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Tuesday, 4 August 2026

ANCIENT HISTORY OF RAJPUTANA ROHILKHAND

*प्राचीन रोहिला राजवंश*
*रोहिला क्षत्रिय/राजपूत*

वैववस्त मनु  से  प्रारंभ  हुई, , श्रीराम व  श्री कृष्ण जिस  कालखंड में है, सहस्राब्दियो पूर्व से भारत की पावन भूमि पर आज तक चली आ रही, क्षत्रिय वंशो की अटूट परम्परा को नमन करते हुए, एक राजन्य (राजपुत्र) ही जन्मसिद्ध स्वतंत्रता की रक्षा सदैव सीमाओ पर   KARTA AYA है हिंदुकुश रोहित-गिरि पंचनद तक भरत खण्ड की पश्चिमी उत्तरीय सीमा के क्षत्रिय प्रहरियों का दीर्घ कालीन विकट संघर्ष ही भारत की संस्कृति व सभ्यता की रक्षा करता रहा है। आक्रमणकारियों के लिए रोहितगिरि का उत्तारापथ ही पूर्व काल से एक  प्रवेश  द्वार  था। सूर्य, चन्द्र और नागादि संज्ञक क्षत्रिय वंशो की शाखाओं प्रशाखाओं में बंटे महाजनपद गणराज्यों के शासक ही प्राचीन आर्य सभ्यता को मध्य एशिया तक प्रसारित करने में संघर्षरत थे। यह प्रसार क्रम कई द्वीपों तथा मध्य एषिया तक होता चला गया, जहाँ से उनका आना जाना बसना उजडना लगा रहता था। वर्तमान भारत में बिखरे पड़े हजारों षाखाओं व प्रषाखाओं में विभाजित करोड़ो संताने है जो सूर्य व चन्द्र वंष की दो समानान्तर विकसित सभ्यताओं के रूप में समूचे आर्यवर्त, हिमवर्ष व मध्यएषिया, अरब ईरान, मिश्र आदि तक फैल गये थे तथा अपने व अपने पूर्वजों, धर्मगुरूओं ओर  वंश पुरोहितों, ऋषियों आदि के नाम पर अपने गणराज्य व ठिकाने स्थापित कर रहे थे।।

रोहिला शब्द भी इसी क्रम की एक
 अटूट कड़ी है प्रयाग के पास झूँसी में विकसित प्राचीन चन्द्रवंषी चक्रवर्ती सम्राट पुरूरवा व उसके वंशधरो में प्रख्यात सम्राट ययाति के पांच पुत्र पंचजन कहलाये और उनके पाँच जनपद स्थापित हुए। लगभग सात सहस्त्राब्दी पूर्व मध्य देश आर्यवर्त में विश्व की प्राचीनतम् सभ्यता विकसित हो रही थी, इलाहाबाद, (प्रयाग) के पास झूँसी में चन्द्रवंषी क्षत्रियों व कौशल (अयोध्या) में सूर्य वंशी इक्ष्वाकु के वंशधरो के राज्य खण्ड स्थापित हो रहे थे। उस काल की परम्परा के अनुसार जिस सम्राट के रथ का चक्र अनेक राज्यों में निशंक घूमता हो वह चक्रवर्ती सम्राटों की श्रेणी में मान्य होता था। वन गमन से पूर्व (वानप्रस्थ आश्रम) सम्राट ययाति ने अपने पाँच पुत्रों क्रमश यदु, तुर्वसु, द्रहृाू (उपनाम रोहू) पुरू और अनु के लिए अपने साम्राज्य को पांच भागों में विभक्त कर प्रत्येक पुत्र को अपने-अपने प्रदेशों के शासनाधिकार का उत्तरदायित्व सौंप दिया था*

1. *यदु- दक्षिण पश्चिम में केन-बेतुआ और चम्बल नदी के कांठो का प्रदेश दिया, कालान्तर में यदु के वंशधर यादव कहलाये*।

2. *तुर्वसु-कुरूष प्रदेष वर्तमान बघेल खण्ड तुर्वसु को प्राप्त हुआ, वहां कुरूषजनों को परास्त कर तुर्वसु वंष की स्थापना हुई*।

3. *द्रह्यु- चम्बल नदी के उत्तर पश्चिम, सिन्धु नदी के किनारे तथा यमुना नदी के पष्चिम पचनद (पंजाब) का पूरा प्रान्त द्रह्यु को मिला। द्रुह्यु के वष्ंाधर आगे चल कर उत्तर और पूरब में हिन्दु कुष तथा पामीर ओर पश्चिमोत्तर में वाल्हिक, हरअवती तक के विस्तुत क्षेत्रों पर अपना अधिकार स्थापित करते चले गए और वैदिक संस्कृति का प्रसार किया*।

4. *पुरू- पुरू को प्रतिष्ठान के राज्य सिंहासन पर आसीन किया गया, पुरू के वंष आगे चलकर पौरव कहलाए इसी वंष में भरत का जन्म हुआ, आर्यवर्त, हिमवर्ष, जम्बूद्वीप (मध्यप्रदेष-विन्घ्याचल से हिन्दुकुष रोहित गिरी तक) का नाम भरत खण्ड भारत वर्ष कहलाया*।

5. *अनु- यमुना नदी को पूरब* *और गंगा यमुना के मध्य का देष (दक्षिण पंचाल) तथा अयोध्या के पष्चिम के क्षेत्र अनु को प्राप्त हुए अनु के वंष घर आनव कहलाए*। 



*इस प्रकार चन्द वंश का विस्तार हुआ*।



*आर्यवर्त की उत्तरी सीमा पर स्थित केकय देष भरत को उसकी माता कैकेयी के राज्य के कारण प्राप्त हुआ। भरत के दो पुत्रों तक्ष व पुष्कर ने क्रमषः तक्षषिला व पुष्करावती दो राजधानियां स्थापित की और आर्य संस्कृति को समृद्ध किया। उस काल में संस्कृत ही मातृभाशा थी*।



*भारत की पश्चिमि उत्तरीय सीमाओं पर जिस अवसर पर भी विदेशी आक्रमण हुए सूर्य वंशी भरत और चन्द्र वंशी द्रह्यु के वंशधरों ने मिल कर**
**प्रहरियों के अनुरूप अपना रक्त बहाया। ईसा से लगभग पाँच सौ वर्ष पूर्व से इस पर्वतीय प्रदेष में पचनद तक ‘कठ‘ गणराज्य, छुद्रक गणराज्य, यौधेय गणराज्य, मालव गणराज्य, अश्वक गणराज्य आदि फल फूल रहे थे। इनकी शासन प्रणाली गणतंत्रात्मक* *थी। यहाँ के निवासी सौंदर्यापासक थे और सुन्दर पुरुष ही राजा चुना जाता था। दु्रह्यु देश का नाम कालान्तर में द्रुह्यु के वंशज गंधारसैन के नाम पर गांधार और सूर्यवंषी राजाओं ने अपने शासित प्रदेष को ‘कपिष‘ के नाम से प्रसिद्ध कर काबुल (कुम्भा) नदी के पूर्वोत्तरीय क्षेत्र में अपनी राजधानी का नाम कपिषा रखा*

      *प्राचीन काल में कपिष (लडाकू, उदण्ड पर्वताश्रयी) और गान्धार की भाशा संस्कृत थी, किन्तु मध्यकाल से संस्कृत भाशा का विकृत सरलीकृत रूप ‘ प्राकृत‘ में परिवर्तित हो गया। भाषा के आधार पर यह स्पष्ट है कि इस प्रदेष में सहस्त्रों वर्ष तक भारतीय संस्कृति और सभ्यता स्थापित रही और इस समस्त प्रदेष में दीर्घ काल तक आर्य क्षत्रिय नरेषों का षासन रहा*।

      *अनेक पहाड़ियों (माल्यवत्त-रोहितगिरि-लोहितगिरि-हिन्दकाकेश्षस-रोहतांग आदि) नदियों (कुनार, स्वातु, गोमल, कुर्रम, सिन्धु की सहायक नदियाँ- सतलज, रावी, व्यास तथा घाटियों के कारण सामरिक दृष्टि से भी यह प्रदेष इन पर्वताश्रयी क्षत्रिय नरेषों के लिए महत्वपूर्ण था। यहाँ ठण्डी ऋतु जलवायु की दृष्टि से अति उत्तम रही। इसलिए यहां के निवासी बलिष्ठ, रक्तिम वर्ण (ललिमा चुक्त गोरा रंग) व कद काटी में मजबूब, हठी व गठीले होते रहे है। दुर्गम पहाड़ियों, नदियों व घाटियों के कारण यहां के निवासी पर्वताश्रयी, अश्वारोही थे। अश्वो के लिए प्रसिद्ध रहा यह प्रदेश रोहित गिरिये, रोहित नस्ल के अश्वों के व्यापार का प्रमुख केन्द्र था। क्रमषः *इसी कारण यह प्रदेष घोड़ों का प्रदेष अथवा अष्वकों का प्रदेश* *(अष्वकायन) कहलाता था*
**रोहित (संस्कृत), वर्तमान भाषा में लाल- भूरा रंग के घोड़े और श्येन नस्ल *के घोड़े पाए जाते थे। घोडों अथवा अष्वारोहण के बिना यहां जीवन* *सम्भव नहीं था। विदेषी* *आक्रमणों के समय अष्वों की प्रथम भूमिका थी। गहरे किसमिसी रंग के बहादुर घोड़ों को रोहित नाम से सम्बोधित किया जाता था*।
 *ईरानी व यूनानी विद्वानों के द्वारा भी इस प्रदेश के रोहित नस्ल के घोड़ों की प्रषन्सा की गई है*
* **इस प्रदेश के (महाजनपद) प्राचीन शासक (चन्द्रवंषी) द्रुह्यु का उपनाम भी रोहु था। इसलिए इसका नाम द्रुहयू का देश रोह देश रोहित गिरि रोह प्रदेश (अपभ्रनस होता चला* गया )हो जाना व्यावहारिक व स्वाभाविक था। *
*संस्कृत भाषा में रोह का अर्थ है- सीधे दृढ़-बल युक्त चढ़ना-अवरोहण करना, रक्तिम वर्ण (रोहित), पर्वत (माउण्टेन) इसलिए मध्यकाल तक ये पर्वताश्रयी* *क्षत्रिय शासक रोहित वर्ग से प्रसिद्ध हुए*। 
*पर्वतीय प्रदेश का नाम , रोहित प्रदेश*
  (प्रांकृत संस्कृत में) यहां सेनाओं की युद्ध प्रणाली रोहिल्ला युद्ध (रोहिला वार, लैटिन भाषा में) प्रणाली
 *सीधे दृढ़ बल युक्त पर्वत पर अवरोहण की तरह तीब्रता से शत्रु पर चढ़ जाना*
 *शत्रु सेना पर बाढ़ रोह की तरह, लाल* *होकर (रक्ति वर्ण क्रोधित आक्रोष युक्त) टूट पड़ना, तीब्रता से षत्रु सेना में घुस जाना। रोह (कमानी) के समान षत्रु सेना को भेदते, (काटते जाना) हुए चढ़ाई करना, प्रख्यात हुई* कालांतर में अनेक *क्षत्रिय सेनानायकों को , रोहिल्ला उपधि से विभूषित किया गया*। (मध्यकाल में)

