेमी के अनुसार यह वर्णन चीन पागी युलान-च्वाड्डा ने किया। प्राचीन भारत का ऐतिहासिक भूगोल पृष्ठ 153-154 द्वारा श्री विमलचन्द्र लाहा (रोहिला क्षत्रिय क्रमबद्ध इतिहास से साभार‘‘) पाणिनी ने भी पश्चिमोत्तरीय सीमा प्रान्त के अश्वकायनों, अश्वकों, कठों, यादवों, छुद्रकों, मालवों निवासी सभी क्षत्रिय वर्गो को पर्वतीय और युद्धोपजीवि कहा है*।

      *पर्वतीय (संस्कृत-हिन्दी), माउण्टेनीयर (लैटिन-अंगे्रजी), रोहित, रोहिते, रोहिले (संस्कृत ‘प्राकृत‘ - पश्तों) रोहिले-चढ़ने वाले, चढाई करने वाले अवरोही, अश्वारोही, द्रोही रोह रोहि पक्थजन , आदि समानार्थी शब्दों का सम्बन्ध प्राचीन क्षत्रिय वर्गोक्षत्रिय शासित क्षेत्रों ,पर्वतीय प्रदेशों (रोहितगिरि, रोहताग दर्रा, लोहित गिरि, कोकचा, पर्वत श्रेणी आदि)युद्ध प्रणालियों और नदी घाटी, काॅठो घोड़ों की पीठ पर (चढ़कर करने बहादुरी के साथ लडने वाले गुणों स्वभावों व क्षात्र धार्मो से है। भारतीय इतिहास में रोहिला- क्षत्रिय एक गौरवशाली वंश परम्परा है जिसमें कई प्राचीन क्षत्रिय वंशों के वंशज पाए जाते है। क्येांकि यह शब्द, क्षेत्रीयता (रोहिल देश, रोहित प्रदेश रोहित गिरि आदि द्रोह देश- रोह देश) गुणधर्म (रोहित-रक्तिम वर्ण) (कसमिसि लाल रंग) युद्ध प्रणाली (रोहिल्ला-युद्ध) (पूर्व वर्णित प्रणाली) उपाधि, बहादूीर, शौर्यपदक और क्षत्रिय सम्मान से जुडा है, इसलिए जो भी क्षत्रिय राजपुत्र इन सभी से सम्बन्धित रहा- रोहिला-क्षत्रिय अथवा रोहिल्ला राजपुत्र कहलाया गया। रोहिला-पठान इस्लामीकरण के पश्चात् की पक्भजनों , (क्षत्रिय) की आधुनिक वंश परम्परा है। जबकि क्रमशः रोहिला-क्षत्रिय पुरातन काल से भारतवर्ष में एक प्रहरी के रूप में विद्यमान रहे है*। 
*सहारनपुर के प्रख्यात साहित्यकार श्री कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर ने अपने पावन ग्रन्थ ‘‘ भगवान परशुराम‘‘ में भी रोहिल देश की चर्चा की है*।

      *प्रतिष्ठित ज्योतिषी एवं ग्रन्थकार डा. सुरेश चन्द्र मिश्र ने हिन्दुस्तान दैनिक‘‘ के रविवार 20 नवम्बर 2009 के मेरठ संस्करण के पृष्ठ-2 पर ‘‘ मूल गोत्र तालिका (40गोत्र) के क्रमांक छः पर क्षत्रिय गो़त्र रोहित का वर्णन किया है। वैदिक काल में पांच की वर्ग या समुदाय आर्य क्षत्रियों के थे जो मिलकर पंचजना-पंचजन कहे जाते थे। इनके सम्मिलित निर्णय को सभी लोग विवाद की दशा में मान लेते थे। इसी शब्द की परम्परा से आज पंचायत शब्द प्रचलित है। ये पांच वशं पुरूष या गोत्रकर्ता थे*।

  *यादव कुल पुरुष यदु, पौरव वंश पुरूष पुरू, द्रहयु वंश पुरूष द्रुहयु, तुर्वषु और आनववंश पुरूष अनु, से शेष अन्य समुदाय निकले थे*।









*क्षत्रिय वंश तालिका -14 (गंधार) वं. ता.-5*

     *इन्ही पांच वंशों के पुरूषों से महापंचायत बनती थी। प्रारम्भ में इन्हीं पंचजनों से लगभग 400 क्षत्रिय गोत्रों का प्रसार हुआ*

