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Saturday, 26 April 2025

ROHILKHAND,KATHIYAWAD(SAURASHTRA) के संस्थापक थे काठी , कठेहहरिया,निकुंभ वंश, कठ गणराज्य के संस्थापक थे रोहिला क्षत्रिय ,जिन्होंने सिकंदर को घुटनों के बल झुकने को काठगढ़ के मंदिर में मजबूर कर दिया था।

*वर्तमान_क्षत्रिय कठेहरिया_राजपूत_शूरवीरो_क़ी_शौर्यगाथाएँ*

*कठ_काठी_कठोड़े_कुलठान_कठपाल_वर्तमान*
*कठेहरिया_ठाकुर ही काठी क्षत्रिय है*
*राजपूताना रोहिलखंड,*
*क्षत्रिय_राजपूताना_रोहिलखंड* 
योद्धा विलाप करते हैं, साम्राज्य का पतन होता है: सिकंदर महान की विरासत इतिहास के सबसे उल्लेखनीय साम्राज्यों में से एक के कड़वे-मीठे अंत को दर्शाती है। 323 ईसा पूर्व में सिकंदर की मृत्यु के बाद, उसने जो विशाल साम्राज्य बनाया था, जो ग्रीस से लेकर भारत तक फैला हुआ था, वह जल्दी ही बिखर गया। 32 वर्ष की कम उम्र में उसके अचानक निधन के बाद कोई स्पष्ट उत्तराधिकारी नहीं बचा, और उसके सेनापति, जिन्हें डायडोची के नाम से जाना जाता था, ने उसके क्षेत्रों पर नियंत्रण के लिए भयंकर युद्ध किया। एक बार एकीकृत साम्राज्य युद्धरत राज्यों में विभाजित हो गया, जिसने बेजोड़ सैन्य विजय के युग का अंत कर दिया। फिर भी, सिकंदर की विरासत युद्ध के मैदान से कहीं आगे तक चली गई। उसके अभियानों ने ग्रीक संस्कृति, भाषा और विचारों को पूरे ज्ञात विश्व में फैलाया, उन्हें स्थानीय परंपराओं के साथ मिलाया, जिसे हेलेनिस्टिक युग के रूप में जाना जाता है। साम्राज्य के पतन के बावजूद, कला, विज्ञान, दर्शन और राजनीतिक विचारों पर सिकंदर की दृष्टि और प्रभाव ने आने वाली सदियों तक सभ्यताओं को आकार देना जारी रखा, जिससे इतिहास के सबसे महान और सबसे प्रभावशाली व्यक्तियों में से एक के रूप में उसका स्थान सुनिश्चित हुआ।
काठी दरबार भव्यअतित कि श्रुंखला मे एक प्रसिद्ध  नाम,यह एक क्षत्रिय संघ जो वीरता  का वैभव,शौर्य का प्रतिक और अपने कठोर स्वाभीमानी गुणो से प्रसिद्ध  हे।
    इनके बारे मे यह भी कहा जाता हे कि,
"काल भी अगर छोड दे लेकिन काठी नहीं  छोडता"
    (Time (Death) Forgets But Not Kathi)
 थोडी कुछ शताब्दियो से उन्होने स्थिर  रुप से अपना निवासस्थान सौराष्ट्र को बना लिया,और इतना हि नहि युगो से पुराण प्रसिद्ध  सौराष्ट्र नाम इन्हि के कारण पलटकर 'काठीयावाड' नाम से प्रसिद्ध  हुआ  ऐसी  इन्होने इस विस्तार कि संस्कृति  मे अमीट छाप छोडी हे।
कठ गणराज्य वाहिक प्रदेश(हाल के पंजाब) मे प्रसिध्ध था इनकि राजधानी (संगल)सांकल थी,
एक उल्लेख मिलता हे कि इन पंजाब वासी कठो के नाम से  अफगानिस्तान के गजनी प्रांत मे ‘काटवाज’ क्षेत्र हे।
 कठ लोगों के शारीरिक सौदंर्य और अलौकिक शौर्य की ग्रीक इतिहास लेखकों ने भूरि-भूरि प्रशंसा की है, ग्रीक लेखकों के अनुसार कठों के यहाँ यह प्रथा प्रचलित थी कि वे केवल स्वस्थ एवं बलिष्ठ संतान को ही जीवित रहने देते थे। ओने सीक्रीटोस लिखता है कि वे सुंदरतम एवं बलिष्ठतम व्यक्ति को ही अपना शासक चुनते थे, ग्रिक इतिहासकारो ने कठो को कठोइ या काठीयन जैसे नामो से निर्देषीत किया हे, पाणिनी के ‘अष्टाध्यायी’ मे कठो का उल्लेख हे, पंतजली के महाभाष्य के मत से कठ वैंशपायन के शिष्य थे।इनकि प्रवर्तित वेदसंहिता कि शाखा ‘काठक’ नाम से प्रसिध्ध थी । काठक कापिष्ठल संहिता जैतारायण, प्रत्धर्न(दिवोदासी) ,भीमसेनी इन राजाओ का नाम मिलते हे जीन्होने राजसूय यज्ञ किया था।
   इन्होने कइ बार पोरस को हराया था।इसा पूर्व ३२६ मे सिकंदर की विशाल सेना हिंदकुश कि पर्वतमाला के इस पार अश्वक और अष्टको के राज्य को हराकर झेलम पार कर पोरस से भीडने आ पहोंची,पोरस का पुत्र मारा गया,पोरस ने संधी कर ली जीसमे सैनीक सहायता के बदले ब्यास नदी तक के आगे जीते जाने वाले प्रदेशो पर पोरस सिंकदर के सहायक के तौर पर शासन करेगा, इसके बाद अधृष्ट(अद्रेसाइ) ने बिना लडे आधीनता स्वीकार कर ली, बाद मे कठ के नगर पर सेना आ खडी हुइ, कठ स्वतंत्रता प्रेमी थे, जो अपने साहस के लिए सबसे अधीक विख्यात थे,उन्होने शकट व्युह रचकर सिंकदर कि सेना पर भीतर तक भीषण  आक्रमण किया और जिसमें  खुद सिंकदर हताहत हो गया, संधी अनुसार पोरस ने २०,००० सैनीको का दल सिंकदर कि सहायता मे भेजा जीसमे हाथी भी थे जीनसे शकट व्युह तुट सकता था, तब कठो कि पराजय मुमकिन हो पाइ, करीबन १७००० कठ मारे गये और कइ बंदि बनाए गये, वहा पर नारीयो ने जौहर भी किया था एसा उल्लेख भी कइ जगह हुआ हे।