‘‘धृतकौषिक मौद्गल्यौ आलम्यान परषरः।

सौपायनस्तथत्रिश्च वासुकी रोहित स्तथा।‘‘

(राष्ट्रधर्म-भाद्रपद 2067, सितम्बर 2010 के पृष्ठ 31 पर रोहित गोत्र का उपरोक्त श्लोक में वर्णन)

‘‘अरूषा रोहिता रथे बात जुता

वृषभस्यवते स्वतः‘‘ ।।10।।

(ऋग्वेद मण्डल 1, अ0 15 स्0 94 ‘‘ रोहिला क्षत्रियों का क्रमबद्ध इतिहासः पृष्ठ 42)



*मद्रान, रोहित कश्चैव, आगेयान, मालवान अपि गणन सर्वान, विनिजीत्य, प्रहसन्निव,। महाभारत वन पर्व 255-20 प्राचीन रोहित गिरि के नाम का अस्तित्व आज भी रोहतांग घाटी, रोहतांग दर्रानाम से अवस्थित है*।

*महाभारत के सभा पर्व में लोहित (रोहित) (संस्कृत शब्द) प्रदेश के दस मण्डलों का उल्लेख है जो भारत का उत्तर पूर्वी मध्यभाग था। श्री वासूदेव शरण अग्रवाल*

      ‘‘ *पाणिनि कालीन भारत वर्ष पृष्ठ 449 ‘‘ अश्येनस्य जवसा‘‘ वैदिक साहितय ऋग्वेद 1, अ0 17, मत्र 11, सुक्त 118-119 अर्थात- दृढ निश्चय के साथ (अश्येनस्य ) बाज पखेरू के समान (जवसा) तीव्र वेग के समान हम लोगो को आन मिली। (यह श्येन और रोहित नस्ल के घोडों की अश्व के रोहिला सेनाओं का वर्णन है*।)

  ‘‘ *उत्तरीय सीमा प्रान्त मे ंएक सुरम्य स्थानथा यहाँ का राजा क्षत्रिय था वह अपनी प्रजा को बहुत प्यार करता था, यहाँ विभिन्न प्रकार के अन्न व फलों के वृक्ष थे*
*यहां के निवासी भयानक थे तथा उनकी भाषा रूक्ष संस्कृत थी। ये रजत तथा ताम्र मुद्राओं का प्रयोग करते थे*
 *ये बहुत लडाकू तथा बहादूर थे यह क्षेत्र कुम्भा नदी के उत्तर पूर्व में 155 मील दूर था। ‘‘ एक प्रसिद्ध इतिहासकार टालेमी के अनुसार यह वर्णन चीन पागी युलान-च्वाड्डा ने किया। प्राचीन भारत का ऐतिहासिक भूगोल पृष्ठ 153-154 द्वारा श्री विमलचन्द्र लाहा (रोहिला क्षत्रिय क्रमबद्ध इतिहास से साभार‘‘) पाणिनी ने भी पश्चिमोत्तरीय सीमा प्रान्त के अश्वकायनों, अश्वकों, कठों, यादवों, छुद्रकों, मालवों निवासी सभी क्षत्रिय वर्गो को पर्वतीय और युद्धोपजीवि कहा है*।

      *पर्वतीय (संस्कृत-हिन्दी), माउण्टेनीयर (लैटिन-अंगे्रजी), रोहित, रोहिते, रोहिले (संस्कृत ‘प्राकृत‘ - पश्तों) रोहिले-चढ़ने वाले, चढाई करने वाले अवरोही, अश्वारोही, द्रोही रोह रोहि पक्थजन , आदि समानार्थी शब्दों का सम्बन्ध प्राचीन क्षत्रिय वर्गोक्षत्रिय शासित क्षेत्रों ,पर्वतीय प्रदेशों (रोहितगिरि, रोहताग दर्रा, लोहित गिरि, कोकचा, पर्वत श्रेणी आदि)युद्ध प्रणालियों और नदी घाटी, काॅठो घोड़ों की पीठ पर (चढ़कर करने बहादुरी के साथ लडने वाले गुणों स्वभावों व क्षात्र धार्मो से है। भारतीय इतिहास में रोहिला- क्षत्रिय एक गौरवशाली वंश परम्परा है जिसमें कई प्राचीन क्षत्रिय वंशों के वंशज पाए जाते है। क्येांकि यह शब्द, क्षेत्रीयता (रोहिल देश, रोहित प्रदेश रोहित गिरि आदि द्रोह देश- रोह देश) गुणधर्म (रोहित-रक्तिम वर्ण) (कसमिसि लाल रंग) युद्ध प्रणाली (रोहिल्ला-युद्ध) (पूर्व वर्णित प्रणाली) उपाधि, बहादूीर, शौर्यपदक और क्षत्रिय सम्मान से जुडा है, इसलिए जो भी क्षत्रिय राजपुत्र इन सभी से सम्बन्धित रहा- रोहिला-क्षत्रिय अथवा रोहिल्ला राजपुत्र कहलाया गया। रोहिला-पठान इस्लामीकरण के पश्चात् की पक्भजनों , (क्षत्रिय) की आधुनिक वंश परम्परा है। जबकि क्रमशः रोहिला-क्षत्रिय पुरातन काल से भारतवर्ष में एक प्रहरी के रूप में विद्यमान रहे है*। 
*सहारनपुर के प्रख्यात साहित्यकार श्री कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर ने अपने पावन ग्रन्थ ‘‘ भगवान परशुराम‘‘ में भी रोहिल देश की चर्चा की है*।

      *प्रतिष्ठित ज्योतिषी एवं ग्रन्थकार डा. सुरेश चन्द्र मिश्र ने हिन्दुस्तान दैनिक‘‘ के रविवार 20 नवम्बर 2009 के मेरठ संस्करण के पृष्ठ-2 पर ‘‘ मूल गोत्र तालिका (40गोत्र) के क्रमांक छः पर क्षत्रिय गो़त्र रोहित का वर्णन किया है। वैदिक काल में पांच की वर्ग या समुदाय आर्य क्षत्रियों के थे जो मिलकर पंचजना-पंचजन कहे जाते थे। इनके सम्मिलित निर्णय को सभी लोग विवाद की दशा में मान लेते थे। इसी शब्द की परम्परा से आज पंचायत शब्द प्रचलित है। ये पांच वशं पुरूष या गोत्रकर्ता थे*।

  *यादव कुल पुरुष यदु, पौरव वंश पुरूष पुरू, द्रहयु वंश पुरूष द्रुहयु, तुर्वषु और आनववंश पुरूष अनु, से शेष अन्य समुदाय निकले थे*।









*क्षत्रिय वंश तालिका -14 (गंधार) वं. ता.-5*

     *इन्ही पांच वंशों के पुरूषों से महापंचायत बनती थी। प्रारम्भ में इन्हीं पंचजनों से लगभग 400 क्षत्रिय गोत्रों का प्रसार हुआ*

      *भारत की पष्चिमोत्तरीय सीमा पर विदेषी आक्रमण कारियों के आक्रमणों को विफल करने के लिए वहां के निवासी क्षत्रिय वर्गो एवं शासकों ने आरम्भ से ही प्रत्येक अवसर पर आक्रान्ताओं के विरूद्ध घोर संघर्ष किया किन्तु मैदानी षासकों की दुर्बल सीमान्त निति के कारण उन्हें किसी भी प्रकार की सहायता उपलब्ध हो सकी। इसलिए सीमान्त प्रदेष के वीर प्रहरी वर्ग इन प्रबल सुगठित आकान्ताअें की अपार शक्ति के सम्मूख लगभग पाँच सौ वर्षो से अधिक संघर्ष न कर सके और सिकन्दर के आक्रमण ईसा पूर्व लगभग 326 के पष्चात् से नदियाँ घाटियाँ, पर्वताश्रय पार करने लगे और मैदानी स्थानों की तरफ पूर्व व पूर्वोत्तर की तरफ आने लगे*
*(अध्याय-9) क्षत्रिय कुल ‘ काठी क्रम सं. 5*

      *पष्चिमोत्तरीय-सीमा प्रान्त पंजाब की जातियों व समुदायों का विवरण जो कि - स्व. सर डैंजिल लिबैट्रषन द्वारा पंजाब की जनगणना सन् 1883 और सर एडवर्ड मैकलेजन द्वारा पंजाब की जनगणना 1892 पर आधारित, सर .एच.ए. रोज द्वारा संकलित कोष है*


हमारी गौरवशाली संस्कृति में सबसे गौरवशाली नाम और वैदिक नाम आर्य है, किंतु दुर्भाग्य से बहुत से लोग आर्य शब्द से नफरत करते हैं और तथाकथित मनुष्यों द्वारा दिए गए नाम को मानते हैं। 
यहां वैदिक और लौकिक ग्रंथों से 'आर्य' शब्द के कुछ प्रमाण दिए जा रहे हैं 