      *भारत की पष्चिमोत्तरीय सीमा पर विदेषी आक्रमण कारियों के आक्रमणों को विफल करने के लिए वहां के निवासी क्षत्रिय वर्गो एवं शासकों ने आरम्भ से ही प्रत्येक अवसर पर आक्रान्ताओं के विरूद्ध घोर संघर्ष किया किन्तु मैदानी षासकों की दुर्बल सीमान्त निति के कारण उन्हें किसी भी प्रकार की सहायता उपलब्ध हो सकी। इसलिए सीमान्त प्रदेष के वीर प्रहरी वर्ग इन प्रबल सुगठित आकान्ताअें की अपार शक्ति के सम्मूख लगभग पाँच सौ वर्षो से अधिक संघर्ष न कर सके और सिकन्दर के आक्रमण ईसा पूर्व लगभग 326 के पष्चात् से नदियाँ घाटियाँ, पर्वताश्रय पार करने लगे और मैदानी स्थानों की तरफ पूर्व व पूर्वोत्तर की तरफ आने लगे*
*(अध्याय-9) क्षत्रिय कुल ‘ काठी क्रम सं. 5*

      *पष्चिमोत्तरीय-सीमा प्रान्त पंजाब की जातियों व समुदायों का विवरण जो कि - स्व. सर डैंजिल लिबैट्रषन द्वारा पंजाब की जनगणना सन् 1883 और सर एडवर्ड मैकलेजन द्वारा पंजाब की जनगणना 1892 पर आधारित, सर .एच.ए. रोज द्वारा संकलित कोष है*


हमारी गौरवशाली संस्कृति में सबसे गौरवशाली नाम और वैदिक नाम आर्य है, किंतु दुर्भाग्य से बहुत से लोग आर्य शब्द से नफरत करते हैं और तथाकथित मनुष्यों द्वारा दिए गए नाम को मानते हैं। 
यहां वैदिक और लौकिक ग्रंथों से 'आर्य' शब्द के कुछ प्रमाण दिए जा रहे हैं 