कच्छ के पोलीटकल एजन्ट मेकमर्डो जो काफि प्रतिभावान विद्बान थे वे काठी क्षत्रियो से प्रभावित थे इन्होने काठीओ मे विरता का नैतिक गुण,शक्ति,मुख पर तेजस्वीता और स्त्री सन्मान कि भावना सबधे अधीक पाइ थी जीसकि उनके विवरणो द्वारा हमे जानकारी मीलती हे ।
   सूर्यवंशी राजा व्रुतकेतु ने माळवा मे राज्य स्थापीत किया था,जीनके बाद उनके वंशजो जो की मैत्रक कुल और कठगण(काठी)ओने सौराष्ट्र मे प्रस्थान किया ,काठी वहा से कच्छ और राजस्थान के कुछ क्षेत्र मे गये कच्छ मे उन्होने अंजार,बन्नी,कंथकोट,कोटाय,भद्रेश्वर,पलाडीया आदि विस्तारो और कुछ सिंध और द.राजस्थान मे संस्थान और छोटी बडी जागीर स्थापीत कर दि और मैत्रक राजवंश ने वलभीपुर, तळाजा,वळा पंथक जैसो क्षेत्रो मे वर्चस्व जमाया|वलभी कि अपनी सवंत, मुद्रा और विद्यापीठ थी।मैत्रक विजयसेन ‘भटार्क’ ने वलभी साम्राज्य कि स्थापना कि थी। कुछ समय बाद यह वंश ‘वाळा राजकुल’ से जाना गया, जीसमे कइ समर्थ महापुरुषो ने जन्म लीया यह वाळा कुल भी काठी नाम से हि परापुर्व से जाना जाता था।
काठीओ का नाम पृथ्वीराज और कनोज के युध्ध मे उल्लेखीत हुआ हे, और अणहिलपुर को अपनी मरजी पुर्वक सहायता करते थे ।
और इधर कच्छ मे जाडेजा राजपूतो से अविरत संघर्षो के चलते काठीओ ने कच्छ छोडकर सौराष्ट्र मे आगमन किया ।
गढ अयोध्या निकाश भयो -गादि ठठ्ठा मुलथान
सूर्यदेव स्थापन कर्या-गढ मुलक फेर थान
        -रचनाःबडवाजी(बल्ला राजवंश व्याख्यान माला)
इस पंक्ति मे दो प्रसिध्ध सूर्य मंदिरो के स्थानो का उल्लेख हे, मुलतान(मुलःस्थान,हाल पाकिस्तान) और थान(स्थान यह नाम भी वाळा और काठीओ के सौराष्ट्र मुलस्थान की याद मे हि पडा और जो काठीयावाड मे सुरेन्द्रनगर जीले मे स्थीत हे।)
   -मुलतान का सूर्यमंदिर अब अवशेषो मे हि शेष हे पहेले वो ९ मी सदि तक विद्यमान था, परंतु थान का सूर्य मंदिर अपनी मग ब्र्हामणो कि शील्प शैली मे सज्ज होलबूट और मुगुट पहने भगवान सूर्यनारायण कि मनोहर प्राचिन प्रतिमा के साथ मौजुद हे,वेसे तो यह मंदिर पौराणीक हे किंतु इसका जिर्णोद्वार और किल्लेबंध रचना काठीओ द्वारा हुइ और बाद मे यह मंदिर सूरजदेवल के नाम से प्रसिध्ध हुआ। भारत के आराजक युग मे गुलाम,खिलजी,तुगलक,सैयद,लोदि,सुरी और उसके बाद मुगल इस तरह एक के बाद एक यवन साम्राज्य स्थापीत हुए, जो पुर्वकाल मे अनेक गणराज्यो मे बटा हुआ होकर भी एक था,वह भारत खंडीत हो रहा था ।12 वि शताब्दि के बाद से इस मंदिर पर कइ भीषण हमले होने से यह मंदिर तुटता रहा और फिर से उसका जिर्णोद्वार होता रहा । जीससे यह स्थान आस्था एवं संग्राम की भुमी हे। इनके बाद अंग्रेज और मराठा कि जुल्मी पेशकदमी और धाड से प्रदेश पुरा आंक्रत था तब काठी क्षत्रियो ने अच्छी तरह से युध्ध-रणनीती,संध बनाकर सौराष्ट्र के प्रांतो को जिता और अविरत युध्ध और संघर्ष किया *‘जितस्येवसुधाकाम्ये दैदिप्य सूर्य नभे’* और जीत के साथ नभ मे दिपमान सूर्य के भांती चमकते रहे इसके चलते मराठाओ ने हि इस प्रदेश को काठीयावाड नाम घोषीत किया,यह एक इतिहास कि विरल घटना होगी जिसमें आक्रांताओ द्वारा जन समुदाय से प्रतिकार होने पर प्रदेश का नामाभिधान हो गया।
काठी क्षत्रीयो का प्रत्येक व्यक्ति गण हे और इनकि संघीय विचारधारा रहि हे, काठीयावाड मे उन्होने अन्य क्षत्रीयो को अपने साथ अपनी परंपरा मे जोडा और संघीय शक्ति मजबुत कि,तथा बगसरा दरबार वालेरावाळा ने १६ वी सदि के उतराध मे सहस्त्र भोज यज्ञ कर लग्न और रीवाज संबधी चुस्त प्रथा का निर्माण संघ को और मजबुत करने के लिए किया तथा जनपद युगीन क्षत्रिय परंपरा को जीवंत रखी।
और इनमे समविष्ट अन्य क्षत्रीय इस प्रकार हे,
राव धाधल के पुत्र बुढाजी और बुढाजीके पुत्र कालुसीह थे.वी.सं १४६६ और शा.शके 1328मे जब कालुसींहजी धाधल अचलदास खीचीके साथ युद्ध कर रहे थे तब वासुकी अवतार गोगाजीने कालुसींह को युद्धमे सहायकी थी. कालुसींहने अपना कर्तव्य नीभाते हुवे वासुकीदेवको अपने इस्टदेव माना. कालुसिंहने फीर पांच वार्ष तक अपनी जमीन पर राज कीया. बादमे कालुसीह धाधल शाके 1333 और वी.सं 1471मे अपना पुरा सेन्य और संघ लेकर द्धवारका की यात्रा कि . तब द्धावरका की गादी पे वाढेर शाखाके के राठौर का राज था जो कालुसींहकी पुर्वज राव सिंहाजी के वंशज थे. एक मास तक स्नेहसे द्धारका रहनेके बाद वापस मारवाड लोटने चले. कालुसिहजी मध्य सौराष्ट्रके पंचाल प्रदेशमे शाके 1333 मागसर सुद 9 के पेहले प्रोहर मे कालुसीह और उनका सेन्य थानगढके पास लाखामाची गाव पोहचे. कच्छके जामके साथ युद्धके हेतु काठी राजपुत तब लाखामाचीमे युद्धकी तयारी कर रहे थे.कालुसीहने काठी राजपुतो को जामके साथ चल रहे युद्धमे सहायता की और वासुकीदेव की आज्ञा से कालुसीह काठी राजपुत संघ मे शामील हुए. 