१) ऋग्वेद में :-
"कृण्वन्तो विश्वमार्यम ।"
      सारे संसार को 'आर्य' बनाओ, श्रेष्ठ बनाओ ।
२) मनुस्मृति में :-
"मद्द मांसा पराधेषु गाम्या पौराः न लिप्तकाः ।
आर्या ते च निमद्यन्ते सदार्यावर्त्त वासिनः ।।"
     वे ग्राम व नगरवासी, जो मद्द, मांस और अपराधों में लिप्त न हों तथा सदा से आर्यावर्त्त के निवासी हैं, वे 'आर्य' कहे जाते हैं ।
३) वाल्मिकी रामायण में :-
"सर्वदा मिगतः सदिशः समुद्र इव सिन्धुभिः ।
आर्य सर्व समश्चैव व सदैवः प्रिय दर्शनः ।।"
     (बालकाण्ड)
      जिस प्रकार नदियाँ समुद्र के पास जाती है, उसी प्रकार जो सज्जनों के लिए सुलभ हैं, वे 'आर्य' हैं, जो सब पर समदृष्टि रखते हैं, हमेशा प्रसन्नचित्त रहते हैं ।
४) महाभारत में :-
"न वैर मुद्दीपयति प्रशान्त,न दर्पयासे हति नास्तिमेति ।
न दुगेतोपीति करोव्य कार्य,तमार्य शीलं परमाहुरार्या ।।"
     (उद्योग पर्व)
     जो अकारण किसी से वैर नहीं करते तथा गरीब होने पर भी कुकर्म नहीं करते, उन शील पुरुषों को 'आर्य' कहते हैं ।
५) वशिष्ठ स्मृति में :-
"कर्त्तव्यमाचरन काम कर्त्तव्यमाचरन ।
तिष्ठति प्रकृताचारे यः स आर्य स्मृतः ।।"
      जो रंग, रुप, स्वभाव, शिष्टता, धर्म, कर्म, ज्ञान और आचार-विचार तथा शील-स्वभाव में श्रेष्ठ हो, उसे 'आर्य' कहते हैं ।
६) निरुक्त में यास्काचार्य जी लिखते हैं :-
"आर्य ईश्वर पुत्रः ।"
      'आर्य' ईश्वर के पुत्र हैं।
७) विदुर नीति में :-
"आर्य कर्मणि रज्यन्ते भूति कर्माणि कुर्वते ।
हितं च नामा सूचन्ति पण्डिता भरतर्षभ ।।"
      (अध्याय १ श्लोक ३०)
      भरत कुल भूषण ! पण्डितजन्य, जो श्रेष्ठ कर्मों में रुचि रखते हैं, उन्नति के कार्य करते हैं तथा भलाई करने वालों में दोष नहीं निकालते हैं, वही 'आर्य' हैं ।
८) गीता में :-
"अनार्य जुष्टम स्वर्गम् कीर्ति करमर्जुन ।"
        (अध्याय २ श्लोक २)
        हे अर्जुन ! तुझे इस असमय में यह अनार्यों का सा मोह किस हेतु प्राप्त हुआ, क्योंकि न तो यह श्रेष्ठ पुरुषों द्वारा आचरित है और न स्वर्ग को देने वाला है तथा न कीर्ति की और ही ले जाने वाला है । यहां पर अर्जुन के अनार्यता के लक्षण दर्शाये हैं ।
९) चाणक्य नीति में :-
"अभ्यासाद धार्यते विद्या कुले शीलेन धार्यते ।
गुणेन जायते त्वार्य,कोपो नेत्रेण गम्यते ।।"
       (अध्याय ५ श्लोक ८)
       सतत् अभ्यास से विद्या प्राप्त की जाती है, कुल, उत्तम गुण, कर्म, स्वभाव से स्थिर होता है, आर्य श्रेष्ठ गुणों के द्वारा जाना जाता है ।
१०) नीतिकार के शब्दों में :-
"प्रायः कन्दुकपातेनोत्पतत्यार्यः पतन्नपि ।
तथा त्वनार्ष पतति मृत्पिण्ड पतनं यथा ।।"
        आर्य पाप से लिप्त होने पर भी गेन्द के गिरने के समान शीघ्र ऊपर उठ जाता है, अर्थात पतन से अपने आपको बचा लेता है, अनार्य पतित होता है, तो मिट्टी के ढेले के गिरने के समान फिर कभी नहीं उठता ।
११) अमरकोष में :-
"महाकुलीनार्य सभ्य सज्जन साधवः ।"
      (अध्याय२ श्लोक६ भाग३)
      जो आकृति, प्रकृति, सभ्यता, शिष्टता, धर्म, कर्म, विज्ञान, आचार, विचार तथा स्वभाव में सर्वश्रेष्ठ हो, उसे 'आर्य' कहते हैं ।
१२) कौटिल्य अर्थशास्त्र में :-
"व्यवस्थितार्य मर्यादः कृतवर्णाश्रम स्थितिः ।"
         आर्य मर्यादाओं को जो व्यवस्थित कर सके और वर्णाश्रम धर्म का स्थापन कर सके, वही 'आर्य' राज्याधिकारी है ।
१३) पंचतन्त्र में :-
"अहार्यत्वादनर्धत्वाद क्षयत्वाच्च सर्वदा ।"
       सब पदार्थों में उत्तम पदार्थ विद्या को ही कहते हैं ।
१४) धम्मपद में :-
"अरियत्पेवेदिते धम्मे सदा रमति पण्डितो ।"
        पण्डित जन सदा आर्यों के बतलाये धर्म में ही रमण करता है ।
१५) पाणिनि सूत्र में :-
"आर्यो ब्राह्मण कुमारयोः ।"
        ब्राह्मणों में 'आर्य' ही श्रेष्ठ है।
१६) काशी विश्वनाथ मन्दिर के मुख्य द्वार पर :-
"आर्य धर्मेतराणो प्रवेशो निषिद्धः ।"
        आर्य धर्म से इतर लोगों का प्रवेश वर्जित है ।
१७) आर्यों के सम्वत् में :-
"जम्बू दीपे भरतखण्डे आर्यावर्ते अमुक देशान्तर्गते ।"
         ऐसा वाक्य बोलकर पौराणिक भाई भी संकल्प पढ़ते हैं, अर्थात यह आर्यों का देश 'आर्यावर्त्त' है ।
१८) आचार्य चतुरसेन :-
"उठो आर्य पुत्रों नहि सोओ ।
समय नहीं पशुओं सम खोओ ।
भंवर बीच में होकर नायक ।
बनो कहाओ लायक-लायक ।।"
        तुम्हारा जीवन पशुओं के समान निद्रा के वशीभूत होने के लिए निर्माण नहीं हुआ है । यह समय तुम्हें पुरुषार्थ करने का है, यदि जीवन में तुम पुरुषार्थ करोगे तो किसी कहानी के नायक बनकर समाज के आगे उपस्थित होवोगे ।
१९) पं. प्रकाशचन्द कविरत्न :-
"आर्य बाहर से आये नहीं,
देश है इनका भारतवर्ष ।
विदेशों में भी बसे सगर्व,
किया था परम प्राप्त उत्कर्ष ।।
आर्य और द्रविड जाति हैं,
भिन्नचलें यह विदेशियों की चाल ।
खेद है कुछ भारतीय भी,
व्यर्थ बजाते विदेशियों सम गाल ।।"
२०) पं. राधेश्याम कथावाचक बरेली वाले :-
जब पंचवटी में सूर्पणखा राम के पास मोहित होकर अपना विवाह करने की बात राम से कहती है,तब राम उत्तर देते हैं -                        
"हम आर्य जाति के क्षत्रिय हैं,
रघुवंशी वैदिक धर्मी हैं ।
जो करें एक से अधिक विवाह,
कहते वेद उन्हें दुष्कर्मी हैं ।।"
*इसमें रोहिला परिवारों* (राजपूत-क्लेन) का पर्याप्त विवरण है।
*संकलन एवम प्रस्तुति*
*समय सिंह पुंडीर*
*२२अगस्त २०१२*
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*विशेष नोट ____यहां प्रदर्शित सभी चित्र सोसल मीडिया से नेट द्वारा लिए गए है इनका लेखक से कोई संबंध नहीं ये सोसल मीडिया की संपत्ति है यहां केवल प्रतीकात्मक रूप से उड्धृत है।।।

ROHILA KINGDOM

*प्रमुख रोहिला क्षत्रिय शासक*

*1. अंगार सैन -* गांधार (वैदिक काल)
*2. अश्वकरण -* ईसा पूर्व 326 (मश्कावती दुर्ग)
*3. अजयराव -* स्यालकोट (सांकल दुर्ग) ईसा पूर्व 326
*4. प्रचेता -* मलेच्छ संहारक 
*5. शाशिगुप्त -* साइरस के समकालीन 
*6. सुभाग सैन -* मौर्य साम्राज्य के समकालीन 
*7. राजाराम शाह -* 909ईसवी रामपुर रोहिलखण्ड 
*8. बीजराज -* रोहिलखण्ड
*9. करण चन्द्र -* रोहिलखण्ड
*10. विग्रह राज -* रोहिलखण्ड - गंगापार कर स्रुघ्न जनपद (सुगनापुर) यमुना तक विस्तार दसवीं शताब्दी में सरसावा में किले का निर्माण पश्चिमी सीमा पर, यमुना द्वारा ध्वस्त टीले के रूप में नकुड़ रोड पर देखा जा सकता है।
*11. सावन्त सिंह -* रोहिलखण्ड
*12. जगमाल -* रोहिलखण्ड
*13. धिंगतराव -* रोहिलखण्ड
*14. गोंकुल सिंह -* रोहिलखण्ड
*15. महासहाय -* रोहिलखण्ड
*16. त्रिलोक चन्द -* रोहिलखण्ड
*17. रणवीर सिंह -* रोहिलखण्ड
*18. सुन्दर पाल -* रोहिलखण्ड
*19. नौरंग देव -* रोहिलखण्ड
*20. सूरत सिंह -* रोहिलखण्ड
*21. हंसकरण रहकवाल -* पृथ्वीराज के सेनापति 
*22. मिथुन देव रायकवार -* ईसम सिंह पुण्डीर के मित्र थाना भवन शासक 
*23. सहकरण, विजयराव -* उपरोक्त 
*24. राजा हतरा -* हिसार 
*25. जगत राय -* बरेली 
*26. मुकंदराज -* बरेली 1567 ई.
*27. बुधपाल -* बदायुं 
*28. महीचंद राठौर -* बदायुं
*29. बांसदेव -* बरेली 
*30. बरलदेव -* बरेली
*31. राजसिंह -* बरेली
*32. परमादित्य -* बरेली
*33. न्यादरचन्द -* बरेली
*34. राजा सहारन -* थानेश्वर 
*35. प्रताप राव खींची (चौहान वंश) -* गागरोन 
*36. राणा लक्ष्य सिंह -* सीकरी 
*37. रोहिला मालदेव -* गुजरात एवम जालोर
*38. जबर सिंह -* सोनीपत 
*39. रामदयाल महेचराना -* कलायथ
*40. गंगसहाय ,वीर गंगा सिंह महेचा राठौड़ रोहिला राजपूत -* महेचराना - क्लायथ 1761 ई.
*41. राणा प्रताप सिंह -* कौराली (गंगोह) 1095 ई.
*42. नानक चन्द -* अल्मोड़ा 
*43. राजा पूरणचन्द -* बुंदेलखंड 
*44. राजा हंस ध्वज -* हिसार व राजा हरचंद 
*45. राजा बसंतपाल -* रोहिलखण्ड व्रतुसरदार, सामंत वृतपाल 1193 ई.
*46. महान सिंह बडगूजर -* बागपत 1184 ई.
*47. राजा यशकरण -* अंधली 
*48. गुणाचन्द -* जयकरण - चरखी - दादरी 
*49. राजा मोहनपाल देव -* करोली 
*50. राजारूप सैन -* रोपड़ 
*51. राजा महीपाल पंवार -* जीन्द 
*52. राजा परपदेड पुंडीर -* लाहौर 
*53. राजा लखीराव -* स्यालकोट 
*54. राजा जाजा जी तोमर -* दिल्ली 
*55. खड़ग सिंह -* रोहिलखण्ड लौदी के समकालीन 
*56. राजा हरि सिंह -* खिज्रखां के दमन का शिकार हुआ - कुमायुं की पहाड़ियों में अज्ञातवास की शरण ली 
*57. राजा इन्द्र सिंह (रोहिलखण्ड) (इन्द्रसेन) -* सहारनपुर में प्राचीन रोहिला किला बनवाया रोहिला क्षत्रिय वंश भास्कर लेखक आर. आर. राजपूत मुरसेन अलीगढ से प्रस्तुत 
*58. राजा बुद्ध देव रोहिला -* 1787 ई., सिंधिया व जयपुर के कछवाहो के खेड़ा व तुंगा के मैदान में हुए युद्ध का प्रमुख पात्र (राय कुँवर देवेन्द्र सिंह जी राजभाट, तुंगा (राजस्थान)