१) ऋग्वेद में :-
"कृण्वन्तो विश्वमार्यम ।"
      सारे संसार को 'आर्य' बनाओ, श्रेष्ठ बनाओ ।
२) मनुस्मृति में :-
"मद्द मांसा पराधेषु गाम्या पौराः न लिप्तकाः ।
आर्या ते च निमद्यन्ते सदार्यावर्त्त वासिनः ।।"
     वे ग्राम व नगरवासी, जो मद्द, मांस और अपराधों में लिप्त न हों तथा सदा से आर्यावर्त्त के निवासी हैं, वे 'आर्य' कहे जाते हैं ।
३) वाल्मिकी रामायण में :-
"सर्वदा मिगतः सदिशः समुद्र इव सिन्धुभिः ।
आर्य सर्व समश्चैव व सदैवः प्रिय दर्शनः ।।"
     (बालकाण्ड)
      जिस प्रकार नदियाँ समुद्र के पास जाती है, उसी प्रकार जो सज्जनों के लिए सुलभ हैं, वे 'आर्य' हैं, जो सब पर समदृष्टि रखते हैं, हमेशा प्रसन्नचित्त रहते हैं ।
४) महाभारत में :-
"न वैर मुद्दीपयति प्रशान्त,न दर्पयासे हति नास्तिमेति ।
न दुगेतोपीति करोव्य कार्य,तमार्य शीलं परमाहुरार्या ।।"
     (उद्योग पर्व)
     जो अकारण किसी से वैर नहीं करते तथा गरीब होने पर भी कुकर्म नहीं करते, उन शील पुरुषों को 'आर्य' कहते हैं ।
५) वशिष्ठ स्मृति में :-
"कर्त्तव्यमाचरन काम कर्त्तव्यमाचरन ।
तिष्ठति प्रकृताचारे यः स आर्य स्मृतः ।।"
      जो रंग, रुप, स्वभाव, शिष्टता, धर्म, कर्म, ज्ञान और आचार-विचार तथा शील-स्वभाव में श्रेष्ठ हो, उसे 'आर्य' कहते हैं ।
६) निरुक्त में यास्काचार्य जी लिखते हैं :-
"आर्य ईश्वर पुत्रः ।"
      'आर्य' ईश्वर के पुत्र हैं।
७) विदुर नीति में :-
"आर्य कर्मणि रज्यन्ते भूति कर्माणि कुर्वते ।
हितं च नामा सूचन्ति पण्डिता भरतर्षभ ।।"
      (अध्याय १ श्लोक ३०)
      भरत कुल भूषण ! पण्डितजन्य, जो श्रेष्ठ कर्मों में रुचि रखते हैं, उन्नति के कार्य करते हैं तथा भलाई करने वालों में दोष नहीं निकालते हैं, वही 'आर्य' हैं ।
८) गीता में :-
"अनार्य जुष्टम स्वर्गम् कीर्ति करमर्जुन ।"
        (अध्याय २ श्लोक २)
        हे अर्जुन ! तुझे इस असमय में यह अनार्यों का सा मोह किस हेतु प्राप्त हुआ, क्योंकि न तो यह श्रेष्ठ पुरुषों द्वारा आचरित है और न स्वर्ग को देने वाला है तथा न कीर्ति की और ही ले जाने वाला है । यहां पर अर्जुन के अनार्यता के लक्षण दर्शाये हैं ।
९) चाणक्य नीति में :-
"अभ्यासाद धार्यते विद्या कुले शीलेन धार्यते ।
गुणेन जायते त्वार्य,कोपो नेत्रेण गम्यते ।।"
       (अध्याय ५ श्लोक ८)
       सतत् अभ्यास से विद्या प्राप्त की जाती है, कुल, उत्तम गुण, कर्म, स्वभाव से स्थिर होता है, आर्य श्रेष्ठ गुणों के द्वारा जाना जाता है ।
१०) नीतिकार के शब्दों में :-
"प्रायः कन्दुकपातेनोत्पतत्यार्यः पतन्नपि ।
तथा त्वनार्ष पतति मृत्पिण्ड पतनं यथा ।।"
        आर्य पाप से लिप्त होने पर भी गेन्द के गिरने के समान शीघ्र ऊपर उठ जाता है, अर्थात पतन से अपने आपको बचा लेता है, अनार्य पतित होता है, तो मिट्टी के ढेले के गिरने के समान फिर कभी नहीं उठता ।
११) अमरकोष में :-
"महाकुलीनार्य सभ्य सज्जन साधवः ।"
      (अध्याय२ श्लोक६ भाग३)
      जो आकृति, प्रकृति, सभ्यता, शिष्टता, धर्म, कर्म, विज्ञान, आचार, विचार तथा स्वभाव में सर्वश्रेष्ठ हो, उसे 'आर्य' कहते हैं ।
१२) कौटिल्य अर्थशास्त्र में :-
"व्यवस्थितार्य मर्यादः कृतवर्णाश्रम स्थितिः ।"
         आर्य मर्यादाओं को जो व्यवस्थित कर सके और वर्णाश्रम धर्म का स्थापन कर सके, वही 'आर्य' राज्याधिकारी है ।
१३) पंचतन्त्र में :-
"अहार्यत्वादनर्धत्वाद क्षयत्वाच्च सर्वदा ।"
       सब पदार्थों में उत्तम पदार्थ विद्या को ही कहते हैं ।
१४) धम्मपद में :-
"अरियत्पेवेदिते धम्मे सदा रमति पण्डितो ।"
        पण्डित जन सदा आर्यों के बतलाये धर्म में ही रमण करता है ।
१५) पाणिनि सूत्र में :-
"आर्यो ब्राह्मण कुमारयोः ।"
        ब्राह्मणों में 'आर्य' ही श्रेष्ठ है।
१६) काशी विश्वनाथ मन्दिर के मुख्य द्वार पर :-
"आर्य धर्मेतराणो प्रवेशो निषिद्धः ।"
        आर्य धर्म से इतर लोगों का प्रवेश वर्जित है ।
१७) आर्यों के सम्वत् में :-
"जम्बू दीपे भरतखण्डे आर्यावर्ते अमुक देशान्तर्गते ।"
         ऐसा वाक्य बोलकर पौराणिक भाई भी संकल्प पढ़ते हैं, अर्थात यह आर्यों का देश 'आर्यावर्त्त' है ।
१८) आचार्य चतुरसेन :-
"उठो आर्य पुत्रों नहि सोओ ।
समय नहीं पशुओं सम खोओ ।
भंवर बीच में होकर नायक ।
बनो कहाओ लायक-लायक ।।"
        तुम्हारा जीवन पशुओं के समान निद्रा के वशीभूत होने के लिए निर्माण नहीं हुआ है । यह समय तुम्हें पुरुषार्थ करने का है, यदि जीवन में तुम पुरुषार्थ करोगे तो किसी कहानी के नायक बनकर समाज के आगे उपस्थित होवोगे ।
१९) पं. प्रकाशचन्द कविरत्न :-
"आर्य बाहर से आये नहीं,
देश है इनका भारतवर्ष ।
विदेशों में भी बसे सगर्व,
किया था परम प्राप्त उत्कर्ष ।।
आर्य और द्रविड जाति हैं,
भिन्नचलें यह विदेशियों की चाल ।
खेद है कुछ भारतीय भी,
व्यर्थ बजाते विदेशियों सम गाल ।।"
२०) पं. राधेश्याम कथावाचक बरेली वाले :-
जब पंचवटी में सूर्पणखा राम के पास मोहित होकर अपना विवाह करने की बात राम से कहती है,तब राम उत्तर देते हैं -                        
"हम आर्य जाति के क्षत्रिय हैं,
रघुवंशी वैदिक धर्मी हैं ।
जो करें एक से अधिक विवाह,
कहते वेद उन्हें दुष्कर्मी हैं ।।"
*इसमें रोहिला परिवारों* (राजपूत-क्लेन) का पर्याप्त विवरण है।
*संकलन एवम प्रस्तुति*
*समय सिंह पुंडीर*
*२२अगस्त २०१२*
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*विशेष नोट ____यहां प्रदर्शित सभी चित्र सोसल मीडिया से नेट द्वारा लिए गए है इनका लेखक से कोई संबंध नहीं ये सोसल मीडिया की संपत्ति है यहां केवल प्रतीकात्मक रूप से उड्धृत है।।।