"कच्छ ना जाम ते कारमा आविया लाविया फ़ौज ते लाख लारा । 
एहना बाप नो वैर वालन वटा पत्तावत गोतता खंड पारा ।। 
सबल सौरठ वीसे साथ ने सांभली द्वेष थी वेरिया दाव दाख्यो ।
 ते दी खत्री वट कारने आफल्या अड़ी खम्भ धरा स्तम्भ धांधले धरम राख्यो॥
  ओखा के वेरावळजी वाढेर(राठोर) भी काठी संघ मे शामील हुए थे इनसे गीडा, तीतोसा, तकमडीया, भांभला इन पेटा राठोड कुल कि पेटा शाखा का उदभव हुआ, जालोरगढ के राजा विरमदेव सोनागरा(चौहान) के पुत्र केशरदेव इनसे जळु शाखा का उदभव हुआ, परमारो राजपूतो मे से बसीया,विंछीया,माला,जेबलीया, और हळवद राजभायात मालसिंहजी जाला से खवड शाखा का उदभव हुआ, कंबध युध्ध करने वाला प्रतापी विर नागाजण जेठवा बचपन मे अपने काठी मामा के यहा पले बडे , इनसे वांक और वरु शाखा का उदभव हुआ तथा चावडा राजपूत और कइ क्षत्रियो को अपने साथ जोडकर संघ को सशक्त किया।इस प्रकार संघ कि शक्ति से वे अपना अस्तीत्व कायम रख पाए ।
काठी दरबारों ने युद्ध के लिए अश्व की एक ब्रीड तैयार की थी जिसका नाम काठी ब्रिड हे है। ये अश्व काफी मामलो में बाकी ब्रीड से आगे है।। महाराणा प्रताप का अश्व चेतक भी एक काठी घोडा था।