तुंगा का युद्ध (जब राठौड़ों की तलवारों ने फ्रांसीसी तोपों के चीथड़े उड़ा दिए!)
इतिहास की किताबों में मराठों की ताकत बहुत गाई जाती है, लेकिन जयपुर और जोधपुर की संयुक्त सेना ने 1787 में जो किया था, वो दुनिया का सबसे खौफनाक 'कैवेलरी चार्ज' था!
*राजा बुद्धदेव रोहिला भी इस युद्ध। का प्रमुख पात्र था।*
"फ्रांसीसी तोपों के सामने नंगी तलवारें लेकर टूट पड़े थे मारवाड़ के शेर... इतिहास का सबसे खौफनाक कैवेलरी चार्ज!
1787 ई. में 'तुंगा के युद्ध' में जोधपुर के महाराजा विजय सिंह और जयपुर के महाराजा प्रताप सिंह की संयुक्त राजपूत सेना का सामना महादजी सिंधिया की विशाल मराठा फौज से हुआ।

सिंधिया की फौज के पास फ्रांस के मशहूर जनरल 'डी बोइन' द्वारा ट्रेन की गई सबसे आधुनिक तोपखाना यूनिट थी। तोपों की भयंकर गोलाबारी के बीच, मारवाड़ के राठौड़ घुड़सवारों ने मौत की परवाह किए बिना अपनी तलवारें निकालीं और सीधे तोपों के मुहाने पर अकल्पनीय 'सुसाइड चार्ज' कर दिया!

राठौड़ों की इस आंधी ने फ्रांसिसी जनरलों के होश उड़ा दिए। उन्होंने तोपचियों को वहीं काट डाला और मराठा सेना के बीचों-बीच घुसकर लाशों के ढेर लगा दिए। इस भयंकर राजपूती हमले के खौफ से महादजी सिंधिया को रातों-रात मैदान छोड़कर भागना पड़ा था!
*नोट* ..*इनके अतिरिक्त और बहुत से रोहिला शासक विभिन्न स्थानों पर हुए,जिनकी खोज जारी हैं क्योंकि क्षत्रिय इतिहास को छिपाया गया है जैसे महोबा में चंदेला से पहले रोहिला शासन था, राजस्थान के राठौड़ रोहिलखंड बंदायू से आए थे*




* दिनांक 10मई 2011 प्रकाशित.क्षत्रिय आवाज मासिक पत्रिका एवम राजपूत/क्षत्रिय वाटिका(क्षत्रिय वंशावली) 22अगस्त2012 🙏*
*जय राजपूताना*

*विशेष नोट__ये चित्र नेट द्वारा सोसल मीडिया से लिए गए केवल प्रतीकात्मक रूप है लेखक का उनसे कोई लेना देना नही है।।।
विभिन्न राजाओं के चित्र केवल प्रतीकात्मक है ये रोहिलखंड के और राजपूताना रोहिलखंड के राजा नही है।।
आभार दर्शकों का

Wednesday, 22 July 2026

RAJPUTANA KKATHHEHAR KE AJEY YODDHHA

*राजपुताना कठेहर रोहिलखंड*
के एक महान पराक्रमी योद्धा 
सूर्य वंशी क्षत्रिय सम्राट
*एक अजेय योद्धा*
*महाराजा रणवीर सिहं कठेहरिया रोहिला*

      *संक्षिप्त परिचय*
************************* *जन्म दिवस* 25 अक्टूबर, 1204 तदानुसार तत्कालीन कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की प्रथमा तिथि संवत 1261 विक्रमी
#पिता* महाराज त्रिलोक सिंह जी काठी क्षत्रिय 
*************************
*वंश* _सूर्यवंश की निकुंभ शाखा 
वेद _यजुर वेद,उपवेद__धनुर्वेद,प्रवर_एक/तीन , शिखा_दाहिनी, पाद_दाहिनी,सूत्र _गुभेल,देवता__विष्णु (रघुनाथ जी), कुलदेवी _चावड़ा/कालिका माता,ध्वजा__गरुड़,नदी__सरयू,झंडा पंच रंगा,नगाड़ा_रण गंजन , ईष्ट_रघुनाथ/श्री राम चंद्र जी,उद्घोष_हर हर महादेव गोत्र_वशिष्ठ गुणधर्म _काठी (कठोर) गद्दी _ अयोध्या,ठिकाना__रावी व व्यास नदियों के बीच के काठे का क्षेत्र 
*************************
#राज्य विस्तार*
◆गंगा - यमुना दोआब क्षेत्र #दक्षिण पश्चिम में गंगा तक #पश्चिम में उत्तराखंड 
#उत्तर में नेपाल तक
*क्षेत्रफल* 25000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र या 10000 वर्ग मील क्षेत्र तक 

# सूबे* 
पांचाल, 
मध्यदेश,
कठेहर रोहिलखण्ड
*राजधानी* -रामपुर (निकट अहिक्षेत्र, रामनगर) कांपिल्य
##################
(तेहरवीं शताब्दी का पूर्वार्द्ध)

🔆सूर्यवंश🔆
***********************
#आइए इतिहास में चलें*



"*काल भी अगर छोड दे लेकिन काठी नहीं छोडता”* 
*(Time ( Death ) Forgets But Not Kathi )*

क्या हैं - “काठी और काठीयावाड, कठेहर खंड ” ?

काठी दरबार भव्यअतित कि श्रृंखला मे एक प्रसिद्ध नाम , यह एक क्षत्रिय संघ जो वीरता का वैभव , शौर्य का प्रतीक और अपने कठोर स्वाभीमानी गुणो से प्रसिद्ध है। 

*इसलिए इनके बारे प्रसिद्ध कहावत हैं - "काल भी अगर छोड दे लेकिन काठी नहि छोडता”*
सिकंदर के आक्रमण के पश्चात भारत की पश्चिमी उत्तरीय सीमा प्रांत के प्रहरी इन क्षत्रिय वीरों ने मैदानों का रुख किया,एक टुकड़ी सौराष्ट्र आई दूसरी उत्तरी पांचाल में तथा एक टुकड़ी काठी क्षत्रियों की नेपाल गई।
उत्तरी पांचाल को कठेहर खंड /रोहिलखंड के नाम से विकसित कर स्थिर रूप से राज्य स्थापित किया।
नेपाल में काठी क्षत्रियों ने कठेत कटायतkathayat साम्राज्य स्थापित किया।
 एक टुकड़ी ने थोडी कुछ शताब्दियो से उन्होने स्थिर रुप से अपना निवासस्थान सौराष्ट्र को बना लिया और इतना हि नहीं युगों से पुराण प्रसिद्ध सौराष्ट्र नाम इन्हि के कारण पलटकर ' काठीयावाड ' नाम से मशहुर हुआ एसी इन्होने इस विस्तार कि संस्कृति मे अमिट छाप छोडी हैं। 

कठ गणराज्य वाहिक प्रदेश ( हाल के पंजाब ) मे प्रसिद्ध था।इनकी राजधानी ( संगल ) सांकल थी ,(आज का स्याल कोट)एक उल्लेख मिलता है कि इन पंजाब वासी कठो के नाम से आज के अफगानिस्तान के गजनी प्रांत मे ' काटवाज ' क्षेत्र हे । कठ लोगों के शारीरिक सौदर्य और अलौकिक शौर्य की ग्रीक इतिहास लेखकों ने भूरि - भूरि प्रशंसा की है , ग्रीक लेखकों के अनुसार कठों के यहाँ यह प्रथा प्रचलित थी कि वे केवल स्वस्थ एवं बलिष्ठ संतान को ही जीवित रहने देते थे । 

सीक्रीटोस लिखता है कि वे सुंदरतम एवं बलिष्ठतम व्यक्ति को ही अपना शासक चुनते थे , ग्रिक इतिहासकारो ने कठो को कठोइ या काठीयन जैसे नामो से निर्देषीत किया हे , पाणिनी के ' अष्टाध्यायी ' मे कठो का उल्लेख हे , पंतजली के महाभाष्य के मत से कठ वैशपायन के शिष्य थे । इनकि प्रवर्तित वेदसंहिता कि शाखा ' काठक ' नाम से प्रसिद्ध थी । 

काठक कापिष्ठल संहिता जैतारायण , प्रत्धन ( दिवोदासी ) भीमसेनी इन राजाओ का नाम मीलते हे जीन्होने राजसूय यज्ञ किया था । इन्होने कई बार पोरस को हराया था।
सिकंदर को घुटने टेकने पर मजबूर किया,कठगणराज्य की राजकुमारी कार्विका उर्फ कर्णिका ने सिकंदर को अपनी नारी सेना के द्वारा परास्त किया घायल किया। वह तो आंतरिक राजाओं की सहायता से बच निकला था।
Painting : 1880's. ' A kathiavad Sentry’
By Artist - Horace van Ruith . 