ROHILA KINGDOM

*प्रमुख रोहिला क्षत्रिय शासक*

*1. अंगार सैन -* गांधार (वैदिक काल)
*2. अश्वकरण -* ईसा पूर्व 326 (मश्कावती दुर्ग)
*3. अजयराव -* स्यालकोट (सांकल दुर्ग) ईसा पूर्व 326
*4. प्रचेता -* मलेच्छ संहारक 
*5. शाशिगुप्त -* साइरस के समकालीन 
*6. सुभाग सैन -* मौर्य साम्राज्य के समकालीन 
*7. राजाराम शाह -* 909ईसवी रामपुर रोहिलखण्ड 
*8. बीजराज -* रोहिलखण्ड
*9. करण चन्द्र -* रोहिलखण्ड
*10. विग्रह राज -* रोहिलखण्ड - गंगापार कर स्रुघ्न जनपद (सुगनापुर) यमुना तक विस्तार दसवीं शताब्दी में सरसावा में किले का निर्माण पश्चिमी सीमा पर, यमुना द्वारा ध्वस्त टीले के रूप में नकुड़ रोड पर देखा जा सकता है।
*11. सावन्त सिंह -* रोहिलखण्ड
*12. जगमाल -* रोहिलखण्ड
*13. धिंगतराव -* रोहिलखण्ड
*14. गोंकुल सिंह -* रोहिलखण्ड
*15. महासहाय -* रोहिलखण्ड
*16. त्रिलोक चन्द -* रोहिलखण्ड
*17. रणवीर सिंह -* रोहिलखण्ड
*18. सुन्दर पाल -* रोहिलखण्ड
*19. नौरंग देव -* रोहिलखण्ड
*20. सूरत सिंह -* रोहिलखण्ड
*21. हंसकरण रहकवाल -* पृथ्वीराज के सेनापति 
*22. मिथुन देव रायकवार -* ईसम सिंह पुण्डीर के मित्र थाना भवन शासक 
*23. सहकरण, विजयराव -* उपरोक्त 
*24. राजा हतरा -* हिसार 
*25. जगत राय -* बरेली 
*26. मुकंदराज -* बरेली 1567 ई.
*27. बुधपाल -* बदायुं 
*28. महीचंद राठौर -* बदायुं
*29. बांसदेव -* बरेली 
*30. बरलदेव -* बरेली
*31. राजसिंह -* बरेली
*32. परमादित्य -* बरेली
*33. न्यादरचन्द -* बरेली
*34. राजा सहारन -* थानेश्वर 
*35. प्रताप राव खींची (चौहान वंश) -* गागरोन 
*36. राणा लक्ष्य सिंह -* सीकरी 
*37. रोहिला मालदेव -* गुजरात एवम जालोर
*38. जबर सिंह -* सोनीपत 
*39. रामदयाल महेचराना -* कलायथ
*40. गंगसहाय ,वीर गंगा सिंह महेचा राठौड़ रोहिला राजपूत -* महेचराना - क्लायथ 1761 ई.
*41. राणा प्रताप सिंह -* कौराली (गंगोह) 1095 ई.
*42. नानक चन्द -* अल्मोड़ा 
*43. राजा पूरणचन्द -* बुंदेलखंड 
*44. राजा हंस ध्वज -* हिसार व राजा हरचंद 
*45. राजा बसंतपाल -* रोहिलखण्ड व्रतुसरदार, सामंत वृतपाल 1193 ई.
*46. महान सिंह बडगूजर -* बागपत 1184 ई.
*47. राजा यशकरण -* अंधली 
*48. गुणाचन्द -* जयकरण - चरखी - दादरी 
*49. राजा मोहनपाल देव -* करोली 
*50. राजारूप सैन -* रोपड़ 
*51. राजा महीपाल पंवार -* जीन्द 
*52. राजा परपदेड पुंडीर -* लाहौर 
*53. राजा लखीराव -* स्यालकोट 
*54. राजा जाजा जी तोमर -* दिल्ली 
*55. खड़ग सिंह -* रोहिलखण्ड लौदी के समकालीन 
*56. राजा हरि सिंह -* खिज्रखां के दमन का शिकार हुआ - कुमायुं की पहाड़ियों में अज्ञातवास की शरण ली 
*57. राजा इन्द्र सिंह (रोहिलखण्ड) (इन्द्रसेन) -* सहारनपुर में प्राचीन रोहिला किला बनवाया रोहिला क्षत्रिय वंश भास्कर लेखक आर. आर. राजपूत मुरसेन अलीगढ से प्रस्तुत 
*58. राजा बुद्ध देव रोहिला -* 1787 ई., सिंधिया व जयपुर के कछवाहो के खेड़ा व तुंगा के मैदान में हुए युद्ध का प्रमुख पात्र (राय कुँवर देवेन्द्र सिंह जी राजभाट, तुंगा (राजस्थान)