कइ लेखक विदो ने इन विरबाहुओ के शौर्य का बखान किया हे यहा प्रसिध्ध लेखक स्व.चंद्रकांत बक्षी के शब्दो मेःकाठी ज्ञाती संख्या मे कम फिर भी शूरविर कोम हे, कम संख्या मे होकर भी पुरे प्रदेश को काठीयावाड घोषीत कर सके वह उनकि शुरविरता,कुनेह,और लडायक नीती का उच्चत्म प्रमाणपत्र हे और यह सिध्धी हासिल करने मे कइ काठी विर,संत और सतिओ के बलीदान हे।

सौजन्यः काठी संस्कृतिदीप संस्थान☀

सदर्भः
 -Arrian, Anabasis of Alexander, V.22-24
-Bharat Discovery
 -An Inquiry Into the Ethnography of Afghanistan By H. W. Bellew page17 
-कर्नल टोड कृत राज. का इतिहास & Travels in -Western India
-जे. डबल्यु. वोटसन
-काठी संस्कृति अने इतिहास-डो.श्री प्रद्युमनभाइ खाचर
-काठीओ अने काठीयावाड -डो.श्री प्रद्युमनभाइ खाचर
-महाविरसिंह छिंताबा(भीलवाडा)
-पथीक मेगेजीन -के.का शास्त्री
-द.श्री भोजवाळा चुडा-सोरठ
-काठी अभ्युदय
-macmurdo. Trans. Lit. soc.

*ठाकुर_राणा_प्रताप_सिंह उर्फ दीपक_सिंह_कठेहरिय श्री_राष्ट्रीय_राजपूत_करणी_सेना_सम्भल_उत्तर_प्रदेश*