#kathiyawad #history #gujrat #mumbai #indianhistory #rajput #kathi #indianhistory #rajputhistory #sentry #sword #shield
https://www.facebook.com/share/1BthabtZzW/(नव युवक मंडल मेवाड़)
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* इस्क्वाकू वंश में सूर्य वंशी महाराज निकुम्भ के वंशधर ई●पू● 326 वर्ष कठगण राज्य (रावी नदी के काठे में) सिकन्दर का आक्रमण काल-राजधानी सांकल दुर्ग (वर्तमान स्यालकोट) 53 वीं पीढ़ी में राजा अजयराव के वंशधर निकुम्भ वंशी राजस्थान अलवर, मंगल गढ़ जैसलमेर होते हुए गुजरात सौराष्ट्र कठियावाड , फिर पांचाल, मध्यदेश गये। 
* एक टुकड़ी नेपाल गई
*************************
*अलवर में दुर्ग निकुम्भ वंशी (कठ क्षत्रिय रावी नदी के काठे से विस्थापित कठ-ंगण जिन्होंने सिकंदर को घुटने टेकने पर मजबूर किया था) क्षत्रियों ने बनवाया (राज्य मंगल गढ़), सौराष्ट्र में काठियावाड़ की स्थापना की ।
*************************
 #मध्यदेश के उत्तरी पांचाल में कठेहर रोहिलखंड राज्य की स्थापन। यहां अहिक्षेत्र के पास रामनगर गांव मे राजधानी स्थापित की, ऊंचा गांव मझगांवा को सैनिक छावनी बनाया। यहां पर शासक हंसदेव, रहे, इनके पुत्र हंसबेध राजा बने-ं816 ई. तक- इसी वंश में राजा रामशाही (राम सिंह जी ) ने रामपुर गांव को एक नगर का रूप दिया और *909 ई में कठेहर- रोहिलखण्ड प्रान्त की राजधानी रामपुर में स्थापित की। 
#यहां पर कठ क्षत्रियों ने 11 पीढ़ी शासन किया इसी वंश75 में महापराक्रमी, विधर्मी संहारक राजा रणवीर
सिंह कठेहरियारोहिला का जन्म कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की प्रथमा तिथि तदानुसार 25 अक्टूबर 1204ईसवी को राजपूत काल के ऐसे समय में हुआ जब महराजा पृथ्वी राज चौहान के शासन अंत के कारण समस्त राजपूत शक्ति क्षीण हो चुकी थी ओर मुस्लिम आक्रांता इस्लामिक सल्तनत कायम करने में लगे थे बची हुई राजपूत शक्तियों का बहुत कठोरता ओर बर्बरता से दमन कर रहे थे हिंदुआ सूर्य चौहान का शासन अस्त हो चुका था ।
वंश वृक्ष इस प्रकार पाया गया
रामपुर संस्थापक राजा राम सिंह उर्फ रामशाह 909 ई. में 966 विक्रमी , 3 पौत्र- बीजयराज 4. करणचन्द 5. विग्रह राज 6. सावन्त सिंह (रोहिलखण्ड कठेहर का विस्तार गंगापार कर यमुना तक किया,) सिरसापाल के राज्य सरसावा में एक किले का निर्माण कराया। (दशवीं शताब्दी का उत्तरार्द्ध) नकुड रोड पर किले को आज यमुना द्वारा ध्वस्त एक टीले के रूप में देखा जा सकता है। 7. जगमाल 8 धिंगतराम 9 गोकुल सिंह 10 महासहाय 11 त्रिलोकसिंह 12रणवीर सिंह( 1204 ),नौरंग देव (पिंगू को परास्त किया) (राजपूत गजट लाहौर 04.06.1940 द्वारा डा0 
सन्त सिंह चैहान)
इक्कीस वर्ष की आयु में रामपुर के राजा त्रिलोक चंद उर्फ त्रिलोक सिंह के पुत्र रणवीर सिंह रोहिला का विवाह विजयपुर सीकरी की राजकुमारी तारा देवी से हुआ। रणवीर सिंह रोहिला का राजतिलक भी इसी वर्ष इक्कीस वर्ष की आयु में हुआ यानी 1225,ईसवी में हुआ ,इनकी लंबाई लगभग सात फीट थी, कंधो पर सीना कवच लगभग साठ शेर ,सिर पर कवच लोहे का इक्कीस सेर खड़ग का वजन 25, सेर ओर स्वयं उनका वजन 125 सेर था। सन् 1236से1240 तक रजया तुदीन सुल्तान सन 1242 मइजुद्दीन बहराम शाह सन,1246 अलाउद्दीन महमूद शाह आदि दिल्ली सुल्तान सेनाओं से राजा रणवीर सिंह रोहिला , कठेहरिया ने कठेहर रोहिलखंड का लोहा मनवाया ओर किसी भी दिल्ली सुल्तान मामुल्क को रोहिलखंड में प्रवेश नहीं होने दिया । इनके साथ विभिन्न राजवंशों के चौरासी अजेय योद्धा थे ,राठौड़, गोड, चौहान,वारेचा परमार गहलोत वच्छिल आदि थे वे सब लोहे के कवच धारी थे।
दिल्ली सुल्तान के 
गुलाम , सेनापति नासिरूद्दीन चंगेज उर्फ नासिरूद्दीन महमूद ने , सन् 1253 ई0,में दोआब, कठेहर, शिवालिक पंजाब, बिजनौर आदि क्षेत्रों पर विजय पाने के लिए दमनकारी अभियान किया। इतने अत्याचार , मारकाट तबाही मचाई कि विद्रोह करने वाले स्थानीय शासक, बच्चे व स्त्रियां भी सुरक्षित नहीं रही। ऐसी विषम परिस्थिति में रोहिल खण्ड के रोहिला शासकों ने दिल्ली सल्तनत के सूबेदार‘ ताजुल मुल्क इज्जूददीन डोमिशी‘ को मार डाला। दिल्ली सल्तनत के लिये यह घटना भीषण चुनौती समझी गई। इस समय रामपुर के राजा रणवीर सिंह थे । उन्होनें आस पास की समस्त राजपूत शक्तियों को एकता के सूत्र में बांधा ओर दिल्ली सल्तनत के विरूद्ध अपनी क्रान्तिकारी प्रवृत्ति को सजीव बनाये रखा था जिससे दिल्ली सुल्तान कठेहर पर आक्रमण करते हुए भय खाते थे ,नासिरूद्दीन महमूद बहराम गुलाम वंश ( उर्फ चंगेज) इस घटना से उद्वेलित हो उठा और सहारनपुर ‘ उशीनर प्रदेश‘ के मण्डावार व मायापुर से 1253 ई0 में गंगापार कर गया और विद्रोह को दबाता हुआ, रोहिलखण्ड को रौदता हुआ बदांयू पहुंचा। वहां उसे ज्ञात हुआ कि रामपुर में राजा रणवीर सिंह रोहिला के साथ लोहे के कवचधारी 84 रोहिले है जिनसे विजय पाना टेढ़ी खीर है। सूचना दिल्ली भेजी गई। दिल्ली दरबार में सन्नाटा हो गया कि एक छोटे राज्य कठेहर रोहिलखंड के रोहिलों से कैसे छीना जाए। नासिरूद्दीन चंगेज (महमूद) ने तलवार व बीड़ा उठाकर राजा रणवीर सिंह के साथ युद्ध करने की घोषणा की। रामपुर व पीलीभीत के बीच मैदान में नसीरुद्दीन व कठेहर नरेश सूर्य वंशी क्षत्रिय रणवीर सिंह की सेना के बीच भयंकर युद्ध हुआ, 6000 रोहिला राजपूत व 
 84 लोहे के कवचधारी रन्धेलवंशी सेना नायकों की सेना के सामने नासिरूद्दीन की तीस हजारी सेना के पैर उखड़ गये।
      नासिरूद्दीन चंगेज को बन्दी बना लिया गया। बची हुई सेना के हाथी व घोडे तथा एक लाख रूपये महाराज रणवीर सिंह को देने की प्रार्थना पर आगे ऐसा अत्याचार न करने की शपथ लेकर नासिरूद्दीन महमूद ने प्राण दान मांग लिया। क्षात्र धर्म के अनुसार शरणागत को अभयदान देकर राजा रणवीर सिंह ने उसे छोड़ दिया। परन्तु धोखेबाज महमूद जो राजा रणवीर सिंह पर विजय पाने का बीड़ा उठाकर दिल्ली से आया था, षडयंत्रों में लग गया। राजा रणवीर सिंह का एक दरबारी पं. गोकुलराम पाण्डेय था। उसे रामपुर का राजा नियुक्त करने का लालच देकर महमूद ने विश्वास में ले लिया और रामपुर के किले का भेद लेता रहा। पं. गोकुल राम ने लालच के वशीभूत होकर विधर्मी को बता दिया कि रक्षांबधन के दिन सभी राजपूत निःशस्त्र होकर शिव मन्दिर में शस्त्र पूजा करेंगें।यह शिव मन्दिर किले के दक्षिण द्वार के समीप है , यह सुनकर महमूद का चेहरा खिल उठा और दिल्ली से भारी सेना को मंगाकर जमावड़ा प्रारम्भ कर दिया रक्षाबन्धन का दिन आ गया। किले में उपस्थित सभी सैनिक, सेनाायक अपने-ंअपने शस्त्रों को उतार कर पूजा स्थान पर शिव मन्दिर ले जा रहे थे। गोकुल राम पाण्डेय यह सब सूचना विधर्मी तक पहुंचाता रहा। श्वेत ध्वज सामने रखकर दक्षिण द्वार पर पठानों की गुलामवंशी सेना एकत्र हो गयी। पूजा में तल्लीन राज पुत्रों को पाकर गोकुलराम पाण्डेय ने द्वार खोल दिया।
      शिव उपासना में रत सभी उपस्थितों को घेरे में ले लिया गया। समस्त राजपूत भौचक्के रह गए ओर मन्दिर से तुलसी का पत्ता लिया ओर मुंह में दबा कर शाका बोल दिया,घमासान युद्ध छिड़ गया परन्तु ऐसी गद्दारी के कारण राजा रणवीर सिंह ने निशस्त्र लड़ते हुए अदम्य साहस ओर शोर्य का परिचय दिया ओर महमूद के सैनिकों से भिड़ गए अद्भुत दृश्य था रणवीर सिंह चारो ओर से विधर्मी सैनिकों से घिरे युद्ध कर रहे थे विधर्मी की खड़ग छीन ली ओर आक्रांताओं के शीश कट कट गिरने लगे , उस समय रामपुर के किले में केवल तीन हजार राजपूत ही उपस्थित थे ओर वे भी निहत्थे रह गए थे सभी राजपूत बड़ी वीरता से लडे किन्तु संख्या में कम होने के कारण बिखर गए, रणवीर सिंह कठहरिया रोहिला की पीठ पर विधर्मी सेना ने तलवार से वार करके काट डाला ओर अंतिम बूंद रक्त की रहने तक रणवीर धराशाई नहीं हुए यह देख कर नसीरुद्दीन चकित रह गया देखते ही देखते कठेहर नरेश वीरगति को प्राप्त हुए। नासिरूद्दीन ने पं. गोकुल राम से कहा कि जिसका नमक खाया अब तुम उसी के नहीं हुए तो तुम्हारा भी संहार अनिवार्य है। नमक हरामी को जीने का हक नहीं है। गोकुल का धड़ भी सिर से अलग पड़ा था। सभी स्त्री बच्चों को लेकर रणवीर सिंह का भाई सूरत सिंह उर्फ सुजान सिंह किले से पलायन कर गया । महारानी तारादेवी जो विजय पुर सीकरी के राजा की पुत्री थी राजा रणवीर सिंह के साथ सती हो गई। 
रामपुर में किले के खण्डरात, सती तारादेवी का मन्दिर तथा उनका राजमहल अभी तक एक ध्वस्त टीले के रूप में मौजूद है, जो क्षात्र धर्म का परिचायक व रामपुर में रोहिला क्षत्रियों की कठ-शाखा के शासन काल की याद ताजा करता है जिन्होंने अपना सर्वस्व बलिदान कर क्षात्र धर्म की रक्षा की। गुलाम वंश, सल्तनत काल में विधर्मी की पराधीनता कभी स्वीकार नहीं की। अन्तिम सांस तक दिल्ली सल्तनत से युद्ध किया और कितनी ही बार धूल चटाई तथा रोहिलखण्ड को स्वतंत्र राज्य बनाये रखा। निरन्तर संघर्ष करते रहे राजा रणवीर सिंह कठहरिया का बलिदान व्यर्थ नहीं , सदैव तुगलक, मंगोल , मुगलों आदि से विद्रोह किया और स्वतंत्र रहने की भावना को सजीव रखा। राणा रणवीर सिंह के वंशधर आज भी रोहिला-ंक्षत्रियों में पाए जाते हे,जय राजपुताना कठेहर रोहिलखंड
उनकी पावन स्मृति को जीवित रखने व रोहिलखंड कठेहर राजपूताना की वीर गाथा को सजीव बनाए रखने के लिए भारत का समस्त रोहिला क्षत्रिय राजपूत समाज रक्षा बन्धन को शोर्य दिवस तथा पच्चीस अक्टूबर को प्रतिवर्ष स्वाभिमान दिवस के रूप में मनाता हे ओर शस्त्र पूजा करता है । उत्तर भारत के महानगर बड़ौत में राजा रणवीर सिंह रोहिला मार्ग व ऐतिहासिक नगर सहारनपुर में आज महाराजा रण वीर सिंह रोहिला चौक स्थित है। (संदर्भ__इतिहास रोहिला राजपूत द्वारा डॉक्टर के सी सेन,
ठाकुर अजीत सिंह परिहार बालाघाट मध्य प्रदेश, मध्यकालीन भारत बीएम रस्तोगी ,रोहिला क्षत्रियों का क्रमबद्ध इतिहास द्वारा श्री दर्शन लाल रोहिला, रोहिला क्षत्रिय वंश भास्कर द्वारा आर आर राजपूत, रोहिला क्षत्रिय जाति निर्णय द्वारा राय भीम राज राजभाट बड़वा जी का बाड़ा तूंगा राजस्थान, काठी कठेरिया क्षत्रिय व रोहिला राजपूत द्वारा महेश सिंह कठाय त नेपाल , मध्य कालीन भारत द्वारा ठाकुर अजित सिंह परिहार बाला घाट मध्य प्रदेश  
संकलन व लेखन 
समय सिंह पुंडीर
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क्षत्रिय/राजपूत वाटिका
अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा
राष्ट्रीय प्रवक्ता 
*क्षत्रिय अस्तित्व न्याय मोर्चा भारत*
नोट
*सनातन रक्षक,विधर्मी संहारक और लगभग तीस वर्ष तक आक्रांताओं द्वारा किए जा रहे इस्लामी करण को रोकने वाले राजपूत सम्राट रोहिलखंड नरेश महाराजा रणवीर सिंह रोहिला काठी क्षत्रिय की जयंती सभी क्षत्रिय भाई स्वाधीनता और स्वाभिमान दिवस के रूप में मनाते हैं*