तुंगा का युद्ध (जब राठौड़ों की तलवारों ने फ्रांसीसी तोपों के चीथड़े उड़ा दिए!)
इतिहास की किताबों में मराठों की ताकत बहुत गाई जाती है, लेकिन जयपुर और जोधपुर की संयुक्त सेना ने 1787 में जो किया था, वो दुनिया का सबसे खौफनाक 'कैवेलरी चार्ज' था!
*राजा बुद्धदेव रोहिला भी इस युद्ध। का प्रमुख पात्र था।*
"फ्रांसीसी तोपों के सामने नंगी तलवारें लेकर टूट पड़े थे मारवाड़ के शेर... इतिहास का सबसे खौफनाक कैवेलरी चार्ज!
1787 ई. में 'तुंगा के युद्ध' में जोधपुर के महाराजा विजय सिंह और जयपुर के महाराजा प्रताप सिंह की संयुक्त राजपूत सेना का सामना महादजी सिंधिया की विशाल मराठा फौज से हुआ।

सिंधिया की फौज के पास फ्रांस के मशहूर जनरल 'डी बोइन' द्वारा ट्रेन की गई सबसे आधुनिक तोपखाना यूनिट थी। तोपों की भयंकर गोलाबारी के बीच, मारवाड़ के राठौड़ घुड़सवारों ने मौत की परवाह किए बिना अपनी तलवारें निकालीं और सीधे तोपों के मुहाने पर अकल्पनीय 'सुसाइड चार्ज' कर दिया!

राठौड़ों की इस आंधी ने फ्रांसिसी जनरलों के होश उड़ा दिए। उन्होंने तोपचियों को वहीं काट डाला और मराठा सेना के बीचों-बीच घुसकर लाशों के ढेर लगा दिए। इस भयंकर राजपूती हमले के खौफ से महादजी सिंधिया को रातों-रात मैदान छोड़कर भागना पड़ा था!
*नोट* ..*इनके अतिरिक्त और बहुत से रोहिला शासक विभिन्न स्थानों पर हुए,जिनकी खोज जारी हैं क्योंकि क्षत्रिय इतिहास को छिपाया गया है जैसे महोबा में चंदेला से पहले रोहिला शासन था, राजस्थान के राठौड़ रोहिलखंड बंदायू से आए थे*




* दिनांक 10मई 2011 प्रकाशित.क्षत्रिय आवाज मासिक पत्रिका एवम राजपूत/क्षत्रिय वाटिका(क्षत्रिय वंशावली) 22अगस्त2012 🙏*
*जय राजपूताना*

*विशेष नोट__ये चित्र नेट द्वारा सोसल मीडिया से लिए गए केवल प्रतीकात्मक रूप है लेखक का उनसे कोई लेना देना नही है।।।
विभिन्न राजाओं के चित्र केवल प्रतीकात्मक है ये रोहिलखंड के और राजपूताना रोहिलखंड के राजा नही है।।
आभार दर्शकों का