Monday, 14 April 2025

RAJPUT CLANS

 RAJPUT CLANS AND SOME PALCES THEIR OFक्रमांक नाम गोत्र वंश स्थान और जिला
1. सूर्यवंशी भारद्वाज सूर्य बुलन्दशहर आगरा मेरठ अलीगढ
2. गहलोत वशिष्ट , कश्यप, बैजवापेड सूर्य मेवाड़ और पूर्वी जिले
3. सिसोदिया बैजवापेड गहलोत महाराणा उदयपुर स्टेट
4. कछवाहा गौतम,वशिष्ठ,मानव सूर्य महाराजा जयपुर
5. राठौड गौतम,कश्यप,भारद्वाज,शान्डिल्य गहरवार महाराजा राजस्थान, रोहिलखंड अनेक स्थानों पाए जाते हैं जोधपुर ,बीकानेर,किशनगढ़ और पूर्व और मालवा
6. रवानी अत्रि,भारद्वाज चन्द्रयान चंद्र राजगीर, औरंगाबाद(बिहार), रोहतास और इलाहाबाद 
7. सोमवंशी अत्रय चन्द्र प्रतापगढ और जिला हरदोई
8. यदुवंशी अत्रय चन्द्र राजकरौली राजपूताने में
9. भाटी अत्रय जादौन महारजा जैसलमेर राजपूताना
10. जाडेचा अत्रय यदुवंशी महाराजा कच्छ भुज
11. जादवा अत्रय जादौन शाखा अवा. कोटला ऊमरगढ आगरा
12. तोमर अत्रय, व्याघ्र, गार्गेय चन्द्र पाटन के राव तंवरघार जिला ग्वालियर
13. कटियार व्याघ्र तोंवर धरमपुर का राज और हरदोई
14. पालीवार व्याघ्र चन्द्र गोरखपुर
15. सत्पोखरिया भारद्वाज राठौड(चाँपावत) मऊ जिला घोसी, इंदारा
16. परिहार, वरगाही कौशल्य, कश्यप अग्नि बांदा जिला, रीवा राज्य में बघेलखंड
17. तखी कौशल्य परिहार पंजाब कांगडा जालंधर जम्मू में
18. पंवार वशिष्ठ अग्नि मालवा मेवाड धौलपुर पूर्व मे बलिया
19. सोलंकी भारद्वाज अग्नि राजपूताना मालवा सोरों जिला एटा
20. चौहान वत्स अग्नि राजपूताना पूर्व और सर्वत्र
21. हाडा वत्स चौहान कोटा बूंदी और हाडौती देश
22. खींची वत्स चौहान खींचीवाडा मालवा ग्वालियर
23. भदौरिया वत्स चौहान नौगंवां पारना आगरा इटावा गालियर
24. देवडा वत्स चौहान राजपूताना सिरोही राज
25. शम्भरी वत्स चौहान नीमराणा रानी का रायपुर पंजाब
26. बच्छगोत्री वत्स चौहान प्रतापगढ सुल्तानपुर
27. राजकुमार वत्स चौहान दियरा कुडवार फ़तेहपुर जिला
28. पवैया वत्स चौहान ग्वालियर
29. गौर,गौड भारद्वाज सूर्य शिवगढ रायबरेली कानपुर लखनऊ
30. वैस भारद्वाज सूर्य आजमगढ उन्नाव रायबरेली मैनपुरी पूर्व में
31. गहरवार कश्यप, भारद्वाज सूर्य माडा, हरदोई, वनारस, उन्नाव, बांदा पूर्व
32. सेंगर गौतम ब्रह्मक्षत्रिय जगम्बनपुर भरेह इटावा जालौन
33. कनपुरिया भारद्वाज ब्रह्मक्षत्रिय पूर्व में राजाअवध के जिलों में हैं
34. बिसेन अत्रय,वत्स,भारद्वाज,पाराशर,शान्डिल्य ब्रह्मक्षत्रिय गोरखपुर गोंडा प्रतापगढ महराजगंज (निचलौल के उत्तर क्षेत्र के समीप) हैं
35. निकुम्भ वशिष्ठ,भारद्वाज सूर्य वंशी कठेहर रोहिलखंड , मऊ गोरखपुर आजमगढ हरदोई जौनपुर
36. श्रीनेत भारद्वाज निकुम्भ गाजीपुर बस्ती गोरखपुर
37. कटहरिया , कठेरिया वशिष्ठ् भारद्वाज, सूर्य वंशी बरेली बंदायूं मुरादाबाद शहाजहांपुर ,रोहिलखंड 
38. वाच्छिल अत्रयवच्छिल चन्द्र मथुरा बुलन्दशहर शाहजहांपुर,रोहिलखंड 
39. बढगूजर वशिष्ठ सूर्य ,सिकरवार ,सीकरी अनूपशहर एटा अलीगढ मैनपुरी मुरादाबाद हिसार गुडगांव जयपुर
40. झाला मरीच, कश्यप, मार्कण्डे चन्द्र धागधरा मेवाड झालावाड कोटा
41. गौतम गौतम ब्रह्मक्षत्रिय राजा अर्गल फ़तेहपुर
42. रैकवार भारद्वाज सूर्य बहरायच सीतापुर बाराबंकी
43. करचुल हैहय कृष्णात्रेय चन्द्र बलिया फ़ैजाबाद अवध
44. चन्देल चान्द्रायन चन्द्रवंशी (रवानी) गिद्धौर ,कानपुर, फ़र्रुखाबाद, बुन्देलखंड, पंजाब, गुजरात
45. जनवार कौशल्य चन्द्रवंशी बलरामपुर अवध के जिलों में
46. बहेलिया भारद्वाज, वैस (उप जाति सिसोदिया )की गोद सिसोदिया रायबरेली बाराबंकी
47. दीत्तत कश्यप सूर्यवंश की शाखा उन्नाव, बस्ती, प्रतापगढ, जौनपुर, रायबरेली ,बांदा
48. सिलार शौनिक चन्द्र सूरत राजपूतानी
49. सिकरवार भारद्वाज, सांक्रित्यन बढगूजर ग्वालियर, आगरा, गाजीपुर और उत्तरप्रदेश में
50. सुरवार गर्ग सूर्य कठियावाड में