THE FOUNDERS OF RAJPUTANA KATHHEHAR ROHILKHANND

*KSHTRIYA SAMRAT MAHARAJA RANVEER SINGH ROHILA,THE FOUNDER OF ROHILKHANND*
🙏 क्रमबद्ध, विस्तृत एवं प्रभावशाली ऐतिहासिक जीवन परिचय प्रस्तुत है।
(लेखन शैली: संतुलित – इतिहास + प्रेरणात्मक, शोधपरक संरचना सहित)
महाराजा रणवीर सिंह रोहिला
कठेहर–रोहिलखण्ड के अजेय क्षत्रिय शासक
(जन्म: 25 अक्टूबर 1204 ई., बलिदान: 13वीं शताब्दी मध्य)
1. प्रस्तावना
भारतीय इतिहास में अनेक ऐसे वीर क्षत्रिय हुए जिन्होंने सीमित संसाधनों में भी विदेशी आक्रमणकारियों का डटकर सामना किया। कठेहर–रोहिलखण्ड (वर्तमान उत्तर प्रदेश का उत्तरी भाग) के पराक्रमी शासक महाराजा रणवीर सिंह रोहिला उन्हीं में से एक थे। उन्होंने दिल्ली सल्तनत के विस्तारवादी अभियानों का विरोध करते हुए स्वतंत्रता और क्षात्र धर्म की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व बलिदान कर दिया।
उनका जीवन केवल एक क्षेत्रीय शासक की कथा नहीं, बल्कि आत्मसम्मान, युद्धनीति और राष्ट्ररक्षा का आदर्श उदाहरण है।
भाग 1
काठी, कठेहर और काठियावाड़ का ऐतिहासिक आधार
2. सूर्यवंश और निकुम्भ वंश
महाराजा रणवीर सिंह रोहिला सूर्यवंशी क्षत्रिय परंपरा से संबंधित माने जाते हैं। परंपरागत वंशावली के अनुसार यह वंश इक्ष्वाकु कुल से उत्पन्न हुआ, जिसे भगवान राम की वंश परंपरा माना जाता है। निकुम्भ नामक पराक्रमी राजा से निकुम्भ वंश की स्थापना मानी जाती है।
इस वंश की एक शाखा “कठ” या “काठी” कहलायी।
3. कठ गणराज्य और सिकंदर काल
ईसा पूर्व 326 में जब Alexander the Great ने उत्तर-पश्चिम भारत पर आक्रमण किया, उस समय रावी नदी के तट पर कठ गणराज्य का उल्लेख मिलता है। इसकी राजधानी “सांकल” (वर्तमान स्यालकोट) बताई जाती है।
यूनानी लेखकों ने कठों (Kathoi/Kathaeans) की वीरता, शारीरिक सौष्ठव और युद्ध कौशल की प्रशंसा की है। कुछ ग्रंथों में उल्लेख है कि वे स्वस्थ और बलिष्ठ संतानों को ही जीवित रखते थे तथा सर्वश्रेष्ठ योद्धा को शासक चुनते थे।
संस्कृत व्याकरणाचार्य Panini की अष्टाध्यायी में कठों का उल्लेख मिलता है। महाभाष्यकार Patanjali ने भी कठों का उल्लेख किया है।
4. काठियावाड़ और कठेहर का विकास
सिकंदर के आक्रमणों के पश्चात कठ क्षत्रियों के विभिन्न समूहों ने भारत के विभिन्न क्षेत्रों में प्रवास किया—
एक शाखा सौराष्ट्र गई — जहाँ “सौराष्ट्र” क्षेत्र “काठियावाड़” नाम से प्रसिद्ध हुआ।
एक शाखा उत्तर भारत के पंचाल क्षेत्र में बसी — जो आगे चलकर “कठेहर खण्ड” या “रोहिलखण्ड” कहलाया।
एक शाखा नेपाल क्षेत्र में गई — जहाँ “कटायत” परंपरा का उल्लेख मिलता है।
काठी वीरों के विषय में कहावत प्रचलित हुई:
“काल भी अगर छोड़ दे, लेकिन काठी नहीं छोड़ता।”
भाग 2
कठेहर राज्य की स्थापना
5. रामपुर की स्थापना
लगभग 7वीं–10वीं शताब्दी के मध्य कठेहर क्षेत्र में स्थायी राज्य की स्थापना हुई।
राजा रामसिंह (रामशाह) ने 909 ईस्वी (विक्रमी 966) में रामपुर नगर को राजधानी के रूप में विकसित किया। यह क्षेत्र अहिक्षेत्र (वर्तमान रामनगर के निकट) के आसपास स्थित था।
इसके बाद 11 पीढ़ियों तक कठ क्षत्रियों ने शासन किया।
वंशावली में उल्लेखित प्रमुख नाम:
रामशाह (रामसिंह)
बीजयराज
करणचन्द
विम्रहराज
सावन्त सिंह
जगमाल
रणवीर सिंह
धिंगतराम
गोकुल सिंह
महासहाय
त्रिलोकचन्द
नौरंग देव
भाग 3
महाराजा रणवीर सिंह रोहिला
6. जन्म और व्यक्तित्व
जन्म: 25 अक्टूबर 1204 ईस्वी
विक्रम संवत: 1261
स्थान: रामपुर, कठेहर-रोहिलखण्ड
गोत्र: वशिष्ठ
वंश: निकुम्भ वंशी कठेहरिया क्षत्रिय
वे युद्धकला, घुड़सवारी और शस्त्र संचालन में निपुण थे। उनके साथ 84 कवचधारी रोहिला वीरों की विशिष्ट सेना रहती थी।
7. दिल्ली सल्तनत से संघर्ष
13वीं शताब्दी में दिल्ली में गुलाम वंश का शासन था। उस समय सुल्तान Nasiruddin Mahmud नाममात्र का शासक था, जबकि वास्तविक सत्ता Ghiyas ud din Balban जैसे शक्तिशाली अमीरों के हाथों में थी।
1253–1254 ईस्वी में दोआब, कठेहर और शिवालिक क्षेत्रों में दमनकारी अभियान चलाया गया। स्थानीय शासकों और जनता पर अत्याचार हुए।
रोहिलखण्ड में विद्रोह भड़क उठा और दिल्ली सल्तनत के सूबेदार की हत्या कर दी गई।
8. निर्णायक युद्ध
रामपुर और पीलीभीत के मध्य मैदान में दिल्ली सल्तनत की लगभग 30,000 सेना और रणवीर सिंह के नेतृत्व में रोहिला योद्धाओं के बीच भयंकर युद्ध हुआ।
परंपरा के अनुसार:
84 कवचधारी रणधेलवंशी वीरों ने असाधारण पराक्रम दिखाया
शत्रु सेना के हाथी-घोड़े परास्त हुए
नासिरूद्दीन को बंदी बनाया गया
क्षात्र धर्म के अनुसार शरणागत को अभयदान देकर रणवीर सिंह ने उसे छोड़ दिया।
9. विश्वासघात और बलिदान
दिल्ली दरबार ने पुनः षड्यंत्र रचा।
दरबारी पंडित गोकुलराम पाण्डेय को लालच देकर विश्वास में लिया गया।
रक्षाबंधन के दिन, जब शिव मंदिर में शस्त्र पूजा हेतु राजपूत निःशस्त्र थे, तब किले का द्वार खोल दिया गया। भारी सेना ने आक्रमण किया।
घमासान युद्ध हुआ।
महाराजा रणवीर सिंह वीरगति को प्राप्त हुए।
महारानी तारादेवी सती हो गईं।
उनके भाई सूरत सिंह शेष परिवार सहित सुरक्षित स्थान पर चले गए।
भाग 4
ऐतिहासिक विरासत
रामपुर के किले के अवशेष
सती तारादेवी मंदिर
स्थानीय परंपराएँ और वंशज
महाराजा रणवीर सिंह ने अंतिम सांस तक पराधीनता स्वीकार नहीं की। उनका बलिदान रोहिलखण्ड की स्वतंत्र चेतना का प्रतीक बना।
निष्कर्ष
महाराजा रणवीर सिंह रोहिला का जीवन भारतीय क्षत्रिय परंपरा, स्वाभिमान और स्वतंत्रता की रक्षा का सशक्त उदाहरण है।
उन्होंने सीमित संसाधनों में भी दिल्ली सल्तनत की शक्तिशाली सेना का सामना किया और क्षात्र धर्म का पालन करते हुए शरणागत को अभयदान दिया — यद्यपि अंततः उन्हें विश्वासघात का सामना करना पड़ा।
उनकी गाथा इतिहास के उन पृष्ठों में स्थान पाने योग्य है जहाँ क्षेत्रीय स्वतंत्रता संग्राम और स्थानीय शौर्य को उचित सम्मान दिया जाए।
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KATHE HAR ROHILKHAND NARESH UNTOLD STORY OF A GREAT WARRIOR