51. सुर्वैया वशिष्ठ यदुवंश काठियावाड
52. मोरी ब्रह्मगौतम सूर्य मथुरा ,आगरा ,धौलपुर
53. टांक (तत्तक) शौनिक नागवंश मैनपुरी और पंजाब
54. गुप्त गार्ग्य चन्द्र अब इस वंश का पता नही है
55. कौशिक कौशिक चन्द्र बलिया, आजमगढ, गोरखपुर
56. भृगुवंशी भार्गव ब्रह्मक्षत्रिय वनारस, बलिया, आजमगढ, गोरखपुर
57. गर्गवंशी गर्ग ब्रह्मक्षत्रिय आजमगढ, नरसिंहपुर सुल्तानपुर,अवध,बस्ती,फैजाबाद
58. पडियारिया, देवल,सांकृतसाम ब्रह्मक्षत्रिय राजपूताना
59. ननवग कौशिक चन्द्र जौनपुर जिला
60. वनाफ़र पाराशर,कश्यप चन्द्र बुन्देलखन्ड बांदा वनारस
61. जैसवार कश्यप यदुवंशी मिर्जापुर एटा मैनपुरी
62. चौलवंश भारद्वाज सूर्य दक्षिण मद्रास तमिलनाडु कर्नाटक में
63. निमवंशी कश्यप सूर्य संयुक्त प्रांत
64. वैनवंशी वैन्य सोमवंशी मिर्जापुर
65. दाहिमा गार्गेय ब्रह्मक्षत्रिय काठियावाड राजपूताना
66. पुण्डीर कपिल, पुलस्त्य भारद्वाज ब्रह्मक्षत्रिय पंजाब, गुजरात, रींवा, यू.पी.
67. तुलवा आत्रेय चन्द्र राजाविजयनगर
68. कटोच कश्यप चन्द्र राजानादौन कोटकांगडा,हिमाचल
69. चावडा,पंवार,चोहान,वर्तमान कुमावत वशिष्ठ पंवार की शाखा मलवा रतलाम उज्जैन गुजरात मेवाड
70. अहवन वशिष्ठ चावडा,कुमावत खेरी हरदोई सीतापुर बारांबंकी
71. डौडिया वशिष्ठ पंवार शाखा बुलंदशहर मुरादाबाद बांदा मेवाड गल्वा पंजाब
72. गोहिल बैजबापेण गहलोत शाखा काठियावाड
73. बुन्देला कश्यप गहरवारशाखा बुन्देलखंड के रजवाडे
74. काठी कश्यप गहरवारशाखा काठियावाड झांसी बांदा, कठेहर रोहिलखंड
75. जोहिया पाराशर चन्द्र पंजाब देश मे
76. गढावंशी कांवायन चन्द्र गढावाडी के लिंगपट्टम में
77. मौखरी अत्रय चन्द्र प्राचीन राजवंश था
78. लिच्छिवी कश्यप सूर्य प्राचीन राजवंश था
79. बाकाटक विष्णुवर्धन सूर्य अब पता नहीं चलता है
80. पाल कश्यप सूर्य यह वंश सम्पूर्ण भारत में बिखर गया है
81. सैन अत्रय ब्रह्मक्षत्रिय यह वंश भी भारत में बिखर गया है
82. कदम्ब मान्डग्य ब्रह्मक्षत्रिय दक्षिण महाराष्ट्र मे हैं
83. पोलच भारद्वाज ब्रह्मक्षत्रिय दक्षिण में मराठा के पास में है
84. बाणवंश कश्यप असुरवंश श्री लंका और दक्षिण भारत में,कैन्या जावा में
85. काकुतीय भारद्वाज चन्द्र,प्राचीन सूर्य था अब पता नही मिलता है
86. सुणग वंश भारद्वाज चन्द्र,पाचीन सूर्य था, अब पता नही मिलता है
87. दहिया गौतम ब्रह्मक्षत्रिय मारवाड में जोधपुर
88. जेठवा कश्यप हनुमानवंशी राजधूमली काठियावाड
89. मोहिल वत्स चौहान शाखा महाराष्ट्र मे है
90. बल्ला भारद्वाज,कश्यप सूर्य, काठी ,काठी दरबार काठियावाड मे मिलते हैं
91. डाबी वशिष्ठ यदुवंश राजस्थान
92. खरवड वशिष्ठ यदुवंश मेवाड उदयपुर
93. सुकेत भारद्वाज गौड की शाखा पंजाब में पहाडी राजा
94. पांड्य अत्रय चन्द अब इस वंश का पता नहीं
95. पठानिया पाराशर वनाफ़रशाखा पठानकोट राजा पंजाब
96. बमटेला शांडल्य विसेन शाखा हरदोई फ़र्रुखाबाद
97. बारहगैया वत्स चौहान गाजीपुर
98. भैंसोलिया वत्स चौहान भैंसोल गाग सुल्तानपुर
99. चन्दोसिया भारद्वाज वैस सुल्तानपुर
100. चौपटखम्ब कश्यप ब्रह्मक्षत्रिय जौनपुर
101. धाकरे भारद्वाज(भृगु) ब्रह्मक्षत्रिय आगरा मथुरा मैनपुरी इटावा हरदोई बुलन्दशहर
102. धन्वस्त यमदाग्नि ब्रह्मक्षत्रिय जौनपुर आजमगढ वनारस
103. धेकाहा कश्यप पंवार की शाखा भोजपुर शाहाबाद
104. दोबर(दोनवार) वत्स या कश्यप ब्रह्मक्षत्रिय गाजीपुर बलिया आजमगढ गोरखपुर
105. हरद्वार भार्गव चन्द्र शाखा आजमगढ
106. जायस कश्यप राठौड की शाखा रायबरेली मथुरा
107. जरोलिया व्याघ्रपद चन्द्र बुलन्दशहर
108. जसावत मानव्य कछवाह शाखा मथुरा आगरा
109. जोतियाना(भुटियाना) मानव्य कश्यप,कछवाह शाखा मुजफ़्फ़रनगर मेरठ
110. घोडेवाहा मानव्य कछवाह शाखा लुधियाना होशियारपुर जालन्धर
111. कछनिया शान्डिल्य ब्रह्मक्षत्रिय अवध के जिलों में
112. काकन भृगु ब्रह्मक्षत्रिय गाजीपुर आजमगढ
113. कासिब कश्यप कछवाह शाखा शाहजहांपुर,रोहिलखंड
114. किनवार कश्यप सेंगर की शाखा पूर्व बंगाल और बिहार में
115. बरहिया गौतम सेंगर की शाखा पूर्व बंगाल और बिहार
116. लौतमिया भारद्वाज बढगूजर शाखा बलिया गाजी पुर शाहाबाद
117. मौनस मौन कछवाह शाखा मिर्जापुर प्रयाग जौनपुर
118. नगबक मानव्य कछवाह शाखा जौनपुर आजमगढ मिर्जापुर
119. पलवार व्याघ्र सोमवंशी शाखा आजमगढ फ़ैजाबाद गोरखपुर
120. रायजादे पाराशर चन्द्र की शाखा पूर्व अवध में
121. सिंहेल कश्यप सूर्य आजमगढ परगना मोहम्दाबाद
122. तरकड कश्यप दिक्खित शाखा आगरा मथुरा
122. तिसहिया कौशल्य परिहार इलाहाबाद परगना हंडिया
124. तिरोता कश्यप तंवर की शाखा आरा शाहाबाद भोजपुर
125. उदमतिया वत्स ब्रह्मक्षत्रिय आजमगढ गोरखपुर
126. भाले वशिष्ठ पंवार अलीगढ
127. भालेसुल्तान भारद्वाज वैस की शाखा रायबरेली लखनऊ उन्नाव
128. जैवार व्याघ्र तंवर की शाखा दतिया झांसी बुन्देलखंड
129. सरगैयां व्याघ्र सोमवंश हमीरपुर बुन्देलखण्ड
130. किसनातिल अत्रय तोमरशाखा दतिया बुन्देलखंड
131. टडैया भारद्वाज सोलंकीशाखा झांसी ललितपुर बुन्देलखंड
132. खागर अत्रय यदुवंश शाखा जालौन हमीरपुर झांसीखंगार क्षत्रिय राठौड़ शाखा मध्य प्रदेश 
133. पिपरिया भारद्वाज गौडों की शाखा बुन्देलखंड
134. सिरसवार अत्रय चन्द्र शाखा बुन्देलखंड
135. खींचर वत्स चौहान शाखा फ़तेहपुर में असौंथड राज्य
136. खाती कश्यप दिक्खित शाखा बुन्देलखंड,राजस्थान में कम संख्या होने के कारण इन्हे बढई गिना जाने लगा
137. आहडिया बैजवापेण गहलोत आजमगढ
138. उदावत गौतम राठौड पाली
139. उजैने श्रवण पंवार आरा डुमरिया
140. अमेठिया भारद्वाज गौड अमेठी लखनऊ सीतापुर
141. दुर्गवंशी कश्यप दिक्खित राजा जौनपुर राजाबाजार
142. बिलखरिया कश्यप दिक्खित प्रतापगढ उमरी राजा
143. डोगरा कश्यप सूर्य कश्मीर राज्य और बलिया
144. निर्वाण वत्स चौहान राजपूताना (राजस्थान)
145. जाटू व्याघ्र तोमर राजस्थान,हिसार पंजाब
146. नरौनी मानव्य कछवाहा बलिया आरा
147. भनवग भारद्वाज कनपुरिया जौनपुर
148. गिदवरिया वशिष्ठ पंवार बिहार मुंगेर भागलपुर
149. रक्षेल कश्यप सूर्य रीवा राज्य में बघेलखंड
150. कटारिया भारद्वाज सोलंकी झांसी मालवा बुन्देलखंड
151. रजवार वत्स चौहान पूर्व मे बुन्देलखंड
152. द्वार व्याघ्र तोमर जालौन झांसी हमीरपुर
153. इन्दौरिया व्याघ्र तोमर आगरा मथुरा बुलन्दशहर
154. छोकर अत्रय यदुवंश अलीगढ मथुरा बुलन्दशहर
155. जांगडा वत्स चौहान बुलन्दशहर पूर्व में झांसी
156. शौनक शौन भ्रृगुवंशी इलाहाबाद
157. बघेल कश्यप या भारद्वाज सोलंकी रीवा राज्य में बघेलखंड
158. दिक्खित कश्यप सूर्य बुन्देलखंड
159. बंधलगोती भारद्वाज ब्रह्मक्षत्रिय अमेठी,सुल्तानपुर
160. कलहंस अंगिरस परिहार प्रतापगढ,बहरायच,गोरखपुर,बस्ती
161. बेरुआर भारद्वाज तोमर बलिया,आजमगढ,मऊ
162.रोहिला(रोहिलखंड में शासन करने वाले सभी क्षत्रिय राजपूत जैसे_राठौड़,गोर,वाछिल्ल , वारेचा चौहान,चौहान,काठी,निकुंभ,परमार,बनाफरे आदि९०९ईस्वी से १७२०ईस्वी कठेहर रोहिलखंड,कुमायूं ,नेपाल,सौराष्ट्र,
आदि लगभग पांच हजार क्षत्रिय गोत्र शाखाएं ,प्रशाखाएं है देश के विभिन्न क्षेत्रों में ।
सूर्य और चंद्र ही प्राचीन वैदिक कालीन क्षत्रिय पूरा इतिहास काल से है बाद में अग्नि वंश और ऋषि वंश माने गए जिनसे छत्तीस राजवंश लिखे गए हैं,।
जिसके पास जो जानकारी मिले कॉपी पेस्ट करके इसमें एड करते जाए जिससे सभी तक जानकारी पहुंचे और जो लिस्टिड नही हुए वे सूची बद्ध किए जा सके ।
जय राजपूताना
जय भवानी
क्षत्रिय इतिहास की अनंत कहानी
क्रमशः====
विशेष नोट _____यह प्रर्दशित चित्र सोसल मीडिया से लिए गए, है लेखक का इस पर कोई हक नही है यह प्रतीकात्मक रूप है और सोसल मीडिया की संपत्ति है।।