राजपूताना कठेहर रोहिलखंड के अमर अपराजित योद्धा ,
सूर्यवंशी क्षत्रिय सम्राट महाराजा रणवीर सिंह रोहिला
25 अक्टूबर — स्वाभिमान दिवस | रक्षा बंधन — शौर्य एवं बलिदान दिवस
⚔️ “धर्म, स्वाभिमान और मातृभूमि की रक्षा हेतु जिसने अंतिम सांस तक संघर्ष किया” ⚔️
भारतीय इतिहास के पन्नों में अनेक ऐसे वीर हुए जिन्होंने विदेशी आक्रांताओं के सामने कभी सिर नहीं झुकाया। उन्हीं अमर योद्धाओं में एक तेजस्वी नाम है —
महाराजा रणवीर सिंह रोहिला
जो राजपूताना कठेहर रोहिलखंड के महान सूर्यवंशी क्षत्रिय सम्राट थे।
उनका जीवन केवल युद्ध गाथा नहीं, बल्कि धर्म रक्षा, राष्ट्र गौरव, क्षात्र मर्यादा और आत्मबलिदान का अद्वितीय उदाहरण है।
🛕 जन्म एवं वंश परिचय
जन्म : 25 अक्टूबर 1204 ईस्वी
तिथि : कार्तिक मास, कृष्ण पक्ष, प्रथमा
संवत : 1261 विक्रमी
पिता : महाराजा त्रिलोक सिंह जी
वंश : रघुवंशी सूर्यवंश — निकुंभ शाखा
गोत्र : वशिष्ठ
इष्टदेव : भगवान रघुनाथ जी
उद्घोष : हर हर महादेव
महाराजा रणवीर सिंह उस गौरवशाली सूर्यवंश से संबंधित थे जिसकी परंपरा भगवान श्रीराम तक जाती है। यह वंश वीरता, त्याग और धर्मपालन के लिए प्रसिद्ध रहा।
🌄 कठेहर रोहिलखंड राज्य की स्थापना
निकुंभ वंशी कठ क्षत्रियों का मूल क्षेत्र रावी नदी के तटवर्ती भाग माना जाता है। समय के साथ यह वंश राजस्थान, सौराष्ट्र और फिर पांचाल-मध्यदेश क्षेत्र में पहुँचा।
कन्नौज के पतन के बाद इस वीर क्षत्रिय वंश ने कठेहर रोहिलखंड राज्य की स्थापना की और अहिक्षेत्र के समीप रामनगर तथा बाद में रामपुर को राजधानी बनाया।
राज्य विस्तार
गंगा-यमुना दोआब
उत्तराखंड सीमा तक
नेपाल की तराई तक
लगभग 25,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र
यह राज्य उस समय उत्तर भारत की प्रमुख स्वतंत्र राजपूत शक्तियों में गिना जाता था।
🗡️ महाराजा रणवीर सिंह का उदय
1225 ईस्वी में मात्र 21 वर्ष की आयु में महाराजा रणवीर सिंह का राजतिलक हुआ। उसी वर्ष उनका विवाह विजयपुर सीकरी की राजकुमारी तारा देवी से हुआ।
उनके व्यक्तित्व का वर्णन अत्यंत अद्भुत मिलता है—
लगभग 7 फीट ऊँचा शरीर
60 सेर का कवच
25 सेर की विशाल तलवार
असाधारण युद्ध कौशल
उनके साथ 84 महान कवचधारी राजपूत योद्धाओं की सेना रहती थी, जिनमें राठौड़, चौहान, परमार, गोड़, वच्छिल आदि वीर शामिल थे।
⚔️ दिल्ली सल्तनत से संघर्ष
जब पृथ्वीराज चौहान के बाद अधिकांश राजपूत शक्तियाँ कमजोर पड़ चुकी थीं, उस समय दिल्ली सल्तनत उत्तर भारत में अपना विस्तार कर रही थी।
किन्तु कठेहर रोहिलखंड की धरती पर महाराजा रणवीर सिंह ने विदेशी सत्ता को कभी स्वीकार नहीं किया।
उन्होंने —
दिल्ली सल्तनत की अनेक सेनाओं को पराजित किया
रोहिलखंड में मुस्लिम सल्तनत का प्रवेश रोका
आसपास की राजपूत शक्तियों को संगठित किया
स्वतंत्रता और धर्म रक्षा की लौ जीवित रखी
🔥 1253 ईस्वी का ऐतिहासिक युद्ध
दिल्ली सल्तनत के सेनापति नासिरुद्दीन महमूद (चंगेज) ने रोहिलखंड को जीतने के लिए विशाल सेना के साथ आक्रमण किया।
रामपुर और पीलीभीत के मध्य हुए भीषण युद्ध में—
महाराजा रणवीर सिंह की लगभग 6000 सेना
और 84 कवचधारी वीरों ने
दिल्ली सल्तनत की 30,000 सेना को परास्त कर दिया
इतिहास के अनुसार नासिरुद्दीन महमूद को बंदी बना लिया गया था।
किन्तु क्षात्र धर्म का पालन करते हुए महाराजा रणवीर सिंह ने उसे अभयदान देकर मुक्त कर दिया।
⚠️ विश्वासघात और बलिदान
पराजय से अपमानित नासिरुद्दीन ने छल का सहारा लिया।
राजदरबार के एक व्यक्ति गोकुलराम पांडेय को लालच देकर उसने किले की गुप्त जानकारी प्राप्त की। रक्षा बंधन के दिन जब सभी राजपूत शिव मंदिर में शस्त्र पूजा हेतु निःशस्त्र थे, तभी विश्वासघात कर किले का द्वार खोल दिया गया।
फिर क्या हुआ?
निहत्थे राजपूतों ने भीषण युद्ध किया
महाराजा रणवीर सिंह ने अकेले सैकड़ों शत्रुओं का संहार किया
अंतिम रक्त बूंद तक युद्ध करते रहे
पीठ पर वार होने के बाद भी धराशायी नहीं हुए
अंततः रक्षा बंधन के पावन दिन
महाराजा रणवीर सिंह रोहिला वीरगति को प्राप्त हुए।
🔥 महारानी तारा देवी का जौहर
महाराजा के बलिदान के पश्चात् महारानी तारा देवी ने सती होकर क्षत्राणी धर्म का पालन किया।
आज भी रामपुर क्षेत्र में किले के अवशेष, सती स्थल और ऐतिहासिक टीले उस गौरवगाथा के साक्षी माने जाते हैं।
🛡️ क्यों महत्वपूर्ण है यह इतिहास?
महाराजा रणवीर सिंह का जीवन हमें सिखाता है—
✅ धर्म की रक्षा सर्वोपरि है
✅ विश्वासघात सबसे बड़ा शत्रु है
✅ राष्ट्र और स्वाभिमान हेतु संघर्ष कभी व्यर्थ नहीं जाता
✅ छोटी शक्ति भी संगठन और साहस से बड़ी साम्राज्यवादी ताकतों को चुनौती दे सकती है
📜 आज भी जीवित है उनकी स्मृति
रोहिला क्षत्रिय समाज आज भी—
25 अक्टूबर को स्वाभिमान दिवस
तथा
रक्षा बंधन को शौर्य एवं बलिदान दिवस
के रूप में मनाता है।
शस्त्र पूजन, वीर स्मरण और समाज जागरण कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।
🚩 अमर संदेश
“क्षात्र धर्म केवल युद्ध नहीं, बल्कि सत्य, संस्कृति और स्वाभिमान की रक्षा का संकल्प है।”
महाराजा रणवीर सिंह रोहिला का बलिदान भारतीय इतिहास की उन अमर गाथाओं में से है जिन्हें आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाना आवश्यक है।
📚 संदर्भ स्रोत
इतिहास रोहिला राजपूत — डॉ. के.सी. सेन
रोहिला क्षत्रियों का क्रमबद्ध इतिहास — दर्शन लाल रोहिला
रोहिला क्षत्रिय वंश भास्कर — आर.आर. राजपूत
मध्यकालीन भारत — ठाकुर अजित सिंह परिहार
अन्य पारंपरिक राजपूत वंशावली स्रोत
🚩 जय राजपुताना — जय कठेहर रोहिलखंड 🚩
⚔️ हर हर महादेव ⚔️