Monday, 23 December 2024

ROHILA THE BRAND

प्रथम स्वतंत्रता संग्राम 1857 में भी रोहिले राजपूतों ने अपना योगदान दिया, ग्वालियर के किले में रानी लक्ष्मीबाई को हजारों की संख्या में रोहिले राजपूत मिले, इस महायज्ञ में स्त्री पुरुष सभी ने अपने गहने, धन आदि एकत्र कर झांसी की रानी के साथ अंग्रेजों के विरुद्ध आवाज उठाने के लिए सम्राट बहादुरशाह- जफर तक पहुंचाए। अंग्रेजों ने ढूंढ-ढूंढ कर उन्हें काट डाला जिससे रोहिले राजपूतों ने अज्ञातवास की शरण ली। राजपूतों की हार के प्रमुख कारण थे हाथियों का प्रयोग, सामंत प्रणाली व आपसी मतभेद, ऊंचे व भागीदार कुल का भेदभाव (छोटे व बड़े की भावना) आदि। सम्वत 825 में बप्पा रावल चित्तौड़ से विधर्मियों को खदेड़ता हुआ ईरान तक गया। बप्पा रावल से समर सिंह तक 400 वर्ष होते हैं, गह्लौतों का ही शासन रहा। इनकी 24 शाखाएं हैं। जिनके 16 गोत्र (बप्पा रावल के वंशधर) रोहिले राजपूतों में पाए जाते हैं। चितौड़ के राणा समर सिंह (1193 ई.) की रानी पटना की राजकुमारी थी इसने 9 राजा, 1 रावत और कुछ रोहिले साथ लेकर मौ. गोरी के गुलाम कुतुबद्दीन का आक्रमण रोका और उसे ऐसी पराजय दी कि कभी उसने चितौड़ की ओर नहीं देखा।  रोहिलखंड के बीचोबीच स्थित संभल के हरिहर मंदिर को रोहिला राजपूतों ने तीन बार आक्रमण करके विधर्मियों से मुक्त कराया था जो सन 1857तक हिंदुओ के कब्जे में रहा,ब्रिटिश राज में इस मंदिर को 1920ईस्वी में भारतीय पुरातत्व विभाग को सौंप दिया गया था।।रोहिला शब्द क्षेत्रजनित, गुणजनित व मूल पुरुष नाम-जनित है। यह गोत्र जाटों में भी रूहेला, रोहेला, रूलिया, रूहेल, रूहिल, रूहिलान नामों से पाया जाता है। रूहेला गोत्र जाटों में राजस्थान व उ. प्र. में पाया जाता है। रोहेला गोत्र के जाट जयपुर में बजरंग बिहार ओर ईनकम टैक्स कालोनी टौंक रोड में विद्यमान है। झुनझुन, सीकर, चुरू, अलवर, बाडमेर में भी रोहिला गोत्र के जाट विद्यमान हैं। उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले में रोहेला रोहल रोहिलान गोत्र के जाटों के बारह गाँव हैं। महाराष्ट्र में रूहिलान गोत्र के जाट वर्धा में केसर व खेड़ा गांव में विद्यमान हैं।रोहतक के पास रोहद आदि स्थानों पर रोहिल रूहिल रोहल रोहिल उपनाम के जाट विद्युमान है जो खुद को महाराज रोहा के वंशज बताते हैं। भिवानी में रोहिल उपनाम के जाट विद्यमान है।मुगल सम्राट अकबर ने भी राजपूत राजाओं को विजय प्राप्त करने के पश्चात् रोहिला-उपाधि से विभूषित किया था, जैसे राव, रावत, महारावल, राणा, महाराणा, रोहिल्ला, रहकवाल आदि।रोहिलखंड से विस्थापित रोहिला-राजपूत समाज, क्षत्रियों का वह परिवार है जो सरल ह्रदयी, परिश्रमी, राष्ट्रप्रेमी, स्वधर्मपरायण, स्वाभिमानी व वर्तमान में अधिकांश अज्ञातवास के कारण साधनविहीन है। 40 प्रतिशत कृषि कार्य से, 30 प्रतिशत श्रम के सहारे व 30 प्रतिशत व्यापार व लघु उद्योगों के सहारे जीवन यापन कर रहे हैं। इनके पूर्वजों ने हजारों वर्षों तक अपनी आन, मान, मर्यादा की रक्षा के लिए बलिदान दिए हैं और अनेको आक्रान्ताओं को रोके रखने में अपना सर्वस्व मिटाया है। गणराज्य व लोकतंत्रात्मक व्यवस्था को सजीव बनाये रखने की भावना के कारण वंश परंपरा के विरुद्ध रहे, करद राज्यों में भी स्वतंत्रता बनाये रखी। कठेहर रोहिलखण्ड की स्थापना से लेकर सल्तनत काल की उथल पुथल, मार काट, दमन चक्र तक लगभग आठ सौ वर्ष के शासन काल के पश्चात् 1857 के ग़दर के समय तक रोहिले राजपूतों ने राष्ट्रहित में बलिदान दिये हैं। क्रूर काल के झंझावातो से संघर्ष करते हुए क्षत्रियों का यह रोहिला परिवार बिखर गया है, इस समाज की पहचान के लिए भी आज स्पष्टीकरण देना पड़ता है। कैसा दुर्भाग्य है? यह क्षत्रिय वर्ग का। जो अपनी पहचान को भी टटोलना पड़ रहा है। परन्तु समय के चक्र में सब कुछ सुरक्षित है। इतिहास के दर्पण में थिरकते चित्र, बोलते हैं, अतीत झांकता है, सच सोचता है कि उसके होने के प्रमाण धुंधले-धुंधले से क्यों हैं? हे- क्षत्रिय तुम धन्य हो, पहचानों अपने प्रतिबिम्बों को –

क्षत्रिय एकता के बिगुल FOONK सब  _धुंधला _धुंधला छंटने दो।

हो akhand भारत के राजपुत्र, खण्ड खण्ड में न सभी को  batne   दो।।
संकलन
समय सिंह पुंडीर
प्रकाशित
क्षत्रिय आवाज मासिक पत्रिका
अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा १८९७
*राजपूत विशेषांक*
02मई 2011ईस्वी