Friday, 19 June 2026

ROHILA GOURAV

📜 गौरवशाली इतिहास के कुछ स्वर्णाक्षर
⚔️ रोहिला क्षत्रिय गौरव गाथा ⚔️
“इतिहास केवल तिथियों का संग्रह नहीं होता,
वह उन वीरों की अमर गाथा होता है जिन्होंने अपने रक्त से राष्ट्र की सीमाएँ लिखीं।”
✨ भूमिका
भारतवर्ष प्राचीन काल में लगभग 42,02,500 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में विस्तृत था। यह भूमि सदैव वीरता, धर्मरक्षा और क्षत्रिय परम्पराओं की जननी रही है। इन्हीं गौरवशाली क्षत्रिय परम्पराओं में रोहिला क्षत्रिय एक प्रमुख और ऐतिहासिक पहचान रखते हैं।
“रोहिला” केवल एक नाम नहीं, बल्कि पराक्रम, स्वाभिमान, राष्ट्ररक्षा, त्याग और धर्मनिष्ठा का जीवंत प्रतीक है। रोहिला राजपूतों का एक गोत्र, कबीला, परिवार एवं परिजन-समूह रहा है जिसने कठेहर–रोहिलखण्ड की स्थापना कर मध्यकालीन भारत में अपनी वीरता का अमिट इतिहास स्थापित किया।
🛡️ 1. रोहिला साम्राज्य
विषय
विवरण
कुल क्षेत्रफल
लगभग 25,000 वर्ग किमी (10,000 वर्ग मील)
शासन क्षेत्र
कठेहर–रोहिलखण्ड
राजधानी
बरेली
शासन काल
1702 ई. – 1720 ई.
प्रमुख पहचान
वीरता, राष्ट्ररक्षा, क्षत्रिय परम्परा
रोहिले-राजपूत प्राचीन काल से ही सीमा-प्रांत, मध्यदेश (गंगा-यमुना दोआब), पंजाब, कश्मीर, गुजरात, राजस्थान और मध्यप्रदेश आदि क्षेत्रों में शासन करते रहे। बाद में अठारहवीं शताब्दी में मुस्लिम सत्ता स्थापित हुई उन्होंने खुद को रोहिला /रूहेला सरदार घोषित किया उन्हीं के द्वारा कटेहर रोहिलखंड को उर्दू में “रूहेलखण्ड” कहा गया।
🏰 2. राजा इन्द्रगिरी और प्राचीन रोहिला किला
रोहिले राजपूतों के महान शासक राजा इन्द्रगिरी (इन्द्रसेन) ने सहारनपुर में रोहिलखण्ड की पश्चिमी सीमा पर एक विशाल दुर्ग का निर्माण कराया जिसे आज “प्राचीन रोहिला किला” कहा जाता है।
काल
घटना
1801 ई.
अंग्रेजों ने रोहिलखण्ड पर अधिकार किया
1806–1857 ई.
रोहिला किले को कारागार में बदला गया
वर्तमान
सहारनपुर जिला कारागार उसी किले में स्थित
☀️ 3. “सहारन” गोत्र की परम्परा
“सहारन” राजपूतों का एक प्रमुख गोत्र है जो रोहिला क्षत्रियों में भी पाया जाता है। इसे सूर्यवंश की शाखा माना जाता है जिसका संबंध राजा भरत के पुत्र तक्ष से बताया गया है।
फिरोज तुगलक के आक्रमण के समय थानेसर का शासक भी राजा सहारन था।
⚔️ 4. राजा रणवीर सिंह कठेहरिया
दिल्ली सल्तनत के गुलाम वंश के समय रोहिलखण्ड की राजधानी रामपुर में राजा रणवीर सिंह कठेहरिया का शासन था।
विशेषता
विवरण
वंश
निकुम्भ वंशीय सूर्यवंशी
क्षेत्र
रामपुर (रोहिलखण्ड)
उपलब्धि
दिल्ली सल्तनत के सेनापति नसीरुद्दीन चंगेज नसीरुद्दीन महमूद ,को पराजित किया
📖 5. “खण्ड” शब्द की क्षत्रिय परम्परा
“खण्ड” शब्द प्राचीन क्षत्रिय राज्यों की पहचान माना जाता है।
क्षत्रिय नाम
इस्लामी प्रभाव वाले नाम
भरतखण्ड
दौलताबाद
बुन्देलखण्ड
मुरादाबाद
रोहिलखण्ड
जलालाबाद
उत्तराखण्ड
फैजाबाद
कुमायुखण्ड
हैदराबाद
“रोहिल” प्राकृत भाषा का तथा “खण्ड” संस्कृत का शब्द है।
🪔 6. रोहिला क्षत्रियों के ऐतिहासिक प्रमाण
रोहिला क्षत्रियों की उपस्थिति अनेक प्रमाणों में प्राप्त होती है —
यौधेय गणराज्य के सिक्के
गुजरात का 1445 वि. का शिलालेख
मंडोर शिलालेख
जोधपुर लेख
पृथ्वीराज रासो
आल्हाखण्ड काव्य
सहारनपुर का प्राचीन रोहिला किला
रानी तारादेवी सती मंदिर
पीलीभीत की सती स्मृतियाँ
“राजा रणवीर सिंह रोहिला मार्ग”
“रोहिलखण्ड रेलवे”
अखिल भारतीय रोहिला क्षत्रिय संगठन
📜 7. संस्कृत वाणी का गौरव
“नगरे नगरे ग्रामै ग्रामै विलसन्तु संस्कृतवाणी।
सदने-सदने जन-जन बदने, जयतु चिरं कल्याणी।।“
यह केवल श्लोक नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति और सनातन परम्परा की आत्मा है।
⚔️ 8. पानीपत का तृतीय युद्ध (1761 ई.)
1761 ई. में हुए पानीपत के तृतीय युद्ध में राजा गंगासहाय राठौर (महेचा) के नेतृत्व में रोहिले राजपूतों ने मराठों की ओर से अहमदशाह अब्दाली और नजीबुद्दौला के विरुद्ध युद्ध किया।
युद्ध
परिणाम
पानीपत तृतीय युद्ध
लगभग 1400 रोहिले राजपूत वीरगति को प्राप्त
🇮🇳 9. 1857 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम
1857 के स्वतंत्रता संग्राम में भी रोहिले राजपूतों ने अद्वितीय योगदान दिया।
ग्वालियर किले में रानी लक्ष्मीबाई को हजारों रोहिले राजपूतों का समर्थन मिला।
स्त्री-पुरुषों ने धन, आभूषण और संसाधन राष्ट्ररक्षा हेतु समर्पित किए।
अंग्रेजों के दमन के कारण अनेक रोहिला परिवार अज्ञातवास में चले गए।
⚔️ 10. राजपूतों की पराजय के प्रमुख कारण
कारण
विवरण
हाथियों का अत्यधिक प्रयोग
युद्धनीति में कमजोरी
सामंतवादी व्यवस्था
संगठन का अभाव
आपसी मतभेद
एकता की कमी
छोटे-बड़े कुलों का भेदभाव
सामूहिक शक्ति कमजोर हुई
🛡️ 11. बप्पा रावल से समर सिंह तक
सम्वत 825 में बप्पा रावल ने चित्तौड़ से विधर्मियों को खदेड़ते हुए ईरान तक विजय अभियान चलाया।
काल
विवरण
बप्पा रावल
ईरान तक विजय
400 वर्ष
गहलौतों का शासन
24 शाखाएँ
16 गोत्र आज भी रोहिला राजपूतों में
⚔️ 12. राणा समर सिंह और कुतुबुद्दीन की पराजय
1193 ई. में चित्तौड़ के राणा समर सिंह ने मोहम्मद गौरी के गुलाम कुतुबुद्दीन के आक्रमण को विफल कर दिया।
विशेषता
विवरण
सहयोगी
9 राजा, 1 रावत, रोहिला वीर
परिणाम
कुतुबुद्दीन पुनः चित्तौड़ की ओर नहीं बढ़ा
🌾 13. जाट समाज में रोहिला गोत्र
रोहिला शब्द क्षेत्रजनित, गुणजनित और मूल-पुरुष नामजनित माना जाता है।
जाट समाज में नाम
क्षेत्र
रूहेला
राजस्थान
रोहेला
उत्तरप्रदेश
रूहिलान
महाराष्ट्र
रूलिया
हरियाणा
🏅 14. रोहिल्ला उपाधि का महत्व
प्राचीन भारत में “रोहिल्ला” कोई जातिसूचक शब्द नहीं था, बल्कि वीरता और युद्धकौशल का सम्मानसूचक क्षत्रिय अलंकरण था।
उपाधियाँ
रावत
महारावत
राणा
महाराणा
रावल
रहकवाल
रोहिल्ला
📜 15. जोधपुर लेख और रोहिल्ला उपाधि
837 ई. के बाउक जोधपुर लेख में प्रतिहार शासक हरिश्चन्द्र को “रोहिल्लद्व्यंक” उपाधि प्राप्त होने का उल्लेख मिलता है —
“वभूव रोहिल्लद्व्यड्कों वेद शास्त्रार्थ पारग:”
अर्थात — वेद-शास्त्र में पारंगत रोहिल्ला उपाधिधारी हरिश्चन्द्र।
⚔️ 16. पृथ्वीराज चौहान और रोहिल्ला सेनानायक
महाराजा पृथ्वीराज चौहान की सेना में लगभग 100 रोहिल्ला राजपूत सेनानायक थे।
“चहूँप्रान, राठवर, जाति पुण्डीर गुहिल्ला ।
बडगूजर पामार, कुरभ, जागरा, रोहिल्ला ।।”
यह रोहिला क्षत्रियों के उच्च स्थान को दर्शाता है।
👑 17. अकबर द्वारा रोहिल्ला उपाधियाँ
मुगल सम्राट अकबर युद्ध में वीरता दिखाने वाले राजपूत सरदारों को “रोहिल्ला” उपाधि से सम्मानित करता था।
काबुल विजय के बाद महाराणा मान सिंह के सरदारों को —
रावल
रोहिल्ला
रावराज
आदि उपाधियाँ दी गईं।
🌺 18. रोहिला समाज : वर्तमान स्थिति
आज रोहिला-राजपूत समाज मुख्यतः —
कार्यक्षेत्र
प्रतिशत
कृषि
40%
श्रम
30%
व्यापार व लघु उद्योग
30%
सदियों तक संघर्ष और आक्रमणों का सामना करते हुए यह समाज बिखर गया, परन्तु इसकी संस्कृति और परम्परा आज भी जीवित है।
🛡️ 19. प्रमुख रोहिला गोत्र
रोहिला, रोहित, रोहिल, रावल, रूहिलान, रावत, पुण्डीर, चौहान, निकुम्भ, राठौर, बुन्देला, परमार, तोमर, गहलौत, कछवाहा, सिसौदिया, सिकरवार, सोलंकी, कश्यप, यदुवंशी आदि अनेकों गोत्र आज भी रोहिला क्षत्रिय परम्परा में पाए जाते हैं।
👑 20. प्रमुख रोहिला क्षत्रिय शासक
शासक
क्षेत्र / विशेषता
अंगार सैन
गांधार
अश्वकरण
मश्कावती दुर्ग
अजयराव
स्यालकोट
विग्रह राज
रोहिलखण्ड विस्तार
रणवीर सिंह
रोहिलखण्ड
राजा सहारन
थानेसर
गंगसहाय
पानीपत युद्ध
राणा प्रताप सिंह
कौराली
राजा इन्द्रगिरी
सहारनपुर रोहिला किला
राजा बुद्धदेव रोहिला
1787 ई. युद्ध
🔥 समापन
“इतिहास के दर्पण में झाँकते चित्र आज भी पुकारते हैं —
पहचानो अपने पूर्वजों को,
पहचानो अपनी संस्कृति को,
पहचानो अपने रक्त में बहती उस क्षत्रिय चेतना को।”
🚩 प्रेरणादायी संदेश
“क्षत्रिय एकता का बिगुल फूँक
सब धुंधला-धुंधला छँटने दो।
हो अखण्ड भारत के राजपुत्र,
खण्ड-खण्ड में न सबको बँटने दो।।“
🚩 जय क्षत्रिय धर्म
🚩 जय राजपूताना रोहिलखण्ड
🚩 जय भारत